Adhyaya 9
Sauptika ParvaAdhyaya 974 Versesयुद्ध का निर्णायक पलटाव पूर्ण—कौरव-पक्ष का नेतृत्व समाप्त; शेष बचे योद्धा शोक और प्रतिशोध के बीच डगमगाते हैं।

Adhyaya 9

अध्याय ९ — दुर्योधनस्य अन्त्यावस्था, विलापः, तथा सौप्तिक-प्रतिवृत्तम् (Duryodhana’s Final Condition, Lamentation, and the Night’s Report)

Upa-parva: Duryodhana’s Final Moments and the Report of Night Retaliation (Sauptika Context Unit)

Sañjaya reports that after killing the Pāñcālas and Draupadī’s sons, Aśvatthāmā, Kṛpa, and Kṛtavarmā arrive where Duryodhana lies struck down. They find him barely breathing, senseless, with shattered thighs, vomiting blood, and surrounded by terrifying scavengers; the three survivors keep the beasts at bay and encircle him in grief. Kṛpa reflects on the overwhelming force of fate as the once-dominant commander now lies in dust; he points to Duryodhana’s beloved mace fallen nearby, using it as a symbol of warrior identity and reversal of fortune. Aśvatthāmā then laments and criticizes the manner of Duryodhana’s defeat, framing it as a deviation from proper combat norms, and anticipates reputational consequences. He consoles Duryodhana by enumerating the remaining survivors and declaring that the night retaliation has eliminated the Pāñcāla leadership and the sons of Draupadī, presenting it as “counter-action” for prior losses. Duryodhana, pleased, acknowledges that this deed exceeded what others achieved for him and offers a final benediction, expressing hope of reunion in heaven before dying. The three embrace him, depart at dawn toward the city, and the framing narration notes Dhṛtarāṣṭra’s anguished reaction and reflective silence.

Chapter Arc: रात्रि के रक्त-धुएँ के बाद प्रभात की ठंडी हवा में कौरव-शिविर के बचे हुए रथी दुर्योधन को खोजते हैं—और उसे धरती पर पड़ा पाते हैं, टूटी जंघाओं के साथ, चेतना डूबती-उतराती, मुख से रक्त-फेन उगलता हुआ। → कृपाचार्य और अश्वत्थामा उस दृश्य से भीतर तक हिल जाते हैं। जिनके द्वार पर कभी अर्थ-हेतु ब्राह्मण उपासना करते थे, उसी नरेश के शरीर पर अब मांस-हेतु क्रव्यादों की दृष्टि है—राज-वैभव की क्षणभंगुरता उनके विलाप को और तीखा करती है। वे दुर्योधन के पास बैठकर उसके पराक्रम, उसके साथ गिरे महारथियों (बाह्लिक, जयद्रथ, सोमदत्त, भूरिश्रवा आदि) का स्मरण करते हुए शोक और आत्मग्लानि में डूबते जाते हैं। → द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) की करुण वाणी में दुर्योधन के निधन का समाचार स्पष्ट हो उठता है—‘अग्रे यात्वा रणे शूरः, पश्चाद् विनिहतः परैः’—और यह स्वीकारोक्ति कि वह प्रायः धर्मपूर्वक शत्रुओं का सामना करते हुए मारा गया। यह क्षण शोक को नियति-स्वीकृति में बदल देता है, पर साथ ही भीतर प्रतिशोध की आग भी सुलगा देता है। → विलाप के बीच वे मृत-राजा को अंतिम प्रणाम/आलिंगन-भाव अर्पित करते हैं, और स्वर्गगमन की कल्पना में उसे उन पूर्वगतान् महारथियों के बीच प्रतिष्ठित देखते हैं। नगर/शिविर की ओर लौटते हुए (प्रत्यूषकाले) कथावाचक-स्वर शोकाकुल गति का संकेत देता है—जीवितों के लिए अब शांति नहीं, केवल आगे की कठोरता है। → दुर्योधन के अंत के साथ कौरव-पक्ष का ध्वज गिर चुका है—पर शेष बचे योद्धाओं के हृदय में प्रतिशोध की प्रतिज्ञा आकार ले रही है; अगला कदम किस पर और कैसे टूटेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ६ “लोक मिलाकर कुल १५९ ६ श्लोक हैं।) भस्म करत (2 अमन नवमो<्ध्याय: दुर्योधनकी दशा देखकर कृपाचार्य और अभश्वत्थामाका विलाप तथा उनके मुखसे पांचालोंके वधका वृत्तान्त जानकर दुर्योधनका प्रसन्न होकर प्राणत्याग करना संजय उवाच ते हत्वा सर्वपज्चालान द्रौपदेयांश्व सर्वशः । आगच्छन्‌ सहितास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः,संजय कहते हैं--राजन्‌! वे तीनों महारथी समस्त पांचालों और द्रौपदीके सभी पुत्रोंका वध करके एक साथ उस स्थानमें आये, जहाँ राजा दुर्योधन मारा गया था

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา! มหารถทั้งสามนั้น ครั้นสังหารชาวปัญจาลทั้งสิ้นและบุตรของเทราปทีทุกคนแล้ว ก็พากันมาถึง ณ ที่ซึ่งพระเจ้าทุรโยธนถูกสังหารนอนอยู่”

Verse 2

गत्वा चैनमपश्यन्त किज्चित्प्राणं जनाधिपम्‌ । ततो रथेभ्य: प्रस्कन्द्य परिवद्रुस्तवात्मजम्‌,वहाँ जाकर उन्होंने राजा दुर्योधनको देखा, उसकी कुछ-कुछ साँस चल रही थी। फिर वे रथोंसे कूद पड़े और आपके पुत्रके पास जा उसे सब ओरसे घेरकर बैठ गये

ครั้นไปถึง พวกเขาเห็นเจ้าแห่งหมู่ชนคือทุรโยธนยังมีลมหายใจริบหรี่ แล้วจึงกระโดดลงจากรถศึก รีบไปยังพระโอรสของพระองค์ และนั่งล้อมเขาไว้ทุกทิศทุกทาง

Verse 3

त॑ भग्नसक्थं राजेन्द्र कृच्छुप्राणमचेतसम्‌ । वमन्तं रुचिरं वक्त्रादपश्यन्‌ वसुधातले

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชาเหนือราชาทั้งปวง พวกเขาเห็นเขานอนอยู่บนพื้นดิน—ต้นขาหัก ลมหายใจติดขัดและแผ่ว สติเลือนราง—อาเจียนออกจากโอษฐ์อันงดงามของเขา”

Verse 4

वृतं समन्ताद्‌ बहुभि: श्वापदैर्घोरदर्शनै: । शालावृकगणैश्वैव भक्षयिष्यद्धिरन्तिकात्‌

สัญชัยกล่าวว่า มันถูกล้อมรอบทุกด้านด้วยสัตว์ร้ายจำนวนมากที่น่าหวาดผวา; และฝูงหมาไนก็อยู่ใกล้ราวกับพร้อมจะกัดกินมัน

Verse 5

निवारयन्तं कृच्छात्तान्‌ श्वापदांश्व चिखादिषून्‌ | विचेष्टमानं महयां च सुभूशं गाढवेदनम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “ด้วยความยากลำบาก เขาพยายามปัดป้องสัตว์ร้ายและพวกกินเนื้อเหล่านั้น เขาบิดเกลือกอยู่บนพื้นดิน ถูกความทุกข์ครอบงำด้วยความเจ็บปวดรุนแรงไม่ยอมคลาย”

