Adhyaya 130
Adi ParvaAdhyaya 13070 Verses

Adhyaya 130

धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः (Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue)

Upa-parva: Jatugṛha (Vāraṇāvata) Upa-Parva

Vaiśaṃpāyana narrates Dhṛtarāṣṭra’s response after hearing Duryodhana. Dhṛtarāṣṭra recalls Pāṇḍu’s consistent dharmic conduct and his particular goodwill toward him, emphasizing Pāṇḍu’s disciplined transparency in matters of the kingdom. He then underscores that Pāṇḍu’s son (Yudhiṣṭhira) mirrors this dharmic orientation, is publicly renowned, and is well-regarded by the citizens, making forcible displacement politically hazardous—especially because Pāṇḍu’s supported officials, forces, and their families remain embedded in the polity. Duryodhana replies that he has already assessed these risks and claims that key administrative and economic stakeholders will align with him. He proposes that Dhṛtarāṣṭra promptly send the Pāṇḍavas to Vāraṇāvata through a gentle stratagem, anticipating that once his rule is secured, Kuntī and her sons can be recalled. Dhṛtarāṣṭra admits the thought also circulates in his mind but notes the moral taint and fears opposition from Bhīṣma, Droṇa, Vidura (kṣattā), and Gautama, who would not approve unequal treatment. Duryodhana counters with an argument about influence: Bhīṣma’s neutrality, Droṇa’s paternal partiality via Aśvatthāman, Kṛpa’s alignment through relationships, and Vidura’s constrained position; he concludes that no single figure can effectively obstruct the plan. The chapter closes by urging immediate relocation to remove Dhṛtarāṣṭra’s sleepless anxiety and grief, portraying policy action as a remedy for internal distress.

Chapter Arc: Janamejaya, eager to trace the roots of the Kurus’ future calamity, asks how Drona was born, how he obtained divine weapons, and how that formidable Brahmin-warrior came to the Kuru court. → Vaishampayana turns back to origins: Sharadvan Gautama, more drawn to dhanurveda than Vedic study, is tempted by a woman who comes to his hermitage; the lapse and its consequences set in motion the line that will culminate in Kripa and Ashvatthama, while the narrative pivots to Drona’s own hunger for astras and recognition. → Drona reaches Mahendra and encounters Parashurama (Bhargava), the great reservoir of martial lore; with humility, restraint, and fierce resolve, he seeks and receives the knowledge of astras and shastras—an initiation that forges him into the teacher who will later shape princes into weapons. → Parashurama, having relinquished earthly dominion and gifts to Kashyapa, bestows what remains of his martial inheritance upon the worthy seeker; Drona’s acquisition of arms is sealed, and the path is cleared for his eventual arrival among the Kurus as a Brahmin bearing the power of a kshatriya. → Armed with Bhargava’s lore, Drona’s next step—entering the Kuru world and binding his fate to princes and rivalries—hangs poised, promising that learning itself will soon become an instrument of destiny.

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल छा अ<-छऋाञ एकोनत्रिशदधिकशततमो< ध्याय: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा जनमेजय उवाच कृपस्यापि मम ब्रद्मान्‌ सम्भवं वक्तुमरहसि । शरस्तम्बात्‌ कथं जज्ञे कथं वास्त्राण्यवाप्तवान्‌,जनमेजयने पूछा--्रह्मन्‌! कृपाचार्यका जन्म किस प्रकार हुआ? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। वे सरकंडेके समूहसे किस तरह उत्पन्न हुए एवं उन्होंने किस प्रकार अस्त्र- शस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की?

جنمیجَے نے کہا—اے برہمن! کِرِپ کی پیدائش کا حال بھی مجھے بیان کیجیے۔ وہ شَرَستَمب (سرکنڈوں کے گچھے) سے کیسے پیدا ہوا، اور اس نے اسلحہ و اسطر کی ودیا کیسے حاصل کی؟

Verse 2

वैशम्पायन उवाच महर्षेगौतमस्यासीच्छरद्वान्‌ नाम गौतम: । पुत्र: किल महाराज जात: सह शरैरविंभो,वैशम्पायनजीने कहा--महाराज! महर्षि गौतमके शरद्वान्‌ गौतम- नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र थे। प्रभो! कहते हैं, वे सरकंडोंके साथ उत्पन्न हुए थे। परंतप! उनकी बुद्धि धनुर्वेदमें जितनी लगती थी, उतनी वेदोंके अध्ययनमें नहीं

وَیشَمپایَن نے کہا—اے مہاراج! مہارشی گوتم کا ایک بیٹا تھا جو شَرَدوان گوتم کے نام سے معروف تھا۔ اے نریندر! کہا جاتا ہے کہ وہ شَر (سرکنڈوں) کے ساتھ ہی پیدا ہوا تھا۔

Verse 3

न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत । यथास्य बुद्धिरभवद्‌ धनुर्वेदे परंतप,वैशम्पायनजीने कहा--महाराज! महर्षि गौतमके शरद्वान्‌ गौतम- नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र थे। प्रभो! कहते हैं, वे सरकंडोंके साथ उत्पन्न हुए थे। परंतप! उनकी बुद्धि धनुर्वेदमें जितनी लगती थी, उतनी वेदोंके अध्ययनमें नहीं

اے پرنتپ! ویدوں کے مطالعے میں اس کی عقل ویسی نہ جاگی؛ مگر دھنُروید (تیراندازی کے علم) میں اس کی سمجھ خاص طور پر نکھر اٹھی۔

Verse 4

अधिजम्मुर्यथा वेदांस्तपसा ब्रह्मचारिण: । तथा स तपसोपेत: सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह,जैसे अन्य ब्रह्मचारी तपस्यापूर्वक वेदोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने तपस्यायुक्त होकर सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये

جس طرح برہماچاری تپسیا کے ذریعے ویدوں پر دسترس پاتے ہیں، اسی طرح وہ بھی تپسیا سے یکت ہو کر تمام اَستر (ہتھیار) حاصل کر گیا۔

