Adhyaya 45
Adi ParvaAdhyaya 4537 Verses

Adhyaya 45

परिक्षिद्वृत्तान्तप्रश्नः (Inquiry into Parīkṣit’s Conduct and the Beginnings of His Downfall)

Upa-parva: Janamejaya–Parīkṣit Upākhyāna (Succession and the Account of Parīkṣit’s End)

Chapter 45.0 unfolds as a structured inquiry within the epic’s dialogic frame. Śaunaka requests that Sauti restate, in detail, what Janamejaya asked his ministers regarding Parīkṣit’s passage to heaven. Janamejaya then articulates a didactic motive: by hearing the complete account of his father’s conduct and end, he intends to pursue what is auspicious and avoid its opposite. The ministers first establish Parīkṣit’s credentials as an ideal ruler—protector of the realm, impartial like Prajāpati, sustaining social order, supporting widows and the destitute, disciplined, truthful, trained in archery, and beloved by the people—while situating his birth after the Kurus’ depletion and his long reign. The narrative then pivots from encomium to causality: Parīkṣit’s habitual hunting leads to a forest pursuit; fatigued, hungry, and aged, he encounters a silent ascetic under a vow. Misreading silence as disregard, the king succumbs to anger and commits a disrespectful act by placing a dead serpent upon the ascetic’s shoulder. The ascetic remains outwardly unreactive, leaving the ethical weight to be interpreted through the epic’s karmic logic and foreshadowing the fatal serpent-related consequence.

Chapter Arc: दीक्षा-धारी महातपा जरत्कारु तीर्थ-तीर्थ विचरते हुए कठोर व्रत में लीन हैं—वायु-भक्षी, निराहार, क्षीण होते शरीर के साथ भी धर्म-पथ पर अडिग। → एक दिन वे एक गर्त में अपने पितरों को उल्टे लटके, सूखते, विवश देखते हैं—उनका जीवन-आधार एक सूक्ष्म ‘कुल-तन्तु’ (वंश-धागा) है, जो अब अत्यल्प शेष रह गया है और शीघ्र कटने वाला है। → पितर स्वयं बोल उठते हैं: ‘तपोधन! तुम ही हमारे कुल के एकमात्र स्तम्भ हो; तुम्हारे ब्रह्मचर्य-एकान्त से वंश आगे नहीं बढ़ा, इसलिए हम इस गर्त में लम्बे हैं। तप से यह दोष नहीं कटेगा—उद्धार का उपाय वंश-वृद्धि है।’ → जरत्कारु को स्पष्ट संकेत मिलता है कि केवल व्यक्तिगत तप नहीं, पितृ-ऋण की पूर्ति हेतु गृहस्थ-धर्म/विवाह द्वारा कुल-परम्परा का प्रवाह आवश्यक है; वे अपने जीवन-धर्म पर पुनर्विचार के लिए बाध्य होते हैं। → पितरों की करुण पुकार—‘हमें नाथवत् देखकर तुम अवश्य कुछ करो’—अगले अध्याय की ओर धकेलती है: क्या जरत्कारु तप-मार्ग छोड़कर विवाह का संकल्प करेंगे, और किससे?

Shlokas

Verse 1

अ्री-क्ा पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप सौतिरुवाच एतस्मिन्नेव काले तु जरत्कारुर्महातपा: । चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसायंगृहो मुनि:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--इन्हीं दिनोंकी बात है, महातपस्वी जरत्कारु मुनि सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे। जहाँ सायंकाल हो जाता, वहीं वे ठहर जाते थे इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वरमें जरत्कारुके पितृदर्शनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ४५ ॥। ऑपन---र< बछ। है २ >> षट्चत्वारिशो5 ध्याय: जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना सौतिरुवाच एतच्छुत्वा जरत्कारुर्भुश॑ शोकपरायण: । उवाच तान्‌ पितृन्‌ दुःखाद्‌ वाष्पसंदिग्धया गिरा

Sauti said: Hearing this, Jaratkāru was overwhelmed with grief. In deep distress, he addressed his ancestral fathers, his voice choked and blurred with tears.

