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Rishi: Atharvanic tradition; verse is RV-like in diction and may reflect borrowing/adaptation
Devata: Agni
Chandas: Triṣṭubh-like cadence (RV-style); Atharvanic transmission may preserve mixed metrical features
Mantra 1
शत्रुनाशनम्। र॒क्षो॒हणं॑ वा॒जिन॒मा जि॑घर्मि मि॒त्रं प्रथि॑ष्ठ॒मुप॑ यामि॒ शर्म॑ । शिशा॑नो अ॒ग्निः क्रतु॑भिः॒ समि॑द्धः॒ स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म्
यह मंत्र दुश्मनों को खत्म करने के लिए है। मैं उस शक्ति को तेल लगा रहा हूँ जो दुश्मन मारता है। मैं उस दोस्त के पास जा रहा हूँ जो हमेशा से पक्का है, उसी की शरण में। अग्नि भगवान की आग तेज चमक रही है। वो दिन में भी हमें बुरी चीज़ों से बचाए, रात में भी।
Mantra 2
अयो॑दंष्ट्रो अ॒र्चिषा॑ यातु॒धाना॒नुप॑ स्पृश जातवेदः॒ समि॑द्धः । आ जि॒ह्वया॒ मूर॑देवान् रभस्व क्र॒व्यादो॑ वृ॒ष्ट्वापि॑ धत्स्वा॒सन्
अग्नि भगवान, तुम्हारी आग में लोहे जैसी दाँत हैं। तुम्हारी लपट उन बुरी आत्माओं तक पहुँच जाए जो लोगों को तंग करती हैं। जब तुम जल रहे हो, तुम उन्हें पकड़ लो। अपनी जीभ से उन बढ़ लोगों को मार डालो। जो मास खाते हैं उनको तुम अपने मुँह में दबा के रखना।
Mantra 3
उ॒भोभ॑यावि॒न्नुप॑ धेहि॒ दंष्ट्रौ॑ हिं॒स्रः शिशा॒नोऽव॑रं॒ परं॑ च । उ॒तान्तरि॑क्षे॒ परि॑ याह्यग्ने॒ जम्भैः॒ सं धे॑ह्य॒भि या॑तु॒धाना॑न्
अग्नि, तुम दोनों तरफ से डराने वाले हो। अपने दाँत ऐसा लगा जैसे बड़े खतरनाक हो। नीचे से ऊपर तक सबको मार डालना। हवा में घूमेगा और जादू करने वालों को पकड़ के उनका काम तमाम कर दो।
Mantra 4
अग्ने॒ त्वचं॑ यातु॒धान॑स्य भिन्धि हिं॒स्राशनि॒र्हर॑सा हन्त्वेनम्। प्र पर्वा॑णि जातवेदः शृणीहि क्र॒व्यात् क्र॑वि॒ष्णुर्वि चि॑नोत्वेनम्
अग्नि, उस जादू करने वाले की खाल फाड़ दो। बिजली की तरह ज़ोर से मार के उसे बर्बाद कर दो। उसकी हड्डियाँ तोड़ दो, जो सब जानता है वही करेगा। वो माँस खाने वाला है, उसे फाड़ के अलग-अलग कर दो।
Mantra 5
यत्रे॒दानीं॒ पश्य॑सि जातवेद॒स्तिष्ठ॑न्तमग्न उ॒त वा॒ चर॑न्तम्। उ॒तान्तरि॑क्षे॒ पत॑न्तं यातु॒धानं॒ तमस्ता॑ विध्य॒ शर्वा॒ शिशा॑नः
जहाँ भी तुम उसको देखो, खड़ा हो या चल रहा हो। हवा में उड़ रहा हो तो भी उस जादू करने वाले को पकड़ लो। अपने तीर से उसे मार डालना, कोई भी जगह हो नहीं बचने देना।
Mantra 6
य॒ज्ञरिषूः॑ सं॒नम॑मानो अग्ने वा॒चा श॒ल्याँ अ॒शनि॑भिर्दिहा॒नः । ताभि॑र्विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न् प्रती॒चो बा॒हून् प्रति॑ भङ्ग्ध्येषाम्
अग्नि भगवान से यह प्रार्थना है। वो यज्ञ के बाण लेकर तैयार हो, निशाना लगा के बैठा हो। अपनी बानी से वो बिजली और तीर बना ले। इन सब से वो यातुधानों का दिल छेद दे। उनके हाथ पीछे की तरफ मोड़ दे, ताकि वो खुद ही टूट जाएँ।
