Adhyaya 43
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Adhyaya 43

Dīkṣā-bhedaḥ (Types of Initiation) — Lalitopākhyāna: Hayagrīva–Agastya Dialogue

इस अध्याय में ललितोपाख्यान के भीतर गुरु-प्रधान, तकनीकी विवेचन आता है। अगस्त्य पूछते हैं कि श्रीदेवी-दर्शन हेतु कैसी दीक्षा चाहिए; हयग्रीव दीक्षाओं के भेद बताकर गुरु की कृपा से शुद्धि और तात्कालिक ज्ञान पर बल देते हैं। स्पर्श-दीक्षा, दृष्टि-दीक्षा, शाम्भवी-दीक्षा (दृष्टि/वाणी/स्पर्श मात्र से तुरंत ज्ञान), तथा दीर्घ सेवा के बाद मौन संकल्प से मानसी-दीक्षा का वर्णन है। फिर क्रिया-दीक्षा की विधि—शुक्लपक्ष व शुभ दिन, देह-वाक्-शुद्धि, संध्या-पालन, एकांत, संयमित आहार व मौन, और मानक उपचारों सहित पूजा—बताई जाती है। अंत में सहस्राक्षरी-विद्या के साथ पुष्पांजलि अनिवार्य कही गई है; उसके बिना पूजा निष्फल मानी जाती है।

Shlokas

Verse 1

इति श्रीब्रह्माण्डमहापुराणे उत्तरभागे ललितोपाख्याने हयग्रीवागस्त्यसम्वादे द्वाचत्वारिंशो ऽध्यायः अगस्त्य उवाच अश्वानन महाप्राज्ञ करुणामृतवारिधे / श्रीदेवीदर्शने दीक्षा यादृशी तां निवेदय

इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डमहापुराण के उत्तरभाग के ललितोपाख्यान में हयग्रीव-अगस्त्य संवाद का बयालीसवाँ अध्याय। अगस्त्य बोले— हे अश्वानन! हे महाप्राज्ञ, करुणामृत के सागर! श्रीदेवी के दर्शन हेतु जैसी दीक्षा हो, वह मुझे बताइए।

Verse 2

हयग्रीव उवाच यदि ते देवताभावो यया कल्मषकर्दमाः / क्षाल्यन्ते च तथा पुसां दीक्षामाचक्ष्महे ऽत्र ताम्

हयग्रीव बोले—यदि तुम्हें वह देवत्व-भाव चाहिए, जिससे मनुष्यों के पापरूपी कीचड़ धुल जाते हैं, तो हम यहाँ उसी दीक्षा का वर्णन करते हैं।

Verse 3

हस्ते शिवपुरन्ध्यात्वा जपेन्मूलाङ्गमालिनीम् / गुरुः स्पृशेच्छिष्यतनुं स्पर्शदीक्षेयमीरिता

हाथ में शिव-पुरंध्री का ध्यान करके मूलाङ्गमालिनी का जप करे। गुरु शिष्य के शरीर का स्पर्श करे—इसे ‘स्पर्श-दीक्षा’ कहा गया है।

Verse 4

निमील्य नयने ध्यात्वा श्रीकामाक्षीं प्रसन्नधीः / सम्यक्पश्येद्गुरुः शिष्यं दृग्दीक्षा सेयमुच्यते

नेत्र मूँदकर श्रीकामाक्षी का ध्यान करे और प्रसन्नचित्त होकर गुरु शिष्य को सम्यक् देखे—इसे ‘दृग्-दीक्षा’ कहा जाता है।

Verse 5

गुरोरालोकमात्रेण भाषणात्स्पर्शनादपि / सद्यः सञ्जायते ज्ञानं सा दीक्षा शाम्भवी मता

गुरु के केवल दर्शन से, वचन से अथवा स्पर्श से भी तत्काल ज्ञान उत्पन्न हो जाता है—वह दीक्षा ‘शाम्भवी’ मानी गई है।

Verse 6

देव्या देहो यथा प्रोक्तो गुरुदेहस्तथैव च / तत्प्रसादेन शिष्यो ऽपि तद्रूपः सम्प्रकाशते

जैसा देवी का देह कहा गया है, वैसा ही गुरु का देह भी है। उनके प्रसाद से शिष्य भी उसी स्वरूप में प्रकाशित हो जाता है।

Verse 7

चिरं शुश्रूषया सम्यक्तोषितो देशिकेश्वरः / तूष्णीं संकल्पयेच्छिष्यं सा दीक्षा मानसी मता

दीर्घकाल तक सेवा से पूर्णतः प्रसन्न हुए देशिकेश्वर गुरु मौन रहकर शिष्य का संकल्प करें—इसी को ‘मानसी दीक्षा’ कहा गया है।

Verse 8

दीक्षाणामपि सर्वासामियमेवोत्तमोत्तमा / आदौ कुर्यात्क्रियादीक्षां तत्प्रकारः प्रवक्ष्यते

सब दीक्षाओं में यह ही परम श्रेष्ठ है; आरम्भ में क्रिया-दीक्षा करनी चाहिए—उसकी विधि आगे कही जाएगी।

Verse 9

शुक्लपक्षे शुभदिने विधाय शुचिमानसम् / जिह्वास्यमलशुद्धिं च कृत्वा स्नात्वा यथाविधि

शुक्ल पक्ष के शुभ दिन में मन को पवित्र करके, जिह्वा और मुख की मल-शुद्धि कर, विधिपूर्वक स्नान करे।

