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त्याग-दीक्षा का सोपान: राज्य-सुख और गृह-रमणीयता के बीच ‘राम-आज्ञा’ को सर्वोच्च मानकर वैराग्य, करुणा, और धर्म-निष्ठा की परीक्षा। यह चरण साधक को सिखाता है कि प्रेम (स्नेह) को आसक्ति न बनने देकर उसे ‘आज्ञा-पालन’ और ‘राम-चरणानुराग’ में रूपान्तरित किया जाए।
यह प्रकरण ‘त्याग-दीक्षा’ का सोपान है जहाँ वियोग की करुणा को साधक के भीतर ‘धर्म-बुद्धि’ और ‘आज्ञा-पालन’ में रूपान्तरित किया जाता है। ‘चार दिन’ का बीतना प्रतीक है—समय शोक को बढ़ाता भी है और परिपक्व भी करता है; लोक-हृदय की स्थिरता बताती है कि सच्चा प्रेम क्षणिक आवेग नहीं। ‘बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं’ राम-सिया की अविच्छिन्नता का प्रतीक-वाक्य है: धर्म का पूर्ण रूप ‘युगल-धर्म’ में है, अकेला लौटना मर्यादा-भंग होगा। ‘वन-जीवन कोटि अमरपुर सरिस’ रूपक त्याग को ही परम-सुख घोषित करता है—सुख का स्थान राजमहल नहीं, राम-आज्ञा के अनुरूप जीवन है। रानी-समाज/जनक-परिवार का करुण-संवाद ‘स्नेह’ की परीक्षा है: तुलसी इसे दोषारोपण/विषाद में नहीं गिरने देते; ‘ईस रजाइ’ के आगे समर्पण शोक का शोधन करता है। भरत-चरित की छाया इस खण्ड का निष्कर्ष है—भक्ति का शिखर वह है जहाँ प्रेम ‘आसक्ति’ नहीं, ‘अनुराग’ बनकर आज्ञा में विलीन हो जाता है।
Verse 572 (चौपाई)
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।। दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।। सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।। परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।। दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।। मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।। अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।
ऐसे ही चार दिन बीत गए। राम को देख के सब लोग और औरतें खुश थे। दोनों तरफ के लोगों के दिल में इतना प्यार था कि सीता के बिना राम कहीं जाना ही नहीं चाहते थे। सीता का राम के साथ वन में रहना, स्वर्ग से भी लाख गुना अच्छा था। लक्ष्मण कभी राम और सीता को छोड़ के चला जाता था, जहां उसका दिल करता था वहां चला जाता। लेकिन जब उसे सही नहीं लगता, तब वापस राम के पास आ जाता। मंदाकिनी नदी में दिन में तीन बार नहाते थे। राम को देखना ही सबसे बड़ा सुख था। पहाड़, जंगल और रिशियों के आश्रम में घूमना, यह राम का खेल था। खाना कंद, मूल और फल खाते थे, जैसे अमृत हो। ऐसे ही बारह साल खुशी से बीत गए। पल जैसा लगता था, साल जैसा नहीं लगता था।
Verse 573 (दोहा/सोरठा)
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
इतनी खुशी देख के सब लोग कहते थे कि ऐसा भाग्य कहां होता है। दोनों तरफ के लोगों का दिल अपने आप से राम के चरणों में लग गया था।
Verse 574 (चौपाई)
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।। सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।। सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।। कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।। सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।। सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।। सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।
ऐसे ही सब अपने दिल की बातें पूरी कर रहे थे। राम के प्यार भरे शब्द सुनकर सब का दिल खुश हो जाता था। तब सीता की मां ने अपनी दासियां भेजी क्योंकि सही वक्त आ गया था। सुन के कि जनक की रानी आई है, सीता की सास जल्दी से मिलने गई। कौशल्या ने इज्जत से स्वागत किया और बैठने को जगह दी। दोनों में बड़ा प्यार और अच्छा चरित्र था। देख और सुनकर तो पत्थर भी पिघल जाता। दोनों के शरीर में झनझनाहट थी, आंखों में पानी आ गया। अपने नाखून से जमीन पर लकीर खींचना शुरू कर दिया, खोई हुई सी बातें। सब लोग सीता और राम में प्यार की मूरति देख रहे थे, जैसे दया ने रूप ले लिया हो। सीता की मां ने इतना अच्छा और समझदार बात कही, जैसे दूध के झाग में सुई घुसा दी हो।
