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श्रीमद्रामायणकथासङ्क्षेपः / The Ramayana in Synopsis (Narada’s Summary to Valmiki)
बालकाण्ड
Sarga 1 functions as a programmatic prologue. Vālmīki, portrayed as an ascetic devoted to tapas and svādhyāya, questions Nārada about the existence of an ideal human embodying comprehensive virtues (truthfulness, gratitude, self-restraint, courage, and benevolence). Nārada replies by identifying Rāma of the Ikṣvāku line and compresses the epic’s full narrative into a structured synopsis: Rāma’s exemplary qualities; Daśaratha’s intent to install him as heir; Kaikeyī’s boons leading to exile; Lakṣmaṇa and Sītā’s accompaniment; crossings and forest dwellings; Daśaratha’s death; Bharata’s refusal of kingship and the sandals as regnal proxy; the Dandaka arc with sages, Virādha’s slaying, Agastya’s divine weapons; Śūrpaṇakhā’s episode and the Janasthāna campaign; Rāvaṇa’s plot with Mārīca and Sītā’s abduction; Jatāyu’s death and rites; Kabandha and the guidance to Śabarī; alliance with Sugrīva via Hanumān; Vāli’s death and the vānara search; Hanumān’s ocean-leap, discovery of Sītā, and return; the sea-bridge via Nala; conquest of Laṅkā, Rāvaṇa’s death, Agni-testimony, Vibhīṣaṇa’s coronation; return to Ayodhyā and Rāma-rājya. The sarga closes with phalaśruti-style assurances: recitation confers learning, prosperity, and merit across social categories, emphasizing the text’s pedagogical and devotional reception in the Southern Recension colophon.
Verse 1
तपस्स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ।।।।
वाल्मीकि रिशियों में बड़े थे। उन्होंने नारद से सवाल किया। नारद तपस्या में लगे रहते थे, वैदिक पढ़ाई करते थे। वो बोलने वाले सबसे बेस्ट थे।
Verse 2
कोन्वस्मिन्साम्प्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् ।धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रत:।।।।
बताओ तोह सही, आज के ज़माने में कौन है इतना अच्छा? कौन है जो स्ट्रांग है, धरम जानता है, अच्छा काम याद रखता है, सच बोलता है, और अपनी बात पक्की रखता है?
Verse 3
चारित्रेण च को युक्तस्सर्वभूतेषु को हित: ।विद्वान्क: कस्समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शन: ।।।।
ऐसा कौन है जो अच्छा करता है और सबकी भलाई चाहता है? कौन है जो सच में समझदार है और काम कर सकता है? जिसे लोग देख के खुश हो जाते हैं, वो कौन है?
Verse 4
आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयक: ।कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ।।।।
बताओ, ऐसा कौन है जो खुद का कंट्रोल में रहता है? ऐसा कौन है जिसका गुस्सा कभी नहीं आता? जो चमकता है और किसी से जलता नहीं? ऐसा कौन है जिसका गुस्सा देख के देवता भी डर जाते हैं?
Verse 5
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ।।।।
उस धोखेबाज़ ने अपनी चाल से दोनों राजकुमार को दूर ले गया। फिर उसने राम की बीवी को उठा लिया। उसने गिद्ध जटायु को मार डाला और भाग गया।
Verse 6
श्रुत्वा चैतत्ित्रलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वच: ।श्रूयतामिति चामन्त्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ।।।।
जब उसने देखा कि गिद्ध मर गया है। और सुना कि सीता को ले गया है। राम बहुत दुखी हो गया। उसका दिल टूट गया और वो रोते रोते बिल्कुल अकड़ गया।
Verse 7
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणा: ।मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तश्श्रूयतान्नर: ।।।।
फिर सुग्रीव ने कहा तो राघव ने लड़ाई में वालि को मारा। और उस राज्य में सुग्रीव को ही राजा बना दिया।
Verse 8
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैश्श्रुत: ।नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान् वशी ।।।।
फिर सुग्रीव के साथ मिल के राम सागर के पास गए। समुंदर के ऊपर इतने तीर बरसाए कि पानी हिल गया। वो तीर ऐसे चमक रहे थे जैसे सूरज चमक रहा हो।
Verse 9
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हण: ।विपुलांसो महाबाहु: कम्बुग्रीवो महाहनु: ।।।।
राम बहुत समझदार है। वो सही काम करना जानता है। अच्छे से बोलता है। उसपे भगवान की कृपा है। दुश्मनों को हराता है। उसके कंधे चौड़े हैं। बाजू में ताकत है। गर्दन अच्छी है। मुँह पक्का है।
