
ब्राह्मणपूजा-राजधर्मः | Royal Duty of Honoring Learned Brahmins
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Kingship and Governance Instructions)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what is the foremost duty of an anointed king and what conduct enables attainment of welfare in both worlds. Bhīṣma answers that the king’s highest recurring obligation is the continual honoring and protection of reputable, learned, and senior brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful attention, material support, and formal salutations. He frames this as a practical instrument of state stability: when such figures are at peace, the realm “shines,” and the public’s functioning is sustained through them. The chapter then expands into a cautionary register: brāhmaṇas are depicted as difficult to oppose, capable (when angered) of overwhelming consequences; their capacities are described as varied and sometimes concealed, with diverse livelihoods and conduct in society. The discourse warns against listening to or participating in disparagement of dvijas; the advised protocol is silent withdrawal. Finally, it asserts that antagonism toward brāhmaṇas is incompatible with secure prosperity, using analogies to emphasize their social and moral “invincibility” within the chapter’s normative worldview.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह से पूछते हैं—यदि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है, तो विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय ने उसी देह से ब्राह्मण्य कैसे पाया? इसी जिज्ञासा के उत्तर में वंश-गाथा और रूपान्तरण की कथा खुलती है। → भीष्म हैहय-वंश और शर्याति-वंश की कड़ियाँ जोड़ते हुए वीतहव्य के पुत्रों और काशी-नरेशों के बीच घोर वैर का वर्णन करते हैं। युद्ध देवासुर-संग्राम-सा उग्र होता है; हैहय राजकुमार विविध शस्त्रों से राजा पर वर्षा करते हैं, मानो हिमालय पर मेघ जल बरसा रहे हों। → प्रतर्दन कवच धारण कर धनुष उठाता है; स्तुतियों के बीच उदित सूर्य-सा दीप्त होकर रण में प्रवेश करता है और निर्णायक पराक्रम से काशी-नरेशों का संहार कर देता है। इसके बाद वीतहव्य का भाग्य-परिवर्तन आता है—भृगुवंशी महर्षि के वचन मात्र से वह क्षत्रिय-जाति का त्याग कर ब्रह्मर्षि/ब्रह्मवादी हो जाता है। → महर्षि भृगु (भृगुवंशी) अपने तप-प्रभाव से ‘जाति’ और ‘अधिकार’ के प्रश्न को वचन-बल द्वारा सुलझाते हैं—वीतहव्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है; प्रतर्दन महर्षि की आज्ञा लेकर यथावत लौटता है, जैसे सर्प विष छोड़ दे। कथा आगे गृत्समद आदि वंश-प्रसंगों की ओर संकेत करती है। → वीतहव्य से आगे की संतति-परम्परा (गृत्समद आदि) और ‘ब्राह्मणत्व’ के दुर्लभ होने पर उठे प्रश्न का व्यापक निष्कर्ष अगले प्रसंगों में फैलता है।
Verse 1
ऑपनआक्राा बछ। अकाल त्रिशो&्थ्याय: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भूगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा युधिछिर उवाच श्रुतं मे महदाख्यानमेतत् कुरुकुलोद्वह । सुदुष्प्रापं यद् ब्रवीषि ब्राह्म॒ण्यं वदतां वर,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुकुलमें उत्पन्न! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! आपके मुखसे यह महान् उपाख्यान मैंने सुन लिया। आप कह रहे हैं कि अन्य वर्णोके लिये इसी शरीरसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति बहुत ही कठिन है
យុធិષ્ઠិរ បាននិយាយថា៖ «ឱ អ្នកលើកតម្កើងវង្សកុរុ! ឱ ពិតាមហា អ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងចំណោមអ្នកនិយាយ! ខ្ញុំបានស្តាប់រឿងអស្ចារ្យដ៏ធំនេះពីមាត់លោករួចហើយ។ តែអ្វីដែលលោកប្រកាសថា—ការទទួលបានភាពជាព្រាហ្មណ៍ (ព្រាហ្មណ្យ) ក្នុងរាងកាយនេះសម្រាប់អ្នកនៃវណ្ណៈផ្សេងៗ គឺលំបាកយ៉ាងខ្លាំង—ហាក់ដូចជាមិនអាចសម្រេចបានឡើយ»។
Verse 2
विश्वामित्रेण च पुरा ब्राह्म॒ण्यं प्राप्तमित्युत । श्रूयते वदसे तच्च दुष्प्रापमिति सत्तम
យុធិષ્ઠិរ បាននិយាយថា៖ «គេក៏បានឮថា កាលពីបុរាណ វិស្វាមិត្រ បានទទួលបានស្ថានភាពជាព្រាហ្មណ៍។ ប៉ុន្តែលោកក៏ថា ការទទួលបានដូច្នោះ លំបាកយ៉ាងខ្លាំងណាស់ ឱ អ្នកប្រកបដោយគុណធម៌ដ៏ល្អឥតខ្ចោះ។ តើយើងគួរយល់ដូចម្តេច?»។
Verse 3
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! परंतु सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने इसी शरीरसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था और आप जो उसे सर्वथा दुर्लभ बता रहे हैं (ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध-सी जान पड़ती हैं) ।। वीतहव्यश्व नृपति: श्रुतो मे विप्रतां गत: । तदेव तावद् गाड़ेय श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो,मेरे सुननेमें यह भी आया है कि राजा वीतहत्य क्षत्रियसे ब्राह्मण हो गये थे। गड़ानन्दन प्रभो! अब मैं पहले उसी प्रसड़को सुनना चाहता हूँ
យុធិષ્ઠិរ បានទូលថា៖ «ឱ ពិតាមហៈ ជាអ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមសត្បុរស! តែគេបានឮថា ក្នុងកាលបុរាណ វិស្វាមិត្រ បានទទួលស្ថានភាពព្រាហ្មណ៍នៅក្នុងរាងកាយនេះដដែល; ខណៈដែលព្រះអង្គវិញពោលថា វាជារឿងកម្រខ្លាំងណាស់—ពាក្យទាំងពីរនេះហាក់ដូចជាផ្ទុយគ្នា។ ខ្ញុំក៏បានឮថា ព្រះមហាក្សត្រ វីតហវ្យៈ ទោះជាក្សត្រិយៈ ក៏បានក្លាយជាព្រាហ្មណ៍។ ឱ ពូជពង្សនៃគាធិ អ្នកមានអานุភាព—ខ្ញុំប្រាថ្នាស្តាប់រឿងនោះជាមុន»។
