राजधर्म से वनधर्म की ओर संक्रमण—यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है। अयोध्या का लोक-शोक, मिथिला का शोक, और भरत की निर्मल निष्ठा मिलकर साधक को यह सिखाते हैं कि ईश्वर-इच्छा के सामने सांसारिक व्यवस्था (राज्य, कुल, प्रतिष्ठा) भी अस्थिर है। इस चरण में मुक्ति की सीढ़ी ‘त्याग’ नहीं, बल्कि ‘अनासक्ति सहित कर्तव्य’ है—राम की मौन-लीला, भरत की सत्य-भावना, और वसिष्ठ का धीरज-उपदेश मन को शरणागति की ओर चढ़ाते हैं।
यह प्रकरण ‘राजधर्म से वनधर्म’ की देहरी है, जहाँ त्याग का बाह्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनासक्ति सहित कर्तव्य को मुक्ति-सीढ़ी बनाया गया है। अयोध्या का असमंजस और मिथिला का शोक—दोनों मिलकर दिखाते हैं कि राज्य, कुल, प्रतिष्ठा जैसी सांसारिक व्यवस्थाएँ ईश्वर-इच्छा के सामने अस्थिर हैं। देवताओं की पुष्प-वृष्टि लोक-शोक के बीच दैवी दृष्टि से धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है—मानो आकाश कह रहा हो: “वियोग भी साधना है।” समुद्र/नाव/केवट रूपक ज्ञान-वैराग्य की सीमा बताता है: केवल तर्क-ज्ञान प्रेम-सरिता पार नहीं करा सकता; राम-प्रेम ही पारावार है। वसिष्ठ का उपदेश शोक के बीच ‘धीरज’ का स्तम्भ बनकर करुणा को शान्ति में रूपान्तरित करता है। फल-मूल-आहार की व्यवस्था वनधर्म को ‘आश्रम-धर्म’ में ढालती है—वियोग के समय भी जीवन-व्यवस्था धर्मानुकूल रहे, यही साधक के लिए संकेत है।
चौपाई 270.1-4
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे।साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची।प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।
जनक दूत तेहि अवसर आए।मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे।बेषु देखि भए निपट दुखारे।।
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता।कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा।बोले चर बर जोरें हाथा।।
बूझब राउर सादर साईं।कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
bharata bacana suci suni sura haraṣe |sādhu sarāhi sumana sura baraṣe ||
asamaṁjasa basa avadha nevāsī |pramudita mana tāpasa banabāsī ||
cupahiṁ rahe raghunātha sãkocī |prabhu gati dekhi sabhā saba socī ||
janaka dūta tehi avasara āe |muni basiṣṭhã suni begi bolāe ||
kari pranāma tinha rāmu nihāre |beṣu dekhi bhae nipaṭa dukhāre ||
dūtanha munibara būjhī bātā |kahahu bideha bhūpa kusalātā ||
suni sakucāi nāi mahi māthā |bole cara bara joreṁ hāthā ||
būjhaba rāura sādara sāīṁ |kusala hetu so bhayau gosāīṁ ||
भरत के साफ बात सुनकर देवता खुश हो गए। उन्होने उसको साधु कहके तारीफ की और फूल बरसाए। अयोध्या के लोग कन्फ्यूज हो गए थे। पर जो रिशि जंगल मे रहते थे, उनका मन खुश हो गया। राम चुप रहे, थोडा शरमाते हुए। उनकी ये हालत देखकर पूरी सभा सोच मे पड़ गई। उसी वक्त जनक के दूत आ गए। रिशि वसिष्ठ ने ये सुनकर उनको जल्दी बुलवा लिया। उन्होने प्रनाम किया और राम को देखा। राम के कपडे देखकर वो बहुत दुखी हो गए। बडे रिशि ने दूतों से पूछा, बोलो, विदेह के राजा ठीक हैं? ये सुनकर दूत शरम से झिझक गए, जमीन पे सिर रखके हाथ जोडके बोले। आप का इतना प्यार से पूछना ही, स्वामी, उनके ठीक होने का कारण बन गया है।
दोहा 270
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।
nāhi ta kosala nātha keṁ sātha kusala gai nātha |mithilā avadha biseṣa teṁ jagu saba bhayau anātha ||270||
नाथ, कोसल के स्वामी के साथ सारी भलाई चली गई। पूरा जग अनाथ रह गया है, मिथिला और अयोध्या सबसे ज्यादा।
चौपाई 271.1-4
कोसलपति गति सुनि जनकौरा।भे सब लोक सोक बस बौरा।।
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू।नामु सत्य अस लाग न केहू।।
