Adhyaya 10
Shalya ParvaAdhyaya 1091 Versesपाण्डव-पक्ष के पक्ष में झुकाव—नकुल द्वारा कर्णपुत्रों के वध से कौरवों का मनोबल टूटता है, पर शल्य के आवेग से प्रतिरोध जारी रहता है।

Adhyaya 10

शल्यस्य पाण्डवसेनापीडनम् — Śalya’s Assault on the Pāṇḍava Host (with Omens and Bhīma’s Counter)

Upa-parva: Śalya–Yudhiṣṭhira Saṅgrāma-prasaṅga (Battle Escalation and Omens Episode)

Sanjaya reports a chaotic, high-intensity phase of fighting marked by mutual attrition, fleeing cavalry, and the cries of elephants and infantry. The Pāṇḍavas and Kauravas exchange lethal volleys as dawn advances. Observing the Kaurava army faltering, Śalya advances toward the Pāṇḍava formation and engages aggressively, showering arrows on Yudhiṣṭhira and other principal warriors (Bhīma, the twins, Draupadī’s sons, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin). The text introduces omen imagery—earth tremors, meteors, and animals moving inauspiciously—signaling heightened disorder. Multiple duels and counter-attacks unfold as Kṛtavarmā, Kṛpa, Śakuni, Aśvatthāman, and others intervene to protect Śalya and check Pāṇḍava offensives. The chapter climaxes with an extended, technical depiction of Bhīma’s formidable gadā, followed by Bhīma’s close-quarters action that disrupts Śalya’s chariot team and strikes Śalya’s charioteer, forcing a tactical setback. The Pāṇḍavas acknowledge Bhīma’s performance as the engagement continues.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि जब कौरव-सेना टूटकर भागने लगती है, तब मद्रराज शल्य क्रोध और लज्जा से भर उठते हैं और सारथि को आदेश देते हैं—घोड़ों को वेग से बढ़ाकर उन्हें शत्रु-पंक्ति के बीच पहुँचा दे, ताकि आज युद्ध में उनका पराक्रम देखा जाए। → शल्य के आगे बढ़ते ही दोनों पक्षों की बिखरी टुकड़ियाँ फिर से भिड़ जाती हैं। धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में पाण्डव-वीर तीखे बाणों की वर्षा करते हुए कौरव-सेना पर टूट पड़ते हैं। इसी उथल-पुथल में नकुल का रथ शत्रु-मध्य में चमकता है; वह बाणों को रोकते हुए परवीरों का संहार करता है और कर्ण-पुत्रों की ओर युद्ध को खींच लाता है। → नकुल और कर्ण के पुत्रों (विशेषतः सुषेण, सत्यसेन आदि) के बीच घोर रथ-युद्ध चरम पर पहुँचता है—सुषेण क्रुद्ध होकर नकुल को बाणों से बींधता है, पर नकुल प्रत्युत्तर में उनके अस्त्रों को निष्फल कर दो-दो बाणों से उन्हें घायल करता है और निर्णायक प्रहारों से कर्ण के तीन पुत्रों का वध कर देता है। → कर्ण-पुत्रों के गिरते ही कौरव-पक्ष में शोक और क्षोभ फैलता है, पर युद्ध रुकता नहीं। दोनों ओर से सैकड़ों-हजारों योद्धा कटते हैं; पाण्डव-सेना धृष्टद्युम्न के साथ आगे धकेलती है, और कौरव-सेना भी प्रतिहिंसा में प्राणघातक प्रतिरोध करती है। → रक्त-धूल से ढँके रण में शल्य का आवेग और कौरवों की जिद अगले टकराव की भूमिका बाँधती है—युद्ध का पलड़ा अभी स्थिर नहीं, और अगले क्षण किसका रथ टूटेगा, यह अनिश्चित रहता है।

Shlokas

Verse 1

अपन बक। ] अतिफ्ऑशाड< दशमो< ध्याय: नकुलद्वारा कर्णके तीन पुत्रोंका वध तथा उभयपक्षकी सेनाओंका भयानक युद्ध संजय उवाच तत्‌ प्रभग्नं बल॑ दृष्टवा मद्रराज: प्रतापवान्‌ । उवाच सारथिं तूर्ण चोदयाश्वान्‌ महाजवान्‌

三阇耶说道:见那军势溃乱不成阵,勇武著称的摩陀罗王立刻对御者说道:“快!催动那些疾如风驰的骏马!”

Verse 2

संजय कहते हैं--राजन्‌! उस सेनाको इस तरह भागती देख प्रतापी मद्रराज शल्यने अपने सारथिसे कहा--'सूत! मेरे महावेगशाली घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ाओ ।। एष तिष्ठति वै राजा पाण्दुपुत्रो युधिष्ठिर: । छत्रेण प्रियमाणेन पाण्डुरेण विराजता,“देखो, ये सामने मस्तकपर शोभाशाली श्वेत छत्र लगाये हुए पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं

三阇耶说道:“大王啊,见那军队如此奔逃,勇武的摩陀罗王沙利耶便对御者说道:‘御者啊,速速驱策我那强健迅疾的骏马向前。看——般度之子、尤提史提罗王就立在前方,头上擎着可爱的白伞,光彩照人。’”

Verse 3

अत्र मां प्रापय क्षिप्रं पश्य मे सारथे बलम्‌ | न समर्थों हि मे पार्थ: स्थातुमद्य पुरो युधि,'सारथे! मुझे शीघ्र उनके पास पहुँचा दो। फिर मेरा बल देखो। आज युद्धमें कुन्तीकुमार युधिष्ठिर मेरे सामने कदापि नहीं ठहर सकते”

“御者,速速载我到他跟前去!且看我的威力。今日战场之上,普利塔之子(尤提史提罗)决不能在我面前立足!”

