त्याग-दीक्षा का सोपान: राज्य-सुख और गृह-रमणीयता के बीच ‘राम-आज्ञा’ को सर्वोच्च मानकर वैराग्य, करुणा, और धर्म-निष्ठा की परीक्षा। यह चरण साधक को सिखाता है कि प्रेम (स्नेह) को आसक्ति न बनने देकर उसे ‘आज्ञा-पालन’ और ‘राम-चरणानुराग’ में रूपान्तरित किया जाए।
यह प्रकरण ‘त्याग-दीक्षा’ का सोपान है जहाँ वियोग की करुणा को साधक के भीतर ‘धर्म-बुद्धि’ और ‘आज्ञा-पालन’ में रूपान्तरित किया जाता है। ‘चार दिन’ का बीतना प्रतीक है—समय शोक को बढ़ाता भी है और परिपक्व भी करता है; लोक-हृदय की स्थिरता बताती है कि सच्चा प्रेम क्षणिक आवेग नहीं। ‘बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं’ राम-सिया की अविच्छिन्नता का प्रतीक-वाक्य है: धर्म का पूर्ण रूप ‘युगल-धर्म’ में है, अकेला लौटना मर्यादा-भंग होगा। ‘वन-जीवन कोटि अमरपुर सरिस’ रूपक त्याग को ही परम-सुख घोषित करता है—सुख का स्थान राजमहल नहीं, राम-आज्ञा के अनुरूप जीवन है। रानी-समाज/जनक-परिवार का करुण-संवाद ‘स्नेह’ की परीक्षा है: तुलसी इसे दोषारोपण/विषाद में नहीं गिरने देते; ‘ईस रजाइ’ के आगे समर्पण शोक का शोधन करता है। भरत-चरित की छाया इस खण्ड का निष्कर्ष है—भक्ति का शिखर वह है जहाँ प्रेम ‘आसक्ति’ नहीं, ‘अनुराग’ बनकर आज्ञा में विलीन हो जाता है।
चौपाई 280.1-4
एहि बिधि बासर बीते चारी।रामु निरखि नर नारि सुखारी।।
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं।बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।
सीता राम संग बनबासू।कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।
परिहरि लखन रामु बैदेही।जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।
दाहिन दइउ होइ जब सबही।राम समीप बसिअ बन तबही।।
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला।राम दरसु मुद मंगल माला।।
अटनु राम गिरि बन तापस थल।असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।
सुख समेत संबत दुइ साता।पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।
ehi bidhi bāsara bīte cārī |rāmu nirakhi nara nāri sukhārī ||
duhu samāja asi ruci mana māhīṁ |binu siya rāma phiraba bhala nāhīṁ ||
sītā rāma saṁga banabāsū |koṭi amarapura sarisa supāsū ||
parihari lakhana rāmu baidehī |jehi gharu bhāva bāma bidhi tehī ||
dāhina daiu hoi jaba sabahī |rāma samīpa basia bana tabahī ||
maṁdākini majjanu tihu kālā |rāma darasu muda maṁgala mālā ||
aṭanu rāma giri bana tāpasa thala |asanu amia sama kaṁda mūla phala ||
sukha sameta saṁbata dui sātā |pala sama hohiṁ na janiahiṁ jātā ||
ऐसे ही चार दिन बिट गए। राम को देख कर आदमी और औरतें खुश थे। दोनो तरफ के लोगों के दिल में एक ही बात थी। सीता और राम के बिना वापस मुडना अच्छा नही। सीता और राम के साथ जंगल में रेहना उस्स जैसा सुख होगा जो करोड़ स्वर्गों के बराबर है। जो लक्ष्मन, राम और सीता को छोड़ कर घर में रेहना पसंद करे, उसका भाग्य खराब है। जब सबका भाग्य साथ दे, तभी वो लोग राम के पास जंगल में रेह पायेंगे। वो तीन वक्त मंदाकिनी नदी में नहायेंगे। राम का दर्शन उनके लिए खुशी और मंगल की माला जैसा होगा। राम के पहाड़, जंगल और रिशियों के स्थान पर घूमेंगे। उनका खाना कंद, मूल और फल होगा, जैसे अमृत हो। दो सौ साल उस्स सुख में बिटेंगे और पल जैसे लगेंगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि कैसे बिट गए।
दोहा 280
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
ehi sukha joga na loga saba kahahiṁ kahā̃ asa bhāgu |sahaja subhāyã samāja duhu rāma carana anurāgu ||280||
सब लोग बोले कि हम लोग इतने सुख के लायक ही नहीं हैं, हमें ऐसी किस्मत कहाँ से मिलेगी। फिर अपने आप, बिना किसी मेहनत के, दोनों तरफ के लोगों के दिल राम के चरण में प्रेम से भर गए।