Verse 2

चरन्‌ दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभि: । तीर्थेष्वाप्लवनं कृत्वा पुण्येषु विचचार ह,उन महातेजस्वी महर्षिने ऐसे कठोर नियमोंकी दीक्षा ले रखी थी, जिनका पालन करना दूसरे अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये सर्वथा कठिन था। वे पवित्र तीर्थोमें स्नान करते हुए विचर रहे थे

Radiant with ascetic power, the great sage had taken up a severe discipline—hard indeed for those who have not mastered their senses. He wandered on, bathing at holy tīrthas as he went.

Verse 3

वायुभक्षो निराहार: शुष्यन्नहरहर्मुनि: । स ददर्श पितृन्‌ गर्ते लम्बमानानधोमुखान्‌,वे मुनि वायु पीते और निराहार रहते थे; इसलिये दिन-पर-दिन सूखते चले जाते थे। एक दिन उन्होंने पितरोंको देखा, जो नीचे मुँह किये एक गड्ढेमें लटक रहे थे। उन्होंने खश नामक तिनकोंके समूहको पकड़ रखा था, जिसकी जड़में केवल एक तन्‍्तु बच गया था। उस बचे हुए तन्तुको भी वहीं बिलमें रहनेवाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था

Living only on air and taking no food, the sage grew more and more emaciated day by day. Then he beheld his forefathers hanging head-down in a pit, suspended in distress.

Verse 4

एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान्‌ | त॑ तन्तुं च शनैराखुमाददानं बिलेशयम्‌,वे मुनि वायु पीते और निराहार रहते थे; इसलिये दिन-पर-दिन सूखते चले जाते थे। एक दिन उन्होंने पितरोंको देखा, जो नीचे मुँह किये एक गड्ढेमें लटक रहे थे। उन्होंने खश नामक तिनकोंके समूहको पकड़ रखा था, जिसकी जड़में केवल एक तन्‍्तु बच गया था। उस बचे हुए तन्तुको भी वहीं बिलमें रहनेवाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था

They were clinging to a clump of vīraṇa grass, of which only a single fibre remained; and in that very burrow, a rat was slowly gnawing away at the last remaining thread.

Verse 5

निराहारान्‌ कृशान्‌ दीनान्‌ गर्ते स्वत्राणमिच्छत: । उपसृत्य स तान्‌ दीनान्‌ दीनरूपो5भ्यभाषत,वे पितर निराहार, दीन और दुर्बल हो गये थे और चाहते थे कि कोई हमें इस गडढेमें गिरनेसे बचा ले। जरत्कारु उनकी दयनीय दशा देखकर दयासे द्रवित हो स्वयं भी दीन हो गये और उन दीन-दुःखी पितरोंके समीप जाकर बोले--

They had become fasting, emaciated, and wretched, longing for someone to rescue them from the pit. Seeing those afflicted ancestors in such a pitiable state, he was moved to compassion; with a humbled, sorrowful demeanor, he approached them and spoke.

Verse 6

के भवन्तो5वलम्बन्ते वीरणस्तम्बमाश्रिता: । दुर्बलं खादितैर्मूलैराखुना बिलवासिना,“आपलोग कौन हैं जो खशके गुच्छेके सहारे लटक रहे हैं? इस खशकी जड़ें यहाँ बिलमें रहनेवाले चूहेने खा डाली हैं, इसलिये यह बहुत कमजोर है

Takṣaka said: “Who are you, hanging here while clinging to this clump of vīraṇa grass? Its roots have been gnawed away by a rat that lives in a burrow, and therefore it has become very weak.”