Verse 10
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः ।आजानुबाहुस्सुशिरास्सुललाटस्सुविक्रमः ।।।।
उसकी छाती चौड़ी थी। बड़ा धनुष चलाता था। उसकी हड्डियाँ आपस में जुरी हुई थीं। दुश्मनों को हराने वाला था। उसकी बाहें घुटनों तक जाती थीं। सिर अच्छा था, माथे पे चमक थी। बहुत हिम्मत वाला था।
Verse 11
समस्समविभक्ताङ्गस्स्निग्धवर्ण: प्रतापवान् ।पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ।। ।।
ब्राह्मण यह रामायण पढ़ता है तो बड़ा बोलने वाला बन जाता है। क्षत्रिय पढ़ता है तो राजा बन जाता है। वैश्य पढ़ता है तो धंधे में सफल हो जाता है। शूद्र भी पढ़ता है तो इज़्ज़त मिल जाती है।
Verse 12
धर्मज्ञस्सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः ।यशस्वी ज्ञानसम्पन्नश्शुचिर्वश्यस्समाधिमान् ।।।।
वो धरम जानता था, सच पे रहता था। अपने लोगों का भला चाहता था। बड़ा नाम वाला था, समझदार था, दिल साफ था। सही बात सुन लेता था, मन हमेशा एक जगह लगा रहता था।
Verse 13
प्रजापतिसमश्श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ।।।।
उसका रंग साफ था, चमक थी उसमें। छाती बड़ी थी, आँखें खुली हुई थीं। भगवान की तरह दिखता था। दुश्मनों को हराता था, लोगों की रक्षा करता था। धरम पे चलता था।
Verse 14
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ।वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ।।।।
वो धरम को समझता था और सच बोलता था। अपनी प्रजा का भला चाहता था। उसकी बड़ाई थी और वो ज्ञानी था। दिल साफ था और अपने ऊपर कंट्रोल रखता था।
Verse 15
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञस्स्मृतिमान्प्रतिभानवान् ।सर्वलोकप्रियस्साधुरदीनात्मा विचक्षणः ।।।।
वो प्रजापति जैसा था, भगवान ने दी थी शक्ति। दुश्मनों को मिटा देता था। लोगों की जान बचाता था और धरम की रक्षा करता था।
Verse 16
सर्वदाभिगतस्सद्भिस्समुद्र इव सिन्धुभिः ।आर्यस्सर्वसमश्चैव सदैकप्रियदर्शनः ।।।।
अपना धरम निभाया और अपने लोगों की रक्षा की। वेद और शास्त्र सब समझता था। धनुष चलाना उसको आता था, युद्ध में एक्सपर्ट था।
Verse 17
स च सर्वगुणोपेत: कौसल्यानन्दवर्धन: ।समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ।।।।
वोह हर गुण में परफेक्ट था। कौसल्या का चेहरा देख के खुल जाता था, इतना खुश होती थी। समुंदर जैसा गहरा था, और हिमाचल जैसा स्ट्रांग।
Verse 18
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः ।कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ।।।।धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः ।
विष्णु जैसा पावरफुल था। चेहरा इतना अच्छा था जैसे चाँद। गुस्सा आए तोह जैसे आग लग जाए। इतना पेशेंट था जैसे धरती। दान में कुबेर जैसा। और सच बोलने में धरम का बेटा था।
Verse 19
तमेवं गुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ।।।।ज्येष्ठं श्रेष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथस्सुतम् ।प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ।।।।यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपति: ।
दशरथ ने देखा कि राम में सब गुण हैं। सच में स्ट्रांग है, सबसे बड़ा बेटा है, सबसे अच्छा है। लोगों का भला चाहता है, लोगों को खुश रखना चाहता है। इसलिए दशरथ ने दिल से सोचा कि इसको राजकुमार बना दू।
Verse 20
तमेवं गुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ।।1.1.19।।ज्येष्ठं श्रेष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथस्सुतम् । प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ।।1.1.20।।यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपति: ।
दशरथ ने देखा कि राम में सब गुण हैं। सच में स्ट्रांग है, सबसे बड़ा बेटा है, सबसे अच्छा है। लोगों का भला चाहता है, लोगों को खुश रखना चाहता है। इसलिए दशरथ ने दिल से सोचा कि इसको राजकुमार बना दू।
Verse 21
तस्याभिषेकसम्भारान्दृष्ट्वा भार्याऽथ कैकयी ।।।।पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत ।विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ।।।।
जब राजकुमार बनाने की तैयारी शुरू हुई, तोह कैकेयी ने पुराना बात याद किया। उसने दशरथ से कहा कि तुमने मुझे प्रॉमिस किया था। अब मुझे वही चाहिए। राम को जंगल भेजो, भरत को राजा बनाओ।
Verse 22
तस्याभिषेकसम्भारान्दृष्ट्वा भार्याऽथ कैकयी ।।1.1.21।।पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत । विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ।।1.1.22।।