Verse 10

संध्याकर्म समाप्याथ गुरुदेहं परं स्मरन् / एकान्ते निवसञ्छ्रीमान्मौनी च नियताशनः

संध्या-कर्म पूर्ण करके, परम गुरु-स्वरूप का स्मरण करता हुआ, एकान्त में रहे; मौन धारण करे और संयमित आहार करे।

Verse 11

गुरुश्च तादृशोभूत्वा पूजामन्दिरमाविशेत् / देवीसूक्तेन संयुक्तं विद्यान्यासं समातृकम्

गुरु भी उसी प्रकार होकर पूजामन्दिर में प्रवेश करे और देवीसूक्त से संयुक्त, मातृकासहित विद्या-न्यास करे।

Verse 12

कृत्वा पुरुषसूक्तेन षोडशैरुपचारकैः / आवाहना सने पाद्यमर्ध्यमाचमनं तथा

पुरुषसूक्त के साथ सोलह उपचारों द्वारा विधिपूर्वक—आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि करे।

Verse 13

स्नानं वस्त्रं च भूषा च गन्धः पुष्पं तथैव च / धूपदीपौ च नैवेद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणा

स्नान, वस्त्र, भूषण, गन्ध, पुष्प; धूप-दीप, नैवेद्य, ताम्बूल और प्रदक्षिणा—ये भी अर्पित करे।

Verse 14

प्रणामश्चेति विख्यातैः प्रीणयेत्त्रिपुरांबिकाम् / अथ पुष्पाञ्जलिं दद्यात्सहस्राक्षरविद्यया

प्रणाम आदि प्रसिद्ध उपचारों से त्रिपुराम्बिका को प्रसन्न करे; फिर सहस्राक्षर-विद्या से पुष्पाञ्जलि अर्पित करे।

Verse 15

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ॐ नमस्त्रिपुरसुन्दरि हृदये देवि शिरोदेवि शिखादेवि कवचदेवि नेत्रदेवि आस्यदेवि कामेश्वरि भगमालिनि नित्यक्लिन्नें भैरुण्डे वह्निवासिनि महावज्रेश्वरि विद्येश्वरि परशिवदूति त्वरिते कुलसुंदरि नित्ये नीलपताके विजये सर्वमङ्गले ज्वालामालिनि चित्रे महानित्ये परमेश्वरि मन्त्रेशमयि षष्ठीशमय्युद्यानमयि लोपामुद्रामय्यगस्त्यमयि कालतापनमयि धर्माचारमयि मुक्तके शीश्वरमयि दीपकलानाथमयि विष्णुदेवमयि प्रभाकरदेवमयि तेजोदेवमयि मनोजदेवमयि अणिमसिद्धे महिमसिद्धे गरिम सिद्धे लघिमसिद्धे ईशित्वसिद्धे वशित्वसिद्धे प्राप्तिसिद्धे प्राकाम्यसिद्धे रससिद्धे मोक्षसिद्धे ब्राह्मि माहेश्वरी कौमारि वैष्णवि वाराहि इन्द्राणि चामुण्डे महालक्ष्मि सर्वसंक्षोभिणि सर्वविद्राविणि सर्वाकर्षिणि सर्ववशङ्करि सर्वोन्मादिनि सर्वमहाङ्कुशे सर्वखेचरि सर्वबीजे सर्वयोने सर्वास्त्रखण्डिनि त्रैलोक्यमोहिनि चक्रस्वामिनि प्राटयोगिनि बौद्धदर्शनाङ्गि कामाकर्षिणि बुद्ध्याकर्षिणि अहङ्काराकर्षिणि शब्दाकर्षिणि स्पर्शाकर्षिणि रूपाकर्षिणि रसाकर्षिणि गन्धाकर्षिणि चित्ताकर्षिणि धैर्याकर्षिणि स्मृत्याकर्षिणि नामाकर्षिणि बीजाकर्षिणात्माकिर्षिणि अमृताकर्षिणि शरीराकर्षिणि गुप्तयोगिनि सर्वाशापरिपूरकचक्रस्वामिनि अनङ्गकुसुमे अनङ्गमेखले अनङ्गमादिनि अनङ्गमदनातुरे ऽनङ्गरेखे ऽनङ्गवेगिन्यनङ्गाङ्कुशे ऽनङ्गमालिनि गुप्ततरयोगिनि वैदिकदर्शनाङ्गि सर्वसंक्षोभकारक चक्रस्वामिनि पूर्वाम्नायाधिदेवते सृष्टिरूपे सर्वसंक्षोभिणि सर्वविद्राविणि सर्वाकर्षिणि सर्वाह्लादिनि सर्वसंमोहिनि सर्वस्तंभिणि सर्वजृंभिणि सर्ववशङ्करि सर्वरञ्जिनि सर्वोन्मादिनि सर्वार्थसाधिके सर्वसंपत्प्रपूरिणि सर्वमन्त्रमयि सर्वद्वन्द्वक्षयकरि सम्प्रदाययोगिनि सौरदर्शनाङ्गि सर्वसौभाग्यदायकचक्रे सर्वसिद्धिप्रदे सर्वसम्पत्प्रदे सर्वप्रियङ्करि सर्वमङ्गलकारिणि सर्वकामप्रदे सर्वदुःखविमोचिनि सर्वमृत्युप्रशमिनि सर्वविघ्ननिवारिणि सर्वाङ्गसुन्दरि सर्वसौभाग्यदायिनि कुलोत्तीर्णयोगिनि सर्वार्थसाधकचक्रेशि सर्वज्ञे सर्वशक्ते सर्वैश्वर्यफलप्रदे सर्वज्ञानमयि सर्वव्याधिनिवारिणि सर्वाधारस्वरूपे सर्वपापहरे सर्वानन्दमयि सर्वरक्षास्वरूपिणि सर्वेप्सित फलप्रदे नियोगिनि वैष्णवदर्शनाङ्गि सर्वरक्षाकरचक्रस्थे दक्षिणाम्नायेशि स्थितिरूपे वशिनि कामेशि मोदिनि विमले अरुणे जयिनि सर्वेश्वरि कौलिनि रहस्ययोगिनि रहस्यभोगिनि रहस्यगोपिनि शाक्तदर्शनाङ्गि सर्वरोगहरचक्रेशि पश्चिमाम्नाये धनुर्बाणपाशाङ्कुशदेवते कामेशि वज्रेशि फगमालिनि अतिरहस्ययोगिनि शैवदर्शनाङ्गि सर्वसिद्धिप्रदचक्रगे उत्तराम्नायेशि संहाररूपे शुद्धपरे विन्दुपीठगते महारात्रिपुरसुन्दरि परापरातिरहस्ययोगिनि शांभवदर्शनाङ्गि सर्वानन्दमयचक्रेशि त्रिपुरसुंदरि त्रिपुरवासिनि त्रिपुरश्रीः त्रिपुरमालिनि त्रिपुरसिद्धे त्रिपुरांब सर्वचक्रस्थे अनुत्तराम्नायाख्यस्वरूपे महात्रिपुरभैरवि चतुर्विधगुणरूपे कुले अकुले कुलाकुले महाकौलिनि सर्वोत्तरे सर्वदर्शनाङ्गि नवासनस्थिते नवाक्षरि नवमिथुनाकृते महेशमाधवविधातृमन्मथस्कन्दनन्दीन्द्रमनुचन्द्रकुबेरागस्त्यदुर्वासःक्रोधभट्टारकविद्यात्मिके कल्याणतत्त्वत्रयरूपे शिवशिवात्मिके पूर्मब्रह्मशक्ते महापरमेश्वरि महात्रिपुरसुन्दरि तव श्रीपादुकां पूजयामि नमः / क एं ईल ह्रीं हस कहल ह्रीं ऐं क्लीं सौः सौः क्लीं ऐं श्रीं / देव्याः पुष्पाञ्जलिं दद्यात्सहस्राक्षरविद्याया / नोचेत्तत्पूजनं व्यर्थमित्याहुर्वेदवादिनः

