
Sukta 10.95
Triṣṭubh (predominant in RV 10.95; dialogue sections vary but largely Triṣṭubh)
RV 10.95 is a dramatic dialogue between the mortal king Purūravas (Aiḷa) and the apsaras Urvāśī, exploring the strain between human desire and divine conditions. Through sharp exchanges, it frames love as a power that can elevate or unmake, and it closes by placing the human partner under mortality while still allowing a path to heavenly participation through progeny and sacrifice.
Mantra 1
हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृणवावहै नु । न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन्परतरे चनाहन् ॥
अरे पत्नी, इस मुश्किल वक्त में मन से साथ रहो। अब हमारी बातें ऐसे मिल जाएं जैसे दो रागिनी एक हो जाएं। हमारी यह सब बातें खाली नहीं हैं, यह सच हैं। यह मीठा फल देती हैं और आगे के दिनों तक चलेंगी।
Mantra 2
किमेता वाचा कृणवा तवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव । पुरूरवः पुनरस्तं परेहि दुरापना वात इवाहमस्मि ॥
मैं तुम्हारी इस बात से क्या करूँ? मैं तो सुबह की पहली किरण की तरह निकल चुकी हूँ। पुरूरव, तुम वापस अपने घर जाओ। मुझे पकड़ना मुश्किल है, मैं हवा की तरह हूँ।
Mantra 3
इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः । अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः ॥
हमारी इच्छा तेज़ थी, जैसे तीर चला हो, जैसे खज़ाना मिल गया हो, जैसे सौ गाय एक साथ दौड़ रही हों। इतनी चमक थी हमारे इरादे में। लेकिन जब तक कोई वीर साथ नहीं देता, तब तक यह ताकतें काम नहीं करती। वह चीख नहीं सुनती, वह तड़प नहीं समझती।
Mantra 4
सा वसु दधती श्वशुराय वय उषो यदि वष्ट्यन्तिगृहात् । अस्तं ननक्षे यस्मिञ्चाकन्दिवा नक्तं श्नथिता वैतसेन ॥
वह अपने अंदर का खज़ाना लेकर सुबह होने का इंतज़ार करती है। वह देखती है कि कैसे बढ़ा मिले। फिर वह घर की तरफ मुड़ती है। उस रास्ते में दिन और रात दोनों वक्त बंधन टूट जाते हैं।
Mantra 5
त्रिः स्म माह्नः श्नथयो वैतसेनोत स्म मेऽव्यत्यै पृणासि । पुरूरवोऽनु ते केतमायं राजा मे वीर तन्वस्तदासीः ॥
दिन में तीन बार यह बंधन टूटा है। तुमने मुझे पूरा कर दिया, मैं अब टूट नहीं सकती। पुरूरव, मैं तुम्हारी रोशनी के पीछे-पीछे चली आई हूँ। तुम उस वक्त मेरे राजा थे, मेरे वीर थे, मेरे शरीर की ताकत थे।
Mantra 6
या सुजूर्णिः श्रेणिः सुम्नआपिर्ह्रदेचक्षुर्न ग्रन्थिनी चरण्युः । ता अञ्जयोऽरुणयो न सस्रुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त ॥
यह जो तेज़ बहने वाली पनाह है, वो आशीर्वाद से भरी है। इनके दिल में दृष्टि है, यह बंधी नहीं हैं, आराम से चलती हैं। जैसे लाल तेल बह रहा हो, वैसे यह बह रही हैं। सुंदरता और बढ़ाये के लिए आती हैं, जैसे गायें, जैसे दूध देने वाली गायें जो कभी ठहरती नहीं।
Mantra 7
समस्मिञ्जायमान आसत ग्ना उतेमवर्धन्नद्यः स्वगूर्ताः । महे यत्त्वा पुरूरवो रणायावर्धयन्दस्युहत्याय देवाः ॥
जब तुम पैदा हुए, तब ही चमकदार शक्तियाँ वहीं थी। नदियाँ भी तुम्हे बड़ा रही थी, सही रास्ते पे। एक बड़े काम के लिए, पुरूरवा, देवताओं ने तुम्हे मज़बूत किया लड़ने के लिए। अंधेरे दुश्मनों को मारने के लिए।
Mantra 8
सचा यदासु जहतीष्वत्कममानुषीषु मानुषो निषेवे । अप स्म मत्तरसन्ती न भुज्युस्ता अत्रसन्रथस्पृशो नाश्वाः ॥
लेकिन जब इंसान इन नॉन-इंसानी हरकतों में रहने की कोशिश करता है, वो टिक नहीं पाता। जैसे वो शरीर छोड़ देते हैं, मुझसे डर के भाग जाते हैं। जैसे घोड़ों की तरह जो रथ को छू कर डर के भाग जाते हैं।
Mantra 9
यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः क्रतुभिर्न पृङ्क्ते । ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीळयो दन्दशानाः ॥
जब इंसान अमरत्व से जुड़ता नहीं, तब वो अपने शरीर को सजा नहीं देता। जैसे खेलते हुए घोड़े, जो काट रहे हैं और चिंता में हैं, वो उसके रहते हैं लेकिन साथ में नहीं चलते।
Mantra 10
विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि । जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी तिरत दीर्घमायुः ॥
बिजली की तरह चमक कर वो आती है, मुझे छुपी हुई चीज़ें ला कर देती है। वो पैदा हुआ, पानी का बेटा, एक अच्छा इंसान। उर्वशी उसे लंबी ज़िंदगी तक ले जाए।
Mantra 11
जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरूरवो म ओजः । अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि ॥
तुम ऐसे पैदा हुई, इसलिए तुमने मुझमें ताकत डाल दी थी। पर पुरुरव, मैं जानती थी, फिर भी उस दिन मैंने तुम्हे कुछ नहीं कहा। तुमने मेरी बात नहीं सुनी। अब ऐसा क्यों बोल रहे हो जैसे तुमने कभी खुशी ही नहीं देखी?
