
धृतराष्ट्रस्य मूर्च्छा तथा द्रोणविषयकप्रश्नाः (Dhṛtarāṣṭra’s Fainting and Questions Concerning Droṇa)
Upa-parva: Droṇābhimukha-prayāṇa (Encirclement Queries and Approaches toward Droṇa)
Vaiśaṃpāyana narrates that Dhṛtarāṣṭra, overwhelmed by grief after questioning Sañjaya, collapses and is revived by attendants with cold water and fanning; palace women lift him and seat him. Regaining consciousness, the trembling king resumes interrogation, repeatedly asking who could restrain specific Pāṇḍava-aligned champions advancing toward Droṇa. The chapter builds a rhetorical inventory: Arjuna’s approach is described through storm-and-thunder imagery (Gāṇḍīva’s roar; arrow-rain; chariot-sound), while other figures—Bhīma, the twins, Sātyaki, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, Abhimanyu, the Draupadeyas, allied kings, and Ghaṭotkaca—are praised via epithets stressing discipline, courage, and near-invincibility. The sequence culminates in a theological reassurance: Nārāyaṇa/Kṛṣṇa as the Pāṇḍavas’ support, implying that defeat is improbable when divine guidance aligns with their cause, and foreshadowing continued narration of Kṛṣṇa’s “divine deeds” for inner steadiness.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र को रणभूमि से यह असह्य समाचार मिलता है कि आचार्य द्रोण—जिन्हें वह अजेय मानता था—मारे गए। राजा का हृदय शोक और अविश्वास से भर उठता है और वह संजय से बार-बार पूछता है: यह कैसे संभव हुआ? → धृतराष्ट्र द्रोण की अपराजेयता का स्मरण करता है—उनके दिव्यास्त्र, स्वर्ण-पंखों वाले बाणों की वर्षा, और शत्रुओं को रौंदती उनकी रथ-चाल। वह संभावनाएँ गिनता है: क्या रथ टूट गया, क्या धनुष खंडित हुआ, क्या वे प्रमत्त हुए? फिर वह युद्ध-व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है—कौन-कौन वीर उनके आगे-पीछे रक्षा में लगे थे, और वे कैसे हटे? → राजा का शोक क्रोध में बदलता है: ‘सिंह-हाथी समान पराक्रमी द्रोण का वध मैं नहीं सह सकता।’ वह द्रोण-वध को केवल पराक्रम का नहीं, व्यवस्था-भंग और भाग्य-प्रहार का परिणाम मानने लगता है—और पुरुषार्थ को भी अनर्थ का कारण कहकर दैव को श्रेष्ठ ठहराता है। → अध्याय का निष्कर्ष धृतराष्ट्र के भीतर टूटते भरोसे में है: द्रोण के गिरने से कौरव-सेना की ढाल टूट गई, और राजा का मन भविष्य के अनिष्ट की ओर झुक जाता है। संजय के उत्तर की प्रतीक्षा में धृतराष्ट्र का विलाप और प्रश्न-श्रृंखला ही इस अध्याय का स्थायी स्वर बनती है। → संजय से धृतराष्ट्र का आग्रह बना रहता है—‘विस्तार से बताओ: द्रोण के निकट कौन थे, अर्जुन ने किसे रोका, और पार्षत (धृष्टद्युम्न) कैसे द्रोण तक पहुँचा?’
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ “लोक हैं।) नवमो<्ध्याय: द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना धृतराष्ट उवाच कि कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नु: पाण्डवसूंजया: । तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभूतामपि,धृतराष्ट्र बोले--संजय! रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्य क्या कर रहे थे कि पाण्डव तथा सूंजय उनपर चोट कर सके? वे तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और अस्त्र-विद्यामें निपुण थे
ธฤตราษฏระตรัสว่า—“สัญชัย! ในสนามรบ โทรณาจารย์กำลังกระทำสิ่งใดเล่า จึงทำให้ปาณฑพและศฤญชัยสามารถประหารท่านได้? ท่านชำนาญยิ่งในอาวุธศร และเป็นยอดแห่งผู้ถือศาสตราทั้งปวงมิใช่หรือ?”
Verse 2
रथभज़ो बभूवास्य थनुर्वाशीर्यतास्यत: । प्रमत्तो वाभवद् द्रोणस्ततो मृत्युमुपेयिवान्,उनका रथ टूट गया था या बाणोंका प्रहार करते समय धनुष ही खण्डित हो गया था अथवा द्रोणाचार्य असावधान थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी?
“รถศึกของท่านแตกพังหรือ? หรือคันศรหักขณะกำลังยิงศร? หรือโทรณาจารย์เผลอไผล จึงถึงความตายด้วยเหตุนั้นหรือ?”
Verse 3
कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् किरन्तमिषुसंघातान् रुक्मपुड्खाननेकश:,तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे। वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे। उनके हाथोंमें फुर्ती थी। वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान थे। दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र-युद्धमें पारंगत थे। फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे
ธฤตราษฏระตรัสว่า—“ลูกเอ๋ย! ปารษตบุตร (ธฤษฏทฺยุมน์) ฆ่าโทรณะผู้ศัตรูยากจะต้านทานได้อย่างไร ในเมื่อท่านยังโปรยระดมลูกศรเป็นหมู่ ๆ นับไม่ถ้วน มีขนศรดุจทองคำอยู่?”