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं… इत्यादि सहस्राक्षर-विद्या का विस्तृत जप करके त्रिपुरसुन्दरी देवी को नमस्कार करे; उसी मंत्र से पुष्पाञ्जलि दे—अन्यथा पूजन व्यर्थ है, ऐसा वेदज्ञ कहते हैं।

Verse 16

ततो गोमयसंलिप्ते भूतले द्रोणशालिभिः / तावद्भिस्तण्डुलैः शुद्धैः शस्तार्णैस्तत्र नूतनम्

फिर गोमय से लिपे हुए भूमितल पर द्रोण-परिमाण शालि और उतने ही शुद्ध, उत्तम तण्डुल रखकर वहाँ नवीन (मण्डल/वेदि) बनाए।

Verse 17

द्रोणोदपूरितं कुंभं पञ्चरत्नैर्नवैर्युतम् / न्यग्रोधाश्वत्थमाकन्दजंबूदुम्बरशाखिनाम्

द्रोण-जल से भरा हुआ कलश, नये पंचरत्नों से युक्त हो; और वट, पीपल, आम, जामुन तथा गूलर की शाखाओं सहित सजाया जाए।

Verse 18

त्वग्भिश्च पल्लवैश्चैव प्रक्षिप्तैरधिवासिनम् / कुम्भाग्रे निक्षिपेत्पक्वं नारिकेलफलं शुभम्

छाल और कोमल पल्लव डालकर उसे अधिवासित करे; फिर कलश के अग्रभाग पर पका हुआ शुभ नारियल-फल रखे।

Verse 19

अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्धूपदीपादि दर्शयेत् / श्रीचिन्तामणिमन्त्रं तु हृदि मातृकमाजपेत्

गन्ध, पुष्प आदि से पूजन कर धूप-दीप आदि दिखाए; और हृदय में मातृका सहित श्रीचिन्तामणि-मन्त्र का जप करे।

Verse 20

कुम्भ स्पृशञ्छ्रीकामाप्तिरूपीकृतकलेवरम् / अष्टोत्तरशते जाते पुनर्दीपं प्रदर्शयेत्

कलश को स्पर्श करते हुए साधक श्री-सम्पदा और काम्य-फल की प्राप्ति-स्वरूप देह धारण करे; और एक सौ आठ जप पूर्ण होने पर फिर दीप दिखाए।

Verse 21

शिष्यमाहूय रहसि वाससा बद्धलोचनम् / कारयित्वा प्रणामानां साष्टाङ्गानां त्रयं गुरुः

गुरु शिष्य को एकान्त में बुलाकर वस्त्र से उसकी आँखें बाँध दे; और उससे साष्टाङ्ग प्रणाम तीन बार करवाए।

Verse 22

पुष्पाणि तत्करे दत्त्वा कारये त्कुसुमाञ्जलिम् / श्रीनाथकरुणाराशे परञ्ज्योतिर्मयेश्वरि

उसके हाथ में पुष्प देकर पुष्पांजलि अर्पित कराए— हे श्रीनाथ! करुणा-राशि! परंज्योतिर्मय ईश्वरि!