Mantra 7
उ॒तार॑ब्धान्त्स्पृनुहि जातवेद उ॒तारे॑भा॒णाँ ऋ॒ष्टिभि॑र्यातु॒धाना॑न्। अग्ने॒ पूर्वो॒ नि ज॑हि॒ शोशु॑चान आ॒मादः॒ क्ष्विङ्का॒स्तम॑द॒न्त्वेनीः॑
जातवेदस, जो लोग पकड़ चुके हैं उनको चीर कर फेंक। जो यातुधान अभी तक हमारे पास नहीं आए, उनको भी भान और बर्छी से मारना। अग्नि, तु सबसे पहले है, जल रहा है, उनको नीचे गिरा दे। जो कच्चा मास खाते हैं, जो भौंकते हैं, जो तेज़ दौड़ते हैं, वो उसको खा जाएँ।
Mantra 8
इ॒ह प्र ब्रू॑हि यत॒मः सो अ॑ग्ने यातु॒धानो॒ य इ॒दं कृ॒णोति॑ । तमा र॑भस्व स॒मिधा॑ यविष्ठ नृ॒चक्ष॑स॒श्चक्षु॑षे रन्धयैनम्
अग्निजी, यहाँ बताओ कि इनमें से कौन बढ़ा कर रहा है, वो यातुधान जो यह सब करता है। उसको पकड़ो, तुम जो सबसे छोटे हो, अपनी लकड़ी से उसे मार के कंट्रोल करो। तुम इंसान को पहचानने वाले हो, उसको अपनी नज़र में रखना।
Mantra 9
ती॒क्ष्णेना॑ग्ने॒ चक्षु॑षा रक्ष य॒ज्ञं प्राञ्चं॒ वसु॑भ्यः॒ प्र ण॑य प्रचेतः । हिं॒स्रं रक्षां॑स्य॒भि शोशु॑चानं॒ मा त्वा॑ दभन् यातु॒धाना॑ नृचक्षः
अग्निजी, अपनी तेज़ नज़र से यह यज्ञ की रक्षा करो। इसको आगे ले जाओ, वसु भगवान के पास। तुम जो सोच समझ के चलते हो। जिन्हें किसी को तकलीफ देने की आदत है, उनके खिलाफ चमक के खड़े हो जाओ। यह यातुधान लोग तुम्हे धोखा ना दें, तुम इंसान को पहचानने वाले हो।
Mantra 10
नृ॒चक्षा॒ रक्षः॒ परि॑ पश्य वि॒क्षु तस्य॒ त्रीणि॒ प्रति॑ शृणी॒ह्यग्रा॑ । तस्या॑ग्ने पृ॒ष्टीर्हर॑सा शृणीहि त्रे॒धा मूलं॑ यातु॒धान॑स्य वृश्च
तुम इंसान को पहचानने वाले हो, तो लोगों में घूम के देखो वो राक्षस कहाँ छुपा है। उसके तीन मेन हिस्सों को मार के तोड़ दो। अग्निजी, उसकी पीठ को ज़ोर से मार के तोड़ दो। उस यातुधान की जड़ भी तीन हिस्सों में काट के निकाल दो।
Mantra 11
त्रिर्या॑तु॒धानः॒ प्रसि॑तिं त एत्वृ॒तं यो अ॑ग्ने॒ अनृ॑तेन॒ हन्ति॑ । तम॒र्चिषा॑ स्फू॒र्जय॑न् जातवेदः सम॒क्षमे॑नं गृण॒ते नि यु॑ङ्ग्धि
अग्नि, जो लोग झूठ बोलके सच को मारते हैं, उनको तीन बार तुम्हारे फाँदे में आने दो। जातवेदस, तुम अपनी आग से चमक के उनको सबके सामने बाँध दो। जो लोग तुम्हारी तारीफ करते हैं, उनके लिए यह करो।
Mantra 12
यद॑ग्ने अ॒द्य मि॑थु॒ना शपा॑तो॒ यद् वा॒चस्तृ॒ष्टं ज॒नय॑न्त रे॒भाः । म॒न्योर्मन॑सः शर॒व्या॒३जाय॑ते॒ या तया॑ विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न्
अग्नि, जो लोग आपस में गाली देते हैं और जो तीर जैसी बातें बोलते हैं, उससे बड़े गुस्से और सोच का तीर बनता है। उस तीर से तुम यह यातुधान लोगों के दिल में मारो।
Mantra 13
परा॑ शृणीहि॒ तप॑सा यातु॒धाना॒न् परा॑ग्ने॒ रक्षो॒ हर॑सा शृणीहि । परा॒र्चिषा॒ मूर॑देवान्छृणीहि॒ परा॑सु॒तृपः॒ शोशु॑चतः शृणीहि
अग्नि, अपनी गर्मी से बुरी आत्माओं को भगा दे। अपनी आग से राक्षस को दूर कर। अपनी लौ से वो बुरी शक्तियों को मार। जो लोग जान खाते हैं और आग जैसा बड़े, उनको भी भगा दे।