जब राजकुमार बनाने की तैयारी शुरू हुई, तोह कैकेयी ने पुराना बात याद किया। उसने दशरथ से कहा कि तुमने मुझे प्रॉमिस किया था। अब मुझे वही चाहिए। राम को जंगल भेजो, भरत को राजा बनाओ।
Verse 23
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयत: ।विवासयामास सुतं रामं दशरथ: प्रियम् ।।।।
राजा दशरथ ने अपना वादा निभाया। धरम के हिसाब से उसने अपने प्यारे बेटे राम को बनवास भेज दिया।
Verse 24
स जगाम वनं वीर: प्रतिज्ञामनुपालयन्।पितुर्वचननिर्देशात्कैकेय्या: प्रियकारणात् ।।।।
राम जंगल चले गए। उन्होंने अपने बाप की बात मानी। कैकेयी की ख्वाहिश पूरी करने के लिए यह किया।
Verse 25
तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ।स्नेहाद्विनयसम्पन्नस्सुमित्रानन्दवर्धन: ।।।।भ्रातरं दयितो भ्रातुस्सौभ्रात्रमनुदर्शयन् ।
लक्ष्मण भी उनके पीछे चले गए। वो अपने भाई से बहुत प्यार करते थे। सुमित्रा का बेटा था वो। भाई की सेवा में रहने के लिए तैयार था।
Verse 26
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ।।।।जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधू: ।।।।सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
सीता राम की पत्नी थी। राम उससे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करते थे। जनक की बेटी थी वो। भगवान ने उसको बनाया था जैसे कोई कला का कमाल हो। औरतों में सबसे ऊपर थी वो। राम के पीछे चली गई जैसे चाँद के पीछे रोहिणी चली जाती है।
Verse 27
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ।।1.1.26।।जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधू: ।।1.1.27।।सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
जनक के घर में पैदा हुई थी वो। भगवान की कला से बनी थी जैसे कोई अप्सरा हो। हर तरह की अच्छी बातें थी उसमें। औरतों में सबसे बड़ी थी वो। दशरथ के घर की बहू बनी थी।
Verse 28
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ।।।।शृङ्गिबेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् ।गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ।।।।गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
शहर के लोग और राजा दशरथ पीछे-पीछे काफी दूर तक गए। जब राम शृंगिबेरपुरा पहुंचा, जो गंगा के किनारे है, उसने अपना सारथी वापस भेज दिया।
Verse 29
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ।।1.1.28।।शृङ्गिबेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् । गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ।।1.1.29।।गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
राम वहाँ गुह के पास गया। गुह निषाद लोगों का राजा था और राम का दोस्त था। फिर राम, गुह, लक्ष्मण और सीता सब साथ में आगे चले गए।
Verse 30
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदका: ।।।।चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रय: ।।।।देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
वो जंगल से जंगल गए और काफी नदियाँ पार की जिनमें पानी बहुत था। भरद्वाज ऋषि ने बताया था उस हिसाब से वो चित्रकूट पहुंच गए।
Verse 31
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदका: ।।1.1.30।।चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रय: ।।1.1.31।।देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
वहाँ उन्होंने अच्छा सा घर बनाया। वो तीनों, राम, लक्ष्मण और सीता, वहाँ खुश रहने लगे। देखने में वो लोग देवता और गंधर्व जैसे लगते थे।
Verse 32
चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तथा ।।।।राजा दशरथस्स्वर्गं जगाम विलपन्सुतम् ।
जब राम चित्रकूट चले गए, तब राजा दशरथ बेटे के लिए बहुत दुखी हो गए। वो अपने बेटे को याद करके रोते रहे। फिर उनकी मौत हो गई और वो स्वर्ग चले गए।
Verse 33
मृते तु तस्मिन्भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजै: ।। ।।नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबल:।
जब दशरथ मर गए, तब वसिष्ठ और दूसरे ब्राह्मिन लोग भरत को राज्य संभालने को बोले। लेकिन भरत बड़े बलवान थे, फिर भी उन्होंने राज्य नहीं लिया।
Verse 34
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादक: ।। ।।
भरत बहुत वीर थे। वो जंगल चले गए। उनका सिर्फ एक काम था, राम के चरणों की कृपा पाना।
Verse 35