Verse 4
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठ कृतिनं चित्रयोधिनम् दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम्,तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे। वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे। उनके हाथोंमें फुर्ती थी। वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान थे। दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र-युद्धमें पारंगत थे। फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “โอ ทวิชผู้ประเสริฐ! โทฺรณาจารย์นั้นมือไว สำเร็จในศิลป์ และเป็นนักรบผู้มีอุบายการรบอันพิสดารหลากหลาย ยิงศรได้ไกล มีอินทรีย์สงบ และชำนาญในวิทยาการยุทธ์ด้วยอาวุธ แล้วธฤษฏทยุมน์ โอรสแห่งปัญจาล จักสังหารพราหมณ์ผู้เลิศนั้น—ผู้ไม่หวั่นไหวในสนามรบ มุ่งมั่นเพื่อชัยชนะ เป็นมหารถีผู้เกรียงไกร ซึ่งดูประหนึ่งไร้ผู้พิชิตสำหรับศัตรู—ได้อย่างไร?”
Verse 5
पाज्चालपुत्रो न्यवधीद् दिव्यास्त्रधरमच्युतम् । कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम्,तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे। वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे। उनके हाथोंमें फुर्ती थी। वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान थे। दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र-युद्धमें पारंगत थे। फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “โอรสแห่งปัญจาลสังหารโทฺรณะได้อย่างไร—ผู้มั่นคงในปณิธาน เป็นผู้ครองทิพยอาวุธ—ในเมื่อมหารถีนั้นกำลังเพียรพยายามในสนามรบและกระทำกิจอันดุเดือด? โทฺรณะดูประหนึ่งไร้ผู้พิชิตสำหรับศัตรู แล้วด้วยอุบายใดอาจารย์ผู้มีวินัยและน่าเกรงขามเช่นนั้นจึงถูกโค่นลง?”
Verse 6
व्यक्त हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मति: । यद् द्रोणो निहतः शूर: पार्षतेन महात्मना,निश्चय ही पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव ही प्रबल है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि द्रोणाचार्य- जैसे शूरवीर महामना धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “สำหรับเราเป็นที่ประจักษ์ว่า โชคชะตานั้นมีกำลังยิ่งกว่าความเพียรของมนุษย์ เพราะโทฺรณะ—แม้เป็นวีรบุรุษ—ก็ยังถูกมหาตมะโอรสแห่งปฤษตะ (ธฤษฏทยุมน์) สังหารเสียแล้ว”
Verse 7
अस्त्र॑ चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत् प्रतिष्तितम् तमिष्वस्त्रधराचार्य द्रोणं शंससि मे हतम्,जिन वीर सेनापतिमें चार प्रकारके अस्त्र प्रतिष्ठित थे, उन धनुर्धरोंके आचार्य द्रोणको तुम मुझे मारा गया बता रहे हो
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ในวีรบุรุษผู้นั้น วิทยาอาวุธทั้งสี่ประการตั้งมั่นอยู่แน่นแฟ้น โทฺรณะ—อาจารย์แห่งนักธนูและผู้ครองศัสตราวุธ—ท่านกลับบอกเราว่าเขาถูกสังหารแล้วหรือ?”
Verse 8
श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयातच्रपरिवारितम् । जातरूपशिरस्त्राणं नाद्य शोकमपानुदे,व्याप्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सुनहरा शिरस्त्राण (टोप या पगड़ी) धारण करनेवाले द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर आज मैं अपने शोकको किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता हूँ
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ครั้นได้ยินว่าโทฺรณาจารย์ผู้ประทับบนรถศึกทองคำ อันหุ้มด้วยหนังเสือ และสวมศิรัสตราณทองคำ ถูกสังหารแล้ว วันนี้เรามิอาจขจัดความโศกของตนให้จางคลายได้เลย”
Verse 9
न नूनं परदु:खेन प्रियते कोडपि संजय । यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधी:,संजय! निश्चय ही कोई भी दूसरेके दुःखसे नहीं मरता है, तभी तो मैं मन्दबुद्धि मनुष्य द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी जी रहा हूँ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रशोके नवमो<ध्याय: ।। ९ || इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्रका शोकविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ
ธฤตราษฏระตรัสว่า “สัญชัย แน่แท้ไม่มีผู้ใดตายเพราะความทุกข์ของผู้อื่น; เพราะฉะนั้นเราผู้ปัญญาทึบจึงยังมีชีวิตอยู่ แม้ได้ยินแล้วว่าโทรณะถูกสังหาร”
Verse 10
दैवमेव परं मन्ये नन्वनर्थ हि पौरुषम् | अश्मसारमयं नून॑ हृदयं सुदृढे मम
ธฤตราษฏระตรัสว่า “บัดนี้เราถือว่าพรหมลิขิตเท่านั้นเป็นสิ่งสูงสุด; เพราะความเพียรของมนุษย์ดูจะไร้ผลโดยแท้. หทัยของเราคงทำด้วยแก่นศิลา—แข็งกร้าวและไม่ยอมอ่อน—เพราะแม้ท่ามกลางความพินาศนี้เรายังทนอยู่ได้”
Verse 11
ब्राह्मे दैवे तथेष्वस्त्रे यमुपासन् गुणार्थिन:
ธฤตราษฏระตรัสว่า “ด้วยความใฝ่หาคุณวิเศษและความชำนาญ พวกเขาบูชาเขาด้วยพิธีพราหมณ์ ด้วยวัตรปฏิบัติอันเป็นทิพย์ และด้วยวินัยแห่งศัสตราวุธ”
Verse 12
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम्
ประหนึ่งมหาสมุทรเหือดแห้ง หรือเขาพระสุเมรุเลื่อนหลุดจากที่ตั้ง—ความอันเป็นไปไม่ได้เช่นนั้นแลกำลังบังเกิดขึ้น
Verse 13
दुष्टानां प्रतिषेद्धा5डसीद् धार्मिकाणां च रक्षिता
ธฤตราษฏระตรัสว่า “เขาเป็นผู้ยับยั้งคนชั่ว และเป็นผู้พิทักษ์ผู้ทรงธรรม”
Verse 14
यो5हासीत् कृपणस्यार्थे प्राणानपि परंतप: । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाले और धार्मिकोंके रक्षक थे। उन्होंने मुझ कृपणके लिये अपने प्राणतक दे दिये ।। १३ ई ।। मन्दानां मम पुत्राणां जयाशा यस्य विक्रमे
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “โอ้ผู้เผาผลาญศัตรู เพื่อข้าผู้ต่ำต้อย เขาถึงกับพร้อมสละชีวิต ท่านโทรณาจารย์ ผู้ทำให้ศัตรูระทม ผู้ลงทัณฑ์คนชั่ว และผู้พิทักษ์ผู้ทรงธรรม—เพราะข้านี่เองจึงยอมสละแม้ชีวิตของตน ความหวังชัยชนะของบุตรข้าผู้ปัญญาทึบก็ผูกไว้กับเดชานุภาพของเขา”
Verse 15
बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्धथया स निहतः कथम् | मेरे मूर्ख पुत्रोंकोी जिनके ही पराक्रमके भरोसे विजयकी आशा बनी हुई थी तथा जो बुद्धिमें बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान थे, वे द्रोणाचार्य कैसे मारे गये? ।। १४ इ ।। ते च शोणा बृहन्तो<श्वाश्छन्ना जालैहिरिण्मयै:,जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर- जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र-शस्त्रोंके आधघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध-स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ผู้มีปัญญาเสมอด้วยพระพฤหัสบดีและอุศนัส (ศุกราจารย์) ผู้นั้นถูกสังหารได้อย่างไร? บุตรข้าผู้เขลายังยึดความหวังชัยชนะไว้ด้วยเดชานุภาพของเขา—แล้วท่านโทรณาจารย์จะถูกฆ่าได้อย่างไร?”