Verse 6

राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजाकी जाँचें टूट गयी हैं। ये बड़े कष्टसे प्राण धारण करते हैं। इनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है और ये अपने मुँहसे पृथ्वीपर खून उगल रहे हैं। इन्हें चट कर जानेके लिये बहुत-से भयंकर दिखायी देनेवाले हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओरसे घेरकर आसपास ही खड़े हैं। ये अपनेको खा जानेकी इच्छा रखनेवाले उन हिंसक जन्तुओंको बड़ी कठिनाईसे रोकते हैं। इन्हें बड़ी भारी पीड़ा हो रही है, जिसके कारण ये पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे हैं ।। त॑ शयानं तथा दृष्टवा भूमौ सुरुधिरोक्षितम्‌ । हतशिष्टास्त्रयो वीरा: शोकार्ता: पर्यवारयन्‌

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่ราชেন্দร! พวกเขาเห็นว่าต้นขาของพระราชาหักแล้ว; พระองค์ประคองชีวิตด้วยความยากลำบาก สติราวกับดับวูบ และทรงพ่นโลหิตจากพระโอษฐ์ลงสู่พื้นดิน สัตว์ร้ายอันน่าสะพรึงและสุนัขจำนวนมากล้อมรอบอยู่ใกล้ ราวกับพร้อมจะกัดกิน พระองค์ฝืนกำลังปัดป้องพวกที่หมายจะกินพระองค์อย่างยากยิ่ง; ด้วยความเจ็บปวดรุนแรงจึงทรงดิ้นรนอยู่บนพื้นดิน ครั้นเห็นพระองค์นอนอยู่เช่นนั้น ชุ่มโชกด้วยโลหิตบนแผ่นดิน วีรบุรุษสามผู้รอดเหลือ—เศร้าโศก—ยืนล้อมอยู่รอบพระองค์”

Verse 7

तैस्त्रिभि: शोणितादिग्धैर्नि:श्वसद्धिर्महारथै:

สัญชัยกล่าวว่า ด้วยมหารถีทั้งสาม—เปื้อนโลหิตและหอบหายใจหนัก—ภาพนั้นยิ่งสะท้อนความอึมครึมของซากความรุนแรงหลังศึก

Verse 8

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें पांचाल आदिका वधविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ,शुशुभे स वृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभि: | वे तीनों महारथी वीर खूनसे रँग गये थे और लंबी साँसें खींच रहे थे। उनसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन तीन अग्नियोंसे घिरी हुई वेदीके समान सुशोभित हो रहा था ।। ते तं शयानं सम्प्रेक्ष्य राजानमतथोचितम्‌

สัญชัยกล่าวว่า—ท่ามกลางดุจถูกล้อมด้วยไฟทั้งสาม พระราชาทรงส่องประกายประหนึ่งแท่นบูชายัญที่มีเปลวเพลิงสามสายโอบล้อม มหารถีทั้งสาม—กายชุ่มด้วยโลหิต ลมหายใจยาวหนัก—ยืนรายรอบอยู่; และทุรโยธนะผู้เอนกายนอน ณ ที่นั้น ก็แลดูดุจเวทีที่ถูกไฟสามกองล้อมไว้ งามเด่นอยู่ในวงล้อมอันน่าสยดสยองนั้น ครั้นเห็นพระราชาบรรทมอยู่เช่นนี้ ในสภาพไม่สมพระเกียรติ พวกเขาจึงเพ่งมองด้วยสายตาเคร่งขรึม

Verse 9

ततस्तु रुधिरं हस्तैर्मुखान्निर्मुज्य तस्य हि । रणे राज्ञ: शयानस्य कृपणं पर्यदेवयन्‌,तत्पश्चात्‌ रणभूमिमें सोये हुए राजा दुर्योधनके मुखसे बहते हुए रक्तको हाथोंसे पोंछकर वे तीनों दीन वाणीमें विलाप करने लगे इति श्रीमहा भारते सौप्तिकपर्वणि दुर्योधनप्राणत्यागे नवमो5ध्याय:

แล้วพวกเขาทั้งสามใช้มือเช็ดโลหิตที่ไหลจากพระโอษฐ์ของพระราชาผู้บรรทมอยู่กลางสมรภูมิ และเริ่มคร่ำครวญด้วยเสียงอันเวทนา

Verse 10

कृप उवाच न दैवस्यातिभारो5स्ति यदयं रुधिरोक्षित: । एकादशचमूभर्ता शेते दुर्योधनो हतः,कृपाचार्य बोले--हाय! विधाताके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है। जो कभी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे, वे ही ये राजा दुर्योधन यहाँ मारे जाकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं

กฤปะกล่าวว่า—“อนิจจา! สำหรับชะตากรรมแล้ว ไม่มีภาระใดหนักเกินไป ดูเถิด—ทุรโยธนะ ผู้เคยเป็นเจ้าแห่งกองทัพอักษৌหิณีสิบเอ็ดกอง บัดนี้ถูกสังหาร นอนชุ่มด้วยโลหิต”

Verse 11

पश्य चामीकराभस्य चामीकरवि भूषिताम्‌ । गदां गदाप्रियस्येमां समीपे पतितां भुवि

จงดู—คทานี้สุกสว่างดุจทอง และประดับด้วยเครื่องทอง เป็นของผู้หลงใหลในคทา; บัดนี้ตกอยู่บนพื้นดินใกล้ตัวเขา

Verse 12

देखो, सुवर्णके समान कान्तिवाले इन गदाप्रेमी नरेशके समीप यह सुवर्णभूषित गदा पृथ्वीपर पड़ी है ।। इयमेनं गदा शूरं न जहाति रणे रणे । स्वर्गायापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम्‌

คทานี้ไม่เคยทอดทิ้งวีรบุรุษผู้นั้นในศึกแล้วศึกเล่า; แม้เมื่อผู้มีเกียรติยศย่างก้าวไปสู่สวรรค์ ก็ยังไม่ละทิ้งเขา

Verse 13

यह गदा इन शूरवीर भूपालका साथ किसी भी युद्धमें नहीं छोड़ती थी और आज स्वर्गलोकमें जाते समय भी यशस्वी नरेशका साथ नहीं छोड़ रही है ।। पश्येमां सह वीरेण जाम्बूनदविभूषिताम्‌ । शयानां शयने हम्यें भार्या प्रीतिमतीमिव,देखो, यह सुवर्णभूषित गदा इन वीर भूपालके साथ रणशय्यापर उसी प्रकार सो रही है, जैसे महलमें प्रेम रखनेवाली पत्नी इनके साथ सोया करती थी

กฤปะกล่าวว่า “จงดูเถิด คทานี้ประดับด้วยทองชัมพูนท มันนอนเคียงข้างวีรบุรุษบนแท่นบรรทมแห่งสนามรบ ราวกับภรรยาผู้เปี่ยมรักนอนร่วมกับเขาบนตั่งในพระราชวัง อาวุธที่ไม่เคยทอดทิ้งพระราชาผู้มีเกียรติยศในศึกใด ๆ วันนี้เมื่อพระองค์เสด็จสู่สวรรค์ ก็ยังไม่ทอดทิ้งพระองค์เช่นเดิม”

