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Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (attribution varies by anukramaṇī for AV 11.3)
Devata: Śāpa/Abhicāra (the efficacious power of speech); implicitly the forces governing hearing (śrotra)
Chandas: Prose/Anuṣṭubh-fragment (late Atharvanic style; not a full metrical pāda)
Mantra 1
ओदनः। (१) तस्यौ॑द॒नस्य॒ बृहस्पतिः॒ शिरो॒ ब्रह्म॒ मुख॑म्
यह भात है। इस भात का सिर बृहस्पति है। ब्रह्मा इसका मुँह है।
Mantra 2
द्यावा॑पृथि॒वी श्रोत्रे॑ सूर्याचन्द्र॒मसा॒वक्षि॑णी सप्तऋ॒षयः॑ प्राणापा॒नाः
आसमान और धरती इसके कान हैं। सूरज और चाँद आँखें हैं। सात रिशि साँस लेते हैं और साँस छोड़ते हैं।
Mantra 3
चक्षु॒र्मुस॑लं॒ काम॑ उ॒लूख॑लम्
मूसल जो है, वो आँख जैसा है। और उखली, वो इच्छा है। यह दोनों चीज़ें एक काम करती हैं, पीसना और मिलाना।
Mantra 4
दितिः॒ शूर्प॒मदि॑तिः शूर्पग्रा॒ही वातोऽपा॑विनक्
दिति का नाम सूप का है। अदिति सूप पकड़ने वाली है। हवा ने साफ कर दिया, बुरा हिस्सा उड़ा के ले गई।
Mantra 5
अश्वाः॒ कणा॒ गाव॑स्तण्डु॒ला म॒शका॒स्तुषाः॑
घोड़े दाने जैसे हैं। गायें चावल के दाने हैं। मच्छर पुड़िया हैं जो ऊपर उड़ जाती हैं।
Mantra 6
कब्रु॑ फली॒कर॑णाः॒ शरो॒ऽभ्रम्
रंग ब्राउन जैसा है, और यह फल देता है। यह एक सरकंडा है, और एक बादल भी।
Mantra 7
श्या॒ममयो॑ऽस्य मां॒सानि॒ लोहि॑तमस्य॒ लोहि॑तम्
इसका माँस काला है। और लाल हिस्सा, हाँ, लाल ही लाल है।
Mantra 8
त्रपु॒ भस्म॒ हरि॑तं॒ वर्णः॒ पुष्क॑रमस्य ग॒न्धः
इस चीज़ का राख टिन से बना है। रंग हरा है, जैसे घास। खुशबू आती है कमल जैसी।
Mantra 9
खलः॒ पात्रं॒ स्फ्यावंसा॑वी॒षे अ॑नू॒क्येऽ
खेत में जो मैदान होता है जहाँ गेहूँ अलग करते हैं, वो पात्र है। दो विनोइंग फैन्स हैं, रखने के काम के लिए। यह अगले रिचुअल में काम आयेंगे।
Mantra 10
आ॒न्त्राणि॑ ज॒त्रवो॒ गुदा॑ वर॒त्राः
पेट के अंदर की चीज़ें, गले के जोड़ और नीचे वाला हिस्सा, यह सब बॉडी को पकड़े रखते हैं जैसे धागा बाँधे हैं।
Mantra 11
इ॒यमे॒व पृ॑थि॒वी कु॒म्भी भ॑वति॒ राध्य॑मानस्यौद॒नस्य॒ द्यौर॑पि॒धान॑म्
यह धरती बड़ी देग बन जाती है। जब चावल पक रही होती है, आसमान उसके ऊपर ढक्कन बन जाता है।
Mantra 12
सीताः॒ पर्श॑वः॒ सिक॑ता॒ ऊब॑ध्यम्
खेत की कटरियाँ बॉडी की हड्डियाँ हैं। रेत के ढेर सबको जकड़ के रखते हैं।
Mantra 13
ऋ॒तं ह॑स्ताव॒नेज॑नं कु॒ल्योऽप॒सेच॑नम्
सच्चाई और सही काम हाथ धोना है। पानी की नलियाँ सबको गीला करती हैं।
Mantra 14
ऋ॒चा कु॒म्भ्यधि॑हि॒तार्त्विज्येन॒ प्रेषि॑ता
यह मंत्र एक घड़े के लिए है। पुरोहित मंत्र पढ़ के इस घड़े को जगह पर लगाता है। घड़ा अब पूजा के काम आने के लिए तैयार है।
Mantra 15
ब्रह्म॑णा॒ परि॑गृहीता॒ साम्ना॒ पर्यू॑ढा
ब्रह्मा शक्ति ने इस्से चारों तरफ से पकड़ लिया है। साम-गान इस्से घेरे हुए है।