Verse 7

वीरणस्तम्बके मूलं यदप्येकमिह स्थितम्‌ | तदप्ययं शनैराखुरादत्ते दशनै: शितै:,“खशके इस गुच्छेमें जो मूलका एक तन्तु यहाँ बचा है, उसे भी यह चूहा अपने तीखे दाँतोंसे धीरे-धीरे कुतर रहा है

Takṣaka said: “Even the single remaining root-fibre of this clump of vīraṇa grass that still stands here—this mouse is slowly gnawing away at that too with its sharp teeth.”

Verse 8

छेत्स्यतेडल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव । ततस्तु पतितारोअत्र गतें व्यक्तमधोमुखा:,“उसका स्वल्प भाग शेष है, वह भी बात-की-बातमें कट जायगा। फिर तो आपलोग नीचे मुँह किये निश्चय ही इस गड्ढेमें गिर जायँगे

“Because only a small portion remains, this too will be cut off in no time. Then, once it gives way, you will surely fall into this pit, headlong.”

Verse 9

तस्य मे दु:खमुत्पन्नं दृष्टवा युष्मानधोमुखान्‌ । कृच्छुमापदमापन्नान्‌ प्रियं कि करवाणि व:,“आपको इस प्रकार नीचे मुँह किये लटकते देख मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है। आपलोग बड़ी कठिन विपत्तिमें पड़े हैं। मैं आपलोगोंका कौन प्रिय कार्य करूँ? आपलोग मेरी इस तपस्याके चौथे, तीसरे अथवा आधे भागके द्वारा भी इस विपत्तिसे बचाये जा सकें तो शीघ्र बतलावें

Takṣaka said: “Seeing you hanging with your faces turned downward, my heart is filled with sorrow. You have fallen into a grievous calamity. What act of kindness can I do for you?”

Verse 10

तपसोअस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुन: । अर्धेन वापि निस्तर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम्‌,“आपको इस प्रकार नीचे मुँह किये लटकते देख मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है। आपलोग बड़ी कठिन विपत्तिमें पड़े हैं। मैं आपलोगोंका कौन प्रिय कार्य करूँ? आपलोग मेरी इस तपस्याके चौथे, तीसरे अथवा आधे भागके द्वारा भी इस विपत्तिसे बचाये जा सकें तो शीघ्र बतलावें

Takṣaka said: “Tell me without delay—by a fourth, a third, or even half of this austerity of mine, can you be brought safely across this calamity? Speak quickly. Seeing you hanging down with your faces turned toward the ground fills my heart with sorrow. You have fallen into a grievous peril; what service, dear to you, may I do?”

Verse 11

अथवापि समग्रेण तरन्तु तपसा मम । भवन्त: सर्व एवेह काममेवं विधीयताम्‌,“अथवा मेरी सारी तपस्याके द्वारा भी यदि आप सभी लोग यहाँ इस संकटसे पार हो सकें तो भले ही ऐसा कर लें”

Takṣaka said: “Or else, if by the full measure of my austerity you all can cross over this peril here, then let it be so—do as you wish in this manner.”

Verse 12

पितर ऊचु. वृद्धों भवान्‌ ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि । नतु विप्राग्रय तपसा शक्‍्यते तद्‌ व्यपोहितुम्‌,पितरोंने कहा--विप्रवर! आप बूढ़े ब्रह्मचारी हैं, जो यहाँ हमारी रक्षा करना चाहते हैं; किंतु हमारा संकट तपस्यासे नहीं टाला जा सकता

The Fathers said: “Venerable brahmin, you are an aged celibate ascetic who wishes to protect us here. Yet this peril cannot be averted merely by austerity. Some consequences have already taken hold, and even a well-intended protector must recognize the limits of personal power when confronted with an inescapable course of events.”