चौपाई 281.1-4
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं।बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।
सीय मातु तेहि समय पठाईं।दासीं देखि सुअवसरु आईं।।
सावकास सुनि सब सिय सासू।आयउ जनकराज रनिवासू।।
कौसल्याँ सादर सनमानी।आसन दिए समय सम आनी।।
सीलु सनेह सकल दुहु ओरा।द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन।महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती।जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी।जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।
ehi bidhi sakala manoratha karahīṁ |bacana saprema sunata mana harahīṁ ||
sīya mātu tehi samaya paṭhāīṁ |dāsīṁ dekhi suavasaru āīṁ ||
sāvakāsa suni saba siya sāsū |āyau janakarāja ranivāsū ||
kausalyā̃ sādara sanamānī |āsana die samaya sama ānī ||
sīlu saneha sakala duhu orā |dravahiṁ dekhi suni kulisa kaṭhorā ||
pulaka sithila tana bāri bilocana |mahi nakha likhana lagīṁ saba socana ||
saba siya rāma prīti ki si mūratī |janu karunā bahu beṣa bisūrati ||
sīya mātu kaha bidhi budhi bā̃kī |jo paya phenu phora pabi ṭā̃kī ||
सब ने अपने मन की बात कह दी। प्यार भरी बातें सुन के जो भी सुन रहा उसका मन खिल गया। उस वक्त सीता की मा ने अपनी दासियां भेजी थी। उन्होंने देखा कि मौका ठीक है और वापस आ गई। सुन के कि सीता की सास सब फ्री हैं, जनक राजा के घर की औरतें मिलने आ गई। कौसल्या ने इज्जत से स्वागत किया। मौके के हिसाब से उनके लिए आसन लगवाई। दोनों तरफ इतना नरम और प्यार था कि देख सुन के वज्र भी पिघल जाए। तन कांपा और ढीला पड गया, आंखों में पानी आ गया, और सब उदास सोच में जमीन नाखुन से खोदने लगी। सब सीता और राम के प्यार की मूर्ति लगती थी, जैसे दया ने कई रूप ले लिए हो और रो रही हो। सीता की मा बोली, भगवान का दिमाग उल्टा है। जैसे उसने वज्र को छेनी बना रखा हो, दूध के झाग को तोडने के लिए।
दोहा 281
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।
sunia sudhā dekhiahiṁ garala saba karatūti karāla |jahã tahã kāka ulūka baka mānasa sakṛta marāla ||281||
सुनने में तो अमृत की बात आती है, पर जो दिखता है वो ज़हर है। भगवान के काम सब भयंकर हैं। हर जगह कौए, उल्लू और बगुले मिलते हैं। हंस कभी-कभी ही मिलता है, और वो भी सिर्फ मानसरोवर में।
चौपाई 282.1-4
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा।बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी।बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।
कौसल्या कह दोसु न काहू।करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।
कठिन करम गति जान बिधाता।जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।
ईस रजाइ सीस सबही कें।उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।
देबि मोह बस सोचिअ बादी।बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।
भूपति जिअब मरब उर आनी।सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।
सीय मातु कह सत्य सुबानी।सुकृती अवधि अवधपति रानी।।
suni sasoca kaha debi sumitrā |bidhi gati baṛi biparīta bicitrā ||
jo sṛji pālai harai bahorī |bāla keli sama bidhi mati bhorī ||
kausalyā kaha dosu na kāhū |karama bibasa dukha sukha chati lāhū ||
kaṭhina karama gati jāna bidhātā |jo subha asubha sakala phala dātā ||
īsa rajāi sīsa sabahī keṁ |utapati thiti laya biṣahu amī keṁ ||
debi moha basa socia bādī |bidhi prapaṁcu asa acala anādī ||
bhūpati jiaba maraba ura ānī |socia sakhi lakhi nija hita hānī ||
sīya mātu kaha satya subānī |sukṛtī avadhi avadhapati rānī ||