Verse 5

धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च । भृशं संतापयामास देवराजं स गौतम:,वे धनुर्वेदमें पारंगत तो थे ही, उनकी तपस्या भी बड़ी भारी थी; इससे गौतमने देवराज इन्द्रको अत्यन्त चिन्तामें डाल दिया था

دھنُروید میں کمال مہارت اور بے پناہ تپسیہ-بل کے باعث گوتم نے دیوراج اندر کے دل میں سخت اضطراب اور گہری تشویش پیدا کر دی۔

Verse 6

ततो जानपदीं नाम देवकन्यां सुरेश्वर: । प्राहिणोत्‌ तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव,कौरव! तब देवराजने जानपदी नामकी एक देवकन्याको उनके पास भेजा और यह आदेश दिया कि “तुम शरद्वानकी तपस्यामें विघ्न डालो”

پھر سُریشور دیوراج نے ‘جانپدی’ نامی ایک دیوکنیا کو بھیجا اور کہا—“اے کورَو! اس کی تپسیا میں رکاوٹ ڈالو۔”

Verse 7

सा हि गत्वा55 श्रमं तस्य रमणीयं शरद्वत: । धनुर्बाणधरं बाला लोभयामास गौतमम्‌,वह जानपदी शरद्वानके रमणीय आश्रमपर जाकर धनुष-बाण धारण करनेवाले गौतमको लुभाने लगी

وہ جانپدی شردوت کے دلکش آشرم میں گئی اور، اگرچہ وہ کم سن تھی، پھر بھی کمان و تیر تھامے ہوئے گوتم کو لبھانے لگی۔

Verse 8

तामेकवसनां दृष्टवा गौतमो5प्सरसं वने । लोके<प्रतिमसंस्थानां प्रोत्फूल्लनयनो5भवत्‌,गौतमने एक वस्त्र धारण करनेवाली उस अप्सराको वनमें देखा। संसारमें उसके सुन्दर शरीरकी कहीं तुलना नहीं थी। उसे देखकर शरद्वानके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे

جنگل میں ایک ہی لباس پہنے اس اپسرا کو دیکھ کر—جس کے حسن کی دنیا میں کوئی مثال نہ تھی—گوتم کی آنکھیں خوشی سے کھِل اٹھیں۔

Verse 9

धनुश्व हि शरास्तस्य कराभ्यामपतन्‌ भुवि । वेपथुश्नापि तां दृष्टवा शरीरे समजायत,उनके हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े तथा उसकी ओर देखनेसे उनके शरीरमें कम्प हो आया

اسے دیکھتے ہی اس کے ہاتھوں سے کمان اور تیر چھوٹ کر زمین پر گر پڑے، اور اس کے سارے جسم میں لرزہ طاری ہو گیا۔

Verse 10

स तु ज्ञानगरीयस्त्वात्‌ तपसश्न समर्थनात्‌ | अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्यरेण परमेण ह,शरद्वान्‌ ज्ञानमें बहुत बढ़े-चढ़े थे और उनमें तपस्याकी भी प्रबल शक्ति थी। अतः वे महाप्राज्ञ मुनि अत्यन्त धीरतापूर्वक अपनी मर्यादामें स्थित रहे

وہ علم میں برتر تھا اور تپسیا کی زبردست قوت کی پشت پناہی اسے حاصل تھی۔ اسی لیے وہ عظیم فہم والا رشی اعلیٰ ترین ثبات کے ساتھ شائستگی و مر्यادہ کی حدوں میں مضبوطی سے قائم رہا۔

Verse 11

यस्तस्य सहसा राजन्‌ विकार: समदृश्यत । तेन सुस्त्राव रेतो5स्य स च तन्नान्वबुध्यत,राजन! किंतु उनके मनमें सहसा जो विकार देखा गया, इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया; परंतु इस बातका उन्हें भान नहीं हुआ

اے راجن! اس کے دل میں اچانک جو اضطراب نمودار ہوا، اسی کے سبب اس کا منی بے اختیار بہہ گیا؛ مگر اسے اس کا احساس نہ ہوا۔

Verse 12

धनुश्न सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च । स विहायाश्रमं तं च तां चैवाप्सरसं मुनि:,वे मुनि बाणसहित धनुष, काला मृगचर्म, वह आश्रम और वह अप्सरा--सबको वहीं छोड़कर वहाँसे चल दिये। उनका वह वीर्य सरकंडेके समुदाय-पर गिर पड़ा। राजन! वहाँ गिरनेपर उनका वीर्य दो भागोंमें बँट गया

اس رشی نے تیروں سمیت کمان اور سیاہ ہرن کی کھالیں بھی چھوڑ دیں؛ اور اس آشرم کو اور اس اپسرا کو بھی ترک کر کے وہاں سے روانہ ہو گیا۔

Verse 13

जगाम रेतस्तत्‌ तस्य शरस्तम्बे पपात च । शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नूप,वे मुनि बाणसहित धनुष, काला मृगचर्म, वह आश्रम और वह अप्सरा--सबको वहीं छोड़कर वहाँसे चल दिये। उनका वह वीर्य सरकंडेके समुदाय-पर गिर पड़ा। राजन! वहाँ गिरनेपर उनका वीर्य दो भागोंमें बँट गया

اے نرپ! جب وہ روانہ ہوا تو اس کا منی سرکنڈوں کے جھرمٹ پر جا گرا؛ اور سرکنڈوں پر گرتے ہی وہ دو حصوں میں بٹ گیا۔

Verse 14

तस्याथ मिथुन जज्ञे गौतमस्य शरद्वत: । मृगयां चरतो राज्ञ: शन्तनोस्तु यदृच्छया,तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वानके उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि “ये दोनों किसी धरनुर्वेदके पारंगत विद्वान ब्राह्मणकी संतानें हैं” ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि “ये दोनों मेरी ही संतानें हैं"