Verse 13

अस्ति नस्तात तपस: फल प्रवदतां वर । संतानप्रक्षयाद्‌ ब्रह्मनू पताम निरयेडशुचौ,तात! तपस्याका बल तो हमारे पास भी है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मग! हम तो वंशपरम्पराका विच्छेद होनेके कारण अपवित्र नरकमें गिर रहे हैं

Takṣaka said: “O dear one, O best among speakers, tell us what fruit comes from austerity. For, O brāhmaṇa, because our line is being cut off and our progeny is perishing, we are falling into an impure hell.”

Verse 14

संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामह: । लम्बतामिह नस्तात न ज्ञान प्रतिभाति वै,ब्रद्माजीका वचन है कि संतान ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है। तात! यहाँ लटकते हुए हमलोगोंकी सुध-बुध प्राय: खो गयी है, हमें कुछ ज्ञात नहीं होता

“Progeny is indeed the highest dharma—so our Grandsire has declared. But, dear one, as we hang here, our senses are nearly lost; no clear understanding dawns upon us.”

Verse 15

येन त्वा नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम्‌ । वृद्धो भवान्‌ महाभागो यो न: शोच्यान्‌ सुदु:ःखितान्‌,इसीलिये लोकमें विख्यात पौरुषवाले आप-जैसे महापुरुषको हम पहचान नहीं पा रहे हैं। आप कोई महान्‌ सौभाग्यशाली महापुरुष हैं, जो अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए हम-जैसे शोचनीय प्राणियोंके लिये करुणावश शोक कर रहे हैं। ब्रह्म! हमलोग कौन हैं इसका परिचय देते हैं, सुनिये। हम अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले यायावर नामक महर्षि हैं

“It is for this reason that we fail to recognize you—though your valor is famed throughout the world. You are an aged and greatly fortunate noble person, for you grieve, out of compassion, for pitiable beings like us who are sunk in extreme sorrow.”

Verse 16

शोचते चैव कारुण्याच्छूणु ये वै वयं द्विज । यायावरा नाम वयमृषय: संशितव्रता:,इसीलिये लोकमें विख्यात पौरुषवाले आप-जैसे महापुरुषको हम पहचान नहीं पा रहे हैं। आप कोई महान्‌ सौभाग्यशाली महापुरुष हैं, जो अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए हम-जैसे शोचनीय प्राणियोंके लिये करुणावश शोक कर रहे हैं। ब्रह्म! हमलोग कौन हैं इसका परिचय देते हैं, सुनिये। हम अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले यायावर नामक महर्षि हैं

Takṣaka said: “You grieve out of compassion—listen, O twice-born. We are those who are called the Yāyāvaras, sages of firmly restrained vows. Moved by pity for us who are in distress, you lament; therefore hear who we are.”

Verse 17

लोकात्‌ पुण्यादिह भ्रष्टा: संतानप्रक्षयान्मुने । प्रणष्टं नस्तपस्तीव्रं न हि नस्तन्तुरस्ति वै,मुने! वंशपरम्पराका क्षय होनेके कारण हमें पुण्य-लोकसे भ्रष्ट होना पड़ा है। हमारी तीव्र तपस्या नष्ट हो गयी; क्योंकि हमारे कुलमें अब कोई संतति नहीं रह गयी है

Takṣaka said: “O sage, because our line of descendants has been cut off, we have fallen here from the meritorious worlds. Our severe austerity has come to nothing, for indeed there is no continuance of our lineage anymore.”

Verse 18

अस्ति त्वेकोडद्य नस्तन्तुः सो5पि नास्ति यथा तथा । मन्दभाग्योडल्पभाग्यानां तप एकं समास्थित:,आजकल हमारी परम्परामें एक ही तन्तु या संतति शेष है, किंतु वह भी नहींके बराबर है। हम अल्पभाग्य हैं, इसीसे वह मन्दभाग्य संतति एकमात्र तपमें लगी हुई है

Takṣaka said: “Today, among us there remains only a single thread of lineage; and even that is scarcely there at all. We are ill-fated—indeed, of meagre fortune—and therefore that lone, unfortunate remnant has taken refuge in austerity alone.”