गत्वा तु सुमहात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।अयाचद्भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृत: ।।।।त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
भरत वहाँ गए। राम बड़े दिल वाले थे और सच्चे वीर थे। भरत ने बड़े भाई से इज्जत से कहा कि आप ही राजा बनो। उन्होंने कहा, आप ही धरम जानते हो, आप ही राजा होना चाहिए।
Verse 36
रामोऽपि परमोदारस्सुमुखस्सुमहायशा: ।न चैच्छत्पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबल: ।।।।
राम बड़े अच्छे थे, चेहरा बड़ा प्यारा था और नाम बड़ा था। लेकिन उन्होंने राज्य नहीं लिया। पिताजी का कहा था, इसलिए उन्होंने मना कर दिया।
Verse 37
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्वा पुन:पुन: ।निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रज: ।।।।
फिर राम ने भरत को अपनी चप्पल दी। यह राज गद्दी की निशानी थी। बार-बार कहा कि अब वापस राज्य चलाओ। भरत से कहा कि अब वापस राजा बन के कैपिटल जाओ।
Verse 38
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ।।।।नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं रामागमनकाङ्क्षया ।
भरत का मन तो यह था कि राम को वापस लाए। पर वो अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाया। उसने राम की चप्पल को सर पे रख के प्रणाम किया। फिर नंदीग्राम से राज्य चलाया। वो बस राम के आने का इंतज़ार करता था।
Verse 39
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रिय: ।।।।रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ।।।।
जब भरत वापस गया, तब राम ने सोचा कि शहर के लोग फिर से यहाँ आ जाएंगे। राम सच पे था, अपने सेंसेज का कंट्रोल रखता था। इसलिए वो एकदम दिल लगा के दंडक वन में चला गया। वहाँ जाके अपना व्रत पूरा करना था।
Verse 40
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रिय: ।।1.1.39।।रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च । तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ।।1.1.40।।
जब भरत वापस गया, तब राम ने सोचा कि शहर के लोग फिर से यहाँ आ जाएंगे। राम सच पे था, अपने सेंसेज का कंट्रोल रखता था। इसलिए वो एकदम दिल लगा के दंडक वन में चला गया। वहाँ जाके अपना व्रत पूरा करना था।
Verse 41
प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः ।विराधं राक्षसं हत्वा शरभङ्गं ददर्श ह ।।।।सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा ।
जब भरत वापस गया, राम ने देखा कि शहर के लोग फिर आ सकते हैं। राम सच पे था, अपने सेंसेज का कंट्रोल रखता था। इसलिए वो दंडक वन में चला गया। वहाँ जाके अपना काम पूरा करना था।
Verse 42
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ।।।।खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ ।
फिर राम जंगल में गए। उन्होंने एक राक्षस विराध को मारा। उसके बाद उन्होंने शरभंग रिशि को देखा। सुतीक्ष्ण और अगस्त्य भी मिले। अगस्त्य के भाई भी वहाँ थे।
Verse 43
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैस्सह ।ऋषयोऽभ्यागमन्सर्वे वधायासुररक्षसाम् ।।।।
अगस्त्य ने कहा तो राम ने इंद्र का धनुष ले लिया। वो बहुत खुश थे। उन्होंने एक तलवार भी ली। दो क्विवर भी मिले, जिनमें एरोज थे जो कभी खत्म नहीं होते थे।
Verse 44
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तथा वने ।।।।प्रतिज्ञातश्च रामेण वधस्संयति रक्षसाम् ।ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ।।।।
जब राम जंगल में रह रहे थे, वहाँ के रिशि उनके पास आए। वो सब परेशान थे क्योंकि राक्षस उन्हे तंग करते थे। रिशियों ने राम से कहा कि इन राक्षसों को खत्म कर दो।
Verse 45
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तथा वने ।।1.1.44।। प्रतिज्ञातश्च रामेण वधस्संयति रक्षसाम् ।ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ।।1.1.45।।
राम ने वहाँ जंगल में रिशियों की बात सुनी। वो रिशि आग जैसी चमक के साथ चमकते थे। राम ने उनको प्रॉमिस किया कि मैं इन राक्षसों को युद्ध में मार दूंगा।
Verse 46
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी ।विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ।।।।
जब राम वहाँ रह रहे थे, एक राक्षस हुई उसका नाम शूर्पणखा था। वो अपना रूप बदल सकती थी। उसने गलत हरकत की, तो उसकी शक्ल बिगाड़ दी गई।
Verse 47
ततश्शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान्सर्वराक्षसान् ।खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ।।।।निजघान वने रामस्तेषां चैव पदानुगान् ।
