Dīkṣā-bhedaḥ (Types of Initiation) — Lalitopākhyāna: Hayagrīva–Agastya Dialogue
आत्मैक्यभावनिष्ठस्य या चेष्टा सा तु दर्शनम् / योगस्तपः स तन्मन्त्रस्तद्धनं यन्निरीक्षणम्
ātmaikyabhāvaniṣṭhasya yā ceṣṭā sā tu darśanam / yogastapaḥ sa tanmantrastaddhanaṃ yannirīkṣaṇam
आत्म-एक्य की भावना में स्थित साधक की जो चेष्टा है वही दर्शन है; वही योग, वही तप, वही उसका मंत्र है; और जो निरंतर निरीक्षण है वही उसका धन है।