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राजधर्म से वनधर्म की ओर संक्रमण—यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है। अयोध्या का लोक-शोक, मिथिला का शोक, और भरत की निर्मल निष्ठा मिलकर साधक को यह सिखाते हैं कि ईश्वर-इच्छा के सामने सांसारिक व्यवस्था (राज्य, कुल, प्रतिष्ठा) भी अस्थिर है। इस चरण में मुक्ति की सीढ़ी ‘त्याग’ नहीं, बल्कि ‘अनासक्ति सहित कर्तव्य’ है—राम की मौन-लीला, भरत की सत्य-भावना, और वसिष्ठ का धीरज-उपदेश मन को शरणागति की ओर चढ़ाते हैं।
यह प्रकरण ‘राजधर्म से वनधर्म’ की देहरी है, जहाँ त्याग का बाह्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनासक्ति सहित कर्तव्य को मुक्ति-सीढ़ी बनाया गया है। अयोध्या का असमंजस और मिथिला का शोक—दोनों मिलकर दिखाते हैं कि राज्य, कुल, प्रतिष्ठा जैसी सांसारिक व्यवस्थाएँ ईश्वर-इच्छा के सामने अस्थिर हैं। देवताओं की पुष्प-वृष्टि लोक-शोक के बीच दैवी दृष्टि से धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है—मानो आकाश कह रहा हो: “वियोग भी साधना है।” समुद्र/नाव/केवट रूपक ज्ञान-वैराग्य की सीमा बताता है: केवल तर्क-ज्ञान प्रेम-सरिता पार नहीं करा सकता; राम-प्रेम ही पारावार है। वसिष्ठ का उपदेश शोक के बीच ‘धीरज’ का स्तम्भ बनकर करुणा को शान्ति में रूपान्तरित करता है। फल-मूल-आहार की व्यवस्था वनधर्म को ‘आश्रम-धर्म’ में ढालती है—वियोग के समय भी जीवन-व्यवस्था धर्मानुकूल रहे, यही साधक के लिए संकेत है।
Verse 551 (चौपाई)
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।। चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।। जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।। करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।। दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।। सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।। बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
भरत के साफ बात सुनकर भगवान लोग खुश हो गए। संत लोग भी उसकी तारीफ करने लगे, और ऊपर से फूल बरसने लगे। अयोध्या के लोग बहुत कन्फ्यूज्ड थे कि क्या हो रहा है। लेकिन दिल से खुश थे, और जो साधु जंगल में रहते थे वो भी खुश थे। राम और लक्ष्मण शरम से चुप हो गए। सभा में सब लोग सोचने लगे कि अब क्या होगा। उसी टाइम पर जनक के दूत आ गए। मुनि वशिष्ठ ने सुनकर उन्हें जल्दी बुलाया। वो लोग झुक कर राम को देखने लगे। राम के कपड़े देख कर वो बहुत दुखी हो गए। दूत ने मुनि से पूछा कि सब ठीक है या नहीं। मुनि ने कहा कि जनक के राजा का क्या हाल है बताओ। यह सुनकर वो लोग शरम से ज़मीन तक सिर झुका दिए। हाथ जोड़ कर बोले कि हम आपके सेवक हैं। राजा ने हमे भेजा है कि सब ठीक है या नहीं जान ले।
Verse 552 (दोहा/सोरठा)
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।
अगर अयोध्या के राजा के साथ सब ठीक नहीं है, तो भगवान, सब ठीक होने का मतलब भी चला गया। मिथिला और अयोध्या का जो रिश्ता था, उसकी वजह से पूरा दुनिया अनाथ हो गई है।
Verse 553 (चौपाई)
कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।। जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।। रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।। भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।। नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।। समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।। नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।। बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।
अयोध्या के राजा की बात सुनकर जनक की बेटी और सब लोग पागल हो गए दुख में। उस टाइम पर जो भी जनक को देखता था, उसको लगता था कि नाम तो विदेहा है पर सच में बॉडीलेस हो गया। रानियों ने राजा की खबर सुनकर होश खो दिया, जैसे साँप मणि के बिना हो। भरत राजा बन गया और राम जंगल चले गए। यह सुनकर मिथिला के राजा के दिल में बहुत दुख आया। राजा ने वाइज़ लोगों और मिनिस्टर्स से पूछा कि अब क्या करना चाहिए। अयोध्या और मिथिला दोनों जगह कन्फ्यूज़न था। चलें या रहें, कोई भी साफ जवाब नहीं दे पाया। राजा ने होश संभाला और दिल में सोचा। अयोध्या में एक स्मार्ट मैसेंजर भेजा। उसने कहा कि भरत क्या कर रहा है यह जान कर जल्दी आओ, टाइम मत लगाओ।
