
कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः (Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma)
Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yuga-Dharma Upadeśa (Prophecy and Royal Ethics Episode)
This chapter continues Mārkaṇḍeya’s account of cyclical time and social restoration. He describes a future re-establishment of order: the protection of the earth for the twice-born, the performance of a great horse-sacrifice, and the installation of auspicious boundaries (maryādā) said to be primordial in origin. The narrative includes a program of security and pacification—suppression of predatory bands and the placement of emblems and weapons in conquered regions as signs of stabilized rule—culminating in the decline of adharma and the increase of dharma when the Kṛta age is attained. Mārkaṇḍeya outlines markers of societal flourishing: ritual activity, public works, thriving agriculture across seasons, and a varṇa-based division of duties presented as normative for that age. The discourse then pivots to direct counsel: Yudhiṣṭhira is urged to resolve dharma-doubt by aligning himself with dharma, practicing compassion, protecting subjects as one’s own children, honoring ancestors and deities, correcting errors through proper giving, and avoiding contempt toward Brahmins. The frame closes with Yudhiṣṭhira’s assent and the listeners’ astonishment at the purāṇic instruction.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष महर्षि मार्कण्डेय काल-चक्र का द्वार खोलते हैं—चारों युगों की वर्ष-संख्या, ब्रह्मा के दिन-रात का मान, और वह अद्भुत तथ्य कि प्रलय के महाशून्य में भी एक साक्षी बना रहता है। → वर्णाश्रम-धर्म के ढहने का चित्र उभरता है: कलियुग में क्षत्रिय-वैश्य विकर्म में पड़ते हैं, अल्पायु और स्वल्पबल हो जाते हैं; ब्राह्मण बाह्य वेश से मुनि-सा कपट धारण कर जीविका के लिए अधर्म का सहारा लेते हैं। समाज का ताना-बाना उलटता जाता है और नैतिक दिशा धुँधली पड़ती जाती है। → प्रलय का दृश्य: जब लोक देव-दानव-समेत शून्य हो जाते हैं, तब भी मार्कण्डेय का दीर्घजीवी अस्तित्व बना रहता है—और वे उस परम रहस्य के निकट पहुँचते हैं जहाँ ब्रह्मा के दिन-रात में समस्त विश्व का परिवर्तन होता है। इस विराट विनाश के बीच एक दिव्य बालक का दर्शन होता है—लाल-लाल तलवों और कोमल अँगुलियों वाला—जिसे मार्कण्डेय श्रद्धा से मस्तक पर उठाकर प्रणाम करते हैं। → महर्षि काल-मान (युग, सहस्रयुग, ब्राह्म-अहः) का विधान स्थापित करते हैं और कलियुग के लक्षणों द्वारा यह बोध देते हैं कि धर्म का क्षय भी नियति के चक्र में आता है; फिर भी साक्षी-चेतना और परम सत्ता का संकेत प्रलय में भी बना रहता है। → दिव्य बालक का रहस्य—वह कौन है और प्रलय के पार किस सत्य की ओर संकेत करता है—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।
Verse 1
हि >> आय न हुक है 7 अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको ४ (02०8 कुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम् । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिषिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया--
বৈশম্পায়ন বললেন—তদনন্তর বিনয়সমন্বিত ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির পুনরায় যশস্বী মর্কণ্ডেয় মুনিকে প্রশ্ন করলেন।
Verse 2
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह सम: कश्रिदायुष्मान् दृश्यते तव,“महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता
হে মহামুনি! আপনি যুগ-যুগের সহস্রান্তে সংঘটিত বহু মহাপ্রলয়ের দৃশ্য প্রত্যক্ষ করেছেন; আর এই জগতে আপনার সমান দীর্ঘায়ু আর কাউকে দেখা যায় না।
Verse 3
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेषछ्ठिनम् । न ते$स्ति सदृश: ककश्रिदायुषा ब्रह्मवित्तम,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है
ব্রহ্মবিদ্যায় শ্রেষ্ঠ! পরমেষ্ঠী মহাত্মা ব্রহ্মাকে বাদ দিলে আয়ুতে আপনার সমান আর কেউ নেই।
Verse 4
अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे,ब्रह्म! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं
হে বিপ্র! প্রলয়ের সময় যখন এই লোক—অন্তরীক্ষসহ—দেব ও দানবশূন্য হয়ে যায়, তখন কেবল আপনিই ব্রহ্মার নিকটে থেকে তাঁর সেবা-উপাসনা করেন।
Verse 5
प्रलये चापि निर्वत्ति प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेक: सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—প্রলয় নিবৃত্ত হলে এবং পিতামহ ব্রহ্মা জাগ্রত হলে, হে ব্রহ্মর্ষি, সৃষ্টির মুহূর্তে উৎপন্ন হতে থাকা সকল প্রাণীকে এখানে একমাত্র আপনিই প্রত্যক্ষ করেন।
Verse 6
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेछ्िना । वायुभूता दिश: कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्तत:,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে বিপ্রর্ষি, প্রলয়ের পরে পরমেষ্ঠী পিতামহ ব্রহ্মা জাগ্রত হয়ে সকল দিককে বায়ুতে পূর্ণ করেন এবং সেই বায়ু দ্বারা জলরাশি এদিক-ওদিক ছড়িয়ে শুষ্ক স্থান সৃষ্টি করেন। তারপর তিনি যথাবিধি চার প্রকার জীব—জরায়ুজ, অণ্ডজ, স্বেদজ ও উদ্ভিজ্জ—সৃষ্টি করেন; সেই প্রথম সৃষ্টিকে আরম্ভে স্পষ্টভাবে একমাত্র আপনিই দেখেন।
Verse 7
त्वया लोकगुरु: साक्षात् सर्वलोकपितामह: । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, আপনি একাগ্র সমাধির দ্বারা স্বয়ং লোকগুরু, সর্বলোকের পিতামহ ব্রহ্মাকে আরাধনা করেছেন।
Verse 8
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश: । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে বিপ্র, আপনি যা বহুবার সাধন করেছেন তার প্রমাণ আপনি নিজেই। ভয়ংকর তপস্যায় প্রবিষ্ট হয়ে আপনি তপোবলে স্রষ্টাসদৃশ প্রজাপতিদের শক্তিকেও জয় করেছেন।
Verse 9
नारायणाड्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेडतिपठ्यसे । भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्व विश्वकृत्,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
বৈশম্পায়ন বললেন—আপনি নারায়ণের সদৃশ বলে খ্যাত, আর পরলোকে সর্বত্র আপনার মহিমা পাঠিত হয়। বৈরাগ্য ও অভ্যাসে লাভ করা দিব্যদৃষ্টিতে, যোগবলে হৃদয়-পদ্মের কর্ণিকাকে উদ্ঘাটিত করে, আপনি বিশ্বস্রষ্টা ভগবান বিষ্ণুকে বহুবার প্রত্যক্ষ করেছেন।
Verse 10
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्यण: कामरूपिण: । रत्नालंकारयोगाशभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
বৈশম্পায়ন বললেন— পূর্বে তুমি বৈরাগ্য ও সাধনাভ্যাসজাত দিব্যদৃষ্টিতে হৃদয়-পদ্মের কর্ণিকার সেই আশ্চর্য, অলৌকিক উন্মোচন দর্শন করেছিলে—যেখানে ইচ্ছামতো রূপ ধারণকারী সর্বব্যাপী ব্রহ্মের সাক্ষাৎ লাভ হয়, রত্নময় দীপ্তিতে ভূষিত জগত্-কারণেরও। তাই নারায়ণের সান্নিধ্যে অবস্থানকারী ভক্তদের মধ্যে তুমি শ্রেষ্ঠ; পরলোকসমূহে সর্বত্র তোমার মহিমা গীত হয়।
