
Rishi: Atharvanic tradition (gaṇa/devasenā-propitiation section)
Devata: Deva-senā (divine hosts) and allied gaṇas (ghoṣiṇī-, keśinī- classes)
Chandas: Mixed/Anuṣṭubh-like cadence (prose-like enumerative namas style)
This sukta is a protective, appeasing litany that addresses roaming divine hosts (deva-senā) and their allied gaṇas through repeated namas, converting potentially harmful presences into guardians. It combines gaṇa-propitiation with Rudra-śānti tones—asking not to be harmed, to be encircled by protection, and to receive svasti (well-being) and abhaya (fearlessness). Its power lies in exhaustive respectful enumeration: by naming, honoring, and ritually acknowledging these forces, the hymn neutralizes their hostility and redirects them toward safeguarding the reciter’s space, body, and community.
Mantra 1
रुद्रः। भवा॑शर्वौ मृ॒डतं॒ माभि या॑तं॒ भूत॑पती॒ पशु॑पती॒ नमो॑ वाम्। प्रति॑हिता॒माय॑तां॒ मा वि स्रा॑ष्टं॒ मा नो॑ हिंसिष्टं द्वि॒पदो॒ मा चतु॑ष्पदः
रुद्र, भव और शर्व, हमे अपनी कृपा करो। हमारे पीछे मत आओ। तुम सब जीवों के मालिक हो, जानवरों के मालिक हो, तुम्हे प्रणाम। जो रोक के रखा है, वैसा ही रहने दो। अपना बाण चलाना मत, हमे नुकसान मत पहुँचाना। न इंसान को, न जानवर को।
Mantra 2
शुने॑ क्रो॒ष्ट्रे मा शरी॑राणि॒ कर्त॑म॒लिक्ल॑वेभ्यो॒ गृध्रे॑भ्यो॒ ये च॑ कृ॒ष्णा अ॑वि॒ष्यवः॑ । मक्षि॑कास्ते पशुपते॒ वयां॑सि ते विघ॒से मा वि॑दन्त
कुत्ता हमारे शरीर को न काटे, गिद्ध भी न काटे। जो काले ज़हरीले जानवर हैं वो भी न काटे। मक्खियाँ और चिड़ियाँ, जो तुम्हारी हैं, वो हमे अपने खाने के लिए न ढूँढें।
Mantra 3
क्रन्दा॑य ते प्रा॒णाय॒ याश्च॑ ते भव॒ रोप॑यः । नम॑स्ते रुद्र कृण्मः सहस्रा॒क्षाया॑मर्त्य
रुद्र, तुम जो ज़ोर से चिल्लाते हो, तुम्हारी जान, और तुम्हारी शक्तियाँ जो बीमारी ठीक करती हैं, उन सब को प्रणाम। रुद्र, तुम्हारे हज़ार आँखें हैं, तुम अमर हो।
Mantra 4
पु॒रस्ता॑त् ते नमः॑ कृण्म उत्त॒राद॑ध॒रादु॒त। अ॒भी॒व॒र्गाद् दि॒वस्पर्य॒न्तरि॑क्षाय ते॒ नमः॑
हम आगे से तुम्हे प्रणाम करते हैं। उत्तर दिशा से भी, नीचे से भी। खतरे के आने से, आसमान के चारों तरफ से, हवा में भी, तुम्हे प्रणाम है।
Mantra 5
मुखा॑य ते पशुपते॒ यानि॒ चक्षूं॑षि ते भव । त्व॒चे रू॒पाय॑ सं॒दृशे॑ प्रती॒चीना॑य ते॒ नमः॑
हे पशुपति, तुम्हारे मुँह को प्रणाम। तुम्हारी आँखों को भी, हे भव। तुम्हारी स्किन को, तुम्हारे रूप को, तुम्हारी नज़र को भी। जिस तरफ तुमने मुँह फेरा है, उस तरफ भी तुम्हे प्रणाम है।
Mantra 6
अङ्गे॑भ्यस्त उ॒दरा॑य जि॒ह्वाया॑ आ॒स्याऽय ते । द॒द्भ्यो ग॒न्धाय॑ ते॒ नमः॑
तुम्हारे शरीर के हर हिस्से को प्रणाम। तुम्हारे पेट को प्रणाम। तुम्हारी जीभ और मुँह को प्रणाम। तुम्हारे दाँतो और तुम्हारी खुशबू को भी प्रणाम।
