Dīkṣā-bhedaḥ (Types of Initiation) — Lalitopākhyāna: Hayagrīva–Agastya Dialogue
शुभे दृष्टे सति स्वप्ने पुण्यं योज्यं तदोत्तमम् / दुःस्वप्ने तु जपं कुर्यादष्टोत्तरसहस्रकम्
śubhe dṛṣṭe sati svapne puṇyaṃ yojyaṃ tadottamam / duḥsvapne tu japaṃ kuryādaṣṭottarasahasrakam
यदि स्वप्न में शुभ दर्शन हो, तो उस समय उत्तम पुण्य-कर्म का विधान करना चाहिए। परन्तु दुःस्वप्न हो तो अष्टोत्तर-सहस्र (१००८) जप करना चाहिए।