Adhyaya 2
Ashramavasika ParvaAdhyaya 263 Verses

Adhyaya 2

धृतराष्ट्र-सत्कारः तथा श्राद्ध-दाने नियमनम् | Honoring Dhṛtarāṣṭra and Regulating Śrāddha-Gifts

Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra-satkāra and Śrāddha-dāna Context (Āśramavāsika narrative unit)

Vaiśaṃpāyana reports that Dhṛtarāṣṭra, duly honored by the Pāṇḍavas, resumes a dignified routine under the attendance of ṛṣis. The Kuru elder distributes brahmadeya/agrahāra endowments and other gifts, which Yudhiṣṭhira endorses. Yudhiṣṭhira addresses his brothers and ministers, establishing a governance directive: Dhṛtarāṣṭra is to be respected by all; adherence to his instructions constitutes friendship with the king’s policy, while opposition is treated as disloyalty subject to removal. The chapter situates these measures within the calendrical framing of sons’ śrāddha observances, authorizing Dhṛtarāṣṭra to give as much as he intends for the rites. Dhṛtarāṣṭra repeatedly donates wealth to eminent brāhmaṇas; the Pāṇḍavas follow his lead out of deference. A reflective note appears among the brothers regarding the elder’s endurance amid grief, concluding that he should attain whatever comfort remained to him in life. The Pāṇḍavas maintain disciplined conduct under Dhṛtarāṣṭra’s rule, and Dhṛtarāṣṭra regards them with a teacher’s approval due to their humility. Gāndhārī, by performing varied śrāddha rites and supporting brāhmaṇas, seeks to discharge ritual obligations toward her sons. The chapter closes by reaffirming Yudhiṣṭhira’s continued honor of Dhṛtarāṣṭra alongside his brothers.

Chapter Arc: राजसूय-विजयी युधिष्ठिर अब युद्धोत्तर शान्ति में राज्य चलाते हुए भी अपने हृदय में धृतराष्ट्र–गान्धारी के प्रति पुत्रवत् सेवा-भाव रखता है; शत्रुता का स्थान करुणा ले लेती है। → धृतराष्ट्र के लिए ब्रह्मदेय-अग्रहार, दान और आश्रय की व्यवस्था होती है; युधिष्ठिर भाइयों और अमात्यों से बार-बार कहता है कि धृतराष्ट्र का कोई भी अप्रिय न हो—पर भीतर-भीतर भीम का मन धृतराष्ट्र को देखकर खिन्न होता रहता है, क्योंकि स्मृति में द्यूत, वनवास और अपमान जागते हैं। → युधिष्ठिर का नीति-वाक्य और आचरण—‘धृतराष्ट्र के प्रति तनिक भी विपरीत आचरण करने वाला मेरे द्वेष का पात्र होगा’—दरबार/परिषद् में एक कठोर प्रतिज्ञा की तरह स्थापित होता है; इसी क्षण से पाण्डव-शासन का स्वर ‘विजय’ नहीं, ‘क्षमा’ बन जाता है। → गान्धारी अपने पुत्र-शोक को दबाकर पाण्डवों को अपने पुत्रों-सा प्रेम देती है; युधिष्ठिर धृतराष्ट्र-पुत्रों के पाप को हृदय में स्थान नहीं देता और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र पाण्डवों के सद्व्यवहार से प्रसन्न रहने लगता है। → भीम का दबा हुआ असंतोष और धृतराष्ट्र का पाण्डवों को देखकर भीतर-भीतर दुर्मन होना—दोनों संकेत देते हैं कि यह शान्ति स्थिर नहीं, किसी आगामी त्याग/वन-गमन की भूमिका है।

Shlokas

Verse 1

/ अपन बक। ] अि्कऑशाय: ३. 'अरा” नामक शस्त्रसे काटकर बनाये जानेके कारण साग-भाजी आदिको “अरालु” कहते हैं। उसको सुन्दर रीतिसे तैयार करनेवाले रसोइये “आरालिक' कहलाते हैं। २. दाल आदि बनानेवाले सामान्यतः: सभी रसोइयोंको 'सूपकार” कहते हैं। ३. पीपल

वैशम्पायन बोले—इस प्रकार पाण्डवों द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर अम्बिका-नन्दन राजा धृतराष्ट्र, ऋषियों के साथ पूर्ववत्‌ सुखपूर्वक विहार करते हुए, श्रद्धापूर्वक सेवित होकर वहाँ सन्तोष से रहने लगे।

Verse 2

ब्रह्मदेयाग्रहारांश्व॒ प्रददौ स कुरूद्गवहः । तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वपद्यत