Verse 4
स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्म॒ण्यं राजसत्तम: । वरेण तपसा वापि तन््मे व्याख्यातुमरहसि,वे नृपशिरोमणि वीतहव्य किस कर्मसे, किस वर अथवा तपस्यासे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें
យុធិષ્ઠិរ បានទូលថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រប្រសើរបំផុត! តើដោយកម្មអ្វី ទ្រង់បានទទួលស្ថានភាពព្រាហ្មណ៍? តើដោយពរ ឬដោយតបស្យា? ឱ មកុដនៃអ្នកគ្រប់គ្រង សូមព្រះអង្គពន្យល់ឲ្យខ្ញុំដោយលម្អិត»។
Verse 5
भीष्म उवाच शृणु राजन् यथा राजा वीतहव्यो महायशा: । राजर्षिर्दिलभ प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम्,भीष्मजीने कहा--राजन्! महायशस्वी राजर्षि राजा वीतहव्यने जिस प्रकार लोकसम्मानित दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था, उसे बताता हूँ, सुनो
ភីष្ម បានមានព្រះវាចាថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ចូរស្តាប់ ខ្ញុំនឹងរៀបរាប់ថា ព្រះរាជឥសី ព្រះមហាក្សត្រ វីតហវ្យៈ អ្នកមានកិត្តិយសដ៏ធំ បានទទួលស្ថានភាពព្រាហ្មណ៍ដ៏កម្រនិងត្រូវបានលោកគោរពយ៉ាងដូចម្តេច»។
Verse 6
मनोर्महात्मनस्तात प्रजा धर्मेण शासत: । बभूव पुत्रो धर्मात्मा शर्यातिरिति विश्रुत:,तात! पूर्वकालमें धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले महामनस्वी राजा मनुके एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था शर्याति
ភីष្ម បានមានព្រះវាចាថា៖ «កូនអើយ! ចំពោះមនុ អ្នកមានព្រលឹងធំ ដែលគ្រប់គ្រងប្រជាជនដោយធម៌ មានកូនប្រុសម្នាក់កើតមក ជាអ្នកមានធម៌ ហើយល្បីឈ្មោះថា សារយាតិ»។
Verse 7
तस्यान्ववाये द्वौ राजन् राजानौ सम्बभूवतु: । हैहयस्तालजंघश्न वत्सस्य जयतां वर,विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! राजा शर्यातिके वंशमें दो राजा बड़े विख्यात हुए--हैहय और तालजंघ। ये दोनों ही राजा वत्सके पुत्र थे
ភីष្ម បានមានព្រះវាចាថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ក្នុងវង្សនោះ មានព្រះមហាក្សត្រពីរអង្គកើតឡើង មានកេរ្តិ៍ឈ្មោះល្បីល្បាញ—ហៃហយៈ និង តាលជង្គៈ។ ឱ អ្នកឈ្នះក្នុងចំណោមវីរបុរស! ព្រះមហាក្សត្រទាំងពីរនេះ ជាព្រះរាជបុត្ររបស់ វត្សៈ»។
Verse 8
हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत । शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम्,भरतवंशी राजेन्द्र! उन दोनोंमें हैहपके (जिसका दूसरा नाम वीतहव्य भी था) दस स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंके गर्भसे सौ शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ឱ ពូជពង្សភារតៈ! ព្រះមហាក្សត្រវង្សហៃហយៈមានព្រះមហេសីដប់នាក់។ ពីព្រះមហេសីទាំងនោះ បានប្រសូត្របុត្ររយនាក់—វីរបុរសមិនដែលថយក្រោយពីសមរភូមិ»។
Verse 9
तुल्यरूपप्रभावाणां बलिनां युद्धशालिनाम् । धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमा:
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពួកគេមានរូបរាង និងអានុភាពស្មើគ្នា—ជាបុរសកម្លាំងខ្លាំង ជំនាញល្អក្នុងសិល្បៈសង្គ្រាម—បានខិតខំប្រឹងប្រែងក្នុងគ្រប់វិជ្ជា ទាំងវិទ្យាធនូ និងវេដៈ»។
Verse 10
उन सबके रूप और प्रभाव एक समान थे, वे सभी बलवान् तथा युद्धमें शोभा पानेवाले थे। उन्होंने धनुर्वेद और वेदके सभी विषयोंमें परिश्रम किया था ।। काशिष्वपि नूपो राजन् दिवोदासपितामह: । हर्यश्व इति विख्यातो बभूव जयतां वर:,उन्हीं दिनों काशी प्रान्तमें हर्यश्व नामके राजा राज्य करते थे, जो दिवोदासके पितामह थे। वे विजयशील वीरोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពួកគេទាំងអស់មានរូបរាង និងអានុភាពស្មើគ្នា—កម្លាំងខ្លាំង សមស្របនឹងភ្លឺរលោងក្នុងសមរភូមិ។ ពួកគេបានខិតខំប្រឹងប្រែងក្នុងវិទ្យាធនូ និងក្នុងគ្រប់សាខានៃចំណេះដឹងវេដៈ។ នៅថ្ងៃទាំងនោះផងដែរ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ នៅកាសីមានព្រះមហាក្សត្រមួយអង្គល្បីឈ្មោះថា ហរិយស្វៈ ជាជីតារបស់ទិវោទាសៈ; ព្រះអង្គត្រូវបានគេចាត់ទុកថាជាអ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងចំណោមវីរបុរសអ្នកឈ្នះ»។
Verse 11
स वीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ । गड्भायमुनयोर्मध्ये संग्रामे विनिपातित:,पुरुषप्रवर! वीतहव्यके पुत्रोंने हर्यश्वके राज्यपर चढ़ाई की उन्हें गंगा-यमुनाके बीच युद्धमें मार गिराया
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ វីរបុរសលើសបុរសទាំងឡាយ! ព្រះអង្គត្រូវបានពូជពង្សរបស់វីតហវ្យៈមកប្រឈមមុខ; ហើយនៅក្នុងសង្គ្រាមដែលប្រយុទ្ធនៅចន្លោះទន្លេគង្គា និងយមុនា ព្រះអង្គត្រូវបានវាយសម្លាប់ចុះ»។
Verse 12
त॑ तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथा: । प्रतिजग्मु: पुरी रम्यां वत्सानामकुतो भया:,राजा हर्यश्वको मारकर वे महारथी हैहय-राजकुमार निर्भय हो वत्सवंशी राजाओंकी सुरम्य पुरीको लौट गये
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ក្រោយពេលសម្លាប់ព្រះមហាក្សត្រនោះហើយ ព្រះរាជកុមារវង្សហៃហយៈ—អ្នកយុទ្ធរថធំៗ—ដោយគ្មានការភ័យខ្លាច បានត្រឡប់ទៅកាន់ទីក្រុងស្រស់ស្អាតរបស់វង្សវត្សៈវិញ»។
Verse 13
हर्यश्व॒स्य च दायाद: काशिराजो< भ्यषिच्यत । सुदेवो देवसंकाश: साक्षाद् धर्म इवापर:
ភីស្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ហើយអ្នកស្នងរាជ្យរបស់ ហរិយស្វៈ គឺព្រះមហាក្សត្រនៃ កាសី ត្រូវបានអភិសេកតាមពិធីយ៉ាងត្រឹមត្រូវ។ សុទេវៈ នោះ រុងរឿងដូចទេវតា ហាក់ដូចជា ធម្មៈ ផ្ទាល់ ក្នុងរូបមួយទៀត»។
Verse 14