پھر گوتَم کے بیٹے شَرَدوت کے اسی منی سے ایک بیٹا اور ایک بیٹی—یعنی جڑواں—پیدا ہوئے۔ اسی وقت اتفاقِ الٰہی سے شکار کرتے ہوئے راجا شانتنو وہاں آ پہنچا۔

Verse 15

कश्चित्‌ सेनाचरो5रण्ये मिथुनं तदपश्यत । धनुश्व सशरं दृष्टवा तथा कृष्णाजिनानि च,तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वानके उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि “ये दोनों किसी धरनुर्वेदके पारंगत विद्वान ब्राह्मणकी संतानें हैं” ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि “ये दोनों मेरी ही संतानें हैं"

ویشَمپاین نے کہا— جنگل میں گشت کرتے ہوئے بادشاہ کے ایک سپاہی نے دو بچوں کی جوڑی دیکھی۔ وہاں تیروں سمیت کمان اور سیاہ ہرن کی کھالیں دیکھ کر اس نے یہ طے کیا کہ یہ دونوں تیراندازی کے علم میں ماہر کسی برہمن کی اولاد ہیں۔ پھر وہ ان دونوں بچوں کو کمان و تیر سمیت راجا شنتنو کے حضور لے گیا۔ راجا انہیں دیکھتے ہی رحم دل ہو گیا اور انہیں اپنے ساتھ لے کر محل میں آ گیا۔ کوئی پوچھتا تو وہ بس یہی کہتا— “یہ دونوں میرے ہی بچے ہیں۔”

Verse 16

ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह । स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनु:,तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वानके उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि “ये दोनों किसी धरनुर्वेदके पारंगत विद्वान ब्राह्मणकी संतानें हैं” ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि “ये दोनों मेरी ही संतानें हैं"

ویشَمپاین نے کہا— جب اس نے جان لیا کہ یہ دونوں اعلیٰ درجے کی تیراندازی میں ماہر ایک دْوِج (برہمن) کی اولاد ہیں، تو اس نے تیر سمیت کمان کے ساتھ ان دونوں شیرخواروں کو بادشاہ کے سامنے پیش کیا۔ ہتھیار اور سیاہ ہرن کی کھال نے ان کی تربیت، ضبط اور شریف نسب کی علامت دی۔ رحم سے متاثر ہو کر راجا شنتنو نے انہیں اپنی سرپرستی میں لے لیا، اور پھر انہیں “میرے بچے” کہہ کر ہی متعارف کراتا رہا۔

Verse 17

स तदादाय मिथुन राजा च कृपयान्वित: । आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन्‌,तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वानके उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि “ये दोनों किसी धरनुर्वेदके पारंगत विद्वान ब्राह्मणकी संतानें हैं” ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि “ये दोनों मेरी ही संतानें हैं"

ویشَمپاین نے کہا— رحم سے بھرے ہوئے بادشاہ نے اس جوڑی کو ساتھ لیا اور “یہ میرے بیٹے ہیں” کہتے ہوئے محل کو لوٹ آیا۔ اس نے ان کے نسب کی کھوج سے بڑھ کر ان کی حفاظت اور پرورش کو اپنا دھرم سمجھا، اور انہیں پناہ اور مرتبہ عطا کیا۔

Verse 18

ततः संवर्धयामास संस्कारैश्वाप्पपोजयत्‌ । प्रातीपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत्‌,तदनन्तर नरश्रेष्ठ प्रतीपनन्दन शन्तनुने शरद्वानुके उन दोनों बालकोंका पालन-पोषण किया और यथासमय उन्हें सब संस्कारोंसे सम्पन्न किया

ویشَمپاین نے کہا— اس کے بعد پرتیپ کے خاندان کے نرश्रेष्ठ شنتنو نے گوتَم کے اس جوڑے کی پرورش کی اور وقتِ مقررہ پر ان کے سب سنسکار (رسمی آداب و مراسم) بھی ادا کرائے۔ تعلیم و تہذیب دے کر اس نے باپ کی طرح ان کی نگہبانی کی۔

Verse 19

गौतमो<5पि ततो<भ्येत्य धनुर्वेदपरो5भवत्‌ | कृपया यन्मया बालाविमौ संवर्धिताविति,गौतम (शरद्वान) भी उस आश्रमसे अन्यत्र जाकर धरनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर रहने लगे। राजा शन्तनुने यह सोचकर कि मैंने इन बालकोंको कृपापूर्वक पाला-पोसा है, उन दोनोंके वे ही नाम रख दिये--कृप और कृपी। राजाके द्वारा पालित हुई अपनी दोनों संतानोंका हाल गौतमने तपोबलसे जान लिया

ویشَمپاین نے کہا— پھر گوتَم (شردوان) وہاں سے روانہ ہو کر دھَنُروید کے ریاض میں مشغول ہو گیا۔ راجا شنتنو نے یہ سوچ کر کہ “میں نے رحم کے باعث ان دونوں بچوں کی پرورش کی ہے”، ان کے نام کِرِپ اور کِرِپی رکھ دیے۔ بادشاہ کے ہاتھوں پلے ہوئے اپنے دونوں بچوں کی حالت گوتَم نے تپسیا کی قوت سے جان لی۔

Verse 20

तस्मात्‌ तयोरनाम चक्रे तदेव स महीपति: । गोपितौ गौतमस्तत्र तपसा समविन्दत,गौतम (शरद्वान) भी उस आश्रमसे अन्यत्र जाकर धरनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर रहने लगे। राजा शन्तनुने यह सोचकर कि मैंने इन बालकोंको कृपापूर्वक पाला-पोसा है, उन दोनोंके वे ही नाम रख दिये--कृप और कृपी। राजाके द्वारा पालित हुई अपनी दोनों संतानोंका हाल गौतमने तपोबलसे जान लिया

پس اُس بھوپتی بادشاہ نے اُن دونوں بچوں کے وہی نام رکھ دیے—کِرِپ اور کِرِپی۔ اور گوتم نے اپنے تپسیا کے زور سے وہیں جان لیا کہ اُس کی دونوں پوشیدہ اور محفوظ رکھی گئی اولاد بادشاہ کی سرپرستی میں پرورش پا رہی ہے۔