Verse 4

एवमुक्तस्तत: प्रायान्मद्रराजस्य सारथि: । यत्र राजा सत्यसंधो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उनके ऐसा कहनेपर मद्रराजका सारथि वहीं जा पहुँचा, जहाँ सत्यप्रतिज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर खड़े थे

三阇耶说道:被如此吩咐后,摩陀罗王的御者立刻出发,来到达摩之子、守真守誓的尤提希提罗王所站立之处。

Verse 5

प्रापतत्‌ तच्च सहसा पाण्डवानां महद्‌ बलम्‌ | दधारैको रणे शल्यो वेलोद्वृत्तमिवार्णवम्‌,साथ ही पाण्डवोंकी वह विशाल सेना भी सहसा वहाँ आ पहुँची। परंतु जैसे तट उमड़ते हुए समुद्रको रोक देता है, उसी प्रकार अकेले राजा शल्यने रणभूमिमें उस सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया

与此同时,般度族那支庞大的军势也骤然赶到。然而正如海岸能阻住翻涌欲溢的海潮,沙利耶王独自一人便在战场上遏止了那支军队的推进。

Verse 6

पाण्डवानां बलौघस्तु शल्यमासाद्य मारिष | व्यतिष्ठत तदा युद्धे सिन्धोर्वेग इवाचलम्‌,माननीय नरेश! जैसे किसी नदीका वेग किसी पर्वतके पास पहुँचकर अवरुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार पाण्डवोंकी सेनाका वह समुदाय युद्धमें राजा शल्यके पास पहुँचकर खड़ा हो गया

三阇耶说道:“尊贵者啊,般度族的军势洪流逼近沙利耶王时,便在战斗中停驻于彼处——如同急湍之河遇到高山,势头被遏而不得前。”

Verse 7

मद्रराजं तु समरे दृष्टवा युद्धाय धिष्ठितम्‌ । कुरव: संन्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्‌,समरांगणमें मद्रराज शल्यको युद्धके लिये डटा हुआ देख कौरव-सैनिक मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिकी सीमा नियत करके पुनः रणभूमिमें लौट आये

然而库鲁军见摩陀罗王沙利耶在阵中屹立,备战而不动摇,便又折返——以死亡为退却的尽头——重回战场。

Verse 8

तेषु राजन्‌ निवृत्तेषु व्यूढानीकेषु भागश: । प्रावर्तत महारौद्र: संग्राम: शोणितोदक:,राजन! पृथक्‌-पृथक्‌ सेनाओंकी व्यूह-रचना करके जब वे सभी सैनिक लौट आये, तब दोनों दलोंमें महाभयंकर संग्राम छिड़ गया, जहाँ पानीकी तरह खून बहाया जा रहा था

三阇耶说道:大王啊,当那些军队回返,并按部就班分列成阵、各自布置战斗队形之后,两军之间便爆发了极其惨烈的厮杀——血流如水。

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ,समार्च्छच्चित्रसेनं तु नकुलो युद्धदुर्मद: । तौ परस्परमासाद्य चित्रकार्मुकधारिणौ इसी समय रणदुर्मद नकुलने कर्णपुत्र चित्रसेनपर आक्रमण किया। विचित्र धनुष धारण करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे भिड़कर दक्षिण तथा उत्तरकी ओरसे आये हुए दो बड़े जलवर्षक मेघोंके समान परस्पर बाणरूपी जलकी बौछार करने लगे

三阇耶说道:就在那一刻,纳库拉被战斗的炽烈所陶醉,猛然冲向迦尔那之子质多罗塞那。两位执持奇妙神弓的英雄迎面相撞,随即彼此倾泻箭雨,宛如自南与自北涌来的两团大雨云,相互泼洒雨水不息。

Verse 10

मेघाविव यथोद्वृत्तौ दक्षिणोत्तरवर्षिणौ । शरतोयै: सिषिचतुस्तौ परस्परमाहवे,इसी समय रणदुर्मद नकुलने कर्णपुत्र चित्रसेनपर आक्रमण किया। विचित्र धनुष धारण करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे भिड़कर दक्षिण तथा उत्तरकी ओरसे आये हुए दो बड़े जलवर्षक मेघोंके समान परस्पर बाणरूपी जलकी बौछार करने लगे इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे दशमो5ध्याय:

三阇耶说道:宛如两团高耸翻涌的雨云——一自南方倾注,一自北方倾注——两位战士在战场上彼此浇灌,以“箭之水流”相互泼洒不绝。

Verse 11

नान्तरं तत्र पश्यामि पाण्डवस्येतरस्य च । उभौ कृतास्त्रौ बलिनौ रथचर्याविशारदौ

三阇耶说道:“在这场交锋中,我看不出般度之子与其对手有何差别。二人皆精通兵器,皆力大无比,亦皆深谙战车搏杀之术。”

Verse 12

चित्रसेनस्तु भललेन पीतेन निशितेन च

三阇耶说道:随后,质多罗塞那被一支阔刃之箭射中,箭色微黄,锋利如剃刀。

Verse 13

अथीैनं छिन्नधन्वानं रुक्मपुड्खै: शिलाशितै:

三阇耶说道:随后,他的弓已被斩断,众人又以金饰箭羽、石磨锐刃之箭射击他,逼迫战势更趋凌厉。

Verse 14

त्रिभि: शरैरसम्भ्रान्तो ललाटे वै समार्पयत्‌ । धनुष कट जानेपर उनके ललाटमें शिलापर तेज किये हुए सुनहरे पंखवाले तीन बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। उस समय चित्रसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई ।। हयांश्वास्य शरैस्तीक्ष्णै: प्रेषयामास मृत्यवे

三阇耶说道:他毫不慌乱,将三支箭稳稳钉入对手的额头。继而以锋利的箭矢,又将战马送向死亡。此景彰显战场技艺那冷峻的精确——一方镇定无惧,另一方则是战争所迫的残酷必然。

Verse 15

स शत्रुभुजनिर्मुक्तिर्ललाटस्थैस्त्रिभि: शरै:

三阇耶说道:额上钉着三支箭,他竟从敌人的钳制中得以解脱——脱离那敌臂的沉重箍缚。此句昭示:在战争残酷的“算计”里,解脱并非出于怜悯,而常由决断而致伤的力量带来;生存与职责,皆在无尽暴烈中被衡量。

Verse 16

स च्छिन्नधन्वा विरथ: खड्गमादाय चर्म च

三阇耶说道:他的弓被斩断,战车亦失,他便执剑持盾。战阵逼迫之中,当惯用之器尽毁,武士的决心便受考验——必须应变而不弃勇气与职责;而此景亦昭示近身搏杀那愈发阴沉的升级。

Verse 17

पद्भ्यामापततस्तस्य शरवृष्टिं समासृजत्‌

三阇耶说道:他徒步猛冲之际,向那对手倾泻箭雨——这是不屈战志的写照,勇气与技艺皆被驱使,奉献于那阴沉而以职责为名的战争。

Verse 18

चित्रसेनरथं प्राप्य चित्रयोधी जितश्रम:

三阇耶说道:及至抵达奇特罗塞那的战车旁,那位战斗辉煌的勇士——已克服疲惫——以新生之势继续逼进;此时战局的转折,所凭者乃坚忍不拔的持久,而非徒然的力之炫示。

Verse 19

सकुण्डलं समुकुटं सुनसं स्वायतेक्षणम्‌

三阇耶说道:“(他显现时)佩戴耳环与冠冕,鼻梁端正,双目硕大而修长。”