Verse 23

प्रसूनाञ्जलिरेषा ते निक्षिप्ता चरणांबुजे / परं धाम परं ब्रह्म मम त्वं परदेवता

यह पुष्पांजलि आपके चरण-कमल में रखी गई है; आप परम धाम, परम ब्रह्म, और मेरे परम देवता हैं।

Verse 24

अद्यप्रभृति मे पुत्रान्रक्ष मां शारणागतम् / इत्युक्त्वा गुरुपादाव्जे शिष्यो मूर्ध्नि विधारयेत्

आज से मेरे पुत्रों की रक्षा करो, और मुझे शरणागत की भाँति बचाओ— ऐसा कहकर शिष्य गुरु के चरण-कमल को मस्तक पर धारण करे।

Verse 25

जन्मान्तर सुकृतत्वं स्यान्न्यस्ते शिरसि पादुके / गुरुणा कमलासनमुरशासनपुरशासनसेवया लब्धे

जब गुरु की पादुका मस्तक पर रखी जाती है, तब जन्म-जन्मांतर के पुण्य का फल प्राप्त होता है; यह कमलासन, मुरशासन और पुरशासन की सेवा से गुरु द्वारा प्राप्त है।

Verse 26

इत्युक्त्वा भक्तिभरितः पुनरुत्थाय शान्तिमान् / वामपार्श्वे गुरोस्तिष्ठेदमानी विनयान्वितः

ऐसा कहकर भक्तिभाव से भरकर, फिर उठकर शांतचित्त होकर, विनययुक्त और निरहंकारी होकर गुरु के बाएँ पार्श्व में खड़ा रहे।

Verse 27

ततस्तुंबीजलैः प्रोक्ष्य वामभागे निवेदयेत् / विमुच्य नेत्रबन्धं तु दर्शयेदर्चनक्रमम्

तत्पश्चात् तुंबी-जल से प्रोक्षण करके वाम भाग में नैवेद्य अर्पित करे। फिर नेत्रबन्ध खोलकर पूजन की विधि दिखाए।

Verse 28

सितामध्वाज्यकदलीफलपायसरूपकम् / महात्रिपुरसुन्दर्या नैवेद्यमिति चादिशेत्

शक्कर, मधु, घी, केले का फल और पायस आदि को ‘महात्रिपुरसुन्दरी का नैवेद्य’ कहकर निर्देश करे।

Verse 29

षोडशर्णमनुं तस्य वदेद्वामश्रुतौ शनैः / ततो बहिर्विनिर्गत्य स्थाप्य दार्वासने शुचिम्

उसका षोडशाक्षरी मन्त्र धीरे-धीरे बाएँ कान में कहे। फिर बाहर निकलकर शुद्ध शिष्य को लकड़ी के आसन पर बैठाए।

Verse 30

निवेश्य प्राङ्मुखं तत्र पट्टवस्त्रसमास्तृते / शिष्यं श्रीकुम्भसलिलैरभिषिञ्चेत्समन्त्रकम्

वहाँ पट्ट-वस्त्र बिछाकर शिष्य को पूर्वाभिमुख बैठाए। फिर मन्त्र सहित श्रीकुम्भ के जल से उसका अभिषेक करे।

Verse 31

पुनः शुद्धोदकैः स्नात्वा वाससी परिगृह्य च / अष्टोत्तरशतं मन्त्रं जप्त्वा निद्रामथाविशेत्

फिर शुद्ध जल से स्नान करके वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करके फिर निद्रा में प्रवेश करे।

Verse 32

शुभे दृष्टे सति स्वप्ने पुण्यं योज्यं तदोत्तमम् / दुःस्वप्ने तु जपं कुर्यादष्टोत्तरसहस्रकम्

यदि स्वप्न में शुभ दर्शन हो, तो उस समय उत्तम पुण्य-कर्म का विधान करना चाहिए। परन्तु दुःस्वप्न हो तो अष्टोत्तर-सहस्र (१००८) जप करना चाहिए।

Verse 33

कारयेत्त्रिपुरांबायाः सपर्यां मुक्तमार्गतः / यदा न दृष्टः स्वप्नो ऽपि तदा सिद्धिश्चिराद्भवेत्

मुक्ति-मार्ग के अनुसार त्रिपुराम्बा की सपर्या (पूजा-सेवा) कराए। जब स्वप्न भी न दिखाई दे, तब सिद्धि देर से प्राप्त होती है।

Verse 34

स्वीकुर्यात्परया भक्त्या देवी शेष कलाधिकम् / सद्य एव स शिष्यः स्यात्पङ्क्तिपावनपावनः

देवी शेष-कलाधिक (अतिशय अनुग्रह) को परम भक्ति से स्वीकार करती हैं। वह साधक तत्काल शिष्य हो जाता है, जो पंक्ति-शुद्धि करने वालों को भी पावन करने वाला है।

Verse 35

शरीरमर्थं प्राणं च तस्मै श्रीगुरवे दिशेत् / तदधीनश्च रेन्नित्यं तद्वाक्यं नैव लघयेत्

