Adi ParvaAdhyaya 3053 Verses

Adhyaya 30

Garuḍa–Śakra Saṃvāda and the Retrieval of Amṛta (गरुड–शक्र संवादः अमृत-अपहरण-प्रसङ्गः)

Upa-parva: Āstīka Upākhyāna (Garuḍa–Amṛta Episode)

Garuḍa offers Śakra (Indra) friendship and, when asked, states his extraordinary strength while disclaiming self-praise as improper unless queried. He claims capacity to bear the earth with mountains and oceans, emphasizing unwearied power. Indra responds by accepting the alliance and requests that Garuḍa not give the soma/amṛta to others, warning of resulting hostility. Garuḍa clarifies he is transporting it for a specific purpose and will not hand it over to anyone; instead he proposes to place it somewhere so Indra may swiftly take it. Pleased, Indra offers a boon; Garuḍa asks that the powerful serpents become his food, aligning with his role as nāga-adversary and recalling the coercive conditions tied to his mother’s servitude. Garuḍa returns to the serpents, announces he will place the amṛta on kuśa grass, and instructs them to bathe and perform auspicious rites before drinking; he also declares his mother freed as agreed. When the serpents depart for ritual preparation, Indra retrieves the amṛta. The serpents return, realize the amṛta is gone, and lick the darbha, resulting in their tongues becoming bifurcated; darbha becomes ritually purified by amṛta-contact. The chapter closes with a phalaśruti: hearing or reciting this account is said to yield merit and ascent to heaven through praising Garuḍa.

Chapter Arc: गरुड एक विशाल वट-वृक्ष की महाशाखा तोड़कर उड़ान भरते हैं—पर उसी क्षण उनकी दृष्टि नीचे उलटे लटके तपोरत वालखिल्य ब्रह्मर्षियों पर पड़ती है, और बल के साथ विवेक की परीक्षा आरम्भ होती है। → अपरिमित वेग से उड़ते हुए भी गरुड यह निश्चय करते हैं कि ‘ऋषियों को हानि नहीं होनी चाहिए’; वे शाखा को संभाले रखते हैं और सोचते हैं कि इसे कहाँ छोड़ा जाए जहाँ मनुष्यों का निवास न हो और तपस्वियों का अपमान भी न हो। महर्षि उनके अलौकिक सामर्थ्य को देखकर विस्मित होते हैं और ‘महाखग’ नाम से उनका अभिषेक-सा कर देते हैं। → गरुड महर्षियों से विनीत होकर पूछते हैं—‘भगवन्, इस शाखा को मैं कहाँ छोड़ूँ?’—और उसी समय उनके अद्भुत कर्म से आकाश में बिना बादल के भी विकट गर्जना, अशुभ उत्पात और देवताओं में हलचल उठती है; इन्द्र स्वयं कारण पूछते हैं कि शत्रु दिखता नहीं, फिर यह भय क्यों। → देवगण युद्ध के लिए सज्ज हो जाते हैं—असुर-पुर-विदारक तेजस्वी सुर परिघों और आयुधों से भरकर आकाश को तपन-किरणों-सा दीप्त कर देते हैं; गरुड का पराक्रम देव-लोक तक कंपित कर देता है और कथा देव-सभा की तैयारी पर ठहरती है। → देवता शस्त्र धारण कर मोर्चा बाँधते हैं—अब प्रश्न यह है कि यह उत्पात किसके विरुद्ध है: क्या गरुड स्वयं देवताओं के सामने चुनौती बनेंगे, या कोई और महान प्रयोजन प्रकट होगा?

Shlokas

Verse 1

न-आऔका-<० ड-ण करा - “कनिष्छान्‌ पुत्रवत्‌ पश्येज्ज्येष्ठो भ्राता पितु: समः' अर्थात्‌ “बड़ा भाई पिताके समान होता है। वह अपने छोटे भाइयोंको पुत्रके समान देखे।” यह शास्त्रकी आज्ञा है। जिनमें फूट हो जाती है, वे पीछे इस आज्ञाका पालन नहीं कर पाते। त्रिशो5थ्याय: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना सौतिरुवाच स्पृष्टमात्रा तु पद्धयां सा गरुडेन बलीयसा । अभज्यत तरो: शाखा भग्नां चैनामधारयत्‌,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकादि महर्षियो! महाबली गरुडके पैरोंका स्पर्श होते ही उस वृक्षकी वह महाशाखा टूट गयी; किंतु उस टूटी हुई शाखाको उन्होंने फिर पकड़ लिया

اُگرشروَا نے کہا—اے شونک وغیرہ مہارشیو! مہابلی گرُڑ کے پاؤں کے محض چھونے سے ہی اُس درخت کی وہ عظیم شاخ ٹوٹ گئی؛ مگر ٹوٹی ہوئی شاخ کو بھی اُس نے تھام لیا اور گرنے نہ دیا۔

Verse 2

तां भड़्क्‍्त्वा स महाशाखां स्मयमानो विलोकयन्‌ । अथात्र लम्बतो5पश्यद्‌ वालखिल्यानधोमुखान्‌,उस महाशाखाको तोड़कर गरुड मुसकराते हुए उसकी ओर देखने लगे। इतनेहीमें उनकी दृष्टि वालखिल्य नामवाले महर्षियोंपर पड़ी, जो नीचे मुँह किये उसी शाखामें लटक रहे थे