Verse 11
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । नत्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेछ्चिन:,इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्ष! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है
অতএব, হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ ঋষি! সর্বসংহারিণী মৃত্যু কিংবা দেহকে ক্ষয়কারী জরা—কোনোটিই তোমাকে স্পর্শ করে না। এ পরমেষ্ঠী (ব্রহ্মা)-র কৃপাপ্রসাদেরই ফল।
Verse 12
यदा नैवं रविनग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्ष नैवोर्वी शेष भवति किंचन,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন— মহাপ্রলয়ের সময় যখন না সূর্য থাকে, না অগ্নি, না বায়ু, না চন্দ্র; না অন্তরীক্ষ অবশিষ্ট থাকে, না পৃথিবী—কিছুই আর থাকে না। তখন সমগ্র চল-অচল জগৎ সেই এক মহাসমুদ্রের জলে ডুবে অদৃশ্য হয়ে যায়; দেবতা ও অসুর বিনষ্ট হয়, মহা নাগরাও ধ্বংসপ্রাপ্ত হয়। সেই সময় পদ্ম ও উৎপলে নিবাস ও শয়নকারী, অমিতাত্মা সর্বভূতেশ্বর ব্রহ্মার সান্নিধ্যে থেকে কেবল তুমিই তাঁর উপাসনা কর।
Verse 13
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजड़मे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন— যখন এই জগৎ একার্ণব হয়ে যায় এবং স্থাবর-জঙ্গম সবই নষ্ট হয়; যখন দেব-অসুরের দল বিনষ্ট হয় এবং মহোরগ নাগরাও সম্পূর্ণ লুপ্ত হয়—সেই মহাপ্রলয়ে না সূর্য থাকে, না অগ্নি, না বায়ু, না চন্দ্র; না অন্তরীক্ষ, না পৃথিবী—কিছুই অবশিষ্ট থাকে না। তখন সমগ্র চল-অচল সেই এক জলরাশিতে ডুবে অদৃশ্য হয়। সেই সময় অমিতাত্মা ব্রহ্মাই স্থিত থাকেন, আর তাঁর ভক্তি-উপাসনাই অবশিষ্ট থাকে।
Verse 14
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् | त्वमेक: सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
পদ্ম ও উৎপলের ধামে শয়নকারী, অমিতাত্মা সর্বভূতেশ্বর ব্রহ্মার সেবায়-উপাসনায় কেবল তুমিই একা উপস্থিত থাক।
Verse 15
एतत् प्रत्यक्षत: सर्व पूर्व वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम्,द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ
হে দ্বিজোত্তম! এই সমগ্র প্রাচীন বৃত্তান্ত আপনার প্রত্যক্ষ অভিজ্ঞতায় বিদিত। অতএব আমি আপনার মুখে সেই কাহিনি শুনতে চাই, যা সকল ঘটনার অন্তর্নিহিত কারণ—কাল ও পরিস্থিতি—ব্যাখ্যা করে।
Verse 16
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'
হে দ্বিজোত্তম, হে বিপ্রবর! বহু যুগে আপনি একাই বারংবার বহু কিছু প্রত্যক্ষ করে অভিজ্ঞতা লাভ করেছেন। সমগ্র লোকসমূহে, কোনো কালেই এমন কিছু নেই যা আপনার অজানা।
Verse 17
मार्कण्डेय उदाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च
মার্কণ্ডেয় বললেন—তথাস্তु, শোনো; আমি তোমাকে এর বর্ণনা করব। প্রথমে স্বয়ম্ভূ প্রভুকে, আদিপুরুষকে—যিনি শাশ্বত ও অব্যয়—প্রণাম করে আমি আরম্ভ করছি।
Verse 18
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघत्र पीतवासा जनार्दन:
অব্যক্ত, অতিসূক্ষ্ম, নির্গুণ এবং তবু সকল গুণের আধার—হে পুরুষব্যাঘ্র, পীতবাস পরিধানকারী সেই জনার্দনই তিনি।
Verse 19
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभु: । अचिन्त्यं महदाश्चर्य पवित्रमिति चोच्यते
তিনি কর্তা এবং বিকর্তাও—যিনি ফলকে পরিবর্তিত ও বিধিবদ্ধ করেন। তিনি সকল ভুতের অন্তরাত্মা, ভুতস্রষ্টা, প্রভু। তাঁকে অচিন্ত্য, মহা-আশ্চর্য এবং পবিত্র বলা হয়।
Verse 20
मार्कण्डेयजी बोले--राजन! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्वर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ।। १७ -7१९ || अनादिनिधनं भूत॑ विश्वमव्ययमक्षयम् | एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे,इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি অনাদি ও অনন্ত; তিনিই এই বিশ্ব—অব্যয় ও অক্ষয়। তিনিই একমাত্র কর্তা; তাঁকে আর কোনো কর্তা সৃষ্টি করে না। আর পুরুষার্থ-সাধনাতেও তিনিই প্রধান কারণ।
Verse 21
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न त॑ विदुः । सर्वमाश्नर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम
বৈশম্পায়ন বললেন—যদি এই পুরুষ সত্যই তত্ত্বকে জানে, তবে বেদও তাকে ‘জানতে’ পারে না; তার অবস্থা অতিসূক্ষ্ম ও অগোচর। হে রাজশ্রেষ্ঠ! এ সবই বিস্ময়কর, কারণ সে সংসার-ব্যবহার থেকে নিবৃত্ত হয়ে বৈরাগ্যে স্থিত।
Verse 22
चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम्
বৈশম্পায়ন বললেন—তাঁরা বলেন, চার হাজার বছরই সেই কৃত (সত্য) যুগ।
Verse 23
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध: । चार हजार दिव्य वर्षोका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ।। २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই যুগের সন্ধ্যা একশো (দিব্য) বছরের, এবং সন্ধ্যাংশও তদ্রূপই। এভাবে চার হাজার দিব্য বছর সত্যযুগ বলা হয়েছে; আর আদ্য ও অন্ত্য সন্ধ্যা-সন্ধ্যাংশে একশো করে দিব্য বছর যোগ হলে মোট আটচল্লিশশো দিব্য বছর হয়। এরপর এখানে ত্রেতাযুগের কাল তিন হাজার (দিব্য) বছর বলা হয়েছে।
Verse 24
तथा वर्षसहसे द्वे द्वापरं परिमाणत:
বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ পরিমাপ অনুযায়ী দ্বাপর যুগ দুই হাজার বছরের।
Verse 25
सहस्रमेकं वर्षाणां तत: कलियुगं स्मृतम्,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
বৈশম্পায়ন বললেন—এর পরে কলিযুগের পরিমাণ এক হাজার দিব্য বর্ষ বলে স্মৃত। তারপর তার সন্ধ্যা একশো বর্ষ এবং সন্ধ্যাংশও একশো বর্ষ নির্ধারিত। এইভাবে কলিযুগ মোট বারোশো দিব্য বর্ষ; সন্ধ্যা ও সন্ধ্যাংশের পরিমাপ সমান বলেই ধারণ করো।
Verse 26
तस्य वर्षशतं संधि: संध्यांशश्व॒ ततः परम् | संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
তার (যুগের) সন্ধি একশো বর্ষ, এবং তার পর সন্ধ্যাংশও একশো বর্ষ। সন্ধি ও সন্ধ্যাংশ—উভয়ের পরিমাপ সমান বলে ধারণ করো।
Verse 27
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् । एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता,कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है
কলিযুগ ক্ষয়প্রাপ্ত হয়ে শেষ হলে আবার কৃত (সত্য) যুগ প্রবৃত্ত হয়। এইভাবেই ‘বারো-হাজার’ (দিব্য বর্ষের) নামে চতুর্যুগী প্রচারিত।
Verse 28
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाह्नतम् । विश्व हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते
এইভাবে সহস্র-পর্যন্ত বিস্তৃত এই মহৎ ব্রাহ্ম (ব্রহ্ম-সম্পর্কিত) বর্ণনা উচ্চারিত হয়েছে। কারণ ব্রহ্মের ভবনে অবস্থিত সমগ্র বিশ্ব সর্বদিকে ঘুরে ঘুরে চক্রাকারে পরিভ্রমণ করে।
Verse 29
अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ
কিন্তু হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যখন যুগান্তে অল্প সময় মাত্র অবশিষ্ট ছিল,