Verse 20

स पपात रथोपस्थे दिवाकरसमद्युति:,सूर्यके समान तेजस्वी चित्रसेन रथके पिछले भागमें गिर पड़ा। चित्रसेनको मारा गया देख वहाँ खड़े हुए पाण्डव महारथी नकुलको साधुवाद देने और प्रचुरमात्रामें सिंहनाद करने लगे

三阇耶说道:“光辉如日的质多罗仙倒在战车车台上,身躯向车后塌落。见质多罗仙已被诛杀,立于其处的般度婆诸大车战士齐声称赞那俱罗,并发出震天的狮子吼——在战争严酷的逼迫之中,昭示其勇武与守持正法的决心。”

Verse 21

चित्रसेनं विशस्तं तु दृष्टवा तत्र महारथा: | साधुवादस्वनांश्चक्रुः सिंहनादांश्व पुष्कलान्‌,सूर्यके समान तेजस्वी चित्रसेन रथके पिछले भागमें गिर पड़ा। चित्रसेनको मारा गया देख वहाँ खड़े हुए पाण्डव महारथी नकुलको साधुवाद देने और प्रचुरमात्रामें सिंहनाद करने लगे

众大车战士见质多罗仙被诛,便齐发喝彩之声,又连连发出雄狮般的长吼。

Verse 22

विशस्तं भ्रातरं दृष्टवा कर्णपुत्रौ महारथौ । सुषेण: सत्यसेनश्व मुज्चन्ती विविधान्‌ शरान्‌

三阇耶说道:“见兄弟被击倒,迦尔那的两位儿子——同为大车战士的苏舍那与萨底耶仙——便开始放出各式箭雨。”

Verse 23

ततो<भ्यधावतां तूर्ण पाण्डवं रथिनां वरम्‌ । अपने भाईको मारा गया देख कर्णके दो महारथी पुत्र सुषेण और सत्यसेन नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र नकुलपर तुरंत ही चढ़ आये ।। २२ *॥ जिघांसन्तौ यथा नागं व्याप्रौ राजन्‌ महावने,राजन! जैसे विशाल वनमें दो व्याप्र किसी एक हाथीको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर दौड़ें, उसी प्रकार तीखे स्वभाववाले वे दोनों भाई इन महारथी नकुलपर अपने बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे, मानो दो मेघ पानीकी धारावाहिक वृष्टि करते हों

三阇耶说道:“随后,他们迅疾冲向那俱罗——般度之子中最卓绝的车战士。迦尔那的两位大车战士之子苏舍那与萨底耶仙,见兄弟被杀,便以各式箭雨倾泻而下,立刻向那俱罗逼近。大王啊,正如广林之中两虎为求杀象而奔突而来,那两位性情刚烈的兄弟也如此将箭簇成阵倾注于大车战士那俱罗,宛若两片云层不断倾下连绵雨幕。”

Verse 24

तावभ्यधावतां तीक्ष्णौ द्वावप्येनं महारथम्‌ | शरौघान्‌ सम्यगस्यन्तौ जीमूती सलिलं यथा,राजन! जैसे विशाल वनमें दो व्याप्र किसी एक हाथीको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर दौड़ें, उसी प्रकार तीखे स्वभाववाले वे दोनों भाई इन महारथी नकुलपर अपने बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे, मानो दो मेघ पानीकी धारावाहिक वृष्टि करते हों

三阇耶说道:那两位凶猛的战士一齐冲向那位大车战士,瞄准得当,箭雨连绵倾泻而下——如同两片雨云放出一道道水流。

Verse 25

स शरै: सर्वतो विद्ध: प्रह्दष्ट इव पाण्डव: । अन्यत्‌ कार्मुकमादाय रथमारुह्य वेगवान्‌

三阇耶说道:虽被箭矢从四面八方射中,那位般度之子却仿佛兴奋昂扬。他又取起另一张弓,身手迅疾地再度登上战车——在痛楚中仍坚忍不屈,绝不向逆境低头。

Verse 26

तस्य तौ भ्रातरौ राजन्‌ शरै: संनतपर्वभि:

三阇耶说道:大王啊,他的两位兄弟被箭矢射中,那些箭的节处弯制得当、装配牢固——是在战阵逼迫之中专为致命而造的利矢。

Verse 27

ततः प्रहस्य नकुलश्षतुर्भिश्चतुरो रणे

三阇耶说道:随后,纳库拉含笑而立,在战场上迎对四名敌手——这是在战争的道德重压之下仍能镇定无畏的形象;此时被考验的不仅是臂力,更是心志。

Verse 28

ततः संधाय नाराचं रुक्मपुड्खं शिलाशितम्‌

三阇耶说道:随后,他搭上一支那罗遮箭——金羽为翎,石磨而锋——引弓瞄准,准备一击。

Verse 29

धनुश्चिच्छेद राजेन्द्र सत्यसेनस्थ पाण्डव: । राजेन्द्र! तत्पश्चात्‌ सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले एक नाराचका संधान करके पाण्डुपुत्र नकुलने सत्यसेनका धनुष काट दिया || २८ $ ।। अथान्यं रथमास्थाय धनुरादाय चापरम्‌

三阇耶说道:“大王啊,那与萨提耶塞那对阵的般度之子(那俱罗)斩断了他的弓。随后他登上另一辆战车,又执起一张新弓——战阵的节奏逼迫不息,技艺与坚决裁定生死;而战士的职责,是以自持与纪律去践行,并非出于仇恨。”

Verse 30

अविध्यत्‌ तावसम्भ्रान्तो माद्रीपुत्र: प्रतापवान्‌

三阇耶说道:“随后,摩德梨之勇子在战场纷乱之中仍不动摇、守持自心,击中了对手。”此句彰显:临战之德在于心神安定——以克制的决断行事,而非惊惶失措。

Verse 31

सुषेणस्तु ततः क्रुद्ध: पाण्डवस्य महद्‌ धनु:

三阇耶说道:“这时,苏舍那怒火炽盛,将目光投向般度之子那张雄强的大弓——那是战士威力与决意的象征,映照着战场上愈演愈烈的杀伐。”

Verse 32

अथान्यद्‌ धनुरादाय नकुल: क्रोधमूर्च्छित:

三阇耶说道:“于是,那俱罗被怒意所蔽、为其所驱,又执起另一张弓——这表明他将以更炽烈的气势重返战斗;而在战争的道德重压之下,愤怒开始牵引战士的作为。”

Verse 33

सत्यसेनस्य च भनुर्हस्तावापं च मारिष

三阇耶说道:“又有萨提耶塞那一系的婆奴,以及哈斯塔瓦帕,尊者啊。”在俱卢之野战争那阴沉的点名之中,叙述者继续报出诸位名将之名,显出多少生命与家族被卷入此劫;名声与职责,皆要与战祸的代价一并衡量。

