Adhyaya 316
Vana ParvaAdhyaya 316136 Verses

Adhyaya 316

Chapter Arc: Yudhishthira arrives at the forest lake and beholds a dreadful sight: Arjuna’s bow and arrows scattered, and his brothers—Arjuna, Bhima, Nakula, Sahadeva—lying fallen and motionless, as if life has fled them. → Grief-stricken, he searches for signs of wounds and finds none—no weapon-strikes, no footprints—only an uncanny stillness, convincing him that some vast, unseen being has struck them down. A disembodied Yaksha voice asserts dominion over the water and demands that Yudhishthira answer questions before drinking. → The Yaksha unleashes a cascade of riddling questions—about the self, fate, friendship, livelihood, refuge, and the essence of dharma—and Yudhishthira answers with steady clarity, refusing temptation and speaking of compassion, restraint of mind, and the enduring bond of the good. → Pleased, the Yaksha reveals his identity and power, admits he has felled the brothers, and—moved by Yudhishthira’s truthfulness and dharmic insight—grants boons that lead toward the restoration of the fallen brothers and the safeguarding of the Pandavas’ forest-journey. → The Yaksha’s final condition and the precise choice Yudhishthira must make (whom to revive and why) hangs over the scene, testing dharma against affection and strategy.

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३६ “लोक हैं।) हू... “+(>9) #:६.# #25-१ त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों हल जीवित होनेका वरदान ना वैशग्पायन उवाच स ददर्श हतान्‌ भ्रातूँललोकपालानिव च्युतान्‌ | चुगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्छिरने इन्द्रके समान गौरवशाली अपने भाइयोंको सरोवरके तटपर निर्जीवकी भाँति पड़े हुए देखा; मानो प्रलय-कालमें सम्पूर्ण लोकपाल अपने लोकोससे भ्रष्ट होकर गिर गये हों

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସରୋବର ତଟରେ ନିଜ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ହତ ଅବସ୍ଥାରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖିଲେ—ଯେପରି ଯୁଗାନ୍ତେ ଲୋକପାଳମାନେ ନିଜ ନିଜ ପଦରୁ ଚ୍ୟୁତ ହୋଇ ପତିତ ହୁଅନ୍ତି। ଇନ୍ଦ୍ରସଦୃଶ ଗୌରବଶାଳୀ ସେମାନେ ଏବେ ନିଶ୍ଚେଷ୍ଟ ଥିଲେ।

Verse 2

विनिकीर्णभनुर्बाणं दृष्टवा निहतमर्जुनम्‌ । भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान्‌ गतायुष:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

ଛିଟିଯାଇଥିବା ଧନୁ-ବାଣ ମଧ୍ୟରେ ଅର୍ଜୁନକୁ ହତ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖି, ଭୀମସେନ ଓ ଯମଜ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଣହୀନ ଓ ନିଶ୍ଚେଷ୍ଟ ଦେଖି, ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘକାଳ କରୁଣ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 3

स दीर्घमुष्णं नि:श्वस्य शोकबाष्पपरिप्लुत: । तान्‌ दृष्टवा पतितान्‌ भ्रातृन्‌ सर्वाश्विन्तासमन्वितः,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

ଶୋକାଶ୍ରୁରେ ସିକ୍ତ ହୋଇ ସେ ଦୀର୍ଘ ଉଷ୍ଣ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ିଲେ; ପତିତ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ନାନା ପ୍ରକାର ଆଶଙ୍କାରେ ଆବୃତ ହୋଇ, ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘକାଳ କରୁଣ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 4

ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ମହାବାହୁ ବୃକୋଦର! ତୁମେ ସେଇ ଦୃଢ଼ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିନଥିଲ କି?” ଏହିପରି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ବିଲାପ କଲେ। ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ପତିତ ଦେଖି ଏବଂ ବୀରଙ୍କ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ନିଷ୍ଫଳ ହେଲା ବୋଲି ଭାବି ସେ ଶୋକ ଓ ଚିନ୍ତାରେ ଆବୃତ ହେଲେ; ତାଙ୍କ କଥା ଧର୍ମ, ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଓ କୁଳକୀର୍ତ୍ତିର ଭାରକୁ ସ୍ପର୍ଶ କଲା।

Verse 5

सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे | व्यर्थ तदद्य मे सर्व त्वयि वीर निपातिते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

“ରଣରେ ମୋ ଗଦାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ସୁୟୋଧନଙ୍କ ଦୁଇ ଜଂଘା ଭାଙ୍ଗିଦେବି”—ଏହା ମୋ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଥିଲା; କିନ୍ତୁ ହେ ବୀର, ଆଜି ତୁମେ ପତିତ ହେବାରୁ ସେ ସବୁ ସର୍ବଥା ବ୍ୟର୍ଥ ହେଲା। ଏହିପରି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ବିଲାପ କଲେ—ଧର୍ମର ଆଶା ଭଙ୍ଗ ହେଲା ଓ ଅଧର୍ମ ଜିତିଲା ବୋଲି ମନେ କରି।

Verse 6

मनुष्यसम्भवा वाचो विधर्मिण्य: प्रतिश्रुता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

“ମନୁଷ୍ୟ-ଦୁର୍ବଳତାରୁ ଜନ୍ମ ନେଇଥିବା କଥା—ଧର୍ମରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା—କିପରି ଫଳିବ?” ଏହି ବିପତ୍ତି ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 7

देवाश्वापि यदावोचन्‌ सूतके त्वां धनंजय,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଧନଞ୍ଜୟ! ତୁମ ଜନ୍ମସଂସ୍କାର ସମୟରେ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ବିଷୟରେ ଯାହା କହିଥିଲେ,” ସେଥିକୁ ସ୍ମରଣ କରି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ବିଲାପ କଲେ। ଜନ୍ମକାଳର ସେଇ ଦିବ୍ୟବାଣୀ ମନେ ପଡ଼ିବାରୁ ତାଙ୍କ ଶୋକ ଆହୁରି ବଢ଼ିଗଲା—ବିଧିରେ ଆସ୍ଥା ଓ ସାମ୍ନାର ହାନି ମଧ୍ୟରେ ମନ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ କଲା।

Verse 8

सहस्राक्षादनवर: कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वश:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

“କୁନ୍ତୀ! ତୁମର ଏହି ପୁତ୍ର ସହସ୍ରାକ୍ଷ ଇନ୍ଦ୍ରଠାରୁ କୌଣସି ଦିଗରେ କମ୍ ନୁହେଁ”—ଏହିପରି କୁହାଗଲା; ଏବଂ ଉତ୍ତର ପାରିୟାତ୍ର ଅଞ୍ଚଳରେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ସର୍ବତ୍ର ଏହି ଘୋଷଣା କଲେ। ସେଇ ସମସ୍ତଙ୍କ ଘୋଷକୁ ସ୍ମରଣ କରି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଶୋକଭାର ବହନ କଲେ।

Verse 9

धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିଲାପ କଲେ। ଅର୍ଜୁନକୁ ମୃତପ୍ରାୟ ଭାବେ ପଡ଼ିଥିବା, ତାଙ୍କର ଧନୁ-ବାଣ ଚାରିଦିଗେ ଛିଟିଯାଇଥିବା, ଏବଂ ଭୀମସେନ ସହ ନକୁଳ-ସହଦେବ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଣହୀନ ନିଶ୍ଚେଷ୍ଟ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାପମୟ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ିଲେ; ଶୋକାଶ୍ରୁ ଚକ୍ଷୁରୁ ଉଠି ତାଙ୍କୁ ଭିଜାଇଦେଲା। ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ଏଭଳି ଧରାଶାୟୀ ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଗଭୀର ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବି ଦୀର୍ଘକାଳ ବିଲାପ କଲେ— “ଧନଞ୍ଜୟ! ତୁମ ଜନ୍ମବେଳେ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ କହିଥିଲେ— ‘କୁନ୍ତୀ! ତୋର ଏହି ପୁତ୍ର ସହସ୍ରନେତ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରଠାରୁ କୌଣସି ଦିଗରେ କମ୍ ହେବ ନାହିଁ।’ ଏବଂ ଉତ୍ତର ପାରିୟାତ୍ର ପର୍ବତରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ତୁମ ବିଷୟରେ ଏହିପରି କହିଥିଲେ— ‘ଏହି ଅର୍ଜୁନ ଶୀଘ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହାରାଇଥିବା ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ ପୁନଃ ଫେରାଇ ଆଣିବ। ଯୁଦ୍ଧରେ କେହି ତାକୁ ଜିତିପାରିବ ନାହିଁ, ଏବଂ ସେ ମଧ୍ୟ କାହାକୁ ପରାଜିତ ନ କରି ରହିବ ନାହିଁ।’”

Verse 10

सो<यं मृत्युवशं यात: कथं जिष्णुर्महाबल: । अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजय:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏହି ମହାବଳୀ ଜିଷ୍ଣୁ (ଅର୍ଜୁନ) କିପରି ମୃତ୍ୟୁର ଅଧୀନ ହେଲା? ଏହି ଧନଞ୍ଜୟ ତ ମୋର ସମସ୍ତ ଆଶାକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଛି ଭଳି ଲାଗୁଛି।” ଏହା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକତପ୍ତ ହୃଦୟରେ ଦୀର୍ଘକାଳ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 11

रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणी,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ରଣରେ ଉନ୍ମତ୍ତ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା, ସଦା ଶତ୍ରୁନାଶକ ଥିବା ସେଇ ଦୁଇ ବୀରକୁ ଏଭଳି ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘକାଳ ବିଲାପ କଲେ— “କୁନ୍ତୀର ଏହି ଦୁଇ ମହାବଳୀ ପୁତ୍ର—ଭୀମସେନ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ—ଯେମାନେ କୌଣସି ଅସ୍ତ୍ରରେ ପ୍ରତିହତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ, ସମରରେ ଉନ୍ମତ୍ତ ହୋଇ ଲଢ଼ନ୍ତି, ଏବଂ ସଦା ଶତ୍ରୁସଂହାରକ—ସେମାନେ ଆଜି ହଠାତ୍ ଶତ୍ରୁର ଅଧୀନ କିପରି ହେଲେ?”

Verse 12

कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ । यौ सर्वास्त्राप्रतिहती भीमसेनधनंजयौ,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “କୁନ୍ତୀର ମହାବଳୀ ପୁତ୍ର—ଭୀମସେନ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ—ଯେମାନେ କୌଣସି ଅସ୍ତ୍ରରେ ପ୍ରତିହତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ, ସେମାନେ ଶତ୍ରୁର ଅଧୀନ କିପରି ହେଲେ?” ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ଦୀର୍ଘକାଳ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 13

अश्मसारमयं नून॑ हृदयं मम दुर्हदः । यमौ यदेतौ दृष्टवाद्य पतितौ नावदीर्यते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मुझ दुष्टका हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहेका बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेवको धरतीपर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ନିଶ୍ଚୟ ମୋ—ଦୁର୍ହୃଦୟର—ହୃଦୟ ପଥର ଓ ଲୋହାର; ଆଜି ଏହି ଦୁଇ ଯମଜ ଭାଇକୁ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମଧ୍ୟ ଏହା ଫାଟୁନାହିଁ!” ଏଭଳି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ, ଆତ୍ମନିନ୍ଦା କରି କରି, ଦୀର୍ଘକାଳ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 14

शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ता: क्रियान्विता: । अकृत्वा सदृशं कर्म कि शेध्वं पुरुषर्षभा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- 'पुरुषसिंह बन्धुओ! तुमलोग शास्त्रोंके विद्वान देशकालको समझनेवाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे। अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुमलोग (प्राणहीन हो) कैसे सो रहे हो?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ହେ ପୁରୁଷର୍ଷଭମାନେ! ତୁମେ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ, ଦେଶ-କାଳବିଚାରୀ, ତପସ୍ୟାୟୁକ୍ତ ଏବଂ କର୍ମରେ ଦୃଢ଼। ନିଜ ଶକ୍ତିକୁ ଯୋଗ୍ୟ କର୍ମ କରିନଥାଇ ଏଭଳି କାହିଁକି ପଡ଼ିଛ?” ଭାଇମାନଙ୍କୁ ନିର୍ଜୀବ ଓ ଧରାଶାୟୀ ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହେଲେ; ତାପ୍ତ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି, ଅଶ୍ରୁଭରା ନୟନରେ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ।

Verse 15

अविक्षतशरीराश्षाप्यप्रमृष्टशरासना: । असंज्ञा भुवि संगम्य कि शेध्वमपराजिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “तुम्हारे शरीरोंमें कोई घाव नहीं है, तुमने धनुष-बाणका स्पर्शतक नहीं किया है तथा तुम किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हो; ऐसी दशामें इस पृथ्वीपर संज्ञाशून्य होकर क्‍यों पड़े हो?”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ତୁମ ଶରୀରରେ କୌଣସି ଘାଉ ନାହିଁ; ଧନୁ-ବାଣକୁ ତୁମେ ସ୍ପର୍ଶ ମଧ୍ୟ କରିନାହ; ତୁମେ ପରାଜିତ ହେବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ନୁହଁ। ତେବେ ଏହି ପୃଥିବୀରେ ସଂଜ୍ଞାହୀନ ହୋଇ କାହିଁକି ପଡ଼ିଛ?” ଘାଉଚିହ୍ନ ବିନା ଭାଇମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି ପତିତ ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଚିନ୍ତା-ଶୋକରେ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ।