रानि कुचालि सुनत नरपालहि।सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।
भरत राज रघुबर बनबासू।भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।
नृप बूझे बुध सचिव समाजू।कहहु बिचारि उचित का आजू।।
समुझि अवध असमंजस दोऊ।चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी।पठए अवध चतुर चर चारी।।
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ।आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।
kosalapati gati suni janakaurā |bhe saba loka soka basa baurā ||
jehiṁ dekhe tehi samaya bidehū |nāmu satya asa lāga na kehū ||
rāni kucāli sunata narapālahi |sūjha na kachu jasa mani binu byālahi ||
bharata rāja raghubara banabāsū |bhā mithilesahi hṛdayã harā̃sū ||
nṛpa būjhe budha saciva samājū |kahahu bicāri ucita kā ājū ||
samujhi avadha asamaṁjasa doū |calia ki rahia na kaha kachu koū ||
nṛpahi dhīra dhari hṛdayã bicārī |paṭhae avadha catura cara cārī ||
būjhi bharata sati bhāu kubhāū |āehu begi na hoi lakhāū ||
जनक की नगर के लोगों को जब पता चला कि कोसल के राजा का क्या हाल हुआ, तो सब लोग दुख से औबे रहे गए और उनकी होश उड़ गई। जिसने भी उस वक्त जनक राजा को देखा, उसे लगा कि उनका नाम 'विदेह' यानी शरीर छोड़ हुआ, सच है। कोई दूसरा नहीं सोच रहा था। जब राजा ने सुना कि रानी ने कैसा खोटी का काम किया है, तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया, बिल्कुल उस साँप की तरह जिसके माथे का मणि निकल गई हो। भरत को राज मिलेगा और राम को वनवास मिलेगा, ये बात सुनकर मिथिला के राजा के दिल में बहुत दुख और परेशानी छा गई। राजा ने अपने समझदार मंत्रियों की सभा को पूछा, सोच समझ कर बताओ कि आज का सही क्या है। अयोध्या की इस उलझन को सोचते हुए कि जाना चाहिए या रुकना चाहिए, किसी ने कुछ नहीं कहा। राजा ने हिम्मत रखी, दिल में सोच समझ की, और चार होशियार जासूस अयोध्या भेज दिए। पता करो भरत का असली भाव कैसा है, अच्छा है या बुरा, और जल्दी वापस आओ, ताकि किसी को पता ना चले।
दोहा 271
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।
gae avadha cara bharata gati būjhi dekhi karatūti |cale citrakūṭahi bharatu cāra cale terahūti ||271||
जासू लोग अयोध्या गए, वहां जाकर उनको भरत की सोच समझ आई और उसके काम देखने को मिला। भरत चित्रकूट को निकल चुका था, और वो जासू लोग तिरहुत को निकल गए।
चौपाई 272.1-4
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी।जनक समाज जथामति बरनी।।
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति।भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई।लिए सुभट साहनी बोलाई।।
घर पुर देस राखि रखवारे।हय गय रथ बहु जान सँवारे।।
दुघरी साधि चले ततकाला।किए बिश्रामु न मग महीपाला।।
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा।चले जमुन उतरन सबु लागा।।
खबरि लेन हम पठए नाथा।तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।
साथ किरात छ सातक दीन्हे।मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।
dūtanha āi bharata kai karanī |janaka samāja jathāmati baranī ||
suni gura parijana saciva mahīpati |bhe saba soca sanehã bikala ati ||
dhari dhīraju kari bharata baṛāī |lie subhaṭa sāhanī bolāī ||
ghara pura desa rākhi rakhavāre |haya gaya ratha bahu jāna sãvāre ||
dugharī sādhi cale tatakālā |kie biśrāmu na maga mahīpālā ||
bhorahiṁ āju nahāi prayāgā |cale jamuna utarana sabu lāgā ||
khabari lena hama paṭhae nāthā |tinha kahi asa mahi nāyau māthā ||
sātha kirāta cha sātaka dīnhe |munibara turata bidā cara kīnhe ||