Mantra 16
बृ॒हदा॒यव॑नं रथन्त॒रं दर्विः॑
यह चमच बड़ा आगे बढ़ने वाली चीज़ है। यह रथंतर नाम का गान है।
Mantra 17
ऋ॒तवः॑ प॒क्तार॑ आर्त॒वाः समि॑न्धते
ऋतु, सही वक़्त पर, मिलके आग जलाते हैं। यह सब पकाने वाले हैं।
Mantra 18
च॒रुं पञ्च॑बिलमु॒खं घ॒र्मो॒३भी॑न्धे
घर्म की गर्मी चरु को जलती है। यह चरु पाँच मुह वाली है, पाँच छेद हैं इसमें।
Mantra 19
ओ॒द॒नेन॑ यज्ञव॒चः सर्वे॑ लो॒काः स॑मा॒प्याः
भात से और यज्ञ के शब्दों से सारी दुनिया जीती जा सकती है। पूरा फायदा मिलेगा।
Mantra 20
यस्मि॑न्त्समु॒द्रो द्यौर्भूमि॒स्त्रयो॑ऽवरप॒रं श्रि॒ताः
जिमें समुंदर, आसमान और धरती, यह तीनों बसे हैं। नीचे से ऊपर तक सब उसमें स्थिर है।
Mantra 21
यस्य॑ दे॒वा अक॑ल्प॒न्तोच्छि॑ष्टे॒ षड॑शी॒तयः॑
जिनके बचे हुए में देवियों ने जगह ली। छियासी देवी थे, सब ने मिलके अपना हिस्सा पकड़ा।
Mantra 22
तं त्वौ॑द॒नस्य॑ पृच्छामि॒ यो अ॑स्य महि॒मा म॒हान्
मैं ओदन से पूछता हूँ, तुम इतने बड़े हो, तुम्हारी इतनी बड़ी ताकत है, यह क्या है?
Mantra 23
स य ओ॑द॒नस्य॑ महि॒मानं॑ वि॒द्यात्
जो इंसान ओदन की असली ताकत समझता है, वही इसका फायदा उठाता है। यह बात सिंपल है, जानने वाले को ही मिलता है।
Mantra 24
नाल्प॒ इति॑ ब्रूया॒न्नानु॑पसेच॒न इति॒ नेदं च॒ किं चेति॑
कभी मत कहना कि यह खाना थोड़ा है। ना यह कहना कि इसमें पानी नहीं है। और ना ही यह कहना कि यह क्या चीज़ है। हर चीज़ का इज़्ज़त करो।
Mantra 25
याव॑द् दा॒ताभि॑मन॒स्येत॒ तन्नाति॑ वदेत्
जब तक कोई देनेवाला फैसला नहीं करता, तब तक ज़्यादा मत बोलो। उस चीज़ का ज़िक्र मत करो जब तक वो तैयार नहीं हो।
Mantra 26
ब्र॒ह्म॒वा॒दिनो॑ वदन्ति॒ परा॑ञ्चमोद॒नं प्राशीः३ प्र॒त्यञ्चा३मिति॑
जो लोग वैदिक ज्ञान बोलते हैं, वो कहते हैं तूने बाहर की तरफ खीर खाई है। तूने अपनी तरफ की भी खाई है। ऐसा वो लोग कहते हैं।
Mantra 27
त्वमो॑द॒नं प्राशी३स्त्वामो॑द॒ना३ इति॑
तूने खीर खाई है और खीर ने तुझे खा लिया है। ऐसा लोग कहते हैं।
Mantra 28
परा॑ञ्चं चैनं॒ प्राशीः॑ प्रा॒णास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह
तूने बाहर की तरफ खाई है तो तेरी साँस तुझे छोड़ देगी। ऐसा उस इंसान को बोला जाता है।
Mantra 29
प्र॒त्यञ्चं॑ चैनं॒ प्राशी॑रपा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह
उसको बोलना है कि तूने यह चीज़ अपनी तरफ मुह करके खा ली है। अब तेरे साँस नीचे की तरफ नहीं जायेंगे, वो तुझे छोड़ देंगे। यह बात उसको सीधी तरह समझाना है।
Mantra 30
नैवाहमो॑द॒नं न मामो॑द॒नः
मैं वो खाना नहीं हूँ जो बर्तन में पका है। और वो खाना भी मैं नहीं है। मैं अलग हूँ, खाना अलग है, यह समझना सिंपल है।
Mantra 31
ओ॒द॒न ए॒वौद॒नं प्राशी॑त्
यह खाना खुद खाने को खा रहा है। एक खाना दूसरे खाने को खा गया, यह बात समझ में नहीं आती। खाना खाने को कैसे खा सकता है?
