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त्याग-धर्म का सोपान: राजधर्म, कुलधर्म और निजी प्रेम (स्नेह) के टकराव में ‘राम-आज्ञा’ को परम मानकर अहं-क्षय, शरणागति और निष्काम सेवा की सिद्धि। अयोध्या काण्ड साधक को ‘घर’ (सामाजिक भूमिका) के भीतर ही वैराग्य और समर्पण का अभ्यास कराता है—यही इस सोपान का द्वार है।
मुख्य प्रतीक-तंत्र ‘नेह-जल’ (आँसू) है—जो शोक का द्रव नहीं, अहं-क्षय और अंतःशुद्धि का जल बनता है। ‘तुषार-सा स्तब्ध’ सभा शोक की जड़ता नहीं, बल्कि धर्म-संकट के सामने मन की निःशब्द परीक्षा है। ‘राम-रुख/राम-आज्ञा’ ध्वज-चिह्न की तरह उभरता है: राजधर्म, कुलधर्म और निजी स्नेह के टकराव में अंतिम मानदंड। भरत का आत्म-विलाप ‘दोष-स्थानांतरण’ की यात्रा है—बाह्य दोषारोपण से स्व-दोष-दर्शन तक—जिससे शरणागति का द्वार खुलता है। ‘गुरु-साहिब अनुकूल’ का भाव बताता है कि धर्म का निर्णय केवल तर्क नहीं, विनय-आश्रय से प्राप्त प्रकाश है। देव-सभा का संकेत इस कथा को ‘व्यक्ति-नाटक’ से ‘लोक-धर्म-योजना’ में रूपांतरित करता है: राम का भक्त-बस होना और भरत-भक्ति का जगत-कल्याणकारी होना—यही त्याग-धर्म के सोपान का नैतिक शिखर है।
Verse 531 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।। पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा। मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।। सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।। मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।
रिशि के ये सुनते ही राम के दिल में प्यार भर गया। उनका गुरु और मालिक उनसे पूरी तरह खुश थे। सब देख रहे थे कि सारी गलती उनके अपने सिर पर है। वो कुछ कह नहीं पा रहे थे, बस अंदर ही अंदर सोच रहे थे। खुशी से उनका शरीर काँप गया। सभा में सभी लोग एकदम से ठहर गए। उनकी आँखों में प्यार के आँसू आ गए। रिशियों के स्वामी, मैं अब बोलूँगा। इससे ज़्यादा क्यों बोलूँ? मैं अपने मालिक का स्वभाव जानता हूँ। वो गुनाहगारों पर भी गुस्सा नहीं करते। मेरे ऊपर उनकी कृपा और प्यार हद से ज़्यादा है। कभी नहीं देखा कि वो मुझे दुश्मन समझ के behave करें। बचपन में भी मैं उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने कभी मेरा दिल नहीं तोड़ा। मेरे दिल में हमेशा यह बात है कि मालिक कैसे कृपा करते हैं। मैं game हार भी जाऊँ, वो मुझे जीता देते हैं।
Verse 532 (दोहा/सोरठा)
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
प्यार और शरम की वजह से मैं उनके सामने कुछ बोल नहीं पा रहा। मेरी आँखें उन्हें देख के अभी तक खुश नहीं हुई, अभी भी प्यासी है।
Verse 533 (चौपाई)
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।। मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।। सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।। बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।। हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।
ब्रह्मा भी मेरे प्यार को नहीं झेल पा रहे थे। मेरी माँ समुंदर पर चलती कश्ती जैसी है। आज मेरे लिए कोई शान नहीं है। मैं अपने आप को अच्छा और साफ समझता हूँ। मेरी माँ थोड़ी simple है और मैं अच्छा हूँ। लेकिन मेरे दिल में लाखों बुरी बातें हैं। क्या कोडवा अच्छी फसल देती है? क्या समुंदर से मोती मिलते हैं? क्या शंख से काला रंग आता है? सपने में भी मैं किसी की गलती नहीं लेता। मैं भाग्य का मारा हूँ और समुंदर में डूब रहा हूँ। अपनी गलतियों को समझे बिना मैं माँ का नाम खराब कर रहा हूँ। अपने दिल में देख के मैं हर तरफ से हार गया। सिर्फ एक तरीके में मेरा भला सच में भला है। मेरे गुरु और मालिक, सीता और राम, मुझे अच्छा result देने वाले लगते हैं।
Verse 534 (दोहा/सोरठा)
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।