Verse 30
सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशो5नृतवादिन: । यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा
বৈশম্পায়ন বললেন—সহস্র বছরের অন্তে প্রায় সকল মানুষই অসত্যভাষী হয়ে ওঠে। হে পার্থ! তখন যজ্ঞও কেবল প্রতিনিধিমাত্র হয়ে যায়, দানও তেমনি প্রতিনিধিমাত্র।
Verse 31
व्रतप्रतिनिधिश्वैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं || २९-३० $ ।। ब्राह्मणा: शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जका:
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সময় ব্রত-আচারেরও কেবল প্রতিনিধিমাত্র প্রচলিত হয়। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ব্রাহ্মণরা শূদ্রের কর্মে প্রবৃত্ত হয়, আর শূদ্ররা ধনসঞ্চয়ে আসক্ত থাকে।
Verse 32
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—কলিযুগের শেষ ভাগে ব্রাহ্মণরা যজ্ঞ ও স্বাধ্যায় ত্যাগ করবে; দণ্ড ও মৃগচর্মও পরিত্যাগ করবে। ভক্ষ্য-অভক্ষ্যের বিচার ছেড়ে তারা যা পায় তাই খাওয়া-দাওয়া করবে। প্রিয় বৎস! ব্রাহ্মণরা জপ থেকে দূরে সরে যাবে, আর শূদ্ররা বৈদিক মন্ত্রজপে প্রবৃত্ত হবে।
Verse 33
ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्न॒ भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—কলিযুগে ব্রাহ্মণরা সর্বভক্ষী হবে, যা পাবে তাই ভক্ষণ করবে। প্রিয় বৎস! ব্রাহ্মণরা জপহীন হবে, আর শূদ্ররা জপে পরায়ণ হবে।
Verse 34
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् । बहवो म्लेच्छराजान: पृथिव्यां मनुजाधिप,नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—যখন লোকের ভাবনা ও আচরণ উল্টো হয়ে যায়, তখন সেটাই বিনাশের পূর্বলক্ষণ। হে মনুজাধিপ! তখন পৃথিবীতে বহু ম্লেচ্ছ রাজা শাসন করতে থাকে।
Verse 35
मृषानुशासिन: पापा मृषावादपरायणा: । आन्ध्रा: शका: पुलिन्दाश्न यवनाश्न नराधिपा:,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
বৈশম্পায়ন বললেন—ছলনায় শাসনকারী, পাপী ও মিথ্যায় আসক্ত রাজারা উঠবে। সেই সময় অন্ধ্র, শক, পুলিন্দ ও যবনই নৃপতি হবে।
Verse 36
काम्बोजा बाह्लिका: शूरास्तथा5<5भीरा नरोत्तम | न तदा ब्राह्मण: कश्रनित् स्वधर्ममुपजीवति,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরোত্তম, সেই সময় কাম্বোজ, বাহ্লীক এবং তদ্রূপ বীর আভীররা ক্ষমতায় থাকবে। তখন কোনো ব্রাহ্মণই স্বধর্ম অনুযায়ী জীবিকা নির্বাহ করতে পারবে না।
Verse 37
क्षत्रियाश्षापि वैश्याश्ष विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:,नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরাধিপ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্যরাও বিকর্মে প্রবৃত্ত হয়ে নিজেদের ধর্ম ত্যাগ করবে। লোকেরা হবে স্বল্পায়ু; তাদের শক্তি কমবে, আর তাদের তেজ ও পরাক্রম ক্ষীণ হবে।
Verse 38
अल्पसाराल्पदेहाश्व॒ तथा सत्याल्पभाषिण: । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिश:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—মানুষ হবে স্বল্পসার ও দুর্বলদেহী, আর তাদের বাক্যে সত্যের অংশ অতি সামান্য থাকবে। বহু জনপদ প্রায় জনশূন্য হয়ে যাবে, এবং দিকদিগন্ত মৃগ ও হিংস্র ব্যালে পরিপূর্ণ হবে।
Verse 39
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिन: । भोवादिनस्तथा शाद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिन:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—যুগান্ত উপস্থিত হলে লোকেরা উপলব্ধি ছাড়াই বৃথা ব্রহ্মবাদের কথা বলবে। শূদ্ররা দ্বিজদের ‘ভো’ বলে ডাকবে, আর ব্রাহ্মণরা শূদ্রদের ‘আর্য’ বলে সম্বোধন করবে।
Verse 40
युगान्ते मनुजव्याप्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्न सर्वगन्धा विशाम्पते,पुरुषसिंह राजन! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे
বৈশম্পায়ন বললেন— হে নরব্যাঘ্র! যুগান্তে নানাবিধ জীবজন্তু উদ্ভূত হয়। হে প্রজাপতি, হে পুরুষসিংহ, হে রাজন—তখন ঘ্রাণশক্তিসম্পন্নেরাও সুগন্ধকে যথার্থরূপে উপলব্ধি করতে পারে না; সকল গন্ধের প্রভাব ম্লান হয়ে যায়।
Verse 41
रसाश्च मनुजव्यात्र न तथा स्वादुयोगिन: । बहुप्रजा हस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता: । मुखे भगा: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
বৈশম্পায়ন বললেন— হে নরব্যাঘ্র! রসযুক্ত আহারও আর যথোচিত মধুর ও কল্যাণকর স্বাদ ধারণ করবে না। হে রাজন! যুগক্ষয়ে নারীরা খর্বকায়, বহু সন্তানপ্রসূ, অথচ শীল-সদাচারবর্জিতা হবে; এবং তারা মুখে সর্বদা কামবিষয়ক, ব্যভিচার-সম্বন্ধীয় কথাই উচ্চারণ করবে।
Verse 42
अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्षतुष्पथा: । केशशूला: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন! যুগক্ষয়ে জনপদসমূহ যেন অট্টশূল দ্বারা বিদ্ধ হবে; চতুষ্পথে ‘শিবশূল’-সদৃশ অমঙ্গলচিহ্ন দেখা দেবে; আর নারীরাও ‘কেশশূল’ নামক ব্যাধিতে পীড়িত হবে। এ সকলই যুগান্তের দুঃখময় লক্ষণ।
Verse 43
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন— হে জনাধিপ! যুগান্তে গাভীরা অল্প দুধ দেবে। বৃক্ষেও ফুল-ফল কম হবে, আর শুভ পাখির চেয়ে কাকই বেশি বসবাস করবে। এভাবে সমৃদ্ধি ও শুচিতা ক্ষীণ হবে এবং অশুভের প্রাধান্য বাড়বে।
Verse 44
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्नन्ति वै द्विजा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন— হে পৃথিবীপাল! ব্রহ্মহত্যার কলঙ্কে লিপ্ত এবং মিথ্যা নিন্দা-অপবাদকারী রাজাদের কাছ থেকেও দ্বিজেরা দান গ্রহণ করে। এটাই ধর্মক্ষয়ের লক্ষণ—লোভের বশে ধর্মধারীরাও পতনের পথে যায়।
Verse 45
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता: । भिक्षार्थ पृथिवीपाल चज्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:,राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! লোভ ও মোহে আচ্ছন্ন, মিথ্যা ধর্মের পতাকা ধারণকারী ব্রাহ্মণরা কেবল ভিক্ষাই চাইবে না; ভিক্ষার নাম করে তারা সর্বদিকের লোকদের উৎপীড়ন ও নিপীড়ন করবে।
Verse 46
करभारभयाद् भीता गृहस्था: परिमोषका: | मुनिच्छञाकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविन:
বৈশম্পায়ন বললেন—ভারী বোঝা বহনের ভয়ে ভীত সেই লুণ্ঠকেরা গৃহস্থের বেশ ধারণ করত। মুনির ছদ্মরূপে আচ্ছন্ন থেকে তারা বাণিজ্যকে জীবিকা করত—আর সেই আড়ালেই চুরি-লুণ্ঠন চালাত।
Verse 47
अर्थलोभान्नरव्याप्र तथा च ब्रह्म॒चारिण:
বৈশম্পায়ন বললেন—ধনের লোভে মানুষ ব্যগ্র হয়ে সংসারধর্মী কাজে ছুটে বেড়ায়; তেমনি ব্রহ্মচর্যব্রতধারীরাও এমন অস্থির প্রবৃত্তিতে টেনে নেওয়া যেতে পারে।
Verse 48
आश्रमेषु वृथाचारा: पानपा गुरुतल्पगा: । इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्
বৈশম্পায়ন বললেন—আশ্রমেও এমন লোক থাকবে যাদের আচরণ ফাঁপা—মদ্যপায়ী এবং গুরুর শয্যা লঙ্ঘনকারী। তারা এখানে কেবল লৌকিক লাভই চাইবে, মাংস ও রক্তের বৃদ্ধি—এইটিকেই লক্ষ্য করবে।
Verse 49