Verse 16

सानूनिवाद्रे: संसुप्तान्‌ दृष्टवा भ्रातृून्‌ महामति: । सुखं प्रसुप्तान्‌ प्रस्विन्न: खिन्न: कष्टां दशां गत:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिर धरतीपर पड़े हुए पर्वत-शिखरोंके समान अपने भाइयोंको इस प्रकार सुखकी नींद सोते देखकर बहुत दुःखी हुए। उनके सारे अंगोंमें पसीना निकल आया और वे अत्यन्त कष्टप्रद अवस्थामें पहुँच गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୃଥିବୀରେ ପର୍ବତଶିଖର ସଦୃଶ ପଡ଼ିଥିବା ଭାଇମାନଙ୍କୁ, ଯେନେ ସେମାନେ ସୁଖନିଦ୍ରାରେ ଶୁଇଛନ୍ତି, ଏଭଳି ଦେଖି ମହାମତି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭିତରେ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ିଲେ। ଭୟଙ୍କର ସତ୍ୟ ବୁଝିବା ସହିତ ସେଙ୍କର ସର୍ବାଙ୍ଗରୁ ପସିନା ଛୁଟିଲା; ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟଦାୟକ ଦଶାକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। ଶୋକ ଓ ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବିଥିବା ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ।

Verse 17

एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वर: । शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुल:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “यह ऐसी ही होनहार है”, ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागरमें मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयोंकी मृत्युके कारणपर विचार करने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ହଁ—ଏହିପରି ହେବାକୁ ଥିଲା; ଏହିପରି ହିଁ,” ଏମିତି କହି ଧର୍ମାତ୍ମା ନରେଶ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକସାଗର ମଧ୍ୟରେ ଥିବା ମଣିଷ ପରି ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇ କାରଣ ଚିନ୍ତା କଲେ। ପରେ ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ, ଯେନେ ଏହି ବିପତ୍ତିର ଗୁପ୍ତ ଧର୍ମକାରଣ ଖୋଜୁଛନ୍ତି।

Verse 18

इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित्‌ | नाभिपेदे महाबाहुश्चिन्तयानो महामति:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- वे यह भी सोचने लगे कि “अब क्या करना चाहिये?” महाबुद्धिमान्‌ महाबाहु युधिष्छिर देश और कालके तत्त्वको पृथकृ-पृथक्‌ जाननेवाले थे; तो भी बहुत सोचने-विचारनेपर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏବେ କ’ଣ କରିବା ଉଚିତ?” ଏମିତି ଭାବି, ଦେଶ-କାଳର ବିଭାଗକୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣୁଥିବା ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଚିନ୍ତା କରିଲେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ନିଷ୍କର୍ଷକୁ ପହଞ୍ଚିପାରିଲେ ନାହିଁ। ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ସେ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ।

Verse 19

विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरज्जसा । नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदा55त्मानं तपोयुतः । एवं विलप्य बहुथा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଏ ସେମାନଙ୍କର ନଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ଶ୍ରୀକୁ ଶୀଘ୍ରେ ପୁନଃ ଆଣିଦେବ। ଯୁଦ୍ଧରେ ତାକୁ କେହି ଜିତିପାରେ ନାହିଁ; ସେ ମଧ୍ୟ କାହାରୁ ଜିତାଯାଏ ନାହିଁ।” ଭାଇମାନଙ୍କୁ ପତିତ ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ବିଲାପ କଲେ। ପରେ ତପୋଯୁକ୍ତ ଧର୍ମାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବହୁପ୍ରକାରେ ବିଲାପ କରି ମନକୁ ସଂଯତ କରି ବୁଦ୍ଧିରେ ଚିନ୍ତା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 20

बुद्धया विचिन्तयामास वीरा: केन निपातिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

ତେବେ ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ଭାବେ ବିଲାପ କରି, ସ୍ଥିର ବୁଦ୍ଧିରେ ଚିନ୍ତା କଲେ—“ଏହି ବୀରମାନଙ୍କୁ କିଏ ନିପାତିତ କଲା?”

Verse 21

नैषां शस्त्रप्रहारो5स्ति पद नेहास्ति कस्यचित्‌ । भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

“ଏମାନଙ୍କ ଦେହରେ ଶସ୍ତ୍ରପ୍ରହାରର କୌଣସି ଚିହ୍ନ ନାହିଁ; ଏଠାରେ କାହାର ପଦଚିହ୍ନ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ। ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ଯେ ମାରିଛି, ସେ ନିଶ୍ଚୟ କୌଣସି ମହାଭୂତସତ୍ତା।” ଏହିପରି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ଭାବେ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 22

एकाग्रं चिन्तयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम्‌ | स्यात्‌ तु दुर्योधनेनेदमुपांशुविहितं कृतम्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “इस विषयमें मैं चित्तको एकाग्र करके फिर सोचूँगा अथवा पानी पीकर इस रहस्यको समझनेकी चेष्टा करूँगा। सम्भव है, दुर्योधनने चुपके-चुपके कोई षड्यन्त्र किया हो

“ମୁଁ ଚିତ୍ତକୁ ଏକାଗ୍ର କରି ଚିନ୍ତା କରିବି; କିମ୍ବା ଜଳ ପିଇ ଏହି ରହସ୍ୟ ବୁଝିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିବି। ସମ୍ଭବତଃ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଗୁପ୍ତଭାବେ ଏହା କରାଇଛି।” ଏହିପରି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ଭାବେ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 23

गान्धारराजरचितं सतत जिद्दाबुद्धिना । यस्य कार्यमकार्य वा सममेव भवत्युत,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”

“କିମ୍ବା ଏହା ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନିଙ୍କ ରଚନା—ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ସଦା କୁଟିଳ, ଏବଂ ଯାହା ପାଇଁ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅକାର୍ଯ୍ୟ ଦୁହେଁ ସମାନ।” ଏହିପରି କହି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀର୍ଘ ଭାବେ ବିଲାପ କଲେ।

Verse 24

कस्तस्य विश्वसेद्‌ वीरो दुष्कृतेरकृतात्मन: । अथवा पुरुषैर्गूढै: प्रयोगो5यं दुरात्मन:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଯେ ଦୁଷ୍କର୍ମରେ ଆସକ୍ତ ଓ ଆତ୍ମସଂଯମହୀନ, ତା’ପରେ କେଉଁ ବୀର ବିଶ୍ୱାସ କରିବ? କିମ୍ବା କୌଣସି ଦୁର୍ମନାର ପ୍ରେରଣାରେ ଗୁପ୍ତ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏହି ହିଂସ୍ର ଯୋଜନା କାର୍ଯ୍ୟକର ହୋଇଥାଇପାରେ।” ଭାଇମାନଙ୍କୁ ନିର୍ଜୀବ ଭାବେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକରେ ଡୁବି ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ—ଦ୍ରୋହର ସନ୍ଦେହ କରି, ଯାହାଙ୍କ ପାଇଁ ଧର୍ମ ଓ ଅଧର୍ମ ସମାନ ହୋଇଯାଇଛି ସେମାନଙ୍କ ନୈତିକ ଅବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ନିନ୍ଦା କଲେ।

Verse 25

भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा तदचिन्तयत्‌ | तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिर भाँति-भाँतिकी चिन्ता करने लगे। (परीक्षा करनेपर) उन्हें इस बातका निश्चय हो गया था कि इस सरोवरके जलमें जहर नहीं मिलाया गया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର “ଏହା କିପରି ହେଲା?” ବୋଲି ନାନା ପ୍ରକାରେ ଚିନ୍ତା କଲେ। ପରୀକ୍ଷା କରି ସେ ନିଶ୍ଚିତ ହେଲେ ଯେ ଏହି ଜଳ ବିଷରେ ଦୂଷିତ ନୁହେଁ। ତଥାପି ଭାଇମାନଙ୍କୁ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ—ବିପତ୍ତି ମଧ୍ୟରେ କାରଣ ବୁଝିବା ଓ ବିବେକ ଧରି ରଖିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରି।

Verse 26

मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते । मुखवर्णा: प्रसन्ना मे ५ 40025 %8 [,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “क्योंकि मर जानेपर भी मेरे इन भाइयोंके शरीरमें कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है। अब भी मेरे भाइयोंके मुखकी कान्ति प्रसन्न है।। इस तरह वे सोच-विचारमें ही डूबे रहे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ, “ମରିଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କ ଦେହରେ କୌଣସି ବିକୃତି ହୋଇନାହିଁ। ତାଙ୍କ ମୁହଁର ବର୍ଣ୍ଣ ମୋତେ ଏବେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ ଲାଗୁଛି।” ଏହା ଦେଖି ସେ ଅଧିକ ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବି ରହିଲେ।

Verse 27

एकैकशश्लोघबलानिमान्‌ पुरुषसत्तमान्‌ | को<न्य: प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ, “ମୋ ଏହି ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କର ବଳ ଅପାର; କାଳାନ୍ତକ ଯମଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଆଉ କିଏ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖୀନ ହୋଇପାରିଥାନ୍ତା?” ଭାଇମାନଙ୍କୁ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ।

Verse 28

एतेन व्यवसायेन तत्‌ तोयं व्यवगाढवान्‌ | गाहमानश्न तत्‌ तोयमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जलमें उतरे। पानीमें प्रवेश करते ही उनके कानोंमें आकाशवाणी सुनायी दी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏହି ନିଶ୍ଚୟ କରି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ଜଳରେ ଅବତରିଲେ। ଜଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଥିବାବେଳେ ସେ ଆକାଶରୁ ଏକ ବାଣୀ ଶୁଣିଲେ। ଭାଇମାନଙ୍କୁ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୋକାକୁଳ ହୋଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଵିଲାପ କଲେ—ତଥାପି କାରଣ ଜାଣିବାକୁ କର୍ତ୍ତବ୍ୟବୋଧରେ ଆଗେଇ ଗଲେ।

Verse 29

यक्ष उवाच अहं बक: शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजा: । त्वं पज्चमो भविता राजपुत्र नचेत्‌ प्रश्नान्‌ पछतो व्याकरोषि,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- यक्ष बोला--राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे

ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ମୁଁ ଶୈବାଳ ଓ ମାଛ ଭୋଜନ କରୁଥିବା ବକ। ତୋର ଛୋଟ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ମୃତ୍ୟୁର ଅଧୀନକୁ ପଠାଇଛି। ହେ ରାଜପୁତ୍ର! ମୋ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ନ ଦେଲେ, ତୁମେ ମଧ୍ୟ ପଞ୍ଚମ ହୋଇ ଯମଲୋକର ଅତିଥି ହେବ।” ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରାଣହୀନ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିଲେ; ତାଙ୍କର ଧନୁ-ବାଣ ଚାରିଦିଗରେ ଛିଟିଯାଇଥିଲା। ଭୀମସେନ, ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ମଧ୍ୟ ଶ୍ୱାସହୀନ, ନିଶ୍ଚେଷ୍ଟ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଥିଲେ। ଏହା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ିଲେ; ଶୋକାଶ୍ରୁ ଆଖିରୁ ଉଠି ତାଙ୍କୁ ଭିଜାଇଦେଲା। ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କୁ ଏଭଳି ପତିତ ଦେଖି ସେ ଗଭୀର ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବି ଦୀର୍ଘ ସମୟ ବିଳାପ କଲେ। ତାପରେ ଯକ୍ଷ ପୁଣି କହିଲା—“ରାଜପୁତ୍ର! ମୁଁ ଶୈବାଳ-ମାଛଭୋଜୀ ବକ; ତୋର ଅନୁଜମାନଙ୍କୁ ଯମଲୋକକୁ ପଠାଇଛି ମୁଁ ନିଜେ। ତେଣୁ ପଚାରିଲେ ଉତ୍ତର ନ ଦେଲେ, ତୁମେ ମଧ୍ୟ ମୃତ୍ୟୁଲୋକର ପଞ୍ଚମ ଅତିଥି ହେବ।”

Verse 30

मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय तत: पिब हरस्व च,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तात! जल पीनेका साहस न करना। इसपर मेरा पहलेसे ही अधिकार हो गया है। कुन्तीकुमार! मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो और तब जल पीओ और ले भी जाओ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ବତ୍ସ, ସାହସ କରିବୁ ନାହିଁ। ଏହି ଜଳ ଉପରେ ମୋର ପୂର୍ବରୁ ଅଧିକାର ଅଛି। ହେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର, ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦେ; ତା’ପରେ ଜଳ ପି—ଏବଂ ନେଇ ଯାଅ ମଧ୍ୟ।” ଅର୍ଜୁନ ମୃତ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିଲେ; ତାଙ୍କର ଧନୁ-ବାଣ ଛିଟିଯାଇଥିଲା। ଭୀମସେନ, ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଣହୀନ, ନିଶ୍ଚେଷ୍ଟ ଥିଲେ। ଏହା ଦେଖି ମହାବାହୁ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତପ୍ତ ଭାରୀ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ିଲେ; ଶୋକାଶ୍ରୁ ଆଖିରୁ ଉଠି ତାଙ୍କୁ ଭିଜାଇଦେଲା। ଭାଇମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି ପତିତ ଦେଖି ସେ ଗଭୀର ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବି ଦୀର୍ଘ ସମୟ ବିଳାପ କଲେ।

Verse 31

युधिछिर उवाच रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक्‌ । पृच्छामि को भवान्‌ देवो नैतच्छकुनिना कृतम्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- युधिष्ठिर बोले--मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रों, वसुओं अथवा मरुद्गणोंमेंसे कौन-से प्रधान देवता हो? बताओ। यह काम किसी पक्षीका किया हुआ नहीं हो सकता?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ମୁଁ ପଚାରୁଛି—ତୁମେ ରୁଦ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଧାନ କି, ବସୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, କିମ୍ବା ମରୁତ୍‌ଗଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ? କହ, ତୁମେ କେଉଁ ଦେବ? ଏହା କୌଣସି ସାଧାରଣ ପକ୍ଷୀର କାମ ନୁହେଁ।”

Verse 32

हिमवान्‌ पारियात्रश्न विन्ध्यो मलय एव च । चत्वार: पर्वता: केन पातिता भूरितेजस:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय--इन चारों पर्वतोंके समान हैं। इन्हें किसने मार गिराया है?