Verse 554 (दोहा/सोरठा)
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।
मैसेंजर अयोध्या गए और भरत के बारे में सब जान लिया। उसके काम देख कर वापस आ गए। भरत चित्रकूट के लिए निकल गया और मैसेंजर मिथिला वापस आ गए।
Verse 555 (चौपाई)
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।। सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।। धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।। घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।। दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।। भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।। खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।। साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।
मैसेंजर वापस आए और भरत ने जो कहा था वो किया। जनक की सभा में सब कुछ बता दिया जितना समझ में आया। यह सुनकर गुरु, फैमिली, मिनिस्टर्स और राजा सब लोग सोच में पड़ गए। दिल से बहुत दुखी हो गए। भरत ने होश संभाला और अपनी ग्रेटनेस दिखाई। बहुत सारे सोल्जर्स लिए और रथ वाले को बुलाया। घर, शहर और देश सब पर गार्ड लगाया। घोड़े, गाय, रथ और बहुत सारी चीज़ें रेडी कर ली। सब अरेंजमेंट कर के तुरंत निकल पड़े। रास्ता में एक मिनट भी रेस्ट नहीं किया। आज सुबह प्रयाग में नहा के यमुना पार करने के लिए निकल पड़े। उन्होंने कहा कि हमने राजा को मैसेज भेजा है। यह कह कर ज़मीन तक सिर झुका दिया। मुनि ने उन्हें छह हज़ार किरात लोग दिए साथ में। तुरंत उनका विदा लिया और चले गए।
Verse 556 (दोहा/सोरठा)
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।
जब जनक ने सुना कि सब आ रहे हैं, पूरा अयोध्या खुश हो गया। लेकिन राम को अजीब सा लग रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था। और देवताओं के राजा इंद्र भी बहुत चिंतित हो गए थे।
Verse 557 (चौपाई)
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।। अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।। एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।। करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।। रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।। राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।। सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।। एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।
कैकेई ने जो कपट किया था, उसकी बदनामी हो गई। अब वो किसको दोष दे, किसको बुरा कहे? लोग खुश हो गए और दिन बितने लगे। ऐसा ही एक दिन गुज़र गया। सुबह सब लोग नहाने लगे। नहाके लोग गणेश, गौरी, शिव और सूर्य की पूजा करने लगे। लक्ष्मी और विष्णु के चरणों में माथा टेका और हाथ जोड़के प्रार्थना की। सबने कहा कि राजा राम और रानी जानकी अयोध्या में खुशी लाएँ। पूरा समाज फिर से खुश हो गया। सबने कहा कि राम भरत को युवराजा बनाएँ। इतनी खुशी से सबका दिल भरता गया। देवताओं ने दुनिया को जीने का सौभाग्य दिया।
Verse 558 (दोहा/सोरठा)
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।
गुरु, सब लोग और भाइयों के साथ राम को राज्य मिलना चाहिए। जब तक राम अयोध्या में राजा रहें, तब तक सबकी इच्छा पूरी होती रहे।
Verse 559 (चौपाई)
सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।। एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।। ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।। सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।। लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।। सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।। कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।। हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।
नगर के लोगों की प्यार भरी बातें सुनकर योगी और ज्ञानी लोगों ने उनकी निंदा की। लोग रोज़ अपना काम करते थे और राम को प्रणाम करते थे, बदन में प्रेम आ जाता था। बड़े छोटे, औरत आदमी सब राम को देखते थे अपने अपने हिसाब से। सब ध्यान से उसकी इज्जत करते थे और उसकी मेहरबानी की तारीफ करते थे। राम बच्चों जैसी बातें करता था लेकिन प्यार और नीति समझता था। वो बड़े शील और विनय के सागर थे, चेहरा सुंदर, आँखें कमल जैसी, और स्वभाव सीधा। सब राम के गुण गाते थे अपने प्यार से। हर कोई अपने भाग्य की तारीफ करने लगा। दुनिया में कम लोग ऐसे पुण्य वाले होते हैं जिन्हें राम अपना मानके जानता है।