اُس عظیم شاخ کو توڑ کر گرُڑ مسکراتے ہوئے اِدھر اُدھر دیکھنے لگا۔ اتنے میں اُس کی نظر والکھلیہ نام کے مہارشیوں پر پڑی، جو اسی شاخ سے اُلٹے لٹک رہے تھے۔

Verse 3

ऋष यो ह्वात्र लम्बन्ते न हन्‍्यामिति तानूषीन्‌ । तपोरतान्‌ लम्बमानान ब्रह्मर्षीनभिवीक्ष्य सः,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था

تپسیا میں رَت اُن برہمرشیوں کو اسی شاخ سے اُلٹا لٹکتا دیکھ کر گرُڑ نے دل میں سوچا—“یہاں رشی لٹک رہے ہیں؛ کہیں میرے سبب ان کا وध نہ ہو جائے۔ یہ گرتی ہوئی شاخ یقیناً اِن رشیوں کو مار ڈالے گی۔” یہ سوچ کر بہادر پرندوں کے راجا گرُڑ نے ہاتھی اور کچھوے کو اپنے پنجوں سے مضبوطی سے پکڑ لیا، اور اُن مہارشیوں کی ہلاکت کے خوف سے جھپٹ کر اس شاخ کو اپنی چونچ میں تھام لیا۔ انہی مُنیوں کی حفاظت کے لیے گرُڑ نے یہ حیرت انگیز پرाकرم دکھایا تھا۔

Verse 4

हन्यादेतान्‌ सम्पतन्ती शाखेत्यथ विचिन्त्य सः । नखैर्दढतरं वीर: संगृह्द गजकच्छपौ,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था

تپسیا میں منہمک برہمرشیوں کو برگد کی گرتی ہوئی شاخ سے لٹکا دیکھ کر گرُڑ نے سوچا—“یہ شاخ ٹوٹ کر گر رہی ہے؛ اگر یہ گری تو یہ رشی یقینا ہلاک ہو جائیں گے—ان کی موت میرے سبب نہ ہو۔” یہ ارادہ کر کے اس بہادر نے اپنے پنجوں سے ہاتھی اور کچھوے کو اور زیادہ مضبوطی سے تھام لیا، اور مہارشیوں کی ہلاکت کے خوف سے جھپٹ کر اس شاخ کو اپنی چونچ میں لے لیا۔ منیوں کی حفاظت ہی کے لیے گرُڑ نے یہ حیرت انگیز کارنامہ انجام دیا۔

Verse 5

स तद्विनाशसंत्रासादभिपत्य खगाधिप: । शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षया,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था

ان کی ہلاکت کے اندیشے سے خوف زدہ ہو کر پرندوں کے سردار گرُڑ نے جھپٹ کر اس شاخ کو اپنی چونچ میں تھام لیا اور اپنی توجہ انہی منیوں پر مرکوز رکھی۔ گرتی ہوئی شاخ سے تپسویوں کا قتل نہ ہو—اسی خوف سے اس نے یہ کیا اور انہیں گزند سے بچایا۔

Verse 6

अतिदैवं तु तत्‌ तस्य कर्म दृष्टवा महर्षय: । विस्मयोत्कम्पह्दया नाम चक्रुर्महाखगे,जिसे देवता भी नहीं कर सकते थे, गरुडका ऐसा अलौकिक कर्म देखकर वे महर्षि आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें कम्प छा गया और उन्होंने उस महान्‌ पक्षीका नाम इस प्रकार रखा (उनके गरुड नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की)--

اس کا وہ کارنامہ—جو گویا دیوتاؤں کی قدرت سے بھی بڑھ کر تھا—دیکھ کر مہارشی حیرت و دہشتِ اعجاب میں ڈوب گئے۔ تعجب سے ان کے دل کانپ اٹھے اور انہوں نے اس عظیم پرندے کو اسی عمل کی عظمت کے مطابق ایک نام عطا کیا۔

Verse 7

गुरु भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगम: । गरुडस्तु खगश्रेष्स्तस्मात्‌ पन्नमनभोजन:,ये आकाशमें विचरनेवाले सर्पभोजी पक्षिराज भारी भार लेकर उड़े हैं; इसलिये (“गुरुम्‌ आदाय उड्डीन इति गरुड:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार) ये गरुड कहलायेंगे

“اس پرندے نے بھاری بوجھ اٹھا کر آسمان کی طرف پرواز کی؛ اسی لیے یہ پرندوں میں افضل ‘گرُڑ’ کہلائے گا”—یوں (رشی نے) نام کی روایتی اشتقاق بیان کی۔ ساتھ ہی یہ بھی بتایا گیا کہ وہ سانپ خور کہلاتا ہوا بھی ضبط والا ہے—یعنی سانپوں کو غذا نہیں بناتا۔

Verse 8

ततः शनै: पर्यपतत्‌ पक्षै: शैलान्‌ प्रकम्पयन्‌ । एवं सो5भ्यपतद्‌ देशान्‌ बहूनू सगजकच्छप:,तदनन्तर गरुड अपने पंखोंकी हवासे बड़े-बड़े पर्वतोंको कम्पित करते हुए धीरे-धीरे उड़ने लगे। इस प्रकार वे हाथी और कछुएको साथ लिये हुए ही अनेक देशोंमें उड़ते फिरे