शूर्पनखा की बात सुन के सारे राक्षस लड़ने के लिए तैयार हो गए। उस जंगल में राम ने खर, त्रिशिरस और दूषण को मारा। उनके सारे आदमी भी गए।
Verse 48
वने तस्मिन्निवसता जनस्थाननिवासिनाम् ।।।।रक्षसां निहतान्यासन्सहस्राणि चतुर्दश ।
जब राम उस जंगल में रह रहे थे, उस वक्त चौदह हज़ार राक्षस मारे गए। वो सब जनस्थान में रहते थे।
Verse 49
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ।।।।सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् ।
जब रावण को पता चला कि उसके अपने लोग मारे गए हैं, वो बहुत गुस्सा हो गया। उसने एक राक्षस को बुलाया जिसका नाम मारीच था। उसने उससे मदद मांगी।
Verse 50
वार्यमाणस्सुबहुशो मारीचेन स रावणः ।।।।न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते ।
महर्षि, मैं यह बात सुनना चाहता हूँ। मुझे बहुत जल्दी है जानने में। आप ही जानते हैं कि ऐसा कोई इंसान कौन है जो इतना बड़ा हो।
Verse 51
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावण: कालचोदित: ।।।।जगाम सह मारीचस्तस्याश्रमपदं तदा ।
मारीच ने रावण को बहुत बार समझाया कि उससे लड़ना ठीक नहीं है। लेकिन रावण ने उसकी एक नहीं सुनी। फिर रावण मारीच को ले के राम के आश्रम की तरफ चला गया।
Verse 52
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ।।।।जहार भार्यां रामस्य गृध्रं हत्वा जटायुषम् ।
रावण ने उसकी बात का कोई अटेंशन नहीं दिया। काल उसे पीछे पड़ा था। वो मारीच के साथ चला गया। दोनों उस आश्रम की तरफ निकल पड़े।
Verse 53
गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ।।।।राघवश्शोकसन्तप्तो विललापाकुलेन्द्रिय: ।
उसी दुख में उसने गिद्ध जटायु को आग्नि दी। फिर वो जंगल में सीता को ढूँढने लगा। तभी उसको एक राक्षस मिला। उसका नाम कबन्ध था, डरावना चेहरा था उसका।
Verse 54
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ।।।।मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं सन्ददर्श ह ।कबन्धन्नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ।।।।
वो उसी दुख में डूबा हुआ था। जटायु की लाश को जलाया उसने। जंगल में सीता को ढूँढ रहा था। तभी एक राक्षस मिला उसे। कबन्ध नाम था उसका, देखने में बहुत डरावना था।
Verse 55
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ।।1.1.54।।मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं सन्ददर्श ह ।कबन्धन्नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ।।1.1.55।।
उसका नाम कबंध था। उसका रूप बिगड़ा हुआ था और देखने में बहुत डरावना था।
Verse 56
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च स: ।स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ।।।।श्रमणीं धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव । 1151
राम ने उसे मारा और फिर उसकी लाश को आग में जला दिया। वो स्वर्ग चला गया। जाते वक्त उसने राम को कहा कि तुम शबरी के पास जाओ। वो धरम में लगी हुई थी और बहुत समझदार थी।
Verse 57
सोऽभ्यगच्छन्महातेजाश्शबरीं शत्रुसूदन: ।।।।शबर्या पूजितस्सम्यग्रामो दशरथात्मज: ।
फिर राम, दशरथ का बेटा, शबरी के पास गया। उसने राम की बहुत अच्छी तरह पूजा की और उसकी बहुत इज्जत की।
Verse 58
पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ।।।।हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागत: ।
पंपा नदी के किनारे राम को हनुमान मिला। हनुमान ने कहा तो उसने सुग्रीव से भी बात की।
Verse 59
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबल: ।।।।आदितस्तद्यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषत: ।
राम ने सुग्रीव को सब कुछ बताया। शुरू से लेकर पूरा किस्सा, और सीता का जो हुआ वो भी डिटेल में।
Verse 60
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानर: ।।।।चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम् ।
सुग्रीव ने राम की बात सुनी। वो वानर था। उसने राम से दोस्ती कर ली। दोनों ने अग्नि के सामने पक्का किया।
Verse 61
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ।।।।रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद्दु:खितेन च ।
फिर वानरों का राजा ने कहा। वो दुखी था पर राम से प्यार भी था। उसने राम को पूरा बताया कि उसकी दुश्मनी वालि के साथ कैसे हुई।
Verse 62
प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति ।।।।वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानर: ।
तब राम ने वादा किया कि वो वालि को मारेगा। वानर ने बताया कि वालि में कितना बल है और वो कितना ताकतवर है।