ହିମବାନ, ପାରିୟାତ୍ର, ବିନ୍ଧ୍ୟ ଓ ମଲୟ—ଏହି ଚାରି ମହାପର୍ବତ ସମ ମୋର ମହାତେଜସ୍ବୀ ଭାଇମାନଙ୍କୁ କିଏ ପତିତ କଲା?

Verse 33

अतीव ते महत्‌ कर्म कृतं च बलिनां वर । यान्‌ न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

ହେ ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଛ—ଯାହା ନ ଦେବମାନେ, ନ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ, ନ ଅସୁରମାନେ, ନ ରାକ୍ଷସମାନେ କରିପାରନ୍ତି।

Verse 34

विषहेरन्‌ महायुद्धे कृतं ते तन्महादभुतम्‌ । न ते जानामि यत्‌ कार्य नाभिजानामि काड्क्षितम्‌

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମେ ଯାହା ସହିଲ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମହାଅଦ୍ଭୁତ। କିନ୍ତୁ ତୁମର କାର୍ଯ୍ୟ କ’ଣ, ମୁଁ ଜାଣେ ନାହିଁ; ତୁମେ କ’ଣ ଚାହୁଁଛ, ତାହା ମଧ୍ୟ ମୁଁ ବୁଝିପାରୁନି।

Verse 35

बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुमने यह अत्यन्त महान्‌ कर्म किया है। बड़े-बड़े युद्धोंमें जिन वीरों-(के प्रभाव)-को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है। तुम्हारा कार्य क्या है? यह मैं नहीं जानता। तुम क्या चाहते हो? इसका भी मुझे पता नहीं है ।। कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम । येनास्म्युद्विग्नहरदय: समुत्पन्नशिरोज्वर:,पृच्छामि भगवंस्तस्मात्‌ को भवानिह तिष्ठति । तुम्हारे विषयमें मुझे महान्‌ कौतूहल हो गया है। तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिरमें संताप होने लगा है। अतः भगवन! मैं विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର! ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଛ। ବଡ଼ ବଡ଼ ଯୁଦ୍ଧରେ ଯେଉଁ ବୀରମାନଙ୍କ ପ୍ରଭାବକୁ ଦେବତା, ଗନ୍ଧର୍ବ, ଅସୁର ଓ ରାକ୍ଷସମାନେ ମଧ୍ୟ ସହିପାରୁନଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ପତିତ କରି ତୁମେ ପରମ ଅଦ୍ଭୁତ ପରାକ୍ରମ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛ। କିନ୍ତୁ ତୁମର କାର୍ଯ୍ୟ କ’ଣ, ମୁଁ ଜାଣେ ନାହିଁ; ତୁମେ କ’ଣ ଚାହୁଁଛ, ତାହା ମଧ୍ୟ ମୋତେ ଜଣା ନାହିଁ। ମୋ ମନରେ ମହା କୌତୁହଳ ଜାଗିଛି, ଏବଂ କିଛି ଭୟ ମଧ୍ୟ ଆସିଛି; ତାହାରେ ମୋ ହୃଦୟ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ, ମୁଣ୍ଡରେ ଜ୍ୱର ଉଠୁଥିବା ପରି ଲାଗୁଛି। ତେଣୁ, ହେ ଭଗବନ, ମୁଁ ବିନୟପୂର୍ବକ ପଚାରୁଛି—ଆପଣ ଏଠାରେ କିଏ ଦଣ୍ଡାୟମାନ?

Verse 36

यक्ष उवाच यक्षो5हमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचर:

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ମୁଁ ଯକ୍ଷ; ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ମୁଁ ନ ପକ୍ଷୀ, ନ ଜଳଚର ପ୍ରାଣୀ।

Verse 37

वैशग्पायन उवाच ततस्तामशिवां श्र॒ुत्वा वाचं स परुषाक्षराम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ସେ ଅଶିବ, କଠୋର ଅକ୍ଷରଯୁକ୍ତ ସେହି ବାଣୀ ଶୁଣି (ପ୍ରତିକ୍ରିୟା କଲା)।

Verse 38

यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नुपक्रम्प तदा स्थित: । विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छुयम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ! ଯକ୍ଷ କଥା କହୁଥିବାବେଳେ ସେ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ତାହାର ନିକଟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲା। ସେ ଦେଖିଲା—ବିଚିତ୍ର ଓ ଭୟଙ୍କର ଚକ୍ଷୁଯୁକ୍ତ, ମହାକାୟ, ତାଳବୃକ୍ଷ ପରି ଉଚ୍ଚ ସେହି ଯକ୍ଷକୁ।

Verse 39

ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम्‌ । वृक्षमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभ:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ତାଙ୍କୁ ଗଛର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଦେଖିଲେ—ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତ, ଅଦମ୍ୟ, ଏବଂ ପର୍ବତ ସମ ଉଚ୍ଚ।

Verse 40

मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम्‌ | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तत्पश्चात्‌ उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके समान ऊँचा है। वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है ।। यक्ष उवाच इमे ते भ्रातरो राजन्‌ वार्यमाणा मयासकृत्‌,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

ମେଘଗମ୍ଭୀର ନାଦରେ ଗର୍ଜି ଧମକାଉଥିବା ସେ ଯକ୍ଷ ମହାସ୍ୱରେ କହିଲା। ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାହାର ନିକଟକୁ ଯାଇ ଦେଖିଲେ—ବିକଟ ନେତ୍ରବିଶିଷ୍ଟ ଏକ ବିଶାଳକାୟ ଯକ୍ଷ ଗଛର ଶିଖରେ ବସିଛି; ତାଳବୃକ୍ଷ ସମ ଉଚ୍ଚ, ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତ, ପର୍ବତ ସମ ଉନ୍ନତ। ସେ ମେଘଗମ୍ଭୀର ବାଣୀରେ ସେମାନଙ୍କୁ ତିରସ୍କାର କରୁଥିଲା। ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ରାଜନ! ତୁମ ଏହି ଭାଇମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ପୁନଃପୁନଃ ରୋକିଥିଲି; ତଥାପି ସେମାନେ ବଳପୂର୍ବକ ଜଳ ନେବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ; ତେଣୁ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ନିହତ କଲି। ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ପ୍ରାଣ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ ଏହି ଜଳ ପିଅନି। ପାର୍ଥ! ସାହସ କରନି—ଏହି ଜଳ ପୂର୍ବରୁ ମୋର ଅଧିକାର। କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର! ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତାପରେ ଜଳ ପିଅ ଓ ନେଇଯାଅ।”

Verse 41

बलात्‌ तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया | न पेयमुदकं राजन्‌ प्राणानिह परीप्सता,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ସେମାନେ ବଳପୂର୍ବକ ଜଳ ନେବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ; ତେଣୁ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ନିହତ କଲି। ରାଜନ! ଏଠାରେ ପ୍ରାଣ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ ଏହି ଜଳ ପିଅନି। କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର! ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତାପରେ ଜଳ ପିଅ ଓ ନେଇଯାଅ।”

Verse 42

पार्थ मा साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ପାର୍ଥ! ସାହସ କରନି; ଏହି ଜଳ ପୂର୍ବରୁ ମୋର ଅଧିକାର। କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର! ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତାପରେ ଜଳ ପିଅ ଓ ନେଇଯାଅ।”

Verse 43

युधिछिर उवाच न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम्‌ । काम॑ नैतत्‌ प्रशंसन्ति सन्‍्तो हि पुरुषा: सदा,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ହେ ଯକ୍ଷ! ଯାହା ତୁମ ପୂର୍ବ ଅଧିକାରରେ ଅଛି, ତାହା ମୁଁ ନେବାକୁ ଚାହୁଁନି। ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ସଦା ଆତ୍ମପ୍ରଶଂସାକୁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି ନାହିଁ। ମୋ ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ତୁମ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦେବି—ଯାହା ପଚାରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ପଚାର।”

Verse 44

यदात्मना स्वमात्मान प्रशंसे पुरुषर्षभ । यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान्‌ प्रतिवक्ष्यामि पूच्छ माम्‌,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ ନିଜେ ନିଜକୁ ପ୍ରଶଂସା କରେ, ସେହି ପ୍ରଶଂସା ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ମନୋନୀତ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ତଥାପି ମୋ ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ତୁମ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କୁ ଉତ୍ତର ଦେବି; ମୋତେ ପଚାର।

Verse 45

यक्ष उवाच कि स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितकश्नचरा: । कश्नैनमस्तं नयति कम्मेंश्ष प्रतेतिष्ठति,यक्षने पूछा--सूर्यको कौन ऊपर उठाता (उदित करता) है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ସୂର୍ଯ୍ୟକୁ କିଏ ଉଦୟ କରାଇ ଉପରକୁ ଉଠାଏ? ତାଙ୍କ ଚାରିପାଖେ କେଉଁମାନେ ଚଳନ କରନ୍ତି? କିଏ ତାଙ୍କୁ ଅସ୍ତ କରାଏ? ଏବଂ ସେ କେଉଁଠି ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ?

Verse 46

युधिछिर उवाच ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितकश्चरा: । धर्मश्षास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति,युधिष्ठिर बोले--ब्रह्म सूर्यको ऊपर उठाता (उदित करता) है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्यमें प्रतिष्ठित है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବ୍ରହ୍ମା ସୂର୍ଯ୍ୟକୁ ଉଦୟ କରାଇ ଉପରକୁ ଉଠାନ୍ତି; ଦେବମାନେ ତାଙ୍କ ଚାରିପାଖେ ଚଳନ କରନ୍ତି। ଧର୍ମ ତାଙ୍କୁ ଅସ୍ତ କରାଏ; ଏବଂ ସେ ସତ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ।

Verse 47

यक्ष उवाच केनस्विच्छोत्रियो भवति केनस्विद्‌ विन्दते महत्‌ । केनस्विद्‌ द्वितीयवान्‌ भवति राजन्‌ केन च बुद्धिमान्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है? महत्पदको किसके द्वारा प्राप्त करता है? वह किसके द्वारा द्वितीयवान्‌ होता है? और किससे बुद्धिमान होता है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ହେ ରାଜନ୍! ମଣିଷ କେଉଁଥିରୁ ଶ୍ରୋତ୍ରିୟ ହୁଏ? କେଉଁଥିରୁ ମହତ୍ତ୍ୱ ପାଏ? କେଉଁଥିରୁ ସେ ‘ଦ୍ୱିତୀୟବାନ୍’—ଭରସାଯୋଗ୍ୟ ସହାୟ/ସହଚର—ହୁଏ? ଏବଂ କେଉଁଥିରୁ ବୁଦ୍ଧିମାନ ହୁଏ?

Verse 48

युधिछिर उवाच श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत्‌ | धृत्या द्वितीयवान्‌ भवति बुद्धिमान्‌ वृद्धसेवया,युधिष्ठिर बोले--वेदाध्ययनके द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है, तपसे महत्पद प्राप्त करता है, धर्यसे द्वितीयवान्‌ (दूसरे साथीसे युक्त) होता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे बुद्धिमान्‌ होता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶ୍ରୁତି (ବେଦାଧ୍ୟୟନ) ଦ୍ୱାରା ମଣିଷ ଶ୍ରୋତ୍ରିୟ ହୁଏ; ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ମହତ୍ତ୍ୱ ପାଏ। ଧୃତି ଦ୍ୱାରା ସେ ‘ଦ୍ୱିତୀୟବାନ୍’—ସହାୟ/ସହଚର—ହୁଏ; ଏବଂ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସେବା ଦ୍ୱାରା ବୁଦ୍ଧିମାନ ହୁଏ।

Verse 49

यक्ष उवाच कि ब्राह्मणानां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्चैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा--्राह्मणोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्‍या है?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ଦେବତ୍ୱ କ’ଣ? ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ତାଙ୍କର ଧର୍ମ କ’ଣ? ତାଙ୍କର ମାନବ-ଭାବ କ’ଣ? ଏବଂ ଅସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କ’ଣ?