Mantra 7
अस्त्रा॒ नील॑शिखण्डेन सहस्रा॒क्षेण॑ वा॒जिना॑ । रु॒द्रेणा॑र्धकघा॒तिना॒ तेन॒ मा सम॑रामहि
हम हाथों में हथियार लेकर खड़े हैं। भगवान रुद्र के साथ, जो नीले बाल वाले हैं। वो हज़ारों आँखों वाले हैं, बहुत तेज़ हैं। वो आधे को मार सकते हैं। उनके साथ हम खतरे का सामना करेंगे।
Mantra 8
स नो॑ भ॒वः परि॑ वृणक्तु वि॒श्वत॒ आप॑ इवा॒ग्निः परि॑ वृणक्तु नो भ॒वः । मा नो॒ऽभि मां॑स्त॒ नमो॑ अस्त्वस्मै
भगवान भव हमें चारो तरफ से रखें, जैसे पानी चारो तरफ से घेर लेता है। जैसे आग चारो तरफ फैलती है, वैसे ही भव हमें घेर लें। हमें मत मारो। उनको प्रणाम है।
Mantra 9
च॒तुर्नमो॑ अष्ट॒कृत्वो॑ भ॒वाय॒ दश॒ कृत्वः॑ पशुपते॒ नम॑स्ते । तवे॒मे पञ्च॑ प॒शवो॒ विभ॑क्ता॒ गावो॒ अश्वाः॒ पुरु॑षा अजा॒वयः
भव को चार बार नमन, आठ बार नमन। पशुपति, जानवरों के मालिक, तुम्हे दस बार प्रणाम। यह पाँच तरह के जानवर तुम्हारे हैं, गाय, घोड़े, आदमी, बकरी और भेड़।
Mantra 10
तव॒ चत॑स्रः प्र॒दिश॒स्तव॒ द्यौस्तव॑ पृथि॒वी तवे॒दमु॑ग्रो॒र्व॑१न्तरि॑क्षम्। तवे॒दं सर्व॑मात्म॒न्वद् यत् प्रा॒णत् पृ॑थि॒वीमनु॑
चार दिशा तुम्हारी, आसमान तुम्हारा, धरती तुम्हारी। यह आसमान भी तुम्हारा है। जो भी ज़ि�दा है, जो भी साँस ले रहा है धरती पर, सब तुम्हारा है।
Mantra 11
उ॒रुः कोशो॑ वसु॒धान॒स्तवा॒यं यस्मि॑न्नि॒मा विश्वा॒ भुव॑नान्य॒न्तः । स नो॑ मृड पशुपते॒ नम॑स्ते प॒रः क्रो॒ष्टारो॑ अभि॒भाः श्वानः॑ प॒रो य॑न्त्वघ॒रुदो॑ विके॒श्यःऽ
भगवान, तुम्हारा खज़ाना बहुत बड़ा है। इसमें सारी दुनिया की दौलत है। तुम सब जानवरों के मालिक हो, हमें आशीर्वाद दो। दूर वाले कुत्ते जो दाँकते हैं, वो यहाँ से चले जाओ। बुरी चीज़ें भी यहाँ से दूर हो जाओ।
Mantra 12
धनु॑र्बिभर्षि॒ हरि॑तं हिर॒ण्ययं॑ सहस्र॒घ्नि श॒तव॑धं शिखण्डिनम्। रु॒द्रस्येषु॑श्चरति देवहे॒तिस्तस्यै॒ नमो॑ यत॒मस्यां॑ दि॒शी॒३तः
रुद्र भगवान हाथ में धनुष लिए हैं। यह धनुष सोना जैसा चमकता है। इसकी बात बहुत ताकतवर है। रुद्र का तीर चलता है और दुश्मन को मारता है। जिस तरफ भी यह तीर हो, उसकी प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि बुरी चीज़ें दूर हो जाओ।
Mantra 13
यो॒३भिया॑तो नि॒लय॑ते॒ त्वां रु॑द्र नि॒चिकी॑र्षति । प॒श्चाद॑नु॒प्रयु॑ङ्क्षे॒ तं वि॒द्धस्य॑ पद॒नीरि॑व
जो कोई भी डर के मारे छुप जाता है और रुद्र को तकलीफ देना चाहता है, रुद्र उसके पीछे पड़ जाते हैं। जैसे किसी इंसान के निशान देख के पीछे चला जाता है, वैसे ही रुद्र भी उस दुश्मन को पकड़ लेते हैं।
Mantra 14
भ॒वा॒रु॒द्रौ स॒युजा॑ संविदा॒नावु॒भावु॒ग्रौ च॑रतो वी॒र्याऽय । तभ्यां॒ नमो॑ यत॒मस्यां॑ दिशी३तः
भव और रुद्र दोनों मिलकर काम करते हैं। दोनों बहुत ताकतवर हैं। जिस तरफ भी वो हों, उनको प्रणाम करते हैं। बुरी ताकतें यहाँ से दूर हो जाओ।
Mantra 15