Verse 63
सुग्रीवश्शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ।।।।राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभे: कायमुत्तमम् ।दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ।।।।
सुग्रीव को राम पर शक था। वो सोचता था कि राम में इतनी ताकत है या नहीं। इसलिए उसने राम को एक काम दिखाया। एक राक्षस दुंदुभी की बॉडी थी, बड़ी पहाड़ जैसी।
Verse 64
सुग्रीवश्शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ।।1.1.63।।राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभे: कायमुत्तमम् ।दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ।।1.1.64।।
सुग्रीव को अभी भी शक था कि राम में इतनी ताकत है या नहीं। उसने दिखाया कि दुंदुभी की बॉडी कितनी बड़ी थी, पहाड़ जैसी। ताकि राम को पूरा यकीन हो जाए।
Verse 65
उत्स्मयित्वा महाबाहु: प्रेक्ष्य चास्थि महाबल: ।पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम् ।।।।
राम मुस्कुरा के उन हड्डियों को देखा। वो बहुत ताकत वाला था, बड़े हाथ वाला। उसने अपने अंगूठे से वो हड्डी उचाल दी। इतनी ज़ोर लगी कि वो दस योजन दूर चली गई।
Verse 66
बिभेद च पुनस्सालान्सप्तैकेन महेषुणा ।गिरिं रसातलं चैव जनयन्प्रत्ययं तथा ।।।।
फिर राम ने एक ही तीर चलाया। उस तीर ने सात साल के पेड़ों को चीर दिया। साथ ही एक पहाड़ भी फट गया, नीचे तक कि पानी वाली जगह तक। यह सब देख के सबको यकीन हो गया कि उसमें बहुत ताकत है।
Verse 67
तत: प्रीतमनास्तेन विश्वस्तस्स महाकपि: ।किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा ।।।।
यह सब देख के सुग्रीव खुश हो गया। अब उसे राम पर भरोसा था। वो बड़ा बंदर था। राम के साथ वो किष्किंधा की गुफा के पास गया।
Verse 68
ततोऽगर्जद्धरिवर: सुग्रीवो हेमपिङ्गल: ।तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वर: ।।।।
फिर सुग्रीव ज़ोर से चिल्लाया। वो बंदरों में बड़ा था, उसका रंग सुनहरा था। उसकी आवाज़ सुनकर वाली बाहर आया। वाली भी बंदरों का राजा था।
Verse 69
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागत: ।निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघव: ।।।।
तारा ने वाली को समझाया कि डरो मत। फिर वाली और सुग्रीव लड़ने लगे। राम ने एक ही तीर चलाया। उस तीर से वाली वही गिर गया।
Verse 70
ततस्सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे ।सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघव: प्रत्यपादयत् ।।।।
मुने, तुमने जो गुण बताए वो बहुत कम लोगों में होते हैं। मैं समझ गया कि किस में यह सब गुण हैं। अब मैं उस आदमी के बारे में बताता हूँ, सुनो।
Verse 71
स च सर्वान्समानीय वानरान्वानरर्षभ: ।दिश: प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ।।।।
सुग्रीव ने सारे वानरों को इकठ्ठा किया। वो वानरों का बड़ा लीडर था। फिर उन्हें चारों तरफ भेजा, जनक की बेटी सीता को ढूँढने के लिए।
Verse 72
ततो गृध्रस्य वचनात्सम्पातेर्हनुमान्बली।शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम्।।।।
फिर गृद्ध ने जो कहा, उसकी बात सुन के हनुमान ने कूद लिया। वो बहुत बलवान था। उसने नमक वाले समुंदर पार किया, जो सौ योजना चौड़ा था।
Verse 73
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ।।।।
वहाँ पहुँच के उसने लंका देखी, जो रावन की नगरी थी। अशोक के बाग में उसने सीता को देखा, वो राघव को याद कर रही थी।
Verse 74
निवेदयित्वाऽऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं च निवेद्य च ।समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ।।।।
हनुमान ने पहले सीता को वोह पहचाने का निशान बताया। फिर उन्होंने पूरा हाल सुनाया क्या क्या हुआ। सीता को तसल्ली दी कि सब ठीक है। फिर उसने उस दरवाज़े का तोरण तोड़ दिया।
Verse 75
पञ्च सेनाग्रगान्हत्वा सप्तमन्त्रिसुतानपि ।शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ।।।।
हनुमान ने पाँच बड़े सेनापति मारे। साथ में सात मंत्रियों के बेटे भी मारे। फिर उसने अक्षय को भी मार डाला, जो बहुत तेज़ था। आखिर में उसने खुद को पकड़वाने दिया।
Verse 76
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद्वरात् ।मर्षयन्राक्षसान्वीरो यन्त्रिणस्तान्यदृच्छया ।।।।ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम् ।रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपि: ।।।।