Verse 34

अथान्यद्‌ धनुरादाय वेगघ्नं भारसाधनम्‌

桑阇耶说:于是他又取起另一张弓——能遏止敌军冲势、足以承受沉重拉力——准备迎接战斗的下一阶段。

Verse 35

संनिवार्य तु तान्‌ बाणान्‌ नकुल: परवीरहा

桑阇耶说:他挡下那些箭矢后,那俱罗——诛灭敌方勇将者——依旧稳立不退,迎受攻势而不屈,正合战场之责所要求的坚忍与克制。

Verse 36

तावेन॑ प्रत्यविध्येतां पृथक्‌ पृथगजिह्दगैः

桑阇耶说:随后二人各自回击,以直飞而中的箭矢相报——这般往复交锋,显出战斗已成不息的技艺与意志之争,而非克制退让。

Verse 37

सत्यसेनो रथेषां तु नकुलस्य धनुस्तथा

桑阇耶说:“在御者之中有真军(Satyasena);同样,还有那俱罗的弓。”此句延续对战士与其战具的列举,强调在战争里,个人英勇与赖以尽责的器械与助力本不可分。

Verse 38

स रथे5तिरथस्तिष्ठन्‌ रथशक्ति परामृशत्‌

桑阇耶说:他如一等战士般稳立车上,握住战车长枪,准备在这无休无止的战场职责中,发出下一记决断之击。

Verse 39

स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां तैलधौतां सुनिर्मलाम्‌ । लेलिहानामिव विभो नागकन्यां महाविषाम्‌

三阇耶说道:“噢,威力无边者!(他看见)一件兵器,金柄耀目,锋尖不钝,经油拭洗,洁净无瑕——宛如剧毒的蛇女,仿佛吐信舔舐。”此喻昭示:在战场上,即便工艺精绝的器物也会化作致命意图的徽记,美与光辉与危险不可分离。

Verse 40

समुद्यम्य च चिक्षेप सत्यसेनस्य संयुगे । तदनन्तर रथपर खड़े हुए अतिरथी वीर नकुलने एक रथशक्ति हाथमें ली, जिसमें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उसका अग्रभाग कहीं भी कुण्ठित होनेवाला नहीं था। प्रभो! तेलमें धोकर साफ की हुई वह निर्मल शक्ति जीभ लपलपाती हुई महाविषैली नागिनके समान प्रतीत होती थी। नकुलने युद्धस्थलमें सत्यसेनको लक्ष्य करके ऊपर उठाकर वह रथशक्ति चला दी ।। ३८-३९ $ ।। सा तस्य हृदयं संख्ये बिभेद च तथा नूप

三阇耶说道:在激战之中,那俱罗——卓越的车战勇士——举起一柄装有金柄的车矛(shakti)。其锋不钝,势不可当。经油洗拭,光洁澄明;刃端如吐信般颤动,宛若一条剧毒巨蛇。那俱罗在战场上锁定萨底耶塞那为目标,高举此矛而掷出。长矛命中并贯穿萨底耶塞那,直入其要害之处。

Verse 41

स पपात रथाद्‌ भूमिं गतसत्त्वो5ल्पचेतन: । नरेश्वर! उस शक्ति ने रणभूमिमें उसके वक्ष:स्थलको विदीर्ण कर दिया। सत्यसेनकी चेतना जाती रही और वह प्राणशून्य होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा || ४० ई ।। भ्रातरं निहतं दृष्टवा सुषेण: क्रोधमूर्च्छित:

三阇耶说道:他从战车上坠落于地,生气已绝,神识昏昧。大王啊,那矛在战场上撕裂了他的胸膛;萨底耶塞那的知觉离散,失却生命,从车上跌落到大地。见兄长被杀,苏舍那怒极而眩,几近昏厥……

Verse 42

चतुर्भिश्वतुरो वाहान्‌ ध्वजं छित्त्वा च पञचभि:

三阇耶说道:他以四箭斩落四匹战马,又以五箭截断战旗——此举显出战场技艺的冷酷精准:所求不仅在伤敌之身,更在击毁战车之力、挫折其士气,直取其支撑与徽号。

Verse 43

नकुलं विरथं दृष्टवा द्रौपदेयो महारथम्‌

三阇耶说道:见那俱罗失却战车,卓罗波底之子——那位大车战勇士——(便上前与之相对)。此句点明战场之道:战士一旦显出破绽,如被迫离车,便成决胜关头,既引来强敌的逼迫,也牵动同阵营援护之心。

Verse 44

सुतसोमो भिदुद्राव परीप्सन्‌ पितरं रणे । महारथी नकुलको रथहीन हुआ देख द्रौपदीका पुत्र सुतमोम अपने चाचाकी रक्षाके लिये वहाँ दौड़ा आया ।। ततो5घिरुह्मु नकुलः: सुतसोमस्य तं रथम्‌

三阇耶说道:见婆罗多族的大车战士那俱罗在战阵之中失却战车,德罗帕蒂之子苏多娑摩为护其叔父,疾驰而来。随后,那俱罗登上苏多娑摩的战车。

Verse 45

शुशुभे भरतश्रेष्ठो गिरिस्थ इव केसरी । तब सुतसोमके उस रथपर आरूढ़ हो भरतश्रेष्ठ नकुल पर्वतपर बैठे हुए सिंहके समान सुशोभित होने लगे ।। अन्यत्‌ कार्मुकमादाय सुषेणं समयोधयत्‌,उन्होंने दूसरा धनुष हाथमें लेकर सुषेणके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। वे दोनों महारथी वीर बाणोंकी वर्षाद्वारा एक-दूसरेसे टक्कर लेकर परस्पर वधके लिये प्रयत्न करने लगे

三阇耶说道:婆罗多族之最胜者那俱罗登上苏多娑摩之车,光辉如踞山之狮。又执一张新弓,与苏舍那交战。两位勇猛的大车战士以箭雨相迎相击,彼此力求置对方于死地。

Verse 46

तावुभौ शरवर्षाभ्यां समासाद्य परस्परम्‌ | परस्परवधे यत्नं चक्रतु: सुमहारथौ,उन्होंने दूसरा धनुष हाथमें लेकर सुषेणके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। वे दोनों महारथी वीर बाणोंकी वर्षाद्वारा एक-दूसरेसे टक्कर लेकर परस्पर वधके लिये प्रयत्न करने लगे

三阇耶说道:二人逼近相接,以箭雨相会。两位强大的车战士各自竭力求取对方之死,陷入无休无止的决斗。

Verse 47

सुषेणस्तु ततः क्रुद्ध: पाण्डवं विशिखैस्त्रिभि: | सुतसोम॑ तु विंशत्या बाह्दोरुरगसि चार्पयत्‌,उस समय सुषेणने कुपित होकर तीन बाणोंसे पाण्डुपुत्र नकुलको बींध डाला और सुतसोमकी दोनों भुजाओं एवं छातीमें बीस बाण मारे