Verse 50

युधिछिर उवाच स्वाध्याय एपषां देवत्वं तप एषां सतामिव । मरणं मानुषो भाव: परिवादोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--वेदोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंमें देवत्व है, तप सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, मरना मनुष्य-भाव है और निन्दा करना असत्पुरुषोंका-सा आचरण है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବେଦର ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ହିଁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ଦେବତ୍ୱ; ତପ ହେଉଛି ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ତାଙ୍କର ଧର୍ମ; ମରଣ ମାନବ-ଭାବ; ଏବଂ ପରନିନ୍ଦା ଅସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଆଚରଣ।

Verse 51

यक्ष उवाच कि क्षत्रियाणां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्नैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा-.क्षत्रियोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्या है?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କର ଦେବତ୍ୱ କ’ଣ? ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ତାଙ୍କର ଧର୍ମ କ’ଣ? ତାଙ୍କର ମାନବ-ଭାବ କ’ଣ? ଏବଂ ଅସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କ’ଣ?

Verse 52

युधिछिर उवाच इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव । भयं वै मानुषो भाव: परित्यागोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--बाण विद्या क्षत्रियोंका देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरणमें आये हुए दु:खियोंका परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧନୁର୍ବିଦ୍ୟା ଓ ଅସ୍ତ୍ରପ୍ରାବୀଣ୍ୟ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କର ଦେବତ୍ୱ; ଯଜ୍ଞ ହେଉଛି ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରି ତାଙ୍କର ଧର୍ମ; ଭୟ ମାନବ-ଭାବ; କିନ୍ତୁ ଶରଣ ନେଇ ଆସିଥିବା ଦୁଃଖୀକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିଦେବା ଅସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଆଚରଣ।

Verse 53

यक्ष उवाच किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजु: । का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते,यक्षने पूछा--कौन एक वस्तु यज्ञिय साम है? कौन एक (यज्ञसम्बन्धी) यज्ञिय यजु है? कौन एक वस्तु यज्ञका वरण करती है? और किस एकका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ଏକମାତ୍ର ଯଜ୍ଞିୟ ସାମ କ’ଣ? ଏକମାତ୍ର ଯଜ୍ଞିୟ ଯଜୁଃ କ’ଣ? ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେଉଁ ଏକ ଯଜ୍ଞକୁ ବରଣ କରେ (ଗ୍ରହଣ କରେ)? ଏବଂ କେଉଁ ଏକକୁ ଯଜ୍ଞ କେବେ ଅତିକ୍ରମ କରେନାହିଁ?

Verse 54

युधिछिर उवाच प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजु: । ऋगेका वृणुते यज्ञ तां यज्ञो नातिवर्तते,युधिष्ठिर बोले--प्राण ही यज्ञिय साम है, मन ही यज्ञसम्बन्धी यजु है, एकमात्र ऋचा ही यज्ञका वरण करती है और उसीका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ପ୍ରାଣ ହିଁ ଯଜ୍ଞଯୋଗ୍ୟ ସାମ, ମନ ହିଁ ଯଜ୍ଞଯୋଗ୍ୟ ଯଜୁଃ। ଏକମାତ୍ର ଋକ୍‌ ମନ୍ତ୍ର ଯଜ୍ଞକୁ ବରଣ କରେ, ଏବଂ ଯଜ୍ଞ ସେହି ଋକ୍‌ର ସୀମା ଅତିକ୍ରମ କରେନାହିଁ।

Verse 55

यक्ष उवाच किंस्विदावपतां श्रेष्ठ किंस्विन्निवपतां वरम्‌ | किंस्वित्‌ प्रतिष्ठमानानां किंस्वित्‌ प्रसवतां वरम्‌

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ଚାଷ କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ କ’ଣ ଶ୍ରେଷ୍ଠ? ବୀଜ ବୁଣୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ କ’ଣ ଉତ୍ତମ? ଯେମାନେ ପ୍ରତିଷ୍ଠାରେ ଦୃଢ଼ ହେବାକୁ ଚାହାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଧାର କ’ଣ? ଏବଂ ସନ୍ତାନ ଉତ୍ପାଦନ କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ କ’ଣ ଶ୍ରେଷ୍ଠ?

Verse 56

यक्षने पूछा--खेती करनेवालोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? बिखेरने (बोने) वालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? तथा संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? ।। युधिछिर उवाच वर्षमावपतां श्रेष्ठ बीज॑ निवपतां वरम्‌ | गाव: प्रतिष्ठमानानां पुत्र: प्रसवतां वर:,महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया युधिष्ठिर बोले--खेती करनेवालोंके लिये वर्षा श्रेष्ठ है। बिखेरने (बोने) वालोंके लिये बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये गौ (का पालन-पोषण और संग्रह) श्रेष्ठ है और संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये पुत्र श्रेष्ठ है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଚାଷୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବର୍ଷା ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ବୀଜ ବୁଣୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବୀଜ ଉତ୍ତମ। ପ୍ରତିଷ୍ଠାରେ ସ୍ଥିର ଧନୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଗୋଧନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଧାର; ଏବଂ ସନ୍ତାନ ଆକାଂକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପୁତ୍ର ଶ୍ରେଷ୍ଠ।

Verse 57

यक्ष उवाच इन्द्रियार्थाननु भवन्‌ बुद्धिमाँलल्‍लोकपूजित: । सम्मत: सर्वभूतानामुच्छवसन्‌ को न जीवति,यक्षने पूछा--ऐसा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान, लोकमें सम्मानित और सब प्राणियोंका माननीय होकर एवं इन्द्रियोंक विषयोंको अनुभव करते तथा श्वास लेते हुए भी वास्तवमें जीवित नहीं है?

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ଇନ୍ଦ୍ରିୟବିଷୟ ଉପଭୋଗ କରୁଥିବା, ବୁଦ୍ଧିମାନ, ଲୋକପୂଜିତ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମତ, ଏବଂ ଶ୍ୱାସ ନେଉଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଯେ ପ୍ରକୃତରେ ଜୀବିତ ନୁହେଁ— ସେ କିଏ?

Verse 58

युधिछिर उवाच देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्न यः । न निर्वपति पज्चानामुच्छवसन्‌ न स जीवति

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଦେବତା, ଅତିଥି, ଭୃତ୍ୟ/ଆଶ୍ରିତ, ପିତୃଗଣ ଏବଂ ନିଜ ପ୍ରତି— ଏହି ପାଞ୍ଚଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭାଗ ଅର୍ପଣ ନ କରୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି, ଶ୍ୱାସ ନେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକୃତରେ ଜୀବିତ ନୁହେଁ।

Verse 59

युधिष्ठिरने कहा--जो देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन, पितर और आत्मा--इन पाँचोंका पोषण नहीं करता, वह श्वास लेनेपर भी जीवित नहीं है ।। यक्ष उवाच किंस्विद्‌ गुरुतरं भूमे: किंस्विदुच्चतरं च खात्‌ । किंस्विच्छीघ्रतरं वायो: किंस्विद्‌ बहुतरं तृणात्‌,यक्षने पूछा--पृथ्वीसे भी भारी क्या है? आकाशसे भी ऊँचा क्या है? वायुसे भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकोंसे भी अधिक (असंख्य) क्या है?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେ ଲୋକ ଦେବତା, ଅତିଥି, ପୋଷଣୀୟ କୁଟୁମ୍ବଜନ, ପିତୃଗଣ ଓ ନିଜ ଆତ୍ମା—ଏହି ପାଞ୍ଚଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରେନାହିଁ, ସେ ଶ୍ୱାସ ନେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଜୀବିତ ନୁହେଁ। ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ପୃଥିବୀଠାରୁ ଭାରୀ କ’ଣ? ଆକାଶଠାରୁ ଉଚ୍ଚ କ’ଣ? ପବନଠାରୁ ଶୀଘ୍ର କ’ଣ? ଏବଂ ତୃଣଠାରୁ ଅଧିକ ଅସଂଖ୍ୟ କ’ଣ?

Verse 60

युधिछ्िर उवाच माता गुरुतरा भूमे: खातू्‌ पितोच्चतरस्तथा । मन: शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्‌,युधिष्ठिर बोले--माताका गौरव पृथ्वीसे भी अधिक है। पिता आकाशसे भी ऊँचा है। मन वायुसे भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकोंसे भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମାତା ପୃଥିବୀଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଗୁରୁତର; ପିତା ଆକାଶଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଉଚ୍ଚତର। ମନ ପବନଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ; ଚିନ୍ତା ତୃଣଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଅସଂଖ୍ୟ।

Verse 61

यक्ष उवाच किंस्वित्‌ सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति | कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद्‌ वेगेन वर्धते,यक्षने पूछा--कौन सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदता? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता? किसमें हृदय नहीं है? और कौन वेगसे बढ़ता है

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ଶୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଯାହା ପଲକ ନମାଏନାହିଁ, ସେ କ’ଣ? ଜନ୍ମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଯାହା ଚେଷ୍ଟା କରେନାହିଁ, ସେ କ’ଣ? କାହାର ହୃଦୟ ନାହିଁ? ଏବଂ କ’ଣ ବେଗରେ ବଢ଼େ?

Verse 62

युधिछिर उवाच मत्स्य: सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति । अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते,युधिष्ठिर बोले--मछली सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरमें हृदय नहीं है और नदी वेगसे बढ़ती है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମାଛ ଶୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପଲକ ନମାଏନାହିଁ; ଅଣ୍ଡା ଜନ୍ମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଚେଷ୍ଟା କରେନାହିଁ। ପଥରର ହୃଦୟ ନାହିଁ; ନଦୀ ନିଜ ବେଗରେ ବଢ଼େ।

Verse 63

यक्ष उवाच किंस्वित्‌ प्रवसतो मित्र किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्र किंस्विन्मित्रं मरिष्यत:,यक्षने पूछा--प्रवासी (परदेशके यात्री)-का मित्र कौन है? गृहवासी (गृहस्थ)-का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ପ୍ରବାସୀର ମିତ୍ର କିଏ? ଘରେ ଥିବା ଗୃହସ୍ଥର ମିତ୍ର କିଏ? ରୋଗୀର ମିତ୍ର କିଏ? ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ସମୀପକୁ ପହଞ୍ଚିଥିବା ପୁରୁଷର ମିତ୍ର କିଏ?

Verse 64

युधिछिर उवाच सार्थ: प्रवसतो मित्र भार्या मित्र गृहे सतः । आतुरस्य भिषड्मित्र दानं मित्र मरिष्यत:,युधिष्ठिर बोले--सहयात्रियोंका समुदाय अथवा साथमें यात्रा करनेवाला साथी ही प्रवासीका मित्र है, पत्नी गृहवासीका मित्र है, वैद्य रोगीका मित्र है और दान मुमूर्षु (अर्थात्‌ मरनेवाले) मनुष्यका मित्र है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପ୍ରବାସୀଙ୍କ ପାଇଁ ସାର୍ଥ ଓ ସହଯାତ୍ରୀମାନେ ମିତ୍ର; ଘରେ ଥିବାଙ୍କ ପାଇଁ ପତ୍ନୀ ମିତ୍ର; ରୋଗୀଙ୍କ ପାଇଁ ବୈଦ୍ୟ ମିତ୍ର; ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁସନ୍ନ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ପାଇଁ ଦାନ ହିଁ ସତ୍ୟ ମିତ୍ର।

Verse 65

यक्ष उवाच को35तिथि: सर्वभूतानां किंस्विद्‌ धर्म सनातनम्‌ | अमृतं किंस्विद्‌ राजेन्द्र किंस्वित्‌ सर्वमिदं जगत्‌,यक्षने पूछा--राजेन्द्र! समस्त प्राणियोंका अतिथि कौन है? सनातन धर्म कया है? अमृत क्या है? और यह सारा जगत्‌ क्या है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଅତିଥି କିଏ? ସନାତନ ଧର୍ମ କ’ଣ? ଅମୃତ କ’ଣ? ଏବଂ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ୍ ସତ୍ୟରେ କ’ଣ?