हनुमान को पता था कि ब्रह्मा की वरदान से वोह अस्त्र उसपे काम नहीं करेगा। इसलिए उसने राक्षसों को अपने ऊपर हाथ देने दिया। फिर उसने लंका की पूरी को आग लगा दी। सिर्फ सीता को छोड़ दिया। फिर वापस राम के पास गया और खुशखबरी दी।
Verse 77
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद्वरात् ।मर्षयन्राक्षसान्वीरो यन्त्रिणस्तान्यदृच्छया ।।1.1.76।। ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम् ।रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपि: ।।1.1.77।।
हनुमान को पता था कि ब्रह्मा की वरदान से वोह अस्त्र उसपे काम नहीं करेगा। इसलिए उसने राक्षसों को अपने ऊपर हाथ देने दिया। फिर उसने लंका की पूरी को आग लगा दी। सिर्फ सीता को छोड़ दिया। फिर वापस राम के पास गया और खुशखबरी दी।
Verse 78
सोऽधिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् ।न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वत: ।।।।
हनुमान ने ब्रह्मा की वरदान की वजह से जान लिया कि वोह अस्त्र से आज़ाद है। उसने राक्षसों को अपने ऊपर हाथ देने दिया क्योंकि उसको यही सही लग रहा था। फिर लंका को आग लगा दी, सीता को छोड़ के। महान बंदर वापस राम के पास गया और खुशखबरी दी।
Verse 79
ततस्सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधे: ।समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभै: ।।।।
हनुमान वापस आया और राम के पास गया। उसने राम के चरणों में झुक कर प्रणाम किया। फिर सच-सच बताया कि सीता को देखा है।
Verse 80
दर्शयामास चात्मानं समुद्रस्सरितां पति: ।समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ।।।।
समुंदर, जो नदियों का मालिक है, अपना असली रूप दिखाया। उसकी बात मान के राम ने नल से पुल बनवाया।
Verse 81
तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे ।राम: सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ।।।।
उस पुल से लंका पहुंच के राम ने रावण को युद्ध में मारा। सीता को वापस पा के भी उन्हें बड़ा शरम आया।
Verse 82
तामुवाच ततो राम: परुषं जनसंसदि ।अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ।।।।
फिर सबके सामने राम ने सीता से काफी कड़वी बातें की। सीता यह बात नहीं सुन पाई। उन्होंने अग्नि में कूद कर अपनी साफ साफ दिखाई।
Verse 83
ततोऽग्निवचनात्सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् ।बभौ रामस्सम्प्रहृष्ट: पूजितस्सर्वदैवतै: ।।।।
अग्नि ने बता दिया कि सीता बिल्कुल साफ है, कोई दोष नहीं। राम खुशी से चमक उठे। सारे देवताओं ने उनकी पूजा की।
Verse 84
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ।सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मन: ।।।।
रघव ने जो बड़ा काम किया, उससे तीनो दुनिया खुश हो गई। जितने भी लोग हैं, सब, देवी-देवता और रिशि सब ठीक हो गए। सब खुश थे।
Verse 85
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वर: प्रमुमोद ह ।।।।
फिर लंका में राम ने विभीषण को राजा बना दिया। उसका काम पूरा हो गया। अब उसे कोई चिंता नहीं थी। वो बहुत खुश था।
Verse 86
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् ।अयोध्यां प्रस्थितो राम: पुष्पकेण सुहृद्वृत: ।।।।
देवी-देवताओं से राम को वरदान मिला। उसने वानरों को भी ठीक कर दिया। फिर अपने दोस्तों के साथ पुष्पक रथ में बैठ के अयोध्या के लिए निकल पड़ा।
Verse 87
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामस्सत्यपराक्रम: ।भरतस्यान्तिकं रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत् ।।।।
भरद्वाज रिशि के आश्रम गए। राम ने हनुमान को भरत के पास भेजा। उसे बोला, जा भरत को सब बता दे।
Verse 88
पुनराख्यायिकां जल्पन्सुग्रीवसहितश्च स: ।पुष्पकं तत्समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा ।।।।
फिर सुग्रीव के साथ बातें करता हुआ पुष्पक में चढ़ा। और नंदीग्राम के लिए निकल गया।
Verse 89
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिस्सहितोऽनघ: ।रामस्सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ।।।।
नंदीग्राम में राम ने अपनी जटें उतार दी। वो अपने भाइयों के साथ था। सीता वापस मिल गई। राम ने अपना राज्य फिर से पा लिया।
Verse 90
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्ट: पुष्टस्सुधार्मिक: ।निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जित: ।।।।
राम के राज में लोग बहुत खुश थे। दिल से खुश थे। धरम पे चले थे। कोई बीमार नहीं था। किसी को भूख का डर नहीं था।
Verse 91
न पुत्रमरणं किञ्चिद्द्रक्ष्यन्ति पुरुषा: क्वचित् ।नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रता: ।।।।