三阇耶说道:于是苏舍那怒火炽盛,以三支利箭贯穿般度子那俱罗;又以二十箭射中苏多娑摩,尽钉其双臂与胸膛。

Verse 48

ततः क्रुद्धो महाराज नकुल: परवीरहा । शरैस्तस्य दिश: सर्वाश्छादयामास वीर्यवान्‌,महाराज! तत्पश्चात्‌ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी नकुलने कुपित हो बाणोंकी वर्षासे सुषेणकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया

三阇耶说道:于是那俱罗——勇力无双、善斩敌方豪杰——勃然大怒,王啊,以密如骤雨的箭矢遮蔽其敌周遭四方。

Verse 49

ततो गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रमर्धचन्द्रं सुतेजनम्‌ । सुवेगवन्तं चिक्षेप कर्णपुत्राय संयुगे,इसके बाद तीखी धारवाले एक अत्यन्त तेज और वेगशाली अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उसे समरांगणमें कर्णपुत्रपर चला दिया

三阇耶说道:随后,他取起一支半月形利箭,锋刃如剃刀,光芒炽烈,挟着惊人的疾速,在鏖战之中猛然掷向迦尔那之子。

Verse 50

तस्य तेन शिर: कायाज्जहार नृपसत्तम । पश्यतां सर्वसैन्यानां तदद्भुतमिवाभवत्‌,नृपश्रेष्ठ॒ उस बाणसे नकुलने सम्पूर्ण सेनाओंके देखते-देखते सुषेणका मस्तक धड़से काट गिराया। वह अद्भुत-सी घटना हुई

三阇耶说道:大王啊,他以那一箭当着诸军之面,将其首级从躯体上斩落;此举迅疾而威猛,几乎如同神迹一般。

Verse 51

स हत: प्रापतद्‌ राजन्‌ नकुलेन महात्मना । नदीवेगादिवारुग्णस्तीरज: पादपो महान्‌,महामनस्वी नकुलके हाथसे मारा जाकर सुषेण पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो नदीके वेगसे कटकर महान्‌ तटवर्ती वृक्ष धराशायी हो गया हो

三阇耶说道:大王啊,被大心的那俱罗击杀后,他坠落于地——如同河岸巨木,被急流之势从根基处撕断而倾倒。

Verse 52

कर्णपुत्रवधध॑ दृष्टवा नकुलस्य च विक्रमम्‌ । प्रदुद्राव भयात्‌ सेना तावकी भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! कर्णपुत्रोंका वध और नकुलका पराक्रम देखकर आपकी सेना भयसे भाग चली

三阇耶说道:见迦尔那之子被诛,又见那俱罗之勇,你的军队为恐惧所制,阵列崩散而奔逃,婆罗多族之雄牛啊。

Verse 53

तां तु सेनां महाराज मद्रराज: प्रतापवान्‌ । अपालयदू रणे शूर: सेनापतिररिंदम:,महाराज! उस समय रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर सेनापति प्रतापी मद्रराज शल्यने आपकी उस सेनाका संरक्षण किया

三阇耶说道:大王啊,在那场战斗中,勇武而显赫的摩陀罗之王——沙利耶——这位不可屈服、摧敌如摧枯的统帅,护持了你的军队。

Verse 54

विभीस्तस्थौ महाराज व्यवस्थाप्य च वाहिनीम्‌ | सिंहनादं भृशं कृत्वा धनु:शब्दं च दारुणम्‌,राजाधिराज! वे जोर-जोरसे सिंहनाद और धनुषकी भयंकर टंकार करके कौरव- सेनाको स्थिर रखते हुए रणभूमिमें निर्भय खड़े थे

三阇耶说道:大王啊!他整列并稳住军阵之后,便在战场上无畏而立,发出雄浑的狮子吼,又令弓弦震出骇人的厉响——以振奋己方、震慑敌军。

Verse 55

तावका: समरे राजन्‌ रक्षिता दृढ्धन्वना । प्रत्युद्ययुररातींस्तु समन्‍्ताद्‌ विगतव्यथा:,राजन! सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले राजा शल्यसे सुरक्षित हो व्यथाशून्य हुए आपके सैनिक समरमें सब ओरसे शत्रुओंकी ओर बढ़ने लगे

三阇耶说道:大王啊!在战斗中得坚弓的沙利耶王护持,你的勇士们忧惧尽消,遂从四面八方推进,迎击敌军。

Verse 56

मद्रराजं महेष्वासं परिवार्य समन्ततः । स्थिता राजन्‌ महासेना योद्धुकामा समन्ततः,नरेश्वरर आपकी विशाल सेना महाथधनुर्थर मद्रराज शल्यको चारों ओरसे घेरकर शत्रुओंके साथ युद्धके लिये खड़ी हो गयी

三阇耶说道:大王啊!你那渴望交战的浩大军势四面列立——已将摩陀罗王沙利耶、那位大弓手,团团围住,诸方皆备,随时开战。

Verse 57

सात्यकिर्भीमसेनश्व माद्रीपुत्री च पाण्डवौ । युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य ह्वीनिषेवमरिंदमम्‌,उधरसे सात्यकि, भीमसेन तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव शत्रुदमन एवं लज्जाशील युधिष्ठिरको आगे करके चढ़ आये

三阇耶说道:萨底耶吉、毗摩塞那,以及摩德丽所生的两位般度之子(那俱罗与娑诃提婆)一同推进,把坚战的由提施提罗置于前列——由提施提罗天性谦抑自持,却能降伏强敌。

Verse 58

परिवार्य रणे वीरा: सिंहनादं प्रचक्रिरे । बाणशड्खरवांस्तीव्रान्‌ क्ष्वेडाश्न विविधा दधु:,रणभूमिमें वे सभी वीर युधिष्ठिरको बीचमें करके सिंहनाद करने, बाणों और शंखोंकी तीव्र ध्वनि फैलाने तथा भाँति-भाँतिसे गर्जना करने लगे

三阇耶说道:在战阵之中,诸位英雄合围由提施提罗,齐发狮子般的怒吼;箭矢的尖啸与海螺号角的厉声充满原野,又响起种种战呼。

Verse 59

तथैव तावका: सर्वे मद्राधिपतिमज्जसा । परिवार्य सुसंरब्धा: पुनर्युद्रभरोचयन्‌,इसी प्रकार आपके समस्त सैनिक मद्रराजको चारों ओरसे घेरकर रोष और आवेशसे युक्त हो पुनः युद्धमें ही रुचि दिखाने लगे