پھر گرُڑ آہستہ آہستہ پرواز کرنے لگا؛ اس کے پروں کی زوردار جنبش سے پہاڑ تک لرز اٹھتے تھے۔ یوں وہ ہاتھی اور کچھوے کو ساتھ لیے ہوئے بہت سے ملکوں کے اوپر سے اڑتا پھرتا رہا۔

Verse 9

दयार्थ वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । स गत्वा पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनमञज्जसा,वालखिल्य ऋषियोंके ऊपर दयाभाव होनेके कारण ही वे कहीं बैठ न सके और उड़ते- उड़ते अनायास ही पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर जा पहुँचे

والکھلیہ رشیوں پر رحم کھا کر اسے بیٹھنے یا ٹھہرنے کی کوئی جگہ نہ ملی؛ چنانچہ وہ بلا تاخیر تیزی سے پہاڑوں کے سردار گندھمادن کی طرف روانہ ہو گیا۔

Verse 10

ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम्‌ | ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम्‌,वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा। पिताने भी अपने पुत्रको देखा। पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे। उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था। वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे

وہاں اس نے اپنے والد کشیپ کو دیکھا جو تپسیا میں مستغرق تھے؛ اور باپ نے بھی اپنے بیٹے کو دیکھا—ایک پرندہ، جس کا روپ دیوی تھا۔

Verse 11

तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम्‌ । शैलशड्डप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्‌,वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा। पिताने भी अपने पुत्रको देखा। पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे। उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था। वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे

وہ تیز، شجاعت اور قوت سے آراستہ تھا؛ ذہن اور ہوا کی طرح برق رفتار؛ پہاڑ کی چوٹی کی مانند بلند و نمایاں؛ اور اٹھے ہوئے برہمدنڈ کی طرح سربلند دکھائی دیتا تھا۔

Verse 12

अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम्‌ । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम्‌,उनका स्वरूप ऐसा था, जो चिन्तन और ध्यानमें नहीं आ सकता था। वे समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने अपने भीतर महान्‌ पराक्रम धारण कर रखा था। वे बहुत भयंकर प्रतीत होते थे। जान पड़ता था, उनके रूपमें स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये हैं

اس کا روپ ناقابلِ تصور، دھیان سے ماورا اور تمام جانداروں کے لیے ہیبت ناک تھا۔ عظیم قوت اپنے اندر سمیٹے وہ نہایت رَودْر دکھائی دیتا تھا—گویا خود آگ سامنے ظاہر ہو گئی ہو۔

Verse 13

अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसै: । भेत्तारं गिरिशुज्भाणां समुद्रजलशोषणम्‌,देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी न तो उन्हें दबा सकता था और न जीत ही सकता था। वे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण करने और समुद्रके जलको सोख लेनेकी शक्ति रखते थे

وہ دیوتاؤں، دانَووں اور راکشسوں کے لیے بھی ناقابلِ مغلوب اور ناقابلِ تسخیر تھا۔ وہ پہاڑوں کی چوٹیوں کو چیر دینے والا اور سمندر کے پانی تک کو سُکھا لینے کی قدرت رکھتا تھا۔

Verse 14

लोकसंलोडडनं घोर कृतान्तसमदर्शनम्‌ | तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान्‌ कश्यपस्तदा । विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमत्रवीत्‌,वे समस्त संसारको भयसे कम्पित किये देते थे। उनकी मूर्ति बड़ी भयंकर थी। वे साक्षात्‌ यमराजके समान दिखायी देते थे। उन्हें आया देख उस समय भगवान्‌ कश्यपने उनका संकल्प जानकर इस प्रकार कहा

وہ نہایت ہولناک ہیبت رکھتا تھا، ساری دنیا کو خوف سے لرزا دینے والا، اور گویا خود یمراج کی مانند دکھائی دیتا تھا۔ اسے آتے دیکھ کر، بھگوان کشیپ نے اس کے دل کا ارادہ جان کر اسی وقت یہ کلام فرمایا۔

Verse 15

कश्यप उवाच पुत्र मा साहसं कार्षी्मा सद्यो लप्स्यसे व्यथाम्‌ | मा त्वां दहेयु: संक्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपा:,कश्यपजी बोले--बेटा! कहीं दुःसाहसका काम न कर बैठना, नहीं तो तत्काल भारी दुःखमें पड़ जाओगे। सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य महर्षि कुपित होकर तुम्हें भस्म न कर डालें

کشیپ نے کہا—“بیٹے، دُوساہس نہ کرنا؛ ورنہ فوراً سخت اذیت میں پڑ جاؤ گے۔ سورج کی کرنوں کے پینے والے والکھلیہ رشی اگر غضبناک ہوئے تو کہیں تمہیں جلا کر راکھ نہ کر دیں—انہیں ناراض نہ کرنا۔”

Verse 16

सौतिरुवाच ततः प्रसादयामास कश्यप: पुत्रकारणात्‌ | वालखिल्यान्‌ महाभागांस्तपसा हतकल्मषान्‌,उग्रश्रवाजी कहते हैं--तदनन्तर पुत्रके लिये महर्षि कश्यपने तपस्यासे निष्पाप हुए महाभाग वालखिल्य मुनियोंको इस प्रकार प्रसन्न किया

سوتی نے کہا—اس کے بعد بیٹے کی خاطر مہارشی کشیپ نے تپسیا کے ذریعے جن کے داغ دھبّے جل چکے تھے، اُن نہایت بختیار والکھلیہ منیوں کو راضی کیا۔