Verse 16
रथे वातजवा युक्ता: सर्वशस्त्रातिगा रणे । बलिनो ह्वेषिणो दान्ता: सैन्धवा: साधुवाहिन:,जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर- जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र-शस्त्रोंके आधघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध-स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ม้าพันธุ์สินธุที่เทียมรถ ศีลว่องไวประหนึ่งลม และในสนามรบสามารถหลบพ้นคมศัสตราทุกชนิดนั้น ซึ่งแข็งแรง ฝึกดี เชื่อง และรับภาระรถได้มั่นคง—พวกมันปลอดภัยในศึกหรือไม่? ยังไม่เสียขวัญใช่หรือไม่?”
Verse 17
दृढा: संग्राममध्येषु कच्चिदासन्नविह्नला: । करिणां बूंहतां युद्धे शड्खदुन्दुभिनि:स्वनै:,जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर- जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र-शस्त्रोंके आधघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध-स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ท่ามกลางศึก พวกมันมั่นคงไม่หวั่นไหวหรือไม่? เมื่อช้างใหญ่คำราม และเสียงสังข์กับกลองศึกกึกก้อง—พวกมันยังไม่ตระหนกใช่หรือไม่?”
Verse 18
ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णव: । आशंसन्त: पराज्जेतुं जितश्वासा जितव्यथा:,जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर- जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र-शस्त्रोंके आधघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध-स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ม้าพวกนั้นทนเสียงสะบัดสายธนู ฝนลูกศร และแรงกระแทกของศัสตราได้ ยังมุ่งหวังจะปราบศัตรู ชนะลมหายใจและความเจ็บปวด—พวกมันมิได้เสียขวัญในสนามรบใช่หรือไม่?”
Verse 19
हया: पराजिता: शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहा: । ते सम रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमास्थिता:
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ม้าอันรวดเร็วที่เทียมรถศึกของภารทวาชะนั้นถูกปราบแล้ว แต่ครั้นเทียมใหม่เข้ากับรถรุกมรถะอันประดับทอง ม้าเหล่านั้นก็ยังยืนมั่นอยู่ภายใต้การบังคับของวีรชนผู้กล้า”
Verse 20
जातरूपपरिष्कारमास्थाय रथमुत्तमम्
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ครั้นขึ้นประทับบนรถศึกอันประเสริฐ ซึ่งประดับด้วยทองที่ผ่านการช่างอย่างวิจิตร,”
Verse 21
विद्यां यस्पोपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्धरा:
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “เหล่านักธนูผู้เลื่องชื่อไปทั่วโลก ยังชีพด้วยวิทยา—ดำรงตนด้วยวินัยและฝีมือแห่งความรู้ที่สั่งสมมา”
Verse 22
दिवि शक्रमिव श्रेष्ठ महामात्र धनुर्भुताम्
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ในหมู่นักธนู เขาเป็นมหามาตยะผู้เลิศ ประหนึ่งศักระ (อินทรา) ในสวรรค์”
Verse 23
ननु रुक्मरथं दृष्टवा प्राद्रवन्ति सम पाण्डवा:
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “แน่แท้ ครั้นเห็นรุกมรถะแล้ว เหล่าปาณฑพก็พุ่งเข้าหาพร้อมกัน”
Verse 24
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं रणे तस्मिन् महाबलम् | उस समरांगणमें दिव्य अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले तथा सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए महाबली द्रोणाचार्यको देखकर तो समस्त पाण्डव-योद्धा भाग खड़े होते थे ।। उताहो सर्वसैन्येन धर्मराज: सहानुज:
ในสมรภูมินั้น เมื่อท่านโทรณาจารย์ผู้มีกำลังมหาศาลสำแดงอาวุธทิพย์อย่างเกรี้ยวกราด และประทับบนรถศึกดุจทองคำ เหล่านักรบฝ่ายปาณฑพจำนวนมากก็แตกหนีไปเมื่อได้เห็นท่าน ถึงกับธรรมราชยุธิษฐิระพร้อมอนุชาทั้งหลาย และมีกองทัพทั้งมวลหนุนหลัง ยังสะท้านหวั่นไหวต่อเดชานุภาพนั้น
Verse 25