यह सुन के सुमित्रा दुख में बोली, भगवान का चल बहुत उलट और अजीब है। वो पैदा करता है, पालता है, फिर उजाड़ देता है। भगवान का दिमाग बच्चे के खेल जैसा चंचल है। कौसल्या बोली, किसी का कोई दोष नहीं। दुख और खुशी, नुकसान और फायदा, सब अपने करम पर निर्भर है। करम का चल समझना बहुत मुश्किल है। सिर्फ वो भगवान जानता है जो हर फल देता है, अच्छा हो या बुरा। भगवान का हुकुम सबके सिर पर है। पैदा होने में, ज़िंदा रहने में, खत्म होने में, ज़हर में और अमृत में। देवी, माया के वश में बेकार शोक करती हो। भगवान का चक्कर ऐसा ही है, जो हिला नहीं सकता और जिसकी शुरुवात नहीं है। राजा जिए या मरे, सोच के दुखी होती हो, सहेली। हम इसलिए दुखी होते हैं क्योंकि अपना नुकसान दिखता है। सीता की माँ बोली, सच और ठीक कहा तुमने, अयोध्या के राजा की रानी। पुण्य वाली लोगों में तुम सबसे आगे हो।
दोहा 282
लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।
lakhanu rāma siya jāhũ bana bhala parināma na pocu |gahabari hiyã kaha kausilā mohi bharata kara socu ||282||
लखमन, राम और सीता को बन जाने दो. रिजल्ट अच्छा होगा, बुरा नहीं होगा. फिर कौसल्या ने, दिल भर आने की वजह से, कहा कि मुझे भरत की चिंता परेशान कर रही है.
चौपाई 283.1-4
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी।सुत सुतबधू देवसरि बारी।।
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ।सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।
भरत सील गुन बिनय बड़ाई।भायप भगति भरोस भलाई।।
कहत सारदहु कर मति हीचे।सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।
जानउँ सदा भरत कुलदीपा।बार बार मोहि कहेउ महीपा।।
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ।पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।।
अनुचित आजु कहब अस मोरा।सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी।भईं सनेह बिकल सब रानी।।
īsa prasāda asīsa tumhārī |suta sutabadhū devasari bārī ||
rāma sapatha maiṁ kīnha na kāū |so kari kahaũ sakhī sati bhāū ||
bharata sīla guna binaya baṛāī |bhāyapa bhagati bharosa bhalāī ||
kahata sāradahu kara mati hīce |sāgara sīpa ki jāhiṁ ulīce ||
jānaũ sadā bharata kuladīpā |bāra bāra mohi kaheu mahīpā ||
kaseṁ kanaku mani pārikhi pāẽ |puruṣa parikhiahiṁ samayã subhāẽ ||
anucita āju kahaba asa morā |soka sanehã sayānapa thorā ||
suni surasari sama pāvani bānī |bhaīṁ saneha bikala saba rānī ||
भगवन की कृपा और आपका आशीर्वाद से, मेरा बेटा और बहू स्वर्ग की नदी के पानी जितने साफ़ हैं। मैने कभी राम की कसम नही खाई थी। पर अब मैं उनकी कसम खा के, सखीजी, अपने दिल की सच्ची बात कह रही हूं। भरत का गुन, अच्छाई, निम्रता और बड़ापन, भाई का प्यार, भक्ति, भरोसा और मेहरबानी। सरस्वती का दिमाग भी उनके बारे में बताते हुए रुक जाए। समुंदर को क्या सीपी से खाली किया जा सकता है? मुझे हमेशा से पता था कि भरत अपने परिवार का दीया है, और राजा ने भी मुझे बार बार यही कहा था। सोना परख की पत्थर से पता चलता है, और मोती जब सुनार के पास आए तब पता चलता है। इंसान को मुश्किल वक्त में और उसके स्वभाव से परखा जाता है। आज ऐसे बात करना मुझे शोभा नही देता, पर दुख और प्यार में समझदूरी थोड़ी रह जाती है। गंगा जैसी साफ़ ये बातें सुनकर, सारी रानियां प्यार से भर गईं।
दोहा 283
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
kausalyā kaha dhīra dhari sunahu debi mithilesi |ko bibekanidhi ballabhahi tumhahi sakai upadesi ||283||
कौसल्या ने हिम्मत करके कहा, सुनो मिथिला की रानी। तुम उसकी पत्नी हो जो ग्यान का खजाना है, तो तुम्हे कोई सलाह कैसे दे सकता है?