Verse 66

भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवन्तु कथं मृषा । “साधारण मनुष्योंकी बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुमलोगोंके सम्बन्धमें जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं?,युधिछिर उवाच अतिथि: सर्वभूतानामग्नि: सोमो गवामृतम्‌ | सनातनोअमृतो धर्मो वायु: सर्वमिदं जगत्‌ युधिष्ठिर बोले--अग्नि समस्त प्राणियोंका अतिथि है, गौका दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत्‌ है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଅଗ୍ନି ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଅତିଥି; ଗାଈର ଦୁଧ ଅମୃତ; ଅବିନାଶୀ ନିତ୍ୟ ଧର୍ମ ହିଁ ସନାତନ ଧର୍ମ; ଏବଂ ବାୟୁ ହିଁ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ୍—ସର୍ବତ୍ର ବ୍ୟାପ୍ତ।

Verse 67

यक्ष उवाच किंस्विदेको विचरते जात: को जायते पुन: । किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत्‌

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—କ’ଣ ଏକା ଏକା ବିଚରେ? କିଏ ଜନ୍ମ ନେଇ ପୁଣି ପୁଣି ଜନ୍ମ ନେଉଛି? ଏହାର ଔଷଧ କ’ଣ? ଏବଂ ମହାନ ‘ଆବପନ’ (ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବିଜବପନ/କ୍ଷେତ୍ର) କ’ଣ?

Verse 68

यक्षने पूछा--अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुन: कौन उत्पन्न होता है? शीतकी ओषधि क्या है? और महान्‌ आवपन (क्षेत्र) क्या है? ।। युधिछिर उवाच सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत्‌,युधिष्ठिर बोले--सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीतकी ओषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସୂର୍ଯ୍ୟ ଏକା ଏକା ବିଚରେ; ଚନ୍ଦ୍ର ଜନ୍ମ ନେଇ ପୁଣି ପୁଣି ଜନ୍ମ ନେଉଛି; ଅଗ୍ନି ଶୀତର ଔଷଧ; ଏବଂ ପୃଥିବୀ ହିଁ ମହାନ ଆବପନ—ଅର୍ଥାତ୍ ବିଶାଳ କର୍ମକ୍ଷେତ୍ର।

Verse 69

यक्ष उवाच किंस्विदेकपदं धर्म्य किंस्विदेकपर्द यश: । किंस्विदेकपदं स्वर्ग्य किंस्विदेकप्दं सुखम्‌,यक्षने पूछा--धर्मका मुख्य स्थान क्‍या है? यशका मुख्य स्थान क्या है? स्वर्गका मुख्य स्थान क्‍या है? और सुखका मुख्य स्थान क्‍या है?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ଧର୍ମର ଏକମାତ୍ର ମୁଖ୍ୟ ଆଧାର କ’ଣ? ଯଶର ଏକମାତ୍ର ଆଧାର କ’ଣ? ସ୍ୱର୍ଗପ୍ରାପ୍ତିର ଏକମାତ୍ର ଆଧାର କ’ଣ? ଏବଂ ସୁଖର ଏକମାତ୍ର ଆଧାର କ’ଣ?

Verse 70

युधिछिर उवाच दाक्ष्यमेकपद धर्म्य दानमेकपर्द यश: । सत्यमेकपदं स्वर्ग्य शीलमेकपदं सुखम्‌,युधिछिर बोले--धर्मका मुख्य स्थान दक्षता है, यशका मुख्य स्थान दान है, स्वर्गका मुख्य स्थान सत्य है और सुखका मुख्य स्थान शील है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧର୍ମର ମୁଖ୍ୟ ଆଧାର ଦକ୍ଷତା; ଯଶର ମୁଖ୍ୟ ଆଧାର ଦାନ। ସ୍ୱର୍ଗର ମୁଖ୍ୟ ଆଧାର ସତ୍ୟ, ଏବଂ ସୁଖର ମୁଖ୍ୟ ଆଧାର ଶୀଳ (ସଦାଚାର)।

Verse 71

यक्ष उवाच किंस्विदात्मा मनुष्यस्य किंस्विद्‌ दैवकृत: सखा । उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम्‌

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟର ସତ୍ୟ ଆତ୍ମା କ’ଣ? ଦୈବକୃତ (ଭାଗ୍ୟଦତ୍ତ) ସଖା କିଏ? ତାହାର ଉପଜୀବନ (ଜୀବିକାର ସାଧନ) କ’ଣ? ଏବଂ ତାହାର ପରମ ଆଶ୍ରୟ, ଶେଷ ଶରଣ କ’ଣ?

Verse 72

यक्षने पूछा--मनुष्यकी आत्मा क्‍या है? इसका दैवकृत सखा कौन है? इसका उपजीवन (जीवनका सहारा) क्या है? और इसका परम आश्रय क्या है? ।। युधिछिर उवाच पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा | उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम्‌,युधिष्ठिर बोले--पुत्र मनुष्यकी आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପୁତ୍ର ମନୁଷ୍ୟର ଆତ୍ମା; ଭାର୍ଯ୍ୟା ତାହାର ଦୈବକୃତ ସଖୀ। ପର୍ଜନ୍ୟ (ବର୍ଷାଦାତା ମେଘ) ତାହାର ଉପଜୀବନ; ଦାନ ତାହାର ପରମ ଆଶ୍ରୟ।

Verse 73

यक्ष उवाच धन्यानामुत्तमं किंस्विद्‌ धनानां स्यात्‌ किमुत्तमम्‌ | लाभानामुत्तमं कि स्यात्‌ सुखानां स्यात्‌ किमुत्तमम्‌,यक्षने पूछा--धन्यवादके योग्य पुरुषोंमें उत्तम गुण क्या है? धनोंमें उत्तम धन क्या है? लाभोंमें प्रधान लाभ क्‍या है? और सुखोंमें उत्तम सुख क्या है?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ଧନ୍ୟ (ପ୍ରଶଂସନୀୟ) ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ କ’ଣ? ଧନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ ଧନ କ’ଣ? ଲାଭମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଧାନ ଲାଭ କ’ଣ? ଏବଂ ସୁଖମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ ସୁଖ କ’ଣ?

Verse 74

युधिछिर उवाच धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्‌ । लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा,युधिष्ठिर बोले--धन्य पुरुषोंमें दक्षता ही उत्तम गुण है, धनोंमें शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभोंमें आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखोंमें संतोष ही उत्तम सुख है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧନ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦକ୍ଷତା ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ଧନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ (ଶ୍ରୁତ) ପ୍ରଧାନ; ଲାଭମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆରୋଗ୍ୟ ଶ୍ରେୟ; ଏବଂ ସୁଖମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସନ୍ତୋଷ ହିଁ ଉତ୍ତମ।

Verse 75

यक्ष उवाच कश्च धर्म: परो लोके कश्न धर्म: सदाफल: । कि नयम्य न शोचन्ति कैश्नल संधिर्न जीर्यते,यक्षने पूछा--लोकमें श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्‍या है? किसको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ଏହି ଲୋକରେ ସର୍ବୋତ୍ତମ ଧର୍ମ କ’ଣ? କେଉଁ ଧର୍ମ ସଦା ଫଳଦାୟକ? କାହାକୁ ନିୟମରେ ରଖିଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଶୋକ କରନ୍ତି ନାହିଁ? ଏବଂ କାହା ସହ କରା ସନ୍ଧି/ମିତ୍ରତା କେବେ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ହୁଏ ନାହିଁ?

Verse 76

युधिछिर उवाच आनुशंस्यं परो धर्मस्त्रयी धर्म: सदाफल: । मनो यम्य न शोचन्ति संधि: सदभिर्न जीर्यते,युधिष्ठिर बोले--लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशभमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଦୟା ହିଁ ପରମ ଧର୍ମ; ବେଦୋକ୍ତ (ତ୍ରୟୀ) ଧର୍ମ ସଦା ଫଳଦାୟକ; ମନକୁ ନିୟମରେ ରଖିଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଶୋକ କରନ୍ତି ନାହିଁ; ଏବଂ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ସହ କରା ମିତ୍ରତା କେବେ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 77

यक्ष उवाच कि नु हित्वा प्रियो भवति कि नु हित्वा न शोचति । कि नु हित्वार्थवान्‌ भवति कि नु हित्वा सुखी भवेत्‌,यक्षने पूछा--किस वस्तुको त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है? किसको त्यागकर शोक नहीं करता? किसको त्यागकर वह अर्थवान्‌ होता है? और किसको त्यागकर सुखी होता है?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—କ’ଣ ତ୍ୟାଗ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରିୟ ହୁଏ? କ’ଣ ତ୍ୟାଗ କଲେ ଶୋକ କରେ ନାହିଁ? କ’ଣ ତ୍ୟାଗ କଲେ ସେ ଅର୍ଥବାନ୍ (ସମୃଦ୍ଧ) ହୁଏ? ଏବଂ କ’ଣ ତ୍ୟାଗ କଲେ ସୁଖୀ ହୁଏ?

Verse 78

युधिछिर उवाच मान हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । काम हित्वार्थवान्‌ भवति लोभ हित्वा सुखी भवेत्‌,युधिष्ठिर बोले--मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान्‌ होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମାନ (ଅହଂକାର) ତ୍ୟାଗ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରିୟ ହୁଏ; କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କଲେ ଶୋକ କରେ ନାହିଁ; କାମ ତ୍ୟାଗ କଲେ ସେ ଅର୍ଥବାନ୍ (ସମୃଦ୍ଧ) ହୁଏ; ଏବଂ ଲୋଭ ତ୍ୟାଗ କଲେ ସୁଖୀ ହୁଏ।

Verse 79

यक्ष उवाच किमर्थ ब्राह्मणे दानं किमर्थ नटनर्तके । किमर्थ चैव भृत्येषु किमर्थ चैव राजसु,यक्षने पूछा--ब्राह्मणको किसलिये दान दिया जाता है? नट और नर्तकोंको क्‍यों दान देते हैं? सेवकोंको दान देनेका क्‍या प्रयोजन है? और राजाओंको क्‍यों दान दिया जाता है?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଦାନ କେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଦିଆଯାଏ? ନଟ ଓ ନର୍ତ୍ତକଙ୍କୁ କାହିଁକି ଦିଆଯାଏ? ସେବକମାନଙ୍କୁ ଦେବାର କାରଣ କ’ଣ? ଏବଂ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଦାନ କାହିଁକି ଦିଆଯାଏ?

Verse 80

युधिछिर उवाच धर्मार्थ ब्राह्मणे दानं यशो<र्थ नटनर्तके । भृत्येषु भरणार्थ वै भयार्थ चैव राजसु,युधिष्ठिर बोले--ब्राह्मणको धर्मके लिये दान दिया जाता है, नट-नर्तकोंको यशके लिये दान (धन) देते हैं, सेवकोंको उनके भरण-पोषणके लिये दान (वेतन) दिया जाता है और राजाओंको भयके कारण दान (कर) देते हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଦାନ ଧର୍ମାର୍ଥେ; ନଟ-ନର୍ତ୍ତକଙ୍କୁ ଦାନ ଯଶ ଓ ଲୋକମାନ ପାଇଁ; ସେବକମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଭରଣ-ପୋଷଣ ପାଇଁ ବେତନ; ଏବଂ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଭୟକାରଣରୁ—କର କିମ୍ବା ଉପହାର ଭାବେ—ଦିଆଯାଏ।

Verse 81

यक्ष उवाच केनस्विदावृतो लोक: केनस्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्ग न गच्छति,यक्षने पूछा--जगत्‌ किस वस्तुसे ढका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रोंको किसलिये त्याग देता है? और स्वर्गमें किस कारण नहीं जाता?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ଜଗତ କେଉଁଥିରେ ଆବୃତ? କେଉଁ କାରଣରୁ ଏହା ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ ନାହିଁ? ମନୁଷ୍ୟ କେଉଁ କାରଣରୁ ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରେ? ଏବଂ କେଉଁ କାରଣରୁ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଯାଏ ନାହିଁ?

Verse 82

युधिछिर उवाच अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते । लोभात्‌ त्यजति मित्राणि संगात्‌ स्वर्ग न गच्छति,युधिष्ठिर बोले--जगत्‌ अज्ञानसे ढका हुआ है, तमोगुणके कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभके कारण मनुष्य मित्रोंको त्याग देता है और आसक्तिके कारण स्वर्गमें नहीं जाता

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଜଗତ ଅଜ୍ଞାନରେ ଆବୃତ; ତମସ୍‌ ହେତୁ ଏହା ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ ନାହିଁ; ଲୋଭରୁ ମନୁଷ୍ୟ ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରେ; ଆସକ୍ତିରୁ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଯାଏ ନାହିଁ।

Verse 83

यक्ष उवाच मृतः कथं स्यात्‌ पुरुष: कथ॑ राष्ट्र मृतं भवेत्‌ । श्राद्ध मृतं कथं वा स्यात्‌ कथं यज्ञों मृतो भवेत्‌

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟ କେମିତି ‘ମୃତ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ? ରାଷ୍ଟ୍ର କେମିତି ‘ମୃତ’ ହୁଏ? ଶ୍ରାଦ୍ଧ କେବେ ‘ମୃତ’ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ? ଏବଂ ଯଜ୍ଞ କେବେ ‘ମୃତ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ?