Verse 17

कश्यप उवाच प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधना: । चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमरहथ,कश्यपजी बोले--तपोधनो! गरुडका यह उद्योग प्रजाके हितके लिये हो रहा है। ये महान्‌ पराक्रम करना चाहते हैं, आपलोग इन्हें आज्ञा दें

کشیپ نے کہا—“اے تپسیا کے دھن والے بزرگو، گڑُڑ کا یہ اقدام رعایا کی بھلائی کے لیے شروع ہوا ہے۔ وہ ایک عظیم کارنامہ انجام دینا چاہتا ہے؛ لہٰذا تمہیں چاہیے کہ اسے اجازت عطا کرو۔”

Verse 18

सौतिरुवाच एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययु: । मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोडर्थिन:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--भगवान्‌ कश्यपके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे वालखिल्य मुनि उस शाखाको छोड़कर तपस्या करनेके लिये परम पुण्यमय हिमालयपर चले गये

سوتی نے کہا—بھگوان کشیپ کے یوں کہنے پر وہ منی راضی ہوئے اور روانہ ہو گئے۔ اس شاخ کو چھوڑ کر، تپسیا کے طالب بن کر، وہ نہایت مقدس ہِمَوَت (ہمالیہ) پہاڑ کی طرف چلے گئے۔

Verse 19

ततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुत: । शाखाव्याक्षिप्तवदन: पर्यपृच्छत कश्यपम्‌,उनके चले जानेपर विनतानन्दन गरुडने, जो मुँहमें शाखा लिये रहनेके कारण कठिनाईसे बोल पाते थे, अपने पिता कश्यपजीसे पूछा--

جب وہ روانہ ہو گئے تو وِنَتا کا بیٹا گَروڑ—منہ میں درخت کی شاخ ہونے کے باعث گفتار میں رکاوٹ کے باوجود—اپنے والد کشیپ سے سوال کرنے لگا۔

Verse 20

भगवन्‌ कक्‍्व विमुज्चामि तरो: शाखामिमामहम्‌ । वर्जित मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान्‌ मम,“'भगवन्‌! इस वृक्षकी शाखाको मैं कहाँ छोड़ दूँ? आप मुझे ऐसा कोई स्थान बतावें जहाँ बहुत दूरतक मनुष्य न रहते हों”

“اے بھگون! میں اس درخت کی شاخ کو کہاں چھوڑوں؟ مجھے ایسا علاقہ بتا دیجیے جو انسانوں سے خالی اور آبادی سے بہت دور ہو، تاکہ کسی کو گزند نہ پہنچے۔”

Verse 21

ततो नि:पुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम्‌ । अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्थाचख्यौ स कश्यप:,तब कश्यपजीने उन्हें एक ऐसा पर्वत बता दिया, जो सर्वथा निर्जन था। जिसकी कन्दराएँ बर्फसे ढँकी हुई थीं और जहाँ दूसरा कोई मनसे भी नहीं पहुँच सकता था

تب کشیپ نے اسے ایک ایسا پہاڑ بتایا جو بالکل بےآباد تھا؛ جس کی غاریں برف سے بند تھیں، اور جہاں دوسرے لوگ خیال سے بھی نہیں پہنچ سکتے تھے۔

Verse 22

त॑ं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखग: । जवेनाभ्यपतत्‌ तार्क्ष्य: सशाखागजकच्छप:,उस बड़े पेटवाले पर्वतका पता पाकर महान्‌ पक्षी गरुड उसीको लक्ष्य करके शाखा, हाथी और कछुएसहित बड़े वेगसे उड़े

اس وسیع شکم والے پہاڑ کو مقصد بنا کر مہاخگ تارکشیہ گَروڑ شاخ، ہاتھی اور کچھوے سمیت بڑی تیزی سے اس کی طرف اڑ پڑا۔

Verse 23

नतां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुभ्‌ | शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्दा ययौ खग:,गरुड वटवृक्षकी जिस विशाल शाखाको चोंचमें लेकर जा रहे थे, वह इतनी मोटी थी कि सौ पशुओंके चमड़ोंसे बनायी हुई रस्सी भी उसे लपेट नहीं सकती थी

مہاتنُو گَروڑ جس عظیم شاخ کو مضبوطی سے چونچ میں تھامے اڑا جا رہا تھا، وہ اتنی موٹی تھی کہ سو جانوروں کی کھالوں سے بنی رسی بھی اسے لپیٹ نہ سکتی۔

Verse 24

स ततः शतसाहस्र॑ योजनान्तरमागत: । कालेन नातिमहता गरुड: पतगेश्वर:,पक्षिराज गरुड उसे लेकर थोड़ी ही देरमें वहाँसे एक लाख योजन दूर चले आये

پھر پرندوں کے سردار گرُڑ اسے لے کر بہت ہی کم وقت میں وہاں سے ایک لاکھ یوجن دور جا پہنچا۔

Verse 25

सतं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात्‌ पितु: । अमुज्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचर:,पिताके आदेशसे क्षणभरमें उस पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने वह विशाल शाखा वहीं छोड़ दी। गिरते समय उससे बड़ा भारी शब्द हुआ

باپ کے حکم کے مطابق وہ آسمان میں اڑنے والا پل بھر میں اس پہاڑ پر جا پہنچا اور وہاں ایک عظیم شاخ چھوڑ دی؛ گرتے وقت اس سے بڑا ہی ہولناک شور اٹھا۔

