
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, पुत्र के जंघा-भंग से पृथ्वी पर गिरने का समाचार सुनकर, संजय से पूछते हैं—परमाहव में उस टूटे हुए, क्रोधाग्नि से दग्ध दुर्योधन ने क्या कहा? → संजय ‘यथावृत्त’ वर्णन आरम्भ करते हैं: रणभूमि में पराजित-देह, पर अडिग-अहंकार वाला दुर्योधन अपने सारथियों/वाहकों और आसपास के जनों को संबोधित कर विलाप करता है, अपने प्रियजनों—दुःशासन, लक्ष्मण और असंख्य कौरवों—का स्मरण कर संदेश भेजने की व्यवस्था करता है; माता-पिता के शोक की कल्पना उसे भीतर से मथती है, पर वह अपने ‘क्षत्रिय-धर्म’ की ढाल भी उठाए रहता है। → दुर्योधन अपने अंत को ‘इष्ट’ क्षत्रिय-मृत्यु घोषित करता है—समन्तपञ्चक क्षेत्र में मृत्यु पाकर सनातन लोकों की प्राप्ति का दावा करता है; उसके प्रलाप/घोषणा से जनसमूह अश्रुपूर्ण हो उठता है और भय-व्याकुल होकर दसों दिशाओं में भागता है। → विलाप के बाद दृश्य का निष्कर्ष भयावह संकेतों में उतरता है—धरती समुद्र-वन-चराचर सहित काँपती है, दिशाएँ व्याकुल होती हैं, वज्र-गर्जना-सा नाद फैलता है; दुर्योधन का अंत निकट और अपरिहार्य प्रतीत होता है। → प्रकृति के इन अपशकुनों के बीच, टूटे हुए राजा के अंतिम क्षणों में आगे कौन-सा संदेश पहुँचेगा और किसके हाथों अंतिम परिणति घटेगी—यह प्रश्न अगले अध्याय पर छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
अत्-#-#क+ चतु:षष्टितमो<5 ध्याय: दुर्योधनका संजयके सम्मुख विलाप और वाहकोंद्वारा अपने साथियोको संदेश भेजना धृतराष्ट्र रवाच अधिष्ित: पदा मूर्थ्नि भग्नसक्थो महीं गत: । शौटीर्यमानी पुत्रो मे किमभाषत संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब जाँघें टूट जानेके कारण मेरा पुत्र पृथ्वीपर गिर पड़ा और भीमसेनने उसके मस्तकपर पैर रख दिया, तब उसने क्या कहा? उसे अपने बलपर बड़ा अभिमान था। राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधी तथा पाण्डवोंसे वैर रखनेवाला था। उस युद्धभूमिमें जब वह बड़ी भारी विपत्तिमें फँस गया, तब क्या बोला?
持国王(德里达罗湿陀罗)说:“三阇耶啊,当我儿子双股被击碎而倒伏于地,敌人又以足踏其首时,他说了什么?他素来以武力自负。在那战场上,陷入极重灾厄之际,难敌(杜尔约陀那)说了哪些话?”
Verse 2
अत्यर्थ कोपनो राजा जातवैरश्न पाण्डुषु व्यसन परमं प्राप्त: किमाह परमाहवे,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब जाँघें टूट जानेके कारण मेरा पुत्र पृथ्वीपर गिर पड़ा और भीमसेनने उसके मस्तकपर पैर रख दिया, तब उसने क्या कहा? उसे अपने बलपर बड़ा अभिमान था। राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधी तथा पाण्डवोंसे वैर रखनेवाला था। उस युद्धभूमिमें जब वह बड़ी भारी विपत्तिमें फँस गया, तब क्या बोला?