Verse 84

यक्षने पूछा--पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है? राष्ट्र किस प्रकार मर जाता है? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है? और यज्ञ कैसे नष्ट हो जाता है? ।। युधिछिर उवाच मृतो दरिद्र: पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम्‌ मृतमश्रोत्रियं श्राद्ध मृतो यज्ञस्त्वदक्षिण:

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା— ପୁରୁଷ କେମିତି ‘ମୃତ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ? ରାଷ୍ଟ୍ର କେମିତି ମରେ? ଶ୍ରାଦ୍ଧ କେମିତି ମୃତ ହୁଏ? ଏବଂ ଯଜ୍ଞ କେମିତି ନଷ୍ଟ ହୁଏ? ॥ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଦରିଦ୍ର ପୁରୁଷ ମୃତ (ମୃତସମ) ଅଟେ; ରାଜାବିହୀନ ରାଷ୍ଟ୍ର ମୃତ; ଅଶ୍ରୋତ୍ରିୟଙ୍କୁ ଦିଆ ଶ୍ରାଦ୍ଧ ମୃତ; ଦକ୍ଷିଣାବିହୀନ ଯଜ୍ଞ ନଷ୍ଟ (ମୃତ) ହୁଏ॥

Verse 85

युधिष्ठिर बोले--दरिद्र पुरुष मरा हुआ है यानी मरे हुएके समान है, बिना राजाका राज्य मर जाता है यानी नष्ट हो जाता है, श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणाका यज्ञ नष्ट हो जाता है ।। यक्ष उवाच का दिक्‌ किमुदकं प्रोक्त किमन्नं किं च वै विषम्‌ | श्राद्धस्य कालमाख्याहि तत: पिब हरस्व च,यक्षने पूछा--दिशा क्‍या है? जल क्या है? अन्न क्या है? विष क्‍या है? और श्राद्धका समय क्या है? यह बताओ। इसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ‘ଦିଗ୍’ କ’ଣ? ‘ଉଦକ’ (ଜଳ) କ’ଣ ବୋଲି କୁହାଯାଏ? ‘ଅନ୍ନ’ କ’ଣ, ଏବଂ ‘ବିଷ’ କ’ଣ? ଶ୍ରାଦ୍ଧର କାଳ ମଧ୍ୟ କହ; ତା’ପରେ ଜଳ ପିଅ ଏବଂ ନେଇଯାଅ॥

Verse 86

युधिछिर उवाच सन्‍्तो दिग्‌ जलमाकाशं गौरन्न प्रार्थना विषम्‌ | श्राद्धस्य ब्राह्मण: काल: कथं वा यक्ष मन्यसे,युधिष्ठिर बोले--सत्पुरुष दिशा हैं, आकाश जल है, पृथ्वी अन्न है, प्रार्थना (कामना) विष है और ब्राह्मण ही श्राद्धका समय है अथवा यक्ष! इस विषयमें तुम्हारी क्या मान्यता है?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ହିଁ ଦିଗ; ଆକାଶ ହିଁ ଜଳ; ପୃଥିବୀ ହିଁ ଅନ୍ନ; ପ୍ରାର୍ଥନା/କାମନା ହିଁ ବିଷ; ଏବଂ ଶ୍ରାଦ୍ଧ ପାଇଁ ବ୍ରାହ୍ମଣ ହିଁ କାଳ (ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ ଅବସର)। ହେ ଯକ୍ଷ, ତୁମ ମତ କ’ଣ?॥

Verse 87

यक्ष उवाच तप: कि लक्षणं प्रोक्तं को दमश्न प्रकीर्तित: । क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्वी: परिकीर्तिता,यक्षने पूछा--तपका क्या लक्षण बताया गया है? दम किसे कहा गया है? उत्तम क्षमा क्या बतायी गयी है? और लज्जा किसको कहा गया है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା— ତପର ଲକ୍ଷଣ କ’ଣ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି? ‘ଦମ’ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ପରମ କ୍ଷମା କ’ଣ? ଏବଂ ‘ହ୍ରୀ’ (ଲଜ୍ଜା) କାହାକୁ କୁହାଯାଏ?॥

Verse 88

युधिछिर उवाच तप: स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दम: । क्षमा द्न्द्सहिष्णुत्वं ह्वीरकार्यनिवर्तनम्‌,युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी- गरमी आदि द्वन्दोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ସ୍ୱଧର୍ମରେ ଅବିଚଳ ରହିବା ହିଁ ତପ; ମନର ଦମନ ହିଁ ଦମ; ଶୀତ-ଉଷ୍ଣ ଆଦି ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱକୁ ସହିବା ହିଁ କ୍ଷମା; ଏବଂ ଅକାର୍ଯ୍ୟରୁ ନିବୃତ୍ତ ହେବା ହିଁ ହ୍ରୀ (ଲଜ୍ଜା)॥

Verse 89

यक्ष उवाच किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्‌ कः शमश्रन प्रकीर्तित: | दया च का परा प्रोक्ता कि चार्जवमुदाहतम्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या कहलाता है? उत्तम दया किसका नाम है? और आर्जव (सरलता) किसे कहते हैं?

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ହେ ରାଜନ୍! ଜ୍ଞାନ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ଶମ (ଆତ୍ମସଂଯମ) କ’ଣ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ? ପରମ ଦୟା କ’ଣ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି? ଏବଂ ଆର୍ଜବ (ସରଳତା) କ’ଣ ବୋଲି ଘୋଷିତ?

Verse 90

युधिछिर उवाच ज्ञान तत्त्वार्थसम्बोध: शमक्षित्तप्रशान्तता | दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता,युधिष्ठिर बोले--परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव (सरलता) है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ତତ୍ତ୍ୱ ଓ ଅର୍ଥର ଯଥାର୍ଥ ବୋଧ ହିଁ ଜ୍ଞାନ; ଚିତ୍ତର ପ୍ରଶାନ୍ତି ହିଁ ଶମ; ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ସୁଖ ଆକାଂକ୍ଷା କରିବା ହିଁ ପରମ ଦୟା; ଏବଂ ସବୁ ପରିସ୍ଥିତିରେ ସମଚିତ୍ତତା ହିଁ ଆର୍ଜବ (ସରଳତା)।

Verse 91

यक्ष उवाच कः शत्रुर्दुर्जय: पुंसां कश्न व्याधिरनन्तक: । कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधु: कीदृश: स्मृत:,यक्षने पूछा--मनुष्योंका दुर्जय शत्रु कौन है? अनन्त व्याधि कया है? साधु कौन माना जाता है? और असाधु किसे कहते हैं?

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଜୟ ଶତ୍ରୁ କିଏ? ଅନନ୍ତ ବ୍ୟାଧି କ’ଣ? କେମିତି ପୁରୁଷ ‘ସାଧୁ’ ବୋଲି ସ୍ମରଣୀୟ? ଏବଂ କେମିତି ପୁରୁଷ ‘ଅସାଧୁ’ ବୋଲି ସ୍ମରଣୀୟ?

Verse 92

युधिछिर उवाच क्रोध: सुदुर्जय: शत्रुलोंभो व्याधिरनन्तक: । सर्वभूतहित: साधुरसाधुर्निर्देय: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— କ୍ରୋଧ ହିଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଜୟ ଶତ୍ରୁ; ଲୋଭ ହିଁ ଅନନ୍ତ ବ୍ୟାଧି; ଯେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ହିତ ଚାହେ ସେଇ ସାଧୁ; ନିର୍ଦୟ ପୁରୁଷ ଅସାଧୁ ବୋଲି ସ୍ମରଣୀୟ।

Verse 93

यक्ष उवाच को मोह: प्रोच्यते राजन्‌ कश्च मान: प्रकीर्तित: । किमालस्यं च विज्ञेयं कक्ष शोक: प्रकीर्तितः:,यक्षने पूछा--राजन्‌! मोह किसे कहते हैं? मान क्या कहलाता है? आलस्य किसे जानना चाहिये? और शोक किसे कहते हैं?

ଯକ୍ଷ କହିଲା— ହେ ରାଜନ୍! ମୋହ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ମାନ (ଅହଂକାର) କ’ଣ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ? ଆଳସ୍ୟ କ’ଣ ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ? ଏବଂ ଶୋକ କ’ଣ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି?

Verse 94

युधिछिर उवाच मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता । धर्मनिष्क्रियता55लस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते,युधिष्ठिर बोले--धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧର୍ମବିଷୟକ ମୂଢତା ହିଁ ମୋହ, ଆତ୍ମାଭିମାନ ହିଁ ମାନ; ଧର୍ମାନୁସାରେ କର୍ମ ନ କରିବା ଆଳସ୍ୟ, ଏବଂ ଯାହାକୁ ଲୋକେ ଶୋକ କହନ୍ତି ତାହା ପ୍ରକୃତରେ ଅଜ୍ଞାନ।

Verse 95

यक्ष उवाच कि स्थैर्यमृषिश्रि: प्रोक्ते कि च धैर्यमुदाह्तम्‌ । स्‍्नान॑ च किं पर प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते,यक्षने पूछा--ऋषियोंने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य क्या कहलाता है? परम स्नान किसे कहते हैं? और दान किसका नाम है?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ଋଷିମାନେ ‘ସ୍ଥୈର୍ୟ’ କାହାକୁ କହିଛନ୍ତି? ‘ଧୈର୍ୟ’ କ’ଣ? ପରମ ‘ସ୍ନାନ’ (ସତ୍ୟ ଶୁଦ୍ଧି) କ’ଣ? ଏଠାରେ ‘ଦାନ’ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ?

Verse 96

युधिछिर उवाच स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्य धेर्यमिन्द्रियनिग्रह: । स्नान मनोमलत्यागो दान वै भूतरक्षणम्‌

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସ୍ୱଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼ ରହିବା ହିଁ ସ୍ଥୈର୍ୟ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ ହିଁ ଧୈର୍ୟ; ମନର ମଳ ତ୍ୟାଗ କରିବା ହିଁ ପରମ ସ୍ନାନ; ଏବଂ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ହିଁ ଦାନ।

Verse 97

युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलोंका त्याग करना परम स्नान है और प्राणियोंकी रक्षा करना ही दान है ।। यक्ष उवाच कः: पण्डित:ः पुमान्‌ ज्ञेयो नास्तिक: कश्न उच्यते । को मूर्ख: कश्न काम: स्यात्‌ को मत्सर इति स्मृतः,यक्षने पूछा--किस पुरुषको पण्डित समझना चाहिये, नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है? तथा मत्सर किसे कहते हैं?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—କେଉଁ ପୁରୁଷକୁ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ? ନାସ୍ତିକ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ମୂର୍ଖ କିଏ? କାମ କ’ଣ? ଏବଂ ମତ୍ସର କାହାକୁ କୁହାଯାଏ?

Verse 98

युधिछ्िर उवाच धर्मज्ञ: पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । काम: संसारहेतुश्न हृत्तापो मत्सर: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म-मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧର୍ମଜ୍ଞ ବ୍ୟକ୍ତିକୁ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ; ନାସ୍ତିକକୁ ମୂର୍ଖ କୁହାଯାଏ। କାମ ହିଁ ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁରୂପ ସଂସାରର ହେତୁ; ହୃଦୟର ଦାହ ହିଁ ମତ୍ସର ବୋଲି ସ୍ମୃତ।

Verse 99

यक्ष उवाच को5हड्कार इति प्रोक्त: कश्न दम्भ: प्रकीर्तित: । कि तद्‌ दैवं परं प्रोक्त कि तत्‌ पैशुन्यमुच्यते,यक्षने पूछा--अहंकार किसे कहते हैं? दम्भ क्या कहलाता है? जिसे परम दैव कहते हैं, वह क्या है? और पैशुन्य किसका नाम है?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ଅହଂକାର କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ଦମ୍ଭ (ଆଡମ୍ବର/ଛଳ) କ’ଣ? ପରମ ‘ଦୈବ’ ବୋଲି ଯାହା କୁହାଯାଇଛି, ସେ କ’ଣ? ଏବଂ ‘ପୈଶୁନ୍ୟ’—ଦୁଷ୍ଟ ପରନିନ୍ଦା/ଚୁଗୁଲି—କାହାକୁ କୁହାଯାଏ?

Verse 100

युधिछिर उवाच महाज्ञानमहड्कारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छूय: । दैवं दानफल प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम्‌,युधिष्ठिर बोले--महान्‌ अज्ञान अहंकार है, अपनेको झूठ-मूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दानका फल दैव कहलाता है और दूसरोंको दोष लगाना पैशुन्य (चुगली) है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମହା ଅଜ୍ଞାନ ହିଁ ଅହଂକାର। ନିଜକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଧାର୍ମିକ ବୋଲି ଆଡମ୍ବରେ ଦେଖାଇବା ଦମ୍ଭ। ଦାନର ଫଳକୁ ‘ଦୈବ’ କୁହାଯାଏ। ଅନ୍ୟଙ୍କୁ ଦୋଷ ଲଗାଇ ନିନ୍ଦା କରିବା ପୈଶୁନ୍ୟ।

Verse 101

यक्ष उवाच धर्मश्चार्थक्ष॒ कामश्ष॒ परस्परविरोधिन: । एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगम:,यक्षने पूछा--धर्म, अर्थ और काम--ये सब परस्पर विरोधी हैं। इन नित्य-विरुद्ध पुरुषार्थोका एक स्थानपर कैसे संयोग हो सकता है?