नम॑स्ते ऽस्त्वाय॒ते नमो॑ अस्तु पराय॒ते। नम॑स्ते रुद्र॒ तिष्ठ॑त॒ आसी॑नायो॒त ते॒ नमः॑
रुद्र भगवान को नमस्कार है जब वो आते हैं। जब वो जाते हैं तब भी नमस्कार है। खड़े रहते हुए भी नमस्कार है, बैठ के भी नमस्कार है। हर हाल में उनको प्रणाम है।
Mantra 16
नमः॑ सा॒यं नमः॑ प्रा॒तर्नमो॒ रात्र्या॒ नमो॒ दिवा॑ । भ॒वाय॑ च श॒र्वाय॑ चो॒भाभ्या॑मकरं॒ नमः॑
मैं शाम को नमन करता हूँ, सुबह को भी नमन करता हूँ। रात को नमन है, दिन को भी नमन है। भव और शर्व दोनों को मिला के मैंने नमन किया है।
Mantra 17
स॒ह॒स्रा॒क्षम॑तिप॒श्यं पु॒रस्ता॑द् रु॒द्रमस्य॑न्तं बहु॒धा वि॑प॒श्चित॑म्। मोपा॑राम जि॒ह्वयेय॑मानम्
रुद्र के हज़ारों आँखें हैं, मैंने उसे आगे देखा। वो बहुत तरह से बाण चला रहा है, बहुत समझदार है। मैं उसके पास नहीं जाना चाहता जब वो सबको खा रहा हो।
Mantra 18
श्या॒वाश्वं॑ कृ॒ष्णमसि॑तं मृ॒णन्तं॑ भी॒मं रथं॑ के॒शिनः॑ पा॒दय॑न्तम्। पूर्वे॒ प्रती॑मो॒ नमो॑ अस्त्वस्मै
उसका रथ काला है, घोड़े भी काले हैं। यह रथ सबको कुचल देता है, बहुत भयानक है। जैसे पुराने लोग करते थे, हम भी उससे मिलते हैं। उसको नमन है।
Mantra 19
मा नो॒ऽभि स्रा॑ म॒त्यं देवहे॒तिं मा नः॑ क्रुधः पशुपते॒ नम॑स्ते । अ॒न्यत्रा॒स्मद् दि॒व्यां शाखां॒ वि धू॑नु
हे पशुपति, तुम्हाला बाण हमारे ऊपर मत चलाना। हम पर गुस्सा मत करना, तुम्हे नमन है। अपना वो आसमान की डाल कहीं और झाड़ दो, हमारे ऊपर नहीं।
Mantra 20
मा नो॑ हिंसी॒रधि॑ नो ब्रूहि॒ परि॑ णो वृङ्ग्धि॒ मा क्रु॑धः । मा त्वया॒ सम॑रामहि
हमें नुकसान मत पहुँचाना। हमें अच्छा बोलो, हमारे ऊपर अच्छी बात रखना। हमारे आस-पास रहो, बुरी चीज़ें हमसे दूर भगाओ। गुस्सा मत करो। हम तुमसे लड़ना नहीं चाहते।
Mantra 21
मा नो॒ गोषु॒ पुरु॑षेषु॒ मा गृ॑धो नो अजा॒विषु॑ । अ॒न्यत्रो॑ग्र॒ वि व॑र्तय॒ पिया॑रूणां प्र॒जां ज॑हि
हमारी गायों में मत घुसना, हमारे लोगों में भी नहीं। बकरी और भेड़ों में भी हमारे ऊपर लालच मत करना। तू भी एक जगह जा, वहां अपना काम कर। पियारू के बच्चों को मार।
Mantra 22
यस्य॑ त॒क्मा कासि॑का हे॒तिरेक॒मश्व॑स्येव॒ वृष॑णः॒ क्रन्द॒ एति॑ । अ॒भि॒पू॒र्वं नि॒र्णय॑ते॒ नमो॑ अस्त्वस्मै
जिसका बुखार है, वो खांसी करता है जैसे कोई हथियार चलाता हो। एक ही मार, जैसे घोड़ा आवाज करता है। वो आगे बढ़ता है, सब पे छाता है। उसको प्रणाम है।
Mantra 23
यो॒३न्तरि॑क्षे॒ तिष्ठ॑ति॒ विष्ट॑भि॒तोऽय॑ज्वनः प्रमृ॒णन् दे॑वपी॒यून्। तस्मै॒ नमो॑ द॒शभिः॒ शक्व॑रीभिः
जो आसमान में खड़ा है, पक्का खड़ा है। वो लोगों को कुचल देता है जो यज्ञ नहीं करते, जो भगवान का पानी पीते हैं। उसको दस श्लोक से प्रणाम करो।
Mantra 24
तुभ्य॑मार॒ण्याः प॒शवो॑ मृ॒गा वने॑ हि॒ता हं॒साः सु॑प॒र्णाः श॑कु॒ना वयां॑सि । तव॑ य॒क्षं प॑शुपते अ॒प्स्व॑१न्तस्तुभ्यं॑ क्षरन्ति दि॒व्या आपो॑ वृ॒धे