शरीर, धन और प्राण—ये सब श्रीगुरु को अर्पित करे। नित्य उनके अधीन रहकर आचरण करे और उनके वचन को कभी तुच्छ न माने।

Verse 36

यः प्रसन्नः क्षणार्धेन मोक्षलक्ष्मीं प्रयच्छति / दुर्लभं तं विजानीयाद्गुरुं संसारतारकम्

जो प्रसन्न होकर क्षण-भर में मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान कर दे—उस दुर्लभ गुरु को संसार से तारने वाला जानना चाहिए।

Verse 37

गुकारस्यान्धकारोर्ऽथो रुकारस्तन्निरोधकः / अन्धकारनिरोधित्वाद्गुरुरित्यभिधीयते

‘गु’ अंधकार का अर्थ है और ‘रु’ उसका निरोधक है। अंधकार का नाश करने वाला होने से वह ‘गुरु’ कहलाता है॥

Verse 38

बोधरूपं गुरुं प्राप्य न गुर्वन्तरमादिशेत् / गुरुक्तं परुषं वाक्यमाशिषं परिचिन्तयेत्

बोधस्वरूप गुरु को पाकर दूसरे गुरु का निर्देश न करे। गुरु द्वारा कहा गया कठोर वचन भी आशीर्वाद मानकर विचार करे॥

Verse 39

लौकिकं वैदिकं वापि तथाध्यात्मिकमेव च / आददीत ततो ज्ञानं पूर्वं तमभिवादयेत्

लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक—इन सब से ज्ञान ग्रहण करे; पर पहले उस गुरु को प्रणाम करे॥

Verse 40

एवं दीक्षात्रयं कृत्वा विधेयं बौधयेत्पुनः / गुरुभक्तिस्सदाचारस्तद्द्रोहस्तत्र पातकम्

इस प्रकार तीन प्रकार की दीक्षा करके फिर शिष्य को कर्तव्य समझाए। गुरु-भक्ति और सदाचार धर्म है; गुरु-द्रोह वहाँ पाप है॥

Verse 41

तत्पदस्मरणं मुक्तिर्यावद्देहमयं क्रमः / यत्पापं समवाप्नोति गुर्वग्रे ऽनृतभाषणत्

उसके चरणों का स्मरण ही मुक्ति है, जब तक देह का क्रम चलता है। गुरु के सामने असत्य बोलने से जो पाप प्राप्त होता है॥

Verse 42

गोब्राह्मणावधं कृत्वा न तत्पापं समाश्रयेत् / ब्रह्मादिस्तंब पर्यतं यस्य मे गुरुसंततिः

जिसकी मेरी गुरु-परम्परा ब्रह्मा से लेकर तृण-स्तम्ब तक व्याप्त है, वह गो-और ब्राह्मण-वध कर लेने पर भी उस पाप का आश्रय नहीं पाता।

Verse 43

तस्य मे सर्वपूज्यस्य को न पूज्यो महीतले / इति सर्वानुकूलो यः स शिष्यः परिकीर्तितः

जो मेरे उस सर्वपूज्य (गुरु) का है, उसके लिए पृथ्वी पर कौन अपूज्य है? जो ऐसा मानकर सबके प्रति अनुकूल रहता है, वही शिष्य कहा गया है।

Verse 44

शीलादिविमलानेकगुणसंपन्नभावनः / गुरुशासनवर्तित्वाच्छिष्य इत्यभिधीयते

जो शील आदि निर्मल अनेक गुणों से युक्त, सद्भाव से परिपूर्ण और गुरु-आज्ञा में स्थित रहता है, वही ‘शिष्य’ कहलाता है।

Verse 45

जपाच्छ्रान्तः पुनर्ध्यायेद्ध्यानाच्छ्रान्तः पुनर्जपेत् / जपध्यानादियुक्तस्य क्षिप्रं मन्त्रः प्रसिध्यति

जप से थक जाए तो फिर ध्यान करे, और ध्यान से थक जाए तो फिर जप करे; जप-ध्यान आदि से युक्त साधक का मन्त्र शीघ्र सिद्ध होता है।

Verse 46

यथा ध्यानस्य सामर्थ्यात्कीटो ऽपि भ्रमरायते / तथा समाधिसा मर्थ्याद्ब्रह्मीभूतो भवेन्नरः

जैसे ध्यान की सामर्थ्य से कीट भी भ्रमर-स्वरूप हो जाता है, वैसे ही समाधि की सामर्थ्य से मनुष्य ब्रह्म-भाव को प्राप्त हो जाता है।

Verse 47

यथा निलीयते काले प्रपञ्चो नैव दृश्यते / तथैव मीलयेन्नेत्रे एतद्ध्यानस्य लक्षणम्

जैसे काल में प्रपंच लीन हो जाता है और दिखाई नहीं देता, वैसे ही नेत्र मूँद ले—यही ध्यान का लक्षण है।

Verse 48

विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविक्रिये / किङ्करत्वं च गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह

जब वर्णातीत, अविकारी परम तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब मंत्र अपने मंत्राधिपतियों सहित सेवकभाव को प्राप्त होते हैं।

Verse 49

आत्मैक्यभावनिष्ठस्य या चेष्टा सा तु दर्शनम् / योगस्तपः स तन्मन्त्रस्तद्धनं यन्निरीक्षणम्