नरश्रेष्ठल धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मांमें ही लगे रहेंगे ।। बहुपाषण्डसंकीर्णा: परान्नगुणवादिन: । आश्रमा मनुजव्यात्र भविष्यन्ति युगक्षये,नरश्रेष्ठ) युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ! যুগান্তে সব আশ্রম নানা প্রকার পাষণ্ডে ভরে উঠবে। লোকেরা পরের কাছ থেকে পাওয়া অন্নেরই গুণগান করবে; আশ্রমধর্মের সার ক্ষয় হবে, অন্তরের সংযম রূপ নেবে বাহ্য চিহ্ন ও ক্ষুধার প্রদর্শনে।
Verse 50
यर्थर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासन: । न चापि सर्वबीजानि सम्यगू रोहन्ति भारत,भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे
যেমন ঋতুকালে যথাযথ বৃষ্টি বর্ষণ করাই ভগবানের বিধান, তেমনি পাকশাসন ইন্দ্রেরও উচিত সময়মতো জল বর্ষণ করা। হে ভারত! তিনি যদি যথাসময়ে বৃষ্টি না দেন, তবে ভূমিতে বোনা সব বীজও ঠিকমতো অঙ্কুরিত হবে না।
Verse 51
हिंसाभिरामश्न जनस्तथा सम्पद्यते5शुचि: । अधर्मफलमत्यर्थ तदा भवति चानघ,कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा
কলিযুগে লোকেরা হিংসাতেই আনন্দ খুঁজবে এবং আচরণে অপবিত্র হয়ে উঠবে। হে নিষ্পাপ! সেই সময় অধর্মের ফল অত্যন্ত প্রবল ও বিপুল হবে।
Verse 52
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः । अल्पायु: स हि मन्तव्यो न हि धर्मो5स्ति कश्नन,भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा
আর তখন, হে ভূপাল! যে রাজা ধর্মে অবিচল থাকবে, তাকে স্বল্পায়ু বলেই গণ্য করা হবে; কারণ সেই সময় কোনো ধর্মই স্থায়ী হবে না।
Verse 53
भूयिष्ठं कूटमानैश्व पण्यं विक्रीणते जना: । वणिजकश्न नरव्यात्र बहुमाया भवन्त्युत,लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठीी उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे
সেই সময় লোকেরা অধিকাংশই ভুয়া ওজন-মাপে পণ্য বিক্রি করবে। হে নরশ্রেষ্ঠ! বণিকরাও নানা কৌশল ও প্রতারণায় পারদর্শী—ধূর্ত—হয়ে উঠবে।
Verse 54
धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जन: । धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्ष बली तथा,धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा
ধর্মনিষ্ঠরা অবহেলিত হয়ে ক্ষীণ হবে, আর অধিক পাপী লোকেরা বাড়তে-ফুলতে থাকবে। ধর্মের শক্তি হ্রাস পাবে, আর অধর্মই প্রবল হয়ে উঠবে।
Verse 55
अल्पायुषो दरिद्राश्न॒ धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुष: समृद्धाश्व विधर्माणो युगक्षये,युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे
বৈশম্পায়ন বললেন—যুগান্তে ধর্মনিষ্ঠ মানুষও স্বল্পায়ু ও দরিদ্র বলে দেখা যাবে; আর অধর্মাচারীরা দীর্ঘায়ু ও সমৃদ্ধ বলে প্রতীয়মান হবে।
Verse 56
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठिरुपायैश्व प्रजा व्यवहरन्त्युत,युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—যুগান্তে নগরের উদ্যান-বিহারে ধর্মচ্যুত লোকেরা জড়ো হয়ে আস্তানা গাড়বে; এবং অধর্মময় কৌশলে প্রজাদের সঙ্গে দুর্ব্যবহার করবে।
Verse 57
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याब्यमदान्विता: । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, সামান্য ধন সঞ্চয় হলেই মানুষ সমৃদ্ধির মদে উন্মত্ত হয়। আর বিশ্বাস করে যে ধন আমানত (নিক্ষেপ) রাখা হয়, বহু লোক পরস্পর যোগসাজশে তা গ্রাস করতে চায় এবং নির্লজ্জভাবে বলে—‘এখানে তোমার কিছুই নেই।’
Verse 58
हर्तु व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विता: । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, পাপাচারে নিমগ্ন ও গ্রাস করার সংকল্পে স্থির নির্লজ্জ মানুষ এমনও বলবে—‘এটা তো আদৌ নেই।’
Verse 59
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणो5थ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते,मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—মানুষভক্ষী জীব—পাখি ও মৃগও—নগরের উদ্যান-বিহারে এবং চৈত্য-দেবালয়েও শুয়ে থাকবে।
Verse 60
सप्तवर्षष्टवर्षाश्च स्त्रियों गर्भधरा नूप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्र: प्रजायते,राजन! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, সেই যুগান্তের অবক্ষয়ের কালে সাত-আট বছরের কন্যারাও গর্ভধারণ করবে, আর দশ-বারো বছরের বালকরাও পুত্র উৎপন্ন করবে।
Verse 61
भवन्ति षोडशे वर्षे नरा: पलितिनस्तथा । आयु:क्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते,सोलहवें वर्षमें मनुष्योंक बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी
বৈশম্পায়ন বললেন—ষোলো বছরেই মানুষের চুল পেকে যাবে; আর মানুষের আয়ু দ্রুত ক্ষয়প্রাপ্ত হয়ে অচিরেই শেষ হবে।
Verse 62
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिन: । तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते,महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका- सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ, তখন তরুণেরা হবে স্বল্পায়ু এবং তাদের স্বভাব-চরিত্র হবে বৃদ্ধদের মতো; আর তরুণদের যে স্বভাব হওয়া উচিত, তা দেখা দেবে বৃদ্ধদের মধ্যেই।
Verse 63
विपरीतास्तदा नार्यो वज्चयित्वारहत: पतीन् | व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासै: पशुभिरेव च,उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন বিপরীত স্বভাবের নারীরা যোগ্য স্বামীদেরও প্রতারণা করে কুশীল হবে, এবং দাসদের সঙ্গে, এমনকি পশুদের সঙ্গেও ব্যভিচারে লিপ্ত হবে।
Verse 64
वीरपत्न्यस्तथा नार्य: संश्रयन्ति नरान् नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत,राजन! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, বীরপুরুষদের পত্নীরাও পরপুরুষের আশ্রয় নেবে; এবং স্বামী জীবিত থাকলেও অন্যদের সঙ্গে ব্যভিচার করবে।
Verse 65
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुष: क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी,महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोतक वृष्टि बंद हो जाती है
হে মহারাজ! সহস্র যুগের অন্ত উপস্থিত হলে এবং আয়ু ক্ষয়ের দিকে গড়ালে বহু-বৎসরব্যাপী অনাবৃষ্টি দেখা দেয়—বহু বছর বৃষ্টি বন্ধ থাকে।
Verse 66
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते,पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं
তখন, হে পৃথিবীপতি! অল্পশক্তিসম্পন্ন সেই প্রাণীরা ক্ষুধায় কাতর হয়ে পৃথিবীতে অধিকাংশই বিনাশের মুখে পতিত হয়।
Verse 67
ततो दिनकरेदीप्तै: सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिल ॑ सर्व समुद्रेषु सरित्सु च,नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं
তারপর, হে মনুষ্যাধিপ! সাতটি সূর্য তাদের প্রখর দীপ্তিতে সমুদ্র ও নদীনালার সমস্ত জল শুষে নেয়।
Verse 68
यच्च काष्ठ॑ तृणं चापि शुष्कं चार्द्र च भारत । सर्व तद् भस्मसाद् भूत॑ दृश्यते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं
হে ভারত! কাঠ ও তৃণ—শুকনো হোক বা সিক্ত—সবই ভস্মীভূত হয়ে দেখা যায়, হে ভরতশ্রেষ্ঠ!