Verse 26

पक्षानिलहतकश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट । मुमोच पुष्पवर्ष च समागलितपादप:,वह पर्वतराज उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर काँप उठा। उसपर उगे हुए बहुतेरे वृक्ष गिर पड़े और वह फूलोंकी वर्षा-सी करने लगा

اس کے پروں کی ہوا کے ضرب سے وہ پہاڑوں کا راجا لرز اٹھا۔ اس پر اُگے ہوئے بہت سے درخت جڑ سے اکھڑ کر گر پڑے، اور پہاڑ گویا پھولوں کی بارش برسانے لگا۔

Verse 27

शृज्भाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्प समन्तत: । मणिकाज्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम्‌,उस पर्वतके मणिकांचनमय विचित्र शिखर, जो उस महान्‌ शैलकी शोभा बढ़ा रहे थे, सब ओरसे चूर-चूर होकर गिर पड़े

اس عظیم پہاڑ کی رونق بڑھانے والی جواہر و سونے سے آراستہ رنگا رنگ چوٹیاں چاروں طرف سے ٹوٹ پھوٹ کر ریزہ ریزہ ہو کر نیچے گر پڑیں۔

Verse 28

शाखिनो बहवश्चापि शाखयाभिहतास्तया । काज्चनै: कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदा:,उस विशाल शाखासे टकराकर बहुत-से वृक्ष भी धराशायी हो गये। वे अपने सुवर्णमय फ़ूलोंके कारण बिजलीसहित मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे

اس عظیم شاخ کے ٹکراؤ سے بہت سے درخت بھی زمین بوس ہو گئے؛ مگر اپنے سنہری پھولوں کے سبب وہ بجلی والے بادلوں کی مانند چمک رہے تھے۔

Verse 29

इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत आस्तीकपरवरर्में गरुडचरित्र-विषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ते हेमविकचा भूमौ युता: पर्वतधातुभि: । व्यराजण्छाखिनस्तत्र सूर्याशुप्रतिरज्जिता: सुवर्णमय पुष्पवाले वे वृक्ष धरतीपर गिरकर पर्वतके गेरू आदि धातुओंसे संयुक्त हो सूर्यकी किरणोंद्वारा रँगे हुए-से सुशोभित होते थे

سونے جیسے پھولوں والے وہ درخت زمین پر آ گرے اور پہاڑ کے گِیرو وغیرہ معدنیات کے ساتھ مل گئے۔ وہاں ان کی شاخیں سورج کی کرنوں سے گویا رنگی ہوئی اور منور ہو کر نہایت درخشاں دکھائی دیتی تھیں۔

Verse 30

ततस्तस्य गिरे: शृड्रमास्थाय स खगोत्तम: । भक्षयामास गरुडस्तावुभी गजकच्छपौ,तदनन्तर पक्षिराज गरुडने उसी पर्वतकी एक चोटीपर बैठकर उन दोनों--हाथी और कछुएको खाया इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रिंशो&ध्याय:

پھر پرندوں میں برتر گڑوڑ اس پہاڑ کی ایک چوٹی پر اترا، وہیں بیٹھ کر اس نے ان دونوں—ہاتھی اور کچھوے—کو نگل لیا۔

Verse 31

तावुभौ भक्षयित्वा तु स तार्क्ष्य: कूर्मकुञ्जरौ । ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजव:,इस प्रकार कछुए और हाथी दोनोंको खाकर महान्‌ वेगशाली गरुड पर्वतकी उस चोटीसे ही ऊपरकी ओर उड़े

کچھوے اور ہاتھی—دونوں کو کھا کر—مہا تیز رفتار تارکشیہ (گڑوڑ) اسی پہاڑی چوٹی سے اوپر کی سمت اچھل کر اڑ گیا۔

Verse 32

प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशंसिन: । इन्द्रस्य वज्ज॑ दयितं प्रजज्वाल भयात्‌ ततः,उस समय देवताओंके यहाँ बहुत-से भयसूचक उत्पात होने लगे। देवराज इन्द्रका प्रिय आयुध वज्र भयसे जल उठा

تب دیوتاؤں کے لوک میں خوف کی خبر دینے والے بہت سے شگونِ بد ظاہر ہونے لگے۔ اسی وقت اندر کا محبوب ہتھیار، وجَر بھی گویا خوف سے بھڑک اٹھا۔

Verse 33

सथूमा न्‍्यपतत्‌ सार्चिर्दिवोल्का नभसभ्ष्युता । तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वश:,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं

آسمان سے دن دہاڑے دھوئیں اور شعلوں میں لپٹی ہوئی ایک شہابِ ثاقب گرنے لگی۔ اسی طرح وسوؤں، رودروں اور آدتیوں میں بھی—ہر سمت—بےسابقہ اضطراب اور خوف کی خبر دینے والی نحوستیں ظاہر ہوئیں۔

Verse 34

साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणा: । स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत्‌,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं

سادھیہ، مرُت اور دوسرے تمام دیوتاؤں کے گروہ—ہر ایک کے اپنے اپنے ہتھیار باہم ایک دوسرے کے خلاف اضطراب میں آ گئے۔ یہ ایسا بےسابقہ شگونِ بد تھا جو پہلے کبھی نہ سنا گیا؛ گویا دھرم کی حفاظت کے لیے بنے ہوئے دیوی ہتھیار بھی بےقرار ہو کر راہ سے بھٹک گئے ہوں۔