毗湿摩波耶那说:难敌王(杜尔约陀那)性极暴怒,且生来与般度诸子为仇;在那至高之战中,他已陷入最深重的灾厄。此时他又说了什么?(此问缘于:其双股既碎,倒地不起,而毗摩塞那以足踏其首——此举使“正义之胜”与“报复之过”之间的伦理张力愈加尖锐。)
Verse 3
संजय उवाच शृणु राजन प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप । राज्ञा यदुक्त भग्नेन तस्मिन् व्यसन आगते
三阇耶说:“大王请听,我将如实叙述所发生的一切,世人之主啊——那位国王在被击垮、灾厄临身之时,究竟说了什么。”
Verse 4
संजयने कहा--राजन्! सुनिये। नरेश्वर! उस भारी संकटमें पड़ जानेपर टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनने जो कुछ कहा था, वह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ।। भग्नसक्थो नृपो राजन् पांसुना सोडवगुण्ठित: । यमयन् मूर्थजांस्तत्र वीक्ष्य चैव दिशो दश,गर्हयन् पाण्डवं ज्येष्ठं नि:श्वस्पेदमथाब्रवीत् । राजन्! जब कौरव-नरेशकी जाँघें टूट गयीं तब वह धरतीपर गिरकर धूलमें सन गया। फिर बिखरे हुए बालोंको समेटता हुआ वहाँ दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा। बड़े प्रयत्नसे अपने बालोंको बाँधकर सर्पके समान फुफकारते हुए उसने रोष और आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा मेरी ओर देखा। इसके बाद दोनों भुजाओंको पृथ्वीपर रगड़कर मदोन्मत्त गजराजके समान अपने बिखरे केशोंको हिलाता, दाँतोंसे दाँतोंको पीसता तथा ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरकी निन्दा करता हुआ वह उच्छवास ले इस प्रकार बोला--
三阇耶说:“大王请听。世人之主啊,陷入那沉重灾厄之时,双股已碎的难敌王(杜尔约陀那)所说之言,我将一一如实叙述。其股既断,王卧于地,满身尘土。他收拢散乱的发丝,环顾十方。继而责骂般度长子,长叹一声,便开口说道——气息粗厉,心神因愤怒与耻辱而炽燃。”
Verse 5
केशान् नियम्य यत्नेन नि:श्वसन्नुरगो यथा । संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम्
三阇耶说道:“他竭力按住自己的发髻,喘息如蛇;以那因狂烈激愤而涌出的泪水盈满的双眼,凝视着我。”
Verse 6
बाहू धरण्यां निष्पिष्य सुदुर्मत्त इव द्विप: । प्रकीर्णान् मूर्थजान् धुन्वन् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन्
三阇耶说道:“他将双臂重重压向大地,如狂乱的怒象;抖动散乱的发丝,齿与齿相磨作响——那是悲恸与暴怒外显的风暴,昭示战争如何逼得连强者也陷入无助而自噬的痛苦。”
Verse 7
भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे
三阇耶说道:“当圣檀奴之子毗湿摩——那位宗主与护持者——以及持兵之最的迦尔那(在场/为统帅)之时……”
Verse 8
गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे । अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि
三阇耶说道:“在乔多摩身上,在沙昆尼身上亦然;在持兵之最的德罗纳身上亦然;同样在阿湿婆他摩、在沙利耶、以及在勇武的克利多伐摩身上……”
Verse 9
इमामवस्थां प्राप्तोडस्मि कालो हि दुरतिक्रम: । 'शान्तनुनन्दन भीष्म, अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचार्य, शकुनि, अस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, शूरवीर शल्य तथा कृतवर्मा मेरे रक्षक थे तो भी मैं इस दशाको आ पहुँचा। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है।। एकादशचमूभर्ता सो5हमेतां दशां गत:
三阇耶说道:“我落到这般境地,因为时(迦罗,Kāla)确实难以逾越。纵然护卫我的有圣檀奴之子毗湿摩;持兵者之最的迦尔那;师长克利波;沙昆尼;诸持兵者中最卓绝的德罗纳;阿湿婆他摩;英勇的沙利耶;以及克利多伐摩——我仍陷入此等困厄。诚然,违越时之敕令,对任何人都极其艰难。我这曾统率十一军阵之将,也已至此。”
Verse 10
आखूयातव्यं मदीयानां ये5स्मिन् जीवन्ति संयुगे
三阇耶说道:“此事当禀告我方——在这场战斗中仍然活着的人。”
Verse 11
बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवै:
三阇耶说道:“确实,般度族做下了许多残酷无情之事。”
Verse 12
इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसै: पाण्डवै: कृतम्
三阇耶说道:“这也是一桩招致耻名之事——般度族以残忍之心所为。”
Verse 13
का प्रीति: सत्त्वयुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जयम्
三阇耶说道:“立足于真实德行之人,若胜利只是凭借人为设下的条件与暗藏的机巧而得,又怎会有满足?”