पशुपति, यह जंगल के जानवर तेरी है। जंगल में रहने वाले मृग, हंस, पक्षी, सब उड़ने वाले तेरी है। तेरी शक्ति पानी में है। आसमान से पानी तेरी बड़ाई के लिए बहता है।
Mantra 25
शि॒शु॒मारा॑ अजग॒राः पु॑री॒कया॑ ज॒षा मत्स्या॑ रज॒सा येभ्यो॒ अस्य॑सि । न ते॑ दू॒रं न प॑रि॒ष्ठास्ति॑ ते भव स॒द्यः सर्वा॒न् परि॑ पश्यसि॒ भूमिं॒ पूर्व॑स्माद्धं॒स्युत्त॑रस्मिन्समु॒द्रे
यह मंत्र शक्ति की बात करता है। बड़े साँप, मछली, और जो जानवर खा जाते हैं, इन सब पे तुम्हारा ज़ोर चलता है। तुम्हारे लिए कोई दूर नहीं, कोई हद नहीं। तुम सीधा पूरी धरती को देख सकते हो। पूरब साइड से तुम मारते हो, उत्तर के समुंदर में।
Mantra 26
मा नो॑ रुद्र त॒क्मना॒ मा वि॒षेण॒ मा नः॒ सं स्रा॑ दि॒व्येना॒ग्निना॑ । अ॒न्यत्रा॒स्मद् वि॒द्युतं॑ पातयै॒ताम्
हे रुद्र, हमें बुखार से मत मारो। ज़हर से भी हमें मत छूना। आग से हमें मत जलाना। बिजली को इधर से हटा के किसी और तरफ गिरा दो।
Mantra 27
भ॒वो दि॒वो भ॒व ई॑शे पृथि॒व्या भ॒व आ प॑प्र उ॒र्व॑न्तरि॑क्षम्। तस्मै॒ नमो॑ यत॒मस्यां॑ दि॒शी॒३तः
भव आसमान का मालिक है। भव धरती पे राज करता है। भव ने पूरा आसमान भर दिया है। उनको प्रणाम है, वो किसी भी तरफ से आएँ, उनका सम्मान करना चाहिए।
Mantra 28
भव॑ राज॒न् यज॑मानाय मृड पशू॒नां हि प॑शु॒पति॑र्ब॒भूथ॑ । यः श्र॒द्दधा॑ति॒ सन्ति॑ दे॒वा इति॒ चतु॑ष्पदे द्वि॒पदे॑ऽस्य मृड
हे भव राजा, यह पूजा करने वाले पे मेहरबानी कर। तम तो पाशुओं के मालिक हो। जो श्रद्धा रखता है और भगवान को मानता है, उसके पास चार पाँव वाले और दो पाँव वाले सब जानवरों पे कृपा कर।
Mantra 29
मा नो॑ म॒हान्त॑मु॒त मा नो॑ अर्भ॒कं मा नो॒ वह॑न्तमु॒त मा नो॑ वक्ष्य॒तः । मा नो॑ हिंसीः पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च॒ स्वां त॒न्वंऽ रुद्र॒ मा री॑रिषो नः
हमें बड़ा आदमी मत हानि पहुँचाओ, छोटे को भी नहीं। जो हमारे साथ चल रहा है उसको भी मत दुखाओ, जो रास्ता दिखाता है उसको भी नहीं। बाप और माँ को मत मारो। हे रुद्र, हमारे शरीर को भी मत छोटना, हमें दुख मत देना।
Mantra 30
रु॒द्रस्यै॑लबका॒रेभ्यो॑ऽसंसूक्तगि॒लेभ्यः॑ । इ॒दं म॒हास्ये॑भ्यः॒ श्वभ्यो॑ अकरं॒ नमः॑
रुद्र के उन कुत्तों को सलाम है जो ज़ोर से भौंकते हैं। जो लोग गलत बात बोलते हैं, उनको निगल जाने वाले कुत्तों को भी नमस्कार है। यह सब बड़े मुँह वाले कुत्ते हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ।
Mantra 31
नम॑स्ते घो॒षिणी॑भ्यो॒ नम॑स्ते के॒शिनी॑भ्यः । नमो॒ नम॑स्कृताभ्यो॒ नमः॑ संभुञ्ज॒तीभ्यः॑ । नम॑स्ते देव॒ सेना॑भ्यः स्व॒स्ति नो॒ अभ॑यं च नः
मैं उन सबको नमस्ते कहता हूँ जो ज़ोर से आवाज़ करते हैं। जिनके लंबे बाल हैं उनको भी नमस्ते। जो लोग इज़्ज़त से झुकते हैं उनको नमस्ते। जो मिलकर खाते हैं उनको भी नमस्ते। देवी सेना को नमस्ते। आप हमारे लिए भला करो और डर को दूर करो।
Begins with appeasing address—repeated namas to classes of beings and powers, establishing respectful contact and non-hostility.