वैशम्पायन बोले—कुरुकुल-श्रेष्ठ धृतराष्ट्र ने ब्राह्मणों को ब्रह्मदेय और कर-मुक्त अग्रहार प्रदान किए। और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उन सब कार्यों का पूर्णतः अनुमोदन करके उन्हें यथावत् संपन्न कराया।

Verse 3

आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिर: । उवाच स तदा भ्रातृनमात्यांश्व महीपति:

वैशम्पायन बोले—करुणा में अग्रणी और सदा प्रसन्न रहने वाले राजा युधिष्ठिर ने तब अपने भाइयों और मन्त्रियों से कहा—“जो मेरी आज्ञा के अनुसार चलता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो उसके विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है—उसे वश में करके दण्ड देना चाहिए।”

Verse 4

मया चैव भवद्धिश्व मान्य एष नराधिप: । निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिषछ्ठति स मे सुह्ृत्‌

वैशम्पायन बोले—“यह नरेश धृतराष्ट्र मेरे द्वारा और आप सबके द्वारा भी माननीय हैं। जो धृतराष्ट्र की आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो उसके विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है—उसे वश में करके अनुशासित करना चाहिए।”

Verse 5

पितृवत्तेषु चाह:सु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि

वैशम्पायन बोले—“पुत्रों के श्राद्धकर्म के उन दिनों में मनुष्य को पितृवत् (बड़ों को पिता समान मानकर) संयम से भोजन करना चाहिए। जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम व अनुशासन में रहता है, वही योग्य पुरुष है।”

Verse 6

ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्री महामना:

तब महामना कौरव-राजा धृतराष्ट्र ने कहा—“जो मेरे शासन-आदेश के विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर अनुशासन में रहता है, वही उत्तम पुरुष है।”

Verse 7

ब्राह्मणेभ्यो यथाहेंभ्यो ददौ वित्तान्यनेकश: । धर्मराजश्न भीमश्षु सव्यसाची यमावपि

वैशम्पायन बोले— धर्मराज युधिष्ठिर ने यथोचित रीति से ब्राह्मणों और अन्य जनों को अनेक प्रकार से धन बाँटा। भीम, सव्यसाची अर्जुन और यम के जुड़वाँ पुत्रों सहित वे उसी नीति पर स्थिर रहे। वे बार-बार अपने भाइयों और मंत्रियों से कहते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है—उसे रोका जाएगा और दण्ड मिलेगा।”

Verse 8

तत्‌ सर्वमन्ववर्तन्त तस्य प्रियचिकीर्षया । तदनन्तर महामना कुरुकुलनन्दन राजा धुृतराष्ट्र उक्त अवसरोंपर सुयोग्य ब्राह्मणोंको बारम्बार प्रचुर धनका दान करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और नकुल-सहदेव भी उनका प्रिय करनेकी इच्छासे सब कार्योमें उनका साथ देते थे ।।

वे सब उनकी प्रियता के लिए उन सब बातों का पालन करते थे। इसके बाद कुरुकुल-नन्दन महामना राजा धृतराष्ट्र अवसर-अवसर पर योग्य ब्राह्मणों को बार-बार प्रचुर धन दान करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन तथा नकुल-सहदेव भी उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा से प्रत्येक कार्य में उनके साथ रहते थे। करुणामय युधिष्ठिर प्रसन्न मुख से अपने भाइयों और मंत्रियों से कहते— “यह वृद्ध राजा धृतराष्ट्र, पुत्र-पौत्रों के वध से पीड़ित होकर भी, मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा मित्र है; जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु—उसे रोका जाएगा और दण्ड मिलेगा।”

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपवके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ

वैशम्पायन बोले— करुणामय और शांतचित्त राजा युधिष्ठिर बार-बार अपने भाइयों और मंत्रियों को यह उपदेश देते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा मित्र है; जो विरोध करता है, वह मेरा शत्रु है और उसे रोका जाएगा तथा दण्ड मिलेगा।” इस प्रकार धर्मराज ने शासन को धर्मानुशासन बनाया—वृद्धों का सम्मान और विधिसम्मत अधिकार का पालन ही निष्ठा की कसौटी है; और जान-बूझकर अवज्ञा करना नैतिक तथा राजकीय दोष है—जब तक वह कुरुवीर, जिसका पुत्र जीवित है, अपने यथोचित कल्याण का सुख भोगता रहे।

Verse 10

ततस्ते सहिता: पञ्च भ्रातर: पाण्डुनन्दना:

वैशम्पायन बोले— तब पाण्डु के पाँचों पुत्र एकजुट होकर रहने लगे। करुणास्वभाव धर्मराज युधिष्ठिर सदा प्रसन्न मुख से अपने भाइयों और मंत्रियों से बार-बार कहते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है और उसे रोका जाएगा तथा दण्ड मिलेगा।”