Verse 69
तत: संवर्तको वह्निवायुना सह भारत | लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम्,भारत! इसके बाद '“संवर्तक” नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है
তারপর, হে ভারত! আগে সাত সূর্য যেসব লোকের জল শুষে নিয়েছিল, সেই লোকসমূহে বায়ুর সঙ্গে প্রলয়াগ্নি ‘সংবর্তক’ প্রবেশ করে সর্বত্র বিস্তার লাভ করে।
Verse 70
ततः स पृथिवीं भिनत्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्,तत्पश्चात् पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है
তখন তা পৃথিবী বিদীর্ণ করে রসাতলে প্রবেশ করে এবং দেবতা, দানব ও যক্ষদের মধ্যে মহাভয় সঞ্চার করে।
Verse 71
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किज्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्व नाशयते क्षणात्,राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है
হে রাজন! নাগলোক দগ্ধ করতে করতে, এই পৃথিবীতে যা কিছু আছে এবং এর নীচে যা কিছু আছে—সবই সে ক্ষণমাত্রে বিনাশ করে দেয়।
Verse 72
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोडनल:,इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है
তারপর অমঙ্গলসূচক প্রবল বায়ু ওঠে, আর তার সঙ্গে সংবর্তক অগ্নি; উভয়ে মিলিত হয়ে বাইশ হাজার যোজন বিস্তৃত অঞ্চলে সকলকে দগ্ধ করে ভস্ম করে দেয়।
Verse 73
सदेवासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्त: स सर्वमेव जगद् विभु:,इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है
তখন সেই সর্বব্যাপী প্রজ্বলিত অগ্নি দেব, অসুর, গন্ধর্ব, যক্ষ, নাগ ও রাক্ষসসহ সমগ্র জগতকে দগ্ধ করে ভস্ম করে দেয়।
Verse 74
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिता: । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शना:,इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है
এরপর আকাশে এক আশ্চর্য দৃশ্য দেখা দেয়—হাতির পালের মতো বিশাল, শ্যামবর্ণ এবং বিদ্যুতের মালায় ভূষিত মহামেঘসমূহ উঠতে থাকে।
Verse 75
केचिन्नीलोत्पलश्यामा: केचित् कुमुदसंनि भा: । केचित् किज्जल्कसंकाशा: केचित् पीता: पयोधरा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—কিছু মেঘ নীলপদ্মের মতো শ্যাম, কিছু কুমুদফুলের মতো শুভ্র। কিছু পরাগের বর্ণের ন্যায় দীপ্ত, আর কিছু জলধর হলুদের মতো পীতবর্ণ প্রতীয়মান হয়।
Verse 76
केचिद्धारिद्रसंकाशा: कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभा: केचिद्धिड्डुलसप्रभा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—কিছু মেঘ হলুদের মতো পীত, কিছু কারণ্ডব পাখির মতো দেখায়। কিছু পদ্মপাতার মতো দীপ্ত, আর কিছু হিঙ্গুল (সিঁদুর)-এর মতো আরক্ত আভাযুক্ত।
Verse 77
केचित् पुरवराकारा: केचिद् गजकुलोपमा: । केचिदञ्जनसंकाशा: केचिन्मकरसंनिभा:,कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—কিছু ছিল উৎকৃষ্ট নগরের মতো আকৃতিবিশিষ্ট, কিছু হাতির পালের মতো। কিছু অঞ্জন (কাজল)-সম কৃষ্ণ, আর কিছু মকর (কুমির)-সদৃশ আকারের।
Verse 78
विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, বিদ্যুৎ-মালায় অলংকৃত ঘন মেঘ উঠতে থাকে। ভয়ংকর গর্জনে তাদের রূপ আরও ভয়াবহ হয়। তারপর সেই সকল জলধর ছড়িয়ে পড়ে সমগ্র আকাশমণ্ডল আচ্ছাদিত করে।
Verse 79
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता,महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें ड्ूबकर सब ओरसे भर जाती है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, তারা বর্ষণ করলে পর্বত, বন ও খনিসহ এই সমগ্র পৃথিবী প্রবল জলস্রোতের রাশিতে প্লাবিত হয়ে চারিদিকে পূর্ণ হয়ে ওঠে।
Verse 80
ततस्ते जलदा घोरा राविण: पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिता: परमेछ्िना,पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं
তখন, হে পুরুষশ্রেষ্ঠ, সেই ভয়ংকর গর্জনকারী মেঘগুলি—বিধাতার প্রেরণায়—শীঘ্রই চারিদিকে বর্ষণ করে সর্বত্র জলমগ্ন করে দিল।
Verse 81
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम्,महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं
প্রচুর জলধারা বর্ষণ করে পৃথিবীকে প্লাবিত করে সেই মেঘগুলি সেই অতিশয় ভয়ংকর, অশুভ ও রৌদ্র অগ্নিকেও নির্বাপিত করে দেয়।
Verse 82
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभि: पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना,तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं
তারপর প্রলয়কালে, মহাত্মার প্রেরণায় সেই জলধর মেঘগুলি বারো বছর ধরে অবিরাম ধারায় বর্ষণ করে পৃথিবীকে সর্বত্র পূর্ণ করে তোলে।
Verse 83
ततः समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति,भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है
হে ভারত, তারপর সমুদ্র নিজের তটরেখা অতিক্রম করে; পর্বতসমূহ বিদীর্ণ হয়, আর পৃথিবী জলে নিমজ্জিত হয়ে যায়।
Verse 84
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:,तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं
তারপর চারিদিকে বিভ্রান্ত হয়ে তারা আকাশমণ্ডলকে আচ্ছাদিত করে; কিন্তু প্রবল বায়ুবেগে আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে ছিন্নভিন্ন হয়ে হঠাৎই অদৃশ্য হয়ে যায়।
Verse 85
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूमनुजाधिप । आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत,नरेश्वरर इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं
তখন, হে নরাধিপ, সেই ভয়ংকর বায়ুকে পদ্মনিবাসী আদিদেব স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা গিলে নেন; তা পান করে, হে ভারত, তিনি নিদ্রায় নিমগ্ন হন।
Verse 86
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजड्रमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
সেই ভয়ংকর একার্ণবে, যখন স্থাবর-জঙ্গম সমস্ত সৃষ্টি বিনষ্ট হল, দেব-অসুরদের দল লুপ্ত হল, এবং যক্ষ-রাক্ষসও অনুপস্থিত—তখন সেই ভীতিকর বিস্তার শূন্য হয়ে রইল।
Verse 87
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् भ्रमाम्पेकोडहमाहत:,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
হে মহীপাল, এই জগতে না মানুষ ছিল, না পশুপাখি, না বৃক্ষ; মধ্যলোকের সত্তারাও ছিল না—এমন অবস্থায় আমি একা, আঘাতপ্রাপ্তের মতো, এদিক-ওদিক ঘুরে বেড়ালাম।
Verse 88
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम | अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:,नृपश्रेष्ठी एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई
হে পার্থিবোত্তম, সেই ভয়ংকর একার্ণব-জলে বিচরণ করতে করতে যখন আমি কোথাও কোনো প্রাণী দেখলাম না, তখন আমি গভীর ব্যাকুলতায় আচ্ছন্ন হলাম।
Verse 89
ततः सुदीर्घ गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:,नरेश्वरर उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला
তখন, হে নরাধিপ, আলস্য না করে আমি দীর্ঘকাল বহু দূর সাঁতরে গেলাম; কিন্তু শেষে অত্যন্ত ক্লান্ত হয়ে পড়লাম, আর কোথাও কোনো আশ্রয় পেলাম না।
Verse 90
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते,राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा
তখন একদিন, হে পৃথিবীপতি রাজন, সেই বিপুল জলসমুদ্রে আমি এক অতি মহান ও বিস্তীর্ণ বটবৃক্ষ দেখলাম।
Verse 91
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यड्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
হে নরাধিপ, হে পৃথিবীপাল! সেই বৃক্ষের বিস্তৃত প্রশাখার উপর এক শয্যা ছিল, যা দিব্য শয্যাবস্ত্রে আচ্ছাদিত।
Verse 92
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसद्शाननम् | फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
হে মহারাজ, হে ভারত! আমি সেখানে এক বালককে উপবিষ্ট দেখলাম—তার মুখ পদ্ম ও চন্দ্রের ন্যায় মনোহর, আর তার চোখ প্রস্ফুটিত পদ্মপত্রের মতো বিশাল।
Verse 93
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत् | कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते,पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा--'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?”
হে পৃথিবীপাল! তাকে দেখে আমার মধ্যে মহাবিস্ময় জাগল। আমি ভাবলাম—“লোকের বিনাশ হয়ে গেলে, এই শিশু এখানে কীভাবে শুয়ে আছে?”