नूनमावारयत् पार्थों रथिनो<न्यानजिह्ागै:
แน่แท้แล้ว ปารถะ (อรชุน) ได้สกัดเหล่านักรบรถศึกอื่น ๆ ไว้—ประหนึ่งใช้ “อสรพิษ” ที่ว่องไวและไม่พลาดเป้าเข้ารัดรึง
Verse 26
न हाहं परिपश्यामि वधे कज्चन शुष्मिण:
อนิจจา! เรามิได้เห็นบุรุษผู้มีเดชแรงกล้าผู้ใดเลย ที่จะสามารถสังหารเขาได้
Verse 27
तैर्वतः सर्वतः शूर: पाउ्चाल्यापसदस्तत:
ครั้นแล้ว วีรบุรุษผู้นั้นก็ถูกพวกเขาล้อมไว้ทุกทิศ—โดยเหล่าคนต่ำทรามในหมู่ปาญจาละ
Verse 28
केक्यैश्रेदिकारूषैर्मस्स्यैरन्यैश्व भूमिपै: । व्याकुलीकृतमाचार्य पिपीलैरुरगं यथा
โอ้อาจารย์! ท่านถูกพวกเคกยะ เจทิ การูษะ มัตสยะ และบรรดากษัตริย์อื่น ๆ ทำให้ปั่นป่วน—ดุจอสรพิษที่ถูกฝูงมดรุมตอมจนกระสับกระส่าย
Verse 29
कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम । केकय, चेदि, कारूष, मत्स्यदेशीय सैनिकों तथा अन्य भूमिपालोंने आचार्यको उसी प्रकार व्याकुल कर दिया होगा, जैसे बहुत-सी चींटियाँ सर्पको विह्नल कर देती हैं; उसी अवस्थामें उन पाण्डव सैनिकोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए नीच धृष्टद्युम्नने दुष्कर कर्ममें लगे हुए द्रोणाचार्यको मार डाला होगा, यही बात मेरे मनमें आती है || २७-२८ $ || यो<धीत्य चतुरो वेदान् साड्ानाख्यानपञ्चमान्
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “ความคิดนี้ผุดขึ้นในใจเรา: เมื่อโทรณะกำลังหมกมุ่นอยู่กับภารกิจอันยากยิ่ง ชาวเคกยะ ชาวเจที ชาวการูษะ ทหารแห่งแคว้นมัตสยะ และบรรดากษัตริย์อื่น ๆ คงรุมเร้าท่านอาจารย์จากทุกทิศ—ดุจฝูงมดมากมายทำให้งูสับสนว้าวุ่น. ในสภาพนั้นเอง เมื่อถูกกองทัพปาณฑพโอบล้อมรอบด้าน ธฤษฏทยุมน์ผู้ต่ำช้าคงได้สังหารโทรณาจารย์ ขณะท่านกำลังประกอบหน้าที่อันยากนั้น.”
Verse 30
ब्राह्मणानां प्रतिष्ठा35सीत् स्रोतसामिव सागर: । क्षत्रं च ब्रह्म चैवेह यो5भ्यतिष्ठत् परंतप:
ท่านเป็นหลักมั่นของพราหมณ์ทั้งหลาย ดุจมหาสมุทรที่รับและทำให้กระแสน้ำแห่งสายนทีทั้งหลายมั่นคง. ณ ที่นี้ท่านทรงค้ำจุนทั้งอำนาจกษัตริย์และพรหมวิทยาไว้พร้อมกัน—ผู้เผาผลาญศัตรู.
Verse 31
स कथं ब्राह्म॒णो वृद्ध: शस्त्रेण वधमाप्तवान् । जो छहों अंगों तथा पंचम वेदस्थानीय इतिहास-पुराणोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करके ब्राह्मणोंके लिये उसी प्रकार आश्रय बने हुए थे, जैसे नदियोंके लिये समुद्र हैं। जो शत्रुओंको संताप देनेवाले तथा ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनोंके धर्मोका अनुष्ठान करनेवाले थे, वे वृद्ध ब्राह्मण द्रोणाचार्य शस्त्रद्वारा कैसे मारे गये? ।। अमर्षिणा मर्षितवान् क्लिश्यमानान् सदा मया
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “พราหมณ์ชราผู้นั้นถูกสังหารด้วยอาวุธได้อย่างไร? ผู้ซึ่งศึกษาพระเวททั้งสี่พร้อมเวทางค์ทั้งหก และ ‘เวทที่ห้า’ คืออิติหาสะกับปุราณะ; ผู้เป็นที่พึ่งของพราหมณ์ทั้งหลายดุจมหาสมุทรเป็นที่รองรับสายนที; ผู้เผาผลาญศัตรูและยังปฏิบัติธรรมทั้งของพราหมณ์และกษัตริย์—ดรโณอาจารย์ผู้ชรานั้นถูกอาวุธคร่าชีวิตได้อย่างไร? และเราผู้มิใช่คนโกรธง่าย ก็อดทนต่อความทุกข์นี้มาช้านาน.”
Verse 32
यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भुतः
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “ผู้ซึ่งด้วยกรรมของท่าน เหล่านักรบผู้ถือธนูทั้งปวงในโลกจึงดำรงชีวิตและเลี้ยงชีพได้.”
Verse 33
स सत्यसंध: सुकृती श्रीकामैर्निहत: कथम् । जगतके सम्पूर्ण धनुर्धर जिनके शिक्षणरूपी कर्मका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ पुण्यात्मा द्रोणाचार्यको राजलक्ष्मीके लोभियोंने कैसे मार डाला? ।। ३२ ई || दिवि शक्र इव श्रेष्ठोी महासत्त्वो महाबल:
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “ท่านผู้มั่นในสัตย์ ผู้มีบุญกุศลนั้น ถูกผู้โลภในศรีแห่งราชสมบัติฆ่าได้อย่างไร?”