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ କାମ ପରସ୍ପର ବିରୋଧୀ। ଯେମାନେ ସଦା ବିରୁଦ୍ଧ ରହନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କର ଏକେଠାରେ ସଙ୍ଗମ କିପରି ହେବ?

Verse 102

युधिषछ्िर उवाच यदा धर्मश्न भार्या च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगम:,युधिछ्िर बोले--जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम--इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है-

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ଧର୍ମ ଓ ଭାର୍ଯ୍ୟା—ଏ ଦୁହେଁ ପରସ୍ପର ଅବିରୋଧୀ ହୋଇ ମନୁଷ୍ୟର ବଶରେ ରହନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥ-କାମ—ଏ ତିନୋଟିର ମଧ୍ୟ ସଙ୍ଗମ ହୁଏ।

Verse 103

यक्ष उवाच अक्षयो नरक: केन प्राप्यते भरतर्षभ । एतनमे मृच्छत: प्रश्ननं तच्छीघ्र॑ वक्तुमहसि,यक्षने पूछा--भरतश्रेष्ठ) अक्षय नरक किस पुरुषको प्राप्त होता है? मेरे इस प्रश्नका शीघ्र ही उत्तर दो

ଯକ୍ଷ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! କେଉଁ ଆଚରଣରେ ମନୁଷ୍ୟ ଅକ୍ଷୟ ନରକ ପାଏ? ମୋର ଏହି ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଶୀଘ୍ର କୁହ।

Verse 104

युधिछिर उवाच ब्राह्मणं स्‍्वयमाहूय याचमानमकिज्चनम्‌ । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्‌ सो$क्षयं नरक॑ व्रजेत्‌,युधिष्ठिर बोले--जो पुरुष भिक्षा माँगनेवाले किसी अकिज्चन ब्राह्मणको स्वयं बुलाकर फिर उसे “नाहीं' कर देता है, वह अक्षय नरकमें जाता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଭିକ୍ଷା ମାଗୁଥିବା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ଧନ ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ ନିଜେ ଡାକି ପଛରେ “କିଛି ନାହିଁ” ବୋଲି କହେ, ସେ ଅକ୍ଷୟ ନରକକୁ ଯାଏ।

Verse 105

वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु । देवेषु पितृधर्मेषु सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत्‌,जो पुरुष वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मोमें मिथ्याबुद्धि रखता है, वह अक्षय नरकको प्राप्त होता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେ ପୁରୁଷ ବେଦ ଓ ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ର, ଦ୍ୱିଜ (ବ୍ରାହ୍ମଣ), ଦେବତା ଏବଂ ପିତୃଧର୍ମ (ଶ୍ରାଦ୍ଧାଦି) ବିଷୟରେ ମିଥ୍ୟା କିମ୍ବା ଅବମାନନାତ୍ମକ ବୁଦ୍ଧି ରଖେ, ସେ ଅକ୍ଷୟ ନରକକୁ ଯାଏ।

Verse 106

आश्रित्य यं वयं नाथ दुःखान्येतानि सेहिम । “वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्युके अधीन कैसे हो गये? ये वे ही धनंजय मेरी आशालताको छिजन्न-भिन्न करके धरतीपर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं,विद्यमाने धने लोभाद्‌ दानभोगविवर्जित: । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्‌ सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत्‌ धन पास रहते हुए भी जो लोभवश दान और भोगसे रहित है तथा (माँगनेवाले ब्राह्मणादिको एवं न्याययुक्त भोगके लिये स्त्री-पुत्रादिको) पीछेसे यह कह देता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, वह अक्षय नरकमें जाता है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନାଥ! ଯାହାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଆମେ ଏହି ଦୁଃଖ ସହିଲୁ। କିନ୍ତୁ ଧନ ଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଲୋଭବଶ ନ ଦାନ କରେ, ନ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଭୋଗ କରେ, ଏବଂ ପରେ ଯାଚକ କିମ୍ବା ଅଧିକାରୀଙ୍କୁ “ମୋ ପାଖରେ କିଛି ନାହିଁ” ବୋଲି କହେ, ସେ ଅକ୍ଷୟ ନରକକୁ ଯାଏ।

Verse 107

यक्ष उवाच राजन्‌ कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा । ब्राह्म॒ण्यं केन भवति प्रब्रूहीतत्‌ सुनिश्चितम्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण--इनमेंसे किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? यह बात निश्चय करके बताओ

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍! କୁଳ, ଆଚରଣ, ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ କିମ୍ବା ଶ୍ରବଣଜନିତ ଜ୍ଞାନ—ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେଉଁଟି ଦ୍ୱାରା ବ୍ରାହ୍ମଣ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ? ନିଶ୍ଚିତ କରି କହ।

Verse 108

युधिछिर उवाच शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम्‌ । कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशय:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶୁଣ, ହେ ଯକ୍ଷ, ପ୍ରିୟ! କୁଳ ନୁହେଁ, ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ନୁହେଁ, କେବଳ ଶ୍ରୁତ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଦ୍ୱିଜତ୍ୱର ସତ୍ୟ କାରଣ ହେଉଛି ଆଚରଣ ମାତ୍ର—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 109

युधिष्ठिर बोले--तात यक्ष! सुनो न तो कुल ब्राह्मणत्वमें कारण है न स्वाध्याय और न शास्त्रश्रवण। ब्राह्मणत्वका हेतु आचार ही है, इसमें संशय नहीं है ।। वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषत: । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हत:,इसलिये प्रयत्नपूर्वक सदाचारकी ही रक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणको तो उसपर विशेषरूपसे दृष्टि रखनी जरूरी है; क्योंकि जिसका सदाचार अक्षुण्ण है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना हुआ है और जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं भी नष्ट हो गया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତାତ ଯକ୍ଷ! ଶୁଣ। ନ କୁଳଜନ୍ମ, ନ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ, ନ ଶାସ୍ତ୍ରଶ୍ରବଣ—ଏମାନଙ୍କୁ କେହି ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱର ସତ୍ୟ କାରଣ କୁହାଯାଏ ନାହିଁ। ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱର ଆଧାର କେବଳ ଆଚାର—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ତେଣୁ ସଦାଚାରକୁ ଯତ୍ନରେ ରକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ; ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ତ ଏଥିରେ ବିଶେଷ ଦୃଷ୍ଟି ରଖିବା ଦରକାର। ଯାହାର ଆଚାର ଅକ୍ଷୁଣ୍ଣ, ସେ କ୍ଷୀଣ ହୁଏ ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ଯାହାର ଆଚାର ନଷ୍ଟ, ସେ ସର୍ବଥା ନଷ୍ଟ।

Verse 110

पठका: पाठकाश्ैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तका: । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्‌ स पण्डित:,पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले तथा शास्त्रका विचार करनेवाले--ये सब तो व्यसनी और मूर्ख ही हैं। पण्डित तो वही है, जो अपने (शास्त्रोक्त) कर्तव्यका पालन करता है

ଯେମାନେ କେବଳ ପଢ଼ନ୍ତି, ଯେମାନେ ପଢ଼ାନ୍ତି, ଏବଂ ଯେମାନେ ମାତ୍ର ଶାସ୍ତ୍ରଚିନ୍ତନ କରନ୍ତି—କର୍ମରେ ନ ନାମିଲେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବିବାଦ-ପ୍ରଦର୍ଶନର ଆସକ୍ତ ଓ ମୂର୍ଖ। ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟକୁ ଆଚରଣ କରେ ଯେ, ସେଇ ପ୍ରକୃତ ପଣ୍ଡିତ।

Verse 111

चतुर्वेदो<पि दुर्वत्त: स शूद्रादतिरिच्यते । योडग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृत:

ଚାରି ବେଦରେ ପାରଙ୍ଗତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯଦି କାହାର ଆଚାର ଦୁଷ୍ଟ, ତେବେ ସେ ଶୂଦ୍ରଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧମ ଗଣାଯାଏ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରରେ ନିଷ୍ଠାବାନ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନଶୀଳ ଓ ଶିଷ୍ଟ—ସେଇ ‘ବ୍ରାହ୍ମଣ’ ବୋଲି ସ୍ମୃତି କହେ।

Verse 112

चारों वेद पढ़ा होनेपर भी जो दुराचारी है, वह अधमतामें शूद्रसे भी बढ़कर है। जो (नित्य) अग्निहोत्रमें तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही “ब्राह्मण” कहा जाता है ।। यक्ष उवाच प्रियवचनवादी कि लभते विमृशितकार्यकर: कि लभते । बहुमित्रकर: किं लभते धर्मरत: कि लभते कथय,यक्षने पूछा--बताओ; मधुर वचन बोलनेवालेको क्‍या मिलता है? सोच-विचारकर काम करनेवाला क्या पा लेता है? जो बहुत-से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है? और जो धर्मनिष्ठ है, उसे क्या मिलता है?

ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—କହ। ମଧୁର ବଚନ କହୁଥିବା ଲୋକ କ’ଣ ପାଏ? ଭଲଭାବେ ଭାବି କାମ କରୁଥିବା ଲୋକ କ’ଣ ଲାଭ କରେ? ଯେ ଅନେକ ମିତ୍ର କରେ, ତାହାର କ’ଣ ଉପକାର? ଏବଂ ଯେ ଧର୍ମରେ ରତ, ସେ କ’ଣ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ?

Verse 113

युधिषछ्िर उवाच प्रियवचनवादी प्रियो भवति विमृशितकार्यकरोडथिकं जयति । बहुमित्रकर: सुखं वसते यश्ष धर्मरत: स गतिं लभते,युधिष्ठिर बोले--मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत-से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सदगति पाता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମଧୁର ବଚନ କହୁଥିବା ଲୋକ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରିୟ ହୁଏ। ଭାବି-ଚିନ୍ତି କାମ କରୁଥିବା ଲୋକ ଅଧିକାଂଶ ସମୟରେ ସଫଳତା ପାଏ। ଯେ ଅନେକ ମିତ୍ର କରେ, ସେ ସୁଖରେ ବସେ। ଏବଂ ଯେ ଧର୍ମରେ ରତ, ସେ ସଦ୍ଗତି ଲାଭ କରେ।

Verse 114

यक्ष उवाच को मोदते किमाश्चर्य क: पन्था: का च वार्तिका । ममैतांश्वतुरः प्रश्नान्‌ कथयित्वा जलं पिब,यक्षने पूछा--सुखी कौन है? आश्वर्य क्या है? मार्ग क्या है और वार्ता क्या है? मेरे इन चार प्रश्नोंका उत्तर देकर जल पीओ

ଯକ୍ଷ କହିଲା—କିଏ ସତ୍ୟରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ? ସର୍ବାଧିକ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କ’ଣ? ପଥ କେଉଁଟି? ଏବଂ ଯଥୋଚିତ ବାର୍ତ୍ତା କ’ଣ? ମୋର ଏହି ଚାରି ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଦେଇ ତାପରେ ଜଳ ପିଅ।

Verse 115

युधिछिर उवाच पजञ्चमे5हनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे । अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते,युधिष्ठिर बोले--जलचर यक्ष! जिस पुरुषपर ऋण नहीं है और जो परदेशमें नहीं है, वह भले ही पाँचवें या छठे दिन अपने घरके भीतर साग-पात ही पकाकर खाता हो, तो भी वही सुखी है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଜଳଚର ଯକ୍ଷ! ଯେ ପୁରୁଷ ଋଣମୁକ୍ତ ଓ ପରଦେଶବାସୀ ନୁହେଁ, ସେ ନିଜ ଘରେ ପଞ୍ଚମ କିମ୍ବା ଷଷ୍ଠ ଦିନ କେବଳ ଶାକ ରାନ୍ଧି ଖାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନିଜେ ସତ୍ୟରେ ସୁଖୀ।

Verse 116

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्‌ | शेषा: स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम्‌,संसारसे रोज-रोज प्राणी यमलोकमें जा रहे हैं; किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहनेकी इच्छा करते हैं; इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?

ଦିନକୁ ଦିନ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଯମାଳୟକୁ ଯାଉଛନ୍ତି; ତଥାପି ଯେମାନେ ରହିଯାନ୍ତି ସେମାନେ ସଦା ଜୀବିତ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି—ଏହାଠାରୁ ବଡ଼ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଆଉ କ’ଣ?

