
Svargārohaṇa-parva Adhyāya 5 — Karmaphala-Nirdeśa and Phalāśruti (कर्मफलनिर्देशः फलश्रुतिश्च)
Upa-parva: Svargārohaṇa-upākhyāna (Karmaphala-nirdeśa)
The chapter opens with Janamejaya enumerating celebrated warriors and kings (e.g., Bhīṣma, Droṇa, Dhṛtarāṣṭra, Virāṭa, Drupada, Śaṅkha, Uttara, Jayadratha, Karṇa’s sons, Ghaṭotkaca and others) and asking how long they remained in heaven, whether their station was permanent, and what final destiny they attained. Sauti notes that, with Vyāsa’s permission, the account proceeds through Vaiśaṃpāyana. Vaiśaṃpāyana states a general principle: all beings must reach an end-state corresponding to karma, and then details specific integrations—Bhīṣma with the Vasus; Droṇa entering Bṛhaspati; Kṛtavarmā among the Maruts; Pradyumna with Sanatkumāra; Dhṛtarāṣṭra attaining Kubera’s difficult-to-reach realms; Pāṇḍu going to Mahendra’s abode; several rulers entering the Viśvedevas; Abhimanyu identified with Varcā, Soma’s son, returning to Soma; Karṇa entering Ravi (the Sun); Śakuni reaching Dvāpara; Dhṛṣṭadyumna entering Pāvaka (Fire); Dhṛtarāṣṭra’s sons ascending after being ‘weapon-purified’; and Yudhiṣṭhira and Vidura (kṣattā) entering Dharma. The chapter then concludes the narrational frame of the sarpasatra: Janamejaya is astonished; the rite ends; Āstīka is pleased; priests are rewarded; and the epic’s sanctity is proclaimed through extensive phalāśruti, asserting Mahābhārata’s completeness across dharma, artha, kāma, and mokṣa and the merit of recitation, study, and teaching.
Chapter Arc: जनमेजय का प्रश्न उठता है—भीष्म, द्रोण, कर्ण, शकुनि, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच और अन्य असंख्य वीर, जो युद्ध में गिरे, वे अंततः कहाँ गए और किस-किन मूलस्वरूपों में लीन हुए? → वैशम्पायन (द्विजोत्तम) तपोदीप्त दृष्टि से एक-एक करके नाम गिनाते हैं—यादव, पाञ्चाल, कौरव-पक्ष, पाण्डव-पक्ष, और वे सब ‘नानुकीर्तित’ भी—और बताते हैं कि मृत्यु के बाद उनकी गंतव्य-यात्रा देवताओं, लोकों और तत्त्वों की ओर हुई। → महान उलटफेर का उद्घाटन: अनेक ‘मानव-वीर’ अपने-अपने दिव्य/तत्त्वात्मक मूल में प्रविष्ट होते हैं—कर्ण सूर्य में, शकुनि द्वापर (कपट-तत्त्व) में, धृष्टद्युम्न पावक (अग्नि) में; पाण्डु दोनों पत्नियों सहित महेन्द्र-भवन में; और धृतराष्ट्र के पुत्र स्वर्गभोग के पश्चात् अपने मूलतः बलोन्मत्त यातुधान-स्वरूप की ओर लौटते हैं। → कथा ‘इतिहास’ से ‘माहात्म्य’ में रूपांतरित होती है—यह पुण्य, पवित्र, उत्तम आख्यान सत्यवादी कृष्णद्वैपायन द्वारा धर्मकाम्यया रचा गया; शस्त्रपूत महात्मा दिव्य लोकों को प्राप्त हुए और समस्त पात्र अपने-अपने कारण-स्वरूप में विलीन हुए।