桑阇耶说道:“正是如此,你方诸将士迅速从四面围住摩陀罗之主,怒火与狂烈的战意翻涌,再次显出渴望厮杀的心。”

Verse 60

ततः प्रववृते युद्ध भीरूणां भयवर्धनम्‌ । तावकानां परेषां च मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्‌,तदनन्तर मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिका निमित्त बनाकर आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमें घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंका भय बढ़ानेवाला था

桑阇耶说道:“随后战斗汹涌爆发——这场厮杀使怯懦者的恐惧倍增。你方与敌方的勇士们拼杀到这般地步:唯有死亡本身才成了退却的缘由;人们不是被击倒,便是在致命危机逼迫下才不得不后退。”

Verse 61

यथा देवासूुरं युद्ध पूर्वमासीद्‌ विशाम्पते । अभीतानां तथा राजन्‌ यमराष्ट्रविवर्धनम्‌,राजन! प्रजानाथ! जैसे पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार भयशून्य कौरवों और पाण्डवोंमें यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला भयंकर संग्राम होने लगा

桑阇耶说道:“人民之主啊,正如远古之时天神与阿修罗曾有大战,如今,王啊,无畏的俱卢与般度诸子之间也爆发了可怖的战斗——此战使阎摩(死王)的国度愈加扩张。”

Verse 62

ततः कपिध्वजो राजन्‌ हत्वा संशप्तकान्‌ रणे । अभ्यद्रवत तां सेनां कौरवीं पाण्डुनन्दन:,नरेश्वर! तदनन्तर पाण्डुनन्दन कपिध्वज अर्जुनने भी संशप्तकोंका संहार करके रणभूमिमें उस कौरवसेनापर आक्रमण किया

桑阇耶说道:“于是,王啊,般度之子阿周那——旗帜上绘有哈奴曼之徽(猴旗)者——在战场上诛灭誓死之众(萨摩沙跋多迦)之后,便径直冲入那俱卢大军。”

Verse 63

तथैव पाण्डवा: सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमा: । अभ्यधावन्त तां सेनां विसृजन्त: शितान्‌ शरान्‌,इसी प्रकार धृष्टद्युम्म आदि समस्त पाण्डववीर पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए आपकी उस सेनापर चढ़ आये

桑阇耶说道:“同样地,诸般度勇士在德里ष्ट杜摩那率领下,向那军阵直冲而去,纷纷放出锐利的箭雨。”

Verse 64

पाण्डवैरवकीर्णानां सम्मोह: समजायत | न च जज्ञुस्त्वनीकानि दिशो वा विदिशस्तथा,पाण्डवोंके बाणोंसे आच्छादित हुए कौरव-योद्धाओंपर मोह छा गया। उन्हें दिशाओं अथवा विदिशाओंका भी ज्ञान न रहा

三阇耶说道:当俱卢军的战士被般度诸子射来的箭雨穿透并覆没之时,他们心神迷乱。于那混战迷雾中,他们已不能辨识本军的阵形,甚至连方位与四隅之间的中间方也分不清——战场的逼迫使其感官与判断尽皆被淹没。

Verse 65

आपूर्यमाणा निशितै: शरै: पाण्डवचोदितै: । हतप्रवीरा विध्वस्ता वार्यमाणा समन्तत:

三阇耶说道:“在般度诸子的逼迫下,那支军队被锋利的箭矢贯穿充塞,仿佛满身皆箭。其前锋豪杰尽被诛戮,行列崩散;纵然四面挣扎欲守,终究被驱退而溃裂。”

Verse 66

पाण्डवोंके चलाये हुए पैने बाणोंसे व्याप्त हो कौरवसेनाके मुख्य-मुख्य वीर मारे गये। वह सेना नष्ट होने लगी और चारों ओरसे उसकी गति अवरुद्ध हो गयी ।। कौरव्यवध्यत चमू: पाण्डुपुत्रैर्महारथै: । तथैव पाण्डवं सैन्यं शरै राजन्‌ समन्ततः

三阇耶说道:俱卢军正被般度诸子——诸位大车战士——不断斩落;而在另一边,般度军亦在四面八方被箭雨击中、被围逼。于是战斗化作相互毁灭:勇武与技艺不偏不倚地降下死亡,战场堆满阵亡豪杰,军阵的进退也在各处被扼塞。

Verse 67

ते सेने भृशसंतप्ते वध्यमाने परस्परम्‌

三阇耶说道:当那两军饱受煎熬,在相互屠戮中彼此斩杀之时,战场便成了极苦之境与无休止的暴力回响——双方同在一轮战争之环里,既为施害者,亦为受害者。

Verse 68

व्याकुले समपद्येतां वर्षासु सरिताविव । जैसे वर्षाकालमें दो नदियाँ एक-दूसरीके जलसे भरकर व्याकुल-सी हो उठती हैं, उसी प्रकार आपसकी मार खाती हुई वे दोनों सेनाएँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं ।। ६७ ई ।। आविवेश ततस्तीव्रं तावकानां महद्‌ भयम्‌ । पाण्डवानां च राजेन्द्र तथाभूते महाहवे,राजेन्द्र! उस अवस्थामें उस महासमरमें खड़े हुए आपके और पाण्डवयोद्धाओंके मनमें भी दु:ःसह एवं भारी भय समा गया

三阇耶说道:如雨季两河,因彼此之水而暴涨,翻涌激荡;两军相击亦如是,困苦至极。于是,大王啊,在那场大决战中,当战斗呈现出那般可怖之相时,猛烈而沉重的恐惧侵入了你方将士与般度诸子之心。

Verse 113

परस्परवधे यत्तौ छिद्रान्वेषणतत्परौ । उस समय वहाँ पाण्डुपुत्र नकुल और कर्णकुमार चित्रसेनमें मुझे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दोनों ही अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान, बलवान्‌ तथा रथयुद्धमें कुशल थे। परस्पर घातमें लगे हुए वे दोनों वीर एक-दूसरेके छिद्र (प्रहारके योग्य अवसर) ढूँढ़ रहे थे

三阇耶说道:二人皆志在相互毁灭,心神尽系于搜寻对方可乘之隙。就在那一刻,在我眼中,般度之子那俱罗与迦尔那之子质多罗塞那并无差别:二者皆通晓兵器之学,力大无比,且善于战车之战。两位英雄相互攻伐之际,仍不断窥伺哪怕最细微的疏漏——那可依战法而成正当一击的机会;而战场的狂烈之势,又将他们逼向致命的终局。

Verse 126

नकुलस्य महाराज मुष्टिदेशे5च्छिनद्‌ धनु: । महाराज! इतनेहीमें चित्रसेनने एक पानीदार पैने भल्लके द्वारा नकुलके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया

三阇耶说道:大王啊,质多罗塞那以一支锋利而淬炼精良的婆罗(bhalla)箭,正从那俱罗弓的握把处——手所执之处——将其斩断,使其兵器在战斗中顷刻失用。

Verse 143

तथा ध्वजं सारथिं च त्रिभिस्त्रिेभिरपातयत्‌ । उसने अपने तीखे बाणोंद्वारा नकुलके घोड़ोंको भी मृत्युके हवाले कर दिया तथा तीन- तीन बाणोंसे उनके ध्वज और सारथिको भी काट गिराया

三阇耶说道:同样地,他以三箭各自射落战旗与御者。凭其锐利的箭矢,他也将那俱罗的战马送入死亡。

Verse 153

नकुल: शुशुभे राजंस्त्रिशुड्र इव पर्वत: । राजन! शत्रुकी भुजाओंसे छूटकर ललाटमें धँसे हुए उन तीन बाणोंके द्वारा नकुल तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पाने लगे

三阇耶说道:“大王啊,那俱罗宛如三峰之山般熠熠生辉,因为那三支箭——自敌人臂力所发——已深深没入他的额头。”

Verse 163

रथादवातरद्‌ वीर: शैलाग्रादिव केसरी । धनुष कट जानेपर रथहीन हुए वीर नकुल हाथमें ढाल-तलवार लेकर पर्वतके शिखरसे उतरनेवाले सिंहके समान रथसे नीचे आ गये

三阇耶说道:那位勇士从战车上跃下,宛如雄狮自山巅下行。弓既被斩断,他虽失却战车,却不弃勇毅与职责;遂执剑持盾,下车继续鏖战,在战乱喧嚣中仍守其坚决之志。

Verse 173

नकुलो>प्यग्रसत्‌ तां वै चर्मणा लघुविक्रम: । उस समय चित्रसेन पैदल आक्रमण करनेवाले नकुलके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। परंतु शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नकुलने ढालके द्वारा ही रोककर उस बाण-वर्षाको नष्ट कर दिया

三阇耶说道:那俱罗也向前逼近。他行动迅捷,以盾迎挡来袭的箭雨,使射向他的那一阵“飞矢之雨”尽皆落空。此景彰显战场上有纪律的勇气——面对侵攻,不以鲁莽相抗,而以警觉的防守与克制的英勇从容应对。

Verse 186

आरुरोह महाबाहु: सर्वसैन्यस्य पश्यत: । विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले महाबाहु नकुल परिश्रमको जीत चुके थे। वे सारी सेनाके देखते-देखते चित्रसेनके रथके समीप जा उसपर चढ़ गये

三阇耶说道:在全军注视之下,那位臂力雄伟的勇士纵身登上前去。那俱罗以奇巧多变之战法克服了疲惫;当众军皆目睹之时,他逼近质多罗塞那的战车,并攀上其车。

Verse 193

चित्रसेनशिर: कायादपाहरत पाण्डव: । तत्पश्चात्‌ पाण्डुकुमारने सुन्दर नासिका और विशाल नेत्रोंसे युक्त कुण्डल और मुकुटसहित चित्रसेनके मस्तकको धड़से काट लिया

三阇耶说道:一位般度子弟击倒质多罗塞那,将其首级从躯体上斩下并夺取。继而,般度之子又把质多罗塞那那戴着耳环与王冠、鼻梁俊秀、双目宏大的头颅从身躯上截断——描绘出战场“裁决”的森然终局:勇武与命运在此汇合,化作不可逆转的丧失。

Verse 256

अतिष्ठत रणे वीर: क्रुद्धरूप इवान्तक: । सब ओरसे बाणोंद्वारा विद्ध होनेपर भी पाण्डुकुमार नकुल हर्ष और उत्साहमें भरे हुए वीर योद्धाकी भाँति दूसरा धनुष हाथमें लेकर बड़े वेगसे दूसरे रथपर जा चढ़े और कुपित हुए कालके समान रणभूमिमें खड़े हो गये

三阇耶说道:在鏖战之中,那位英雄屹立不动,怒相如阎摩——终结者。纵使四面皆被箭矢穿刺,那俱罗——般度之子——仍满怀欢欣与斗志,手执另一张弓,以极快之势跃上另一乘战车。于是,他如被激怒的“时”(迦罗)一般,仍立于战场——在战争的暴烈之中,勇气与决心毫不动摇。

Verse 266

रथं विशकलीकर्तु समारब्धौ विशाम्पते । राजन! प्रजानाथ! उन दोनों भाइयोंने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा नकुलके रथके टुकड़े-टुकड़े करनेकी चेष्टा आरम्भ की

三阇耶说道:噢,民之主,噢,大王,护佑臣民者——那两位兄弟开始试图将那俱罗的战车击碎成片,发射带“曲节”(弯结、曲关节)的箭矢以求拆毁。此景凸显战场战术的冷酷精准:瘫痪一名战士的乘具,便是直接打击其作战与生存之能。

Verse 273

जघान निशितैर्बाणै: सत्यसेनस्यथ वाजिन: । तब नकुलने हँसकर रणभूमिमें चार पैने बाणोंद्वारा सत्यसेनके चारों घोड़ोंको मार डाला

三阇耶说道:他以锋利之箭射倒了萨提耶塞那的战马。继而,纳库拉在兵刃交击的喧嚣中自信含笑,于战场上以四支劲锐之矢一一射毙萨提耶塞那的四匹骏马——此举在当下并不直取武士性命,而是先断其机动与战车之力,正合战车之战的战术与节制之道。

Verse 293

सत्यसेन: सुषेणश्च पाण्डवं पर्यधावताम्‌ । इसके बाद दूसरे रथपर सवार हो दूसरा धनुष हाथमें लेकर सत्यसेन और सुषेण दोनोंने पाण्डुकुमार नकुलपर धावा किया

三阇耶说道:萨提耶塞那与苏舍那追逐那位般度之子而疾驰而来。继而他们登上另一乘战车,手执第二张弓——萨提耶塞那与苏舍那二人一齐向般度之子纳库拉发起冲击。此偈凸显战阵不息的势头:决意与战术上的随时应变,驱使一次又一次的猛攻,在血火之中考验武士的沉着与职责。

Verse 303

द्वाभ्यां द्वाभ्यां महाराज शराभ्यां रणमूर्थनि । महाराज! माद्रीके प्रतापी पुत्र नकुलने बिना किसी घबराहटके युद्धके मुहानेपर दो-दो बाणोंसे उन दोनों भाइयोंको घायल कर दिया