Verse 14

यो<यं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे यात: परंतप: । स हतो ग्रसते पांसून्‌ पश्य कालस्य पर्ययम्‌,जो ये शत्रुसंतापी नरेश सभी मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चला करते थे, वे ही आज मारे जाकर धरतीपर पड़े-पड़े धूल फाँक रहे हैं। यह समयका उलट-फेर तो देखो

ผู้ที่เคยยาตรานำหน้าบรรดากษัตริย์ผู้ผ่านพิธีราชาภิเษก เป็นผู้เผาผลาญศัตรู—บัดนี้ถูกสังหาร นอนกลืนฝุ่นอยู่บนพื้นดิน จงดูความผันแปรที่กาลเวลาบันดาลเถิด

Verse 15

येनाजौ निहता भूमावशेरत पुरा द्विष: । स भूमौ निहतः शेते कुरुराज: परैरयम्‌,पूर्वकालमें जिनके द्वारा युद्धमें मारे गये शत्रु भूमिपर सोया करते थे, वे ही ये कुरुराज आज शशत्रुओंद्वारा स्वयं मारे जाकर भूमिपर शयन करते हैं

ศัตรูทั้งหลายที่ครั้งก่อนถูกเขาฟันล้มในศึกย่อมนอนกองอยู่บนแผ่นดิน บัดนี้กษัตริย์แห่งกุรุผู้นั้นเอง ถูกผู้อื่นสังหารและนอนอยู่บนพื้นดิน

Verse 16

भयान्नमन्ति राजानो यस्य सम शतसंघश: । स वीरशयमने शेते क्रव्याद्धि: परिवारित:,जिनके आगे सैकड़ों राजा भयसे सिर झुकाते थे, वे ही आज हिंसक जन्तुओंसे घिरे हुए वीर-शय्यापर सो रहे हैं

เบื้องหน้าเขา กษัตริย์นับร้อยเคยก้มเศียรด้วยความหวาดกลัว แต่บัดนี้วีรบุรุษผู้นั้นกลับนอนอยู่บนแท่นบรรทมของนักรบ ถูกสัตว์กินเนื้อรายล้อม

Verse 17

उपासत द्विजा: पूर्वमर्थहेतोर्यमी श्वरम्‌ उपासते च तं हाद्य क्रव्यादा मांसहेतव:,पहले बहुत-से ब्राह्मण धनकी प्राप्तिके लिये जिन नरेशके पास बैठे रहते थे, उन्हींके समीप आज मांसके लिये मांसाहारी जन्तु बैठे हुए हैं

กาลก่อน พราหมณ์มากมายเคยนั่งเฝ้ากษัตริย์องค์นั้นเพื่อหวังทรัพย์และอุปถัมภ์ แต่วันนี้ ณ ที่เดิมนั้นเอง สัตว์กินเนื้อนั่งใกล้พระองค์ เพราะหมายเอาเพียงเนื้อหนัง

Verse 18

संजय उवाच तं शयानं कुरुश्रेष्ठ ततो भरतसत्तम । अश्वत्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवयत्‌,संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुरुकुल-भूषण दुर्योधनको रणशय्यापर पड़ा देख अश्वत्थामा इस प्रकार करुण विलाप करने लगा--

สัญชัยกล่าวว่า “โอ ผู้ประเสริฐแห่งวงศ์ภารตะ! ครั้นแล้ว เมื่ออัศวัตถามาเห็นทุรโยธนะ ผู้เป็นเครื่องประดับแห่งวงศ์กุรุ นอนอยู่บนแท่นบรรทมแห่งสนามรบ เขาก็เพ่งมองและเริ่มคร่ำครวญด้วยความเวทนาอันลึกซึ้ง”

Verse 19

आहुस्त्वां राजशार्दूल मुख्य॑ सर्वधनुष्मताम्‌ । धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं संकर्षणस्य च,“निष्पाप राजसिंह! आपको समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कहा जाता था। आप गदायुद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरकी समानता करनेवाले तथा साक्षात्‌ संकर्षणके शिष्य थे तो भी भीमसेनने कैसे आपपर प्रहार करनेका अवसर पा लिया? नरेश्वर! आप तो सदासे ही बलवान्‌ और गदायुद्धके विद्वान्‌ रहे हैं। फिर उस पापात्माने कैसे आपको मार दिया?

สัญชัยกล่าวว่า “โอ พยัคฆ์แห่งราชา! ผู้คนเคยยกย่องท่านว่าเป็นยอดแห่งนักธนูทั้งปวง ในสงครามท่านถูกกล่าวว่าเสมอด้วยกุเบร เจ้าแห่งทรัพย์ และท่านเป็นศิษย์โดยตรงของสังกรษณะ (พลราม) ถึงกระนั้น ภีมเสนาจะได้ช่องว่างใดจึงลงมือฟันท่านได้? โอ ผู้ครองแผ่นดิน! ท่านทั้งแข็งแกร่งและชำนาญศึกคทามาแต่เดิม แล้วคนใจบาปนั้นจะฆ่าท่านได้อย่างไร?”

Verse 20

कथं विवरमद्राक्षीद्‌ भीमसेनस्तवानघ । बलिन कृतिनं नित्यं स च पापात्मवान्‌ नृप,“निष्पाप राजसिंह! आपको समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कहा जाता था। आप गदायुद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरकी समानता करनेवाले तथा साक्षात्‌ संकर्षणके शिष्य थे तो भी भीमसेनने कैसे आपपर प्रहार करनेका अवसर पा लिया? नरेश्वर! आप तो सदासे ही बलवान्‌ और गदायुद्धके विद्वान्‌ रहे हैं। फिर उस पापात्माने कैसे आपको मार दिया?

สัญชัยกล่าวว่า “โอ กษัตริย์ผู้ปราศจากบาป! ภีมเสนมองเห็นช่องโหว่ต่อท่านได้อย่างไร? ท่านแข็งแกร่งและสำเร็จศึกอยู่เสมอ; กระนั้น โอ นฤปะ ผู้มีใจบาปนั้นกลับสังหารท่านได้อย่างไร?”

Verse 21

कालो नूनं महाराज लोके5स्मिन्‌ बलवत्तर: । पश्यामो निहतं त्वां च भीमसेनेन संयुगे,“महाराज! निश्चय ही इस संसारमें समय महाबलवान्‌ है, तभी तो युद्धस्थलमें हम आपको भीमसेनके द्वारा मारा गया देखते हैं

สัญชัยกล่าวว่า “โอ มหาราช! ในโลกนี้กาล (เวลา/ชะตา) นั้นแน่นอนว่าแข็งแกร่งยิ่งกว่า เพราะในศึกเรายังเห็นท่านถูกภีมเสนสังหาร”

Verse 22

कथं त्वां सर्वधर्मज्ञ क्षुद्र: पापो वृकोदर: । निकृत्या हतवान्‌ मन्दो नूनं कालो दुरत्यय:,“आप तो सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता थे। आपको उस मूर्ख, नीच और पापी भीमसेनने किस तरह धोखेसे मार डाला? अवश्य ही कालका उल्लंघन करना सर्वथा कठिन है

สัญชัยกล่าวว่า “ท่านเป็นผู้รู้ธรรมทั้งปวง แล้ววฤโกทร (ภีมะ) ผู้ต่ำช้า ใจบาป และเขลานั้น จะฆ่าท่านด้วยเล่ห์กลได้อย่างไร? แน่นอนว่า ‘กาล’ นั้นยากยิ่งจะล่วงพ้น”