Verse 117

तर्कोउप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्‌ । धर्मस्य तत्त्वं निहित॑ गुहायां महाजनो येन गत: स पन्था:,तर्ककी कहीं स्थिति नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है कि जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा धर्मका तत्त्व गुहामें निहित है अर्थात्‌ अत्यन्य गूढ़ है; अत: जिससे महापुरुष जाते रहे हैं, वही मार्ग है

ତର୍କର କୌଣସି ଦୃଢ଼ ଆଧାର ନାହିଁ; ଶ୍ରୁତିମାନେ ମଧ୍ୟ ନାନା ଓ ପରସ୍ପର ଭିନ୍ନ। ଏମିତି ଏକ ଋଷି ନାହାନ୍ତି ଯାହାଙ୍କ ମତକୁ ଅନ୍ତିମ ପ୍ରମାଣ ମାନାଯାଉ। ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱ ଗୁହାରେ ନିହିତ—ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ। ତେଣୁ ମହାଜନ ଯେ ପଥେ ଗଲେ, ସେଇ ପଥ ହେଉଛି।

Verse 118

अस्मिन्‌ महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । मारसत्‌दर्वीपरिघट्टनेन भूतानि काल: पचतीति वार्ता,इस महामोहरूपी कड़ाहेमें भगवान्‌ काल समस्त प्राणियोंको मास और ऋतुरूप करछीसे उलट-पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधनके द्वारा राँध रहे हैं, यही वार्ता है

ଏହି ମହାମୋହରୂପ କଟାହରେ କାଳଦେବ ସୂର୍ଯ୍ୟରୂପ ଅଗ୍ନି ଓ ରାତି-ଦିନରୂପ ଇନ୍ଧନ ଦ୍ୱାରା, ମାସ ଓ ଋତୁରୂପ କରଛି ଘୁମାଇ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ପକାଉଛନ୍ତି—ଏହିଏ ହେଉଛି ବାର୍ତ୍ତା।

Verse 119

यक्ष उवाच व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना याथातथ्यं परंतप । पुरुष त्विदानीं व्याख्याहि यश्च सर्वधनी नर:

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ପରନ୍ତପ! ତୁମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଉତ୍ତର ଦେଲ। ଏବେ କହ—‘ପୁରୁଷ’ କାହାକୁ କୁହାଯାଏ? ଏବଂ ସତ୍ୟରେ ‘ସର୍ବଧନୀ’ ମନୁଷ୍ୟ କିଏ?

Verse 120

यक्षने पूछा--परंतप! तुमने मेरे सब प्रश्नोंके उत्तर ठीक-ठीक दे दिये, अब तुम पुरुषकी भी व्याख्या कर दो और यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है? ।। युधिछिर उवाच दिवं स्पृशति भूमिं च शब्द: पुण्येन कर्मणा । यावत्‌ स शब्दो भवति तावत्‌ पुरुष उच्यते,युधिष्ठिर बोले--जिस व्यक्तिके पुण्यकर्मोकी कीर्तिका शब्द जबतक स्वर्ग और भूमिको स्पर्श करता है, तबतक वह पुरुष कहलाता है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପୁଣ୍ୟକର୍ମରୁ ଜନ୍ମିଥିବା କୀର୍ତ୍ତିର ଶବ୍ଦ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଓ ପୃଥିବୀକୁ—ଦୁହେଁକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରେ। ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସେଇ କୀର୍ତ୍ତି ରହେ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତାହାକୁ ‘ପୁରୁଷ’ କୁହାଯାଏ।

Verse 121

तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च । अतीतानागते चोभे स वै सर्वधनी नर:,जो मनुष्य प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख और भूत-भविष्यत्‌--इन द्वद्धोंमें सम है, वही सबसे बड़ा धनी है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରିୟ-ଅପ୍ରିୟ, ସୁଖ-ଦୁଃଖ, ଏବଂ ଭୂତ-ଭବିଷ୍ୟତ—ଏହି ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱମାନଙ୍କରେ ସମ ରହେ, ସେଇ ସତ୍ୟରେ ସର୍ବଧନୀ।

Verse 122

(भूतभव्यभविष्येषु नि:स्पूह: शान्तमानस: । सुप्रसन्न: सदा योगी स वै सर्वधनी श्वरः ।।) जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयोंकी ओरसे निःस्पृह, शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियोंका स्वामी है ।। यक्ष उवाच व्याख्यात: पुरुषो राजन्‌ यश्च सर्वधनी नर: । तस्मात्‌ त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु,यक्षने कहा--राजन्‌! जो सबसे बढ़कर धनी पुरुष है, उसकी तुमने ठीक-ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयोंमेंसे जिस एकको तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है

ଯେ ଭୂତ, ବର୍ତ୍ତମାନ ଓ ଭବିଷ୍ୟତ—ଏ ସବୁ ପ୍ରତି ନିଃସ୍ପୃହ; ଯାହାର ମନ ଶାନ୍ତ; ଯିଏ ସଦା ପ୍ରସନ୍ନ; ଏବଂ ନିତ୍ୟ ଯୋଗରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ—ସେଇ ସତ୍ୟରେ ସର୍ବଧନର ଅଧିପତି। ଯକ୍ଷ କହିଲା—ହେ ରାଜନ! ‘ପୁରୁଷ’ ଏବଂ ‘ସର୍ବଧନୀ’ ମନୁଷ୍ୟ କିଏ, ତୁମେ ଠିକ୍ ଭାବେ ବ୍ୟାଖ୍ୟା କଲ। ତେଣୁ ତୁମ ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯାହାକୁ ତୁମେ ଚାହ, ସେଇ ଜୀବିତ ହେଉ।

Verse 123

युधिछिर उवाच श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहच्छाल इवोत्थित: । व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु,युधिष्ठिर बोले--यक्ष! यह जो श्यामवर्ण, अरुणनयन, सुविशाल शालवृक्षके समान ऊँचा और चौड़ी छातीवाला महाबाहु नकुल है, वही जीवित हो जाय

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଯକ୍ଷ! ଏହି ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ, ରକ୍ତାକ୍ଷ, ବିଶାଳ ଶାଳବୃକ୍ଷ ପରି ଉଚ୍ଚ, ବିସ୍ତୃତ ବକ୍ଷସ୍ଥଳ ଓ ମହାବାହୁ ନକୁଳ—ସେଇ ଜୀବିତ ହେଉ।

Verse 124

यक्ष उवाच प्रियस्ते भीमसेनो5यमर्जुनो व: परायणम्‌ | स कस्मान्नकुलं राजन्‌ सापत्नं जीवमिच्छसि,यक्षने कहा--राजन्‌! यह तुम्हारा प्रिय भीमसेन है और यह तुमलोगोंका सबसे बड़ा सहारा अर्जुन है; इन्हें छोड़कर तुम किसलिये सौतेले भाई नकुलको जिलाना चाहते हो?

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍! ଏହି ଭୀମସେନ ତୁମର ପ୍ରିୟ, ଏହି ଅର୍ଜୁନ ତୁମମାନଙ୍କର ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଶ୍ରୟ। ସେମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି, ଭିନ୍ନ ମାତାଜନ୍ମା ସହୋଦର ନକୁଳକୁ କାହିଁକି ଜୀବନ୍ତ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ?

Verse 125

यस्य नागसहस्रेण दशसंख्येन वै बलम्‌ | तुल्यं त॑ भीममुत्सूज्य नकुलं जीवमिच्छसि,जिसमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उस भीमको छोड़कर तुम नकुलको ही क्यों जिलाना चाहते हो?

ଯାହାର ବଳ ଦଶହଜାର ହାତୀଙ୍କ ବଳ ସମାନ, ସେହି ଭୀମକୁ ଛାଡ଼ି ତୁମେ କାହିଁକି ନକୁଳକୁ ହିଁ ଜୀବନ୍ତ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ?

Verse 126

तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव । अथ केनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि,सभी मनुष्य भीमसेनको तुम्हारा प्रिय बतलाते हैं; उसे छोड़कर भला सौतेले भाई नकुलमें तुम कौन-सा सामर्थ्य देखकर उसे जिलाना चाहते हो?

ଲୋକମାନେ କହନ୍ତି ଭୀମସେନ ହିଁ ତୁମର ସବୁଠାରୁ ପ୍ରିୟ। ତେବେ ତାକୁ ଛାଡ଼ି, କେଉଁ ଗୁଣ କିମ୍ବା ପ୍ରଭାବ ଦେଖି ତୁମେ ଭିନ୍ନ ମାତାଜନ୍ମା ନକୁଳକୁ ଜୀବନ୍ତ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ?

Verse 127

यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवा: समुपासते । अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि,जिसके बाहुबलका सभी पाण्डवोंको पूरा भरोसा है, उस अर्जुनको भी छोड़कर तुम्हें नकुलको जिला देनेकी इच्छा क्‍यों है?

ଯାହାର ବାହୁବଳ ଉପରେ ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ଭରସା କରନ୍ତି, ସେହି ଅର୍ଜୁନକୁ ଛାଡ଼ି ତୁମେ କାହିଁକି ନକୁଳକୁ ଜୀବନ୍ତ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ?

Verse 128

युधिछिर उवाच धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित: । तस्माद्‌ धर्म न त्यजामि मा नो धर्मो हतोडवधीत्‌,युधिष्ठिर बोले--यदि धर्मका नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ताको भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ताकी भी रक्षा कर लेता है। इसीसे मैं धर्मका त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଧର୍ମକୁ ହତ କଲେ, ହତ ହୋଇଥିବା ଧର୍ମ ହିଁ ହତକାରୀକୁ ନଶ୍ଟ କରେ; ଧର୍ମକୁ ରକ୍ଷା କଲେ, ରକ୍ଷିତ ଧର୍ମ ହିଁ ରକ୍ଷକକୁ ରକ୍ଷା କରେ। ତେଣୁ ମୁଁ ଧର୍ମକୁ ତ୍ୟାଗ କରେନି—ନଶ୍ଟ ହୋଇଥିବା ଧର୍ମ ଫେରି ମୋତେ ନଶ୍ଟ କରିଦେବ ନାହିଁ ବୋଲି।

Verse 129

आनुशंस्यं परो धर्म: परमार्थाच्च मे मतम्‌ | आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता (दया तथा समता) ही परम धर्म है। यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समानभाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—କରୁଣା ହିଁ ପରମ ଧର୍ମ; ପରମ ହିତକୁ ଆଧାର କରି ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ମତ। ମୁଁ ଅକ୍ରୂରତା ଓ ଦୟାରେ ଆଚରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତେଣୁ, ହେ ଯକ୍ଷ, ନକୁଳ ଜୀବିତ ରହୁ।

Verse 130

धर्मशील: सदा राजा इति मां मानवा विदु: । स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! लोग मेरे विषयमें ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अतएव मैं अपने धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा। मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଲୋକେ ମୋତେ ସଦା ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ରାଜା ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି। ତେଣୁ ମୁଁ ମୋର ସ୍ୱଧର୍ମରୁ ଚ୍ୟୁତ ହେବି ନାହିଁ। ହେ ଯକ୍ଷ, ନକୁଳ ଜୀବିତ ରହୁ।

Verse 131

कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भायें तु पितुर्मम । उभे सपुत्रे स्थातां वै इति मे धीयते मति:,मेरे पिताके कुन्ती और माद्री नामकी दो भार्याएँ रहीं। वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପିତାଙ୍କର ଦୁଇ ଭାର୍ଯ୍ୟା ଥିଲେ—କୁନ୍ତୀ ଓ ମାଦ୍ରୀ। ଉଭୟେ ପୁତ୍ରସହିତ ଧନ୍ୟ ରହୁନ୍ତୁ—ଏହି ମୋର ଦୃଢ଼ ମତ।

Verse 132

यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयो: । मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री। उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनों माताओंके प्रति समानभाव ही रखना चाहता हूँ। इसलिये नकुल ही जीवित हो

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପାଇଁ କୁନ୍ତୀ ଯେପରି, ମାଦ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ସେପରି; ଦୁହିଁଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୋତେ କୌଣସି ଭେଦ ନାହିଁ। ମୁଁ ଦୁଇ ମାତାଙ୍କ ପ୍ରତି ସମଭାବ ରଖିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତେଣୁ, ହେ ଯକ୍ଷ, ନକୁଳ ହିଁ ଜୀବିତ ରହୁ।

Verse 133

यक्ष उवाच तस्य ते<र्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम्‌ | तस्मात्‌ ते भ्रातर: सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ,यक्षने कहा--भरतगश्रेष्ठ! तुमने अर्थ और कामसे भी अधिक दया और समताका आदर किया है, इसलिये तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायेँ

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ଅର୍ଥ ଓ କାମଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଉପରେ କରୁଣା ଓ ସମତାକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାନିଛ; ତେଣୁ ତୁମର ସମସ୍ତ ଭାଇ ଜୀବିତ ହେଉନ୍ତୁ।

Verse 312

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदि चारों भाइयोंके मूर्च्छित होकर गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला तीन सौ बारहवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଆରଣେୟପର୍ବରେ ନକୁଳ ଆଦି ଚାରିଭାଇ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପତିତ ହେବା ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ତିନିଶେ ବାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ।

Verse 313

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्नने त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहद्या भारत वनप्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें यक्षप्रश्रविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଆରଣେୟପର୍ବରେ ଯକ୍ଷପ୍ରଶ୍ନ-ବିଷୟକ ତିନିଶେ ତେରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 363

मयैते निहता:ः सर्वे भ्रातरस्ते महौजस: । यक्षने कहा--तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ। तुम्हारे ये सभी महान्‌ तेजस्वी भाई मेरे द्वारा ही मारे गये हैं

ଯକ୍ଷ କହିଲା—ତୋର ଏହି ସମସ୍ତ ମହାବଳୀ, ତେଜସ୍ବୀ ଭାଇମାନେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ନିହତ ହୋଇଛନ୍ତି।