चौपाई 284.1-4
रानि राय सन अवसरु पाई।अपनी भाँति कहब समुझाई।।
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन।जौं यह मत मानै महीप मन।।
तौ भल जतनु करब सुबिचारी।मोरें सौचु भरत कर भारी।।
गूढ़ सनेह भरत मन माही।रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी।सब भइ मगन करुन रस रानी।।
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि।सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ।तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।
देबि दंड जुग जामिनि बीती।राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
rāni rāya sana avasaru pāī |apanī bhā̃ti kahaba samujhāī ||
rakhiahiṁ lakhanu bharatu gabanahiṁ bana |jauṁ yaha mata mānai mahīpa mana ||
tau bhala jatanu karaba subicārī |moreṁ saucu bharata kara bhārī ||
gūṛha saneha bharata mana māhī |raheṁ nīka mohi lāgata nāhīṁ ||
lakhi subhāu suni sarala subānī |saba bhai magana karuna rasa rānī ||
nabha prasūna jhari dhanya dhanya dhuni |sithila sanehã siddha jogī muni ||
sabu ranivāsu bithaki lakhi raheū |taba dhari dhīra sumitrā̃ kaheū ||
debi daṁḍa juga jāmini bītī |rāma mātu sunī uṭhī saprītī ||
रानी को, जब मौका मिले, तो अपने तरीके से राजा को समझा देना। लखन को यहीं रख लो, और भरत को जंगल भेज दो, अगर राजा का मन इस बात को मान तो। फिर तुम अच्छे से सोच समझ कर अच्छा प्लान बना लेना, मुझे भरत के बारे में बहुत चिंता होती है। भरत के मन में बहुत गहरा प्यार छुपा है, अगर वो पीछे रहेगा तो मुझे ठीक नहीं लगता। उसका स्वभाव देख कर और उसकी सीधी सीधी बात सुन कर, सारी रानियां करुणा में डूब गईं। आसमान से फूल बरस रहे थे और धन्य धन्य की आवाज हो रही थी, और सिद्ध, योगी और रिशि प्यार में बेहाल हो गए। पूरा रानी महल देखते ही रह गया, फिर सुमित्रा ने हिम्मत करके बोलना शुरू किया। देवी, रात के दो दंड बीत गए हैं। ये सुन कर राम की माता प्यार से उठी।
दोहा 284
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।
begi pāu dhāria thalahi kaha sanehã satibhāya |hamareṁ tau aba īsa gati ke mithilesa sahāya ||284||
उसने प्यार और सच्चाई से कहा, अपने रुकने की जगह की तरफ जल्दी मुड़ जाओ। अब हमारे लिए तो सिर्फ भगवान ही सहारा हैं, या फिर मिथिला के स्वामी जो हमारी मदद करते हैं।
चौपाई 285.1-4
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता।जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी।दसरथ घरिनि राम महतारी।।
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं।अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।
सेवकु राउ करम मन बानी।सदा सहाय महेसु भवानी।।
रउरे अंग जोगु जग को है।दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।
रामु जाइ बनु करि सुर काजू।अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।
अमर नाग नर राम बाहुबल।सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।
यह सब जागबलिक कहि राखा।देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।
lakhi saneha suni bacana binītā |janakapriyā gaha pāya punītā ||
debi ucita asi binaya tumhārī |dasaratha gharini rāma mahatārī ||
prabhu apane nīcahu ādarahīṁ |agini dhūma giri sira tinu dharahīṁ ||
sevaku rāu karama mana bānī |sadā sahāya mahesu bhavānī ||
raure aṁga jogu jaga ko hai |dīpa sahāya ki dinakara sohai ||
rāmu jāi banu kari sura kājū |acala avadhapura karihahiṁ rājū ||
amara nāga nara rāma bāhubala |sukha basihahiṁ apaneṁ apane thala ||
yaha saba jāgabalika kahi rākhā |debi na hoi mudhā muni bhāṣā ||