Verse 23

धर्मयुद्धे ह्वार्मेण समाहूयौजसा मृधे । गदया भीमसेनेन निर्भग्ने सक्थिनी तव,'भीमसेनने आपको धर्मयुद्धके लिये बुलाकर रणभूमिमें अधर्मके बलसे गदाद्वारा आपकी दोनों जाँघें तोड़ डालीं

สัญชัยกล่าวว่า “แม้จะประกาศว่าเป็นยุทธธรรม ภีมเสนะก็ท้าทายท่านในสมรภูมิ; แต่ด้วยกำลังแห่งอธรรม เขาใช้คทาทุบทำลายต้นขาทั้งสองของท่าน”

Verse 24

अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिर: । य उपेक्षितवान क्षुद्रे धिक्‌ कृष्णं धिग्‌ युधिष्ठिरम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “ศีรษะของผู้ที่ถูกสังหารในศึกด้วยอธรรม กำลังถูกเหยียบย่ำบดขยี้ด้วยเท้า ผู้ที่มองดูอย่างเพิกเฉยด้วยใจคับแคบ—จงมีคำสาปต่อกฤษณะ และจงมีคำสาปต่อยุธิษฐิระ”

Verse 25

“एक तो आप रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारे गये। दूसरे भीमसेनने आपके मस्तकपर लात मारी। इतनेपर भी जिन्होंने उस नीचकी उपेक्षा की, उसे कोई दण्ड नहीं दिया, उन श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरको धिक्कार है! ।। युद्धेष्वपवदिष्यन्ति योधा नूनं वृकोदरम्‌ | यावत्‌ स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या हसि पातित:,“आप धोखेसे गिराये गये हैं, अतः इस संसारमें जबतक प्राणियोंकी स्थिति रहेगी, तबतक सभी युद्धोंमें सम्पूर्ण योद्धा भीमसेनकी निन्दा ही करेंगे

สัญชัยกล่าวว่า “ประการหนึ่ง ท่านถูกสังหารในสมรภูมิด้วยวิถีอธรรม; อีกประการหนึ่ง ภีมเสนะยังเตะศีรษะของท่าน และผู้ที่เพิกเฉยไม่ลงโทษคนชั่วนั้น—จงมีคำประณามต่อพระกฤษณะ และจงมีคำประณามต่อยุธิษฐิระ เหล่านักรบจักติเตียนวฤโกทร (ภีมะ) ในทุกศึก; เพราะตราบใดที่สรรพชีวิตยังดำรงอยู่ ตราบนั้นจะยังจดจำว่า ท่านถูกโค่นลงด้วยเล่ห์กลและถูกสังหาร”

Verse 26

ननु रामो<ब्रवीद्‌ राजंस्त्वां सदा यदुनन्दन: । दुर्योधनसमो नास्ति गदया इति वीर्यवान्‌

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา พระรามผู้ทรงเดช ผู้เป็นที่ชื่นชมของวงศ์ยทุ เคยกล่าวถึงท่านเสมอว่า ‘ในศึกคทา ไม่มีผู้ใดเสมอเหมือนทุรโยธนะ’”

Verse 27

“राजन! पराक्रमी यदुनन्दन बलरामजी आपके विषयमें सदा कहा करते थे कि 'गदायुद्धकी शिक्षामें दुर्योधनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है” ।। श्लाघते त्वां हि वाष्णेयो राजसंसत्सु भारत | स शिष्यो मम कौरव्यो गदायुद्ध इति प्रभो

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่ภารตะ ในที่ประชุมแห่งกษัตริย์ทั้งหลาย วาษเณยะ (พระพลราม) ยกย่องท่านว่า ‘ข้าแต่เจ้านาย กุรุวงศ์ผู้นี้เป็นศิษย์ของข้าในศิลปะแห่งศึกคทา’”

Verse 28

'प्रभो! भरतनन्दन! वे वृष्णिकुलभूषण बलराम राजाओंकी सभामें सदा आपकी प्रशंसा करते हुए कहते थे कि “कुरुराज दुर्योधन गदायुद्धमें मेरा शिष्य है” ।। यां गतिं क्षत्रियस्याहु: प्रशस्तां परमर्षय: । हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम्‌,“महर्षियोंने युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए मारे जानेवाले क्षत्रियके लिये जो उत्तम गति बतायी है, आपने वही गति प्राप्त की है

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระองค์ ผู้เป็นที่ชื่นใจแห่งวงศ์ภารตะ! พระพลราม ผู้เป็นมงกุฎแห่งวงศ์วฤษณิ เคยสรรเสริญพระองค์ในท่ามกลางสภากษัตริย์อยู่เสมอว่า ‘ท้าวทุรโยธน์ กษัตริย์แห่งกุรุ เป็นศิษย์ของเราในศิลปะการรบด้วยกระบอง’ และคติอันประเสริฐที่มหาฤๅษีทั้งหลายยกย่องสำหรับกษัตริย์นักรบ—ผู้ถูกสังหารในสนามรบขณะเผชิญหน้าศัตรู—พระองค์ได้บรรลุคตินั้นแล้ว”

Verse 29

दुर्योधन न शोचामि त्वामहं पुरुषर्षभ । हतपुत्रौ तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते,'पुरुषश्रेष्ठ राजा दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिये शोक नहीं करता। मुझे तो माता गान्धारी और आपके पिता धृतराष्ट्रके लिये शोक हो रहा है, जिनके सभी पुत्र मार डाले गये हैं

สัญชัยกล่าวว่า “โอ้ทุรโยธน์ ผู้ประเสริฐในหมู่บุรุษ! ข้ามิได้โศกเศร้าเพื่อเจ้า หากแต่โศกเพื่อพระนางคานธารีและพระบิดาของเจ้า ธฤตราษฏระ—ผู้สูญสิ้นบุตรทั้งหลายแล้ว”

Verse 30

भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम्‌ । धिगस्तु कृष्ण वार्ष्णेयमर्जुनं चापि दु्मतिम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “คนทั้งสองนั้นจักพเนจรไปบนแผ่นดินนี้ดุจขอทาน คร่ำครวญด้วยความโศก. น่าละอายแก่กฤษณะผู้สืบวงศ์วฤษณิ และน่าละอายแก่อรชุนผู้มีความเห็นผิดด้วย”

Verse 31

पाण्डवाश्षापि ते सर्वे कि वक्ष्यन्ति नराधिप

สัญชัยกล่าวว่า “และข้าแต่มหาราช! เหล่าปาณฑพทั้งปวงนั้นจักกล่าวสิ่งใดแก่ท่านเล่า?”