Mantra 14
परा॒द्य दे॒वा वृ॑जि॒नं शृ॑णन्तु प्र॒त्यगे॑नं श॒पथा॑ यन्तु सृ॒ष्टाः । वा॒चास्ते॑नं॒ शर॑व ऋच्छन्तु॒ मर्म॒न् विश्व॑स्यैतु॒ प्रसि॑तिं यातु॒धानः॑
आज देवता इस बुरी चीज़ को तोड़ दें। जो भी बुरा काम किया है, उसका फल उसी को मिले। बोली से तीर मारो उस चोर पर, जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द हो। वो बुरी आत्मा जाल में फंस जाए।
Mantra 15
यः पौरु॑षेयेण क्र॒विषा॑ सम॒ङ्क्ते यो अश्व्ये॑न प॒शुना॑ यातु॒धानः॑ । यो अ॒घ्न्याया॒ भर॑ति क्षी॒रम॑ग्ने॒ तेषां॑ शी॒र्षाणि॒ हर॒सापि॑ वृश्च
जो इंसान की मांस से अपना शरीर मलते हैं। जो घोड़े और जानवर मारते हैं। जो गाय का दूध छीन लेते हैं। अग्नि, उन सबके सर काट दे अपनी गर्मी से।
Mantra 16
वि॒षं गवां॑ यातु॒धाना॑ भरन्ता॒मा वृ॑श्चन्ता॒मदि॑तये दु॒रेवाः॑ । परै॑णान् दे॒वः स॑वि॒ता द॑दातु॒ परा॑ भा॒गमोष॑धीनां जयन्ताम्
जो लोग जादू करते हैं और गायों को बिमारी डालते हैं, वो खुद उस ज़हर को उठा के रख लें। जो लोग बुरा काम करते हैं, उनका नाश हो जाए। सविता देव उनको बहुत दूर ले जाए। और जो जड़ी-बूटियाँ हैं, वो बुरी चीज़ को भगा दें।
Mantra 17
सं॒व॒त्स॒रीणं॒ पय॑ उ॒स्रिया॑या॒स्तस्य॒ माशी॑द् यातु॒धानो॑ नृचक्षः । पी॒यूष॑मग्ने यत॒मस्तितृ॑प्सा॒त् तं प्र॒त्यञ्च॑म॒र्चिषा॑ विध्य॒ मर्म॑णि
गाय का दूध जो एक साल पुराना हो, उसमें जो जादू करने वाले घुस के पीना चाहें, वो न पीएँ। अग्नि, जो भी उस अमृत जैसा मीठा दूध अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करे, तुम उसकी आग से उसको वापस भगा दो। उसकी कमज़ोर जगह पे मारो।
Mantra 18
स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न् न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः । स॒हमू॑रा॒ननु॑ दह क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः
अग्नि, तूने पुराने टाइम से बुरी आत्माओं को कुचल दिया। राक्षस तुझे कभी लड़ाई में नहीं हरा पाए। उन माँस खाने वाले दुश्मनों को जला दे। उनकी बुरी ताकत तुझे न लग जाए।
Mantra 19
त्वं नो॑ अग्ने अध॒रादु॑द॒क्तस्त्वं प॒श्चादु॒त र॑क्षा पु॒रस्ता॑त्। प्रति॒ त्ये ते॑ अ॒जरा॑स॒स्तपि॑ष्ठा अ॒घशं॑सं॒ शोशु॑चतो दहन्तु
अग्नि, तू हमें नीचे से ऊपर से बचा। पीछे से भी, आगे से भी, सब तरफ से रखवाली कर। जो बुरा बोलता है, तेरी तेज़ आग उसे जला दे।
Mantra 20
प॒श्चात् पु॒रस्ता॑दध॒रादु॒तोत्त॒रात् क॒विः काव्ये॑न॒ परि॑ पाह्यग्ने । सखा॒ सखा॑यम॒जरो॑ जरि॒म्णे अग्ने॒ मर्ताँ॒ अम॑र्त्य॒स्त्वं नः॑
अग्नि, पीछे से, आगे से, नीचे से, ऊपर से, सब तरफ से हमें बचा। तू अपने दोस्त की तरह हमें संभाल। तू अमृत है, हम मरते हैं, तू हमें बचाता रहे।
Mantra 21
तद॑ग्ने॒ चक्षुः॒ प्रति॑ धेहि रे॒भे श॑फा॒रुजो॒ येन॒ पश्य॑सि यातु॒धाना॑न्। अ॒थ॒र्व॒वज्ज्योति॑षा॒ दैव्ये॑न स॒त्यं धूर्व॑न्तम॒चितं॒ न्योऽष