‘Harm us not; speak kindly over us; encompass us; avert ill; be not wroth; let us not come into conflict’—a direct petition for protection and pacification.
Asserts a sovereign, all-seeing reach that transcends distance and boundaries, capable of controlling liminal dangers (notably aquatic/serpentine threats) across directions.
Ends by saluting the deva-senā and allied gaṇas and explicitly requesting svasti and abhaya—welfare and fearlessness as the hymn’s sealed outcome.
svasti no abhayaṃ ca naḥ
mā no hiṃsīḥ … mā tvayā samārāmahi
na te dūraṃ na pariṣṭhā
Raksha/Apotropaic (Protective), with Devatā-gaṇa propitiation
Pacification of potentially harmful gaṇas and fierce divinities; establishment of protective encirclement; acquisition of svasti and abhaya for people, dwelling, and livestock.
Householders, village protectors, purohitas/atharvan priests, and anyone seeking warding against unseen roaming forces, sudden fear, or divine/liminal affliction.
A collective, mobile ‘army’ of divine or semi-divine beings—loud/clamorous bands (ghoṣiṇī), long-haired/liminal companies (keśinī), and related gaṇas—whose presence can be protective when honored, or dangerous when neglected; Rudra appears as the archetype of fierce power requiring pacification.
To avert injury and hostility from roaming hosts and fierce powers, secure a protective perimeter around the household/settlement, and transform these gaṇas into a benevolent ‘divine army’ that bestows welfare and fearlessness.
Evening twilight, before sleep, at times of fear/inauspicious disturbance, or when entering a new/uncertain place; also suitable for periodic household protection.
They are named classes of roaming divine/liminal hosts (gaṇas). The hymn treats them as powerful companies who can become protective when honored with respectful namas rather than feared as hostile presences.
Its dominant method is appeasement and reconciliation: repeated homage, requests for non-harm, and a shift from conflict to guardianship. The aim is to neutralize danger by converting roaming forces into allies.
No. The sukta is primarily verbal and works through invocation and pacification. If following common Atharvanic practice, simple water for purification or boundary-sprinkling can be added, but it is optional.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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