Verse 11

धृतराष्ट्रश्न तान्‌ सर्वान्‌ विनीतान्‌ नियमे स्थितान्‌

वैशम्पायन बोले— धृतराष्ट्र और अन्य सबको विनीत तथा नियमबद्ध आचरण में स्थित देखकर सौम्यहृदय युधिष्ठिर बार-बार अपने भाइयों और मंत्रियों से कहते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विरोध में चलता है, वह मेरा शत्रु है—उसे रोका जाएगा और दण्ड मिलेगा।”

Verse 12

शिष्यवृत्तिं समापन्नान्‌ गुरुवत्‌ प्रत्यपद्यत । धृतराष्ट्र भी उन सबको परम विनीत, अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले और शिष्य- भावसे सेवामें संलग्न जानकर पिताकी भाँति उनसे स्नेह रखते थे ।।

वैशम्पायन बोले— उन्हें शिष्य-भाव से सेवा में लगे देखकर उसने गुरु की भाँति उनका सत्कार किया। धृतराष्ट्र ने भी उन सबको अत्यन्त विनीत, अपनी आज्ञा के अधीन रहनेवाले और शिष्य-भाव से सेवा में तत्पर जानकर पिता की तरह स्नेह किया। गान्धारी ने भी अपने पुत्रों के लिये विविध श्राद्ध-कर्म किये। और धर्मराज युधिष्ठिर, करुणाशील और सदा प्रसन्नचित्त, अपने भाइयों और मन्त्रियों से कहा करते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिये पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा में रहता है वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत आचरण करता है वह मेरा शत्रु है और मेरे दण्ड-नियमन का भागी होगा।”

Verse 13

एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिर:

वैशम्पायन बोले— इस प्रकार धर्म का पालन करनेवालों में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी नीति प्रकट की— “जो मनुष्य संयम और आज्ञापालन में स्थित रहता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है तथा मेरे दण्ड-नियमन के अधीन होगा।” करुणा और धैर्य से प्रेरित होकर वे अपने भाइयों और मन्त्रियों को समझाते कि धृतराष्ट्र वृद्ध और पूज्य हैं; उनकी आज्ञा का पालन ही धर्मनिष्ठा का चिह्न है।

Verse 14

स राजा सुमहातेजा वृद्ध: कुरुकुलोद्वह:

वैशम्पायन बोले— वह राजा, महान तेजस्वी, वृद्ध और कुरुकुल का प्रमुख (युधिष्ठिर) इस प्रकार बोला— “जो कोई इसके विपरीत आचरण करेगा, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम में रहकर आज्ञा का पालन करेगा, वह मेरा अपना है।” इस प्रकार उन्होंने स्पष्ट किया कि मित्रता का माप व्यक्तिगत पक्षपात नहीं, बल्कि धर्मसम्मत अधिकार का सम्मान है— धृतराष्ट्र को पूज्य मानकर उनकी आज्ञा का पालन सुहृदता का प्रमाण है, और अवज्ञा दण्डनीय है।

Verse 15

वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु

वैशम्पायन बोले— जब महात्मा पाण्डव सदाचार में स्थित थे, तब युधिष्ठिर इस नियम को दृढ़ता से निभाते थे— “जो मनुष्य संयम में रहकर शासन-आज्ञा का पालन करता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो उसके विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है तथा उसे रोककर नियंत्रित किया जाएगा।” इस प्रकार धर्म्य शासन में मित्रता का आधार व्यक्तिगत निकटता नहीं, उचित आज्ञापालन ही था।

Verse 16

सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम्‌

वैशम्पायन बोले— सौबल की पुत्री गान्धारी ने पुत्र-शोक को एक ओर रखकर (युधिष्ठिर की इस नीति को सुनकर) उसे स्वीकार किया— “जो मनुष्य संयम में रहकर आज्ञा का पालन करता है, वह मेरा अपना है; और जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है।” इसी प्रसंग में करुणामय राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते— “धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं; उनकी आज्ञा मानना ही मित्रता है, और अवज्ञा दण्डनीय।”

Verse 17

प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्गधह:

वैशम्पायन बोले— कौरव युधिष्ठिर दृढ़-निश्चयी थे; वे सदा प्रिय वचन ही कहते, कठोर और अप्रिय नहीं। वे अपने भाइयों और मंत्रियों से कहते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है— वह मेरे दण्ड का भागी होगा।”

Verse 18

यद्‌ यद्‌ ब्रूते च किंचित्‌ स धृतराष्ट्री जनाधिप:

वैशम्पायन बोले— “जनाधिप राजा धृतराष्ट्र जो कुछ भी आदेश दें, जो उनके अनुसार चले वही मेरा हितैषी है; और जो उनके वचन के विपरीत आचरण करे, वह मेरा शत्रु है— उसे वश में किया जाएगा।” इस प्रकार सौम्य युधिष्ठिर ने अपने ही अधिकार को वृद्ध-राज के सम्मान से बाँध दिया और धृतराष्ट्र की आज्ञा-पालना को निष्ठा तथा धर्म का मानदण्ड ठहराया।

Verse 19

गुरु वा लघु वा कार्य गान्धारी च तपस्विनी । तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधर:

वैशम्पायन बोले— गान्धारी तपस्विनी हों या राजा धृतराष्ट्र, वे कोई भी कार्य— छोटा हो या बड़ा— करने को कहते, तो पाण्डवों का भार वहन करनेवाले महाराज युधिष्ठिर उस आदेश को श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य करके पूरा कर देते। और उन्होंने यह नियम ठहराया— “धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहे, वही मेरा सुहृद्; जो विपरीत चले, वह मेरा शत्रु और दण्डनीय है।”

Verse 20

तेन तस्याभवत्‌ प्रीतो वृत्तेन स नराधिप:

ऐसे आचरण से वह नराधिप धृतराष्ट्र प्रसन्न हो गए। और सौम्य स्वभाव वाले युधिष्ठिर सदा प्रसन्नचित्त रहकर अपने भाइयों और मंत्रियों से कहते— “धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहे, वही मेरा सुहृद्; जो विपरीत चले, वह मेरा शत्रु और दण्ड का भागी होगा।”

Verse 21

सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्य: शुचिर्न॑प:

वैशम्पायन बोले— “राजा को सदा प्रातःकाल उठकर शुद्ध रहना चाहिए और नियत जप-आदि कर्तव्य पूर्ण करने चाहिए। जो धर्म-नीति के विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो नियम में रहकर आज्ञाधीन रहता है, वही मेरा हितैषी है।” इसी प्रसंग में दयालु युधिष्ठिर बार-बार अपने भाइयों और मंत्रियों को समझाते— “धृतराष्ट्र हम सबके लिए पूज्य हैं; उनकी आज्ञा का पालन निष्ठा है, और विरोध अपराध— दण्डनीय।”

Verse 22

आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम्‌ | प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान-संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात्‌ पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ।।

Vaiśaṃpāyana said: Dhṛtarāṣṭra continually wished for the Pāṇḍava sons of Pāṇḍu to remain unconquered in battle. Each day, rising at dawn, he would bathe, perform the twilight rites, and recite the Gāyatrī; having thus become purified, he would bless the Pāṇḍavas with victory in war. He would also have Brahmins pronounce auspicious benedictions and would offer oblations into the sacred fire. In the same spirit of disciplined order, Yudhiṣṭhira—ever compassionate and serene—would tell his brothers and ministers: “King Dhṛtarāṣṭra is worthy of honor for me and for you all. Whoever abides by his command is my friend; whoever acts contrary is my enemy and will incur my punishment.”

Verse 23

नतां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्य: स कुरूद्गधहः

Vaiśampāyana said: That Kurū leader won the highest affection from his sons. He would, remaining ever composed, tell his brothers and ministers: “King Dhṛtarāṣṭra is worthy of honor for me and for all of you. Whoever lives in obedience to his command is my well-wisher; whoever acts contrary is my enemy, and he will fall under my discipline and punishment.”

Verse 24

ब्राह्मणानां यथावृत्त: क्षत्रियाणां यथाविध:

Vaiśampāyana said: “One should act toward brāhmaṇas according to proper established conduct, and toward kṣatriyas according to the rule of their station. Any man who behaves contrary to this is my enemy; but the one who restrains himself and remains under discipline becomes acceptable (as one aligned with me).” In context, Yudhiṣṭhira is portrayed as compassionate and steady-minded, instructing his brothers and ministers that Dhṛtarāṣṭra is worthy of honor and that loyalty to his command is a mark of friendship, while defiance is punishable.

Verse 25

तथा विट्शूद्रसंघानामभवत्‌ स प्रियस्तदा । युधिष्ठिर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ जैसा सद्‌बर्ताव करते थे, वैसा ही वैश्यों और शूद्रोंक साथ भी करते थे। इसलिये वे उन दिनों सबके प्रिय हो गये थे ।।

Vaiśampāyana said: At that time Yudhiṣṭhira became dear even to the communities of Vaiśyas and Śūdras, for he treated them with the same upright regard that he showed to Brāhmaṇas and Kṣatriyas. And as for whatever wrongdoing had been committed earlier by Dhṛtarāṣṭra’s sons, the king—greatly compassionate and ever composed—would tell his brothers and ministers: “This King Dhṛtarāṣṭra is worthy of honor from me and from you. Whoever remains obedient to his command is my friend; whoever acts in opposition is my enemy and will be subject to restraint and punishment.”