Verse 14
अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डित:
三阇耶说道:“以非正法(adharma)得胜之后,哪位智者会真正欢喜?由非正法而生的胜利,不能成为明了正道及其果报之人真正的满足。”
Verse 15
किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम
三阇耶说道:“今日此事究竟有何可惊——我这大腿已被击碎之人,如今落到这般境地?”
Verse 16
प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु
三阇耶说道:“(他)勇力炽盛,福运相随,行走于亲族之间(在自己族人之中)。”
Verse 17
अभिशनज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च मे,“मेरे माता-पिता युद्धधर्मके ज्ञाता हैं। वे दोनों मेरी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो जायाँगे। तुम मेरे कहनेसे उन्हें यह संदेश देना कि मैंने यज्ञ किये, जो भरण-पोषण करनेयोग्य थे, उनका पालन किया और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका अच्छी तरह शासन किया
三阇耶说道:“我的母亲与父亲深谙战士之法(战斗的达摩)。当他们听闻我战死的消息,必将为悲痛所吞没。请依我所求,将此言转告他们:我曾举行祭祀,护持应受供养之人,并善治大地,直至环海之疆。”
Verse 18
तौ हि संजय दुःखार्तो विज्ञाप्यौ वचनाद्धि मे । इष्टं भृत्या भृता: सम्यग् भू: प्रशास्ता ससागरा,“मेरे माता-पिता युद्धधर्मके ज्ञाता हैं। वे दोनों मेरी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो जायाँगे। तुम मेरे कहनेसे उन्हें यह संदेश देना कि मैंने यज्ञ किये, जो भरण-पोषण करनेयोग्य थे, उनका पालन किया और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका अच्छी तरह शासन किया
三阇耶说道:“三阇耶啊,我那双亲听闻我死讯,必为悲苦所迫。故请依我之言转告他们:我已如法奉行所命祭祀,妥善抚养依赖于我者,并善治大地,直至环绕之海。”
Verse 19
मूर्थ्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव संजय । दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम्
三阇耶说道:“三阇耶啊,敌人尚存之时,我已凌驾其上而为主;我量力分配份额与赠礼,也做了令友人欢喜之事。”
Verse 20
मानिता बान्धवा: सर्वे वश्य: सम्पूजितो जन:
三阇耶说道:“一切亲族都得到了应有的礼敬,百姓也被纳入治理之中——备受尊重,妥善接待。”
Verse 21
त्रितयं सेवितं सर्व को नु स्वन्ततरो मया । “मैंने सभी बन्धु-बान्धवोंको सम्मान दिया। अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया। मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ।। २० $ ।। आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्त: सुदुर्लभ:
“我已敬奉所有亲族。凡在我号令之下的百姓,我皆厚待款迎;而且我已圆满行持三者——法(Dharma)、利(Artha)与欲(Kāma)。谁还能有比我更美的结局?并且在诸王之中,那难得的荣誉也因诏命而归于我。”
Verse 22
यातानि परराष्ट्राणि नूपा भुक्ताश्च दासवत्
三阇耶说道:“他们已流落他国,在那里被迫以依附之身度日——如奴隶般被驱使、被榨取。”
Verse 23
अधीतं विधिवदू दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम्,दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीमृते त्वन्यगता विभो । “विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की। इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है। फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली। सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है