हर्यश्वके पुत्र सुदेव जो देवताके तुल्य तेजस्वी और साक्षात् दूसरे धर्मराजके समान न्यायशील थे, पिताके बाद काशिराजके पदपर अभिषिक्त किये गये ।। स पालयामास महीं धर्मात्मा काशिनन्दन: । तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वर्विनिर्जित:,धर्मात्मा काशिनन्दन सुदेव धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगे। इसी बीचमें वीतहव्यके सभी पुत्रोंने आक्रमण करके युद्धमें उन्हें भी परास्त कर दिया
ភីស្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «សុទេវៈ ព្រះរាជបុត្រដ៏សុចរិត នៃកាសី ជាកូនពិតនៃកាសី បានគ្រប់គ្រងផែនដីតាមធម្មៈ។ ប៉ុន្តែបន្ទាប់មក កូនៗរបស់ វីតហវ្យៈ បានមកវាយលុក ហើយក្នុងសមរភូមិ គាត់ត្រូវបានពួកគេទាំងអស់យកឈ្នះ»។
Verse 15
तमथाजोौ विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् । सौदेवस्त्वथ काशीशो दिवोदासो5भ्यषिच्यत,समराज्रणमें सुदेवको धराशायी करके वे हैहय-राजकुमार जैसे आये थे वैसे लौट गये। तत्पश्चात् सुदेवके पुत्र दिवोदासका काशिराजके पदपर अभिषेक किया गया
ភីស្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បន្ទាប់ពីបានយកឈ្នះ អជៈ ក្នុងសង្គ្រាមហើយ ពួកគេក៏ត្រឡប់ទៅដូចដែលបានមក។ បន្ទាប់មក ទិវោទាសៈ កូនប្រុសរបស់ សោទេវៈ ត្រូវបានអភិសេកឡើងជាព្រះមហាក្សត្រនៃ កាសី»។
Verse 16
दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्य तेषां यतात्मनाम् । वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात्,दिवोदास बड़े तेजस्वी राजा थे। उन्होंने जब मनको वशमें रखनेवाले हैहयराजकुमारोंके पराक्रमपर विचार किया तब इन्द्रकी आज्ञासे वाराणसी नामवाली नगरी बसायी
ភីស្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ទិវោទាសៈ ព្រះមហាក្សត្រដ៏មានអំណាច និងពន្លឺធំ បានយល់ដឹងពីសមត្ថភាពរបស់ព្រះរាជកុមារហៃហយៈទាំងនោះ ដែលគ្រប់គ្រងចិត្តបាន។ ដោយគោរពតាមព្រះបញ្ជារបស់ សក្រៈ (ឥន្ទ្រៈ) ព្រះអង្គបានបង្កើតទីក្រុងឈ្មោះ វារាណសី»។
Verse 17
विप्रक्षत्रियसम्बाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् । नैकद्रव्योच्चयवर्ती समृद्धविपणापणाम्,वह पुरी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंसे भरी हुई थी। नाना प्रकारके द्रव्योंके संग्रहसे सम्पन्न थी; तथा उसके बाजार-हाट और दूकानें धन-वैभवसे भरपूर थीं
ភីស្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ទីក្រុងនោះមានប្រជាជនកកកុញដោយព្រាហ្មណ៍ និងក្សត្រិយៈ ហើយក៏ពោរពេញដោយវៃស្យៈ និងសូទ្រៈផងដែរ។ វារីកចម្រើនដោយការប្រមូលផ្តុំទំនិញជាច្រើនប្រភេទ ហើយទីផ្សារ បាសារ និងហាងទំនិញរបស់វា សម្បូរបែប និងរុងរឿងដោយទ្រព្យសម្បត្តិ»។
Verse 18
गड्जाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम । गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम्,नृपश्रेष्ठट उस नगरीके घेरेका एक छोर गंगाजीके उत्तर तटतक दूसरा छोर गोमतीके दक्षिण किनारेतक फैला हुआ था। वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान जान पड़ती थी
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះរាជាដ៏ប្រសើរបំផុត! នគរនោះស្ថិតតាមបណ្តោយឆ្នេរខាងជើងនៃទន្លេគង្គា ដល់ជាយកំពែងរបស់វា ហើយលាតសន្ធឹងទៅដល់ឆ្នេរខាងត្បូងនៃទន្លេគោមតី។ ក្នុងភាពរុងរឿង វាហាក់ដូចអមរាវតី—នគរឋានសួគ៌របស់ឥន្ទ្រ—ផ្ទាល់»។
Verse 19
तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् । आगत्य हैहया भूय: पर्यधावन्त भारत
នៅទីនោះ ឱ ភារតៈ ពួកហៃហយៈបានមកម្តងទៀតកាន់ទីកន្លែងដែល «ខ្លាឃ្មុំក្នុងចំណោមស្តេច»—ព្រះមហាក្សត្រនោះ—កំពុងស្នាក់នៅ ហើយពួកគេបានព័ទ្ធជុំវិញទ្រង់គ្រប់ទិស ដណ្ដើមចូលជិតទ្រង់ម្តងទៀត។
Verse 20
भारत! उस नगरीमें निवास करते हुए राजसिंह भूपाल दिवोदासपर पुनः हैहयराजकुमारोंने धावा किया ।। स निष्क्रम्य ददौ युद्ध तेभ्यो राजा महाबल: । देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युति:
ឱ ភារតៈ ខណៈដែលព្រះបាទទិវោទាស—សីហៈក្នុងចំណោមអ្នកគ្រប់គ្រង—កំពុងស្នាក់នៅក្នុងនគរនោះ ព្រះរាជកុមារនៃវង្សហៃហយៈបានវាយប្រហារលើទ្រង់ម្តងទៀត។ ទិវោទាស អ្នកមានកម្លាំងធំ និងភ្លឺរលោង បានចេញទៅប្រឈមមុខពួកគេ ហើយប្រគល់សង្គ្រាមដ៏សាហាវធំធេង ដូចសង្គ្រាមរវាងទេវតានិងអសុរ។
Verse 21
महातेजस्वी महाबली राजा दिवोदासने पुरीसे बाहर निकलकर उन राजकुमारोंके साथ युद्ध किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ।। स तु युद्धे महाराज दिनानां दशतीर्दश । हतवाहनभूयिष्ठस्ततो दैन्यमुपागमत्,महाराज! काशिनरेशने एक हजार दिन (दो वर्ष नौ महीने दस दिन)-तक शत्रुओंके साथ युद्ध किया। इस युद्धमें दिवोदासके बहुत-से सिपाही और हाथी, घोड़े आदि वाहन मारे गये। उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशामें पड़ गये। अन्तमें अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ព្រះបាទទិវោទាស អ្នកមានពន្លឺដ៏ធំ និងកម្លាំងដ៏ខ្លាំង បានចេញពីនគររបស់ទ្រង់ទៅប្រយុទ្ធជាមួយព្រះរាជកុមារទាំងនោះ។ សង្គ្រាមនោះគួរឱ្យភ័យខ្លាច ដូចសង្គ្រាមទេវតានិងអសុរ។ ឱ មហារាជ! ទ្រង់បានប្រយុទ្ធយូរអង្វែងជាច្រើនថ្ងៃ; ប៉ុន្តែពេលរថសេះ និងយានជាច្រើនត្រូវបំផ្លាញ ទ្រង់បានធ្លាក់ចូលសេចក្តីទុក្ខវេទនា។ ទ័ព និងដំរីសង្គ្រាម សេះជាច្រើនត្រូវសម្លាប់ ទ្រព្យសម្បត្តិអស់សព្វ ហើយចុងក្រោយ ទ្រង់បានបោះបង់រាជធានី ហើយរត់គេចខ្លួន។
Verse 22
हतयोधस्ततो राजन् क्षीणकोशश्व भूमिप: । दिवोदास: पुरी त्यक्त्वा पलायनपरो5भवत्,महाराज! काशिनरेशने एक हजार दिन (दो वर्ष नौ महीने दस दिन)-तक शत्रुओंके साथ युद्ध किया। इस युद्धमें दिवोदासके बहुत-से सिपाही और हाथी, घोड़े आदि वाहन मारे गये। उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशामें पड़ गये। अन्तमें अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ព្រះរាជា អ្នកគ្រប់គ្រងនោះ—ទ័ពត្រូវសម្លាប់ និងឃ្លាំងទ្រព្យអស់សព្វ—ទិវោទាសបានបោះបង់នគររបស់ទ្រង់ ហើយបែរទៅចិត្តលើការរត់គេច»។