मैसेंजर्स आकर जनक की सभा में बताए, जितना उनको समझ आया, भरत ने क्या क्या किया। यह सुनके गुरु, परिवार, मंत्री और राजा सब बहुत चिंतित हुए और प्यार से आकुल हो गए। हिम्मत धांके और भरत की तारीफ करके, जनक ने अपने अच्छे सिपाही और अधिकारियों को बुलावा भेजा। घर, शहर और देस की निगेबानी के लिए लोग छोड़ दिए, और घोड़े, हाथी, रथ और कई तरह की गाड़ियां तैयार करवाई। दो घड़ी में सब कुछ तैयार करके तुरंत निकल पड़े, और राजा ने रास्ते में कहीं आराम नहीं किया। आज सुबह प्रयाग में स्नान किया, और अब पूरा झुंड यमुना पार करने लग गया है। हम आगे खबर देने के लिए भेजे गए हैं, प्रभु। यह कहके मैसेंजर्स ने ज़मीन पर मथा टेक दिया। सबसे अच्छे रिशि ने उन्हें छे सात किरात साथ में दिए, और तुरंत मैसेंजर्स को रुखसत कर दिया।
दोहा 272
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।
sunata janaka āgavanu sabu haraṣeu avadha samāju |raghunaṁdanahi sakocu baṛa soca bibasa surarāju ||272||
जनक आने की बात सुनकर अयोध्या के सारे लोग बहुत खुश हो गए. पर राम को बहुत शरम आई. और देवताओं के राजा इंद्र बहुत चिंता में पध गए.
चौपाई 273.1-4
गरइ गलानि कुटिल कैकेई।काहि कहै केहि दूषनु देई।।
अस मन आनि मुदित नर नारी।भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।
एहि प्रकार गत बासर सोऊ।प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी।गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।
रमा रमन पद बंदि बहोरी।बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।
राजा रामु जानकी रानी।आनँद अवधि अवध रजधानी।।
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा।भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू।देव देहु जग जीवन लाहू।।
garai galāni kuṭila kaikeī |kāhi kahai kehi dūṣanu deī ||
asa mana āni mudita nara nārī |bhayau bahori rahaba dina cārī ||
ehi prakāra gata bāsara soū |prāta nahāna lāga sabu koū ||
kari majjanu pūjahiṁ nara nārī |ganapa gauri tipurāri tamārī ||
ramā ramana pada baṁdi bahorī |binavahiṁ aṁjuli aṁcala jorī ||
rājā rāmu jānakī rānī |ānãda avadhi avadha rajadhānī ||
subasa basau phiri sahita samājā |bharatahi rāmu karahũ jubarājā ||
ehi sukha sudhā̃ sīṁcī saba kāhū |deva dehu jaga jīvana lāhū ||
कैकेई को बहुत शरम आ रही थी और पछतावा भी। अब किस्से बात करे, और किस को दोष दे? औरतों और मर्दों के मन्न में ये खयाल आया कि अब और चार दिन रुकना है, तो सब खुश हो गए। वैसे ही वो दिन भी निकल गया। सुबह सब लोग नहाने लगे। नहाने के बाद औरतों और मर्दों ने गनेश, गौरी, शिव और सूर्य की पूजा की। फिर राम और सीता के चरणों में नतक, हाथ जोड़ कर अंचल पकड़े हुए उनसे प्रार्थना की। राम राजा बने और सीता रानी बने, और अयोध्या राजधानी बने, ऐसी खुशी की हद ना हो। अयोध्या फिर से बस जाए अपनी पूरी सभा के साथ, और राम भरत को युवराजा बना दे। हे भगवन, सब को इस खुशी का रस पिला दे, और दुनिया को जीवन का लाभ दे दे।
दोहा 273
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।
gura samāja bhāinha sahita rāma rāju pura hou |achata rāma rājā avadha maria māga sabu kou ||273||
सबको यही दुआ थी कि राम अपने गुरु, सभी मंत्रियों और अपने भाइयों के साथ मिलकर शहर पर राज करें। और जब तक राम अयोध्या के राजा हैं, तब तक हम सब मर जाएँ, बस यही सब चाहते थे।
चौपाई 274.1-4
सुनि सनेहमय पुरजन बानी।निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन।रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।
ऊँच नीच मध्यम नर नारी।लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।
सावधान सबही सनमानहिं।सकल सराहत कृपानिधानहिं।।
लरिकाइहि ते रघुबर बानी।पालत नीति प्रीति पहिचानी।।
सील सकोच सिंधु रघुराऊ।सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।
कहत राम गुन गन अनुरागे।सब निज भाग सराहन लागे।।