Verse 575 (दोहा/सोरठा)
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।
अमृत सुनो और ज़हर देखो। दुनिया का काम बहुत बुरा है। कहीं भी देखो, कौए और उल्लू और बगुले मिलेंगे। इंसानों में कभी-कभी हंस जैसा अच्छा इंसान मिलता है।
Verse 576 (चौपाई)
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।। कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।। ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।। भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।। सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।
सुमित्रा ने सुनके चिंता के साथ कहा कि भगवान की चाल बहुत अलग है। वोही सब कुछ बनाता है, संभालता है, और फिर खत्म करता है। जैसे बच्चे खेलते हैं, वैसे ही उसकी मत चलती है। कौसल्या बोली कि किसी को दोष मत दो। करम के हिसाब से दुख और सुख आते रहते हैं। विधाता करम की मुश्किल राह जानता है। वोही अच्छे और बुरे फल देता है। भगवान की मर्जी सबसे ऊपर है। दुनिया बनाना, चलाना, और खत्म करना उसका खेल है। देवी मोह में फंस के व्यर्थ रो रही है। विधि का यह खेल ऐसा ही चलता आया है। राजा जिएगा या मरेगा, यह उसने अपने ऊपर लाया है। अपना नुकसान देख के चिंता मत करो। सीता माँ ने सच बात कही। वोह अच्छे करम वाली हैं और अयोध्या के राजा की रानी हैं।
Verse 577 (दोहा/सोरठा)
लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।
लक्ष्मण, राम, और सीता जंगल जाओ। सब ठीक होगा, चिंता मत करो। कौसल्या का दिल भारी था। उसने कहा कि मुझे सिर्फ भरत की चिंता है।
Verse 578 (चौपाई)
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।। राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।। भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।। जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।
भगवान की कृपा और आशीर्वाद से मेरा बेटा और बहू देवियों जैसे हैं। मैंने राम की कसम कभी नहीं तोड़ी। यह मैं तुम्हे सच दिल से बताती हूँ। भरत का कैरेक्टर, गुण, और विनय सबसे बड़ा है। उसका भाई प्यार और भरोसा अच्छा है। सरस्वती भी अगर उसको डिस्क्राइब करें तो हाथ मारेगी। समुंदर को क्या खाली करना है। मैं हमेशा जानती हूँ कि भरत अपने खानदान का चिराग है। राजा ने मुझे बार बार यही कहा है। सोने को पत्थर पर चेक करते हैं। इंसान को वक्त पर चेक करते हैं। आज जो मैंने कहा वोह गलत था। गम और प्यार में मैंने थोड़ा सोचा नहीं। यह बात सुनके सब रानियों का दिल भर गया। उनका प्यार बढ़ गया।
Verse 579 (दोहा/सोरठा)
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
कौसल्या बोली कि धीरे रहो और सुनो। मिथिला के राजा की बेटी, तुम और तुम्हारा पति दोनों बहुत समझदार हैं। कोई तुम्हे समझाने की कोशिश भी करे तो नहीं कर पाएगा।
Verse 580 (चौपाई)
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
रानी ने राजा के पास मौका देख के अपनी बात शुरू की। उसने कहा कि अगर राजा मान ले तो लक्ष्मण और भरत को जंगल जाने से रोका जाए। फिर मैं सोच समझ के कुछ करूंगी। भरत की वजह से मुझे बहुत चिंता है। भरत के दिल में बहुत प्यार है। वोह ठीक नहीं रहेगा, मुझे लगता है। उसका स्वभाव देख के और उसकी सीधी बात सुन के कैकेयी का दिल पिघल गया। आसमान से फूल बरसे और लोग धन्य धन्य बोलने लगे। योगी और मुनि सब के दिल नरम पड़ गए। पूरा महल उदास हो गया था। तब सुमित्रा ने होश संभाल के बात कही। रात गुज़र गई और सुबह हो गई। राम की माँ प्यार के साथ उठी।
Verse 581 (दोहा/सोरठा)
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।
जल्दी से पानी से पैर ज़मीन पर रख दो, प्यार से और सच बोल के। अब मेरे लिए सिर्फ़ मिथिलेश ही सहारा है।
Verse 582 (चौपाई)