किसी आदमी को अपने बेटे की मौत नहीं देखनी पड़ी। औरतों के पति नहीं मरे। वो अपने पति के साथ रहती थी।
Verse 92
न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तव: ।न वातजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ।।।।न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।
आग का डर नहीं था। कोई पानी में डूबता नहीं था। हवा से खतरा नहीं था। बुखार नहीं होता था। भूख का डर नहीं था। चोरों का डर भी नहीं था।
Verse 93
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ।।।।नित्यं प्रमुदितास्सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।
शहर और गाँव दोनों में पैसा और अनाज भरा था। लोग हमेशा खुश थे, जैसे कोई पुराना अच्छा ज़माना हो।
Verse 94
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकै: ।।।।गवां कोट्ययुतं दत्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।असंख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा: ।।।।
राम बहुत बड़े नाम वाले थे। उन्होंने सौ-सौ अश्वमेध यज्ञ किए और बहुत सारा सोना दिया। ब्राह्मण लोगों को लाखों गाये दी और जिस दिन तक का हिसाब नहीं, उतना पैसा दिया। अब वो ब्रह्मा के पास जायेंगे।
Verse 95
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकै: ।।1.1.94।।गवां कोट्ययुतं दत्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।असंख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा: ।।1.1.95।।
जिस दिन तक का हिसाब नहीं, उतना पैसा ब्राह्मण लोगों को दिया। बड़ा नाम वाले लोग ऐसे ही अपना काम पूरा करके चले जाते हैं।
Verse 96
राजवंशान्शतगुणान्स्थापयिष्यति राघव: ।चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ।।।।
रघव राजपरिवार को सौ गुना बड़ा करके बिठायेंगे। चार तरह के लोग अपना-अपना काम करेंगे, सब अपनी जगह पे।
Verse 97
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।। ।।
राम दस हज़ार साल राज करेंगे, और उसके ऊपर और हज़ार साल। फिर वो ब्रह्मा के पास जायेंगे।
Verse 98
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।य: पठेद्रामचरितं सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।।।
यह रामायण का पूरा बात पाप मिटाने वाली है और पुण्य देने वाली है। यह वेदों के बराबर की चीज़ है। जो कोई राम के बारे में पढ़ता है, उसके सारे पाप माफ़ हो जाते हैं।
Verse 99
एतदाख्यानमायुष्यं पठन्रामायणं नर: ।सपुत्रपौत्रस्सगण: प्रेत्य स्वर्गे महीयते ।। ।।
यह रामायण पढ़ने वाले की उमर लंबी होती है। मरने के बाद वो स्वर्ग में जाता है। उसके साथ उसके बेटे, पोते और सारी फ़ैमिली भी जाती है।
Verse 100
पठन्द्विजो वागृषभत्वमीयात्स्यात्क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।वणिग्जन: पण्यफलत्वमीयात्जनश्च शूद्रोऽपि महत्वमीयात् ।।।।
वो हर शास्त्र का ज्ञान रखता था। यादाश अच्छी थी और समझदारी भी। सब लोग उससे प्यार करते थे। बुरा लोगों से दूर रहता था और सही फैसला लेता था।
Verse 101
वो धरम जानता था, सच पे रहता था। अपने लोगों का भला चाहता था। बड़ा नाम वाला था, समझदार था, दिल साफ था। सही बात सुन लेता था, मन हमेशा एक जगह लगा रहता था।
The sarga frames an ethical inquiry rather than a single dilemma: Vālmīki asks whether a human exemplar can embody a complete set of virtues (guṇa-sampad) in the present world. Nārada answers by presenting Rāma as the integrative model of dharma in action—truth-keeping, kingship-as-protection, and restraint under adversity.
The upadeśa is that ethical excellence is not abstract: it is validated through narrative causality—vows, consequences, and public welfare. The synopsis teaches that dharma is sustained by satya (truth), niyama (self-governance), and lokasaṅgraha (holding society together), making the epic a normative map for conduct.
Key landmarks are presented as a route-map of the epic: Ayodhyā’s succession crisis; Śṛṅgibērapura and the Gaṅgā crossing with Guha; Citrakūṭa and Bharadvāja’s hermitage; Daṇḍakāraṇya and Janasthāna; Pampā and Kiṣkindhā; the ocean crossing to Laṅkā and the Aśoka grove; and the return via Puṣpaka to Nandigrāma and Ayodhyā.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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