Mantra 32
(२) ३२-४९ मन्त्रोक्ताः। ३२, ३८, ४१ (प्रथमा), ३२-४९ (सप्तमी) साम्नी त्रिष्टुप्, ३२, ३५,४२ (द्वितीया), ३२-४९ (तृतीया) ३३-३४, ४४-४८ (पञ्चमी) एकपदाऽऽसुरी गायत्री, ३२, ४१, ४३, ४७ दैवी जगती, ३८, ४४, ४६ (द्विo), ३२, ३५-४३, ४९ (पञ्चo) एकपदाऽऽसुर्यनुष्टुप्, ३२-४९ (षष्ठी) साम्न्यनुष्टुप्, ३२-४९ (प्रo) आर्च्यनुष्टुप्, ३७ (प्रo) साम्नी पङ्क्तिः, ३३, ३६, ४०, ४७-४८ (द्विo) आसुरी जगती, ३४, ३७, ४१, ४३, ४५ (द्विo) आसुरी पङ्क्तिः, ३४ (चo) आसुरी त्रिष्टुप्, ३५, ४६, ४८ (चo) याजुषी गायत्री, ३६-३७, ४० (चo) दैवी पङ्क्तिः ३८-३९ (चo) प्राजापत्या गायत्री, ३९ (द्विo) आसुर्युष्णिक्, ४२, ४५, ४९ (चo) दैवी त्रिष्टुप्, ४९ (द्विo) एकपदा भुरिक्साम्नी बृहती। तत॑श्चैनम॒न्येन॑ शी॒र्ष्णा प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
पहले बड़े बेटे से शुरू करके तुम्हारी पूरी लाइन खत्म हो जाएगी, यह बात उसने सुनाई थी। रिशियों ने पहले भी यही कहा था जो आगे बढ़ चुके हैं।
Mantra 33
ज्ये॒ष्ठ॒तस्ते॑ प्र॒जा म॑रिष्य॒तीत्ये॑नमाह
मैं उस आदमी को ऐसा मानता हूँ कि वो न इधर है, न उधर, न वापस आ रहा है। वो कहीं भी नहीं है, बस गया।
Mantra 34
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॑ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको बुलाता हूँ। वो न आगे है, न पीछे, न साइड में। वो अलग है, सब जगह है।
Mantra 35
बृह॒स्पति॑ना शी॒र्ष्णा
बृहस्पति की शक्ति से काम चलाना है। सिर भी इसमें काम आ रहा है।
Mantra 36
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
इससे मैंने उसे हिस्सा दिया। इससे मैंने उसे अपना मक़सद पहुँचाया।
Mantra 37
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना ऐसा है जिसमे हर अंग है। हर जोड़ है, पूरा बदन है। कोई कमी नहीं है इसमे।
Mantra 38
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है वो पूरा हो जाता है। उसके सब अंग हो जाते हैं, सब जोड़ मिल जाते हैं। पूरा बदन बना रहता है उसका।
Mantra 39
३२॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
अब उसके दो कान भी इस्तेमाल करो। इन दोनों कान से भी उसे खिलाओ। पहले के रिशि भी इसी तरह खाते थे।
Mantra 40
ब॒धि॒रो भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह
उसको बोला जा रहा है कि बहरा हो जाओगे। यह बात सीधी और साफ है।
Mantra 41
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको ऐसे छोड़ रहा हूँ न कि इधर हो, न उधर हो, न पीछे हो। बीच में ही रह जाएगा।
Mantra 42
द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्याम्
आसमान और धरती की कसम। दोनों कानों से सुनने की बात है।
Mantra 43
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों चीज़ों से मैंने उसे खिलाया। और फिर इन्हीं दोनों से मैंने उसे आगे बढ़ाया, चला दिया।
Mantra 44
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह भात है। इसमें पूरा जिस्म है, सारे अंग हैं, हर हिस्सा पूरा है।
Mantra 45
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जिसे यह बात सही-सही पता है, वो आदमी पूरा होता है। हर अंग सही, हर जोड़ सही, शरीर भी पूरा।
Mantra 46
३३॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑म॒क्षीभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
उसके बाद दूसरी आँखों से तुमने उसे खा लिया। वही आँखें जिससे पुराने रिशि भी खाते थे।
Mantra 47
अ॒न्धो भ॑वि॒ष्य॒सीत्ये॑नमाह
उसने कहा, 'अंधा हो जाएगा।' ऐसे बोला उससे।
Mantra 48
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उस आदमी को नहीं मानता जो न इधर देखता है, न उधर, न पीछे। वो ऐसा है जैसे न यहाँ है न वहाँ, मैं उसे बिल्कुल नहीं मानता।
Mantra 49
सू॒र्या॒च॒न्द्र॒म॒साभ्या॑म॒क्षीभ्या॑म्
भगवान ने तुम्हे आँखें दी हैं जैसे सूरज और चाँद चमकते हैं। सूरज दिन में रोशनी देता है, चाँद रात में, तुम्हारी नज़र इतनी चमकदार होनी चाहिए।
Mantra 50
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