三阇耶说道:“我依仪轨而学,依正法而施,得享无病长寿。承天之幸,宏大的王者富贵曾归我所有,唯在我死后才转入他人之手,噫,伟力之人。”
Verse 24
स्वर्मेण जिता लोका: को नु स्वन्ततरो मया । दिष्ट्या नाहं जित: संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रित:
三阇耶说道:“凭我自身的行持,我赢得了天界诸世——谁还能比我更能自持?承天之幸,我未曾在战阵中败北,也未曾沦落到如仆役般依人而活。”
Verse 25
यदि क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम्
三阇耶说道:“若那些不过是‘刹帝利的族亲’却自称武士之位的人,真能遵行自身之法度……”
Verse 26
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जित:
三阇耶说道:“幸而我并未因仇怨而退转,也未以卑下凡俗之态行事。”
Verse 27
सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा
三阇耶说道:“正如人们可能击杀熟睡之人或疏忽之人——甚至以毒药毁灭之——如此这般的杀法也被提及。”言下所指,是一种可责的暗袭之举,违背武士当以明战相对的法度。
Verse 28
अश्वत्थामा महाभाग: कृतवर्मा च सात्वत:
三阇耶说道:尊贵的阿湿婆陀摩,以及萨特瓦塔族的克利多伐摩也在其间——他们被点名为战后余波中显要的行动者;在那余烬未冷之时,个人的忠诚与暴力的残响仍在塑造抉择与报应。
Verse 29
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानामनेकश:
三阇耶说道:“般度五子以多种方式——既已凭不义之道而起动行事——……”
Verse 30
वार्तिकांश्षाब्रवीद् राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रम:,पृष्ठतोडनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वग: । इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा-- 'भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है। अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, महापराक्रमी वृषसेन, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली जलसन्ध, राजा भगदत्त, महाधनुर्धर सोमदत्त, सिंधुराज जयद्रथ, अपने ही समान पराक्रमी दुःशासन आदि बन्धुगण, विक्रमशाली दुःशासनकुमार और अपने पुत्र लक्ष्मण--इन सबके तथा और भी जो बहुत-से मेरे पक्षके सहस्रों योद्धा मारे गये हैं, उन सबके पीछे मैं स्वर्ग जाऊँगा। मेरी दशा उस पथिकके समान है, जो अपने साथियोंसे बिछुड़ गया हो
三阇耶说道:随后,那位国王——你的儿子,坚守真实勇武者——说出此言:“我将追随他们而去,如同旅人失却商队,孤身落在后头。”在此语境中,杜尔约陀那把将至之死视作同伴尽殁后的孤行之旅,暗示在他所认为以“非正法”(adharma)收场的战争之后,必有阴沉的道德清算。
Verse 31
अधर्माद् भीमसेनेन निहतो<हं यथा रणे । सोऊ हं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा
三阇耶说道:“在战场上,我被毗摩塞那以非正法之举所杀。因此,我将去见已登天界的德罗那,也同样去见迦尔那与沙利耶二人。”
Verse 32
वृषसेनं महावीर्य शकुनिं चापि सौबलम् । जलसन्ध॑ महावीर्य भगदत्तं च पार्थिवम्
三阇耶说道:“(其中有)弗利沙塞那,勇力绝伦;还有苏婆罗之子沙昆尼;骁悍的阇罗散陀;以及国王薄伽达多。”
Verse 33
सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् । दुःशासनपुरोगांश्न भ्रातृनात्मसमांस्तथा
三阇耶说道:“(他见到)大弓手苏摩达多,以及信度之王子阇耶德罗陀;又见他的诸兄弟,以杜沙萨那为首——其志其决,皆与他相当。”
Verse 34
दौ:शासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ । एतांश्वान्यांश्व सुबहून् मदीयांश्व सहस्रश:
三阇耶说道:“(我见到)杜沙萨那那勇猛的儿子,以及罗什摩那,并那两位儿子;此外还有许多许多——我方阵营中成千上万的战士。”
Verse 35
कर्थ॑ भ्रातृन् हतान् श्र॒त्वा भर्तारं च स््वसा मम
三阇耶说道:“我的妹妹听闻她的兄弟们已被杀戮,连她的夫君也已陨落,她作何反应?”