Verse 23
गत्वा55श्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमत: । जगाम शरणं राजा कृताञज्जलिररिंदम,शत्रुदमन नरेश! बुद्धिमान् भरद्वाजके रमणीय आश्रमपर जाकर राजा दिवोदास हाथ जोड़े हुए वहाँ मुनिकी शरणमें गये
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ព្រះរាជា—អ្នកបង្ក្រាបសត្រូវ—បានទៅដល់អាស្រមដ៏រីករាយនៃឥសីភរទ្វាជៈ អ្នកមានប្រាជ្ញា ហើយបានចូលសុំជ្រកកោន ដោយប្រណម្យដៃជាប់គ្នា ក្នុងកិរិយាគោរព។
Verse 24
तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठ: पुत्रो बृहस्पते: । पुरोधा: शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम्,बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े शीलवान् और दिवोदासके पुरोहित थे। उन्होंने राजाको उपस्थित देखकर पूछा--“नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो। तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा उसे मैं करूँगा। इसके लिये मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होगा”
ភរទ្វាជៈ—កូនច្បងនៃព្រះព្រហស្បតិ និងជាពុរោហិតរបស់ព្រះរាជា ដ៏មានសីលធម៌—បានមានព្រះបន្ទូលទៅកាន់ព្រះមហាក្សត្រ ទិវោទាស។ ពេលឃើញព្រះរាជាមកដល់ គាត់សួរដោយក្តីគោរពថា ព្រះអម្ចាស់មកទីនេះដោយហេតុអ្វី សូមប្រាប់ដំណឹងទាំងអស់ ហើយអ្វីដែលព្រះរាជាប្រាថ្នាសម្រាប់សុខសាន្ត គាត់នឹងធ្វើ ដោយគ្មានចិត្តលាក់លៀម។
Verse 25
किमागमनकृत्य ते सर्व प्रब्रूहि मे नूप । यत् ते प्रियं तत् करिष्ये न मे5त्रास्ति विचारणा,बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े शीलवान् और दिवोदासके पुरोहित थे। उन्होंने राजाको उपस्थित देखकर पूछा--“नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो। तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा उसे मैं करूँगा। इसके लिये मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होगा”
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះរាជា សូមប្រាប់ខ្ញុំឲ្យពេញលេញថា ព្រះអម្ចាស់មកទីនេះដោយកិច្ចការអ្វី។ សូមនិយាយលម្អិតទាំងអស់។ អ្វីដែលព្រះអម្ចាស់ស្រឡាញ់—កិច្ចការណាដែលព្រះអម្ចាស់ប្រាថ្នា—ខ្ញុំនឹងធ្វើឲ្យ។ ក្នុងរឿងនេះ ចិត្តខ្ញុំគ្មានការស្ទាក់ស្ទើរ ឬសង្ស័យឡើយ»។
Verse 26
राजोवाच भगवन् वैतहत्यैमें युद्धे वंश: प्रणाशित: । अहमेकः: परिद्यूनो भवन्तं शरणं गत:,राजाने कहा--भगवन! संग्राममें वीतहव्यके पुत्रोंने मेरे कुलका विनाश कर डाला। मैं अकेला ही अत्यन्त संतप्त हो आपकी शरणमें आया हूँ
ព្រះរាជាមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះគ្រូដ៏គួរគោរព ក្នុងសង្គ្រាមនេះ កូនៗរបស់ វីតហវ្យៈ បានបំផ្លាញវង្សកុលរបស់ខ្ញុំ។ ខ្ញុំតែម្នាក់ឯង សោកស្តាយយ៉ាងខ្លាំង បានមកសុំជ្រកកោនក្រោមព្រះអង្គ»។
Verse 27
शिष्यस्नेहेन भगवंस्त्वं मां रक्षितुमर्हसि । एकशेष: कृतो वंशो मम तै: पापकर्मभि:,भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ और आप मेरे गुरु हैं। शिष्यके प्रति गुरुका जो सहज स्नेह होता है उसीके द्वारा आप मेरी रक्षा कीजिये। उन पापकर्मियोंने मेरे कुलमें केवल मुझ एक ही व्यक्तिको शेष छोड़ा है
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះអង្គដ៏គួរគោរព ដោយសេចក្តីស្នេហាធម្មជាតិដែលគ្រូមានចំពោះសិស្ស សូមព្រះអង្គការពារខ្ញុំផង។ ពួកអ្នកប្រព្រឹត្តអំពើបាបទាំងនោះ បានធ្វើឲ្យវង្សកុលរបស់ខ្ញុំសល់តែអ្នករស់រានម្នាក់គត់—គឺខ្ញុំ»។
Verse 28
तमुवाच महाभागो भरद्वाज: प्रतापवान् । न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम्,यह सुनकर प्रतापी महर्षि महाभाग भरद्वाजने कहा--'सुदेवनन्दन! तुम न डरो, न डरो। तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये
ព្រះឥសីមហាបុណ្យ មានតេជៈដ៏ខ្លាំង គឺភារទ្វាជ បានមានព្រះវាចាដល់គាត់ថា៖ «កុំភ័យ កុំភ័យឡើយ ឱ កូនរបស់សុទេវៈ។ សូមឲ្យភាពភ័យរបស់អ្នករលាយបាត់ទៅ»។
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतज्ञका संवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अहमिष्टिं करिष्यामि पुत्रार्थ ते विशाम्पते | वीतहव्यसहस््राणि येन त्वं प्रहरिष्यसि “प्रजानाथ! मैं तुम्हारी पुत्र-प्राप्तिके लिये एक यज्ञ करूँगा जिसकी सहायतासे तुम हजारों वीतहव्य-पुत्रोंकी मार गिराओगे”
ឥន្ទ្រៈ (សក្រក្សត្រ) បានមានព្រះវាចាថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន! ដើម្បីឲ្យអ្នកបានកូនប្រុស ខ្ញុំនឹងធ្វើពិធីយញ្ញ (អិષ્ટិ) មួយសម្រាប់អ្នក។ ដោយអានុភាពនៃពិធីនោះ អ្នកនឹងអាចវាយប្រហារបំផ្លាញកូនប្រុសរបស់វីតហវ្យា រាប់ពាន់នាក់បាន»។
Verse 30
तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् । अथास्य तनयो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुतः,तब ऋषिने राजासे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। इससे उनके प्रतर्दन नामसे विख्यात पुत्र हुआ महाराज! इसी तरह मैंने गृत्समदके वंशका भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। अब और क्या पूछ रहे हो? ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि वीतहव्योपाख्यानं नाम त्रिंशोडध्याय:
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «បន្ទាប់មក ឥសីបានធ្វើពិធីអិષ્ટិ ដើម្បីឲ្យគាត់បានកូនប្រុស។ មិនយូរប៉ុន្មាន កូនប្រុសមួយបានកើតឡើង មានឈ្មោះល្បីថា ប្រតរទន។ ដូច្នេះ ខ្ញុំបានពណ៌នាការពង្រីកវង្សត្រកូលរបស់គ្រឹតសមទៈដោយលម្អិតរួចហើយ។ តើអ្នកនៅចង់សួរអ្វីទៀត?»