Verse 21

आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा । चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च,और वहाँ गुप्तरूपसे आकर अपने पुत्रको गोत्र आदि सब बातोंका पूरा परिचय दे दिया। चार प्रकारके- थनुर्वेद, नाना प्रकारके शास्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उसको उपदेश दिया। इससे कृप थोड़े ही समयमें धनुर्वेदके उत्कृष्ट आचार्य हो गये

پھر وہ پوشیدہ طور پر آ کر اپنے بیٹے کو گوتر وغیرہ کی تمام باتیں پوری طرح بتا گیا۔ اس نے اسے چار قسم کے دھنُروید، طرح طرح کے شاستر اور اُن کے گہرے اسرار بھی مکمل طور پر سکھائے۔ اس کے نتیجے میں کِرِپ تھوڑے ہی عرصے میں دھنُروید کا برتر استاد بن گیا۔

Verse 22

निखिलेनास्य तत्‌ सर्व गुहमाख्यातवांस्तदा । सो<चिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गत:,और वहाँ गुप्तरूपसे आकर अपने पुत्रको गोत्र आदि सब बातोंका पूरा परिचय दे दिया। चार प्रकारके- थनुर्वेद, नाना प्रकारके शास्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उसको उपदेश दिया। इससे कृप थोड़े ही समयमें धनुर्वेदके उत्कृष्ट आचार्य हो गये

تب اُس نے وہ سب کچھ پوری طرح بتا دیا جو راز میں رکھنا تھا۔ اور وہ تھوڑے ہی زمانے میں مرتبۂ پرم آچاریہ تک پہنچ گیا۔

Verse 23

ततो<5थिजम्मु: सर्वे ते धनुर्वेदं महारथा: । धृतराष्ट्रात्मजाश्वैव पाण्डवा: सह यादवै:,धृतराष्ट्रके महारथी पुत्र, पाण्डव तथा यादव--सबने उन्हीं कृपाचार्यसे धनुर्वेदका अध्ययन किया

پھر دھرتراشٹر کے بیٹے، پاندو کے بیٹے اور یادیوں سمیت وہ سب مہارَتھی دھنُروید میں مہارت حاصل کرنے لگے۔

Verse 24

वैशम्पायन उवाच विशेषार्थी ततो भीष्म: पौत्राणां विनयेप्सया,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा--'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान्‌ भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।” नरश्रेष्ठ) यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया

وَیشَمپایَن نے کہا—اس کے بعد بھیشم نے اپنے پوتوں میں خاص برتری پیدا کرنے اور اُن کی تربیت و ضبط کی تکمیل کی خواہش سے، مزید تعلیم کے لیے ایسے آچاریہ کی تلاش شروع کی جو اسلحہ و ہتھیاروں کے علم میں ماہر اور ثابت شدہ شجاعت کے سبب معزز ہو؛ کیونکہ ایسا ہی استاد کورو شہزادوں کو ذمہ داری کے ساتھ سنوار سکتا تھا۔

Verse 25

इष्वस्त्रज्ञान्‌ पर्यपृच्छदाचार्यान्‌ वीर्यसम्मतान्‌ | नाल्‍्पधीर्ना महाभागस्तथा नानास्त्रकोविद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा--'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान्‌ भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।” नरश्रेष्ठ) यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया

وَیشَمپایَن نے کہا—اے راجَن! کِرِپاچارْیَ سے پوری تعلیم حاصل ہو جانے کے بعد پِتامہ بھِیشم نے اپنے پوتروں میں خاص قابلیت پیدا کرنے کے لیے مزید اعلیٰ تعلیم دلانے کی خواہش سے ایسے آچاریوں کی تلاش شروع کی جو تیراندازی اور اسلحہ-وِدیا میں ماہر اور اپنے پرَاکرم کے سبب معزز ہوں۔ انہوں نے سوچا—جس کی عقل کم ہو، جو عظیم بخت و امتیاز سے محروم ہو، جو گوناگوں اسلحہ-علوم میں پختہ نہ ہو، وہ ان مہابلی کوروؤں کو ٹھیک طرح تربیت نہیں دے سکتا۔

Verse 26

नादेवसत्त्वो विनयेत्‌ कुरूनस्त्रे महाबलान्‌ | इति संचिन्त्य गाड़्रेयस्तदा भरतसत्तम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा--'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान्‌ भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।” नरश्रेष्ठ) यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया

وَیشَمپایَن نے کہا—راجن! بھِیشم نے سوچا—“جس میں دیوتاؤں جیسی قوت نہ ہو، وہ اسلحہ-وِدیا میں ان مہابلی کُروؤں کو ضبط و آداب کے ساتھ تربیت نہیں دے سکتا۔” یوں غور کر کے گنگا نندن، بھرتوں میں افضل بھِیشم نے نہایت قابل استاد کی تلاش کا عزم کیا تاکہ شہزادے جنگی نظم و ضبط میں غیر معمولی کمال حاصل کریں۔

Verse 27

द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धीमते । पाण्डवान्‌ कौरवांश्वैव ददौ शिष्यान्‌ नरर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा--'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान्‌ भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।” नरश्रेष्ठ) यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया

وَیشَمپایَن نے کہا—اے نرشرِیشٹھ! بھِیشم نے وید کے عالم، دانا بھاردواج پُتر دْرون کو آچاریہ کے منصب پر قائم کر کے پانڈوؤں اور کوروؤں—سب کو شاگرد کی حیثیت سے اس کے سپرد کر دیا۔

Verse 28

शास्त्रतः पूजितश्वैव सम्यक्‌ तेन महात्मना । स भीष्मेण महाभागस्तुष्टो5स्त्रविदुषां वर:,अस्त्र-विद्याके दिद्दानोंमें श्रेष्ठ महाभाग द्रोण महात्मा भीष्मके द्वारा शास्त्रविधिसे भलीभाँति पूजित होनेपर बहुत संतुष्ट हुए