Verse 94
तपसा चिन्तयंश्वापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप,नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका
হে নরাধিপ! তপস্যা করে ধ্যানমগ্ন হয়েও আমি সেই শিশুর বিষয়ে কিছুই জানতে পারলাম না; যদিও আমি অতীত, বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—তিন কালই জানি।
Verse 95
अतसीपुष्पवर्णा भ: श्रीवत्सकृतभूषण: । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे,उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था
বৈশম্পায়ন বললেন—তার দেহকান্তি অতসীফুলের মতো শ্যাম-নীল ছিল। তার বক্ষস্থল শ্রীবৎসচিহ্নে বিভূষিত ছিল। সেই সময় সে আমার কাছে যেন স্বয়ং লক্ষ্মীর নিবাসস্থানরূপে প্রতিভাত হয়েছিল।
Verse 96
ततो मामब्रवीद् बाल: स पद्मनिभलोचन: । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक््यं श्रुतिसुखावहम्
তখন সেই দীপ্তিমান বালক—পদ্মসম নয়নবিশিষ্ট ও শ্রীবৎসধারী—আমাকে শ্রবণসুখদ বাক্যে সম্বোধন করল।
Verse 97
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाड्क्षिणम् । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव
“আমি জানি তুমি ক্লান্ত, তাই বিশ্রাম কামনা করছ। হে মার্কণ্ডেয়, হে ভার্গব—যতক্ষণ ইচ্ছা এখানে থাকো।”
Verse 98
मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा--'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वास: प्रसादस्ते कृतो मया,“'मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है”
বৈশম্পায়ন বললেন—আমাকে বিস্ময়ে নিমগ্ন দেখে সেই পদ্মনয়ন, শ্রীবৎসধারী, দীপ্তিমান বালক শ্রবণসুখদ বাক্যে বলল—“ভৃগুবংশীয় মার্কণ্ডেয়! আমি তোমাকে চিনি। তুমি অত্যন্ত ক্লান্ত এবং বিশ্রাম কামনা করছ। যতক্ষণ ইচ্ছা এখানে বসে থাকো। আবার সে বলল—‘হে মুনিশ্রেষ্ঠ, আমার দেহের অন্তরে প্রবেশ করে বিশ্রাম করো। সেখানে তোমার বাসের ব্যবস্থা করা হয়েছে; আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন হয়েছি।’”
Verse 99
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्थासीत् तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत,उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! সেই বালক এভাবে বলতেই, সেই মুহূর্তে আমার দীর্ঘ জীবন এবং মানবত্বের প্রতিও গভীর অনাসক্তি ও বিষাদ জেগে উঠল।
Verse 100
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वकत्रे दैवयोगात् प्रवेशित:,तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया
তখন সেই বালক হঠাৎ করে তার মুখ প্রশস্ত করে খুলল। আর দैবযোগে আমি—অসহায়, যেন বাধ্য হয়ে—তার মুখের ভিতরে প্রবেশ করলাম।
Verse 101
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णा कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम्,राजन! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी
হে নরাধিপ! তাতে প্রবেশ করামাত্রই আমি হঠাৎ সেই বালকের উদরের ভিতরে পৌঁছে গেলাম। সেখানে আমি রাজ্য ও নগরে পরিপূর্ণ সমগ্র পৃথিবীকে দেখলাম।
Verse 102
गड्डां शतद्रं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् । चर्मण्वतीं वेत्रवर्ती चन्द्रभागां सरस्वतीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
হে নরশ্রেষ্ঠ! তারপর আমি সেই মহাত্মা বালকের উদরের ভিতরে বিচরণ করতে লাগলাম। বিচরণ করতে করতে সেখানে আমি গঙ্গা, শতদ্রু, সীতা, যমুনা, কৌশিকী, চর্মণ্বতী, বেত্রবতী, চন্দ্রভাগা ও সরস্বতী—এই পবিত্র নদীগুলিকে দেখলাম।
Verse 103
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
হে ভারত! সেখানে আমি সিন্ধু, বিপাশা এবং গোদাবরী নদীকেও দেখলাম; তদ্রূপ বস্বোকসারা, নলিনী ও নর্মদাকেও।
Verse 104
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
সেখানে আমি তাম্রা নদী, বেণা, কল্যাণবাহী পুণ্যতোয়া—পবিত্র জলের সেই নদী—এবং সুবেণা, কৃষ্ণবেণা ও মহানদী ইরামাকেও দেখলাম।
Verse 105
वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याप्र विशल्यां किम्पुनामपि,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ, নরব্যাঘ্র! আমি বিতস্তা, মহা নদী কাবেরী, শোণ, বিশল্যা এবং কিম্পুনা নদীকেও দেখলাম।
Verse 106
एताश्षान्याश्व नद्यो5हं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मन:,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
নরশ্রেষ্ঠ! সেই মহাত্মার উদরের মধ্যে বিচরণ করতে করতে আমি এই সব নদী এবং পৃথিবীতে প্রবাহিত অন্যান্য নদীগুলিও দেখলাম।
Verse 107
ततः समुद्र पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्,शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा
তারপর, অমিত্রঘ্ন! আমি জলচরগণের দ্বারা নিত্যসেবিত, অগাধ জলের শ্রেষ্ঠ ভাণ্ডার, রত্নাকর সমুদ্রকে দেখলাম।
Verse 108
तत्र पश्यामि गगन चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभि: पावकार्कसमप्रभम्,वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था
সেখানে আমি চন্দ্র-সূর্যে শোভিত আকাশমণ্ডল দেখলাম—অসীম তেজে প্রজ্বলিত, অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান।
Verse 109
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसड्कुलाम् ।) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:,राजन! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे
রাজন! আমি সেই ভূমিকে দেখলাম—বহু কাননে শোভিত, পর্বত-অরণ্য-দ্বীপে চিহ্নিত, শত শত নদী-নালায় পরিপূর্ণ। সেই সময়ে, রাজন, ব্রাহ্মণগণ বহু যজ্ঞের দ্বারা যজ্ঞপুরুষ দেবতাকে যথাযথভাবে পূজা করতেন।
Verse 110
क्षत्रियाश्ष प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै: । वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप,नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोकी प्रजाका अनुरंजन करते--सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे
বৈশম্পায়ন বললেন— ক্ষত্রিয়েরা সকল বর্ণের মনোরঞ্জন করে নিজেদের ধর্ম পালন করত, সকলকে সুখী ও প্রসন্ন রাখত। আর হে নরাধিপ! বৈশ্যেরা ন্যায় ও বিধি অনুসারে কৃষিকর্ম ও বাণিজ্য পরিচালনা করত।
Verse 111
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा । ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
বৈশম্পায়ন বললেন— সে সময় শূদ্রেরা তিন দ্বিজজাতির সেবা-শুশ্রূষায় নিবিষ্ট ছিল। তারপর, হে রাজন! সেই মহাত্মার উদরের মধ্যে বিচরণ করতে করতে আমি বহু পর্বত দেখলাম— হিমবান, হেমকূট, নিষধ, রজত-দ্যুতিময় শ্বেতগিরি, গন্ধমাদন, মন্দরাচল, মহাগিরি নীল, স্বর্ণময় মেরু, মহেন্দ্র, উত্তম বিন্ধ্য, মলয় ও পারিয়াত্র— এবং আরও অনেক; সকলেই নানা রত্নে অলংকৃত। সেখানে ঘুরে বেড়াতে বেড়াতে সিংহ, ব্যাঘ্র ও বরাহ প্রভৃতি পশুও দেখলাম।
Verse 112
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् । निषध॑ चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
আমি হিমবানকে দেখি, হেমকূট পর্বতকেও দেখি; নিষধকেও দেখি, আর রজত-দ্যুতিময় শ্বেতগিরিকেও দেখি।
Verse 113
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् । मन्दरं मनुजव्याप्र नीलं चापि महागिरिम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
হে মহীপাল! আমি গন্ধমাদন পর্বতকে দেখি; আর হে মনুষ্যব্যাঘ্র! মন্দর ও মহাগিরি নীলকেও দেখি।
Verse 114
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् | महेन्द्र चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
হে মহারাজ! আমি স্বর্ণপর্বত মেরুকে দেখি; মহেন্দ্রকেও দেখি, আর উত্তম পর্বত বিন্ধ্যকেও দেখি।
Verse 115
मलयं चापि पश्यामि पारियात्र च पर्वतम् | एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
বৈশম্পায়ন বললেন—আমি মালয় পর্বতমালা ও পারিয়াত্র পর্বতও দেখলাম; আর এদের ছাড়াও পৃথিবীকে ধারণকারী অসংখ্য পর্বত। সেই মহাত্মা শিশুর উদরের মধ্যে বিচরণ করতে করতে আমার দৃষ্টিতে হিমবান, হেমকূট, নিষধ, রজতযুক্ত শ্বেতগিরি, গন্ধমাদন, মন্দরাচল, মহাগিরি নীল, সুবর্ণময় মেরু, মহেন্দ্র, উত্তম বিন্ধ্য, মালয় ও পারিয়াত্র—এই সব পর্বত উদ্ভাসিত হল। সকলেই নানা রত্নে অলংকৃত ছিল।
Verse 116
तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता: । सिंहान् व्याप्रान् वराहांश्न॒ पश्यामि मनुजाधिप,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
তার উদরের মধ্যে আমি সবকিছুই রত্নে বিভূষিত দেখলাম। হে মনুষ্যাধিপ, সেখানে বিচরণ করতে করতে আমি সিংহ, ব্যাঘ্র ও বরাহও দেখলাম।
Verse 117
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा,पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा
হে জগতীপতি, পৃথিবীতে যত জীব আছে, তাদের সকলকেই সেখানে দেখতে দেখতে আমি তখন বিচরণ করছিলাম।
Verse 118
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्ट: संचरन् दिश: । शक्रादींश्वापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम्,नरश्रेष्ठ उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए
হে নরব্যাঘ্র, সেই শিশুর উদরে প্রবেশ করে আমি সকল দিকেই বিচরণ করলাম; এবং সেখানে ইন্দ্র প্রভৃতি সমগ্র দেবগণকেও দেখলাম।
Verse 119
साध्यान् रुद्रांस्तथा5<दित्यान् गुह्मकान् पितरस्तदा । सर्पान् नागान् सुपर्णाश्च वसूनप्यश्चिनावपि,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
বৈশম্পায়ন বললেন—হে পৃথিবীপতি, আমি সাধ্য, রুদ্র ও আদিত্যদের; গুহ্যক ও পিতৃগণকে; সর্প, নাগ ও সুপর্ণদের; বসুগণ এবং অশ্বিনীকুমারদ্বয়কেও দেখলাম। গন্ধর্ব, অপ্সরা, যক্ষ ও ঋষিদেরও দর্শন পেলাম। দৈত্য-দানবদের দল, সিংহিকার পুত্র—রাহু প্রভৃতি—এবং অন্যান্য দেবশত্রুকেও দেখলাম। হে নৃপ, এই জগতে আমি যা কিছু স্থাবর-জঙ্গম দেখেছিলাম, তার সবই সেই মহাত্মার কুক্ষিতে আমার দৃষ্টিগোচর হল। আর মহারাজ, আমি প্রতিদিন ফলাহার করে এই সমগ্র লোকের মধ্যে বিচরণ করে থাকি।
Verse 120
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानषींश्वैव महीपते । देत्यदानवसड्घांश्व नागांश्न मनुजाधिप,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
বৈশম্পায়ন বললেন— হে মহীপতি, মনুজাধিপ, পৃথিবীপতে! আমি গন্ধর্ব ও অপ্সরা, যক্ষ ও ঋষি, দৈত্য-দানবদের দল এবং নাগদেরও দেখেছি। সাধ্য, রুদ্র, আদিত্য, গুহ্যক, পিতৃগণ, সর্প ও নাগ, সুপর্ণ, বসুগণ, অশ্বিনী-কুমারদ্বয়, গন্ধর্ব, অপ্সরা, যক্ষ এবং আরও অনেককে আমি দর্শন করেছি। সিংহিকার পুত্র (রাহু প্রভৃতি) ও অন্যান্য দেবশত্রুকেও দেখেছি। রাজন! এই জগতে আমি যা কিছু স্থাবর-জঙ্গম দেখেছিলাম, তা সবই সেই মহাত্মার উদরে আমার দৃষ্টিগোচর হল। মহারাজ! আমি প্রতিদিন ফলাহার করে এই সমগ্র জগতে বিচরণ করি।
Verse 121
सिंहिकातनयांश्वापि ये चान्ये सुरशत्रव: । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
বৈশম্পায়ন বললেন— আমি সিংহিকার পুত্রদেরও এবং অন্যান্য দেবশত্রুদেরও দেখেছি। আর এই জগতে আমি যা কিছু কখনও দেখেছি—স্থাবর হোক বা জঙ্গম—হে পৃথিবীপতে, তা সবই সেই মহাত্মার উদরের মধ্যে আমার কাছে প্রত্যক্ষ হল। আমি সাধ্য, রুদ্র, আদিত্য, গুহ্যক, পিতৃগণ; সর্প ও নাগ, সুপর্ণ, বসুগণ, অশ্বিনী-কুমারদ্বয়; গন্ধর্ব, অপ্সরা, যক্ষ ও ঋষিদের দেখেছি। দৈত্য-দানবদের দল, নাগ, সিংহিকার পুত্র (রাহু প্রভৃতি) এবং অন্যান্য দেবশত্রুকেও দেখেছি। রাজন! অস্তিত্বের যে সমগ্র বিস্তার আমি দেখেছিলাম, তা সবই তাঁর মধ্যে একত্রিত হয়ে আমার দৃষ্টিতে ধরা দিল। আর, হে মহারাজ, আমি প্রতিদিন ফলাহার করে এই সমগ্র জগতে বিচরণ করতে থাকলাম।
Verse 122
सर्व पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन: । चरमाण: फलाहार: कृत्स्नं जगदिदं विभो,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
বৈশম্পায়ন বললেন— রাজন! আমি সেই মহাত্মার উদরের মধ্যে সবই দেখি। হে বিভো, হে পৃথিবীপতে! ফলাহার করে বিচরণ করতে করতে আমি সেখানে এই সমগ্র জগতকে দেখেছি।
Verse 123
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् । न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन,उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षमे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया
বৈশম্পায়ন বললেন— সেই বালকের দেহের ভিতরে আমি একশো বছরেরও অধিককাল ঘুরে বেড়ালাম; তবু কোনো সময়েই তার দেহের শেষ সীমা দেখতে পেলাম না।
Verse 124
सततं धावमानश्ष् चिन्तयानो विशाम्पते । (भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् ।) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मन:,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
বৈশম্পায়ন বললেন— হে বিশাম্পতে! আমি অবিরাম দৌড়োচ্ছিলাম এবং উদ্বেগচিন্তায় নিমগ্ন ছিলাম। হে মহীপাল! সেখানে বহু বছর ঘুরে বেড়িয়েও, রাজন, সেই মহাত্মার দেহের শেষ সীমা আমি পেলাম না। তখন, হে রাজন, মন, বাক্য ও কর্ম দ্বারা—বিধিপূর্বক—আমি সেই বরদায়ক ও সর্বশ্রেষ্ঠ দেবতার শরণ নিলাম।
Verse 125
ततस्तमेव शरणं गतो<5स्मि विधिवत् तदा । वरेण्यं वरदं देव॑ं मनसा कर्मणैव च,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
তখন আমি যথাবিধি সেই-ই দেবতার শরণ নিলাম—যিনি বরণীয় এবং বরদাতা; মনেও, কর্মেও তাঁকেই আশ্রয় করলাম। হে যুধিষ্ঠির! আমি অবিরাম ছুটে বেড়াতাম, উৎকণ্ঠায় আচ্ছন্ন থাকতাম; আর বহু বছর ঘুরেও যখন সেই মহাত্মার দেহের অন্ত পেলাম না, তখন মন, বাক্য ও ক্রিয়ার দ্বারা সেই বরদাতা, পরম পূজনীয় দেবতারই শরণাপন্ন হলাম।
Verse 126
ततो<5हं सहसा राजन् वायुवेगेन नि:सृतः । महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम,पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया
তারপর, হে রাজন, আমি হঠাৎই বায়ুর বেগে সেই মহাত্মার উন্মুক্ত মুখপথ দিয়ে বাইরে বেরিয়ে এলাম। হে পুরুষরত্ন যুধিষ্ঠির! তাঁর শরণ নিতেই আমি এভাবে দ্রুত নিষ্ক্রান্ত হলাম।
Verse 127
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
তারপর, হে বিশাম্পতে, বাইরে বেরিয়ে আমি দেখলাম—সেই বটগাছের সেই-ই ডালে, সেই-ই বালকবেশে, সেই মনুষ্যশার্দূল পূর্বের মতো বসে আছে, যেন সমগ্র জগৎকে নিজের উদরে ধারণ করে রেখেছে।
Verse 128
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् | आसीन तं॑ नरव्याप्र पश्याम्यमिततेजसम्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
হে নরব্যাঘ্র, হে নরশ্রেষ্ঠ রাজন! বাইরে এসে আমি দেখলাম—সেই-ই বালকবেশে, শ্রীবৎসচিহ্নে চিহ্নিত, অপরিমেয় তেজস্বী সেই বালকটি; সে সেই বটগাছের ডালে পূর্বের মতো বসে আছে, যেন সমগ্র জগৎকে নিজের উদরে ধারণ করে রেখেছে।
Verse 129
ततो मामब्रवीद् बाल: स प्रीत: प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युति:,तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा--
তখন সেই মহাদ্যুতিমান, পীতবস্ত্রধারী, শ্রীবৎসচিহ্নে ভূষিত দীপ্তিমান বালকটি প্রসন্ন হয়ে, যেন মৃদু হাসিতে, আমাকে বলল।
Verse 130
अपीदानीं शरीरेडस्मिन् मामके मुनिसत्तम | उषितस्त्व॑ सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे,“'मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ”
বৈশম্পায়ন বললেন— হে মুনিশ্রেষ্ঠ মার্কণ্ডেয়! তুমি কি এখন আমার এই দেহের মধ্যে অবস্থান করে সম্পূর্ণ বিশ্রাম লাভ করেছ? আমাকে বলো।
Verse 131
मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्,फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा
বৈশম্পায়ন বললেন— অল্পক্ষণ পরেই আমার মধ্যে আবার এক নব দৃষ্টি উদিত হল; তার দ্বারা আমি নিজেকে মায়া থেকে মুক্ত ও পূর্ণ চেতনায় প্রতিষ্ঠিত—মন পুনরুদ্ধার ও স্থির—দেখতে পেলাম।
Verse 132
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिषछ्ितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरड्जुलीभिविराजितौ
বৈশম্পায়ন বললেন— হে প্রিয়! তার পদযুগল—তাম্রবর্ণ তলবিশিষ্ট—দৃঢ়ভাবে স্থিত ছিল। সুগঠিত ও মনোহর, কোমল লালিমাযুক্ত আঙুলিতে তারা দীপ্ত ছিল।
Verse 133
दृष्टवा परिमितं तस्य प्रभावममितौजस:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
সীমিত অথচ আশ্চর্য সেই অসীম-শক্তিধরের প্রভাব দেখে, এবং অনন্ত দীপ্তিময় সেই শিশুকে নীরিক্ষণ করে, আমি যত্নসহকারে তার নিকটে গেলাম। বিনীত হয়ে করজোড়ে আমি পদ্মনয়ন দেবকে—সকল জীবের অন্তরাত্মাকে—দর্শন করলাম।
Verse 134
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचन:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