Verse 31
स जातमात्रो ववृधे समा: सद्यस्त्रयोदश । वेदं चापि जगौ कृत्स्नं धनुर्वेदे च भारत,भारत! वह पैदा होते ही इतना बढ़ गया कि तुरंत तेरह वर्षकी अवस्थाका-सा दिखायी देने लगा। उसी समय उसने अपने मुखसे सम्पूर्ण वेद और धनुर्वेदका गान किया
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «កុមារនោះ ទើបតែកើតមក ក៏លូតលាស់ភ្លាមៗ ដូចជាមានអាយុដល់ដប់បីឆ្នាំ។ នៅក្នុងវេលានោះឯង គាត់បានសូត្រព្រះវេទទាំងមូល ហើយសូត្រវិជ្ជាធនុរវេទ (វិទ្យាព្រួញធ្នូ) ផងដែរ ឱ ភារតៈ»។
Verse 32
योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता । तेजो लोक्यं स संगृहा तस्मिन् देशे समाविशत्,बुद्धिमान् भरद्वाजमुनिने उसे योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया और उसके शरीरमें सम्पूर्ण जगत्का तेज भर दिया
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ដោយប្រាជ្ញារបស់ឥសីភារទ្វាជ គាត់ត្រូវបានបំពេញដោយសមាធិយោគ; ហើយបានប្រមូលយកពន្លឺតេជៈដែលលាតសន្ធឹងទូទាំងលោក មកបញ្ចូលនៅក្នុងទីនោះ ដោយពោរពេញទៅដោយសោភ័ណភាពសកល»។
Verse 33
ततः स कवची धन््वी स्तूयमान: सुरभि: । वन्दिभिर्वन्द्यमानश्न बभौ सूर्य इवोदित:,तदनन्तर राजकुमार प्रतर्दनने अपने शरीरपर कवच धारण किया और हाथमें धनुष ले लिया। उस समय देवर्षिगण उसका यश गाने लगे। वन्दीजनोंसे वन्दित हो वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा
បន្ទាប់មក ព្រះរាជកុមារនោះ ពាក់អាវក្រោះ និងកាន់ធ្នូ បានឈានទៅមុខទាំងមានសូរសរសើរ។ ពេលព្រះឥសីទេវៈច្រៀងសរសើរកិត្តិយសរបស់ទ្រង់ ហើយពួកកវីវន្ទីថ្វាយការគោរព ទ្រង់ភ្លឺរលោងដូចព្រះអាទិត្យទើបរះ—រូបភាពនៃវីរភាពដែលត្រូវបានប្រកាសជាសាធារណៈ និងសេចក្តីប្តេជ្ញាដ៏ធម៌ដែលបង្ហាញច្បាស់។
Verse 34
स रथी बद्धनिस्त्रिंशो बभौ दीप्त इवानल: । प्रययौ स धनुर्धुन्चन् खड्गी चर्मी शरासनी,वह रथपर बैठ गया और कमरमें तलवार बाँधकर प्रज्वलित अग्निके समान उद्धासित होने लगा। ढाल, तलवार और धनुषसे सम्पन्न हो वह धनुषकी टंकार करता हुआ आगे बढ़ा
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ទ្រង់ឡើងលើរថសង្គ្រាម ហើយចងដាវនៅចង្កេះ ក៏ភ្លឺរលោងដូចភ្លើងកំពុងឆេះ។ មានដាវ និងខែល ហើយកាន់ធ្នូ ទ្រង់ឈានទៅមុខ ឲ្យធ្នូបន្លឺសូរ—ដំណើរទៅមុខដោយសេចក្តីប្តេជ្ញាដ៏កាចសាហាវរបស់យុទ្ធជន ដែលត្រៀមធ្វើតាមធម៌ដែលខ្លួនបានជ្រើសរើស។
Verse 35
त॑ दृष्टवा परमं हर्ष सुदेवतनयो ययौ । मेने च मनसा दग्धान् वैतहव्यान् स पार्थिव:,उसे देखकर सुदेव-पुत्र राजा दिवोदासको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मन-ही-मन वीतहव्यके पुत्रोंको अपने पुत्रके तेजसे दग्ध हुआ ही समझा
ឃើញទិដ្ឋភាពនោះ ព្រះបាទទិវោទាស ព្រះរាជបុត្ររបស់សុទេវៈ មានព្រះហឫទ័យរីករាយយ៉ាងខ្លាំង ហើយបានចាកចេញដោយចិត្តលើកទឹកចិត្ត។ ក្នុងព្រះមនសិការ ទ្រង់គិតថា កូនៗរបស់វីតហវ្យា បានត្រូវពន្លឺ និងកម្លាំងរបស់ព្រះរាជបុត្ររបស់ទ្រង់ ដុតឲ្យរលាយរួចហើយ។
Verse 36
ततो5सौ यौवराज्ये च स्थापयित्वा प्रतर्दनम् कृतकृत्यं तदा55त्मानं स राजा अभ्यनन्दत,तत्पश्चात् राजा दिवोदासने प्रतर्दनको युवराजके पदपर स्थापित करके अपने आपको कृतकृत्य माना और बड़े आनन्दका अनुभव किया
បន្ទាប់មក ព្រះបាទនោះបានតែងតាំងប្រតរទនៈជាយុវរាជ ហើយទ្រង់មានព្រះហឫទ័យថា កិច្ចការរបស់ទ្រង់បានសម្រេចរួចរាល់។ ទ្រង់រីករាយនៅក្នុងព្រះហឫទ័យ—ពេញចិត្តថា បានធានាការស្នងរាជ្យត្រឹមត្រូវ និងស្ថិរភាពនៃនគរ។
Verse 37
ततस्तु वैतहव्यानां वधाय स महीपति: । पुत्र प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम्,इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा
បន្ទាប់មក ព្រះបាទនោះមានព្រះបំណងសម្លាប់ពួកវៃតហវ្យា ក៏បានផ្ញើព្រះរាជបុត្រ ប្រតរទនៈ—អ្នកបង្ក្រាបសត្រូវ—ឲ្យទៅបំផ្លាញពួកគេ។ ព្រឹត្តិការណ៍នេះបង្ហាញថា នយោបាយរាជវង្សអាចក្លាយជាអំពើហិង្សាដែលស្នងតាមជំនាន់បាន ដោយឪពុកអនុញ្ញាតឲ្យកូនប្រុសដឹកនាំសង្គ្រាមសងសឹក។
Verse 38
सरथ: स तु संतीर्य गज्जामाशु पराक्रमी । प्रययौ वीतहव्यानां पुरी परपुरज्जय:
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ វីរបុរសដ៏ខ្លាំងក្លា អ្នកឈ្នះទីក្រុងសត្រូវនានា បានបើករទេះឆ្លងទន្លេ «គជ្ជា» ដោយរហ័ស ហើយចេញដំណើរទៅកាន់រាជធានីរបស់វីតហវ្យា។
Verse 39
पिताकी आज्ञा पाकर वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला पराक्रमी वीर शीघ्र ही रथसहित गंगापार करके वीतहतव्यपुत्रोंकी राजधानीकी ओर चल दिया ।। वैतहव्यास्तु संश्रुत्य रथघोष॑ समुद्धतम् । निर्ययुर्नगराकारै रथै: पररथारुजै:,उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ព្រះរាជកុមារវៃតហវ្យា បានឮសំឡេងគ្រហឹមគ្រាំដ៏ខ្លាំងនៃរទេះរបស់គាត់ ក៏ចេញពីទីក្រុងឡើងលើរទេះធំៗដូចជាទីក្រុង ស្លៀកពាក់អាវក្រោះពេញលេញ ជាវីរបុរសដូចសត្វសិង្ហា មានជំនាញក្នុងយុទ្ធវិធីចម្លែក និងអាចបំបែករទេះសត្រូវ។ ពួកគេលើកធ្នូ ហើយវាយប្រហារលើប្រតរទន ដោយបាញ់ព្រួញជាព្យុះ។
Verse 40
निष्क्रम्य ते नरव्याप्रा दंशिताश्रित्रयोधिन: । प्रतर्दन॑ समाजग्मु: शरवर्षैरुदायुधा:,उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ពួកនោះបានចេញមក—ជាបុរសរវល់នឹងសង្គ្រាម ស្លៀកអាវក្រោះរឹងមាំ និងជំនាញក្នុងការប្រយុទ្ធលើរទេះ—ហើយបានចូលទៅប្រឆាំងប្រតរទន។ ពួកគេលើកអាវុធឡើង ហើយវាយប្រហារគាត់ដោយព្រួញជាព្យុះ។
Verse 41
शस्त्रैश्न विविधाकारै रथौचैश्व युधिष्ठिर । अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदा:,युधिष्ठि!! जैसे बादल हिमालयपर जल बरसाते हैं, उसी प्रकार हैहयराजकुमारोंने रथसमूहोंद्वारा आकर राजा प्रतर्दनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ យុធិષ્ઠិរ! ដោយអាវុធនានាប្រភេទ និងដោយកងរទេះជាច្រើន ពួកគេបានបាញ់អាវុធដូចភ្លៀងលើព្រះរាជា—ដូចពពកភ្លៀងដែលបង្អួតទឹកលើហិមវាន (ហិមាល័យ) ដូច្នោះដែរ»។