三阇耶说道:大王啊,在战阵最前沿,他以箭“二二相继”射中他们,使两位兄弟皆负伤。大王!玛德丽那英勇的儿子纳库拉临战毫不惊惶,于战斗的门槛处以每次两矢伤及那对兄弟。此景彰显战争冷峻而不息的精准:勇气与技艺毫不迟疑地展露,而伤及亲族的道德重负,则在俱卢之野的大悲剧中默然潜伏。

Verse 316

चिच्छेद प्रहसन युद्धे क्षुरप्रेण महारथ: । इससे सुषेणको बड़ा क्रोध हुआ। उस महारथीने हँसते-हँसते युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा पाण्डुकुमार नकुलके विशाल धनुषको काट डाला

三阇耶说道:战斗正酣之际,那位大车战士含笑而战,以剃刃般锋利的箭矢斩断了般度之子纳库拉的强弓。此举—从容自负、似不费力—激起苏舍那的盛怒,使这场交锋在无情的战场法度之中更添一层私人恩怨的锋芒。

Verse 326

सुषेणं पञ्चभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे । फिर तो नकुल क्रोधसे तमतमा उठे और दूसरा धनुष लेकर उन्होंने पाँच बाणोंसे सुषेणको घायल करके एकसे उसकी ध्वजाको भी काट डाला

三阇耶说道:他以五箭贯穿苏舍那,继而又以一矢斩断其旗帜。此举旨在摧折敌军的傲气,并在战场职责的无情法度中昭示己方的压倒之势。

Verse 333

चिच्छेद तरसा युद्धे तत उच्चुक्रुशुर्जना: । आर्य! इसके बाद रणभूमिमें सत्यसेनके धनुष और दस्तानेके भी नकुलने वेगपूर्वक टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इससे सब लोग जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे

三阇耶说道:在战斗的炽烈之中,他迅疾一击将其斩断;见此情景,众人齐声高呼。随后在战场上,纳库拉又以惊人的速度,将萨提耶塞那的弓与护手手套也击碎成片,令目睹者尽皆喧嚣震动。

Verse 343

शरै: संछादयामास समन्तात्‌ पाण्डुनन्दनम्‌ | तब सत्यसेनने शत्रुका वेग नष्ट करनेवाले दूसरे भारसाधक धनुषको हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन नकुलको ढक दिया

三阇耶说道:他以箭雨从四面八方将般度之子完全遮蔽。战斗正酣之际,善于迅猛突击、意在摧折敌势的勇士萨提耶塞那又执起一张强弓,以连绵齐发的箭矢,将般度五子之一的纳库拉笼罩在箭幕之中。

Verse 376

पृथक्‌ शराभ्यां चिच्छेद कृतहस्त: प्रतापवान्‌ । तत्पश्चात्‌ सिद्धहस्त और प्रतापी वीर सत्यसेनने पृथक्‌-पृथक्‌ दो-दो बाणोंसे नकुलका धनुष और उनके रथके ईषादण्ड भी काट डाले

三阇耶说道:那位强悍的战士,手法纯熟、威势逼人,以两支各自射出的箭将其斩断。随后,英勇而稳准的萨提耶塞那又以一对对分开射出的箭,削断了纳库拉的弓,甚至连他战车的车辕长杆也一并截落。

Verse 413

अभ्यवर्षच्छरैस्तूर्ण पादातं पाण्डुनन्दनम्‌ । भाईको मारा गया देख सुषेण क्रोधसे व्याकुल हो उठा और तुरंत ही हरसा कट जानेसे पैदल हुए-से पाण्डुनन्दन नकुलपर बाणोंकी वर्षा करने लगा

三阇耶说道:见兄弟被杀,苏舍那悲愤交加,怒火翻涌,立刻向般度之子纳库拉倾泻箭雨——那时纳库拉因坐骑被斩倒,不得不徒步应战。

Verse 423

त्रिभिवव सारथिं हत्वा कर्णपुत्रो ननाद ह । उसने चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको मार डाला और पाँचसे उनकी ध्वजा काटकर तीनसे सारथिके भी प्राण ले लिये। इसके बाद कर्णपुत्र जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा

三阇耶说道:以三箭射杀御者之后,迦尔那之子放声长啸。战斗正酣时,他以四箭迅速射倒四匹战马,又以五箭斩断战旗,继而再以三箭夺去车夫性命。随后,迦尔那之子如狮子般大吼,震动战场。

Verse 663

रणे5हन्यत पुत्रैस्ते शतशशो5थ सहस््रशः । राजन! महारथी पाण्डुपुत्र कौरव-सेनाका वध करने लगे। इसी प्रकार आपके पुत्र भी पाण्डव-सेनाके सैकड़ों, हजारों वीरोंका समरांगणमें सब ओरसे अपने बाणोंद्वारा संहार करने लगे

三阇耶说道:在战场上,你的诸子成百、继而成千地击倒勇士。大王啊,般度诸子中的那位大车战士开始在俱卢军阵中掀起大屠戮。同样地,你的诸子也在战场四面八方以箭矢毁灭般度军中成百上千的英雄——这正是战争怒潮层层升级的图景:武勇压过克制,代价以生命计,而非仅以胜利计。

Verse 3536

सत्यसेन सुषेणं च द्वाभ्यां द्वाभ्यामविध्यत । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने उन बाणोंका निवारण करके सत्यसेन और सुषेणको भी दो-दो बाणोंद्वारा घायल कर दिया

三阇耶说道:他以两箭各中萨提耶塞那与苏舍那。那俱罗——素以诛灭敌方勇将著称——格开来矢,继而从容还击,也以两箭各伤萨提耶塞那与苏舍那,显出乱军之中仍能自持的武艺。

Verse 3636

सारथिं चास्य राजेन्द्र शितैर्विव्यधतु: शरै: । राजेन्द्र! फिर उन दोनों भाइयोंने भी पृथक्‌ू-पृथक्‌ अनेक बाणोंसे नकुलको बींध डाला और पैने बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया

三阇耶说道:“大王啊,那两兄弟以锐利之箭穿透了他;又以劲利之矢伤及他的御者。”此句凸显战势无情升级:连驾车之人——本为关键支援而非战斗者——也在战火狂澜中被牵入伤害。

Frequently Asked Questions

The chapter frames a practical dharma-tension: whether commanders should pursue decisive personal engagement to arrest collapse (Śalya’s advance) versus the duty to preserve order and minimize cascading harm amid battlefield panic and omens.

Agency operates under constraint: even skilled leadership and valor unfold within unstable systems shaped by morale, logistics (chariots, drivers), and perceived signs of kāla; effectiveness depends on disciplined response rather than mere ferocity.

No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is historiographic—Sanjaya’s witnessing organizes chaos into intelligible causality, reinforcing the epic’s ethical memory of war’s systemic costs.