Verse 32

धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमायोधने हत:

สัญชัยกล่าวว่า “โอ้คานธาระ! ท่านเป็นผู้มีบุญยิ่งนัก เพราะท่านได้ล้มลงในสนามรบ”

Verse 33

हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिबान्धवा

สัญชัยกล่าวว่า—คานธารีสูญเสียบุตรทั้งหลายแล้ว และญาติวงศ์กับเครือญาติก็ถูกสังหารสิ้น

Verse 34

धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम्‌

สัญชัยกล่าวว่า—“น่าละอายแก่กฤตวรรมะ และแก่ข้าด้วย และแก่กฤปะ มหารถผู้นั้นด้วย”

Verse 35

ये वयं न गताः: स्वर्ग त्वां पुरस्कृत्य पार्थिवम्‌ । “मुझको, कृतवर्माको तथा महारथी कृपाचार्यको भी धिक्‍्कार है कि हम आप-जैसे महाराजको आगे करके स्वर्गलोकमें नहीं गये ।। ३४ $ ।। दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम्‌

สัญชัยกล่าวว่า—“น่าละอายแก่พวกเรา, โอ้พระราชา ที่มิได้ไปสวรรค์โดยมีพระองค์นำหน้า พระองค์ทรงเป็นผู้ประทานสิ่งปรารถนาทั้งปวง และทรงเป็นผู้พิทักษ์ประโยชน์สุขแห่งไพร่ฟ้า”

Verse 36

कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्न मे

สัญชัยกล่าวว่า—“ด้วยวีรภาพของกฤปะผู้เป็นของพระองค์ และด้วยของข้า และด้วยของบิดาข้าด้วย…”

Verse 37

तव प्रसादादस्माभि: समित्रै: सह बान्धवै:

“ด้วยพระกรุณาของพระองค์ พวกเรา—พร้อมด้วยมิตรสหายและวงศ์ญาติ—(จึงเป็นไปได้ดังนี้)”

Verse 38

कुतश्चापीदृशं पापा: प्रवर्तिष्पयामहे वयम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “พวกเราผู้มีบาป ไฉนจึงมุ่งกระทำการอันน่าชั่วเช่นนี้ได้—มาจากไหนกันเล่า?”

Verse 39

वयमेव त्रयो राजन्‌ गच्छन्तं परमां गतिम्‌,“राजन्‌! परम गतिको जाते समय आपके पीछे-पीछे जो हम तीनों भी नहीं चल रहे हैं, इसके कारण हम स्वर्ग और अर्थ दोनोंसे वंचित हो आपके सुकृतोंका स्मरण करते हुए दिन- रात शोकाग्निमें जलते रहेंगे

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา พระองค์กำลังเสด็จสู่ภาวะอันสูงสุด แต่พวกเราสามคนกลับมิได้ตามเสด็จไปเบื้องหลัง ด้วยเหตุนี้ เมื่อถูกพรากทั้งสวรรค์และลาภในโลก เราจักระลึกถึงกุศลกรรมของพระองค์ และจักไหม้เกรียมในไฟแห่งโศกา ทั้งกลางวันและกลางคืน”

Verse 40

यद्‌ वै त्वां नानुगच्छामस्तेन धक्ष्यामहे वयम्‌ | तत्‌ स्वर्गहीना हीनार्था: स्मरन्त: सुकृतस्य ते,“राजन्‌! परम गतिको जाते समय आपके पीछे-पीछे जो हम तीनों भी नहीं चल रहे हैं, इसके कारण हम स्वर्ग और अर्थ दोनोंसे वंचित हो आपके सुकृतोंका स्मरण करते हुए दिन- रात शोकाग्निमें जलते रहेंगे

สัญชัยกล่าวว่า “หากแท้จริงเรามิได้ตามเสด็จพระองค์ไป ความผิดนั้นเองจักเผาผลาญเรา เมื่อไร้สวรรค์และไร้ลาภอันควรได้ ข้าแต่พระราชา เราจักระลึกถึงกุศลกรรมของพระองค์ และจักไหม้ในไฟแห่งโศกา ทั้งกลางวันและกลางคืน”

Verse 41

कि नाम तद्‌ भवेत्‌ कर्म येन त्वां न व्रजाम वै । दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्याम महीमिमाम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “กรรมอันใดเล่าที่ทำให้เรามิอาจไปถึงพระองค์ได้? แน่แท้ โอ้ผู้ประเสริฐแห่งวงศ์กุรุ เราจักพเนจรอยู่บนแผ่นดินนี้ด้วยความทุกข์”

Verse 42

'कुरुश्रेष्ठ! न जाने वह कौन-सा कर्म है, जिससे विवश होकर हम आपके साथ नहीं चल रहे हैं। निश्चय ही इस पृथ्वीपर हमें निरन्तर दुःख भोगना पड़ेगा ।। हीनानां नस्त्वया राजन्‌ कुतः शान्ति: कुतः सुखम्‌ । गत्वैव तु महाराज समेत्य च महारथान्‌

สัญชัยกล่าวว่า “โอ้ผู้ประเสริฐแห่งวงศ์กุรุ เรามิอาจรู้ได้เลยว่าเป็นกรรมอันใดที่บีบคั้นให้เรามิอาจตามเสด็จไปกับพระองค์ แน่แท้ เมื่อคงอยู่บนแผ่นดินนี้ เราจักต้องเสวยทุกข์ไม่รู้จบ ข้าแต่พระราชา เมื่อถูกพรากจากพระองค์แล้ว ความสงบจักอยู่ที่ใด? ความสุขจักอยู่ที่ใด? กระนั้นก็ดี ข้าแต่มหาราช ครั้นไปถึงที่นั่นแล้วได้พบกับเหล่ามหารถีอีกครั้ง…”

Verse 43

आचार्य पूजयित्वा च केतु सर्वधनुष्मताम्‌

สัญชัยกล่าวว่า—ครั้นบูชาอาจารย์ตามสมควรแล้ว และถวายความเคารพแก่เกตุ ผู้เลิศในหมู่นักธนูทั้งปวง เขาจึงก้าวต่อไป; ท่ามกลางกระแสสงครามอันโหดร้าย นั่นยังเป็นการแสดงความนอบน้อมโดยเจตนา

Verse 44

हतं मयाद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप । “नरेश्वर! फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके ध्वजस्वरूप आचार्यका पूजन करके उनसे कह दें कि “आज अअभश्व॒त्थामाके द्वारा धृष्टद्युम्म मार डाला गया” || ४३ $ || परिष्वजेथा राजानं बाह्विकं सुमहारथम्‌

สัญชัยกล่าวว่า—“ข้าแต่มหาราช จงประกาศว่า ‘วันนี้เราสังหารธฤษฏทยุมน์แล้ว’ และจงโอบกอดพระราชาพาหลีกะ มหารถีผู้นั้น”

Verse 45

सैन्धवं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । “महारथी राजा बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाका भी आप मेरी ओरसे आलिंगन करें |। तथा पूर्वगतानन्यान्‌ स्वर्गे पार्थिवसत्तमान्‌,“दूसरे-दूसरे भी जो नृपश्रेष्ठ पहलेसे ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं, उन सबको मेरे कथनानुसार हृदयसे लगाकर उनकी कुशल पूछें"

สัญชัยกล่าวว่า—“จงโอบกอดไซนธวะ (ชยทรถะ) โสมทัตตะ และภูริศรวัสด้วย และเช่นกัน จงโอบกอดด้วยใจจริงเหล่ากษัตริย์ผู้ประเสริฐอื่น ๆ ที่ได้ไปถึงโลกสวรรค์ก่อนหน้าแล้ว และจงไต่ถามความผาสุกของท่านเหล่านั้นตามที่เรากล่าว”

Verse 46

अस्मद्वाक्यात्‌ परिष्वज्य सम्पृच्छेस्त्वमनामयम्‌,“दूसरे-दूसरे भी जो नृपश्रेष्ठ पहलेसे ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं, उन सबको मेरे कथनानुसार हृदयसे लगाकर उनकी कुशल पूछें"

