
Rishi: Prāṇa-hymn tradition (often attributed in ancillary tradition to Atharvanic seers; exact r̥ṣi per anukramaṇī to be verified).
Devata: Prāṇa (personified vital breath).
Chandas: Mixed; predominantly anuṣṭubh-like with prose-like segmentation.
Mantra 1
प्राणः। प्रा॒णाय॒ नमो॒ यस्य॒ सर्व॑मि॒दं वशे॑ । यो भू॒तः सर्व॑स्येश्व॒रो यस्मि॒न्त्सर्वं॒ प्रति॑ष्ठितम्
प्राण को नमस्कार है। सब कुछ उसके कंट्रोल में है। वो सब का मालिक बन गया है और उसमें सब स्थित है।
Mantra 2
नम॑स्ते प्राण॒ क्रन्दा॑य॒ नम॑स्ते स्तनयि॒त्नवे॑ । नम॑स्ते प्राण वि॒द्युते॒ नम॑स्ते प्राण॒ वर्ष॑ते
प्राण को सलाम है जो ऐसे चिल्लाता है जैसे बादल गरज रही हो। प्राण को सलाम है जो बिजली की तरह चमकता है। प्राण को सलाम है जो बारिश लाता है। यह प्राण की ताकत है जो सब जगह काम करती है।
Mantra 3
यत् प्रा॒ण स्त॑नयि॒त्नुना॑भि॒क्रन्द॒त्योष॑धीः । प्र वी॑यन्ते॒ गर्भा॑न् दध॒तेऽथो॑ ब॒ह्वीर्वि जा॑यन्ते
जब प्राण चिल्लाता है, बिजली की आवाज़ के साथ, और पौधों को पुकारता है, तब वो पौधे फैलने लगते हैं। वो बीज अंदर लेते हैं, और बहुत सारे नए पौधे उग आते हैं।
Mantra 4
यत् प्रा॒ण ऋ॒तावाग॑तेऽभि॒क्रन्द॒त्योष॑धीः । सर्वं॑ त॒दा प्र मो॑दते॒ यत् किं च॒ भूम्या॒मधि॑
जब प्राण सही वक़्त पर आता है और पौधों को आवाज़ देता है, तब धरती पर जो भी है, सब खुश हो जाता है। सब आगे बढ़ने लगता है।
Mantra 5
य॒दा प्रा॒णो अ॒भ्यव॑र्षीद् व॒र्षेण॑ पृथि॒वीं म॒हीम्। प॒शव॒स्तत् प्र मो॑दन्ते॒ महो॒ वै नो॑ भविष्यति
जब प्राण बारिश लाता है और बड़ी धरती को गीला करता है, तब जानवर खुश हो जाते हैं। वो आगे बढ़ते हैं। हमारे लिए बड़ा अच्छा है।
Mantra 6
अ॒भिवृ॑ष्टा॒ ओष॑धयः प्रा॒णेन॒ सम॑वादिरन्। आयु॒र्वै नः॒ प्राती॑तरः॒ सर्वा॑ नः सुर॒भीर॑कः
जब बारिश पड़ती है और पौधे गीला हो जाते हैं, वो प्राण के साथ बोलने लगते हैं। प्राण हमें पार ले जाए। सारी चीज़ें अच्छी खुशबू दे, हमारे काम आएँ।
Mantra 7
नम॑स्ते अस्त्वाय॒ते नमो॑ अस्तु पराय॒ते। नम॑स्ते प्राण॒ तिष्ठ॑त॒ आसी॑नायो॒त ते॒ नमः॑
जब तू बाहर जाए तो तुझे प्रणाम हो। जब तू वापस जाए तो भी प्रणाम हो। प्राण, जब तू खड़ा हो तो तुझे प्रणाम। जब तू बैठा हो तो भी प्रणाम। हर हाल में तुझे प्रणाम।
Mantra 8
नम॑स्ते प्राण प्राण॒ते नमो॑ अस्त्वपान॒ते। प॒रा॒चीना॑य ते॒ नमः॑ प्रती॒चीना॑य ते॒ नमः॑ सर्व॑स्मै त इ॒दं नमः॑
प्राण, तुम्हे सलाम है, तुम जो साँस ले रहे हो, तुम्हे नमस्ते। जो साँस बाहर जाती है, उसको भी नमस्ते। जो साँस बाहर की तरफ है, उसको नमस्ते। जो अंदर की तरफ है, उसको भी नमस्ते। तुम्हारी हर तरफ को नमस्ते।
Mantra 9
या ते॑ प्राण प्रि॒या त॒नूर्यो ते॑ प्राण॒ प्रेय॑सी । अथो॒ यद् भे॑ष॒जं तव॒ तस्य॑ नो धेहि जी॒वसे॑
प्राण, तुम्हारा जो शरीर है वो बहुत प्यारा है। तुम्हारा सबसे प्यारा रूप है यह। जो भी दवाई तुम्हारे पास है, वो हमे दे दो। हम जीना चाहते हैं।
Mantra 10