Verse 34
क्षिप्रहस्तश्न बलवान् दृढ्धन्वारिमर्दन:,ब्राह्मश्व वेदकामानां ज्याघोषश्न धनुष्मताम् । जो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान, दृढ्धन्वा तथा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले थे, कोई भी विजयाभिलाषी वीर जिनके बाणोंका लक्ष्य बन जानेपर जीवित नहीं रह सकता था, जिन्हें जीते-जी दो शब्दोंने कभी नहीं छोड़ा था--एक तो वेदाध्ययनकी इच्छावाले लोगोंके समक्ष वेदध्वनिका शब्द और दूसरा धनुर्धारियोंके बीचमें प्रत्यंचाकी टंकारका शब्द
ธฤตราษฏรตรัสว่า “เขาเป็นผู้มือไว ทรงพลัง คันศรมั่นคง และเป็นผู้บดขยี้ศัตรู ต่อหน้าผู้ใฝ่หาความรู้ศักดิ์สิทธิ์ เขาประหนึ่งเสียงแห่งพระเวทเอง; และท่ามกลางเหล่านักธนู เขาประหนึ่งเสียงดีดกังวานของสายคันศร—เครื่องหมายแห่งความชำนาญที่หล่อหลอมด้วยวินัย เมื่อใดผู้ใดตกเป็นเป้าศรของเขา วีรบุรุษผู้ใฝ่ชัยย่อมแทบไม่เหลือความหวังรอดชีวิต”
Verse 35
न यस्य विजयाकाडूभक्षी विषयं प्राप्प जीवति । यं द्ौन जहत: शब्दौ जीवमानं कदाचन
ธฤตราษฏรตรัสว่า “ผู้ใดแม้ได้สิ่งอันปรารถนาแล้วก็มิได้ดำรงอยู่ด้วยความกระหายชัยชนะ ผู้นั้น—ตราบใดที่ยังมีลมหายใจ—โทรณะย่อมไม่ทอดทิ้ง; เขามิได้ละวางผู้นั้นในยามยังมีชีวิตเลย”
Verse 36
अदीनं पुरुषव्याघत्रं हवीमनतमपराजितम्
ธฤตราษฏรตรัสว่า “เรามองเห็นพยัคฆ์ท่ามกลางมนุษย์ผู้นั้น—ผู้ไม่ครั่นคร้าม มิยอมก้มหัวในใจ และไม่เคยพ่ายแพ้”
Verse 37
कथं संजय दुर्धर्षमनाधृष्यशोबलम्
ธฤตราษฏรตรัสว่า “โอ้ สัญชัย ผู้เกรียงไกรผู้ยากจะต้านทานนั้น—ผู้รุ่งเรืองด้วยรัศมีที่มิอาจล่วงละเมิด—เขาถูกจัดการได้อย่างไร?”
Verse 38
पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतो5वधीत् । संजय! जिनके यश और बलका तिरस्कार होना असम्भव था, उन दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यको समरभूमिमें सम्पूर्ण नरेशोंके देखते-देखते धृष्टद्युम्नने कैसे मार डाला? ।। के पुरस्तादयुध्यन्त रक्षन्तो द्रोणमन्तिकात्
ธฤตราษฏรตรัสว่า “สัญชัย ในสนามรบต่อหน้าบรรดากษัตริย์ผู้เป็นใหญ่ทั้งหลาย ปารษตะ (ธฤษฏทยุมน์) ได้สังหารโทรณาจารย์—วีรบุรุษผู้ยากจะลบหลู่ ทั้งด้วยเกียรติยศและกำลังอันมิอาจดูแคลนได้ เขาฆ่าโทรณะในท่ามกลางสายตาของเหล่าผู้ครองแผ่นดินได้อย่างไร? และผู้ใดบ้างที่รบอยู่เบื้องหน้า คุ้มกันโทรณะอย่างใกล้ชิด?”
Verse 39
केडरक्षन् दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मन:,कौन वीर उन महात्माके दाहिने पहियेकी और कौन बायें पहियेकी रक्षा करते थे? कौन उस युद्धस्थलमें युद्धपरायण वीरवर द्रोणाचार्यके आगे थे और किन लोगोंने अपने शरीरका मोह छोड़कर विपक्षियोंका सामना करते हुए उस रणक्षेत्रमें मृत्युका वरण किया था
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “โอ ท่านผู้ประเสริฐ ใครเล่าปกป้องปีกขวาแห่งกระบวนทัพนั้น และใครปกป้องปีกซ้าย? วีรชนใดบ้างยืนอยู่เบื้องหน้าท่านโทรณาจารย์ ผู้มุ่งมั่นในศึก ณ สมรภูมินั้น? และผู้ใดสละความยึดติดในกาย เผชิญหน้าศัตรู แล้วเลือกความตายในสนามรบ?”
Verse 40
पुरस्तात् के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे | के च तस्मिंस्तनूंस्त्यकत्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन्,कौन वीर उन महात्माके दाहिने पहियेकी और कौन बायें पहियेकी रक्षा करते थे? कौन उस युद्धस्थलमें युद्धपरायण वीरवर द्रोणाचार्यके आगे थे और किन लोगोंने अपने शरीरका मोह छोड़कर विपक्षियोंका सामना करते हुए उस रणक्षेत्रमें मृत्युका वरण किया था
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “เมื่อวีรบุรุษนั้นรบอยู่ท่ามกลางศึก ใครยืนอยู่เบื้องหน้าเขา? โอ ท่านผู้ประเสริฐ ใครปกป้องปีกขวา และใครปกป้องปีกซ้าย? และผู้ใดสละความยึดติดในกาย เผชิญหน้าศัตรู แล้วไปสู่ความตายในสนามรบนั้น?”