मैंने उन दोनों चीज़ों से उसे खिलाया। फिर उन्हीं से मैंने उसे आगे बढ़ाया। यह दोनों काम मैंने उनके साथ किए।
Mantra 51
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्वपरुः॒ सर्व॑तनूः
यह ओदन पूरा है। इसमें सब अंग हैं, सब जोड़ हैं, सब कुछ है। यह एक कम्पलीट बॉडी जैसा है।
Mantra 52
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है, वो भी पूरा हो जाता है। उसके सब अंग ठीक हो जाते हैं, सब जोड़ मिल जाते हैं। ज्ञान वाला इंसान कम्पलीट बन जाता है।
Mantra 53
३४॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॒ मुखे॑न॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
उसके बाद तुम उसे एक दूसरे मुँह से खिलाना। वही मुँह जो पुराने रिशियों ने उसे किया था।
Mantra 54
मु॒ख॒तस्ते॑ प्र॒जा म॑रिष्य॒तीत्ये॑नमाह
उसने उसे कहा कि तुम्हारे मुँह से तुम्हारी औलाद बर्बाद हो जाएगी।
Mantra 55
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको ऐसे पकड़ा हुआ हूँ जो न इधर मुढ़ा है, न उधर गया है, न पीछे हट गया है। वो बिल्कुल सीधा है, किसी तरफ झुका नहीं।
Mantra 56
ब्रह्म॑णा॒ मुखे॑न
ब्रह्मन शक्ति से काम लिया। मुँह से शब्द निकाला, यही से शक्ति चली।
Mantra 57
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
उस शक्ति से मैंने उसे खिलाया। उसी से मैंने उसे आगे बढ़ाया। वो अब चलने लगा।
Mantra 58
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरे शरीर के लिए है। इसमें हर अंग का हिस्सा है, हर जोड़ मिलता है। यह पूरा तन है, कुछ कमी नहीं।
Mantra 59
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जिसको पूरा शरीर मिल जाता है, वो पूरा हो जाता है। सारे अंग, सारे जोड़, पूरा तन, सब उसका हो जाता है। यह उसके लिए है जो ऐसे जानता है।
Mantra 60
३५॥ तत॑श्चैनम॒न्यया॑ जि॒ह्वया॒ प्राशी॒र्यया॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर उसने दूसरी जीभ से उसे खत्म किया। वही जीभ थी जो पुराने रिशि भी उसे करते थे।
Mantra 61
जि॒ह्वा ते॑ मरिष्य॒तीत्ये॑नमाह
उसने उसको कहा कि तेरी जीभ खराब हो जाएगी।
Mantra 62
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको न इधर करूँगा, न उधर करूँगा, न पीछे करूँगा। उसको मैं कहीं भी नहीं करूँगा।
Mantra 63
अ॒ग्नेर्जि॒ह्वया॑
अग्नि की जीभ से यह काम हुआ।
Mantra 64
तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्
उस चीज़ से मैंने उसे खा लिया। उसी चीज़ से मैंने उसे आगे भेज दिया।
Mantra 65
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरा है। हर अंग में पूरा, हर जोड़ में पूरा, पूरे शरीर में पूरा। कहीं भी कमी नहीं है।
Mantra 66
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है वो पूरा हो जाता है। हर अंग में पूरा, हर जोड़ में पूरा, पूरे शरीर में पूरा। कोई कमी नहीं रहती।
Mantra 67
३६॥ तत॑श्चैनम॒न्यैर्दन्तैः॒ प्राशी॒र्यैश्चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर तुम अपने दूसरे दाँतो से उसे खाना। वही दाँत जिससे पुराने रिशि लोग यह खाना खाते थे। उनकी तरह तुम भी खाना।
Mantra 68
दन्ता॑स्ते शत्स्य॒न्तीत्ये॑नमाह
उसने उसको आशीर्वाद दिया था। बोला था तुम्हारे दाँत सौ साल तक ठीक रहेंगे। यह बात उसने कही थी।
Mantra 69
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको पकड़ा हूँ, वो न इधर मुड़ के आया, न उधर गया, न पीछे पलटा। वो कहीं का नहीं रहा, न यहाँ, न वहाँ, न पीछे।
Mantra 70
ऋ॒तुभि॒र्दन्तैः॑
इस देवता के दाँत मौसम के तरह हैं। जैसे मौसम एक के बाद एक आते हैं, वैसे ही उसके दाँत हैं।
Mantra 71
तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्
मैंने उन दाँतों से उसे खिलाया है। उन्हीं से मैंने उसे आगे बढ़ाया है। यह दाँत उसे ताकत देते हैं।
Mantra 72
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना एक खास खाना है। इसमें हर अंग है, हर जोड़ है, पूरा शरीर है। यह पूरा है, किसी चीज़ की कमी नहीं।
Mantra 73