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे।जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।
suni sanehamaya purajana bānī |niṁdahiṁ joga birati muni gyānī ||
ehi bidhi nityakarama kari purajana |rāmahi karahiṁ pranāma pulaki tana ||
ū̃ca nīca madhyama nara nārī |lahahiṁ darasu nija nija anuhārī ||
sāvadhāna sabahī sanamānahiṁ |sakala sarāhata kṛpānidhānahiṁ ||
larikāihi te raghubara bānī |pālata nīti prīti pahicānī ||
sīla sakoca siṁdhu raghurāū |sumukha sulocana sarala subhāū ||
kahata rāma guna gana anurāge |saba nija bhāga sarāhana lāge ||
hama sama punya puṁja jaga thore |jinhahi rāmu jānata kari more ||
शहर के लोगों की प्यारी बातें सुन के, रिशि, योगी और ग्यानी लोग अपनी तपस्या को बेकार लगने लगे। शहर के लोग अपना डेली पूजा करके राम को प्रणाम करने गए, उनका पूरा बदन खुशी से काँप रहा था। ऊपर के लोग, नीचे के लोग, बीच वाले, और औरत मर्द सब, अपने अपने लेवल पे राम से मिल पाए। राम ने सब को ध्यान से इज्जत दी, और सब ने उस भगवान की तारीफ की जो कृपा का खजाना है। बचपन से ही राम ने सही रास्ता पकड़ा है, और सच्चा प्यार पहचाना है। राम में नम्रता और शरम का सागर है। सुंदर चेहरा, खूबसूरत आँखें, और बिल्कुल सीधा सा नेचर। लोग राम के बहुत सारे गुण बताते हुए प्रेम से भर गए, और सब अपनी किस्मत की तारीफ करने लगे। दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे पुण्य वाले होंगे जिसे राम जानता है और अपना मानता है।
दोहा 274
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।
prema magana tehi samaya saba suni āvata mithilesu |sahita sabhā saṁbhrama uṭheu rabikula kamala dinesu ||274||
उस वक्त सब लोग प्रेम में खोए थे। तब पता चला कि मिथिला के राजा आ रहे हैं। राम, जो सूर्य वंश के कमल के लिए सूरज हैं, जल्दी उठ खड़े हुए और सारी सभा भी साथ में।
चौपाई 275.1-4
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा।आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं।करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
राम दरस लालसा उछाहू।पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही।बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।
आवत जनकु चले एहि भाँती।सहित समाज प्रेम मति माती।।
आए निकट देखि अनुरागे।सादर मिलन परसपर लागे।।
लगे जनक मुनिजन पद बंदन।रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि।चले लवाइ समेत समाजहि।।
bhāi saciva gura purajana sāthā |āgeṁ gavanu kīnha raghunāthā ||
giribaru dīkha janakapati jabahīṁ |kari pranāma ratha tyāgeu tabahīṁ ||
rāma darasa lālasā uchāhū |patha śrama lesu kalesu na kāhū ||
mana tahã jahã raghubara baidehī |binu mana tana dukha sukha sudhi kehī ||
āvata janaku cale ehi bhā̃tī |sahita samāja prema mati mātī ||
āe nikaṭa dekhi anurāge |sādara milana parasapara lāge ||
lage janaka munijana pada baṁdana |riṣinha pranāmu kīnha raghunaṁdana ||
bhāinha sahita rāmu mili rājahi |cale lavāi sameta samājahi ||
अपने भाइयों, मंत्री, गुरु और शहर के लोगों के साथ, राम आगे निकल पड़े। जैसे ही जनक ने पहाड़ देखा, उन्होंने उसको प्रणाम किया और तुरंत रथ से उतर गए। राम को देखने की चाहत में इतने उतावले थे कि किसी को रास्ते की थकान या तकलीफ महसूस ही नहीं हुई। उनका मन वहाँ था जहाँ राम और सीता थे। जब मन ही वहाँ नहीं, तो शरीर के दुख सुख किसे पता। ऐसे ही जनक अपने साथ के लोगों के साथ आगे बढ़े, सब प्रेम में मस्त थे। जब पास आए और एक दूसरे को देखा, सब प्रेम से भर गए और एक दूसरे को इज्जत से मिलने लगे। जनक रिशियों के पैर छूने लगे, और राम ने रिशियों को प्रणाम किया। राम अपने भाइयों के साथ राजा को गले लगाए, और फिर उन्हें और उनके सारे साथियों को ले कर आगे चल पड़े।