Verse 36
स््नुषाभि: प्रस्नुषाभिश् वृद्धो राजा पिता मम
三阇耶说道:“我那年迈的父王,被儿媳与孙媳们环绕。”
Verse 37
नूनं लक्ष्मणमातापि हतपुत्रा हतेश्वरा
三阇耶说道:“想必罗刹摩那之母亦然——丧子又丧夫——已被悲恸击倒。”
Verse 38
यदि जानाति चार्वाक: परिव्राड् वाग्विशारद:
三阇耶说道:“若车婆迦——一位善辩的游行沙门——确实知晓(此事)……”
Verse 39
समन्तपज्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्वरुते
三阇耶说道:在神圣的三漫多般遮迦——名闻三界——
Verse 40
ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि मारिष
于是,噢,尊者,成千上万的人都泪流满面。
Verse 41
ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा
三阇耶说:那可怖的大地——连同海洋与森林,连同一切动者与不动者——仿佛在惊惧中颤抖。
Verse 42
ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं नयवेदयन्,उन संदेशवाहकोंने आकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे यथावत् समाचार कह सुनाया। भारत! गदायुद्धमें भीमसेनका जैसा व्यवहार हुआ तथा राजाको जिस प्रकार धराशायी किया गया, वह सारा वृत्तान्त द्रोणपुत्रको बताकर दुःखसे संतप्त हो वे बहुत देरतक चिन्तामें डूबे रहे। फिर शोकसे व्याकुलचित्त एवं आर्त होकर जैसे आये थे वैसे चले गये
三阇耶说:那些使者走近德罗那之子(阿湿婆他摩),将事情原原本本、毫无遗漏地禀告——毗摩塞那在棍棒决斗中如何行事,以及国王如何被击倒。因所传之事而悲恸,他们良久沉陷于忧惧的思虑;继而心为哀伤与苦痛所压倒,便如来时一般离去。
Verse 43
व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्थ च पातनम् | तदाख्याय तत: सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ।। (वार्तिका दुःखसंतप्ता: शोकोपहतचेतस: ।) ध्यात्वा च सुचिरं काल॑ जम्मुराता यथागतम्,उन संदेशवाहकोंने आकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे यथावत् समाचार कह सुनाया। भारत! गदायुद्धमें भीमसेनका जैसा व्यवहार हुआ तथा राजाको जिस प्रकार धराशायी किया गया, वह सारा वृत्तान्त द्रोणपुत्रको बताकर दुःखसे संतप्त हो वे बहुत देरतक चिन्तामें डूबे रहे। फिर शोकसे व्याकुलचित्त एवं आर्त होकर जैसे आये थे वैसे चले गये
三阇耶说:“噢,婆罗多啊,在将一切都禀告德罗那之子之后——棍棒决斗如何进行,国王如何被击倒——那些使者为悲痛所灼,心为哀伤所击,良久沉思。继而在忧苦与哀号中,他们便如来时一般离去。”
Verse 63
गर्हयन् पाण्डवं ज्येष्ठं नि:श्वस्पेदमथाब्रवीत् । राजन्! जब कौरव-नरेशकी जाँघें टूट गयीं तब वह धरतीपर गिरकर धूलमें सन गया। फिर बिखरे हुए बालोंको समेटता हुआ वहाँ दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा। बड़े प्रयत्नसे अपने बालोंको बाँधकर सर्पके समान फुफकारते हुए उसने रोष और आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा मेरी ओर देखा। इसके बाद दोनों भुजाओंको पृथ्वीपर रगड़कर मदोन्मत्त गजराजके समान अपने बिखरे केशोंको हिलाता, दाँतोंसे दाँतोंको पीसता तथा ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरकी निन्दा करता हुआ वह उच्छवास ले इस प्रकार बोला--
三阇耶说:他谴责般度族的长兄,长长叹息,继而开口。俱卢王的大腿被击碎、倒落尘土之时,他拢起散乱的头发,环顾十方;又费力束发,嘶嘶作声如蛇。双眼因愤怒与泪水而肿胀,他向我投来一瞥;随后,他将双臂在地上摩擦,宛如醉狂的象王,摇动披散的发缕,咬牙切齿,责骂般度长兄坚战(Yudhiṣṭhira),吸一口气,便如此说道——
Verse 64
इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनविलापे चतु:षष्टितमो<5ध्याय: ।। धड ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका विलापविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