Verse 26

यश्न वक्षिन्नर: किंचिदप्रियं वाम्बिकासुते

Vaiśampāyana said: “Any man who does not speak anything unpleasant to Dhṛtarāṣṭra, the son of Ambikā, is dear to me. But whoever behaves in opposition to his command is my enemy; such a person should be restrained and brought under discipline.” (Thus Yudhiṣṭhira, ever compassionate, repeatedly instructed his brothers and ministers to honor Dhṛtarāṣṭra and to treat obedience to him as a measure of loyalty and right conduct.)

Verse 27

न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै

वैशम्पायन बोले— “राजा धृतराष्ट्र के विषय में—और दुर्योधन के विषय में भी—कोई मेरे आदेश के विरुद्ध आचरण न करे। जो विपरीत चलेगा वह मेरा शत्रु है; और जो संयम में रहकर आज्ञा का पालन करेगा, वही मेरा सुहृद् और सज्जन माना जाएगा।”

Verse 28

उवाच दुष्कृतं कश्चिद्‌ युधिष्ठिरभयान्नर: । युधिष्ठिरके भयसे कोई भी मनुष्य कभी राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधनके कुकृत्योंकी चर्चा नहीं करता था ।।

वैशम्पायन बोले— युधिष्ठिर के भय से कोई भी मनुष्य कभी किए गए कुकर्मों की चर्चा खुलकर नहीं करता था। राजा की मर्यादा और तेज के कारण लोग वाणी को संयम में रखते, ऐसा कुछ न कहते जो वैर या विघ्न का कारण बने।

Verse 29

शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शरत्रुहन्‌ । शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र गान्धारी और विदुरजी अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे विशेष प्रसन्न थे

वैशम्पायन बोले— शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुर अजातशत्रु युधिष्ठिर के शौच, धैर्य और संयमित आचरण से अत्यन्त प्रसन्न थे; परन्तु भीमसेन के व्यवहार से उन्हें संतोष नहीं था। फिर भी भीम ने निश्चय करके धर्मराज युधिष्ठिर का ही अनुसरण किया।

Verse 30

राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा । अन्ववर्तत कौरव्यो हृदयेन पराड्मुख:

वैशम्पायन बोले— अमित्रहा धर्मपुत्र युधिष्ठिर को राजा धृतराष्ट्र के अनुकूल आचरण करते देख कुरुनन्दन भीमसेन भी ऊपर-ऊपर से उसी मार्ग का अनुसरण करते थे; परन्तु हृदय से वे धृतराष्ट्र से विमुख ही रहते थे। क्योंकि युधिष्ठिर ने यह घोषित किया था— “धृतराष्ट्र मेरे और तुम सबके माननीय हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहेगा वह मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत आचरण करेगा वह मेरा शत्रु है—उसे रोका जाएगा और दण्ड मिलेगा।”

Verse 31

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो विपरीत आचरण करता है वह मेरा शत्रु है; और जो संयम में रहकर आज्ञा का पालन करता है, वह मेरा अपना माना जाएगा।” इसी भाव से करुणामय राजा युधिष्ठिर बार-बार भाइयों और मन्त्रियों को स्मरण कराते थे कि धृतराष्ट्र माननीय हैं; उनकी आज्ञा का पालन ही मित्रता का लक्षण है, और अवज्ञा दण्डनीय वैर।

Verse 32

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर आज्ञा के अधीन रहता है, वह मेरा अपना ही माना जाता है।” इसी भाव से करुणाशील धर्मराज युधिष्ठिर सदा प्रसन्न और शांत रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियों से कहा करते थे— “राजा धृतराष्ट्र हम सबके लिए पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है और मेरे दण्ड का भागी होगा।”

Verse 33

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो इस आदेश के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर आज्ञाधीन रहता है, वही वास्तव में विनीत कहलाता है।” इसी प्रसंग में करुणाशील धर्मराज युधिष्ठिर शांत और प्रसन्न मुख से अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते— “राजा धृतराष्ट्र मेरे और आप सबके लिए वन्दनीय हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है और मेरे दण्ड को प्राप्त होगा।”

Verse 34

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो इसके विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर आज्ञाधीन रहता है, वह मेरा पक्षधर माना जाए।” इसी प्रसंग में करुणाशील युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों को बार-बार समझाते— “राजा धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा मानता है, वह मेरा सुहृद् गिना जाता है; जो विपरीत चलता है, वह शत्रु की भाँति माना जाएगा और दण्डनीय होगा।”