Verse 560 (दोहा/सोरठा)
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।
इतना सब सुनके मिथिला के राजा जनक प्यार में मगन होकर आए। सूर्यवंश के राजा दशरथ भी अपनी पूरी सभा के साथ हैरानी और उत्साह में उठे।
Verse 561 (चौपाई)
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।। गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।। राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।। मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।। आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।। आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।। लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।। भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।
रघुनाथ अपने भाइयों, मंत्रियों, गुरु और शहर के लोगों के साथ निकले। जब जनक को पहाड़ दिखा, उन्होंने प्रणाम किया और रथ छोड़ दिया। उन्हे राम के दर्शन का इतना शौक था कि रास्ते की थकान का कोई एहसास ही नहीं रहा। उनका मन वहाँ था जहाँ राम और सीता थे। मन वहाँ था तो शरीर को दर्द या सुख का पता ही नहीं चलता था। ऐसे ही जनक अपने सारे लोगों के साथ आगे बढ़ने लगा, प्यार में डूब के। जब पास पहुँचे और एक दूसरे का प्यार दिखा, तो इज्जत से मिले। जनक रिशियों के पास झुक के प्रणाम करने लगे। राम ने भी रिशियों को प्रणाम किया। फिर राम अपने भाइयों के साथ राजा से मिले और सारी संगत लेकर चल दिए।
Verse 562 (दोहा/सोरठा)
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
आश्रम समुंदर जैसा था, शांत और अमृत से भरा हुआ। जो भी वहाँ जाता था वो साफ हो जाता था। रघुनाथ वहाँ जा रहे थे, जैसे कोई दया की नदी उन्हे ले जा रही हो।
Verse 563 (चौपाई)
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।। भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।
लोग ज्ञान और वैराग्य की नदी पार कर रहे थे। उनकी बातें दुख भरी थी, जैसे नदियाँ मिल रही हों। चिंता और आहें हवा की तरह चल रही थी। धैर्य का किनारा था, जहाँ पेड़ टूटे हुए थे। दुख की धार बह रही थी, भय और भ्रम के बवाल थे। ज्ञान की नावी थी, बुढ़ापे की विद्या थी, पर कोई एक नहीं पार कर सकता था। वनचर, कोल, किरात सब देख के थक गए। जब आश्रम के समुंदर से मिले, तो मन उठने लगा। दोनों राज समाज दुख में डूब गए, न ज्ञान रहा न धैर्य। राजा के गुण और शील की तारीफ करते करते लोग रोए, दुख के समुंदर में।
Verse 564 (छंद)
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।। सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।
दुख के समुंदर में डूब के औरत और मर्द बहुत परेशान थे। सब को दोष देते हुए गुस्से में बोले, यह कैसा विधाता है जो ऐसा किया। देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी, मुनि सब देख के बोले, तुलसीदास कहते हैं कोई नहीं है जो इस प्यार की नदी पार कर सके।
Verse 565 (दोहा/सोरठा)
किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।
लोगों और बड़े रिशियों को यहाँ वहाँ बहुत उपदेश दिया। राजा ने कहा धैर्य रखो। वसिष्ठ ने विदेह से बात की।
Verse 566 (चौपाई)
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।। तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।। बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।। राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।। सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।। मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।। सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।। पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।