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो इंसान यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। उसमें हर अंग होता है, हर जोड़ होती है, पूरा तन होता है। ज्ञान उसे पूरा बना देता है।
Mantra 74
३७॥ तत॑श्चैनम॒न्यैः प्रा॑णापा॒नैः प्राशी॒र्यैश्चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
इसके बाद अपनी साँस से उसे खा जाओ। साँस लेने और छोड़ने दोनों से। पहले के रिशि भी इसी तरह करते थे।
Mantra 75
प्रा॒णा॒पा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह
उसने उस आदमी के बारे में कहा कि साँस आनी-जानी दोनों उसको छोड़ देंगे। मतलब जीवन की साँस उसके पास नहीं रहेगी।
Mantra 76
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको इधर भी नहीं करूँगा, उधर भी नहीं, पीछे भी नहीं। वो ऐसे ही रहेगा जैसे है, किसी तरफ नहीं जाएगा।
Mantra 77
स॒प्त॒ऋषिभिः॑ प्राणापा॒नैः
सात रिशियों के साथ, साँस आने-वाली और जाने-वाली दोनों की ताकत से।
Mantra 78
तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्
इन ताकतों से मैंने उसको खिलाया, इन से ही मैंने उसको आगे बढ़ाया। साँस और रिशियों की ताकत से उसका काम हुआ।
Mantra 79
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह चावल का बना खाना पूरा है। इसमे हर अंग शामिल है, हर जोड़ है, पूरा शरीर है।
Mantra 80
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है, उसका पूरा शरीर ठीक रहता है। हर जॉइंट, हर अंग साफ-साफ चलता है। वो इंसान पूरा साफ और हेल्दी होता है।
Mantra 81
३८॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॒ व्यच॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर उसको एक और मंत्र से साफ किया। वही मंत्र जो पुराने रिशि भी यूज़ करते थे। इससे शरीर और भी साफ हो जाता है।
Mantra 82
रा॒ज॒य॒क्ष्मस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह
उसने कहा, अब राजा रोग तुम्हे पकड़ेगा। यह बिमारी तुम्हारे पास आएगी, तुम्हे छोड़ेगी नहीं।
Mantra 83
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको पकड़ा हूँ, वो न इधर आया, न उधर गया, न पीछे पलटा। वो कहीं का नहीं रहा, कहीं भी नहीं।
Mantra 84
अ॒न्तरि॑क्षेण॒ व्यच॑सा
यह मंत्र हवा के रास्ते काम करता है। आस-पास फैली हुई शक्ति से कुछ होता है।
Mantra 85
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
इस चीज से मैंने उसे खाना खिलाया। और इसी से मैंने उसे फिर आगे बढ़ाया।
Mantra 86
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरा है। इसमें अंग भी पूरे हैं, जोड़ भी पूरे हैं, और शरीर भी पूरा है।
Mantra 87
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। उसके अंग पूरे हैं, जोड़ पूरे हैं, और शरीर भी पूरा है।
Mantra 88
३९॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॑ पृ॒ष्ठेन॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
उसके बाद दूसरी तरफ से उसे खाना खिलाओ। पहले के रिशि भी इसी तरह खाते थे।
Mantra 89
वि॒द्युत् त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह
उसने उस आदमी को धमकी दी थी। बोला था बिजली तुमपे पड़ेगी। यह बात उसने उसको कही थी।
Mantra 90
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उस शख्स को ऐसा पकड़ता हूँ कि वो न इधर घूमता है, न उधर, न पीछे। वो सीधा रहता है।
Mantra 91
दि॒वा पृ॒ष्ठेन॑
दिन के वक्त पीछे से सारा काम चल रहा है।
Mantra 92
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
इस शक्ति से मैंने उसे खिलाया और आगे बढ़ने को कहा।
Mantra 93
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरा है। हर अंग में, हर जोड़ में, पूरे बदन में, सब ठीक है।
Mantra 94
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो इंसान यह बात समझ लेता है, वो पूरा हो जाता है। उसके सब अंग, सब जोड़, सब बॉडी काम करती है। वो हर तरफ से पूरा बन जाता है।
Mantra 95
४०॥ तत॑श्चैनम॒न्येनोर॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर दूसरे सीने से तुमने उसे खिलाया। वही सीना जिससे पुराने रिशि भी खाते थे।
Mantra 96