जनक की प्यारी रानी ने उनका प्यार देख कर और उनकी नरम बातें सुन कर, उनके पैर पकड़ लिए। "रानी, ऐसी नरमी आप पर ही शोभा देती है। आप दसरथ की पत्नी है और राम की माँ है।" "बड़े लोग छोटे लोगों का भी आदर करते हैं। आग अपने सिर पर धुआँ उठाती है, और पहाड़ अपनी चोटी पर घास रखता है।" "राजा जनक आपका नौकर है, करम, मन और बानी से। और शिव और पार्वती हमेशा आपकी मदद करने वाले हैं।" "जग में कोई आपका मददगार बनने के लायक है? क्या दीया सूरज को रोशनी देने में मदद करता है?" "राम बन में जाकर देवताओं का काम करेंगे, और फिर वो अयोध्या पर अचल राज करेंगे।" "राम की बाहु बल से, देवता, नाग और इंसान सब अपने अपने जगह पर खुश रहेंगे।" "ये सब याज्ञवल्क्य ने पहले ही बता दिया था। रानी, रिशि की बात गलत नहीं हो सकती।"
दोहा 285
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।
asa kahi paga pari pema ati siya hita binaya sunāi |siya sameta siyamātu taba calī suāyasu pāi ||285||
इतने कहने के बाद, उसने बड़े प्यार से उनके पैर छूते, और सीता के लिए अपनी बात रखी। फिर सीता की माँ ने सीता को साथ लेके निकल पड़ी, जब उनसे जाने की इजाजत मिल गयी।
चौपाई 286.1-4
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही।जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।
तापस बेष जानकी देखी।भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।
जनक राम गुर आयसु पाई।चले थलहि सिय देखी आई।।
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी।पाहुन पावन पेम प्रान की।।
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू।भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा।ता पर राम पेम सिसु सोहा।।
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु।बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।
मोह मगन मति नहिं बिदेह की।महिमा सिय रघुबर सनेह की।।
priya parijanahi milī baidehī |jo jehi jogu bhā̃ti tehi tehī ||
tāpasa beṣa jānakī dekhī |bhā sabu bikala biṣāda biseṣī ||
janaka rāma gura āyasu pāī |cale thalahi siya dekhī āī ||
līnhi lāi ura janaka jānakī |pāhuna pāvana pema prāna kī ||
ura umageu aṁbudhi anurāgū |bhayau bhūpa manu manahũ payāgū ||
siya saneha baṭu bāṛhata johā |tā para rāma pema sisu sohā ||
cirajīvī muni gyāna bikala janu |būṛata laheu bāla avalaṁbanu ||
moha magana mati nahiṁ bideha kī |mahimā siya raghubara saneha kī ||
सीता अपने घर के प्यारे लोगों से मिली, हर एक को जैसे जैसे मिलना ठीक लगा। सब ने सीता को तपस्वी के कपड़े में देखा, तो सब बहुत दुखी हो गए, और उनका दुख और भी बढ़ गया। जनक ने राम और गुरु का आदेश पा कर वहाँ गया, और सीता को देखने आया। जनक ने सीता को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे प्यार की जिंदगी का पाप धोने वाला मेहमान हो। उनके दिल में प्यार का समंदर उठा, और राजा का दिल प्रयाग जैसा हो गया। उन्होने देखा सीता के प्यार का बड़ जैसा पेड़ वहाँ उग रहा है, और उस पर राम का प्यार एक छोटा बच्चा जैसा चमक रहा है। जैसे कोई बूढ़ा रिशी ग्यान में अटक कर डूब रहा हो, और एक छोटे बच्चे को सहारा पकड़ ले। जनक का दिमाग किसी मोह में नहीं डूबा था, सीता और राम के प्यार की महिमा ही उन्हें भारी पड़ गई थी।
दोहा 286
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
siya pitu mātu saneha basa bikala na sakī sãbhāri |dharanisutā̃ dhīraju dhareu samau sudharamu bicāri ||286||
सीता अपने माँ बाप के प्यार की वजह से बहुत इमोशनल हो गई थी और खुद को संभल नहीं पा रही थी। पर फिर धरती की बेटी ने समय और अपना धरम सोच कर हिम्मत की और खुद को कंट्रोल कर लिया।
चौपाई 287.1-4
तापस बेष जनक सिय देखी।भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।
पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ।सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी।गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे।एहिं किए साधु समाज घनेरे।।
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी।सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई।सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।