وَیشَمپایَن نے کہا—اس مہاتما بھِیشم نے شاستر کے حکم کے مطابق دْرون کی پوری طرح پوجا کی۔ تب اسلحہ-وِدیا کے جاننے والوں میں افضل، وہ مہابھاگ دْرون بھِیشم سے نہایت خوش ہوا۔

Verse 29

प्रतिजग्राह तान्‌ सर्वान्‌ शिष्यत्वेन महायशा: । शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषत:,फिर उन महायशस्वी आचार्य द्रोणने उन सबको शिष्यरूपमें स्वीकार किया और सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा दी

وَیشَمپایَن نے کہا—وہ مہایَشسوی دْرون نے ان سب کو شاگرد کے طور پر قبول کیا اور پھر انہیں پورا دھنُروید (علمِ تیراندازی) سکھایا۔

Verse 30

ते5चिरेणैव कालेन सर्वशस्त्रविशारदा: । बभूवु: कौरवा राजन्‌ पाण्डवाश्वलामितौजस:,राजन्‌! अमिततेजस्वी पाण्डव तथा कौरव--सभी थोड़े ही समयमें सम्पूर्ण शस्त्र- विद्यामें परम प्रवीण हो गये

اے راجا! تھوڑے ہی عرصے میں کورو سبھی ہتھیاروں اور جنگی فنون میں پوری طرح ماہر ہو گئے؛ اور بے اندازہ قوت و شوکت والے پانڈو بھی اسی طرح کامل مہارت کو پہنچ گئے۔

Verse 31

जनमेजय उवाच कथं समभवद्‌ द्रोण: कथं चास्त्राण्यवाप्तवान्‌ | कथं चागात्‌ कुरून्‌ ब्रह्मान्‌ कस्य पुत्र: स वीर्यवान्‌,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! द्रोणाचार्यकी उत्पत्ति कैसे हुई? उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-विद्या प्राप्त की? वे कुरुदेशमें कैसे आये? तथा वे महापराक्रमी द्रोण किसके पुत्र थे?

جنمیجیہ نے کہا—اے برہمن! درون کی پیدائش کیسے ہوئی؟ اس نے اسلحہ و فنِ حرب کی ودیا کیسے حاصل کی؟ وہ کوروؤں کے پاس کیسے آیا؟ اور وہ زورآور درون کس کا بیٹا تھا؟

Verse 32

कथं चास्य सुतो जात: सो<श्चृत्थामास्त्रवित्तम: | एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय,साथ ही अस्त्र-शस्त्रके विद्वानोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा, जो द्रोणका पुत्र था, कैसे उत्पन्न हुआ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप विस्तारपूर्वक कहिये

اور اس کا بیٹا—اسوتھاما جو علمِ اسلحہ میں سب سے برتر تھا—کیسے پیدا ہوا؟ یہ سب میں تفصیل سے سننا چاہتا ہوں؛ آپ اسے پوری طرح بیان کیجیے۔

Verse 33

वैशम्पायन उवाच गड़ाद्वारं प्रति महान्‌ बभूव भगवानृषि: । भरद्वाज इति ख्यात: सततं संशितव्रत:,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान्‌ भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी

ویشَمپاین نے کہا—اے جنمیجیہ! گنگادوار کے نزدیک بھردواج نام سے مشہور ایک عظیم و مقدس رشی رہتا تھا، جو ہمیشہ سخت ریاضت اور پختہ ورتوں میں ثابت قدم رہتا تھا۔

Verse 34

सोऊभिषेक्तुं ततो गड्जां पूर्वमेवागमन्नदीम्‌ । महर्षिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन्‌ पुरा,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान्‌ भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी

پھر غسلِ تطہیر (ابھیشیک) کے لیے بھردواج—جو پہلے ہویردھان یَجْن میں مشغول تھا—مہارشیوں کے ساتھ پیشتر ہی دریائے گنگا کے پاس آ پہنچا۔

Verse 35

ददर्शाप्सरसं साक्षाद्‌ घृताचीमाप्लुतामृषि: । रूपयौवनसम्पन्नां मददृप्तां मदालसाम्‌,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान्‌ भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी

وَیشَمپایَن نے کہا—رِشی نے اپنی آنکھوں سے اپسرا گھرتاچی کو دیکھا جو غسل سے ابھی ابھی اُبھری تھی۔ وہ حسن و شباب سے آراستہ تھی؛ شباب کے غرور کے نشے میں گویا مدہوش، اور اپنی مستی میں سست و بےپروا دکھائی دیتی تھی۔

Verse 36

तस्या: पुनर्नदीतीरे वसन॑ पर्यवर्तत | व्यपकृष्टाम्बरां दृष्टवा तामृषिश्चकमे तत:,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान्‌ भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी

وہ پھر دریا کے کنارے ٹھہری اور اپنے کپڑے بدلنے لگی۔ جب رِشی نے اس کا لباس سرکا ہوا دیکھا تو اسی دم اس کے دل میں خواہش جاگ اٹھی۔

Verse 37

तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः । ततोअस्य रेतश्नस्कन्द तदृषिद्रोण आदधे,परम बुद्धिमान्‌ भरद्वाजजीका मन उस अप्सरामें आसक्त हुआ; इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया। ऋषिने उस वीर्यको द्रोण (यज्ञकलश)-में रख दिया

وہاں دانا بھردواج کا دل اس اپسرا میں اٹک گیا۔ نتیجتاً اس کا منی خارج ہوا؛ اور اس رِشی نے اسے دُرون (یَجْن کے کلش) میں رکھ دیا۔

Verse 38

ततः समभवद्‌ द्रोण: कलशे तस्य धीमत: । अध्यगीष्ट स वेदांश्न॒ वेदाड़ानि च सर्वश:,तब उन बुद्धिमान्‌ महर्षिको उस कलशशसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह द्रोणसे जन्म लेनेके कारण द्रोण नामसे ही विख्यात हुआ। उसने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंका अध्ययन किया