Verse 19

जरत्कारुरिति ख्यातो वेदवेदाड़पारग: । नियतात्मा महात्मा च सुव्रतः सुमहातपा:,उसका नाम है जरत्कारु। वह वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान्‌ होनेके साथ ही मन और इन्द्रियोंकों संयममें रखनेवाला, महात्मा, उत्तम व्रतका पालक और महान्‌ तपस्वी है

Takṣaka said: “He is renowned by the name Jaratkāru. He is a master of the Vedas and the Vedāṅgas, disciplined in mind and senses, a great-souled man, steadfast in excellent vows, and a mighty ascetic.”

Verse 20

तेन सम तपसो लोभात्‌ कृच्छुमापादिता वयम्‌ । न तस्य भार्या पुत्रो वा बान्धवो वास्ति कश्चन,उसने तपस्याके लोभसे हमें संकटमें डाल दिया है। उसके न पत्नी है, न पुत्र और न कोई भाई-बन्धु ही है

Through his greed for ascetic power, he has driven us into distress. He has neither wife nor son, nor any kinsman at all—no tie exists that might restrain him or make him heed the consequences of his acts.

Verse 21

इसीसे हमलोग अपनी सुध-बुध खोकर अनाथकी तरह इस गड्ढेमें लटक रहे हैं। यदि वह आपके देखनेमें आवे तो हम अनाथोंको सनाथ करनेके लिये उससे इस प्रकार कहियेगा --

For this reason we have lost all sense and discernment and are hanging in this pit like the helpless. If he should come within your sight, then, to give support to us who are without a protector, speak to him in this manner—

Verse 22

पितरस्ते5वलम्बन्ते गर्ते दीना अधोमुखा: । साधु दारान्‌ कुरुष्वेति प्रजामुत्पादयेति च,“जरत्कारो! तुम्हारे पितर अत्यन्त दीन हो नीचे मुँह करके गड्ढेमें लटक रहे हैं। तुम उत्तम रीतिसे पत्नीके साथ विवाह कर लो और उसके द्वारा संतान उत्पन्न करो

“Your forefathers are hanging helplessly, face downward, in a pit. They urge you: ‘Marry properly and beget offspring.’” The verse frames marriage and procreation not as mere personal desire but as an ethical duty toward one’s lineage—rescuing ancestors from distress through the continuation of the family line.

Verse 23

कुलतन्तुर्हि नः शिष्टस्त्वमेवैकस्तपोधन । यस्त्वं पश्यसि नो ब्रह्मन्‌ वीरणस्तम्बमाश्रितान्‌,“तपोधन! तुम्हीं अपने पूर्वजोंके कुलमें एकमात्र तन्तु बच रहे हो। ब्रह्मन्‌! आप जो हमें खशके गुच्छेका सहारा लेकर लटकते देख रहे हैं, यह खशका गुच्छा नहीं है, हमारे कुलका आश्रय है, जो अपने कुलको बढ़ानेवाला है। विप्रवर! इस खशकी जो कटी हुई जड़ें यहाँ आपकी दृष्टिमें आ रही हैं, ये ही हमारे वंशके वे तन्तु (संतान) हैं, जिन्हें कालरूपी चूहेने खा लिया है। ब्राह्णणण आप जो इस खशकी यह अधकटी जड़ देखते हैं, जिसके सहारे हम गड़्ढेमें लटक रहे हैं, यह वही एकमात्र संतान जरत्कारु है, जो तपस्यामें लगा है और ब्राह्मण देवता! जिसे आप चूहेके रूपमें देख रहे हैं, यह महाबली काल है

Takṣaka said: “O ascetic rich in austerity, you alone are the single remaining thread of our lineage. O Brahmin, what you see—us hanging while clinging to a clump of vīraṇa-grass—is not merely a tuft of grass: it is the very support of our family, the means by which the line may be extended. The cut roots of that grass which appear before your eyes are the offspring-threads of our race that have been gnawed away by Time, like a mouse. And the one root still partly uncut, by which we hang over the pit, is that sole remaining descendant—Jaratkāru—absorbed in austerity; and the ‘mouse’ you perceive is mighty Time itself.”

