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Sukta 3.27
Viśvāmitra Gāthina
Agni (as the one who leads offerings to the gods; verse frames ascent of offerings/forces)
Gāyatrī (shorter tri-pāda style; this verse is compact and gāyatrī-like in feel—exact metrical counting may vary by recension)
This hymn to Agni presents him as the forward-leading power of the sacrifice who carries the clarified offering upward and makes the path to the gods accessible. It repeatedly frames “vāja” (plenitude, victorious force) as something set in motion and guided by Agni through the adhvara (the sacrificial journey). The sukta culminates in kindling Agni as the bull-force, asking him to blaze widely in the Vast (bṛhat), granting grace and accomplishment of the yajña.
Mantra 1
प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या । देवाञ्जिगाति सुम्नयुः ॥
तुम्हारी ताकत आगे बढ़ रही है, ऊपर की तरफ, जैसे यज्ञ में सामान लेकर जा रहे हो। घी की रोशनी के साथ चल रहे हो, और भगवान तक पहुँच रहे हो, उनकी कृपा माँग के।
Mantra 2
ईळे अग्निं विपश्चितं गिरा यज्ञस्य साधनम् । श्रुष्टीवानं धितावानम् ॥
मैं अग्नि को अपनी ज़बान से पुकारता हूँ। वो सब कुछ समझता है और यज्ञ को पूरा करता है। वो सबकी बात सुनता है और अपने ध्यान में स्थिर रहता है।
Mantra 3
अग्ने शकेम ते वयं यमं देवस्य वाजिनः । अति द्वेषांसि तरेम ॥
अग्नि, हम तेरे शक्तिशाली लोग बन जाएँ। हम भगवान के नियम तक पहुँचें। और जो लोग हमसे नफ़रत करते हैं, उनसे हम आगे निकल जाएँ।
Mantra 4
समिध्यमानो अध्वरेऽग्निः पावक ईड्यः । शोचिष्केशस्तमीमहे ॥
यज्ञ के रास्ते में अग्नि को जलाया जा रहा है। वो साफ करता है और उसे पूजना चाहिए। उसके बाल आग जैसी चमक में हैं। हम उसे ढूंढते हैं।
Mantra 5
पृथुपाजा अमर्त्यो घृतनिर्णिक्स्वाहुतः । अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट् ॥
अग्नि की ताकत बहुत बड़ी है। वो अमर है और चमक में ढाका है। उसे सही तरीके से भोग लगाया जाता है। वो यज्ञ के भोग को ले जाता है।
Mantra 6
तं सबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञवन्तः । आ चक्रुरग्निमूतये ॥
यज्ञ करने वाले लोग अपने हाथ में चम्मच लेकर आगे बढ़ते हैं। उनका मन एक जगह लगा है। वो अग्नि को मदद के लिए बुला ले आते हैं। यह भगवान की इच्छा की ताकत है।
Mantra 7
होता देवो अमर्त्यः पुरस्तादेति मायया । विदथानि प्रचोदयन् ॥
वो भगवान जो कभी मरता नहीं, वो आगे आगे चल रहा है। अपनी शक्ति से वो सब जगह पहुँचता है। यज्ञ के सब लोगों को सही दिशा में ले जाता है।
Mantra 8
वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वरेषु प्र णीयते । विप्रो यज्ञस्य साधनः ॥
वो सब कुछ देने वाला है, और जहाँ भी कुछ मिलता है, वहीं है। यज्ञ के काम में आगे बढ़ता है। यह वो शक्ति है जो यज्ञ को पूरा करती है।
Mantra 9
धिया चक्रे वरेण्यो भूतानां गर्भमा दधे । दक्षस्य पितरं तना ॥
अपनी सोच से उसने सब कुछ बनाया है। सब प्राणियों की शुरुआत उसने की है। अपने शरीर में उसने दक्ष को स्थित किया, जो सब समझता है।
Mantra 10
नि त्वा दधे वरेण्यं दक्षस्येळा सहस्कृत । अग्ने सुदीतिमुशिजम् ॥
मैं तुम्हे बिठा रहा हूँ, अग्नि। तुम सबसे बढ़कर हो। दक्ष की सोच से तुम पैदा हुए, शक्ति से बने हो। तुम चमकते हो और यज्ञ के लिए तैयार हो।
Mantra 11
अग्निं यन्तुरमप्तुरमृतस्य योगे वनुषः । विप्रा वाजैः समिन्धते ॥
अग्नि सबको सही रास्ता दिखाता है और काम पूरा करता है। सच्चाई के साथ जुड़ कर वो सबसे जुड़ता है। रिशि लोग उसे अपनी शक्ति से जलाते हैं।
Mantra 12
ऊर्जो नपातमध्वरे दीदिवांसमुप द्यवि । अग्निमीळे कविक्रतुम् ॥
मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ। यह बलवान है और हमें खुश रखता है। यह यज्ञ में चमकता है और आसमान की तरफ जाता है। इसकी इच्छा भी रिशि जैसी है, जो साफ देख सकता है।
Mantra 13
ईळेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यते वृषा ॥
अग्नि को प्रणाम करना चाहिए। यह अंधेरा में भी साफ दिखता है। जब यह जलता है तो पूरा जलता है। इसमें बहुत ताकत है जो आगे बढ़ाता है।
Mantra 14
वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईळते ॥
अग्नि जलता है और बलवान है जैसे बैल। यह गॉड का घोड़ा है जो उन्हें ले के जाता है। जो लोग हवन करते हैं वो अग्नि को पुकारते हैं।
Mantra 15
वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीद्यतं बृहत् ॥
अग्नि, तुम बहुत ताकत वाले हो। हम भी ताकत ले के तुम्हे जलाते हैं। तुम बड़े हो और चारो तरफ फैलो।
It praises Agni as the power that leads the sacrifice forward and carries the offering upward to the gods, so that grace and success return to the worshipper.
“Vāja” is the hymn’s way of describing energized abundance and victory. Agni sets this force in motion and guides it through the sacrificial journey so it becomes effective.
It means “Agni, blaze widely in the Vast.” The prayer asks the fire to expand in power and light, completing the rite and opening a larger, auspicious state.
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