สัญชัยกล่าวว่า—“ตามถ้อยคำของเรา จงโอบกอดท่านเหล่านั้นด้วยใจจริง และไต่ถามความผาสุกปราศจากโรคภัย”

Verse 47

संजय उवाच इत्येवमुक्त्वा राजानं भग्नसक्थमचेतनम्‌ | अभश्रृत्थामा समुद्वीक्ष्य पुनर्वचनमब्रवीत्‌,संजय कहते हैं--महाराज! जिसकी जाँघें टूट गयी थीं, उस अचेत पड़े हुए राजा दुर्योधनसे ऐसा कहकर अभश्रव॒त्थामाने पुन उसकी ओर देखा और इस प्रकार कहा --

สัญชัยกล่าวว่า—ครั้นกล่าวดังนี้แก่พระราชา (ทุรโยธนะ) ผู้มีต้นขาแตกหักและนอนหมดสติอยู่แล้ว อัศวัตถามาจึงเหลียวมองอีกครั้ง และกล่าวถ้อยคำขึ้นใหม่

Verse 48

दुर्योधन जीवसि त्वं वाक्यं श्रोत्रसुखं शूणु । सप्त पाण्डवत: शेषा धार्तराष्ट्रासत्रयो वयम्‌

สัญชัยกล่าวว่า “ทุรโยธนะ! ท่านยังมีชีวิตอยู่—จงฟังถ้อยคำอันรื่นหูเถิด ฝ่ายปาณฑพยังเหลืออยู่เจ็ด ส่วนฝ่ายธฤตราษฏระ เหลือพวกเราสามคน”

Verse 49

*राजा दुर्योधन! यदि आप जीवित हों तो यह कानोंको सुख देनेवाली बात सुनें। पाण्डवपक्षमें केवल सात और कौरवपक्षमें सिर्फ हम तीन ही व्यक्ति बच गये हैं ।। ते चैव भ्रातर: पञ्च वासुदेवो5थ सात्यकि: । अहं च कृतवर्मा च कृप: शारद्वतस्तथा,“उधर तो पाँचों भाई पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकि बचे हैं और इधर मैं, कृतवर्मा तथा शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य शेष रह गये हैं

“ข้าแต่พระราชาทุรโยธนะ! หากท่านยังมีชีวิตอยู่ จงฟังถ้อยคำอันรื่นหูเถิด ฝ่ายปาณฑพเหลือพี่น้องห้าคน วาสุเทวะศรีกฤษณะ และสาตยกี; ส่วนฝ่ายเราเหลือเพียงข้า กฤตวรมะ และกฤปาจารย์ บุตรแห่งศรทวัต—รวมสามคนเท่านั้น”

Verse 50

द्रौपदेया हता: सर्वे धृष्टद्युम्नस्थ चात्मजा: । पज्चाला निहता: सर्वे मत्स्यशेषं च भारत,“भरतनन्दन! द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नके सभी पुत्र मारे गये, समस्त पांचालोंका संहार कर दिया गया और मत्स्य देशकी अवशिष्ट सेना भी समाप्त हो गयी

สัญชัยกล่าวว่า “บุตรทั้งปวงของเทราปทีถูกสังหารแล้ว และบุตรของธฤษฏทยุมน์ก็เช่นกัน โอ ภารตะ! ชาวปัญจาลถูกฆ่าล้างสิ้น แม้กองกำลังที่เหลือของแคว้นมัตสยะก็ถูกกวาดล้างจนหมด”

Verse 51

कृते प्रतिकृतं पश्य हतपुत्रा हि पाण्डवा: । सौप्तिके शिबिरं तेषां हतं सनरवाहनम्‌,“राजन! देखिये, शत्रुओंकी करनीका कैसा बदला चुकाया गया? पाण्डवोंके भी सारे पुत्र मार डाले गये। रातमें सोते समय मनुष्यों और वाहनोंसहित उनके सारे शिविरका नाश कर दिया गया

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา! จงดูเถิด การกระทำถูกตอบแทนอย่างไร ปาณฑพเองก็ถูกทำให้ไร้บุตร ในการบุกยามราตรี ขณะพวกเขาหลับใหล ค่ายทั้งค่ายถูกทำลายสิ้น พร้อมทั้งผู้คนและพาหนะ”

Verse 52

मया च पापकर्मासौ धृष्टद्युम्नो महीपते । प्रविश्य शिबिरं रात्रौ पशुमारेण मारित:,'भूपाल! मैंने स्वयं रातके समय शिविरमें घुसकर पापाचारी धृष्टद्युम्मको पशुओंकी तरह गला घोंट-घोंटकर मार डाला है”

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระมหากษัตริย์! ข้าก็เช่นกัน ได้ลอบเข้าไปในค่ายยามราตรี แล้วสังหารธฤษฏทยุมน์ผู้ก่อกรรมชั่วนั้น ด้วยการบีบคอราวกับฆ่าสัตว์”

Verse 53

दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनस: प्रियाम्‌ । प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमब्रवीत्‌,यह मनको प्रिय लगनेवाली बात सुनकर दुर्योधनको पुनः होश आ गया और वह इस प्रकार बोला--

ครั้นทุรโยธน์ได้สดับถ้อยคำอันเป็นที่รื่นรมย์แก่ดวงใจ ก็กลับได้สติอีกครั้ง แล้วกล่าววาจานี้ว่า

Verse 54

न मे5करोत्‌ तद्‌ गाड़ेयो न कर्णो न च ते पिता | यत्‌ त्वया कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम्‌

กิจที่ท่านได้กระทำแก่ข้าในวันนี้ โดยร่วมกับครูกรปะและโภชะนั้น มิใช่กาฑेयะ มิใช่กรรณะ แม้บิดาของท่านก็ไม่เคยกระทำให้ข้าได้

Verse 55

“मित्रवर! आज आचार्य कृप और कृतवर्माके साथ तुमने जो कार्य कर दिखाया है, उसे न गंगानन्दन भीष्म, न कर्ण और न तुम्हारे पिताजी ही कर सके थे ।। स च सेनापति: क्षुद्रो हत: सार्थ शिखण्डिना । तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै,“शिखण्डीसहित वह नीच सेनापति धृष्टद्युम्न मार डाला गया, इससे आज निश्चय ही मैं अपनेको इन्द्रके समान समझता हूँ

โอ้สหายผู้ประเสริฐ! กิจที่ท่านได้กระทำในวันนี้ร่วมกับอาจารย์กรปะและกฤตวรมันนั้น แม้ภีษมะโอรสแห่งคงคา แม้กรรณะ แม้บิดาของท่านก็ยังมิอาจกระทำได้ และแม่ทัพผู้ต่ำช้าคือธฤษฏทฺยุมน์ก็ถูกสังหารพร้อมด้วยศิขัณฑิน ด้วยเหตุนั้น วันนี้ข้าย่อมเห็นตนเสมอด้วยมฆวา (พระอินทร์) จริงแท้

Verse 56

स्वस्ति प्राप्तुत भद्रं व: स्वर्गे न: संगम: पुन: । इत्येवमुक्त्वा तूष्णी स कुरुराजो महामना:,“तुम सब लोगोंका कल्याण हो। तुम्हें सुख प्राप्त हो। अब स्वर्गमें ही हमलोगोंका पुनर्मिलन होगा।/ ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरुराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदोंके लिये दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोकमें चला गया; किंतु उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वीपर ही पड़ा रह गया