दोहा 275
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
āśrama sāgara sāṁta rasa pūrana pāvana pāthu |sena manahũ karunā sarita liẽ jāhiṁ raghunāthu ||275||
वहां का आश्रम एक समंदर जैसा था, जिसमे शांति भरी पानी था। वहां की भीड़ एक दया की नदी लग रही थी, और राम उनको ले जा रहा था उस समंदर से मिलने।
चौपाई 276.1-4
बोरति ग्यान बिराग करारे।बचन ससोक मिलत नद नारे।।
सोच उसास समीर तंरगा।धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
बिषम बिषाद तोरावति धारा।भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा।सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।
बनचर कोल किरात बिचारे।थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
आश्रम उदधि मिली जब जाई।मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
सोक बिकल दोउ राज समाजा।रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।
भूप रूप गुन सील सराही।रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।
borati gyāna birāga karāre |bacana sasoka milata nada nāre ||
soca usāsa samīra taṁragā |dhīraja taṭa tarubara kara bhaṁgā ||
biṣama biṣāda torāvati dhārā |bhaya bhrama bhavãra abarta apārā ||
kevaṭa budha bidyā baṛi nāvā |sakahiṁ na khei aika nahiṁ āvā ||
banacara kola kirāta bicāre |thake biloki pathika hiyã hāre ||
āśrama udadhi milī jaba jāī |manahũ uṭheu aṁbudhi akulāī ||
soka bikala dou rāja samājā |rahā na gyānu na dhīraju lājā ||
bhūpa rūpa guna sīla sarāhī |rovahiṁ soka siṁdhu avagāhī ||
ये दुख की नदी ग्यान और वैराग्य के ऊंचे किनारे डूब देती है। और लोग जो दुखी होकर जो बातें बोलते हैं, वो इसमें बहने वाली छोटी नदियां हैं। फिकर और आहें इसकी हवा और लहरें हैं। जो सब्र के बड़े पेड़ किनारे खड़े थे, उनको तोड़ देती हैं। भयानक उदासी इसकी तेज़ धार है। और डर और भ्रम के अपने बहुत सारे भंवर हैं। समझदार लोग इसके बोटमैन हैं और ग्यान बड़ी नाव है। पर वो लोग भी पार नहीं कर पाते। कोई पार करने का रस्ता नहीं मिलता। बन में रहने वाले गरीब कोल और किरात मुसाफिर हैं। वो नदी को देखते हैं, थक जाते हैं, और हिम्मत हार देते हैं। जब ये नदी आश्रम के समुंदर से मिली, तो ऐसा लगा जैसे समुंदर उठ कर उबल रहा हो। दोनों राज सभा दुख से भर गई। ना ग्यान बचा, ना सब्र, ना शरम। राजा के रूप, गुण और अच्छे स्वभाव की तारीफ करते हुए, वो रोये, दुख के समुंदर में डूब कर।
छंद 276
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।।
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।
avagāhi soka samudra socahiṁ nāri nara byākula mahā |dai doṣa sakala saroṣa bolahiṁ bāma bidhi kīnho kahā ||
sura siddha tāpasa jogijana muni dekhi dasā bideha kī |tulasī na samarathu kou jo tari sakai sarita saneha kī ||
औरतें और मर्द दुख के समुंदर में डूब गए, बहुत परेशान थे। सब पर दोष लगाते हुए गुस्से में बोले, "उल्टा काम करने वाले भगवान ने क्या किया?" देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और रिशि सब ने जनक राजा की हालत देखी। तुलसीदास कहते हैं, कोई नहीं था जो उसके प्यार की नदी पार कर सके।
सोरठा 276
किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।
kie amita upadesa jahã tahã loganha munibaranha |dhīraju dharia naresa kaheu basiṣṭha bideha sana ||276||
सबसे बड़े रिशि लोगों को हर जगह बहुत सारी एडवाइस दी। वसिष्ठ ने राजा विदेह से कहा, राजा, हिम्मत रखो।
चौपाई 277.1-4
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा।बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।