कृ॒ष्या न रा॑त्स्य॒सीत्ये॑नमाह
उसने कहा कि तुम उसे हल चलाने के लिए मत देना।
Mantra 97
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको पकड़ के रखूंगा। वो न इधर जाएगा, न उधर, न पीछे मुड़के आएगा।
Mantra 98
पृ॒थि॒व्योर॑सा
धरती के सीने से मैं उसे संभालूंगा।
Mantra 99
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
इस मंत्र में यह कह रहे हैं कि मैंने उसे खिलाया और आगे बढ़ाया। यह कोई स्पेशल चीज़ से किया, जैसे कोई ताकत या शक्ति थी। मैं उसे ले गया जहाँ उसे जाना था।
Mantra 100
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना जो भी है, पूरा है। इसमें हर अंग है, हर जोड़ है, पूरा बदन है। कोई कमी नहीं है इसमें। यह भोजन एकदम पूरा है।
Mantra 101
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो इंसान यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। उसके सब अंग पूरे हैं, सब जोड़ पूरे हैं, पूरा बदन पूरा है। कोई कमी नहीं रहती उसमें।
Mantra 102
४१॥ तत॑श्चैनम॒न्येनो॒दरे॑ण॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर उसने दूसरे पेट से खाना खिलाया। वह पेट जो पुराने रिशि लोग इस्तेमाल करते थे। रिशि लोग भी ऐसे ही खाते थे पहले।
Mantra 103
उ॒द॒र॒दा॒रस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह
किसीने कहा, पेट फाड़ने वाला तुम्हे मारेगा। यह धमकी थी। पेट फाड़ने वाला का मतलब है जो बड़ा ताकतवर है और मार सकता है।
Mantra 104
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उस आदमी को नहीं मानता। न वो मेरे पास आता है, न दूर जाता है, न पीछे मुड़के आता है। वो मेरे ऊपर कोई असर नहीं डाल सकता।
Mantra 105
स॒त्येनो॒दरे॑ण
यह मंत्र सच्चाई की ताकत के बारे में है। पेट के ज़रिए हम जो खाते हैं उसे अपने अंदर समेट लेते हैं। सच्चाई से यह काम होता है, जैसे पेट खाना समझ लेता है।
Mantra 106
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
इस मंत्र में फिर वही बात है। मैंने उसे खाना खिलाया और उसको आगे ले गया। जैसे कोई गुरु अपने शिष्य को सिखाता है और आगे बढ़ाता है, वैसे ही यहाँ हो रहा है।
Mantra 107
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह मंत्र एक खास खाना के बारे में है जिसे ओदन कहते हैं। यह खाना ऐसा है जिसमे पूरी बॉडी का हिस्सा है। हर अंग, हर जॉइंट, सब कुछ इसमे है। जैसे यह खाना कम्पलीट है, पूरा है।
Mantra 108
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो इंसान यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। उसकी बॉडी में सब कुछ होता है, हर अंग, हर जॉइंट। यह जानने वाला इंसान कम्पलीट बन जाता है, जैसे उस खाना में सब कुछ था।
Mantra 109
४२॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॑ व॒स्तिना॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
इसके बाद दूसरे बर्तन से उसे खाना खिलाओ। वही बर्तन जिससे पुराने रिशि लोगों ने इस आदमी को खिलाया था।
Mantra 110
अ॒प्सु म॑रिष्य॒सीत्ये॑नमाह
उसने उसे कहा कि पानी में ही मर जाएगा।
Mantra 111
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसे न इधर करूँगा, न उधर, न वापस।
Mantra 112
स॒मु॒द्रेण॑ व॒स्तिना॑
समुंदर उसे ढाक के रख देगा।
Mantra 113
तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्
उसी से मैंने उसे खिलाया, उसी से आगे भेजा।
Mantra 114
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरा है। हर अंग में, हर जोड़ में, पूरे बदन में, सब जगह पूरा है।
Mantra 115
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जिसे यह बात पता है, वो आदमी पूरा होता है। उसके शरीर के हर हिस्से में, हर जोड़ में पूरापन आता है। कोई कमी नहीं रहती।
Mantra 116
४३॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑मू॒रुभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर उसके दो टाँगे अलग कर दिए गए। पुराने रिशियों ने उसको पूरा खाया। यह एक रिचुअल था जो पहले लोग करते थे।
Mantra 117
ऊ॒रू ते॑ मरिष्यत॒ इत्ये॑नमाह