आत्म-एक्य की भावना में स्थित साधक की जो चेष्टा है वही दर्शन है; वही योग, वही तप, वही उसका मंत्र है; और जो निरंतर निरीक्षण है वही उसका धन है।

Verse 50

देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि / यत्रयत्र मनो याति तत्रतत्र समाधयः

जब देहाभिमान गल जाता है और परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, तब मन जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ-वहाँ समाधि ही होती है।

Verse 51

यः पश्येत्सर्वगं शांमानन्दात्मानमद्वयम् / न तस्य किञ्चिदाप्तव्यं ज्ञातव्यं वावशिष्यते

जो सर्वव्यापी, शांत, आनंदस्वरूप अद्वैत आत्मा को देख लेता है, उसके लिए न कुछ प्राप्त करना शेष रहता है न कुछ जानना।

Verse 52

पूजाकोटिसमं स्तोत्रं स्तोत्रकोटिसमोजपः / जपकोटिसमं ध्यानं ध्यानकोटिसमो लयः

पूजा के करोड़ों फल के समान स्तोत्र है, और करोड़ों स्तोत्रों के समान जप। करोड़ों जप के समान ध्यान है, और करोड़ों ध्यान के समान लय (समाधि) है।

Verse 53

देहो देवालयः प्रोक्तो जीव एव महेश्वरः / त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोहंभावेन योजयेत्

देह को देवालय कहा गया है और जीव ही महेश्वर है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को त्यागकर ‘सोऽहं’ भाव से (स्वरूप में) युक्त हो।

Verse 54

तुषेण बद्धो व्रीहिः स्यात्तुषाभावे तु तण्डुलः / पाशबद्धः स्मृतो जीवः पाशमुक्तो महेश्वरः

भूसी से बँधा हुआ धान कहलाता है, और भूसी न रहने पर वही चावल है। बंधन-पाश से बँधा जीव कहा गया है, और पाश से मुक्त वही महेश्वर है।

Verse 55

आकाशे पक्षिजातीनां जलेषु जलचारिणाम् / यथा गतिर्न दृश्येत महावृत्तं महात्मनाम्

आकाश में पक्षियों की और जल में जलचरों की गति जैसे दिखाई नहीं देती, वैसे ही महात्माओं का महान आचरण (मार्ग) समझ में नहीं आता।

Verse 56

नित्यार्चनं दिवा कुर्याद्रात्रौ नैमित्तिकार्चनम् / उभयोः काम्यकर्मा स्यादिति शास्त्रस्य निश्चयः

दिन में नित्य-पूजन करे और रात में नैमित्तिक-पूजन। दोनों समयों में काम्य कर्म (इच्छित फल हेतु) भी हो सकता है—यह शास्त्र का निश्चय है।

Verse 57

कोटिकोटिमहादानात्कोटिकोटिमहाव्रतात् / कोटिकोटिमहायज्ञात्परा श्रीपादुका स्मृतिः

करोड़ों-करोड़ महादानों, करोड़ों-करोड़ महाव्रतों और करोड़ों-करोड़ महायज्ञों से भी बढ़कर श्रीपादुका का स्मरण परम है।

Verse 58

ज्ञानतो ऽज्ञानतो वापि यावद्देहस्य धारणम् / तावद्वर्णाश्रमाचारः कर्तव्यः कर्ममुक्तये

ज्ञान से हो या अज्ञान से, जब तक देह धारण है, तब तक कर्म-मुक्ति के लिए वर्णाश्रम-आचार का पालन करना चाहिए।

Verse 59

निर्गतं यद्गुरोर्वक्त्रात्सर्वं शास्त्रं तदुच्यते / निषिद्धमपि तत्कुर्याद्गुर्वाज्ञां नैव लङ्घयेत्

गुरु के मुख से जो निकले वही समस्त शास्त्र कहा जाता है; निषिद्ध भी हो तो भी वही करे—गुरु-आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे।

Verse 60

जातिविद्याधनाढ्यो वा दूरे दृष्ट्वा गुरुं मुदा / दण्डप्रमाणं कृत्वैकं त्रिः प्रदक्षिणामाचरेत्

जाति, विद्या या धन से सम्पन्न हो, तो भी दूर से गुरु को देखकर प्रसन्न होकर एक दण्ड-प्रमाण दूरी रखकर तीन बार प्रदक्षिणा करे।

Verse 61

गुरुबुद्ध्या नमेत्सर्वं दैवतं तृणमेव वा / प्रणमेद्देवबुद्ध्या तु प्रतिमां लोहमृन्मयीम्

गुरु-बुद्धि से वह सबको नमस्कार करे—चाहे देवता हों या तृण मात्र; पर देव-बुद्धि से तो लोहे या मिट्टी की प्रतिमा को प्रणाम करे।

Verse 62

गुरुं हुङ्कृत्य तुङ्कृत्य विप्रं वादैर्विजित्य च / विकास्य गुह्यशास्त्राणि भवन्ति ब्रह्मराक्षसाः

जो गुरु पर हुंकार करे, तिरस्कार करे और वाद-विवाद से ब्राह्मण को जीत ले; तथा गुप्त शास्त्रों का दुरुपयोग कर उन्हें फैलाए—वे ब्रह्मराक्षस बन जाते हैं।

Verse 63

अद्वैतं भाव येन्नित्यं नाद्वैतं गुरुणा सह / न निन्देदन्यसमयान्वेदशास्त्रागमादिकान्