तेहि कि मोह ममता निअराई।यह सिय राम सनेह बड़ाई।।
बिषई साधक सिद्ध सयाने।त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।
राम सनेह सरस मन जासू।साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।करनधार बिनु जिमि जलजानू।।
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए।रामघाट सब लोग नहाए।।
सकल सोक संकुल नर नारी।सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू।प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।
jāsu gyānu rabi bhava nisi nāsā |bacana kirana muni kamala bikāsā ||
tehi ki moha mamatā niarāī |yaha siya rāma saneha baṛāī ||
biṣaī sādhaka siddha sayāne |tribidha jīva jaga beda bakhāne ||
rāma saneha sarasa mana jāsū |sādhu sabhā̃ baṛa ādara tāsū ||
soha na rāma pema binu gyānū |karanadhāra binu jimi jalajānū ||
muni bahubidhi bidehu samujhāe |rāmaghāṭa saba loga nahāe ||
sakala soka saṁkula nara nārī |so bāsaru bīteu binu bārī ||
pasu khaga mṛganha na kīnha ahārū |priya parijana kara kauna bicārū ||
उसका ग्यान सूरज की तरह है जो दुनिया की रात को खत्म कर देता है, और उसके बोल धूप की किरण है जिससे रिशियों का कमल खिल जाता है। ऐसे इंसान के पास मोह और ममता कैसे आ सकती है? ये तो बस सीता और राम के प्यार की बड़ी ताकत है। वेद तीन तरह के समझदार लोगों की बात करते हैं: जो दुनिया में हैं, जो साधना करते हैं, और जो सब कुछ पा चुके हैं। जिसका मन राम के प्यार से भीगा हुआ है, उसकी साधुओं की सभा में बहुत इज्जत होती है। राम के प्यार के बिना ग्यान चमकता नहीं, जैसे बिना चलाने वाले के जहाज। रिशि ने विदेह को बहुत तरह से समझाया, फिर सब लोग राम घाट पर नहाए। सब मर्द और औरत दुख से भर गए थे, और वो दिन बिना एक बूंद पानी के निकल गया। जानवर, पक्षी और हिरण कुछ नहीं खाए, तो अपने प्यारे अपनों का क्या कहना।
दोहा 277
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।
dou samāja nimirāju raghurāju nahāne prāta |baiṭhe saba baṭa biṭapa tara mana malīna kṛsa gāta ||277||
सुबह होते ही मिथिला के राजा और रघु वंस के राजा, दोनों अपने अपने लोगों के साथ नहाए। फिर सब लोग बन्यन के पेड़ के नीचे बैठ गए। दिल भारी था और शरीर सूख के पतले हो गए थे।
चौपाई 278.1-4
जे महिसुर दसरथ पुर बासी।जे मिथिलापति नगर निवासी।।
हंस बंस गुर जनक पुरोधा।जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।
लगे कहन उपदेस अनेका।सहित धरम नय बिरति बिबेका।।
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं।समुझाई सब सभा सुबानीं।।
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ।नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।
मुनि कह उचित कहत रघुराई।गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू।इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।
कहा भूप भल सबहि सोहाना।पाइ रजायसु चले नहाना।।
je mahisura dasaratha pura bāsī |je mithilāpati nagara nivāsī ||
haṁsa baṁsa gura janaka purodhā |jinha jaga magu paramārathu sodhā ||
lage kahana upadesa anekā |sahita dharama naya birati bibekā ||
kausika kahi kahi kathā purānīṁ |samujhāī saba sabhā subānīṁ ||
taba raghunātha kosikahi kaheū |nātha kāli jala binu sabu raheū ||
muni kaha ucita kahata raghurāī |gayau bīti dina pahara aṛhāī ||
riṣi rukha lakhi kaha terahutirājū |ihā̃ ucita nahiṁ asana anājū ||
kahā bhūpa bhala sabahi sohānā |pāi rajāyasu cale nahānā ||