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।। देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।। प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।। सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।। रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।। रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।। अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।। यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।
उसका प्यार देख के और उसकी सीधी बात सुन के, जनक की बेटी ने उसके पास पकड़ लिए। रानी, तुम्हारी यह बात बिल्कुल सही है, तुम तो दशरथ के घर राम की माँ हो। वो लोग नीचे वाले को भी इज़्ज़त देते हैं, आग का धुआँ अपने सिर पे उठा लेते हैं। सेवक भी राजा जैसा काम करता है, मन और बात में। शिव और भवानी हमेशा तुम्हारे साथ रहें। तुम्हारा शरीर दुनिया के लायक है, जैसे दिया सूरज जैसा चमकता है। राम जंगल जाएगा देवताओं का काम करने के लिए, और अयोध्या में पक्का राज करेगा। राम की ताकत से देवता, नाग और इंसान अपनी जगह खुश रहेंगे। मैंने यह सब आगे का सोच के बताया है, रानी, रिषि की बात बेकार मत समझना।
Verse 583 (दोहा/सोरठा)
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।
यह कह के उसने पैर पकड़ लिए, बहुत प्यार दिखाया और सीता के लिए रिक्वेस्ट की। फिर सीता अपनी माँ के साथ चली गई, उनकी परमिशन ले के।
Verse 584 (चौपाई)
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।। तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।। जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।। लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।। उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।। सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।। चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।
सीता अपने प्यारे परिवार से मिली, सब अपने तरीके से। जब जनकी ने साधू के कपड़े देखे, सब बहुत दुखी हो गए। जनक और राम से परमिशन ले के वो ज़मीन पर गई और सीता को आते देखा। जनक ने जनकी को अपने सीने से लगा लिया, वो मेहमान था, पाप धोने वाला और जान से प्यारा। उसके दिल में प्यार का समुंदर उठा, राजा का मन ऐसा लगा जैसे प्रयाग में नहा लिया हो। सीता के प्यार का बाँधा और टाइट हो गया, उसपे राम का प्यार बच्चे जैसा चमकने लगा। बड़ी उम्र वाले रिषि भी ऐसे लगे जैसे ज्ञान चला गया हो, डूबता हुआ आदमी सहारा ढूंढता है। विदेह का मन मोह में डूब गया, सीता और रघुवर के प्यार की बात सोच के।
Verse 585 (दोहा/सोरठा)
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
सीता के पिता और माँ प्यार में इतना डूब गए कि खुद को संभाल नहीं पाए। लेकिन धरती की बेटी ने होश संभाला, वक़्त और सही काम सोच के।
Verse 586 (चौपाई)
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।। पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।। जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।। गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।। पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।। पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।। कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।। लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।
जनक और सीता ने उसे साधु भेस में देखा। उनके दिल में प्यार उठा और खुशी भी बहुत हुई। उसने बेटी और परिवार दोनों को साफ कर दिया। अब सब लोग उनकी बड़ाई कहते हैं। जिसने गंगा की बड़ाई पार की थी, उसने अपना सफर भी पूरा किया। ब्रह्मा ने यह लिख दिया था। गंगा, धरती और तीन दुनिया बड़ी हैं। इस दिन बहुत सारे साधु आए थे। बाप ने प्यार से बात की। सीता शर्मा रही थी लेकिन उसका दिल ठीक हो गया। फिर बाप और माँ ने उसे गले लगाया। उन्होंने अच्छी बातें बताई और आशीर्वाद दिया। सीता शर्म के मारे बोल नहीं पा रही थी। उसने सोचा, आज रात यहाँ रहना ठीक नहीं है। रानी ने उसकी परेशानी देख के राजा को बताया। राजा ने दिल में उसका अच्छा स्वभाव सराहा।