जिसका ज्ञान सूरज जैसा है, वो इस दुनिया की रात को खत्म कर देता है। उसके बोल कमल की किरणें हैं, रिशियों के दिल खिल जाते हैं। ऐसे इंसान के पास मोह और ममता नहीं आ सकती। यह सीता और राम के प्यार की बड़ी बात है। ज्ञानी लोग कहते हैं कि तीन तरह के लोग होते हैं, जो ढूंढते हैं, जो पहुंच गए, जो समझदार हैं। वेद में यह तीन लिखे हैं। जिसके मन में राम के प्यार का रस भरा है, वो साधु लोगों की सभा में बड़ा इज्जत पाता है। राम के प्यार के बिना ज्ञान चमकता नहीं, जैसे सूरज के बिना कमल नहीं खिलता। रिशि विदेह ने उन्हें बहुत तरीके से समझाया। सब लोग राम घाट पर नहाए। आदमी और औरतें दुख में डूब गए थे। वो दिन किसी फेस्टिवल के बिना गुजर गया। जानवर, चिड़िये, हिरन कुछ खाए नहीं। उनके अपने लोग भी कुछ सोच नहीं पा रहे थे।
Verse 567 (दोहा/सोरठा)
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।
दोनों तरफ के लोग, राजा निमि और रघु कुल के राजा, सुबह नहाए। सब लोग बरगद और पेड़ के नीचे बैठ गए। उनका मन दुखी था और बॉडी पतली हो गई थी।
Verse 568 (चौपाई)
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।। हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।। लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।। कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।। तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।। मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।। रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।। कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।
जो दशरथ की सिटी के बड़े लोग थे, और जो मिथिला के राजा के शहर में रहते थे, सब आए थे। जनक कुल के गुरु, जिन्होंने दुनिया के मकसद को समझा था, वो भी था। वो लोग बहुत उपदेश देने लगे, धरम, नीति, वैराग्य, सब बात। रिशि कुशिक ने पुरानी कहानियां सुनाई और सब को अच्छे से समझाया। फिर रघु नाथ ने कुशिक से कहा, प्रभु, पानी के बिना सब सूखा है। रिशि ने कहा, सही कहा आपने। दिन गुजर गया, दोपहर हो गई। रिशि का दुख देख के तिरहुत के राजा ने कहा, यहां खाना ठीक नहीं। राजा ने कहा, क्या करें, सब ठीक है। इजाजत ले के सब नहाने चले गए।
Verse 569 (दोहा/सोरठा)
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।
उस वक्त जंगल में रहने वाले लोग बहुत तरह के फल, फूल, पत्ते, और जड़ ले कर आए। उन्होंने बड़ी-बड़ी टोकरियां भर ली थी।
Verse 570 (चौपाई)
कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।। सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।। बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।। तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।। जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।। तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।। देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।। दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।
राम की कृपा से चित्रकूट पर्वत ने सब की इच्छा पूरी कर दी। एक नज़र में सब दुख दूर हो गया। झील, नदियां, जंगल, ज़मीन, सब खुशी और प्यार से भरी हुई थी। बेल और पेड़ फूल और फल से भरे थे। चिड़िये, हिरण, भंवरे अच्छी आवाज़ में बोल रहे थे। उस वक्त जंगल में बहुत खुशी थी। हवा भी अच्छी चल रही थी, सब को सुख मिल रहा था। इतनी खूबसूरती का बयान नहीं हो सकता। मानो ज़मीन जनक की मेहमान बन गई हो। फिर सब लोग नहाए। राम, जनक और रिशियों ने इजाज़त ली। पेड़ देख कर लोगों का मन भर गया। शहर के लोग यहां-वहां उतरने लगे। फल, जड़, कंद, बहुत तरह की चीज़ें थी। साफ, सुंदर, और अमृत जैसी।
Verse 571 (दोहा/सोरठा)
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।
राम ने इज्जत से सब जगह अपने आदमी भेजे। हर एक के पास भर-भर के तोहफे थे। पहले अपने पुरवजों की पूजा की, फिर भगवान और मेहमान और गुरु सब की पूजा की। फिर सब मिल के खुशी मनाने लगे।
परम्परा में यह अंश ‘भरत-चरित्र’ और ‘वसिष्ठ-धीरज’ के कारण शोक-निवारण, मन की स्थिरता, तथा परिवार/समाज में धर्म-बुद्धि जागरण का फलदायी माना जाता है—विशेषकर वियोग, संकट, और निर्णय-काल में पाठ से धैर्य व शरणागति बढ़ती है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-संपुट; और भरत-प्रसंग में कई परम्पराएँ ‘भरत चरित्र बिनु बिनु’ नहीं, बल्कि ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम संपुट मानती हैं (स्थान-परम्परा अनुसार भेद)।
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