پھر اس دانا رِشی کے کلش سے ایک بیٹا پیدا ہوا۔ چونکہ وہ دُرون (برتن) سے پیدا ہوا تھا، اس لیے ‘دُرون’ ہی کے نام سے مشہور ہوا۔ اس نے تمام ویدوں اور سب ویدانگوں کا پورا پورا ادھیयन کیا۔

Verse 39

अग्निवेशं महाभागं भरद्वाज: प्रतापवान्‌ । प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वर:,प्रतापी महर्षि भरद्वाज अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने महाभाग अग्निवेशको आग्नेय अस्त्रकी शिक्षा दी थी

جلال و ہیبت والے مہارِشی بھردواج اسلحہ-ودیا کے جاننے والوں میں سب سے برتر تھے۔ انہوں نے نیک بخت اگنی ویش کو آگنیہ استر کی باقاعدہ تعلیم دی۔

Verse 40

अग्नेस्तु जात: स मुनिस्ततो भरतसत्तम | भारद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्र॑ प्रत्यपादयत्‌,जनमेजय! अग्निवेश मुनि साक्षात्‌ अग्निके पुत्र थे। उन्होंने अपने गुरुपुत्र भरद्वाजनन्दन द्रोणको उस आग्नेय नामक महान्‌ अस्त्रकी शिक्षा दी

وَیشَمپایَن نے کہا—اے بھرت شریشٹھ جنمیجَے! آگنی سے پیدا ہونے والے اُس مُنی نے تب بھاردواج کو ‘آگنیہ’ نامی مہااستر کی ودیا عطا کی۔

Verse 41

भरद्वाजसखा चासीत्‌ पृषतो नाम पार्थिव: । तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्‌ सुत:,उन दिनों पृषत नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल महर्षि भरद्वाजके मित्र थे। उन्हें भी उसी समय एक पुत्र हुआ, जिसका नाम द्रुपद था

وَیشَمپایَن نے کہا—بھاردواج مُنی کا دوست پِرِشَت نامی ایک راجا تھا۔ اسی وقت اُس کے ہاں بھی ایک بیٹا پیدا ہوا، جس کا نام دْرُپَد رکھا گیا۔

Verse 42

स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिव: । चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभ:,वह राजकुमार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ था। वह प्रतिदिन भरद्वाज मुनिके आश्रममें जाकर द्रोणके साथ खेलता और अध्ययन करता था

وَیشَمپایَن نے کہا—وہ شہزادہ، جو کشتریوں میں برتر تھا، روزانہ آشرم جاتا اور درون کے ساتھ کھیلتا بھی اور باقاعدہ تعلیم بھی حاصل کرتا تھا۔

Verse 43

ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदो5भवत्‌ | पज्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वर,नरेश्वर जनमेजय! पृषतकी मृत्यु हो जानेपर महाबाहु ट्रुपद उत्तर-पंचाल देशके राजा हुए

وَیشَمپایَن نے کہا—اے نریشور جنمیجَے! پِرِشَت کے انتقال کے بعد مہاباہو دْرُپَد شمالی پانچالوں کا راجا بنا۔

Verse 44

भरद्वाजो5पि भगवानारुरोह दिवं तदा । तत्रैव च वसन्‌ द्रोणस्तपस्तेपे महातपा:,कुछ दिनों बाद भगवान्‌ भरद्वाज भी स्वर्गवासी हो गये और महातपस्वी द्रोण उसी आश्रममें रहकर तपस्या करने लगे

وَیشَمپایَن نے کہا—تب بھگوان بھاردواج بھی سوَرگ کو روانہ ہوئے۔ اور وہیں اسی آشرم میں رہ کر مہاتپسوی درون نے تپسیا کی۔

Verse 45

वेदवेदाड़विद्वान्‌ स तपसा दग्धकिल्बिष: । ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशा:,वे वेदों और वेदांगोंके विद्वान्‌ तो थे ही, तपस्याद्वारा अपनी सम्पूर्ण पापराशिको दग्ध कर चुके थे। उनका महान्‌ यश सब ओर फैल चुका था। एक समय पितरोंने उनके मनमें पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वानकी पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अन्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी

وَیشَمپایَن نے کہا—وہ ویدوں اور ویدانگوں کا عالم تھا، اور تپسیا کے زور سے اس نے گناہ کی آلودگی کو جلا ڈالا تھا۔ اس کی شہرت عظیم تھی۔ پھر پِتروں کی تحریک سے اور بیٹے کی خواہش میں مبتلا ہو کر اس نامور نے اولاد پیدا کرنے کی طرف دل لگایا۔

Verse 46

शारद्वतीं ततो भार्या कृपी द्रोणो5न्वविन्दत । अन्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम्‌,वे वेदों और वेदांगोंके विद्वान्‌ तो थे ही, तपस्याद्वारा अपनी सम्पूर्ण पापराशिको दग्ध कर चुके थे। उनका महान्‌ यश सब ओर फैल चुका था। एक समय पितरोंने उनके मनमें पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वानकी पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अन्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी

اس کے بعد دروṇ نے شاردوت کی بیٹی کِرپی کو زوجہ بنایا۔ وہ ہمیشہ اگنی ہوترا، دھرم کے آچرن اور ضبطِ نفس میں مشغول رہتی تھی۔

Verse 47

अलभद्‌ गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च । स जातमात्रो व्यनदद्‌ यथैवोच्चै:श्रवा हय:,गौतमी कृपीने द्रोणसे अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया। उस बालकने जन्म लेते ही उच्चै:श्रवा घोड़ेके समान शब्द किया

گَوتَمی (کِرپی) نے اشوتھاما نام کا بیٹا جنا۔ وہ بچہ پیدا ہوتے ہی اُچّیَہ شْرَوا گھوڑے کی مانند آواز نکال کر رو پڑا۔

Verse 48

तच्छुत्वान्तहितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत्‌ । अश्वस्येवास्य यत्‌ स्थाम नदत: प्रदिशो गतम्‌,उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा--“इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा है; अतः यह अअश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा।” उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई

یہ سن کر فضا میں موجود ایک پوشیدہ ہستی نے کہا—“اس بچے کے رونے میں گھوڑے جیسی قوت ہے؛ اس کی آواز سب سمتوں میں پھیل گئی ہے۔”

Verse 49

अश्वृत्थामैव बालो<यं तस्मान्नाम्ना भविष्यति । सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततो5भवत्‌,उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा--“इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा है; अतः यह अअश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा।” उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई

“پس یہ بچہ اشوتھاما ہی کے نام سے مشہور ہوگا۔” یہ سن کر بھاردواج کے فرزند دروṇ اپنے اس بیٹے پر نہایت خوش ہوا۔

Verse 50

तत्रैव च वसन्‌ धीमान्‌ धर्नुर्वेदपरो5भवत्‌ | स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम्‌,बुद्धिमान्‌ द्रोण उसी आश्रममें रहकर धरनुर्वेदका अभ्यास करने लगे। राजन्‌! किसी समय उन्होंने सुना कि “महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं

اسی آشرم میں رہتے ہوئے دانا درون اچھی طرح دھنُروید (تیراندازی کے علم) میں منہمک ہو گیا۔ کچھ عرصے بعد اس نے مہاتما جامدگنی نندن پرشورام کی شہرت سنی—وہ دشمنوں کو رنج دینے والا، سب کچھ جاننے والا اور تمام ہتھیار برداروں میں سب سے برتر تھا؛ اور وہ برہمنوں کو اپنی پوری جنگی دولت و اسلحہ بطور دان دینے کا ارادہ رکھتا تھا۔

Verse 51

सर्वज्ञानविदं विप्र॑ सर्वशस्त्रभूृतां वरम्‌ । ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन्‌ दित्सन्तं वसु सर्वश:,बुद्धिमान्‌ द्रोण उसी आश्रममें रहकर धरनुर्वेदका अभ्यास करने लगे। राजन्‌! किसी समय उन्होंने सुना कि “महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं

وَیشَمپایَن نے کہا: اے راجَن! اُس وقت آشرم میں رہنے والا دانا درون، دھنُروید میں کمال حاصل کرنے کے شوق میں، یہ خبر سننے لگا کہ جمَدگنی نندن پرشورام سب علوم کا جاننے والا، تمام ہتھیار برداروں میں برتر ہے اور وہ برہمنوں کو اپنا سارا مال و متاع پوری طرح دان کرنے کا خواہاں ہے۔

Verse 52

स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह । श्रुत्वा तेषु मनश्नक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च,द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति-शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया

یہ سن کر کہ رام (پرشورام) کے پاس دھنُروید اور دیویہ استروں کا پورا علم ہے، درون نے انہیں حاصل کرنے کا پختہ ارادہ کیا۔ اسی طرح اس نے ان سے نیتی شاستر اور درست طرزِ عمل کی تعلیم لینے کا بھی عزم کیا۔

Verse 53

ततः स व्रतिभि: शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपा: । वृत: प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्‌,फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये

پھر وہ عظیم تپسوی، قوی بازو درون، برہمچریہ ورت پر قائم اور تپسیا میں رَت اپنے شاگردوں سے گھِرا ہوا، پہاڑوں میں افضل مہندر پہاڑ کی طرف روانہ ہوا۔

Verse 54

ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपा: । क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद्‌ भूगुनन्दनम्‌,महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान्‌ तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया

پھر مہندر پہاڑ پر پہنچ کر عظیم تپسوی بھاردواج (درون) نے بھِرگو کے نامور نسل پرشورام کے دیدار کیے—وہ بردبار، ضبطِ نفس والا، دشمنوں کا قاہر، اور شَم و دَم جیسی باطنی ریاضتوں سے آراستہ تھا۔

Verse 55

ततो द्रोणो वृत: शिष्यैरुपगम्य भगूद्धहम्‌ । आचर्ख्यावात्मनो नाम जन्म चाजड्डिरस: कुले,तत्पश्चात्‌ शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया और यह भी कहा कि “मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है'

تب درون اپنے شاگردوں کے حلقے میں بھِرگوؤں کے سردار، جامدگنی پرشورام کے پاس گیا۔ اس نے اپنا نام اور نسب پیش کیا اور کہا: “میرا نام درون ہے؛ میرا جنم آنگِرس کے خاندان میں ہوا ہے”—یوں اس نے بزرگ استاد کے حضور پہنچنے کے آداب کے مطابق اپنا تعارف کرایا۔

Verse 56

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत्‌ । ततस्तं सर्वमुत्सृूज्य वनं जिगमिषुं तदा

اس نے سر زمین پر رکھ کر اور قدموں کو باادب سلام کر کے تعظیم بجا لائی۔ پھر سب کچھ ترک کر کے اسی وقت جنگل جانے کے ارادے سے روانہ ہوا۔

Verse 57

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोडब्रवीदिदम्‌ | भरद्वाजात्‌ समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम्‌

ویشَمپاین نے کہا—بھاردواج نے مہاتما جامدگنی سے یوں کہا: “آپ بھاردواج سے پیدا ہوئے ہیں؛ اور اسی طرح مجھے بھی اَیونِج (جو رحم سے پیدا نہ ہوا ہو) جانیے۔”

Verse 58

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ । इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा--दद्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे आया हूँ। मेरा नाम द्रोण है” || ५६-५७ $ || तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दन:,यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले --

درون نے کہا: “اے برہمنوں میں برتر! مجھے درون جانیے۔ میں دولت کی خواہش لے کر آیا ہوں۔ میں مہارشی بھاردواج سے پیدا ہوا، ان کا اَیونِج بیٹا ہوں۔” یہ سن کر تمام کشتریوں کو کچلنے والے مہاتما پرشورام نے اسے جواب دیا۔

Verse 59

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे । एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोडब्रवीद्‌ वच:,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।” उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा--“महान्‌ व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो”