Verse 587 (दोहा/सोरठा)
बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।
सीता ने बार-बार मिलके उनसे बाय कहा और इज्जत दी। रानी ने समझा के बताया कि भरत कब वापस आएगा। वो समझदार और अच्छी बात करती थी।
Verse 588 (चौपाई)
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।। मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।। सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।। धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।। सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।। बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।। भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।। समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
राजा ने भरत के बारे में सुना तो बहुत खुश हुआ। आँखों में आँसू आए और दिल खुशी से भर गया। उसने अपनी बड़ाई की। रानी, ध्यान से सुन। भरत की कहानी सुनने से इंसान को मुक्ति मिलती है। यह धरम की बात है, राजनीति की बात है। मैं जो समझता हूँ वो बताता हूँ। लेकिन मैं भरत की बड़ाई के बारे में क्या कहूँ? मैं उसकी छाँव भी नहीं छू सकता। ब्रह्मा, गणेश, शिव, सरस्वती और सब बड़े लोग इस चीज को जानते हैं। भरत का चरित्र, उसके काम, उसका धरम और उसके गुण सब साफ हैं। जो सुनता है वो खुश हो जाता है। यह गंगा जैसा साफ है और अमृत जैसा मीठा है।
Verse 589 (दोहा/सोरठा)
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
भरत में गुण बहुत हैं, कोई उसके बराबर नहीं है। उसे भरत जैसा ही समझो। क्या सुमेरु पर्वत को एक दाने से तोला जा सकता है? कवि के दिल में शर्म मत आओ।
Verse 590 (चौपाई)
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।। भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।। बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।। बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।। देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।। भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।। परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।। साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।
सब कहते हैं उसके बारे में बात करना मुश्किल है। जैसे मछली पानी के बिना ज़मीन तक नहीं पहुँच सकती। रानी, भरत की बड़ाई सुन। जो राम को जानते हैं वो भी उसे पूरा नहीं बता सकते। राजा ने प्यार से भरत के स्वभाव की बात की। उसने देखा कि रानी क्या सुनना चाहती थी। लक्ष्मण और भरत फिर से जंगल गए। सबके लिए अच्छा था और सबके दिल को अच्छा लगा। पर भरत का प्यार और राम पर भरोसा कभी कम नहीं हुआ। भरत प्यार और अटैचमेंट की हद है। राम तो समता का रूप है। भरत ने कभी सपने में भी पैसा या सुख नहीं देखा। राम के चरण ही सब कुछ हैं। भरत ने मुझे देख के अपना मन मोड़ लिया।
Verse 591 (दोहा/सोरठा)
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।
भरत कभी भी अपने मन में राम की बात के खिलाफ नहीं जायेंगे। राजा ने कहा, अब चिंता मत करो, इतना प्यार है तुम्हे। राजा रोए जा रहे थे।
परम्परानुसार यह खण्ड ‘वैराग्य-प्रबोध’ और ‘राम-आज्ञा-परायणता’ देता है: गृह-शोक/वियोग को धर्म-बुद्धि में बदलकर मन को स्थिर करता है, तथा भरत-चरित के श्रवण से ‘भव-बन्धन-बिमोचनि’ (पाठ में ही संकेत) फल माना जाता है।
सत्संग-परम्परा में प्रसंगानुसार ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम रामेति’ जप-संपुट जोड़ा जाता है; विशेषतः भरत-चरित/आज्ञा-पालन के भाव में ‘राम-आज्ञा गुरु समान’ भाव-स्मरण हेतु नाम-संपुट प्रचलित है।
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