Verse 24

एषो<स्माकं कुलस्तम्ब आस्ते स्वकुलवर्धन: । यानि पश्यसि वै ब्रह्मन्‌ मूलानीहास्य वीरुध:,“तपोधन! तुम्हीं अपने पूर्वजोंके कुलमें एकमात्र तन्तु बच रहे हो। ब्रह्मन्‌! आप जो हमें खशके गुच्छेका सहारा लेकर लटकते देख रहे हैं, यह खशका गुच्छा नहीं है, हमारे कुलका आश्रय है, जो अपने कुलको बढ़ानेवाला है। विप्रवर! इस खशकी जो कटी हुई जड़ें यहाँ आपकी दृष्टिमें आ रही हैं, ये ही हमारे वंशके वे तन्तु (संतान) हैं, जिन्हें कालरूपी चूहेने खा लिया है। ब्राह्णणण आप जो इस खशकी यह अधकटी जड़ देखते हैं, जिसके सहारे हम गड़्ढेमें लटक रहे हैं, यह वही एकमात्र संतान जरत्कारु है, जो तपस्यामें लगा है और ब्राह्मण देवता! जिसे आप चूहेके रूपमें देख रहे हैं, यह महाबली काल है

Takṣaka said: “O Brahmin, this one is the very pillar of our lineage, abiding here as the increaser of his own family. And the roots of this creeper that you see here—these signify the remaining strands of our line.”

Verse 25

एते नस्तन्तवस्तात कालेन परिभक्षिता: । यत्त्वेतत्‌ पश्यसि ब्रह्मन्‌ मूलमस्यार्धभक्षितम्‌,“तपोधन! तुम्हीं अपने पूर्वजोंके कुलमें एकमात्र तन्तु बच रहे हो। ब्रह्मन्‌! आप जो हमें खशके गुच्छेका सहारा लेकर लटकते देख रहे हैं, यह खशका गुच्छा नहीं है, हमारे कुलका आश्रय है, जो अपने कुलको बढ़ानेवाला है। विप्रवर! इस खशकी जो कटी हुई जड़ें यहाँ आपकी दृष्टिमें आ रही हैं, ये ही हमारे वंशके वे तन्तु (संतान) हैं, जिन्हें कालरूपी चूहेने खा लिया है। ब्राह्णणण आप जो इस खशकी यह अधकटी जड़ देखते हैं, जिसके सहारे हम गड़्ढेमें लटक रहे हैं, यह वही एकमात्र संतान जरत्कारु है, जो तपस्यामें लगा है और ब्राह्मण देवता! जिसे आप चूहेके रूपमें देख रहे हैं, यह महाबली काल है

Takṣaka said: “Sir, the threads of our lineage have been gnawed away by Time. And what you see here, O brāhmaṇa—the root half-eaten—is the last remaining support of our family line, diminished by the devouring power of Kāla.”

Verse 26

यत्र लम्बामहे गर्ते सो5प्येकस्तप आस्थित: । यमाखुं पश्यसि ब्रह्मनू काल एष महाबल:,“तपोधन! तुम्हीं अपने पूर्वजोंके कुलमें एकमात्र तन्तु बच रहे हो। ब्रह्मन्‌! आप जो हमें खशके गुच्छेका सहारा लेकर लटकते देख रहे हैं, यह खशका गुच्छा नहीं है, हमारे कुलका आश्रय है, जो अपने कुलको बढ़ानेवाला है। विप्रवर! इस खशकी जो कटी हुई जड़ें यहाँ आपकी दृष्टिमें आ रही हैं, ये ही हमारे वंशके वे तन्तु (संतान) हैं, जिन्हें कालरूपी चूहेने खा लिया है। ब्राह्णणण आप जो इस खशकी यह अधकटी जड़ देखते हैं, जिसके सहारे हम गड़्ढेमें लटक रहे हैं, यह वही एकमात्र संतान जरत्कारु है, जो तपस्यामें लगा है और ब्राह्मण देवता! जिसे आप चूहेके रूपमें देख रहे हैं, यह महाबली काल है