Verse 35

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “मेरे लिए जो विपरीत आचरण करता है, वह शत्रु हो जाता है; और जो अपने को संयम में रखकर अनुशासन में रहता है, वह योग्य ठहरता है।” तब दयालु युधिष्ठिर शांत और प्रसन्न भाव से अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार बोले— “यह राजा धृतराष्ट्र मेरे और आप सबके पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा का पालन करता है, वही मेरा सुहृद् है; जो विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है और मेरे दण्ड का भागी होगा।”

Verse 36

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम में रहकर अनुशासन के अधीन रहता है, वह मेरा अपना ही माना जाए।” इसी भाव से करुणामय और सदा प्रसन्न, स्थिरचित्त युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते— “राजा धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं; इसलिए जो उनकी आज्ञा मानता है, वही मेरा सुहृद् है। जो विपरीत चलता है, वह शत्रु की भाँति माना जाएगा और दण्डनीय होगा।”

Verse 37

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले—जो मेरी आज्ञा और धर्म-मर्यादा के विरुद्ध आचरण करता है, वही मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर विनयपूर्वक आज्ञाधीन रहता है, वह मेरा अपना जन है। इसी भाव से करुणामय और सदा प्रसन्न रहने वाले राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते थे—“राजा धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है तथा मेरे दण्ड का भागी होगा।”

Verse 38

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले—जो मेरी आज्ञा और धर्म-मर्यादा के विरुद्ध चलता है, वही मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर अनुशासन में रहता है, वही निष्ठावान माना जाए। इसी प्रसंग में करुणाशील और स्थिरचित्त युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते थे—“राजा धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं। जो उनके निर्देशों और आज्ञा का पालन करता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत आचरण करता है, वह शत्रु समझा जाएगा और दण्ड का भागी होगा।”

Verse 39

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले—जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम में रहकर शासन-अनुशासन के अधीन रहता है, वह मेरा अपना है। इसी प्रसंग में करुणामय और सदा प्रसन्न रहने वाले राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते थे—“राजा धृतराष्ट्र वन्दनीय हैं। उनकी आज्ञा का पालन करना मानो मेरी ही निष्ठा है; और उसका उल्लंघन दण्डनीय है।”

Verse 40

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले—जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर अनुशासन के अधीन रहता है, वही सच्चा पुरुष है। इसी भाव से दयालु और स्थिरस्वभाव राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और मन्त्रियों को उपदेश दिया—“वृद्ध राजा धृतराष्ट्र पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है; और जो विपरीत चलता है, वह प्रतिपक्षी है तथा दण्डनीय है।”

Verse 41

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले—जो इस प्रकार के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो अपने को संयम में रखकर राजा की आज्ञा को शिरोपरि धारण करता है, वह मेरे अनुग्रह में स्थित रहता है। इसी भाव से करुणामय राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते थे—“राजा धृतराष्ट्र पूज्य हैं; उनकी आज्ञा का पालन मुझे भी प्रिय है, और उसका उल्लंघन शत्रुता है तथा दण्डनीय है।”

Verse 42

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विपरीत चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर आज्ञा के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् होता है।” करुणा से प्रसिद्ध धर्मराज युधिष्ठिर प्रसन्नचित्त होकर अपने भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते थे— “राजा धृतराष्ट्र हम सबके पूज्य हैं। जो उनकी आज्ञा के अधीन रहेगा, वही मुझे प्रिय है; जो विपरीत आचरण करेगा, वह मेरा शत्रु है और मेरे दण्ड का भागी होगा।”

Verse 43

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर विधि-नियम के अनुसार आज्ञा का पालन करता है, वही सच्चा सहायक है।” इस प्रसंग में दयालु युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को पूज्य मानकर भाइयों और मन्त्रियों से कहते थे— “उनकी आज्ञा मानना ही मित्रता और धर्म है; उसका उल्लंघन दण्ड का कारण है।”

Verse 44

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा और उचित धर्म के विरुद्ध आचरण करता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर नियम के अधीन रहता है, वही सत्पुरुष माना जाता है।” इस प्रसंग में दयालु धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों और मन्त्रियों से कहते थे— “वृद्ध धृतराष्ट्र पूज्य हैं; उनकी आज्ञा मानने वाला मेरा सुहृद् है, और जो विपरीत चले वह शत्रु ठहरेगा तथा दण्ड का भागी होगा।”