जो ब्राह्मण दशरथ की शहर में रहते थे, और जो मिथिला के राजा की शहर में रहते थे। साथ में वसिष्ठ थे, जो सूर्य वंश के गुरु थे, और जनक के पुरोहित थे। इन लोगों ने दुनिया का रस्ता और सबसे बड़ा भला का रस्ता ढूंढ रखा था। सब ने बहुत तरह की सलाह देने शुरू की, जिसमें धरम, राजनीति, वैराग्य और समझदारी सब था। कौसिक ने भी पुरानी कथा एक के बाद एक सुनाई, और अपनी मीठी भाषा में सभी को समझा दिया। तब राम ने कौसिक से कहा, "गुरुजी, कल से सब लोग बिना पानी के रह गए हैं।" रिशि ने कहा, "जो राम कह रहे हैं वही सही है। दिन के दो और आधे पहर बीत गए हैं।" रिशि का रुख देख के तिरहुत के राजा ने कहा, "यहां खाना और अनाज लेना ठीक नहीं है।" राजा ने जो कहा वह अच्छा था और सब को पसंद आया। उनकी मंजूरी ले के सब नहा ने चले गए।
दोहा 278
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।
tehi avasara phala phūla dala mūla aneka prakāra |lai āe banacara bipula bhari bhari kā̃vari bhāra ||278||
उस वक्त बन में रहने वाले लोग बहुत सारे फल, फूल, पत्ते और जड़ वाले बीज लाते हुए आए। उनके कंधे पर भारी बोझे थे, एक से एक टोकली भरी हुई थी।
चौपाई 279.1-4
कामद मे गिरि राम प्रसादा।अवलोकत अपहरत बिषादा।।
सर सरिता बन भूमि बिभागा।जनु उमगत आनँद अनुरागा।।
बेलि बिटप सब सफल सफूला।बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू।त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।
जाइ न बरनि मनोहरताई।जनु महि करति जनक पहुनाई।।
तब सब लोग नहाइ नहाई।राम जनक मुनि आयसु पाई।।
देखि देखि तरुबर अनुरागे।जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।
दल फल मूल कंद बिधि नाना।पावन सुंदर सुधा समाना।।
kāmada me giri rāma prasādā |avalokata apaharata biṣādā ||
sara saritā bana bhūmi bibhāgā |janu umagata ānãda anurāgā ||
beli biṭapa saba saphala saphūlā |bolata khaga mṛga ali anukūlā ||
tehi avasara bana adhika uchāhū |tribidha samīra sukhada saba kāhū ||
jāi na barani manoharatāī |janu mahi karati janaka pahunāī ||
taba saba loga nahāi nahāī |rāma janaka muni āyasu pāī ||
dekhi dekhi tarubara anurāge |jahã tahã purajana utarana lāge ||
dala phala mūla kaṁda bidhi nānā |pāvana suṁdara sudhā samānā ||
राम की करम से पहाड़ ऐसा हो गया जो हर दिल की ख्वाहिश पूरी करता था, और बस उसको देख लेते ही सारी उदास चली जाती थी। झील, नदियां, जंगल और ज़मीन के हिस्से ऐसे लग रहे थे जैसे खुशी और प्यार से उबल रहे हो। बेल और पेड़ सब फूल और फल से भरे हुए थे, और परिंदे, हिरण और मधुमक्खी आवाज़ें निकाल रहे थे जो बहुत प्यारी और मिल-जुल कर लग रही थी। उस वक़्त जंगल में बहुत ज़्यादा खुशी थी, और हवा ठंडी, नरम और खुशबू वाली थी, सब को आराम दे रही थी। उसका खूबसूरत पन बयां नहीं हो सकता था, ऐसा लग रहा था जैसे ज़मीन खुद जनक को मेहमान बना कर रख रही हो। फिर सब लोग नहाए, और राम, जनक और रिशि से आग्या ले ली। पेड़ को देखते देखते सब उनसे प्यार कर बैठे, और शहर के लोग यहां वहां उतर कर रहने लगे। पत्ते, फल, जड़ और कंद बहुत तरह के थे, साफ़ और खूबसूरत, जैसे अमृत हो।
दोहा 279
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।
sādara saba kahã rāmagura paṭhae bhari bhari bhāra |pūji pitara sura atithi gura lage karana pharahāra ||279||
राम के गुरु ने सबको इज्जत से बहुत सारा सामान भेजा। फिर उनने पुरखो, देवता, मेहमान और गुरु की पूजा की, और फल और कंदमूल खाना शुरू कर दिया।
परम्परा में यह अंश ‘भरत-चरित्र’ और ‘वसिष्ठ-धीरज’ के कारण शोक-निवारण, मन की स्थिरता, तथा परिवार/समाज में धर्म-बुद्धि जागरण का फलदायी माना जाता है—विशेषकर वियोग, संकट, और निर्णय-काल में पाठ से धैर्य व शरणागति बढ़ती है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-संपुट; और भरत-प्रसंग में कई परम्पराएँ ‘भरत चरित्र बिनु बिनु’ नहीं, बल्कि ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम संपुट मानती हैं (स्थान-परम्परा अनुसार भेद)।
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