“That very one, on whose support we hang suspended in this pit, is the sole remaining thread of our line—he is devoted to austerity. And the ‘mouse’ you see, O brāhmaṇa, is in truth mighty Time (Kāla) itself.”

Verse 27

स तं॑ तपोरतं मन्दं शनै: क्षपयते तुदन्‌ । जरत्कारुं तपोलब्धं मन्दात्मानमचेतसम्‌,“वह उस तपस्वी एवं मूढ़ जरत्कारुको, जो तपको ही लाभ माननेवाला, मन्दात्मा (अदूरदर्शी) और अचेत (जड) हो रहा है, धीरे-धीरे पीड़ा देते हुए दाँतोंसे काट रहा है

Takṣaka says that Kāla is slowly wearing down Jaratkāru—absorbed in austerity yet dull-witted—by repeatedly tormenting him. He bites the ascetic, who takes austerity itself as his sole gain and has grown short-sighted and unthinking, draining his strength little by little.

Verse 28

न हि नस्तत्‌ तपस्तस्य तारयिष्यति सत्तम । छिन्नमूलान्‌ परिभ्रष्टानू कालोपहतचेतस:,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “O best of the good, that asceticism of his will not rescue us from this plight. Our roots have been cut; Time has struck down our clarity of mind; dislodged from our proper station, we are falling. In such a condition, mere personal austerity cannot serve as our deliverance.”

Verse 29

अध:प्रविष्टान्‌ पश्यास्मान्‌ यथा दुष्कृतिनस्तथा | अस्मासु पतितेष्वत्र सह सर्वे: सबान्धवै:,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “Look at us—sunk down below—meeting the same ruin that befalls evildoers. When we have fallen here, together with all our kinsmen, we shall be cast into this pit.”

Verse 30

छिन्न: कालेन सो>प्यत्र गन्ता वै नरकं॑ ततः । तपो वाप्यथवा यज्ञो यच्चान्यत्‌ पावनं महत्‌,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “Cut off by Time, he too will, from here, surely go to hell. In this crisis, neither austerity nor sacrifice, nor any other great and purifying practice will avail.”

Verse 31

तत्‌ सर्वमपरं तात न संतत्या सम॑ मतम्‌ । स तात दृष्ट्वा ब्रूयास्तं जरत्कारुं तपोधन,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

“Dear one, all those other means are not regarded as equal to progeny. Therefore, having seen this, you should speak to the ascetic Jaratkāru.”

Verse 32

यथा दृष्टमिदं चात्र त्वयाख्येयमशेषत: । यथा दारानू्‌ प्रकुर्यात्‌ स पुत्रानुत्पादयेद्‌ यथा,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “Whatever you have seen here must be reported by you in full. Speak to him in such a way that he takes a wife and, through her, begets sons. For austerity, sacrifice, and other lofty and holy disciplines are not equal to offspring when it comes to sustaining a lineage. Tell the ascetic Jaratkāru everything you have witnessed, and urge him toward marriage so that his kin may be rescued from this impending ruin.”

Verse 33

तथा ब्रह्मंंस्त्वया वाच्य: सो5स्माकं नाथवत्तया । बान्धवानां हितस्येह यथा चात्मकुलं तथा,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “O Brāhmaṇa, you must speak to him in such a way that we may again have a protector. Here, for the welfare of our kinsmen, treat our cause as you would your own family’s. Approach Jaratkāru so that he is moved to accept a wife and beget offspring, for only thus can our line be saved from this impending ruin.”