Verse 45

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर नियम के अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है।” दयालु युधिष्ठिर अपने भाइयों और मन्त्रियों को बार-बार स्मरण कराते थे— “धृतराष्ट्र पूज्य हैं; उनकी आज्ञा मानना धर्म है, और उसका विरोध दण्डनीय है।”

Verse 46

विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है

वैशम्पायन बोले— “जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, वह मेरा शत्रु है; और जो संयम रखकर मेरे निर्देश के अनुसार चलता है, वह मेरा अपना माना जाता है।” इस प्रसंग में दयालु धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों और मन्त्रियों से बार-बार कहते— “वृद्ध धृतराष्ट्र पूज्य हैं; उनकी इच्छा के अनुसार चलना निष्ठा है, और उसका विरोध वैर तथा दण्ड का कारण है।”

Verse 56

सुह्ृदां चैव सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम्‌ । “पिता आदिकी क्षयाह तिथियोंपर तथा पुत्रों और समस्त सुहृदोंके श्राद्धकर्ममें राजा धृतराष्ट्र जितना धन खर्च करना चाहें, वह सब इन्हें मिलना चाहिये”

वैशम्पायन बोले—राजा धृतराष्ट्र अपने समस्त सुहृदों के लिये जितना करना चाहें, उतनी ही व्यवस्था की जानी चाहिये। विशेषतः पिता, पुत्रों तथा सभी हितैषियों के श्राद्धकर्म में वे जितना धन व्यय करना चाहें, वह सब उन्हें उपलब्ध कराया जाये।

Verse 86

शोकमस्मस्कृतं प्राप्य न प्रियेतेति चिन्त्यते । उन्हें सदा इस बातकी चिन्ता बनी रहती थी कि पुत्र-पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुए बूढ़े राजा धृतराष्ट्र हमारी ओरसे शोक पाकर कहीं अपने प्राण न त्याग दें

वैशम्पायन बोले—वे सदा यह सोचकर चिन्तित रहते थे कि पुत्र-पौत्रों के वध से शोकाकुल वृद्ध राजा धृतराष्ट्र हमारी ओर से नया शोक पाकर कहीं अप्रसन्न न हो जाएँ और निराश होकर प्राण न त्याग दें।

Verse 96

बभूव तदवाप्रोति भोगांश्वेति व्यवस्थिता: । अपने पुत्रोंकी जीवितावस्थामें कुरुवीर धृतराष्ट्रको जितने सुख और भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें--इसके लिये पाण्डवोंने पूरी व्यवस्था की थी

वैशम्पायन बोले—पुत्रों के जीवित रहते समय कुरुवीर धृतराष्ट्र को जितने सुख-भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें—इस हेतु पाण्डवों ने पूरी व्यवस्था कर दी थी।

Verse 106

तथाशीला: समातस्थुर्धुतराष्ट्रस्य शासने । इस प्रकारके शील और बर्तावसे युक्त होकर वे पाँचों भाई पाण्डव एक साथ धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहते थे

वैशम्पायन बोले—ऐसे शील और आचरण से युक्त होकर वे पाँचों पाण्डव भाई एक साथ धृतराष्ट्र की आज्ञा के अधीन रहते थे।

Verse 126

आनृण्यमगमत्‌ कामान्‌ विदप्रेभ्य: प्रतिपाद्य सा | गान्धारी देवीने भी अपने पुत्रोंके निमित्त नाना प्रकारके श्राद्धकर्मका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दान किया और ऐसा करके वे पुत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गयीं

वैशम्पायन बोले—गान्धारी देवी ने अपने पुत्रों के निमित्त नाना प्रकार के श्राद्धकर्म का अनुष्ठान किया और ब्राह्मणों को उनकी इच्छा के अनुसार धन-दान दिया। इस प्रकार वे पुत्र-ऋण से मुक्त हो गयीं और (कर्तव्य-पालन से) आनृण्य को प्राप्त हुईं।

Verse 133

भ्रातृभि: सहितो धीमान्‌ पूजयामास तं नृपम्‌ । इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ रहकर सदा राजा धृतराष्ट्रका आदर-सत्कार करते रहते थे

भाइयों सहित बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर सदा उस नरेश धृतराष्ट्र का आदर-सत्कार करते रहते थे।

Verse 143

न ददर्श तदा किंचिदप्रियं पाण्डुनन्दने । कुरुकुलशिरोमणि महातेजस्वी बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका कोई ऐसा बर्ताव नहीं देखा, जो उनके मनको अप्रिय लगनेवाला हो

उस समय वृद्ध, महातेजस्वी कुरुकुल-शिरोमणि राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर में कोई भी ऐसा आचरण नहीं देखा जो उन्हें अप्रिय लगे।

Verse 163

सदैव प्रीतिमत्यासीत्‌ तनयेषु निजेष्विव । सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं

सुबलपुत्री गान्धारी अपने पुत्रों के शोक को त्यागकर पाण्डवों पर सदा अपने ही पुत्रों के समान स्नेह रखती थीं।

Verse 176

वैचित्रवीर्ये नूपती समाचरत वीर्यवान्‌ । पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठछिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे

पराक्रमी कुरुकुल-तिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्र के प्रति सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय कभी नहीं करते थे।

Verse 196

पूजयित्वा वचस्तत्‌ तदकार्षीत्‌ परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते

महाराज! शत्रुवीरहा पाण्डवधुरन्धर राजा युधिष्ठिर धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी के वचनों का पूजन करके, वे जो भी छोटा-बड़ा कार्य करने को कहते, उनके आदेश को सादर शिरोधार्य कर, उसे पूर्ण रूप से सम्पन्न कर देते थे।

Verse 206

अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्र॑ तं मन्दचेतसम्‌ । उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे

वैशम्पायन बोले— उस मन्दबुद्धि पुत्र को स्मरण करके राजा धृतराष्ट्र पश्चात्ताप से भर उठते थे। फिर भी उसके ही व्यवहार से वे प्रायः प्रसन्न रहते; पर जब मोहवश अपने दुर्योधन को याद करते, तब पुनः ग्लानि उन्हें घेर लेती थी।

Verse 226

आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिप: । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात्‌ राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े

वैशम्पायन बोले— राजा धृतराष्ट्र पाण्डुपुत्रों की दीर्घायु की कामना करते थे। ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर और पवित्र अग्नि में हवन करने के पश्चात् वे मन ही मन सदा यही शुभ संकल्प करते—“पाण्डवों की आयु बढ़े।”

Verse 233

यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्य:ः सदावाप नराधिप: । राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी

वैशम्पायन बोले— नराधिप राजा धृतराष्ट्र को पाण्डुपुत्रों से जो निरन्तर प्रसन्नता और उत्कृष्ट प्रीति प्राप्त होती थी, वैसी परम प्रीति उन्हें अपने पुत्रों से भी कभी नहीं मिली थी।

Verse 256

अकृत्वा ह्दि तत्‌ पापं त॑ नृपं सोडन्ववर्तत । धृतराष्ट्रके पुत्रोंने उनके साथ जो कुछ बुराई की थी, उसे अपने हृदयमें स्थान न देकर वे युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें संलग्न रहते थे

वैशम्पायन बोले— धृतराष्ट्र के पुत्रों ने जो-जो अपकार किए थे, उन्हें हृदय में स्थान न देकर युधिष्ठिर ने उस पाप को मन में नहीं बसाया। वे राजा धृतराष्ट्र की सेवा में सदा संलग्न रहते थे।

Verse 263

कुरुते द्वेष्पतामेति स कौन्तेयस्य धीमत: । जो कोई मनुष्य राजा धुृतराष्ट्रका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान्‌ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके द्वेषका पात्र बन जाता था

वैशम्पायन बोले— जो कोई धृतराष्ट्र राजा का थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान् कुन्तीकुमार युधिष्ठिर के द्वेष का पात्र बन जाता था।

Verse 293

धृतराष्ट्र च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मना: । यद्यपि भीमसेन भी दृढ़ निश्चयके साथ युधिष्ठिरके ही पथका अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्रको देखकर उनके मनमें सदा ही दुर्भावना जाग उठती थी

वैशम्पायन बोले— यद्यपि भीमसेन दृढ़ निश्चय के साथ सदा युधिष्ठिर के ही पथ का अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्र को देखते ही उनका मन बार-बार विषाद में डूब जाता और भीतर एक स्थायी दुर्भावना जाग उठती।

Verse 1536

प्रीतिमानभवद्‌ राजा धृतराष्ट्रो3म्बिकासुत: । महात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धुृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे

वैशम्पायन बोले— अम्बिका के पुत्र राजा धृतराष्ट्र प्रेम से भर उठे। महात्मा पाण्डव सदा शील, मर्यादा और सम्मान के साथ आचरण करते थे; इसीलिए अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र उन पर अत्यन्त प्रसन्न रहते थे।

Frequently Asked Questions

How a victorious king should treat a bereaved elder formerly aligned with the opposing side: whether to prioritize punitive control or compassionate, rule-based deference that stabilizes the realm.

Public ethics after conflict are sustained through restraint, honoring elders, and fulfilling ritual-social duties; legitimacy is maintained by disciplined conduct rather than celebratory dominance.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as normative narrative guidance on rājyadharma, dāna, and śrāddha within the broader movement toward renunciation in Book 15.