Verse 42
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दन: । जघान तान् महातेजा वज्जानलसमै: शरै:,तब महा तेजस्वी राजा प्रतर्दनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका निवारण करके वज्र और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे उन सबको मार डाला
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ព្រះរាជាប្រតរទន អ្នកមានពន្លឺអស្ចារ្យ បានប្រើអាវុធរបស់ព្រះអង្គទប់ស្កាត់អាវុធសត្រូវទាំងឡាយ; បន្ទាប់មក ព្រះអង្គបានបាញ់ព្រួញភ្លឺចែងចាំងដូចវជ្រ និងអគ្គី ដើម្បីវាយសម្លាប់ពួកគេ។
Verse 43
कृत्तोत्तमाड़ास्ते राजन् भल्लै: शतसहस्रशः । अपततन् रुधिरार्द्राज़ा निकृत्ता इव किंशुका:,राजन! भल्लोंकी मारसे उनके मस्तकोंके सैकड़ों और हजारों टुकड़े हो गये थे। उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये और वे कटे हुए पलाशके वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़े
Bhishma said: “O King, struck by broad-headed arrows, their heads were hewn into hundreds and thousands of pieces. With limbs drenched in blood, they fell to the earth like kiṃśuka (palāśa) trees cut down.”
Verse 44
हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्य: सुतेष्वथ । प्राद्रवन्नगरं हित्वा भूगोराश्रममप्युत,उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये
Bhishma said: When all those sons had been slain, King Vītahavya—overwhelmed by the destruction of his lineage—abandoned his city and fled to the hermitage of the sage Bhṛgu. The episode underscores how the collapse of worldly supports drives a ruler to seek refuge in ascetic sanctuaries, turning from royal power toward spiritual protection and counsel.
Verse 45
ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिप: । अभयं च ददौ तस्मै राजे राजन् भगुस्तदा,राजन! वहाँ नरेश्वर वीतहव्यने महर्षि भूगुकी शरण ली। तब भूगुने राजाको अभयदान दे दिया
Bhīṣma said: King Vītahavya sought refuge with the sage Bhṛgu. Then Bhṛgu granted the king fearlessness (protection), O King—affirming the ethical duty to shelter one who has surrendered, even when he is a ruler in distress.
Verse 46
अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत् प्रतर्दन: । स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजो<ब्रवीत्,इतनेहीमें उनके पीछे लगा हुआ दिवोदासकुमार प्रतर्दन भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। आश्रममें पहुँचकर उसने इस प्रकार कहा--
Bhishma said: Then, close on their heels, Pratardana quickly arrived there. Reaching the hermitage, the son of Divodasa spoke as follows—setting the stage for the next exchange in which conduct, restraint, and right action are to be clarified.
Verse 47
भो भो: केजत्राश्रमे सन्ति भूगो: शिष्या महात्मन: । द्रष्टमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति,भाइयो! इस आश्रममें महात्मा भृगुके शिष्य कौन-कौन हैं? मैं महर्षिका दर्शन करना चाहता हूँ। आपलोग उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दें
Bhishma said: “Ho there, ho there! Who among you are the disciples of the great-souled Bhrigu in this hermitage? I wish to see the sage. Please inform him of my arrival.”
Verse 48
सतं विदित्वा तु भगुर्निश्चक्रामाश्रमात् तदा । पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम्
ភីष្មបាននិយាយ៖ ពេលភគុបានស្គាល់ថា ព្រះអង្គនោះជាបុរសមានសីលធម៌ពិតប្រាកដ នោះគាត់បានចេញពីអាស្រាមរបស់ខ្លួន។ បន្ទាប់មក តាមពិធីការត្រឹមត្រូវ និងមារយាទសមរម្យ គាត់បានគោរពបូជាស្តេចដ៏ប្រសើរបំផុត ដោយបង្ហាញថា ធម៌មិនត្រឹមតែស្ថិតនៅក្នុងតបស្យា ប៉ុន្តែស្ថិតនៅក្នុងការគោរពប្រកបដោយសុចរិតចំពោះអ្នកគួរគោរពផងដែរ។
Verse 49
प्रतर्दनको आया जान भृगुजी आश्रमसे निकले। उन्होंने नृपश्रेष्ठ प्रतर्दनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ।। उवाच चैन राजेन्द्र कि कार्य ब्रूहि पार्थिव | स चोवाच नृपस्तस्मै यदागमनकारणम्,और इस प्रकार पूछा--'राजेन्द्र! पृथ्वीनाथ! मुझसे आपका क्या काम है, बताइये।' तब राजाने उनसे अपने आगमनका जो कारण था, उसे इस प्रकार बताया
ភೃគុបានដឹងថា ស្តេចប្រតរទនបានមកដល់ ហើយគាត់បានចេញពីអាស្រាម។ គាត់បានស្វាគមន៍ និងគោរពបូជាស្តេចដ៏ប្រសើរនោះតាមវិធីការត្រឹមត្រូវ។ បន្ទាប់មក ភೃគុបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃស្តេចទាំងឡាយ ឱ ព្រះនាយកផែនដី ចូរប្រាប់ខ្ញុំ—តើព្រះអង្គមកទីនេះដោយហេតុអ្វី?» នោះស្តេចបានពន្យល់ហេតុផលនៃការមកដល់របស់ព្រះអង្គ។
Verse 50
राजोवाच अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् । तस्य पुन्रैहि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंश: प्रणाशित:,राजाने कहा--ब्रह्मन! राजा वीतहव्यको आप यहाँसे बाहर निकाल दीजिये। विप्रवर! इनके पुत्रोंने मेरे सम्पूर्ण कुलका विनाश कर डाला है
ស្តេចបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះព្រាហ្មណ៍ សូមបណ្តេញស្តេចវីតហវ្យនេះចេញពីទីនេះ។ ឱ ព្រាហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរ កូនប្រុសរបស់គាត់បានបំផ្លាញវង្សត្រកូលទាំងមូលរបស់ខ្ញុំ។»
Verse 51
उत्सादितश्न विषय: काशीनां रत्नसंचय: । एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया
ភីष្មបាននិយាយ៖ «ខ្ញុំបានបំផ្លាញដែនដីរបស់គាត់ ហើយយកយសសម្បត្តិដែលស្តុកស្តម្ភរបស់កាសីទាំងអស់។ ហើយចំពោះបុរសនេះ ដែលមោទនភាពដោយកម្លាំងរបស់ខ្លួន ខ្ញុំបានសម្លាប់កូនប្រុសរបស់គាត់មួយរយនាក់។»
Verse 52
तमुवाच कृपाविष्टो भृगुर्थर्मभूतां वर:
ដោយចិត្តពោរពេញដោយមេត្តាករុណា ព្រះឥសីភೃគុ—ជាអ្នកឈរលើធម៌ដ៏ប្រសើរបំផុត—បាននិយាយទៅកាន់គាត់ ដើម្បីដាក់មូលដ្ឋាននៃសីលធម៌សម្រាប់អ្វីដែលនឹងតាមមក។
Verse 53
एतत् तु वचन श्रुत्वा भगोस्तथ्यं प्रतर्दन:,महर्षि भूगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला--“भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है
ភីෂ្មៈបាននិយាយ៖ ព្រះបាទប្រតារទនៈ បានស្តាប់ពាក្យពិតប្រាកដទាំងនោះហើយ មានសេចក្តីរីករាយយ៉ាងខ្លាំង។ ដោយក្តីគោរព គាត់បានប៉ះជើងរបស់មហាឥសីទាំងឡាយយ៉ាងទន់ភ្លន់ ហើយនិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអង្គដ៏មានពរ! បើពិតជាយ៉ាងនេះមែន នោះគោលបំណងរបស់ខ្ញុំបានសម្រេចហើយ—គ្មានសង្ស័យឡើយ»។
Verse 54
पादावुपस्मृश्य शनै: प्रह्ृष्टो वाक््यमब्रवीत् | एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशय:,महर्षि भूगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला--“भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है
ដោយបានប៉ះជើង (របស់ឥសី) យ៉ាងទន់ភ្លន់ ហើយពោរពេញដោយសេចក្តីរីករាយ គាត់បាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអង្គដ៏មានពរ! បើពិតជាយ៉ាងនេះមែន នោះខ្ញុំបានសម្រេចអ្វីដែលគួរសម្រេចហើយ—គ្មានសង្ស័យឡើយ»។
Verse 55
य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया । अनुजानीहि मां ब्रह्मन् ध्यायस्व च शिवेन माम्,“क्योंकि इन राजाको मैंने अपने पराक्रमसे अपनी जाति त्याग देनेके लिये विवश कर दिया। ब्रह्मन! मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये और मेरा कल्याण-चिन्तन कीजिये
ភីෂ្មៈបាននិយាយ៖ «ព្រះរាជានេះ ខ្ញុំបានបង្ខំដោយអំណាចវីរភាពរបស់ខ្ញុំឲ្យបោះបង់ស្ថានភាព និងវង្សត្រកូលដ៏សមរម្យរបស់គាត់។ ឱ ព្រះព្រាហ្មណ៍ សូមអនុញ្ញាតឲ្យខ្ញុំចាកចេញ ហើយសូមគិតអំពីសេចក្តីសុខមង្គលរបស់ខ្ញុំ—សូមរំលឹកខ្ញុំដោយព្រះពរ»។
Verse 56
त्याजितो हि मया जातिमेष राजा भृगूद्धह | ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो ययौ राजा प्रतर्दन:
ភីෂ្មៈបាននិយាយ៖ «ពិតប្រាកដណាស់ ខ្ញុំបានបង្ខំព្រះរាជានេះ—ព្រះបាទប្រតារទនៈ អ្នកលេចធ្លោក្នុងចំណោមពួកភ្រឹគុ—ឲ្យបោះបង់អត្តសញ្ញាណវណ្ណៈរបស់គាត់។ បន្ទាប់មក ដោយបានទទួលការអនុញ្ញាតពីគាត់ ព្រះបាទប្រតារទនៈក៏ចាកចេញទៅ»។
Verse 57
भूगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गत:
ភីෂ្មៈបាននិយាយ៖ «ដោយគ្រាន់តែគោរពតាមពាក្យរបស់ភ្រឹគុ គាត់ក៏បានឈានដល់ស្ថានភាពជាព្រះព្រាហ្មឥសី (Brahmarṣi) ផងដែរ»។
Verse 58
तस्य गृत्समद: पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापर:
ភីष្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «កូនប្រុសរបស់គាត់ ឈ្មោះ គ្រឹត្សមដៈ មានរូបសម្បត្តិដូចជា ឥន្ទ្រៈមួយទៀត—ភ្លឺរលោង និងអស្ចារ្យក្នុងទម្រង់»។
Verse 59
ऋग्गवेदे वर्तते चाग्रया श्रुतिर्यस्थ महात्मन:,ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है। राजन! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्सममदका बड़ा सम्मान करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे
ភីष្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ក្នុងឥគ្វេទៈ មានស្រ៊ុតិដ៏លេចធ្លោ និងជាស្រ៊ុតិដំបូង ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងមហាត្មៈនោះ។ ឱ ព្រះរាជា! នៅទីនោះ ព្រហ្មណ៍ទាំងឡាយគោរពគ្រឹត្សមដៈ អ្នកឃើញ (ṛṣi) យ៉ាងខ្ពង់ខ្ពស់; ព្រហ្មឫសិ គ្រឹត្សមដៈ មានតេជៈវិញ្ញាណភ្លឺចែងចាំង និងឈរជាប់ក្នុងវ្រតៈព្រហ្មចារី»។
Verse 60
यत्र गृत्समदो राजन ब्राह्मणैः स महीयते । स ब्रह्मचारी विप्रर्षि: श्रीमान् गृत्समदो5भवत्,ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है। राजन! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्सममदका बड़ा सम्मान करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे
ភីष្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រះរាជា! នៅទីដែលព្រហ្មណ៍ទាំងឡាយលើកតម្កើងគ្រឹត្សមដៈ នោះ គ្រឹត្សមដៈ អ្នកប្រាជ្ញព្រហ្មណ៍ (viprarṣi) ជាព្រហ្មចារី មានសិរីរុងរឿង និងកិត្តិយស»។
Verse 61
पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद् द्विज: । वर्चा: सुचेतस: पुत्रो विहव्यस्तस्य चात्मज:,गृत्समदके पुत्र सुचेता नामके ब्राह्मण हुए। सुचेताके पुत्र वर्चा और वचकि पुत्र विह॒व्य हुए
ភីष្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «គ្រឹត្សមដៈក៏មានកូនប្រុសម្នាក់ដែរ ជាទ្វិជ (dvija) ឈ្មោះ សុចេតា។ កូនប្រុសរបស់សុចេតា គឺ វរចា ហើយកូនប្រុសរបស់វរចា គឺ វិហវ្យ»។
Verse 62
विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मज: । वितत्यस्य सुतः सत्य: संतः सत्यस्य चात्मज:,विहव्यके पुत्रका नाम वितत्य था। वितत्यके पुत्र सत्य और सत्यके पुत्र सन्त हुए
ភីष្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «វិហវ្យមានកូនប្រុសឈ្មោះ វិតត្យ។ វិតត្យមានកូនប្រុសឈ្មោះ សត្យ។ ហើយសត្យមានកូនប្រុសឈ្មោះ សន្ត។ ដូច្នេះពូជពង្សត្រូវបានរៀបរាប់តាមលំដាប់ ដើម្បីរក្សាការចងចាំនៃការស្នងតំណែងដោយធម៌ និងការបន្តរបស់បុព្វបុរស»។
Verse 63
श्रवास्तस्य सुतश्चर्षि: श्रवसश्चा भवत् तम: । तमसश्न प्रकाशो5भूत् तनयो द्विजसत्तम: । प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतां वर:,सन्तके पुत्र महर्षि श्रवा, श्रवाके तम और तमके पुत्र द्विजश्रेष्ठ प्रकाश हुए। प्रकाशका पुत्र विजयशीलोंमें श्रेष्ठ वागिन्द्र था