三阇耶说道:“如是,在神圣的《摩诃婆罗多》中,于《沙利耶篇》之内——尤在《伽陀篇》中——关于杜律约陀那哀叹的第六十四章至此终了。”此结尾题记标示一段叙事的完成:它框定了一位败亡君主在道德与情感上的崩塌;杜律约陀那的悲恸成为一面叙事之镜,映照傲慢、非正法(adharma)与战争所致毁灭的后果。
Verse 93
काल प्राप्प महाबाहो न कश्िदतिवर्तते । “महाबाहो! मैं एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था; परंतु आज इस दशामें आ पड़ा हूँ। वास्तवमें कालको पाकर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता
三阇耶说道:“噢,臂力无双者!当时劫(迦罗,Kāla)已至,无人能越其界。纵使昔日统御十一阿叉乌希尼(akṣauhiṇī)大军者,亦可被推至此境;因为确然,无人能违逆时劫之敕令。”
Verse 106
यथाहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः । “मेरे पक्षके वीरोंमेंसे जो लोग इस युद्धमें जीवित बच गये हों, उन्हें यह बताना कि भीमसेनने किस तरह गदायुद्धके नियमका उल्लंघन करके मुझे मारा
三阇耶说道:“我如何在毗摩塞那逾越既定约法(伽陀决斗之规)之后,被其所杀。”此句将这场杀戮置于道义蒙尘之中:说话者把自己的死不只视为战败,更视为对双方共守之决斗法度的破坏所致。
Verse 116
भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च श्रीमति । 'पाण्डवोंने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म तथा श्रीमान् द्रोणाचार्यके प्रति बहुत-से नृशंस कार्य किये हैं
三阇耶说道:“对于布胡利室罗婆斯、迦尔那、毗湿摩,以及那位光耀的德罗那,般度子弟曾行下许多残酷之事。”此句揭示战争的道德张力:即便名震天下的勇士,也成了残忍指控的缘由;胜利被描绘为背负伦理重担,而非纯然的英雄凯歌。
Verse 126
येन ते सत्सु निर्वेद॑ गमिष्यन्ति हि मे मतिः । 'उन क्रूरकर्मा पाण्डवोंने यह भी अपनी अकीर्ति फैलानेवाला कर्म ही किया है, जिससे वे साधु पुरुषोंकी सभामें पश्चात्ताप करेंगे; ऐसा मेरा विश्वास है
三阇耶说道:“我深信:因他们所行之事,那些行径残酷的般度子弟必在名声上染上污点;在贤德之士的会座之中,他们也将被迫陷入悔恨。”
Verse 136
को वा समयके त्तारं बुध: सम्मन्तुमर्हति । “छलसे विजय पाकर किसी सत्त्वगुणी या शक्तिशाली पुरुषको क्या प्रसन्नता होगी? अथवा जो युद्धके नियमको भंग कर देता है, उसका सम्मान कौन विद्वान् कर सकता है?
三阇耶说道:“智者又怎会认为那违背既定交战规约之人值得尊敬?以欺诈得胜,真正具德或强盛之士又能从中得到何等满足?若有人破坏战场之法,哪位学者能正当地敬重他?”
Verse 143
यथा संहृष्यते पाप: पाण्डुपुत्रो वृकोदर: | “अधर्मसे विजय प्राप्त करके किस बुद्धिमान् पुरुषको हर्ष होगा? जैसा कि पापी पाण्डुपुत्र भीमसेनको हो रहा है
三阇耶说道:“以非正法(阿达摩)而得胜,智者怎会欢喜?然而那有罪的弗利拘陀罗——般度之子毗摩——却正是如此欢庆。”
Verse 153
क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिर: । “आज जब मेरी जाँघें टूट गयी हैं; ऐसी दशामें कुपित हुए भीमसेनने मेरे मस्तकको जो पैरसे ठुकराया है, इससे बढ़कर आश्वर्यकी बात और क्या हो सकती है?
三阇耶说道:毗摩塞那盛怒之下,以足践踏其首。“今日我双腿已断;在这般境地里,愤怒的毗摩竟以脚踢踏我的头颅——还有什么比这更令人惊异?”
Verse 163
एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै संजय पूजित: । “संजय! जो अपने तेजसे तप रहा हो, राजलक्ष्मीसे सेवित हो और अपने सहायक बन्धुओंके बीचमें विद्यमान हो, ऐसे शत्रुके साथ जो उक्त बर्ताव करे, वही वीर पुरुष सम्मानित होता है (मरे हुएको मारनेमें क्या बड़ाई है)
三阇耶说道:“噢,三阇耶,唯有如此行事之人,才真正配受敬礼。因为当敌人以威勇炽盛,得王者之福相随,又立于亲族与盟友扶持之中时,唯真英雄方能依所规定之战法与之周旋。击打已死之人,又有何等伟业?”