Verse 34

कस्त्वं बन्धुमिवास्माकमनुशोचसि सत्तम | श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति,'साधुशिरोमणे! उस जरत्कारुकी तपस्या हमें इस संकटसे नहीं उबारेगी। देखिये, हमारी जड़ें कट गयी हैं, कालने हमारी चेतनाशक्ति नष्ट कर दी है और हम अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर नीचे इस गड्ढेमें गिर रहे हैं। जैसे पापियोंकी दुर्गति होती है, वैसे ही हमारी होती है। हम समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ जब इस गड़ढेमें गिर जायँगे, तब वह जरत्कारु भी कालका ग्रास बनकर अवश्य इसी नरकमें आ गिरेगा। तात! तपस्या, यज्ञ अथवा अन्य जो महान्‌ एवं पवित्र साधन हैं, वे सब संतानके समान नहीं हैं। तात! आप तपस्याके धनी जान पड़ते हैं। आपको तपस्वी जरत्कारु मिल जाय तो उससे हमारा संदेश कहियेगा और आपने यहाँ जो कुछ देखा है, वह सब उसे बता दीजियेगा! ब्रह्मन्‌! हमें सनाथ बनानेकी दृष्टिसे आप जरत्कारुके साथ इस प्रकार वार्तालाप कीजियेगा, जिससे वह पत्नी-संग्रह करे और उसके द्वारा पुत्रोंको जन्म दे। तात! जरत्कारुके बान्धव जो हमलोग हैं, हमारे लिये अपने कुलकी भाँति अपने भाई-बन्धुके समान आप सोच कर रहे हैं। अतः साधुशिरोमणे! बताइये, आप कौन हैं? हम सब लोगोंमेंसे आप किसके क्या लगते हैं, जो यहाँ खड़े हुए हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं!

Takṣaka said: “O best of the good, who are you that you grieve for us as though you were our kinsman? We all wish to hear—who are you, standing here among us?”

Verse 44

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत आस्तीकपव॑रमोें जनमेजयराज्याभिषेकसम्बन्धी चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus ends the forty-fourth chapter of the Āstīka section within the Ādi Parva of the Śrī Mahābhārata, concerning King Janamejaya’s royal consecration. The colophon formally closes this unit, placing what follows within the frame of legitimate kingship and the ritual order that upholds political authority.

Verse 45

इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुपितृदर्शने पज्चचत्वारिंशो5 ध्याय:

Thus ends the forty-fifth chapter in the Ādi Parva of the Śrī Mahābhārata, within the Āstīka section, describing the vision of Jaratkāru’s forefathers. The colophon marks a transition in the tale, stressing ancestral obligation and the ethical weight of continuing one’s lineage through rightful action.

Verse 231

तस्माल्लम्बामहे गर्ते नष्टसंज्ञा हुनाथवत्‌ | स वक्तव्यस्त्वया दृष्टो हास्माकं नाथवत्तया

“Therefore we lie fallen in a pit, our senses lost, like people without a protector. If you have seen him, you must tell us—so that we may once again have a guardian and not remain bereft.”

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a ruler should respond when deprived (fatigue, hunger, frustration) and confronted with perceived disrespect: the chapter contrasts dharmic restraint toward an ascetic vow with the impulsive choice to assert authority through humiliation.

Even exemplary governance can be ethically destabilized by a single unrestrained act; the chapter teaches vigilance over anger, interpretive charity toward spiritual disciplines, and the principle that power must remain accountable to dharma in moments of stress.

No explicit phalaśruti appears in this unit; the meta-function is foreshadowing—linking a discrete ethical breach to later consequences—thereby reinforcing the epic’s interpretive frame that narrative understanding supports moral self-correction.