प्रा॒णः प्र॒जा अनु॑ वस्ते पि॒ता पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम्। प्रा॒णो ह॒ सर्व॑स्येश्व॒रो यच्च॑ प्रा॒णति॒ यच्च॒ न
प्राण सब जीवों के साथ रहता है, जैसे बाप अपने प्यारे बेटे के साथ रहता है। प्राण सब का मालिक है। जो साँस लेते हैं उनका भी, जो नहीं लेते उनका भी।
Mantra 11
प्रा॒णो मृ॒त्युः प्रा॒णस्त॒क्मा प्रा॒णं दे॒वा उपा॑सते । प्रा॒णो ह॒ सत्यवा॒दिन॑मुत्त॒मे लो॒क आ द॑धत्
प्राण ही मौत है, प्राण ही बुखार है। देवता भी प्राण की पूजा करते हैं। जो सच बोलता है, प्राण उसे ऊपर वाली दुनिया में ले जाता है।
Mantra 12
प्रा॒णो वि॒राट् प्रा॒णो देष्ट्री॑ प्रा॒णं सर्व॒ उपा॑सते । प्रा॒णो ह॒ सूर्य॑श्च॒न्द्रमाः॑ प्रा॒णमा॑हुः प्र॒जाप॑तिम्
प्राण सबसे बड़ा है, वही सब कुछ संभालता है। लोग प्राण की पूजा करते हैं, उसी पे भरोसा रखते हैं। सूरज और चाँद भी प्राण हैं। लोग उसे प्रजापति कहते हैं, यानी सबकी उत्पत्ति का कारण।
Mantra 13
प्रा॒णा॒पा॒नौ व्री॑हिय॒वाव॑न॒ड्वान् प्रा॒ण उ॑च्यते । यवे॑ ह प्रा॒ण आहि॑तोऽपा॒नो व्री॒हिरु॑च्यते
साँस लेने और छोड़ने को चावल और जव कहा जाता है। साँस को बैल भी कहते हैं। जव में साँस बसी है, और चावल को साँस छोड़ने वाली चीज़ कहते हैं।
Mantra 14
अपा॑नति॒ प्राण॑ति॒ पुरु॑षो॒ गर्भे॑ अन्त॒रा। य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॒स्यथ॒ स जा॑यते॒ पुनः॑
बच्चा माँ के पेट में साँस लेता है और छोड़ता है। जब साँस उसे जीता करती है, तब वो दोबारा पैदा होता है।
Mantra 15
प्रा॒णमा॑हुर्मात॒रिश्वा॑नं॒ वातो॑ ह प्रा॒ण उ॑च्यते । प्रा॒णे ह॑ भू॒तं भव्यं॑ च प्रा॒णे सर्वं॑ प्रति॑ष्ठितम्
लोग साँस को मातरिश्वन कहते हैं। हवा को भी साँस ही कहते हैं। जो बीत गया और जो आनेवाला है, सब साँस में है। सारी दुनिया साँस पे टिकी है।
Mantra 16
आ॒थ॒र्व॒णीरा॑ङ्गिर॒सीर्दैवी॑र्मनुष्य॒जा उ॒त। ओष॑धयः॒ प्र जा॑यन्ते य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॑सि
अथर्वन और अंगिरस रिशियों से जुड़ी हुई, भगवान की तरफ से भी और इंसानों में भी पैदा हुई, यह सब दवाई वाली घास जब साँस उसे जीता करती है, तब उग आती है।
Mantra 17
य॒दा प्रा॒णो अ॒भ्यव॑र्षीद् व॒र्षेण॑ पृथि॒वीं म॒हीम्। ओष॑धयः॒ प्र जा॑य॒न्तेऽथो॒ याः काश्च॑ वी॒रुधः॑
जब प्राण ने बरस कर ढो डाला, तब धरती भी भारी हो गई। उस बाद सारी जड़ी-बूटियाँ उग आईं। जो भी पौधे थे, सब निकल आए।
Mantra 18
यस्ते॑ प्राणे॒दं वेद॒ यस्मिं॒श्चासि॒ प्रति॑ष्ठितः । सर्वे॒ तस्मै॑ ब॒लिं ह॑रान॒मुष्मिंल्लो॒क उ॑त्त॒मे
प्राण, जो तुझे जानता है और जहाँ तू खड़ा है वो भी जानता है। सब लोग उसको ऊपर वाली दुनिया में सम्मान देते हैं।
Mantra 19
यथा॑ प्राण बलि॒हृत॒स्तुभ्यं॒ सर्वाः॑ प्र॒जा इ॒माः । ए॒वा तस्मै॑ ब॒लिं ह॑रा॒न् यस्त्वा॑ शृ॒णव॑त् सुश्रवः
प्राण, जैसे सारी जीव तुझे सम्मान देते हैं। वैसे ही उसको भी सम्मान दो जो तुझे सुनता है, तू जो बड़ा नाम वाला है।
Mantra 20
अ॒न्तर्गर्भ॑श्चरति दे॒वता॒स्वाभू॑तो भू॒तः स उ॑ जायते॒ पुनः॑ । स भू॒तो भव्यं॑ भवि॒ष्यत् पि॒ता पु॒त्रं प्र वि॑वेशा॒ शची॑भिः