ขอความสวัสดีจงมีแก่ท่านทั้งหลาย ขอความผาสุกจงบังเกิดแก่ท่าน ในสวรรค์เท่านั้นเราจักได้พบกันอีก ครั้นกล่าวดังนี้แล้ว กษัตริย์กุรุผู้มีจิตใจสูงส่งก็นิ่งเงียบไป

Verse 57

प्राणानुपासृजद्‌ वीर: सुहृदां दुःखमुत्सूजन्‌ । अपाक्रामद्‌ दिवं पुण्यां शरीरं क्षितिमाविशत्‌,“तुम सब लोगोंका कल्याण हो। तुम्हें सुख प्राप्त हो। अब स्वर्गमें ही हमलोगोंका पुनर्मिलन होगा।/ ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरुराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदोंके लिये दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोकमें चला गया; किंतु उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वीपर ही पड़ा रह गया

วีรบุรุษนั้นปล่อยลมหายใจชีวิต สลัดทิ้งความโศกที่ถ่วงใจหมู่สหาย แล้วจากไปสู่สวรรค์อันเป็นแดนบุญ ส่วนกายหยาบนั้นกลับคงอยู่กับพื้นพิภพ

Verse 58

एवं ते निधन यात: पुत्रो दुर्योधनो नूप । अग्रे यात्वा रणे शूर: पश्चाद्‌ विनिहतः परै:,नरेश्वर! इस प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन मृत्युको प्राप्त हुआ। वह समरांगणमें सबसे पहले गया था और सबसे पीछे शत्रुओंद्वारा मारा गया

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา บัดนี้พระโอรสทุรโยธนะของพระองค์ถึงกาลอวสานแล้ว เป็นวีรบุรุษในสนามรบ เขาออกสู่ห้วงศึกเป็นคนแรก แต่ในที่สุดกลับเป็นผู้สุดท้ายที่ถูกศัตรูพิฆาตลง”

Verse 59

तथैव ते परिष्वक्ता: परिष्वज्य च ते नृपम्‌ । पुनः पुन: प्रेक्षमाणा: स्वकानारुरुहू रथान्‌,मरनेसे पहले दुर्योधनने तीनों वीरोंको गले लगाया और उन तीनोंने भी राजाको हृदयसे लगाकर विदा दी, फिर वे बारंबार उसकी ओर देखते हुए अपने-अपने रथोंपर सवार हो गये

สัญชัยกล่าวว่า “เช่นนั้นเอง พวกเขาก็โอบกอดเขา และเมื่อโอบกอดพระราชาแล้วก็ทูลลา ครั้นแล้วต่างหันกลับมามองเขาครั้งแล้วครั้งเล่า ก่อนขึ้นสู่รถศึกของตน”

Verse 60

इत्येवं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम्‌ । प्रत्यूषकाले शोकार्तत: प्राद्रवन्नगरं प्रति,इस प्रकार द्रोणपुत्रके मुखसे वह करुणाजनक समाचार सुनकर मैं शोकसे व्याकुल हो उठा और प्रातःकाल नगरकी ओर दौड़ा चला आया

สัญชัยกล่าวว่า “ครั้นได้ฟังถ้อยคำอันโศกสลดจากโอรสของโทรณะ ข้าพเจ้าก็ถูกความเศร้าครอบงำ และเมื่อรุ่งอรุณมาเยือน ด้วยใจระทมทุกข์ ข้าพเจ้าก็วิ่งไปยังนคร”

Verse 61

एवमेष क्षयो वृत्त: कुरुपाण्डवसेनयो: । घोरो विशसनो रीौद्रो राजन्‌ दुर्मन्त्रिते तव,राजन! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके अनुसार कौरवों तथा पाण्डवोंकी सेनाओंका यह घोर एवं भयंकर विनाशकार्य सम्पन्न हुआ है

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา ความพินาศของกองทัพกุรุและปาณฑพได้บังเกิดขึ้นดังนี้—น่าสยดสยอง อาบด้วยการสังหาร และดุเดือด—อันเป็นผลจากคำปรึกษาอันชั่วร้ายของพระองค์เอง”

Verse 62

तव पुत्रे गते स्वर्ग शोकार्तस्यथ ममानघ । ऋषिदत्तं प्रणष्टं तद्‌ दिव्यदर्शित्वमद्य वै,निष्पाप नरेश! आपके पुत्रके स्वर्गलोकमें चले जानेसे मैं शोकसे आतुर हो गया हूँ और महर्षि व्यासजीकी दी हुई मेरी वह दिव्य दृष्टि भी अब नष्ट हो गयी है

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่พระองค์ผู้ปราศจากมลทิน เมื่อพระโอรสของพระองค์เสด็จสู่สวรรค์ ข้าพเจ้าก็จมอยู่ในความโศก และวันนี้เอง นิมิตทิพย์ที่ฤๅษีประทานแก่ข้าพเจ้าได้ดับสูญไปแล้วโดยแท้”

Verse 63

वैशम्पायन उवाच इति श्रुत्वा स नृपतिः पुत्रस्य निधनं तदा । नि:श्वस्य दीर्घमुष्णं च ततश्चिन्तापरो5 भवत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार अपने पुत्रकी मृत्युका समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र ग॒रम-गरम लंबी साँस खींचकर गहरी चिन्तामें डूब गये

ไวศัมปายนะกล่าวว่า—ครั้นได้ยินดังนั้น พระราชาเมื่อทรงทราบข่าวการสิ้นชีวิตของพระโอรสในกาลนั้น ก็ทรงถอนพระสุรเสียงเป็นลมหายใจยาวร้อนผ่าว แล้วทรงจมลงสู่ความกังวลอันหนักหน่วง

Verse 66

अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वत: । दुर्योधनको इस प्रकार खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा शोकसे व्याकुल हो उसे तीन ओरसे घेरकर बैठ गये

สัญชัยกล่าวว่า—เมื่อเห็นทุรโยธนะนอนแน่นิ่งบนพื้นดิน ชุ่มโชกด้วยโลหิต วีรบุรุษผู้รอดชีวิตทั้งสาม—อัศวัตถามา กฤปาจารย์ และกฤตวรมะแห่งวงศ์สาตวตะ—ถูกความโศกเผาผลาญ จึงนั่งล้อมเขาไว้ทุกทิศ

Verse 83

अविषदह्दोन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रय: । राजाको इस प्रकार अयोग्य अवस्थामें सोया देख वे तीनों असहा दुःखसे पीड़ित हो रोने लगे

สัญชัยกล่าวว่า—ด้วยความทุกข์อันสุดจะทน ทั้งสามจึงร่ำไห้ ครั้นเห็นพระราชานอนอยู่ในสภาพอันไม่สมควรและน่าเวทนา ก็ถูกความโศกอันหนักหน่วงบดขยี้จนพรั่งพรูเป็นคร่ำครวญ

Verse 303

धर्मज्ञमानिनौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम्‌ “अब वे बेचारे शोकमग्न हो भिखारी बनकर इस भूतलपर भीख माँगते फिरेंगे। उस वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण और खोटी बुद्धिवाले अर्जुनको भी धिक्कार है, जिन्होंने अपनेको धर्मज्ञ मानते हुए भी आपके अन्यायपूर्वक वधकी उपेक्षा की

สัญชัยกล่าวว่า—“คนทั้งสองผู้โอ้อวดว่ารู้ธรรม กลับเพิกเฉยเมื่อท่านถูกสังหาร บัดนี้เขาทั้งคู่จะถูกความโศกเผาผลาญ กลายเป็นขอทานเร่ร่อนบนแผ่นดินนี้ ขอประณามกฤษณะแห่งวงศ์วฤษณิ และขอประณามอรชุนผู้มีปัญญาคลาดเคลื่อนด้วย—ผู้กล่าวอ้างความชอบธรรมแต่กลับละเลยการฆ่าท่านอย่างอยุติธรรม”

Verse 316

कथं दुर्योधनो5स्माभिहीत इत्यनपत्रपा: | “नरेश्वर! क्या वे समस्त पाण्डव भी निर्लज्ज होकर लोगोंके सामने कह सकेंगे कि “हमने दुर्योधनको किस प्रकार मारा था?”