Verse 35

अभूतपूर्व संग्रामे तदा देवासुरेडपि च । ववुर्वाता: सनिर्घाता: पेतुरुल्का: सहस्रश:,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं

دیوتاؤں اور اسوروں کی اُس بےسابقہ جنگ میں بھی ایسے شگونِ بد نظر نہ آئے تھے۔ اب تو گرجدار دھماکوں کے ساتھ تیز و تند ہوائیں چلنے لگیں اور ہزاروں شہابِ ثاقب گرنے لگے—یہ اس بات کی علامت تھا کہ عالم کا نظام متزلزل ہو رہا ہے اور واقعات ایک ہولناک، ناگزیر موڑ کی طرف بڑھ رہے ہیں۔

Verse 36

निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम्‌ । देवानामपि यो देव: सो<प्यवर्षत शोणितम्‌,आकाशमें बादल नहीं थे तो भी बड़ी भारी आवाजमें विकट गर्जना होने लगी। देवताओंके भी देवता पर्जन्य रक्तकी वर्षा करने लगे

آسمان بالکل بےابر تھا، پھر بھی اس میں زبردست گرج سنائی دینے لگی۔ اور دیوتاؤں کے بھی دیوتا پرجنیہ نے خون کی بارش برسائی۔ یہ شگونِ بد اخلاقی و کائناتی نظام میں شدید خلل کی علامت تھا، جو آنے والی آفت کا پیش خیمہ تھا۔

Verse 37

मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्न ववृषु: शोणितं बहु,देवताओंके दिव्य पुष्पहार मुर॒झा गये, उनके तेज नष्ट होने लगे। उत्पातकालिक बहुत- से भयंकर मेघ प्रकट हो अधिक मात्रामें रुधिरकी वर्षा करने लगे

دیوتاؤں کے ہار مرجھا گئے اور ان کا نور بھی ماند پڑنے لگا۔ نحوست کے ہولناک بادل امڈ آئے اور بہت سا خون برسانے لگے۔ ایسے تغیرات دھرم کے ٹوٹنے کی علامت ہیں اور بتاتے ہیں کہ پُرتشدد ادھرم کی قوتیں سر اٹھا رہی ہیں۔

Verse 38

रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षयन्‌ । ततस्त्राससमुद्धिग्न: सह देवै: शतक्रतुः । उत्पातान्‌ दारुणान्‌ पश्यन्नित्युवाच बृहस्पतिम्‌,बहुत-सी धूलें उड़कर देवताओंके मुकुटोंको मलिन करने लगीं। ये भयंकर उत्पात देखकर देवताओं-सहित इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले

گرد کے گھنے بادل اٹھے اور دیوتاؤں کے تاجوں پر پڑ کر انہیں ماند کر گئے۔ تب شتکرتو (اندر)، دوسرے دیوتاؤں کے ساتھ، خوف سے مضطرب ہو کر، ان ہولناک شگونوں کو دیکھتے ہوئے، برہسپتی سے یوں گویا ہوا۔

Verse 39

इन्द्र वाच किमर्थ भगवन्‌ घोरा उत्पाता: सहसोत्थिता: । न च शत्रु प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्षयेत्‌,इन्द्रने पूछा--भगवन्‌! सहसा ये भयंकर उत्पात क्‍यों होने लगे हैं? मैं ऐसा कोई शात्र नहीं देखता, जो युद्धमें हम देवताओंका तिरस्कार कर सके

اِندر نے کہا—اے برگزیدہ! یہ ہولناک شگون اچانک کیوں ظاہر ہوئے ہیں؟ میں میدانِ جنگ میں ایسا کوئی دشمن نہیں دیکھتا جو ہم دیوتاؤں کو مغلوب یا رسوا کر سکے۔

Verse 40

ब॒हस्पतिरु्वाच तवापराधाद्‌ देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो । तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम्‌,बृहस्पतिजीने कहा--देवराज इन्द्र! तुम्हारे ही अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे कश्यप मुनि और विनताके पुत्र पक्षिराज गरुड अमृतका अपहरण करनेके लिये आ रहे हैं। वे बड़े बलवान्‌ और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं

بِرہسپتی نے کہا—اے دیویندر، اے شتکرتو! یہ سب تمہارے اپنے جرم اور غفلت کے سبب ہے؛ اور مہاتما والکھلیہ مہارشیوں کی تپسیا کی قوت نے اسے اور بھی تقویت دی ہے۔

Verse 41

कश्यपस्य मुने: पुत्रो विनतायाश्व खेचर: । हर्तु सोममभिप्राप्तो बलवान्‌ कामरूपधृक्‌,बृहस्पतिजीने कहा--देवराज इन्द्र! तुम्हारे ही अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे कश्यप मुनि और विनताके पुत्र पक्षिराज गरुड अमृतका अपहरण करनेके लिये आ रहे हैं। वे बड़े बलवान्‌ और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं

مُنی کشیپ اور وِنَتا کا بیٹا، آسمان میں اڑنے والا گَروڑ، سوَم (امرت) چھین لینے کے لیے آ پہنچا ہے۔ وہ نہایت زورآور ہے اور اپنی مرضی کے مطابق روپ دھار سکتا ہے۔