रिशियों की सभा के सामने और मेरे गुरु के सामने मैं सच बोल रहा हूँ। सच्चा प्यार से यह बात कह रहा हूँ। रिशि और रघु के स्वामी जानते हैं कि यह सच्चा प्यार है या नकली।
Verse 535 (चौपाई)
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।। देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।। महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।। बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।। अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।
राजा ने मरने तक भी अपना प्यार का वादा निभाया। उसकी माँ की बुरी सलाह का पूरा दुनिया गवाह था। अपनी माँ को इतना दुखी देख के वो उसे नहीं देख सकता था। शहर की औरत और मर्द बुरी तरह जल रहे थे। ज़मीन ही सारी बलाएँ लाने वाली बन गई। यह सुन के समझ के मैंने हर दर्द सहा। जंगल जाने की बात सुन के रघु के स्वामी ने रिशि का रूप लिया। लक्ष्मण और सीता उनके साथ थे। बिना पानी पिए वो प्यासों को पानी देते थे। शिव जी इस बात के गवाह रहे। फिर मैंने निषाद का प्यार देखा। मेरा दिल पत्थर जैसा था, नरम नहीं हुआ। अब यह सब मेरी आँखों के सामने आ गया है। जब मैं जीवित था, सारे जीव और जड़ चीज़ें भी मेरे काम आई। जो लोग रास्ते पर मुझे देख के बुरी नज़र से देखते थे, वो लोग मुझे छोड़ के चले गए।
Verse 536 (दोहा/सोरठा)
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।
रघुकुल के लक्ष्मण और सीता अब मुझे बुरा लगने लगे हैं। मैंने अपने बेटे को छोड़ा है, अब यह दुख सहन नहीं हो रहा। अब कौन मदद करेगा?
Verse 537 (चौपाई)
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।। सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।। कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।। तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।। तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
भरत की बात सुनके सब दुखी हो गए। वो इतना प्यार और विनम्रता से बोले कि सब रोने लगे। मुनि ने पुरानी कथाएं सुना कर भरत को समझाया। फिर रघुकुल के वो आदमी ने सही बात बोली। उन्होंने कहा, पिताजी, जहां दिल करे वहां जाओ। भगवान की मर्ज़ी के सारे जीव चलते हैं। मैं तीनों काल और तीनों दुनिया में आप पे भरोसा रखता हूं। आप मेरे दिल में कुटिलता रखते हो, इसलिए दोनों दुनिया बर्बाद हो रही है। लोग अपनी मां को दोष देते हैं जो गुरु और साधु की बात नहीं मानते।
Verse 538 (दोहा/सोरठा)
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।
आपका नाम याद करने से सारे पाप और भ्रम मिट जायेंगे। सारा बुरा बोझ उतर जायेगा। इस दुनिया में नाम बनेगा और उस दुनिया में सुख मिलेगा।
Verse 539 (चौपाई)
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।। मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।। तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।। राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।। तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।
मैं सच बोलता हूं, शिवजी गवाह हैं। भरत, धरती ने तुम्हारी इज्जत रखी है। पिताजी, गलती मत करो। नफरत और प्यार कड़वी बातों से दूर नहीं होता। रिशि, चिड़िया और हिरण पास आते हैं। शिकारी को देख के भाग जाते हैं। जानवर समझते हैं कौन दोस्त है कौन दुश्मन। इंसान का तन गुण और ज्ञान का खज़ाना है। पिताजी, मैं आपको अच्छा जानता हूं। मैं क्यों उलझन पैदा करूं? राजा ने मुझसे सच का वादा किया था। उन्होंने अपना तन छोड़ा क्योंकि प्यार में थे। उनकी बात मेरे दिल का दुख मिटाती है। इसलिए मैं आपसे और शर्मता हूं। मेरे गुरु ने मुझे हुकुम दिया है। जो आप कहेंगे मैं वो करूंगा।
Verse 540 (दोहा/सोरठा)
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।
