प्रियेभ्य: प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । “दूसरे राष्ट्रोपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की। फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा?
priyebhyaḥ prakṛtaṃ sādhu ko nu svantataro mayā |
三阇耶说道:“我善待我所钟爱之人——世间又有谁,真能比我得着更好的结局?我曾攻伐他国,使许多国王如奴仆般服役;然而我仍恒常护持我至爱之人的福祉——如此,哪一种结局还能胜过我的结局呢?”
संजय उवाच