สัญชัยกล่าวว่า—“ข้าแต่นเรศวร! พวกปาณฑพจะไร้ยางอายถึงเพียงใด จึงจะกล่าวต่อหน้าผู้คนได้ว่า ‘เราฆ่าทุรโยธนะอย่างนี้’?”

Verse 333

प्रज्ञाचक्षुश्न दुर्धर्ष: कां गतिं प्रतिपत्स्यते । जिनके सभी पुत्र, कुटुम्बी और भाई-बन्धु मारे जा चुके हैं, वे माता गान्धारी तथा प्रज्ञाचक्षु दुर्जय राजा धृतराष्ट्र अब किस दशाको प्राप्त होंगे?

สัญชัยกล่าวว่า “พระเจ้าธฤตราษฏระ ผู้มีดวงตาแห่งปัญญาแต่ไร้การเห็น ผู้ยากจะปราบปราม บัดนี้จักไปสู่คติใด? เมื่อบุตร วงศ์ญาติ พี่น้อง และมิตรสหายทั้งปวงถูกสังหารสิ้นแล้ว พระมารดาคานธารี และพระเจ้าธฤตราษฏระผู้มีปัญญาแต่ตาบอด ผู้มิอาจพิชิตได้ บัดนี้จักถึงสภาพเช่นไร?”

Verse 353

यद्‌ वयं नानुगच्छाम त्वां धिगस्मान्‌ नराधमान्‌ | आप हमें सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ देते रहे और प्रजाके हितकी रक्षा करते रहे। फिर भी हमलोग जो आपका अनुसरण नहीं कर रहे हैं, इसके लिये हम-जैसे नराधमोंको धिक्‍्कार है!

สัญชัยกล่าวว่า “เพราะพวกเราไม่ติดตามพระองค์ ขอความอัปยศจงมีแก่พวกเรา—คนชั่วช้านัก. พระองค์ทรงประทานสิ่งอันใจปรารถนาทั้งปวงแก่เรา และทรงพิทักษ์ประโยชน์สุขของไพร่ฟ้า; แต่เรากลับมิได้ดำเนินตามมรรคาของพระองค์.”

Verse 363

सभृत्यानां नरव्याप्र रत्नवन्ति गृहाणि च । “नरश्रेष्ठू आपके ही बल-पराक्रमसे सेवकोंसहित कृपाचार्यको, मुझको तथा मेरे पिताजीको रत्नोंसे भरे हुए भव्य भवन प्राप्त हुए थे

สัญชัยกล่าวว่า “โอ้ยอดแห่งบุรุษ! ด้วยกำลังและวีรปรีชาของพระองค์เอง ครูกรปาจารย์ ทั้งข้าพเจ้าและบิดาของข้าพเจ้า ได้รับคฤหาสน์อันโอ่อ่าซึ่งเต็มไปด้วยรัตนะ พร้อมด้วยบริวาร.”

Verse 373

अवाप्ता: क्रतवो मुख्या बहवो भूरिदक्षिणा: । “आपके ही प्रसादसे मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंने प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक मुख्य-मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान किया है

สัญชัยกล่าวว่า “ด้วยพระกรุณาของพระองค์เอง พวกเรา—พร้อมด้วยมิตรและญาติ—ได้ประกอบยัญพิธีสำคัญมากมาย อันอุดมด้วยทักษิณา (ของกำนัลแก่พราหมณ์) อย่างไพศาล.”

Verse 383

यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गत: सर्वपार्थिवान्‌ । “महाराज! आप जिस भावसे समस्त राजाओंको आगे करके स्वर्ग सिधार रहे हैं, हम पापी ऐसा भाव कहाँसे ला सकेंगे?

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่มหาราช! ด้วยอัธยาศัยอันสูงส่งเช่นใดที่พระองค์เสด็จสู่สวรรค์ ประหนึ่งทรงให้บรรดากษัตริย์ทั้งปวงอยู่เบื้องหน้า—พวกเราผู้มีบาปจักหาใจเช่นนั้นได้จากที่ใด?”

Verse 423

यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयेवचनान्मम । “महाराज! आपसे बिछुड़ जानेपर हमें शान्ति और सुख कैसे मिल सकते हैं? राजन! स्वर्गमें जाकर सब महारथियोंसे मिलनेपर आप मेरी ओरसे बड़े-छोटेके क्रमसे उन सबका आदर-सत्कार करें

ขอพระองค์ทรงถวายเกียรติและการต้อนรับแทนข้าพเจ้า ตามลำดับอาวุโสและความเป็นเลิศเถิด มหาราชา! ครั้นเราพลัดพรากจากพระองค์แล้ว เราจะได้พบความสงบและความสุขได้อย่างไร? และข้าแต่ราชัน เมื่อพระองค์เสด็จถึงสวรรค์และได้พบมหารถีทั้งปวง ขอทรงถ่ายทอดความเคารพของข้าพเจ้าแก่แต่ละท่านตามลำดับผู้ใหญ่ผู้น้อยโดยสมควร

Verse 3236

प्रायशो 5भिमुख: शत्रून्‌ धर्मेण पुरुषर्षभ । पुरुषप्रवर गान्धारीनन्दन! आप धन्य हैं, क्योंकि युद्धमें प्राय: धर्मपूर्वक शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये हैं

โอ้ผู้ประเสริฐดุจโคอุสุภในหมู่มนุษย์ ท่านล้มลงเพราะโดยมากได้เผชิญหน้าศัตรูตรง ๆ ตามธรรมะ โอ้ยอดบุรุษ บุตรแห่งคานธารี ท่านเป็นผู้มีบุญยิ่งนัก เพราะในสนามรบท่านถูกสังหารขณะยืนหยัดประจันหน้าศัตรูโดยชอบธรรมเป็นส่วนใหญ่

Frequently Asked Questions

The chapter stages a conflict between warrior-code ideals (fair combat and restraint) and retaliatory impulses justified by grief, humiliation, and strategic necessity, with characters disputing legitimacy through competing moral vocabularies.

Power and status are shown as contingent and reversible; appeals to fate (kāla/daiva) can console grief but also function rhetorically to manage blame, revealing how ethical narratives are constructed after catastrophe.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-layer appears as narratorial framing—Sañjaya’s report and Vaiśaṃpāyana’s closure—emphasizing witness-accountability and the listener’s reflective burden in interpreting events.