Verse 41
द्रोणस्य समरे वीरा: के5कुर्वन्त परां धृतिम् कच्चिन्नैनं भयान्मन्दा: क्षत्रिया व्यजहन् रणे
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “ในศึกของโทรณะ วีรชนใดแสดงความมั่นคงกล้าหาญสูงสุด? หรือว่ากษัตริย์นักรบผู้ใจอ่อนเพราะความกลัวได้ทอดทิ้งท่านไว้ในสนามรบแล้ว?”
Verse 42
रक्षितारस्तत: शून्ये कच्चित् तैर्न हतः परै: । किन वीरोंने युद्धमें द्रोणाचार्यको उत्तम धैर्य प्रदान किया? उनकी रक्षा करनेवाले मूर्ख क्षत्रियोंने भयभीत होकर युद्धस्थलमें उन्हें अकेला तो नहीं छोड़ दिया? और इस प्रकार शत्रुओंने सूनेमें तो उन्हें नहीं मार डाला? ।। ४१ $ ।। न स पृष्ठमरेस्त्रासाद् रणे शौर्यात् प्रदर्शयेत्
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “เมื่อผู้คุ้มกันของท่านหายไปและท่านตกอยู่ในสภาพเปิดโล่งไร้การป้องกัน ศัตรูมิได้ฟันสังหารท่านลงหรือ? เพราะนักรบไม่พึงหันหลังให้ศัตรูในสนามรบด้วยความหวาดกลัว หากต้องแสดงวีรภาพให้ปรากฏ”
Verse 43
परामप्यापदं प्राप्प स कथं निहत: परै: । जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति पड़नेपर भी रणमें अपने शौर्यके कारण शत्रुको भयवश पीठ नहीं दिखा सकते थे, वे विपक्षियोंद्वारा किस प्रकार मारे गये? || ४२ ई ।। एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छास्वापत्सु संजय
ธฤตราษฏร์ตรัสว่า “แม้ประสบมหันตภัยอันร้ายแรงยิ่ง เขาถูกศัตรูสังหารได้อย่างไร? ผู้ซึ่งด้วยพลังแห่งวีรภาพไม่อาจถูกบีบให้หันหลังในศึกเพราะความกลัว—ฝ่ายตรงข้ามฆ่าเขาได้อย่างไร? สัญชัย จงบอกเราเถิดว่า เมื่อถูกกดดันด้วยวิกฤตอันคับขันและสิ้นหวัง บุรุษผู้ประเสริฐพึงกระทำสิ่งใด”
Verse 44
पराक्रमेद् यथाशक्त्या तच्च तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । संजय! बड़े भारी संकटमें पड़नेपर श्रेष्ठ पुरुषको यही करना चाहिये कि वह यथाशक्ति पराक्रम दिखावे; यह बात द्रोणाचार्यमें पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित थी ।। ४३ $ ।। मुहाते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम् । भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि संजय,तात! इस समय मेरा मन मोहित हो रहा है; अतः तुम यह कथा बंद करो! संजय! फिर होशमें आनेपर तुमसे यह समाचार पूछूँगा
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “สัญชัย! เมื่อเผชิญวิกฤตใหญ่ บุรุษผู้ประเสริฐพึงแสดงวีรภาพตามกำลังของตน; หลักนี้ตั้งมั่นอยู่ในท่านโทรณาจารย์อย่างแน่วแน่ แต่บัดนี้ ลูกเอ๋ย จิตของเราถูกความหลงครอบงำ—จงหยุดเล่าเรื่องนี้ไว้ก่อน เมื่อเราตั้งสติได้แล้ว สัญชัย เราจะถามเจ้าถึงเหตุการณ์เหล่านี้อีกครั้ง”
Verse 103
यच्छुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते । मैं तो दैवको ही श्रेष्ठ मानता हूँ। पुरुषार्थ तो अनर्थका ही कारण है। निश्चय ही मेरा यह अत्यन्त सुदृढ़ हृदय लोहेका बना हुआ है, जिससे द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी इसके सौ टुकड़े नहीं हो जाते
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “เมื่อได้ยินว่าโทรณาจารย์ถูกสังหาร หัวใจของเราก็มิได้แตกเป็นร้อยเสี่ยง เราถือว่าพรหมลิขิตเท่านั้นเป็นใหญ่ ส่วนความเพียรของมนุษย์กลับดูประหนึ่งเป็นเหตุแห่งหายนะ แน่แท้ หัวใจของเรานี้แข็งยิ่ง—ดุจทำด้วยเหล็ก—เพราะแม้ได้ยินข่าวการสิ้นของโทรณาจารย์ ก็ยังไม่แตกสลายเป็นร้อยชิ้น”
Verse 116
ब्राह्मणा राजपुत्राश्न स कथं मृत्युना हृत: । गुणार्थी ब्राह्मण तथा राजकुमार ब्राह्म और दैव अस्त्रोंके लिये जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गयी?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ผู้ซึ่งพราหมณ์และราชกุมารต่างเสาะแสวงหา พราหมณ์ผู้ใฝ่คุณธรรมและความเป็นเลิศเช่นโทรณะนั้น ความตายจะพรากไปได้อย่างไร? ผู้ซึ่งผู้คนบำเพ็ญตบะและบูชาเพื่อหวังได้อาวุธทิพย์ เหตุไฉนมฤตยูจึงครอบงำท่านผู้น่าเคารพเช่นนั้นได้—สัญชัย จงบอกเราเถิด”
Verse 123
पतनं भास्करस्यथेव न मृष्ये द्रोणपातनम् । द्रोणका रणभूमिमें गिराया जाना समुद्रके सूखने, मेरु पर्वतके चलने-फिरने और सूर्यके आकाशसे टूटकर गिरनेके समान है। मैं इसे किसी प्रकार सहन नहीं कर पाता
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “เราทนการล้มลงของโทรณะมิได้—ประหนึ่งดวงอาทิตย์เองตกลงมา การที่โทรณะถูกโค่นในสนามรบ สำหรับเราดุจมหาสมุทรเหือดแห้ง เขาพระสุเมรุเคลื่อนจากที่ตั้ง หรือดวงอาทิตย์แตกจากฟากฟ้าแล้วร่วงกระแทกลงมา เราไม่อาจทนได้ไม่ว่าประการใด”
Verse 193
कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् । क्या द्रोणाचार्यके रथको वहन करनेवाले वे शीघ्रगामी अश्व पराजित हो गये थे? तात! द्रोणाचार्यके सुवर्णमय रथमें जुते हुए और उन्हीं नरवीर आचार्यकी सवारीमें काम आनेवाले वे घोड़े पाण्डव-सेनाको पार कैसे नहीं कर सके?