پرشورام نے کہا: “اے برہمنوں میں برتر! تمہارا خیرمقدم ہے۔ جو کچھ چاہتے ہو، مجھ سے کہو۔” راما کے یوں کہنے پر بھاردواج کے بیٹے درون نے عرض کیا: “اے عظیم ورت کے پابند مہارشی! میں آپ سے ایسے مال کی درخواست کرتا ہوں جس کا کبھی خاتمہ نہ ہو۔”

Verse 60

राम॑ प्रहरतां श्रेष्ठ दित्सन्तं विविध वसु । अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।” उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा--“महान्‌ व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो”

ویَشَمپایَن نے کہا— “اے رام! دشمنوں پر ضرب لگانے والوں میں سب سے برتر، جو طرح طرح کا مال عطا کرنا چاہتے ہو! اے عظیم ورت کے پابند، اے برہمنوں میں افضل! میں تم سے ایسے بے پایاں مال کا سوال کرتا ہوں جس کا کبھی اختتام نہ ہو۔”

Verse 61

राम उवाच हिरण्यं मम यच्चान्यद्‌ वसु किंचिदिह स्थितम्‌ | ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत्‌ तपोधन,परशुरामजी बोले--तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया। इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है

رام نے کہا— “اے تپودھن! یہاں میرے پاس جو کچھ سونا اور دوسری دولت تھی، وہ سب میں نے برہمنوں کو دے دی ہے۔”

Verse 62

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना । कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी,परशुरामजी बोले--तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया। इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है

رام (پرشورام) نے کہا— “اسی طرح یہ دیوی دھرتی بھی—جو سمندر تک محدود ہے اور بستیوں و شہروں کی مالا سے آراستہ ہے—میں نے پوری کی پوری مہارشی کشیپ کو دان کر دی ہے۔”

Verse 63

शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम्‌ | अस्त्राणि च महाहाणि शस्त्राणि विविधानि च,अब मेरा यह शरीरमात्र बचा है। साथ ही नाना प्रकारके बहुमूल्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अवशिष्ट है

رام نے کہا— “آج میرے لیے صرف یہ جسم ہی باقی رہ گیا ہے؛ مگر طرح طرح کے نہایت زورآور اسلحہ و اسطر کی ودیا (علم) اب بھی باقی ہے۔”

Verse 64

अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्मयोद्यतम्‌ | वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत्‌,अतः तुम अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अथवा यह शरीर माँग लो। इसे देनेके लिये मैं सदा प्रस्तुत हूँ। द्रोण! बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र उसे कहो

رام نے کہا— “یا تو اسطر (اسلحہ کی ودیا) لے لو یا یہ میرا جسم ہی مانگ لو—میں اسے دینے کے لیے تیار ہوں۔ اے درون! بتاؤ، میں تمہیں کیا دوں؟ فوراً کہو۔”

Verse 65

द्रोण उदाच अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव | सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषत:,द्रोणगने कहा--भूगुनन्दन! आप मुझे प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधिसहित सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्रदान करें

درون نے کہا—اے بھارگو! براہِ کرم مجھے تمام اسلحہ و اَستر کا مکمل علم عطا کیجیے—ان کے سمیٹنے (واپس بلانے) اور بے اثر کرنے کے طریقوں سمیت، اور ان کے درست استعمال کے پوشیدہ اسرار کے ساتھ—بغیر کسی کمی کے۔

Verse 66

तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गव: । सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषत:,तब “तथास्तु” कहकर भृगुवंशी परशुरामजीने द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्र प्रदान किये तथा रहस्य और व्रतसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका भी उपदेश किया

یہ کہہ کر کہ “تھاستُو”، بھارگو نے پھر اسے تمام اَستر عطا کیے؛ اور رازدارانہ ریاضتوں اور عہد و پیمان (ورت) سمیت پورا دھنُروید بھی مکمل طور پر سکھایا۔

Verse 67

प्रतिगृहा तु तत्सवव कृतास्त्रो द्विजसत्तम: | प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति,वह सब ग्रहण करके द्विजश्रेष्ठ द्रोण अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित हो गये और अत्यन्त प्रसन्न हो अपने प्रिय सखा ट्रपदके पास गये

وہ سب کچھ حاصل کر کے برہمنوں میں افضل درون اسلحہ و اَستر کے علم میں کامل ہو گیا؛ اور نہایت شاداں ہو کر اپنے عزیز دوست دروپد سے ملنے کے لیے روانہ ہوا۔

Verse 128

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ अद्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں، سمبھَو پَرو کا بھیم سین کی واپسی سے متعلق ایک سو اٹھائیسواں باب مکمل ہوا۔

Verse 129

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य भार्गवादस्त्रप्राप्तौ ऊनत्रिंशदधिकशततमो<ध्याय:

اِتی شری مہابھارت کے آدی پَرو میں، سمبھَو پَرو کے اندر، بھارگو (پرشورام) سے درون کے اَستر حاصل کرنے کے بیان پر مشتمل ایک سو انتیسواں باب اختتام پذیر ہوا۔

Verse 2336

वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागता: । वृष्णिवंशी तथा भिन्न-भिन्न देशोंसे आये हुए अन्य नरेश भी उनसे धरनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे

وِرِشنی اور دوسرے بادشاہ بھی بہت سے ملکوں سے جمع ہو کر اُس سے علمِ تیراندازی (دھنُروید) کی تعلیم حاصل کرتے تھے۔

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether state authority may be used to engineer a rival’s displacement under a lawful-looking administrative measure, despite awareness that the intent is ethically compromised and risks violating norms of equal kin-treatment.

Legitimacy is a moral-political asset: a ruler’s stability depends on public trust, prior benefaction, and credible fairness; policies motivated by internal fear or factional desire tend to require escalating rationalizations and institutional manipulation.

No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is diagnostic rather than devotional, illustrating how counsel, reputation, and ethical self-awareness interact in high-stakes governance decisions.