वो गर्भ में रहते हुए देवताओं के बीच चलता है। जो बन गया वो फिर से पैदा होता है। जो हुआ वो होने वाला भी बनेगा। बाप अपनी शक्ति ले के बेटे में आ गया।
Mantra 21
एकं॒ पादं॒ नोत्खि॑दति सलि॒लाद्धंस उ॒च्चर॑न्। यद॒ङ्ग स तमु॑त्खि॒देन्नैवाद्य न श्वः स्या॒न्न रात्री॒ नाहः॑ स्या॒न्न व्युऽछेत् क॒दा च॒न
हंस पानी से ऊपर उठता है, एक पाँर हिलाता नहीं। अगर वो वो पाँर हिला दे तो न आज रहेगा न कल। न रात रहेगी न दिन, न सवेरा कभी होगा।
Mantra 22
अ॒ष्टाच॑क्रं वर्तत॒ एक॑नेमि स॒हस्रा॑क्षरं॒ प्र पु॒रो नि प॒श्चा। अ॒र्धेन॒ विश्वं॒ भुव॑नं ज॒जान॒ यद॑स्या॒र्धं क॑त॒मः स के॒तुः
एक चक्र है जो आठ पहिए से बना है। उसका सिर्फ एक नवी है। उसमें हज़ार शब्द हैं। वो आगे भी चलता है, पीछे भी। आधे से पूरा दुनिया बना दिया। अब सवाल है कि आधा कौनसा है, वो क्या निशानी है।
Mantra 23
यो अ॒स्य वि॒श्वज॑न्मन॒ ईशे॒ विश्व॑स्य॒ चेष्ट॑तः । अन्ये॑षु क्षि॒प्रध॑न्वने॒ तस्मै॑ प्राण॒ नमो॑ऽस्तु ते
वो शक्ति है जो सब कुछ पैदा करती है और सारी दुनिया पर राज करती है। जो भी हिलता-डुलता है, सब उसके कंट्रोल में है। वो बहुत तेज़ है, जैसे तीर चलाने वाला। उस प्राण शक्ति को सलाम है, हम उसको प्रणाम करते हैं।
Mantra 24
यो अ॒स्य स॒र्वज॑न्मन॒ ईशे॒ सर्व॑स्य॒ चेष्ट॑तः । अत॑न्द्रो॒ ब्रह्म॑णा॒ धीरः॑ प्रा॒णो मानु॑ तिष्ठातु
वो शक्ति सब कुछ पैदा करती है और हर काम पर राज करती है। कभी थकती नहीं, हमेशा स्थित रहती है, अपनी शक्ति से। हे मनु, यह प्राण शक्ति तुम्हारे लिए, इंसानियत के लिए, मज़बूत खड़ी रहे।
Mantra 25
ऊ॒र्ध्वः सु॒प्तेषु॑ जागार न॒नु ति॒र्यङ् नि प॑द्यते । न सु॒प्तम॑स्य सु॒प्तेष्वनु॑ शुश्राव॒ कश्च॒न
जब सब सो रहे होते हैं, यह प्राण शक्ति जागती है। वो कभी उल्टा-पुल्टा नहीं गिरता। जब सब सो रहे हैं, किसी ने कभी नहीं सुना कि यह भी सो रहा है।
Mantra 26
प्राण॒ मा म॑त् प॒र्यावृ॑तो॒ न मद॒न्यो भ॑विष्यसि । अ॒पां गर्भ॑मिव जी॒वसे॒ प्राण॑ ब॒ध्नामि॑ त्वा॒ मयि॑
हे प्राण, मुझसे मत फेर मुँह, मेरे से अलग मत हो जा। जैसे पानी में बच्चा रहता है, वैसे ही तुम मेरे अंदर जीवन के लिए बंधे रहो। मैं तुम्हे अपने पास कस के रखता हूँ।
To praise and stabilize Prāṇa as the ruling life-force, so vitality returns, life remains established, and weakening or life-threatening collapse is averted.
Both. It functions as a healing/protective charm (bhaisajya/āyuṣya) while also teaching a brahmavāda view: breath is a cosmic sovereignty that upholds all beings and order.
No specific substances are required by the hymn. The primary ‘instrument’ is disciplined recitation with a steady, calming intent; optional water or a simple protective thread may be used by local tradition.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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