ธฤตราษฏระตรัสว่า— “ลูกเอ๋ย เหตุไฉนพวกเขาจึงไม่อาจเจาะทะลวงและข้ามแนวทัพของปาณฑพได้? ม้าฝีเท้าไวเหล่านั้น—ที่เทียมรถศึกทองคำของโทรณาจารย์และเป็นพาหนะของอาจารย์ผู้กล้า—ถูกปราบเสียแล้วหรือ จึงไม่อาจพาท่านฝ่ากองทัพปาณฑพไปได้?”
Verse 206
भारद्वाज: किमकरोद् युधि सत्यपराक्रम: । उस सुवर्णभूषित उत्तम रथपर आरूढ़ हो सत्यपराक्रमी द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें क्या किया?
ธฤตราษฏระตรัสว่า “โทรณะ บุตรแห่งภารทวาช ผู้มีวีรภาพมั่นคงไม่เสื่อมคลาย ได้กระทำสิ่งใดในสมรภูมิ? เมื่อขึ้นประทับบนรถศึกอันประเสริฐประดับทอง โทรณาจารย์ผู้ยึดมั่นสัจจะและทรงพละ ได้ประกอบการใดในทุ่งรบ?”
Verse 213
स सत्यसंधो बलवान् द्रोण: किमकरोदू युधि । समस्त जगतके धनुर्धर जिनकी विद्याका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं, उन सत्यपराक्रमी बलवान द्रोणाचार्यने युद्धमें क्या किया?
ธฤตราษฏระตรัสว่า “โทรณะ ผู้มั่นในสัจจะและทรงกำลัง ได้กระทำสิ่งใดในศึก? ด้วยอาศัยวิชาธนูของท่าน เหล่านักธนูทั่วโลกจึงดำรงชีพได้ แล้วโทรณาจารย์ผู้มีวีรภาพนั้นได้บรรลุการใดในสงคราม?”
Verse 226
के नुतं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथा: । स्वर्गमें देवराज इन्द्रके समान जो इस लोकमें श्रेष्ठ और समस्त धनुर्धरोंमें महान् थे, उन भयंकर कर्म करनेवाले द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये उस रणक्षेत्रमें कौन-कौनसे रथी गये थे?
ธฤตราษฏระทรงถามว่า “เหล่านักรบรถศึกผู้ใดบ้างที่รุกออกไปในศึกเพื่อเผชิญโทรณาจารย์—ผู้ประกอบกรรมอันดุดัน ผู้เป็นยอดแห่งนักธนูทั้งปวงในโลกนี้ และถูกเทียบได้กับพระอินทร์ ราชาแห่งเทวะในสวรรค์? ณ สมรภูมินั้น วีรชนผู้ใดบ้างออกไปประจันหน้าเขา?”
Verse 246
पाज्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारयत् । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने अपनी सारी सेनाके साथ जाकर धृष्टद्युम्नरूपी डोरीकी सहायतासे द्रोणाचार्यको घेर तो नहीं लिया था?
ธฤตราษฏระตรัสว่า “กองทัพปัญจาละมิได้ล้อมโทรณะไว้ทุกทิศดอกหรือ? เมื่อธรรมราชยุธิษฐิระพร้อมด้วยอนุชาทั้งหลายและกองทัพทั้งหมดรุกเข้าไป แล้วอาศัยธฤษฏทยุมน์ประหนึ่งเชือกผูกมัด จึงปิดล้อมโทรณาจารย์ไว้ดุจถูกพันธนาการ มิใช่หรือ?”
Verse 266
धृष्टय्युम्नादृते रौद्रात् पाल्यमानात् किरीटिना । किरीटथधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित भयंकर स्वभाववाले धृष्टद्युम्नको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त तेजस्वी द्रोणाचार्यके वधमें समर्थ हो
ธฤตราษฏระตรัสว่า “นอกจากธฤษฏทยุมน์ผู้ดุดัน—ซึ่งอรชุนผู้สวมมงกุฎคุ้มครองอยู่—เราไม่เห็นผู้ใดอื่นที่จะสามารถสังหารโทรณาจารย์ผู้รุ่งเรืองยิ่งได้ เว้นธฤษฏทยุมน์ผู้น่าเกรงขามนั้นแล้ว ไม่มีผู้ใดที่เราถือว่าเสมอด้วยภารกิจฆ่าโทรณะ”
Verse 313
अनर्हमाणान् कौन्तेयान् कर्मणस्तस्य तत् फलम् | मैंने अमर्षमें भरकर सदा कष्ट भोगनेके अयोग्य कुन्तीकुमारोंको क्लेश ही दिया है; परंतु मेरे इस बर्तावको द्रोणाचार्यने चुपचाप सह लिया था। उनके उसी कर्मका यह वधरूपी फल प्राप्त हुआ है
เรายาวนานนัก ด้วยความขุ่นเคืองที่คุกรุ่นอยู่ภายใน ได้มอบแต่ความทุกข์เข็ญแก่โอรสแห่งกุนตี—ผู้หาได้สมควรรับความลำบากนั้นไม่ ด्रोณาจารย์เคยอดกลั้นพฤติกรรมของเราด้วยความเงียบงัน; บัดนี้ท่ามกลางสงคราม ความตายของท่านปรากฏแก่เราดุจผลอันน่าสยดสยองของกรรมชั่วนั้นเอง ที่ย้อนกลับมาทวงคืนผลตอบแทน.