अग्नि से कह रहे हैं कि वो आँख इस्तेमाल कर जो बुरी आत्माओं को देख सकती है। यह आँख इतनी ताकत वाली है कि दुश्मन की हड्डी तक तोड़ सकती है। अथर्वन रिशियों जैसी चमक से वो छुपा हुआ दुश्मन को जला दे। जो सच में नुकसान कर रहा है, उसे मा दे।
Mantra 22
परि॑ त्वाग्ने॒ पुरं॑ व॒यं विप्रं॑ सहस्य धीमहि । धृ॒षद्व॑र्णं दि॒वेदि॑वे ह॒न्तारं॑ भङ्गु॒राव॑तः
अग्नि के आस-पास हम एक सुरक्षा की दीवार बना रहे हैं। यह दीवार बहुत मज़बूत है और चमक रही है। रोज़ यह दुश्मन को मारती है जो कमज़ोर है। अग्नि हमारे लिए किले की तरह है।
Mantra 23
वि॒षेण॑ भङ्गु॒राव॑तः॒ प्रति॑ स्म र॒क्षसो॑ जहि । अग्ने॑ ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ तपु॑रग्राभिर॒र्चिभिः॑
अग्नि, तुम ज़हर की ताकत से मारो। राक्षस जो सामने खड़े हैं, उनको तोड़ दो। तुम्हारी आग बहुत तेज़ है, उसकी लपटें भी जलती हैं। इन सब से उनको गिरा दो।
Mantra 24
वि ज्योति॑षा बृह॒ता भा॑त्य॒ग्निरा॒विर्विश्वा॑नि कृणुते महि॒त्वा। प्रादे॑वीर्मा॒याः स॑हते दु॒रेवाः॒ शिशी॑ते॒ शृङ्गे॒ रक्षो॑भ्यो वि॒निक्ष्वे॑
अग्नि बड़ी रोशनी से चमक रहा है। वो अपनी ताकत से सब कुछ साफ़ दिखाता है। वो बुरी जादू और बुरी हरकतों को हराता है। वो अपने सींग तेज़ करता है राक्षस के ख़िलाफ़, उनको धक्का मारने के लिए।
Mantra 25
ये ते॒ शृङ्गे॑ अ॒जरे॑ जातवेदस्ति॒ग्महे॑ती॒ ब्रह्म॑संशिते । ताभ्यां॑ दु॒र्हार्द॑मभि॒दास॑न्तं किमी॒दिनं॑ प्र॒त्यञ्च॑म॒र्चिषा॑ जातवेदो॒ वि नि॑क्ष्व
अग्नि, तुम्हारे सींग कभी बूढ़ा नहीं होते। वो बहुत तेज़ हैं, मंत्र से और भी तेज़ किए गए हैं। इन सींग और आग से उस किमिदिन को धक्का मारो जो तुमपे हमला कर रहा है। वो बुरा दिल वाला है, उसे गिरा दो।
Mantra 26
अ॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति शु॒क्रशो॑चि॒रम॑र्त्यः । शुचिः॑ पाव॒क ईड्यः॑
अग्नि राक्षसों को भगाता है। यह अग्नि अमर है, कभी नहीं मरता। इसकी आग चमकती है और यह सबसे साफ है। यह सबको साफ करता है और इसकी पूजा करनी चाहिए।
For protection against enemies, hostile spirits (rakṣas/yātudhānas), and sudden harmful attacks—especially to secure safety through both day and night.
The hymn explicitly asks Agni to guard from behind, in front, below, and above, treating fire as a conscious perimeter-guard that surrounds the practitioner.
Traditionally it is strongest with a kindled fire and ghee offerings, but a simplified use can pair recitation with clean water sprinkling/anointing and a focused visualization of Agni’s protective circle.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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