मेरा दिल खुश कर दो, झिझक छोड़ो और बताओ मैं आज क्या करूं। रघुकुल के सच्चे आदमी की बात सुनके पूरा समाज खुश हो गया।
Verse 541 (चौपाई)
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।। बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।। सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।। आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।। हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।
देवी-देवता और उनका राजा सब एक जगह बैठे थे, पर दिमाग में सोच चल रही थी। वो लोग कोई उपाय निकालना चाहते थे ताकि जो गलत काम होने वाला था वो न हो। कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा था, तो सबके दिल में राम की शरण आ गई। फिर सोचने के बाद एक दूसरे से बोले कि रघु के पति अपने भक्तों के भक्त हैं। भक्ति उनके ऊपर बस करती है। अंबरीश और दुर्वासा की कहानी याद की, और देवी-देवता और उनका राजा बिलकुल निराश हो गए। देवी-देवता बहुत देर तक दुख सह रहे थे, जब तक प्रह्लाद के लिए नरसिंह भगवान प्रकट नहीं हुए। कान में कान में बात कर रहे थे, सर हिला रहे थे, कि अब देवियों का काम भरत के हाथ है। कोई और उपाय नहीं दिख रहा था, देवियों। राम सच्चे सेवक की सेवा को मानता है। अपने दिल में सब भरत को याद करो, उसके गुण और उसके स्वभाव से राम उसके ऊपर बस करता है।
Verse 542 (दोहा/सोरठा)
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
देवियों की बात सुन कर देवियों के गुरु बोले कि तुम्हारा भाग्य बहुत बड़ा है। जग में सब अच्छे का मूल भरत के चरणों में प्यार है।
Verse 543 (चौपाई)
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।। देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।। सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।। निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।। करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।
सीतापति अपने सेवकों का सेवक है, वो कामधेनु जैसा है, हिरन जैसा सुंदर है। भरत की भक्ति तुम्हारे दिल में आ गई है, तो चिंता छोड़ दो, ब्रह्मा जी ने सच कहा है। देवियों के राजा, भरत की ताकत देखो, अपने स्वभाव से राम उसके ऊपर बस करता है। दिल को ठीक कर लो देवियों, डरो मत, राम भरत के लिए बिलकुल समर्पित है। सुनो देवियों के गुरु, देवियों की सोच सही है, भगवान दिल का जानने वाला है, इसलिए इज्जत से उसके पास जाओ। अपना बोझ भरत के दिल पे डाल दिया है, और उसे बहुत इज्जत देता है। सोच के बाद अपना दिल दे दिया है, राम को बहुत पसंद है। अपना पन छोड़ कर अपना वादा रखा है, प्यार थोड़ा नहीं, बहुत दिखाया है।
Verse 544 (दोहा/सोरठा)
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।
सीताजी के पति ने हर तरह से बहुत कृपा की। दोनों हाथ जोड़ कर भरत ने प्रणाम किया और बोला।
Verse 545 (चौपाई)
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।। अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।। पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।। जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।
अब मैं कहूँ और किस से कहूँ, स्वामी? तुम दया के समुंदर हो, दिल का जानने वाले। गुरु खुश हैं, स्वामी साथ दे रहे हैं, दिल का दाग मिट गया, जो तकलीफ थी वो गायब हो गई। मुझे जंगल का डर नहीं था, न कोई चिंता थी, सूरज में कोई दोष नहीं देखा, देवियों की तरफ से कोई गलती नहीं की। मेरा किस्मत खराब है, माँ की चालाकी, ब्रह्मा जी की लिखी कठिन तक़दीर, यह सब वजह थी। सब मिल कर मुझे पैर पे फेरने लगे, लेकिन तुमने अपना वादा निभाया, जो शरण आते हैं उनकी रक्षा करते हो। यह कोई नई बात नहीं है, न तुम्हारी रीति है, जग में और वेदों में भी यह सुनाया नहीं गया। जग कोई काम नहीं निकलता, अच्छा सिर्फ भगवान है। बताओ किसी का भला करने से क्या भला होता है? भगवान पेड़ जैसा है जो छाव देता है, सबके लिए एक जैसा, किसी की तरफ न मुड़ता है न किसी से मुह मोड़ता है।