नित्य अद्वैत-भाव का चिंतन करे, पर गुरु के साथ अद्वैत का दुराग्रह न करे; और वेद, शास्त्र, आगम आदि अन्य मत-मार्गों की निन्दा न करे।

Verse 64

एकग्रामस्थितः शिष्यस्त्रिसंध्यं प्रणमेद्गुरुम् / क्रोश मात्रस्थितो भक्त्या गुरुं प्रतिदिनं नमेत्

जो शिष्य एक ही ग्राम में रहता हो, वह तीनों संध्याओं में गुरु को प्रणाम करे; और जो एक क्रोश की दूरी पर हो, वह भक्ति से प्रतिदिन गुरु को नमस्कार करे।

Verse 65

अर्थयोजनगः शिष्यः प्रणमेत्पञ्चपर्वसु / एकयोजनमारभ्य योजनद्वादशावधि

एक से बारह योजन तक की दूरी में रहने वाला शिष्य पाँच पर्वों (पावन अवसरों) पर गुरु को प्रणाम करे।

Verse 66

तत्तद्योजनसंख्यातमासेषु प्रणमेद्गुरुम् / अतिदूरस्थितः शिष्यो यदेच्छा स्यात्तदा व्रजेत्

जितने योजन की दूरी हो, उतने-उतने मासों के अंतर पर गुरु को प्रणाम करे; और जो अत्यन्त दूर हो, वह जब इच्छा (अवसर) हो तब गुरु के पास जाए।

Verse 67

रिक्तपाणिस्तु नोपेयाद्राजानं देवतां गुरुम् / फलपुष्पांबरादीनि यथाशक्ति समर्पयेत्

खाली हाथ राजा, देवता या गुरु के पास न जाए। यथाशक्ति फल, पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित करे।

Verse 68

मनुष्यचर्मणा बद्धः साक्षात्परशिवः स्वयम् / सच्छिष्यानुग्रहार्थाय गूढं पर्यटति क्षितौ

मनुष्य-चर्म से बँधा हुआ वह स्वयं साक्षात् परशिव है। सत्शिष्यों पर अनुग्रह करने हेतु वह पृथ्वी पर गुप्त रूप से विचरता है।

Verse 70

सद्भक्तरक्षणायैव निराकारो ऽपि साकृतिः / शिवः कृपानिधिर्लोके संसारीव हि चेष्टते // ब्न्द्प्३,४३।६९ / अत्रिनेत्रः शिवः साक्षादचतुर्बाहुरच्युतः / अचतुर्वदनो ब्रह्मा श्रीगुरुः परिकीर्तितः

सद्भक्तों की रक्षा के लिए निराकार होकर भी शिव साकार रूप धारण करते हैं; कृपानिधि शिव लोक में मानो संसारी की भाँति व्यवहार करते हैं। त्रिनेत्रधारी शिव, चतुर्भुज-रहित अच्युत और चतुर्मुख-रहित ब्रह्मा—यही श्रीगुरु कहे गए हैं।

Verse 71

श्रीगुरुं परतत्त्वाख्यं तिष्ठन्तं चक्षुरग्रतः / भाग्यहीना न पश्यन्ति सूर्यमन्धा इवोदितम्

परतत्त्वस्वरूप श्रीगुरु आँखों के सामने स्थित हों, फिर भी भाग्यहीन उन्हें नहीं देखते—जैसे अंधे उदित सूर्य को नहीं देखते।

Verse 72

उत्तमा तत्त्वचिन्ता स्याज्जपचिन्ता तु मध्यमा / अधमा शास्त्रचिन्ता स्याल्लोकचिन्ताधमाधमा

तत्त्व का चिंतन उत्तम है, जप का चिंतन मध्यम है। केवल शास्त्र-चिंतन अधम है, और लोक-चिंता तो अधमाधम है।

Verse 73

नास्थि गुर्वधिकं तत्त्वं नास्ति ज्ञानाधिकं सुखम् / नास्ति भक्त्यधिका पूजा न हि मोक्षाधिकं फलम्

गुरु से बढ़कर कोई तत्त्व नहीं, ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं। भक्ति से बढ़कर कोई पूजा नहीं, और मोक्ष से बढ़कर कोई फल नहीं है।

Verse 74

सर्ववेदेषु शास्त्रेषु ब्रह्मविष्णुशिवादिषु / तत्र तत्रोच्यते शब्दैः श्रीकामाक्षी परात्परा

समस्त वेदों और शास्त्रों में, तथा ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि में, वहाँ-वहाँ शब्दों द्वारा श्रीकामाक्षी को परात्परा कहा गया है।

Verse 75

शचीन्द्रौ स्वाहाग्नी च प्रभारवी / लक्ष्मीनारायणौ वाणीधातारौ गिरिजाशिवौ

शची और इन्द्र, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और रवि; लक्ष्मी और नारायण, वाणी और धाता, गिरिजा और शिव—ये सब युगल रूप हैं।

Verse 76

अग्नीषोमौ बिन्दुनादौ तथा प्रकृतिपूरुषौ / आधाराधेयनामानौ भोगमोक्षौ तथैव च

अग्नि-सोम, बिन्दु-नाद, तथा प्रकृति-पुरुष; आधार-आधेय नाम वाले, और भोग-मोक्ष भी उसी प्रकार (युगल) हैं।