उसने उसको कहा कि तुम्हारी दोनों टाँगे खत्म हो जाएँगी। यह बात उसने सीधे बोला।
Mantra 118
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको कहीं भी नहीं जाने देता, न इधर, न उधर, न पीछे। उसकी कोई जगह नहीं है मेरे पास।
Mantra 119
मि॒त्राव॑रुणयोरू॒रुभ्या॑म्
यह मंत्र मित्र और वरुण दोनों की टांगों का ज़िक्र करता है। मित्र और वरुण दोनों देवता हैं। इनकी टांगों का मतलब है कि यह बहुत ताकतवर हैं।
Mantra 120
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों चीज़ों से मैंने उसे खिलाया। और इन्हीं दोनों से मैंने उसे आगे भेजा जहाँ उसका काम था।
Mantra 121
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह ओदन पूरा है। सब अंग हैं, सब जोड़ हैं, पूरा बदन है। कुछ भी मिसिंग नहीं है।
Mantra 122
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है वो पूरा हो जाता है। सब अंग, सब जोड़, पूरा बदन उसका हो जाता है।
Mantra 123
४४॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑मष्ठी॒वद्भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर दो और चीज़ों से, जो हड्डी वाली हैं, उसे खिलाना। पहले के रिशि भी इसी से खाते थे।
Mantra 124
स्रा॒मो भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह
वो कहते हैं, अब तू ठीक हो जाएगा। यह बात उसको सुना दी गई है।
Mantra 125
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उस आदमी को ऐसे ही नहीं छोड़ूंगा। न वो मेरी तरफ देख सकता है, न मुझसे दूर जा सकता है, न पीछे मुड़ सकता है। मैं उसे पकड़के रखूंगा।
Mantra 126
त्वष्टु॑रष्ठी॒वद्भ्या॑म्
त्वष्ट्रि भगवान ने दो ऐसे हथियार बनाए हैं जो हड्डी से बने हैं। यह बहुत ताकतवर चीज़ें हैं।
Mantra 127
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों हथियारों से मैंने उसे खिलाया। और इन्हीं से मैंने उसे आगे बढ़ाया। अब वो मेरे कंट्रोल में है।
Mantra 128
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना ऐसा है जिसमें पूरा जिस्म है। हर हिस्सा, हर जोड़ी, सब कुछ इसमें है। यह पूरा है, कोई कमी नहीं।
Mantra 129
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो इंसान यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। उसके सारे अंग, सारे जोड़, सारी बॉडी, सब कुछ एक हो जाता है। वो पूरा तन में बस जाता है।
Mantra 130
४५॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ पादा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर दूसरी पैर से उसको खिलाया। वही पैर जिससे पहले के रिशि लोग उसे खिलाते थे।
Mantra 131
ब॒हुचा॒री भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह
उसने कहा कि तू बहुत जगह घूमोगे। तू ऐसे ही दूर-दूर तक जायेगा।
Mantra 132
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उससे ऐसा बना रहा हूँ। न इधर मुड़ा हुआ, न उधर, न पीछे। सीधा है वो।
Mantra 133
अ॒श्विनोः॒ पादा॑भ्याम्
अश्विन के दोनों पैर से यह काम किया जा रहा है।
Mantra 134
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों चीज़ों से मैंने उसे खिलाया। और इन्हीं दोनों से मैंने उसे आगे बढ़ाया।
Mantra 135
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना पूरा है। हर अंग में, हर जोड़ में, पूरे बदन में, सब जगह पूरा है।
Mantra 136
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। हर अंग, हर जोड़, पूरा बदन, सब पूरा मिल जाता है।
Mantra 137
४६॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ प्रप॑दाभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर दो और कदम से, और दो दुआ के साथ, पुराने रिशि इस खाने को खाते थे।
Mantra 138
स॒र्पस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह
उसने कहा, साँप तुम्हे काटेगा।
Mantra 139
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको नहीं मानता, न इधर का, न उधर का, न पीछे का। वो किसी तरफ का नहीं है, मैं उस्से अपनी बात में नहीं लगाऊँगा।
Mantra 140
स॒वि॒तुः प्रप॑दाभ्याम्