कहति न सीय सकुचि मन माहीं।इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।
लखि रुख रानि जनायउ राऊ।हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।
tāpasa beṣa janaka siya dekhī |bhayau pemu paritoṣu biseṣī ||
putri pavitra kie kula doū |sujasa dhavala jagu kaha sabu koū ||
jiti surasari kīrati sari torī |gavanu kīnha bidhi aṁḍa karorī ||
gaṁga avani thala tīni baṛere |ehiṁ kie sādhu samāja ghanere ||
pitu kaha satya sanehã subānī |sīya sakuca mahũ manahũ samānī ||
puni pitu mātu līnha ura lāī |sikha āsiṣa hita dīnhi suhāī ||
kahati na sīya sakuci mana māhīṁ |ihā̃ basaba rajanīṁ bhala nāhīṁ ||
lakhi rukha rāni janāyau rāū |hṛdayã sarāhata sīlu subhāū ||
जनक ने देखा, सीता तपस्वी कपड़ों में है, और उनके मन में बहुत प्यार और संतोष पैदा हुआ। उन्होंने कहा, बेटी, तूने दोनों खानदान को पवित्र कर दिया है, दुनिया में सब लोग तेरी सफेद सारेत बोलते हैं। तेरे कीर्ति की नदी गंगा से भी आगे निकल गई है, और ब्रह्मा के करोड़ों यूनिवर्स में बेह रही है। गंगा की ज़मीन पर सिर्फ तीन बड़े जगह हैं, लेकिन तूने साधु सभा करके बहुत जगह बना दी हैं। पिता ने सत्य और प्यार वाले अच्छे बोल बोले, और सीता अपनी शर्म में डूब सी गई। फिर पिता और माँ ने उसे सीने से लगा लिया, और अच्छी तरह सेहित और प्यार वाली आशीर्वाद और सिखा दी। सीता कुछ नहीं बोली, मन में ही सरमाई, सोचने लगी कि यहाँ रात गुज़रना अच्छा नहीं है। रानी ने उसके मूड को समझ लिया और राजा को बता दिया, अपने हृदय में सीता के शील और अच्छे स्वभाव की तारीफ कर रही थी।
दोहा 287
बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।
bāra bāra mili bheṁṭa siya bidā kīnha sanamāni |kahī samaya sira bharata gati rāni subāni sayāni ||287||
बार बार सीता से मिल के गले लगते रहे और इज्जत से उसकी विदाई की। फिर रानी ने, जो समझदार थी और प्यारी बोली वाली थी, सही वक्त पर भरत के काम के बारे में बात की।
चौपाई 288.1-4
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू।सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।
मूदे सजल नयन पुलके तन।सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि।भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू।इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।
सो मति मोरि भरत महिमाही।कहै काह छलि छुअति न छाँही।।
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद।कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।
भरत चरित कीरति करतूती।धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
समुझत सुनत सुखद सब काहू।सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
suni bhūpāla bharata byavahārū |sona sugaṁdha sudhā sasi sārū ||
mūde sajala nayana pulake tana |sujasu sarāhana lage mudita mana ||
sāvadhāna sunu sumukhi sulocani |bharata kathā bhava baṁdha bimocani ||
dharama rājanaya brahmabicārū |ihā̃ jathāmati mora pracārū ||
so mati mori bharata mahimāhī |kahai kāha chali chuati na chā̃hī ||
bidhi ganapati ahipati siva sārada |kabi kobida budha buddhi bisārada ||
bharata carita kīrati karatūtī |dharama sīla guna bimala bibhūtī ||
samujhata sunata sukhada saba kāhū |suci surasari ruci nidara sudhāhū ||
राजा ने भरत के किरदार के बारे में सुना। वह किरदार सोना जैसा था, उसमें खुशबू थी। अमृत जैसा था, चाँद की तरह ठंडा और शांत। राजा की आँखों में पानी आ गया और उन्होंने आँखें बंद कर लीं। उनके शरीर में खुशी से झिझोरी आ गई। दिल खुश होके उन्होंने भरत की तारीफ शुरू की। राजा बोले, ध्यान से सुन, सुंदर चेहरा वाली। भरत की कहाँ से इंसान को दुनिया के बंधन से आज़ाद कर देती है। धरम में, राजनीति में, और ब्रह्मा के ग्यान में, मैं जितना समझता हूँ, उतनी ही मेरी समझ है। मेरी वह समझ भरत की महिमा के बारे में क्या बोलेगी? चाहे कोशिश भी करे तो उसकी परछाई को भी हाथ नहीं लगा सकती। ब्रह्मा, गणेश, नाग देवता, शिव और सरस्वती, कवि, विद्वान और समझदार लोग, जिनकी बुद्धि बहुत चतुर है। भरत के काम, उसकी कीर्ति, उसके अच्छे काम, उसका धरम, उसका शील, उसके गुन, और उसकी बिना दाग की शान। सब को खुशी देती है, चाहे कोई समझ के सुन या बस सुन ले। गंगा जैसी साफ है और अमृत से भी बढ़िया लगती है।
