Opening the text

Sukta 10.89
Indra
Trishtubh (probable)
This hymn is an expansive praise of Indra as the all-surpassing power who opens the luminous worlds, overflows beyond the “rivers,” and secures victory, wealth, and well-being for his worshippers. It repeatedly affirms Indra’s sovereignty over heaven, earth, waters, and mountains, and petitions him to hear the call in conflict and in peaceful rites, striking down Vṛtra-like obstructions. The purpose is both celebratory and practical: to invoke Indra’s protection, strength, and abundance in the “bearing” (bhara) of life and in the winning of plenitude (vājasāti).
Mantra 1
इन्द्रं स्तवा नृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना वि ज्मो अन्तान् । आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा ॥
इंद्र की तारीफ करो, वो सबसे बड़ा बलवान है। उसकी ताकत से दुनिया का उजाला और उसकी हदें खुल गई। उसने अपनी चौड़ी दायरें भर दी और नदियों से भी आगे बढ़ गया।
Mantra 2
स सूर्यः पर्युरू वरांस्येन्द्रो ववृत्याद्रथ्येव चक्रा । अतिष्ठन्तमपस्यं न सर्गं कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान ॥
वो सूरज जैसा है। इंद्र ने आसमान को रथ के पहिए की तरह घुमा दिया। उसने देखा कि रास्ता बंद है, और अपनी तेज शक्ति से अंधेरा तोड़ दिया।
Mantra 3
समानमस्मा अनपावृदर्च क्ष्मया दिवो असमं ब्रह्म नव्यम् । वि यः पृष्ठेव जनिमान्यर्य इन्द्रश्चिकाय न सखायमीषे ॥
उसके लिए एक साफ गीत गाओ, धरती और आसमान में जैसा कुछ नहीं। इंद्र सब जन्मों को पीठ की तरह साफ देख लेता है। उसका कोई बराबर नहीं, उससे कोई टक्कर नहीं ले सकता।
Mantra 4
इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात् । यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम् ॥
इंद्र के लिए हमारी बातें तीर की तरह होनी चाहिए, सीधा मारका। मैं समुंदर के नीचे से पानी को हिला रहा हूँ। इंद्र की ताकत ऐसी है जैसे पहिया अपने डंडे पर पक्का होता है। उसने धरती और आसमान को पक्का कर दिया है, दोनों को सही जगह पे।
Mantra 5
आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमीवाञ्छरुमाँ ऋजीषी । सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः ॥
जब इंद्र गुस्सा करता है, वो अंत तक जाता है। उसके पास तीन तरह की सुरक्षा है, ताकत, तेज़ता, और अस्त्र। सोम ने इंद्र के बराबर कोई नहीं बनाया। वो इतना ताकतवर है कि सारी दुनिया काँप जाती है।
Mantra 6
न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व नान्तरिक्षं नाद्रयः सोमो अक्षाः । यदस्य मन्युरधिनीयमानः शृणाति वीळु रुजति स्थिराणि ॥
इंद्र को कोई रोक नहीं सकता, ना धरती, ना आसमान, ना बीच का स्पेस, ना पत्थर, ना सोम, ना जुआ। जब उसका गुस्सा उठता है, वो सब तोड़ देता है। जो चीज़ें पक्की लगती हैं, वो भी टूट जाती हैं।
Mantra 7
जघान वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पुरो अरदन्न सिन्धून् । बिभेद गिरिं नवमिन्न कुम्भमा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः ॥
इंद्र ने वृत्र को मारा, जैसे जंगल में कोई पेड़ काट दे। उसने रास्ते के बंधन तोड़ दिए और नदियों को आज़ाद कर दिया। पहाड़ फटा, जैसे नया मटका टूटता है। उसने अपनी ताकत से रोशनी को बाहर निकाला।
Mantra 8
त्वं ह त्यदृणया इन्द्र धीरोऽसिर्न पर्व वृजिना शृणासि । प्र ये मित्रस्य वरुणस्य धाम युजं न जना मिनन्ति मित्रम् ॥
इंद्र, तुम सही रास्ते पे पक्के हो। तुम टेढ़ी बातों को सीधा कर देते हो, जैसे बॉडी का जॉइंट काम करता है। जो लोग मित्र और वरुण के नियमों को तोड़ना चाहते हैं, वो गलत काम करते हैं। यह दोस्ती और साथ को तोड़ने जैसा है।
Mantra 9
प्र ये मित्रं प्रार्यमणं दुरेवाः प्र संगिरः प्र वरुणं मिनन्ति । न्यमित्रेषु वधमिन्द्र तुम्रं वृषन्वृषाणमरुषं शिशीहि ॥
कुछ बुरे लोग हैं जो मित्र और अर्यमन को तकलीफ देते हैं। यह लोग बंधन तोड़ते हैं और वरुण की भी नहीं सुनते हैं। इंद्र, आप अपना तेज़ हथियार उठाओ। आप एक बलवान हाथी हो, तो इन दुश्मनों को मार के गिराओ।
Mantra 10
इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः ॥
इंद्र आसमान का मालिक है, धरती का भी वही राजा है। पानी पर भी इंद्र की हुकूमत है, पहाड़ों पर भी। जो लोग बड़े हो रहे हैं, उनमें भी इंद्र है। जो लोग समझदार हैं, उनमें भी। शांत समय में इंद्र को बुलाओ, काम में भी उसी की मदद लो।
Mantra 11
प्राक्तुभ्य इन्द्रः प्र वृधो अहभ्यः प्रान्तरिक्षात्प्र समुद्रस्य धासेः । प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः ॥
इंद्र रातों से देता है, दिनों से भी देता है। आस-पास की दुनिया से देता है, समुंदर से भी। हवा के फैलने से देता है, धरती के कोने से भी। नदियों से निकल के देता है, जगह-जगह से देता है।
Mantra 12
प्र शोशुचत्या उषसो न केतुरसिन्वा ते वर्ततामिन्द्र हेतिः । अश्मेव विध्य दिव आ सृजानस्तपिष्ठेन हेषसा द्रोघमित्रान् ॥
इंद्र, तुम चमक के उड्डो जैसे सुबह की लाली चमकती है। तुम्हारा हथियार ऐसा चल रहा है जो कभी खत्म नहीं होता। पत्थर की तरह मारो इन लोगों को। आसमान से ज़ोर मार के आओ। जो दोस्ती तोड़ते हैं, उन्हे आग की तरह जला दो।
Mantra 13
अन्वह मासा अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु पर्वतासः । अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जायमानम् ॥
महीना-महीना इंद्र के पीछे चला। जंगल चला, घास-पात चला, पहाड़ भी चला। दोनों दुनिया चिल्लाते हुए चली, इंद्र के पीछे। पानी भागा उसके पीछे जब वो पैदा हो रहा था।
Mantra 14
कर्हि स्वित्सा त इन्द्र चेत्यासदघस्य यद्भिनदो रक्ष एषत् । मित्रक्रुवो यच्छसने न गावः पृथिव्या आपृगमुया शयन्ते ॥
इंद्र, कब तेरी ताकत आएगी? कब तू बुराई और राक्षस को तोड़ देगा जो हमारे ऊपर आ रहा है? जो लोग साथ नहीं निभाते, वो ज़मीन पर गिर गए हैं। जैसे बड़े जानवर मार खाते हैं, वैसे ही वो भी मार खा गए।
Mantra 15
शत्रूयन्तो अभि ये नस्ततस्रे महि व्राधन्त ओगणास इन्द्र । अन्धेनामित्रास्तमसा सचन्तां सुज्योतिषो अक्तवस्ताँ अभि ष्युः ॥
जो लोग हमारे दुश्मन बन के फैल गए हैं, उन्होंने हम पर बहुत ज़ुल्म किया है। इंद्र, इन दुश्मनों को अंधेरे में डाल दे। उनकी आँखें बंद हो जाएं। और हमारे साथ जो भी अच्छी ताकतें हैं, वो उन पर भारी हो जाएं।
Mantra 16
पुरूणि हि त्वा सवना जनानां ब्रह्माणि मन्दन्गृणतामृषीणाम् । इमामाघोषन्नवसा सहूतिं तिरो विश्वाँ अर्चतो याह्यर्वाङ् ॥
बहुत लोग तुझे पूजा के लिए बुलाते हैं और रिशि भी तेरे लिए गाते हैं। यह सब आवाज़ सुन के हमारे पास आ जा। हम तुझे बुला रहे हैं, तू सबसे पहले हमारे पास आ। बाकी सब को छोड़ के हमारी तरफ आ।
Mantra 17
एवा ते वयमिन्द्र भुञ्जतीनां विद्याम सुमतीनां नवानाम् । विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विश्वामित्रा उत त इन्द्र नूनम् ॥
इंद्र, हम तुझे जानना चाहते हैं। जो खुशियाँ तू देता है, उनको पाना चाहते हैं। हम तेरे लिए गाते हैं और तेरी मदद से सुबह की रोशनी पाते हैं। हम विश्वामित्र के परिवार से हैं और अभी तुझसे यह उम्मीद रखते हैं।
Mantra 18
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ । शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम् ॥
हम इंद्र को बुलाते हैं ताकि हमें अच्छा मिले। वो देने वाला है और जंग में हमारा साथ देता है। वो दुश्मनों को मारता है और धन जीतता है। हम चाहते हैं कि वो हमारे लिए सुनने और लड़ने वाला हो।
It praises Indra as the supreme power who rules the cosmic regions and breaks obstacles, and it asks him for protection, success, victory, and prosperity in life’s struggles and works.
This is a Vedic way of saying Indra’s power is total and comprehensive—he governs all domains of existence, so he can support both outer order (nature and society) and inner strength (mind and will).
Traditionally it supports Indra-invocation in offerings (often soma or ghee) for strength and success; in a personal recitation, it can be used as a prayer to overcome inner blocks and to gain courage, clarity, and steady progress.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.