Mantra 13
प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्ये शिवायै । प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यस्तं नहि मूर मापः ॥
मैं जब जवाब देती हूँ, आँसू वापस आ जाते हैं। वो रो रहा है, पर शांत नहीं हो रहा। मैं तुम्हारी चीज़ें तुम्हे वापस दे रही हूँ। अब तुम जाओ, यहाँ से चले जाओ। पागल मत बनो, मेरे पास मत आना।
Mantra 14
सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्तवा उ । अधा शयीत निॠतेरुपस्थेऽधैनं वृका रभसासो अद्युः ॥
आज वो उड़ कर बहुत दूर चला जाएगा। वापस नहीं आएगा, सबसे आगे जाएगा। फिर वो मौत की गोद में सो जाएगा। और उसके बाद बड़े कुत्त उसे पकड़ लेंगे।
Mantra 15
पुरूरवो मा मृथा मा प्र पप्तो मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन् । न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता ॥
पुरुरव, मत मरो। बरबाद मत हो जाओ। बुरे लोग तुम्हे नहीं काट लें। और हाँ, औरतों की दोस्ती चलती नहीं। वो लोग बाहर से दोस्त लगते हैं, पर अंदर से दुश्मन होते हैं।
Mantra 16
यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः । घृतस्य स्तोकं सकृदह्न आश्नां तादेवेदं तातृपाणा चरामि ॥
मैं इंसानों में रहती थी, अलग-अलग रूप में। चार साल बिताए, रातें गुज़ारी। बस एक बार दिन में थोड़ा सा घी खाया। बस इतना ही, इसी से मैं खुश हूँ।
Mantra 17
अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः । उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्नि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे ॥
मैं वशिष्ठ बोल रहा हूँ। उर्वशी आकाश में घूरती है, दुनिया नापते हुए। मैं उसे समझाना चाहता हूँ, वापस लाना चाहता हूँ। अच्छा काम की भेंट तुम्हारे पास खड़ी है। वापस आ जाओ, मेरा दिल जल रहा है तुम्हे ढूंढते हुए।
Mantra 18
इति त्वा देवा इम आहुरैळ यथेमेतद्भवसि मृत्युबन्धुः । प्रजा ते देवान्हविषा यजाति स्वर्ग उ त्वमपि मादयासे ॥
देवताओं ने तुम्हे कहा, ऐल, तुम मरण के साथ बंधे हो। लेकिन तुम्हारी औलाद देवताओं को हवन करके पूजा करेगी। और तुम भी स्वर्ग में खुश रहोगे।
A tense appeal to the ‘wife’ to stand with the mind in a hard moment, and to blend speech into a workable harmony (words as a ritual act).
The dialogue exposes incompatible expectations: the mortal seeks permanence and possession; the apsaras insists on divine conditions and the limits of embodied life. A key teaching emerges: without grounding and kratu, impulses remain unintegrated—restless like biting horses.
The decisive pronouncement that the mortal becomes ‘mṛtyu-bandhu’—bound to death—clarifying that personal immortality is not seized by passion.
The hymn redirects continuity toward prajā and yajña: offspring will worship with offerings, and the mortal may still partake of heavenly delight within the lawful order (svar).
वचांसि मिश्राः कृणवावहै नुयदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः क्रतुभिर्न पृङ्क्ते । ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीळयो दन्दशानाः ॥मृत्युबन्धुःIt is a conversation between a human king and a divine apsaras. Their love becomes a lesson about why the human world cannot hold the divine on its own terms, and how sacrifice and right order give a lawful connection to heaven.
Because it draws a clear boundary: passion cannot override the conditions of embodied life. The hymn teaches that immortality is approached through alignment with cosmic order—especially through yajña and disciplined will (kratu)—not through possession.
It suggests that inspiration and beauty (apsaras-like energies) must be met with steadiness of mind and discernment. Otherwise, impulses remain restless and unharmonized; when integrated, they ‘adorn’ life and support duty, continuity, and higher joy.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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