Verse 77

प्राणापनौ च शब्दार्थौं तथा विधिनिषेधकौ / सुखदुःखादि यद्द्वन्द्वं दृश्यते श्रूयते ऽपि वा

प्राण-अपान, शब्द-अर्थ, तथा विधि-निषेध; और सुख-दुःख आदि जो भी द्वन्द्व दिखाई देता है या सुना जाता है।

Verse 78

सर्वलोकेषु तत्सर्वं परं ब्रह्म न संशयः / उत्तीर्ममपरं ज्योतिः कामाक्षीनामकं विदुः

समस्त लोकों में जो सर्वव्यापक परम ब्रह्म है, इसमें संशय नहीं। उसी को अतीत, अनुपम ज्योति ‘कामाक्षी’ नाम से विद्वान जानते हैं।

Verse 79

यदेव नित्यं ध्यायन्ति ब्रह्मविष्णुशिवादयः / इत्थं हि शक्तिमार्गे ऽस्मिन्यः पुमानिह वर्तते

जिसका नित्य ध्यान ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि करते हैं—ऐसे ही इस शक्तिमार्ग में जो पुरुष यहाँ आचरण करता है।

Verse 80

प्रसादभूमिः श्रीदेव्या भुक्तिमुक्त्योः स भाजनम् / अमन्त्रं वा समत्रं वा कामाक्षीमर्चयन्ति ये

श्रीदेवी की कृपाभूमि वही है; वही भोग और मोक्ष का पात्र है—जो मंत्र के बिना या मंत्र सहित कामाक्षी की अर्चना करते हैं।

Verse 81

स्त्रियो वैश्याश्च शूद्राश्च ते यान्ति परमां गतिम् / किं पुनः क्षत्त्रिया विप्रा मन्त्रपूर्वं यजन्ति ये

स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परम गति को प्राप्त होते हैं; फिर जो क्षत्रिय और विप्र मंत्रपूर्वक यजन करते हैं, उनका तो कहना ही क्या।

Verse 82

संसारिणो ऽपि ते नूनं विमुक्ता नात्र संशयः / सितामध्वाज्यकदलीफलपायसरूपकम्

वे संसार में रहते हुए भी निश्चय ही विमुक्त हैं—इसमें संशय नहीं। (अर्पण) शर्करा, मधु, घृत, केले का फल और पायस आदि के रूप में (हो)।

Verse 83

पञ्चपर्वसु नैवेद्यं सर्वदैव निवेदयेत् / योनार्चयति शक्तो ऽपि स देवीशापमाप्नुयात्

पाँच पर्वों में सदा देवताओं को नैवेद्य अर्पित करे। जो समर्थ होकर भी योनि-पूजन करता है, वह देवी के शाप का भागी होता है।

Verse 84

अशक्तौ भावनाद्रव्यैरर्चयेन्नित्यमंबिकाम् / गृहस्थस्तु महादेवीं मङ्गलाचारसंयुतः

असमर्थ होने पर भी भावना-रूप द्रव्यों से नित्य अम्बिका की पूजा करे। गृहस्थ मंगलाचार सहित महादेवी का आराधन करे।

Verse 85

अर्चयेत महालक्ष्मीमनुकूलाङ्गनासखः / गुरुस्त्रिवारमाचारं कथयेत्कलशोद्भव

अनुकूल पत्नी का प्रिय होकर महालक्ष्मी की पूजा करे। हे कलशोद्भव! गुरु आचार-विधि को तीन बार बतलाए।

Verse 86

शिष्यो यदि न गृह्णीया च्छिष्ये पापं गुरोर्न हि / लक्ष्मीनारायणौ वाणीधातारौ गिरिजाशिवौ

यदि शिष्य ग्रहण न करे तो पाप शिष्य पर है, गुरु पर नहीं। (साक्षी हैं) लक्ष्मी-नारायण, वाणी-धाता और गिरिजा-शिव।

Verse 87

श्रीगुरुं गुरुपत्नीं च पितरौ चिन्तयेद्धिया / इति सर्वं मया प्रोक्तं समासेन घटोद्भव

बुद्धि से श्रीगुरु, गुरुपत्नी और माता-पिता का स्मरण करे। हे घटोद्भव! यह सब मैंने संक्षेप में कहा।

Verse 88

एतावदवधानेन सर्वज्ञो मतिमान्भवेत्

इतने ही ध्यान से मनुष्य सर्वज्ञ और बुद्धिमान हो जाता है।

Frequently Asked Questions

It differentiates sparśa-dīkṣā (guru’s touch with mantra-japa), dṛg-dīkṣā (guru’s sanctified gaze after meditation), śāmbhavī-dīkṣā (instant knowledge via glance/speech/touch), and mānasī-dīkṣā (silent mental conferment after sustained service), then outlines kriyā-dīkṣā as a formal ritual procedure.

Auspicious timing in śukla-pakṣa, purification of mind and speech, prescribed bathing and sandhyā, seclusion with regulated diet/silence, guru-led entry into the worship space, nyāsa with Vedic sūktas, ṣoḍaśopacāra pūjā, and puṣpāñjali offered with the sahasrākṣarī-vidyā.

It functions as a comprehensive Śākta liturgical address to Tripurasundarī and her cakra-deities, serving both as consecratory speech and as a doctrinal map of Śrīvidyā; the text explicitly stresses that puṣpāñjali without this vidyā makes the worship ineffective.