Verse 546 (दोहा/सोरठा)
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
जाओ, पास का पेड़ पहचानो। उसके साये में बैठ के अपनी सारी परेशानी भूल जाओ। राजा हो या भिखारी, सबको अपना दिल माँगा मिलता है। भिखारी भी इज़्ज़त में आता है।
Verse 547 (चौपाई)
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।। अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।। जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।। सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।। स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।। देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।। तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।
गुरु और स्वामी ने सब देख कर प्यार से भाव हो गया। दुख दूर हो गया, मन में कोई शक नहीं रहा। अब हे करुणा करने वाले, जो सेवक के भले का काम हो वो करो। प्रभु, तुम्हारे मन में दुख न आए। अगर कोई सेवक अपने मालिक से शर्माता है, उसकी समझ कमज़ोर है। वो अपना ही भला चाहता है। मालिक का काम है सेवक की सेवा करना। वो हर खुशी देता है, लालच छोड़ के। स्वामी, सब अपना भला चाहते हैं। लेकिन तुमने करोड़ तरीके से अपनी मर्ज़ी चलाई है। यह अपना भला ही सबसे बड़ा काम है। यह सारे पुण्य का फल है, सही रास्ते का श्रृंगार है। देवा, मेरी एक बात सुनो। जो सही लगेगा, मैं वही करूँगी। तिलक और सब तैयार करके लाओ। प्रभु का काम पूरा होगा अगर उनका मन खुश हो।
Verse 548 (दोहा/सोरठा)
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।
मुझे मेरे भाई के साथ वन भेजो और सबको सुरक्षित करो। नहीं तो दोनों भाइयों को वापस करो, स्वामी, और मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।
Verse 549 (चौपाई)
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।। देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।। कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।। उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।। अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।। प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।
नहीं तो तीन भाई वन जाएँगे। फिर रघु के राजा सीता के साथ वापस आएँगे। जिस तरह प्रभु का मन खुश हो, हे करुणा सागर, वही करो। देवियों ने मुझे सब दिया है, कोई भार नहीं। मेरी नीति या धरम में कोई विचार नहीं। मैं जो बोल रही हूँ वो अपना भला के लिए है। जब मन दुखी होता है तो कुछ और याद नहीं रहता। जो सेवक अपने मालिक की मर्ज़ी सुन कर जवाब देता है, वो शर्म करने वाला सेवक है। मैं तो बड़े समुंदर जैसी गलतियों वाली हूँ। लेकिन स्वामी के प्यार में मुझे अच्छा बोला जाता है। अब हे कृपालु, यह मेरी बात पसंद आनी चाहिए। स्वामी का मन शर्म न करे। प्रभु के चरणों की कसम, सच के साथ कहता हूँ। जग की भलाई का एक ही उपाय है।
Verse 550 (दोहा/सोरठा)
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
प्रभु खुश होकर शर्म छोड़ दो। जो भी आदेश दोगे, मैं सर पे लेकर मानूँगी। सब कुछ पूरा होगा और सारी तकलीफ़ मिट जाएगी।
परंपरागत मान्यता में भरत-विनय (दोहा 260–269) का पाठ ‘सेवक-धर्म’ और ‘गुरु-वचन-पालन’ की बुद्धि देता है, मातृ/कुल-कलह से उत्पन्न दोषारोप-भाव को शान्त करता है, तथा ‘राम-आज्ञा’ के प्रति श्रद्धा बढ़ाकर गृहस्थ-जीवन में भी वैराग्य और शरणागति की सिद्धि कराता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-संपुट जोड़ा जाता है; विशेषतः भरत-प्रसंग में ‘भरत चरन अनुरागु’ की भावना के साथ राम-नाम जप (राम/सीता-नाम) को संपुट रूप में रखा जाता है।
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