Verse 193
अमित्रा बाधिता: सर्वे को नु स्वन्ततरो मया । “संजय! मैंने जीवित शत्रुओंके ही मस्तकपर पैर रखा। यथाशक्ति धनका दान और मित्रोंका प्रिय किया। साथ ही सम्पूर्ण शत्रुओंको सदा ही क्लेश पहुँचाया। संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जिसका अन्त मेरे समान सुन्दर हुआ हो?
三阇耶说道:“我的一切仇敌都已被压伏——世间谁的结局能比我更为幸运?我曾以足踏在仍活着的敌人头上;尽我所能施财行布施,并做令友人欢喜之事;又不断使诸敌受苦。在这世上,哪一个男子得到了如我这般美好的终局?”
Verse 213
आजानेयैस्तथा यात॑ को नु स्वन्ततरो मया । “बड़े-बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय (अरबी) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा?
三阇耶说道:“我曾骑乘上等的阿阇尼耶良马,曾号令诸大王,赢得难得的尊荣——世间又有谁,真能比我得着更好的结局呢?”
Verse 223
प्रियेभ्य: प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । “दूसरे राष्ट्रोपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की। फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा?
三阇耶说道:“我善待我所钟爱之人——世间又有谁,真能比我得着更好的结局?我曾攻伐他国,使许多国王如奴仆般服役;然而我仍恒常护持我至爱之人的福祉——如此,哪一种结局还能胜过我的结局呢?”
Verse 243
दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीमृते त्वन्यगता विभो । “विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की। इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है। फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली। सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है
三阇耶说道:“噫,强者啊,幸而我那广大的王者富贵,唯在我身后方才转归他人。我依仪轨自习诵读吠陀,施与种种布施,得享无病之寿。更有甚者,凭我之达摩,我战胜并夺取了功德之诸界。谁还能有比我更好的结局?幸而我从未在战阵中败北,也从未如奴仆般向仇敌求庇。幸而大权与王者之福运常在我手,唯待我既逝,方离我而去。”
Verse 253
निधन तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । “अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा?
三阇耶说道:“我得到了守持刹帝利达摩之宗亲所向往的那种死亡。因此,世间又有谁能比我得着更好的结局呢?”
Verse 266
दिष्टया न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजित: । /हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं। निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ--यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है
三阇耶说道:“此亦为福:纵然我遭败北,却未曾依附任何迷妄之决意。即便在失利之时,我也不以卑贱的屈服为庇护,不以曲邪可耻之念为归依——此亦是我的荣耀。”
Verse 273
एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हत: । “जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले, उसी प्रकार धर्मका उल्लंघन करनेवाले पापी भीमसेनने गदायुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके मुझे मारा है
三阇耶说道:“因此,我被那背离达摩之人所击倒——他逾越并破坏了既定的决斗约法。”此句所强调的并非单纯战场胜负,而是伦理上的越轨:说话者宣称这一击违背了棍棒决斗所约定的“samaya”(约法/规约),故属非达摩(adharma),而非正当的胜利。
Verse 286
कृप: शारद्वतश्वैव वक्तव्या वचनान्मम | “महाभाग अअश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा तथा शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य--इन सबको मेरी यह बात सुना देना
三阇耶说道:“当把我的话转告给舍罗陀梵之子克利帕;也同样转告高贵的阿湿婆他摩,以及萨特瓦塔族系的克利多伐摩。把我这番讯息传给他们所有人。”
Verse 296
विश्वासं समयघ्नानां न यूय॑ गन्तुमर्ह थ । 'पाण्डवोंने अधर्ममें प्रवृत्त होकर अनेकों बार युद्धकी मर्यादा तोड़ी है; अतः आपलोग कभी उनका विश्वास न करें"
三阇耶说道:“不可相信那些毁弃誓约、破坏盟约之人。般度五子既已趋向非达摩,便屡次践踏战争所公认的约束;因此,切莫再倚赖他们。”
Verse 343
पृष्ठतोडनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वग: । इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा-- 'भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है। अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, महापराक्रमी वृषसेन, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली जलसन्ध, राजा भगदत्त, महाधनुर्धर सोमदत्त, सिंधुराज जयद्रथ, अपने ही समान पराक्रमी दुःशासन आदि बन्धुगण, विक्रमशाली दुःशासनकुमार और अपने पुत्र लक्ष्मण--इन सबके तथा और भी जो बहुत-से मेरे पक्षके सहस्रों योद्धा मारे गये हैं, उन सबके पीछे मैं स्वर्ग जाऊँगा। मेरी दशा उस पथिकके समान है, जो अपने साथियोंसे बिछुड़ गया हो
三阇耶说道:“我将追随其后——如同失却商旅队伍的行人。”在此语境中,这一句传达出一种道德与情感的荒凉:当同伴因战争与过失而尽皆覆灭之后,他只能无依无靠、无所指引地尾随他们,走向同样的终局。
Verse 356
रोखूयमाणा दु:खार्ता दुःशला सा भविष्यति | “हाय! अपने भाइयों और पतिकी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त रोदन करती हुई मेरी बहिन दुःशलाकी क्या दशा होगी?