सवितर के आगे बढ़ने वाले दो कदम। यह उसके पैर के दो कदम हैं जो आगे बढ़ते हैं।
Mantra 141
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों कदम से मैंने उसे खाना खिलाया। इन्हीं से मैंने उसे आगे बढ़ाया और चला दिया।
Mantra 142
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह ओदन खाना पूरे शरीर के लिए है। इसमें हर अंग शामिल है, हर जोड़ पूरी तरह से है, पूरा तन बना है।
Mantra 143
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है वो पूरा हो जाता है। उसका हर अंग बन जाता है, हर जोड़ पूरा होता है, पूरा शरीर मिल जाता है।
Mantra 144
४७॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ हस्ता॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
फिर मैंने अपने दो और हाथों से उसे खिलाया। पहले के रिशि भी इसी तरह खाते थे।
Mantra 145
ब्रा॒ह्म॒णं ह॑निष्य॒सीत्ये॑नमाह
किसीने कहा कि तुम एक ब्राह्मण को मारेगा। यह बात उसने उसके बारे में कही थी।
Mantra 146
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको पकड़ता हूँ। वो न इधर जा सकता है, न उधर, न पीछे। उसका कोई रास्ता नहीं बचता।
Mantra 147
ऋ॒तस्य॒ हस्ता॑भ्याम्
रिता के दोनों हाथ से। यह वो हाथ है जो सीधा रखता है।
Mantra 148
ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्
इन दोनों हाथों से मैंने उसको पकड़ा। और इन्हीं हाथों से मैंने उसको आगे बढ़ा दिया।
Mantra 149
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह ओदन पूरा है। इसमें सब अंग हैं, सब जोड़ हैं, पूरा बदन है। कोई हिस्सा नहीं छोड़ा।
Mantra 150
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जिस इंसान को यह बात समझ आ जाती है, उसका पूरा शरीर ठीक हो जाता है। उसके सब अंग सही में जुड जाते हैं। वो हर तरफ से पूरा और मजबूत हो जाता है।
Mantra 151
४८॥ तत॑श्चैनम॒न्यया॑ प्रति॒ष्ठया॒ प्राशी॒र्यया॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्
इसके बाद एक और तरीके से उसे स्थिति दी जाती है। पहले के रिशि भी इसी तरीके से यह काम करते थे। वो लोग भी इसी से लेकर चलते थे।
Mantra 152
अ॒प्र॒ति॒ष्ठा॒नोऽनायत॒नो म॑रिष्य॒सीत्ये॑नमाह
उसने कहा था कि अगर कोई अपनी जगह पर नहीं है, तो वो कहीं भी टिक नहीं सकता। बिना किसी आसरे के इंसान काम नहीं चल सकता। यह बात उसने उसे समझाई थी।
Mantra 153
तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्
मैं उसको ना तो आगे करूंगा, ना पीछे करूंगा, ना ही उसको मुझसे दूर करूंगा। वो कहीं भी नहीं जाएगा, मैं उसे ऐसे ही रखूंगा।
Mantra 154
स॒त्ये प्र॑ति॒ष्ठाय॑
यह मंत्र सच पे खड़े होने के बारे में है। जब इंसान सच पे रहता है, वो मज़बूत हो जाता है। सच बोलने वाला इंसान कभी गिरता नहीं।
Mantra 155
तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्
इसके साथ मैंने उसको खिलाया। इसके साथ मैंने उसको आगे बढ़ा दिया।
Mantra 156
ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः
यह खाना ऐसा है जो पूरा है। हर अंग में पूरा, हर जोड़ में पूरा, पूरे बदन में पूरा।
Mantra 157
सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑
जो यह बात समझता है, वो पूरा हो जाता है। हर अंग से पूरा, हर जोड़ से पूरा, पूरे बदन से पूरा।
Not primarily. It is centered on śāpa/abhicāra-śakti—the efficacy of spoken formulae—while also treating hearing (śrotra) and the vital airs (prāṇa, apāna) as operative powers.
It is a direct abhicāra performative: the reciter addresses a target and commands a specific impairment (loss of hearing). The hymn treats such utterance as an action that produces the stated effect.
This is a binding technique. By negating multiple directions, the target is ritually ‘fixed’ so they cannot turn, escape, or effectively respond—an immobilization strategy that can serve coercion or protection.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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