Verse 336
स कथं निहतः: पार्थ: क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमि: । स्वर्गलोकमें इन्द्रके समान जो इस लोकमें सबसे श्रेष्ठ थे, उन महान् सत्त्वशाली, महाबली द्रोणाचार्यको कुन्तीके पुत्रोंने उसी प्रकार मार डाला, जैसे छोटे मत्स्योंने मिलकर तिमि नामक महामत्स्यको मार डाला हो। यह कैसे सम्भव हुआ?
ธฤตราษฏรตรัสว่า—ปารถะถูกโค่นลงได้อย่างไร ราวกับฝูงปลาน้อยร่วมกันสังหาร ‘ติมิ’ มหาปลา? ด्रोณาจารย์ผู้มหาพล ผู้มีจิตวิญญาณสูงส่ง—เสมออินทราในสวรรค์ และเป็นยอดแห่งมนุษย์ในโลกนี้—โอรสแห่งกุนตีจะสังหารท่านได้เช่นนั้นอย่างไร? สิ่งนี้เป็นไปได้อย่างไร?
Verse 353
ब्राह्मश्व वेदकामानां ज्याघोषश्न धनुष्मताम् । जो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान, दृढ्धन्वा तथा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले थे, कोई भी विजयाभिलाषी वीर जिनके बाणोंका लक्ष्य बन जानेपर जीवित नहीं रह सकता था, जिन्हें जीते-जी दो शब्दोंने कभी नहीं छोड़ा था--एक तो वेदाध्ययनकी इच्छावाले लोगोंके समक्ष वेदध्वनिका शब्द और दूसरा धनुर्धारियोंके बीचमें प्रत्यंचाकी टंकारका शब्द
ธฤตราษฏรตรัสว่า—สำหรับผู้ใฝ่เวท มีเสียงพรหมสวร คือเสียงสาธยายพระเวท; สำหรับนักธนู มีเสียงชยาฆोष คือเสียงสายธนูสะท้านก้อง. เขาเป็นผู้มือไว มีกำลัง ธนูมั่นคง เป็นผู้บดขยี้ศัตรู; ผู้ใดตกเป็นเป้าลูกศรของเขา แม้เป็นวีรบุรุษผู้ใฝ่ชัย ก็ยากจะรอดชีวิต. ตราบที่เขายังมีชีวิต เสียงสองประการนี้ไม่เคยขาด: เสียงเวท และเสียงธนู.
Verse 366
नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् । सिंह और हाथीके समान पराक्रमी, उदार, लज्जाशील और किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणका वध मैं नहीं सहन कर सकता
ธฤตราษฏรตรัสว่า—เราทนไม่ได้ที่ด्रोณถูกสังหาร ด्रोณผู้มีเดชดุจสิงห์และคชสาร ผู้ใจกว้าง มีความละอาย และไม่เคยพ่ายแพ้—การล้มลงของบุรุษสิงห์ผู้นั้นเป็นสิ่งที่เรารับมิได้.
Verse 383
के नु पश्चादवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् कौन-कौनसे वीर उस समय निकटसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करते हुए उनके आगे रहकर युद्ध करते थे और कौन-कौन योद्धा दुर्गम मार्गपर पैर बढ़ाते हुए उनके पीछे रहकर रक्षा करते थे?
ธฤตราษฏรถามว่า—เมื่อพวกเขารุกคืบไปตามเส้นทางอันยากยิ่งนั้น ใครบ้างเป็นวีรชนที่ยืนอยู่เบื้องหน้า รบไปพร้อมกับคุ้มครองด्रोณาจารย์ และใครบ้างที่อยู่เบื้องหลัง คอยเป็นกองระวังหลังเพื่อพิทักษ์ท่าน?
Verse 2536
ततो द्रोणं समारोहत् पार्षत: पापकर्मकृत् । निश्चय ही अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा अन्य रथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया था। इसीलिये पापकर्मा धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर सका
ครั้งนั้น โอรสแห่งปฤษตะ คือ ทฤษฏทยุมน์—ผู้ถูกประณามว่ากระทำกรรมอันบาป—ก็รุกเข้าประจัญบานต่อท่านโทรณาจารย์ เพราะอรชุนได้ใช้ศรที่พุ่งตรงของตนสกัดเหล่านักรบรถศึกอื่น ๆ ไว้อย่างเด็ดขาด มิให้กรูก้าวหน้าได้; ด้วยช่องว่างนั้นเอง ทฤษฏทยุมน์จึงฉวยโอกาสเข้าบุกโจมตีโทรณาจารย์ได้
The dilemma is interpretive and ethical: Dhṛtarāṣṭra’s paternal attachment drives him to seek assurances of Kaurava resistance, while the narrative exposes how emotional dependence can distort a ruler’s capacity to face consequences of prior choices.
The chapter illustrates that mental steadiness (dhṛti) is tested by adverse reports; disciplined inquiry must be paired with detachment, and reliance on higher principles (dharma/refuge in Nārāyaṇa) is presented as a stabilizing orientation.
A direct phalaśruti formula is not stated; however, a meta-narrative signal appears when the speaker indicates an intent to recount Nārāyaṇa’s divine deeds “with devotion” for personal steadiness, framing remembrance as spiritually and psychologically beneficial.