三阇耶说道:“悲痛压身,哀号不绝,我的妹妹杜赫沙拉将被摧折。唉——当她听闻兄弟与夫君皆亡的噩耗时,她将沦落到何等境地?”
Verse 363
गान्धारीसहितकश्नैव कां गतिं प्रतिपत्स्यति । “पुत्रों और पौत्रोंकी बिलखती हुई बहुओंके साथ मेरे बूढ़े पिता राजा धृतराष्ट्र माता गान्धारीसहित किस अवस्थाको पहुँच जायँगे?
三阇耶说道:“那么,与甘陀梨在一起,他将抵达何种境地、何种归宿?”在俱卢之野的浩劫之后,这一问指向战争的道德与存在之余波:当宗脉尽碎、宫室只余哀恸之时,年迈的持国王与其王后将何去何从?
Verse 373
विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना । “निश्चय ही जिसके पति और पुत्र मारे गये हैं, वह कल्याणमयी विशाललोचना लक्ष्मणकी माता भी सारा समाचार सुनकर तुरंत ही प्राण दे देगी
三阇耶说道:“那位吉祥而大眼的夫人,将很快走向终结。确实,当她听到全部消息——她的丈夫与儿子已被杀害——拉克什玛那之母必将立刻舍弃性命。”
Verse 386
करिष्यति महाभागो श्रुवं चापचितिं मम । 'संन्यासीके वेषमें सब ओर घूमनेवाले प्रवचनकुशल चार्वाकको- यदि मेरी दशा ज्ञात हो जायगी तो वे महाभाग निश्चय ही मेरे वैरका बदला लेंगे
三阇耶说道:“那位高贵之人必定会给我应得的慰藉与补偿。倘若善辩的遮罗婆迦——披着出家遁世者的外衣、四方游行——得知我的处境,那么那位伟丈夫必将为我的仇怨讨回报复。”
Verse 393
अहं निधनमासाद्य लोकानू प्राप्स्यामि शाश्वतान् | “तीनों लोकोंमें विख्यात पुण्यमय समन्त-पंचवकक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होकर अब मैं सनातन लोकोंमें जाऊँगा'
三阇耶说道:“当我遭逢死亡,便将抵达永恒之界。若死于功德无上的三界闻名之地——萨曼塔·般遮迦——我将前往不朽的境域。”
Verse 403
प्रलापं नृपते: श्र॒त्वा व्यद्रवन्त दिशो दश । मान्यवर! राजा दुर्योधनका यह विलाप सुनकर हजारों मनुष्योंकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे दसों दिशाओंमें भाग चले
三阇耶说道:“听见国王的哀号,他们惊惧而迷乱,泪盈于目,遂向十方奔逃”——此景昭示:当悲恸与绝望由君王之口倾吐,足以动摇众人之心,使军阵秩序崩解。
Verse 413
चचालाथ सनिर्लहादा दिशश्वैवाविलाभवन् । उस समय समुद्र, वन और चराचर प्राणियोंसहित यह पृथ्वी भयानक रूपसे हिलने लगी। सब ओर वज्रकी-सी गर्जना होने लगी और सारी दिशाएँ मलिन हो गयीं
三阇耶说道:于是大地开始以可怖之势震颤——连同海洋、森林,以及一切有动无动的众生。宛如金刚(vajra)般的雷霆巨响从四面八方轰然回荡,四方诸界尽皆昏黯污浊,仿佛自然本身也在战场暴烈的杀伐前退缩战栗。