বিনীতভাবে করজোড়ে, এবং যত্নসহকারে তার নিকটে গিয়ে, আমি সেই পদ্মনয়ন দেবকে দর্শন করলাম—যিনি সকল জীবের অন্তরাত্মা।
Verse 135
तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमन्रुवम् । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्,फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा--देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ
তখন আমি করজোড়ে প্রণাম করে এই কথা বললাম— “দেব! আমি আপনাকে এবং আপনার এই পরম মায়াকে জানতে চাই।”
Verse 136
आस्थयेनानुप्रविष्टो5हं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते,'भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोका अवलोकन किया है
বৈশম্পায়ন বললেন— “ভগবান! আপনার মুখপথ দিয়ে আপনার দেহে প্রবেশ করে আমি আপনার উদরের মধ্যে সমগ্র জগৎ—সবকিছু সম্পূর্ণরূপে—দেখেছি।”
Verse 137
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसा: । यक्षगन्धर्वनागाश्न जगत् स्थावरजड्रमम्
বৈশম্পায়ন বললেন— “দেব! আপনার দিব্য দেহে দেবতা, দানব ও রাক্ষস; যক্ষ, গন্ধর্ব ও নাগও—এবং সমগ্র জগৎ, স্থাবর ও জঙ্গম—অবস্থান করে।”
Verse 138
“देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत् विद्यमान है ।। त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । ट्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:,'प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है
বৈশম্পায়ন বললেন— “দেব! আপনার দেহে দেবতা, দানব, যক্ষ, রাক্ষস, গন্ধর্ব, নাগ এবং স্থাবর-জঙ্গম সমগ্র জগৎ বিদ্যমান। আর হে দেব, আপনার কৃপায় আমার স্মৃতি লুপ্ত হয়নি; আপনার অন্তঃশরীরে অবিরত দ্রুতগতিতে আবর্তিত হলেও, হে প্রভু, আমার স্মরণশক্তি ক্ষয় হয়নি।”
Verse 139
निर्गतो5हमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम्,“महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ
বৈশম্পায়ন বললেন— “মহাপ্রভো! আমার নিজের কোনো কামনা না থাকলেও, কেবল আপনার ইচ্ছাতেই আমি বাইরে বেরিয়ে এসেছি। পদ্মনয়ন! দেবগণের মধ্যে অনিন্দ্য ও শ্রেষ্ঠ আপনাকে আমি জানতে চাই।”
Verse 140
इह भूत्वा शिशु: साक्षात् कि भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमहसि,“आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें
আপনি এই সমগ্র জগৎ পান করে এখানে প্রত্যক্ষ শিশুরূপে কেন অবস্থান করছেন? অনুগ্রহ করে এ সব কথা ব্যাখ্যা করুন।
Verse 141
किमर्थ च जगत् सर्व शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम,“अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?
অনঘ! কী উদ্দেশ্যে এই সমগ্র জগৎ আপনার দেহের মধ্যে অবস্থান করছে? আর শত্রুদমন! এই প্রকাশিত রূপে আপনি এখানে কতকাল থাকবেন?
Verse 142
एतदिच्छामि देवेश श्रोतु ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्,'देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ
দেবেশ! কমলপত্রনয়ন! ব্রাহ্মণোচিত স্বাভাবিক জিজ্ঞাসা দ্বারা প্রেরিত হয়ে আমি আপনার কাছ থেকে এ সব কথা যথাযথভাবে, বিস্তারে শুনতে চাই।
Verse 143
महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो । इत्युक्त: स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युति: । सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,'प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।” मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले
আমি বললাম—“প্রভু! আমি যা দেখেছি তা মহৎ ও অচিন্ত্য।” এ কথা বললে মহাদ্যুতি, দেবদেব, শ্রীমান—বক্তাদের শ্রেষ্ঠ—ভগবান আমাকে সান্ত্বনা দিয়ে এই বাক্য বললেন।
Verse 187
इस प्रकार श्रीम्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वनें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে পবিত্র মহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়সমাস্যাপর্বে মৎস্যোপাখ্যান-বিষয়ক একশো সাতাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 188
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের মার্কণ্ডেয়-সমাস্যাপর্বে একশো আটাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 213
आदितो मनुजव्याप्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये । ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्वर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है
হে মনুষ্যব্যাঘ্র! সমগ্র জগতের ক্ষয়ের আদিতেই সেই অন্তর্যামী পরমাত্মা সকলকে জানেন, কিন্তু তাঁকে বেদও জানে না। হে নৃপশিরোমণি, নরশ্রেষ্ঠ! সমগ্র জগতের প্রলয়ের পরে সেই আদিভূত পরমেশ্বর থেকেই এই বিস্ময়ময় জগৎ পুনরায় উদ্ভূত হয়।
Verse 236
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्व॒ ततः: परम् । तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)
বৈশম্পায়ন বললেন—ত্রেতাযুগ তিন হাজার দিব্য বছরের বলে কীর্তিত। তার সন্ধ্যা ও সন্ধ্যাংশও সমান পরিমাপের—প্রতিটি তিনশো দিব্য বছর। অতএব সন্ধ্যা-সন্ধ্যাংশসহ সেই যুগের পরিমাণ ছত্রিশশো দিব্য বছর।
Verse 246
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्ष तथाविध: । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अत: सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)
বৈশম্পায়ন বললেন—দ্বাপরযুগের সন্ধ্যা দুইশো (দিব্য বছর) এবং তার সন্ধ্যাংশও তদ্রূপ। দ্বাপর দুই হাজার দিব্য বছরের বলে কীর্তিত; শুরু ও শেষে দুইশো করে যোগ হলে মোট চব্বিশশো দিব্য বছর হয়।
Verse 283
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं त॑ विदुर्बुधा: । नरश्रेष्ठ] एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মনুষ্যব্যাঘ্র! জ্ঞানীরা একে লোকসমূহের প্রলয় বলে জানেন। হে নরশ্রেষ্ঠ! এক হাজার চতুর্যুগ অতিক্রান্ত হলে ব্রহ্মার এক দিন সম্পূর্ণ হয়। এই সমগ্র বিশ্ব ব্রহ্মার দিবসকাল পর্যন্তই স্থিত থাকে; দিন শেষ হলেই তা বিনষ্ট হয়—এটাই লোকপ্রলয় বলে গণ্য।
Verse 316
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शाद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं
যুগ অতিবাহিত হয়ে যুগান্ত উপস্থিত হলে এখানে লোকেরা ক্ষত্রধর্ম অবলম্বন করে জীবিকা নির্বাহ করতে শুরু করে; ফলে বর্ণধর্মের সীমা ভেঙে যায় এবং আচারের মিশ্রণ ঘটে।
Verse 463
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजा: । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायाँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे
সেই যুগে দ্বিজেরাও প্রতারণার বশে নখ ও কেশ ধারণ করবে—শুধু বাহ্য প্রদর্শনের জন্য। গৃহস্থাশ্রমের ভারে ভীত হয়ে লোকেরা লুণ্ঠনে প্রবৃত্ত হবে; মুনির মতো ভণ্ড বেশ ধরে বৈশ্যবৃত্তিতে জীবিকা চালাবে এবং মিথ্যা সাজের জন্য নখ ও দাড়ি-গোঁফ বাড়াবে।
Verse 1323
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा हभिवन्दितौ | तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया
আমি যত্নসহকারে সেগুলি ধারণ করে মস্তকে প্রণাম করলাম। তারপর, হে তাত, সেই বালকের সুন্দর ও সুপ্রতিষ্ঠিত চরণযুগল—কোমল, রক্তিম আঙুলে শোভিত এবং লাল লাল তলদেশযুক্ত—শ্রদ্ধাভরে ধরে মাথায় স্থাপন করে বিনীতভাবে নত হলাম।
Yudhiṣṭhira asks how to remain established in dharma while protecting subjects and acting in the world without deviating from svadharma; the response frames doubt itself as a risk to dharmic stability when it becomes excessive suspicion toward sound counsel.
Govern through compassion and protection as if subjects were one’s own children; correct missteps through appropriate giving; honor ancestors and deities; and maintain disciplined respect toward learned authorities, treating dharma as the ruler’s continuous inner alignment in thought, speech, and action.
Yes. The chapter explicitly frames the discourse as conveying past and future knowledge remembered from Vāyu-proclaimed tradition and r̥ṣi-praised purāṇic material, and it closes by noting the audience’s astonishment at the purāṇa-style exposition—signaling its didactic and archival intent.