यक्ष उवाच किंस्वित् प्रवसतो मित्र किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्र किंस्विन्मित्रं मरिष्यत:,यक्षने पूछा--प्रवासी (परदेशके यात्री)-का मित्र कौन है? गृहवासी (गृहस्थ)-का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है?
ଯକ୍ଷ ପଚାରିଲା—ପ୍ରବାସୀର ମିତ୍ର କିଏ? ଘରେ ଥିବା ଗୃହସ୍ଥର ମିତ୍ର କିଏ? ରୋଗୀର ମିତ୍ର କିଏ? ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ସମୀପକୁ ପହଞ୍ଚିଥିବା ପୁରୁଷର ମିତ୍ର କିଏ?
यक्ष उवाच