दोहा 288
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
niravadhi guna nirupama puruṣu bharatu bharata sama jāni |kahia sumeru ki sera sama kabikula mati sakucāni ||288||
भरत के गुनों की कोई लिमिट नहीं, और उसके जैसा दूसरा कोई नहीं। समझो कि भरत सिर्फ भरत के लेवल का है। क्या सुमेरु पहाड़ को किसी रिशी के बराबर वज़न का बोल सकते हैं? सारे कवि सोचते सोचते पीछे हट जाते हैं।
चौपाई 289.1-4
अगम सबहि बरनत बरबरनी।जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।
भरत अमित महिमा सुनु रानी।जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ।तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं।सब कर भल सब के मन माहीं।।
देबि परंतु भरत रघुबर की।प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।
भरतु अवधि सनेह ममता की।जद्यपि रामु सीम समता की।।
परमारथ स्वारथ सुख सारे।भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।
साधन सिद्ध राम पग नेहू।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।
agama sabahi baranata barabaranī |jimi jalahīna mīna gamu dharanī ||
bharata amita mahimā sunu rānī |jānahiṁ rāmu na sakahiṁ bakhānī ||
barani saprema bharata anubhāū |tiya jiya kī ruci lakhi kaha rāū ||
bahurahiṁ lakhanu bharatu bana jāhīṁ |saba kara bhala saba ke mana māhīṁ ||
debi paraṁtu bharata raghubara kī |prīti pratīti jāi nahiṁ tarakī ||
bharatu avadhi saneha mamatā kī |jadyapi rāmu sīma samatā kī ||
paramāratha svāratha sukha sāre |bharata na sapanehũ manahũ nihāre ||
sādhana siddha rāma paga nehū |mohi lakhi parata bharata mata ehū ||
सुनो रानी, भरत को कोई भी बता नहीं सकता। जैसे पानी के बिना मछली जमीन पर नहीं चल सकती, वैसे ही कोई भरत को पूरा नहीं बता सकता। सुनो रानी, भरत की बड़ियत की कोई लिमिट नहीं है। राम सब जानते हैं, लेकिन वो भी उसे बता नहीं सकते। राजा ने प्यार से भरत की बात की, और पत्नी के दिल को जो पसंद लगे देख कर आगे बोला। लक्ष्मण वापस आएँ और भरत बन चले जाएँ, सब के मन में यही है कि यह सब के लिए अच्छा है। लेकिन रानी, भरत और राम के बीच जो प्यार और भरोसा है, उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। भरत प्यार और ममता की लिमिट हैं, जबकि राम सब में बराबर रहने की लिमिट हैं। भरत ने अपने फायदे या किसी बड़े काम का सुख सपने में भी नहीं देखा, ना ही मन में लाया। राम के चरणों का प्यार ही उसका साधना है और उसका सब कुछ है। मेरे हिसाब से यही भरत का विश्वास है।
दोहा 289
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।
bhorehũ bharata na pelihahiṁ manasahũ rāma rajāi |karia na socu saneha basa kaheu bhūpa bilakhāi ||289||
राजा रोते हुए बोला, भरत राम के हुकुम को भूल से भी नही टालेगा, दिल में भी नही। इसलिए प्यार की वजह से फिकर मत करो।
परम्परानुसार यह खण्ड ‘वैराग्य-प्रबोध’ और ‘राम-आज्ञा-परायणता’ देता है: गृह-शोक/वियोग को धर्म-बुद्धि में बदलकर मन को स्थिर करता है, तथा भरत-चरित के श्रवण से ‘भव-बन्धन-बिमोचनि’ (पाठ में ही संकेत) फल माना जाता है।
सत्संग-परम्परा में प्रसंगानुसार ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम रामेति’ जप-संपुट जोड़ा जाता है; विशेषतः भरत-चरित/आज्ञा-पालन के भाव में ‘राम-आज्ञा गुरु समान’ भाव-स्मरण हेतु नाम-संपुट प्रचलित है।
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