Verse 42

समर्थों बलिनां श्रेष्ठो हर्तु सोम॑ं विहंगम: । सर्व सम्भावयाम्यस्मिन्नसा ध्यमपि साधयेत्‌,बलवानोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी गरुड अमृत हर ले जानेमें समर्थ हैं। मैं उनमें सब प्रकारकी शक्तियोंके होनेकी सम्भावना करता हूँ। वे असाध्य कार्य भी सिद्ध कर सकते हैं

وہ پرندہ زورآوروں میں سب سے برتر ہے اور سوَم (امرت) چھین لے جانے کی پوری قدرت رکھتا ہے۔ میں اس میں ہر طرح کی قوت کا امکان دیکھتا ہوں؛ وہ ناممکن دکھنے والا کام بھی کر گزرے گا۔

Verse 43

सौतिरुवाच श्रुत्वैतद्‌ वचन शक्र: प्रोवाचामृतरक्षिण: । महावीर्यबल: पक्षी हर्तु सोममिहोद्यतः,उग्रश्रवाजी कहते हैं--बृहस्पतिजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र अमृतकी रक्षा करनेवाले देवताओंसे बोले--'रक्षको! महान्‌ पराक्रमी और बलवान पक्षी गरुड यहाँसे अमृत हर ले जानेको उद्यत हैं

سَوتی نے کہا—یہ بات سن کر شکر (اِندر) نے امرت کے محافظ دیوتاؤں سے کہا—“اے نگہبانوں! عظیم دلیری اور قوت والا وہ پرندہ یہاں سوَم (امرت) چھین لے جانے کے لیے آمادہ ہے۔”

Verse 44

युष्मान्‌ सम्बोधयाम्येष यथा न स हरेद्‌ बलात्‌ | अतुल हि बल॑ तस्य बृहस्पतिरुवाच ह,“मैं तुम्हें सचेत कर देता हूँ, जिससे वे बलपूर्वक इस अमृतको न ले जा सकें। बृहस्पतिजीने कहा है कि उनके बलकी कहीं तुलना नहीं है”

کاشیپ نے کہا—میں تمہیں پہلے ہی خبردار کرتا ہوں تاکہ وہ زورِ بازو سے اس امرت کو نہ لے جائے۔ اس کی قوت بے مثال ہے—یہ بات برہسپتی نے کہی ہے۔

Verse 45

तच्छुत्वा विबुधा वाक्‍्यं विस्मिता यत्नमास्थिता: । परिवार्यामृतं तस्थुर्वज्नी चेन्द्र: प्रतापवान्‌,इन्द्रकी यह बात सुनकर देवता बड़े आश्वर्यमें पड़ गये और यत्नपूर्वक अमृतको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रतापी इन्द्र भी हाथमें वज् लेकर वहाँ डट गये

یہ بات سن کر دیوتا حیرت زدہ ہو گئے اور پوری چوکسی کے ساتھ امرت کو چاروں طرف سے گھیر کر کھڑے ہو گئے۔ بجلی کے ہتھیار (وجر) والا پرتابی اندر بھی وہاں ڈٹ گیا۔

Verse 46

धारयन्तो विचित्राणि काउचनानि मनस्विन: । कवचानि महाहणि वैदूर्यविकृतानि च,मनस्वी देवता विचित्र सुवर्णमय तथा बहुमूल्य वैदूर्य मणिमय कवच धारण करने लगे

وہ بلند ہمت دیوتا عجیب و غریب سنہری زرہیں پہننے لگے—نہایت قیمتی، اور ویدوریہ (بلی کی آنکھ) کے جواہرات سے آراستہ۔

Verse 47

चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च । विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकश:,उन्होंने अपने अंगोंमें यथास्थान मजबूत और चमकीले चमड़ेके बने हुए हाथके मोजे आदि धारण किये। नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्र भी ले लिये। उन सब आयुधोंकी धार बहुत तीखी थी। वे श्रेष्ठ देवता सब प्रकारके आयुध लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके पास ऐसे-ऐसे चक्र थे, जिनसे सब ओर आगकी चिनगारियाँ और धूमसहित लपटें प्रकट होती थीं। उनके सिवा परिघ, त्रिशूल, फरसे, भाँति-भाँतिकी तीखी शक्तियाँ चमकीले खड्ग और भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ भी थीं। अपने शरीरके अनुरूप इन अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवता डट गये

انہوں نے اپنے اعضا پر مضبوط اور چمکدار چمڑے کے حفاظتی پوش بھی پہن لیے، اور طرح طرح کے بے شمار ہتھیار اٹھا لیے—جو ہیبت ناک صورت کے تھے۔

Verse 48

शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सुरोत्तमा: | सविस्फुलिड्गजज्वालानि सधूमानि च सर्वश:

سُروں میں برتر دیوتاؤں نے نہایت تیز، دھار دار نوک والے ہتھیار اٹھا کر ہر سمت لہرا دیے—وہ چنگاریاں بکھیرتے، شعلے بھڑکاتے اور دھوئیں میں لپٹے ہوئے تھے۔

Verse 49

चक्राणि परिघांश्ैव त्रिशूलानि परश्वधान्‌ | शक्तीश्न विविधास्तीक्ष्णा: करवालांश्व निर्मलान्‌ | स्वदेहरूपाण्यादाय गदाश्षोग्रप्रदर्शना:

کاشیپ نے کہا—انہوں نے ہر طرح کے ہتھیار اٹھا لیے: چکر، پریغ (لوہے کے گرز)، ترشول، پرشو (کلہاڑے)، طرح طرح کی تیز نیزہ نما شکتیوں اور بے داغ تلواروں کو۔ اپنے ہی جسموں کے مطابق صورتیں اختیار کر کے انہوں نے ہولناک گدائیں بھی دکھائیں۔

Verse 50

तैः शस्त्रैर्भानुमद्धिस्ते दिव्याभरण भूषिता: । भानुमन्त: सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मषा:,दिव्य आभूषणोंसे विभूषित निष्पाप देवगण तेजस्वी अस्त्र-शस्त्रोंक॒े साथ अधिक प्रकाशमान हो रहे थे

کاشیپ نے کہا—آسمانی زیورات سے آراستہ اور درخشاں ہتھیاروں سے مسلح وہ بے داغ دیوتاؤں کے لشکر اور بھی زیادہ تابناک ہو کر ثابت قدم کھڑے رہے۔

Verse 51

अनुपमबलवीर्यतेजसो धृतमनस: परिरक्षणेडमृतस्य । असुरपुरविदारणा: सुरा ज्वलनसमिद्धवपु:प्रकाशिन:,उनके बल, पराक्रम और तेज अनुपम थे, जो असुरोंके नगरोंका विनाश करनेमें समर्थ एवं अग्निके समान देदीप्यमान शरीरसे प्रकाशित होनेवाले थे; उन्होंने अमृतकी रक्षाके लिये अपने मनमें दृढ निश्चय कर लिया था

کاشیپ نے کہا—ان دیوتاؤں کی قوت، شجاعت اور جلال بے مثال تھا۔ وہ اسوروں کے شہروں کو چیر پھاڑ دینے پر قادر تھے اور بھڑکتی ہوئی آگ کی مانند دہکتے جسمانی نور سے روشن تھے۔ امرت کی حفاظت کے لیے انہوں نے دل میں اٹل عزم باندھ لیا تھا۔

Verse 52

इति समरवरं सुरा: स्थितास्ते परिघसहस्रशतै: समाकुलम्‌ । विगलितमिव चाम्बरान्तरं तपनमरीचिविकाशितं बभासे,इस प्रकार वे तेजस्वी देवता उस श्रेष्ठ समरके लिये तैयार खड़े थे। वह रणांगण लाखों परिघ आदि आयुधोंसे व्याप्त होकर सूर्यकी किरणोंद्वारा प्रकाशित एवं टूटकर गिरे हुए दूसरे आकाशके समान सुशोभित हो रहा था

یوں وہ تابناک دیوتا اس بہترین جنگ کے لیے تیار کھڑے تھے۔ میدانِ کارزار لوہے کے گرزوں کے صدہا ہزاروں اور دوسرے ہتھیاروں سے بھرا ہوا، سورج کی کرنوں سے روشن، گویا پھٹ کر بکھرے ہوئے ایک دوسرے آسمان کی مانند جگمگا رہا تھا۔

Verse 419

उन्होंने अपने अंगोंमें यथास्थान मजबूत और चमकीले चमड़ेके बने हुए हाथके मोजे आदि धारण किये। नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्र भी ले लिये। उन सब आयुधोंकी धार बहुत तीखी थी। वे श्रेष्ठ देवता सब प्रकारके आयुध लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके पास ऐसे-ऐसे चक्र थे, जिनसे सब ओर आगकी चिनगारियाँ और धूमसहित लपटें प्रकट होती थीं। उनके सिवा परिघ, त्रिशूल, फरसे, भाँति-भाँतिकी तीखी शक्तियाँ चमकीले खड्ग और भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ भी थीं। अपने शरीरके अनुरूप इन अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवता डट गये

کاشیپ نے کہا—انہوں نے اپنے اعضا پر مناسب جگہوں پر مضبوط اور چمکدار چمڑے کے بنے ہوئے دستانے اور دیگر حفاظتی پوشاکیں پہنیں، پھر طرح طرح کے نہایت ہولناک ہتھیار اٹھا لیے۔ ان سب اسلحے کی دھاریں بے حد تیز تھیں۔ وہ برگزیدہ دیوتا ہر قسم کے ہتھیاروں سے آراستہ ہو کر جنگ کے لیے آمادہ ہو گئے۔ ان کے پاس ایسے چکر تھے کہ جب وہ گھومتے تو ہر سمت دھوئیں کے ساتھ آگ کی چنگاریاں اور شعلے نمودار ہوتے۔ اس کے سوا پریغ، ترشول، پرشو، قسم قسم کی تیز شکتیوں، چمکتے ہوئے کھڑگ اور ہیبت ناک گدائیں بھی تھیں۔ اپنے جسموں کے مطابق یہ اسلحہ سنبھالے دیوتا ثابت قدم ہو کر جنگ کے لیے ڈٹ گئے۔

Frequently Asked Questions

Garuḍa must satisfy a coerced transactional promise to the serpents to liberate his mother while preventing an ethically destabilizing outcome—serpents acquiring amṛta—requiring a solution that is formally compliant yet outcome-aware.

The chapter models disciplined speech and duty: power is acknowledged without gratuitous self-exaltation, and obligations are managed through precise commitments, strategic timing, and prioritization of a higher protective order.

Yes. The closing verses state that one who regularly hears or recites this account—especially in learned assemblies—gains religious merit and is said to attain heaven through the commemorative praise (prākīrtana) of Garuḍa.