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពីគាត់បានកើតឥសីមួយឈ្មោះ ស្រាវា; ពីស្រាវា បានកើត តមៈ។ ពីតមៈ បានកើត ប្រាកាសៈ ជាព្រាហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរបំផុត។ ហើយពីប្រាកាសៈ បានកើត វាគិន្ទ្រៈ ជាអ្នកលេចធ្លោក្នុងចំណោមអ្នកឈ្នះទាំងឡាយ»។
Verse 64
तस्यात्मजश्न प्रमितिर्वेदवेदाड़पारग: । घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत,वागिन्द्रके पुत्र प्रमेति हुए जो वेदों और वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे। प्रमितिके घृताची अप्सरासे रुरुनामक पुत्र हुआ
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «កូនប្រុសរបស់គាត់គឺ ប្រាមិតិ ជាបណ្ឌិតដែលឈានដល់ចុងបញ្ចប់នៃវេដ និងវេដាង្គទាំងឡាយ។ ពីប្រាមិតិ និងអប្សរា ឃ្រឹតាចី បានកើតកូនប្រុសមួយឈ្មោះ រុរុ»។
Verse 65
प्रमद्वरायां तु रुरो: पुत्र: समुदपद्यत । शुनको नाम विदप्रर्षियस्य पुत्रो5थ शौनक:,रुससे प्रमद्वराके गर्भसे ब्रह्मर्षि शुनकका जन्म हुआ, जिनके पुत्र शौनक मुनि हैं
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពី ប្រាមទ្វរា រុរុ បានបង្កើតកូនប្រុសមួយឈ្មោះ សុនកៈ។ ហើយពីឥសី សុនកៈ នោះ បានកើត (សាយសន្តាន) សោនកៈ»។
Verse 66
एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिप: । भृगो: प्रसादादू राजेन्द्र क्षत्रिय: क्षत्रियर्षभ,राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगुके प्रसादसे ब्राह्मण हो गये
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ដូច្នេះ ព្រះមហាក្សត្រ វីតហវ្យៈ បានឈានដល់ស្ថានភាពជាព្រាហ្មណ៍។ ឱ ព្រះរាជាធិរាជ! ទោះជាគាត់ជាក្សត្រិយៈ—ជាវីរបុរសលេចធ្លោក្នុងចំណោមក្សត្រិយៈ—ដោយព្រះគុណ និងព្រះអនុគ្រោះរបស់ ភ្រឹគុ គាត់បានក្លាយជាព្រាហ្មណ៍»។
Verse 67
तथैव कथितो वंशो मया गार्त्समदस्तव | विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि
ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ដូច្នេះ ឱ អ្នកជាចៅចៅនៃ ការត្សមដៈ ខ្ញុំបានរៀបរាប់វង្សត្រកូលរបស់អ្នកដោយលម្អិតហើយ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ។ តើអ្នកចង់សួរអ្វីបន្ថែមទៀត?»
Verse 513
अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृण: पितु: । इतना ही नहीं, उनके पुत्रोंने काशिप्रान्तका सारा राज्य उजाड़ डाला और रत्नोंका संग्रह लूट लिया है। बलके घमंडमें भरे हुए इन राजाके सौ पुत्रोंको तो मैंने मार डाला; अब केवल ये ही रह गये हैं। इस समय इनका भी वध करके मैं पिताके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा?
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ថ្ងៃនេះ បើខ្ញុំសម្លាប់គាត់ ខ្ញុំនឹងរួចផុតពីបំណុលចំពោះឪពុករបស់ខ្ញុំជាចុងក្រោយ។ មិនត្រឹមតែប៉ុណ្ណោះទេ—កូនប្រុសរបស់គាត់បានបំផ្លាញអាណាចក្រទាំងមូលនៃដែនកាសី ហើយបានលួចយកទ្រព្យរតនាដែលសន្សំទុក។ ដោយអំនួត ខ្ញុំបានសម្លាប់កូនប្រុសរបស់ស្តេចនោះមួយរយរួចហើយ; នៅសល់តែពួកនេះប៉ុណ្ណោះ។ បើឥឡូវខ្ញុំសម្លាប់ពួកនេះទៀត តើខ្ញុំនឹងរួចពីកាតព្វកិច្ចចំពោះឪពុករបស់ខ្ញុំឬ?»
Verse 523
नेहास्ति क्षत्रिय: कश्रित् सर्वे हीमे द्विजातय: । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भूगुने दयासे द्रवित होकर उनसे कहा--'राजन्! यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है। ये सब-के-सब ब्राह्मण हैं
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! នៅទីនេះមិនមានក្សត្រិយៈសោះ។ អ្នកទាំងអស់ដែលនៅមុខព្រះអង្គ គឺជាទ្វិជៈ—ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងអស់»។
Verse 563
यथागतं महाराज मुक््त्वा विषमिवोरग: । भृगुवंशी महर्षे! मैंने इन राजासे अपनी जातिका त्याग करवा दिया।” महाराज! तदनन्तर महर्षिकी आज्ञा लेकर राजा प्रतर्दन जैसे साँप अपने विषको त्याग देता है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर जैसे आया था वैसे लौट गया
ភីෂ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! បន្ទាប់ពីទទួលអនុញ្ញាតពីមហាឥសី ស្តេចប្រតរទនបានត្រឡប់ទៅដូចដែលបានមក—បានបោះចោលកំហឹង ដូចពស់បោះពុលចេញ។ ឱ មហាឥសីនៃវង្សភೃគុ! ខ្ញុំបានធ្វើឲ្យស្តេចនេះបោះបង់អំនួតលើជាតិវង្សរបស់ខ្លួន»។
Verse 573
वीतहव्यो महाराज ब्रह्म॒वादित्वमेव च । नरेश्वर! इस प्रकार राजा वीतहव्य भृूगुजीके कथनमात्रसे ब्रह्मर्षि एवं ब्रह्मवादी हो गये
ភីષ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! ដូច្នេះ ស្តេចវីតហវ្យ បានក្លាយជាព្រះឥសីប្រាហ្ម (Brahmarṣi) ហើយជាអ្នកបកស្រាយព្រះព្រហ្ម (Brahman) ដោយសារព្រះបន្ទូលតែមួយរបស់ភೃគុមុនី»។
Verse 586
शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निंगृहीत: किलाभवत् | उनके पुत्रो गृत्समद हुए जो रूपमें दूसरे इन्द्रके समान थे। कहते हैं, किसी समय दैत्योंने उन्हें यह कहते हुए पकड़ लिया था कि “तुम इन्द्र हो"
ភីષ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «គេនិយាយថា ម្តងមួយ គាត់ត្រូវពួកដានវៈ (Daityas) ចាប់ខ្លួន ដោយចោទថា ‘អ្នកគឺសក្រណ៍—ឥន្ទ្រ’»។
He asks which royal duty is greatest among all obligations and what conduct allows a king to secure welfare in both this world and the next.
To regularly honor reputable and senior learned brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful engagement, appropriate material support, salutations, and protective governance, treating their well-being as integral to the realm’s stability.
Yes. It advises that disparagement of dvijas should not be listened to; one should remain silent and withdraw, emphasizing disciplined speech and avoidance of factional hostility as part of ethical state maintenance.