Verse 1
अपन रा< बछ। ] अत्ऑफा:म पञठ्चमो<ध्याय: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महा'भारतका उपसहार तथा माहात्म्य जनमेजय उवाच भीष्मद्रोणौ महात्मानौ धृतराष्ट्रश्न पार्थिव: । विराटद्रुपदौ चोभौ शड्खश्नैवोत्तरस्तथा
ジャナメージャヤは問うた。「ビーマとドローナ、あの大いなる魂の勇士たち、王ドリタラーシュトラ、ヴィラाटとドルパダの両王、さらにシャンカとウッタラ——彼らはどうなったのか。」叙事詩の結びにおいて、王の問いは勝敗の彼方へと移り、人生の道義的な精算へと向かう。義務(ダルマ)と宿命に縛られた強者たちは、戦場を越えていかなる終極の境地に至るのか。
Verse 2
धृष्टकेतुर्जयत्सेनो राजा चैव स सत्यजित् | दुर्योधनसुताश्चैव शकुनिश्चैव सौबल:
ジャナメージャヤは言った。「また、ドリシュタケートゥ、ジャヤツェーナ、そして王サティヤジット、さらにドゥルヨーダナの息子たち、スバラの子シャクニ——彼らはどうなったのか。」
Verse 3
कर्णपुत्राश्च विक्रान्ता राजा चैव जयद्रथ: । घटोत्कचादयश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिता:
ジャナメージャヤは問うた。「また、勇猛なるカルナの息子たち、王ジャヤドラタ、そしてガトートカチャら——名を挙げられぬ多くの者たちはどうなったのか。」
Verse 4
ये चान्ये कीर्तिता वीरा राजानो दीप्तमूर्तय: । स्वर्गे काल॑ कियन्तं ते तस्थुस्तदपि शंस मे
ジャナメージャヤは尋ねた。「また、名を挙げられた他の勇王たち、輝ける姿を帯びた者たちは——天上にどれほどの時を留まったのか。それもまた私に告げよ。」
Verse 5
जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! महात्मा भीष्म और द्रोण, राजा धुृतराष्ट्र, विराट, ट्रुपद, शंख, उत्तर, धृष्टकेतु, जयत्सेन, राजा सत्यजित्द् दुर्योधनके पुत्र, सुबलपुत्र शकुनि, कर्णके पराक्रमी पुत्र, राजा जयद्रथ तथा घटोत्कच आदि तथा दूसरे जो नरेश यहाँ नहीं बताये गये हैं और जिनका नाम लेकर यहाँ वर्णन किया गया है, वे सभी तेजस्वी शरीर धारण करनेवाले वीर राजा स्वर्गलोकमें कितने समयतक एक साथ रहे? यह मुझे बताइये ।। आहोस्विछाश्रृतं स्थान तेषां तत्र द्विजोत्तम | अन्ते वा कर्मणां कां ते गतिं प्राप्ता नरर्षभा:,द्विजश्रेष्ठ! क्या उन्हें वहाँ सनातन स्थानकी प्राप्ति हुई थी? अथवा कर्मोका अन्त होनेपर वे पुरुषश्रेष्ठ किस गतिको प्राप्त हुए? इति श्रीमहा भारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिकयां स्वर्गारोहणपर्वणि पउठ्चमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत नामक व्यासनिर्मित शतसाहसी संहिताके स्व्गरोह्रणपर्वमें पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ
ジャナメージャヤは言った。「おお、婆羅門よ。大士ビーシュマとドローナ、王ドリタラーシュトラ、ヴィラाट、ドルパダ、シャṅカ、ウッタラ、ドリシュタケートゥ、ジャヤツェーナ、王サティヤジト、ドゥルヨーダナの子ら、スバラの子シャクニ、カルナの勇猛なる子ら、王ジャヤドラタ、ガトートカチャ、そしてここに列挙されずとも名をもって語られた他の諸王——光輝く身を帯びたこれら英雄の王たちは、天界において共にどれほどの時を住したのか。わたしに告げよ。さらに、二度生まれの最勝者よ、彼らはそこで永遠の位地を得たのか。それとも業の果が尽きたのち、雄牛のごときその優れた男たちは、いかなる次の帰趣に至ったのか。」
Verse 6
एतदिच्छाम्यहं श्रोतु प्रोच्यमानं द्विजोत्तम । तपसा हि प्रदीप्तेन सर्व त्वमनुपश्यसि,विप्रवर! मैं आपके मुखसे इस विषयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप अपनी उद्दीप्त तपस्यासे सब कुछ देखते हैं
ジャナメージャヤは言った。「二度生まれの最勝者よ、あなたが説き明かすままに、この事をあなたの口から聞きたい。あなたは霊威に燃え立つ苦行によって、すべてを見通しておられるからだ。おお、婆羅門の中の第一人者よ。」
Verse 7
सौतिर्वाच इत्युक्त: स तु विप्रर्षिरनुज्ञातो महात्मना | व्यासेन तस्य नृपतेराख्यातुमुपचक्रमे,सौति कहते हैं--राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर महात्मा व्यासकी आज्ञा ले ब्रह्मर्षि वैशम्पायनने राजासे इस प्रकार कहना आरम्भ किया
サウティは言った。ジャナメージャヤ王がこのように述べると、ブラフマ仙ヴァイシャンパーヤナは、大心のヴィヤーサの許しを得て、王にその次第を語り始めた。
Verse 8
वैशम्पायन उवाच न शक्यं कर्मणामन्ते सर्वेण मनुजाधिप । प्रकृति कि नु सम्यक्ते पृच्छैषा सम्प्रयोजिता,वैशम्पायनजी बोले--राजन्! कर्मोंका भोग समाप्त हो जानेपर सभी लोग अपनी प्रकृति (मूल कारण)-को ही नहीं प्राप्त हो जाते हैं; (कोई-कोई ही अपने कारणमें विलीन होता है) यदि पूछो, क्या मेरा प्रश्न असंगत है? तो इसका उत्तर यह है कि जो प्रकृतिको प्राप्त नहीं हैं, उनके उद्देश्यसे तुम्हारा यह प्रश्न सर्वथा ठीक है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「人の主よ、業の果が尽きるとき、すべての者が例外なくプラクリティ(根源の基体)へと融解してしまう、ということはあり得ぬ。もしこの問いが不当かと疑うなら、それは違う。まさにプラクリティに至らぬ者たちについてこそ、汝の問いは正しい——彼らはどうなるのか、いかなる理によってその行く末が分かたれるのか。」
Verse 9
शृणु गुह्मामिदं राजन् देवानां भरतर्षभ । यदुवाच महातेजा दिव्यचक्षु: प्रतापवान्,राजन्! भरतश्रेष्ठ) यह देवताओंका गूढ़ रहस्य है। इस विषयमें दिव्य नेत्रवाले, महातेजस्वी, प्रतापी मुनि व्यासजीने जो कहा है, उसे बताता हूँ; सुनो--
ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、バーラタ族の雄牛よ、神々に関わるこの秘奥を聞け。天眼を具え、威光に満ち、武威ある聖仙ヴィヤーサがこの件について語ったことを、わたしは述べよう。」
Verse 10
मुनि: पुराण: कौरव्य पाराशर्यों महाव्रत: । अगाथबुद्धि: सर्वज्ञो गतिज्ञ: सर्वकर्मणाम्,कुरुनन्दन! जो सब कर्मोकी गतिको जाननेवाले, अगाध बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वज्ञ हैं उन महान् व्रतधारी, पुरातन मुनि, पराशरनन्दन व्यासजीने तो मुझसे यही कहा है कि “वे सभी वीर कर्मभोगके पश्चात् अन्ततोगत्वा अपने मूल स्वरूपमें ही मिल गये थे। महातेजस्वी, परम कान्तिमान् भीष्म वसुओंके स्वरूपमें ही प्रविष्ट हो गये”
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、クル族の裔よ。古の聖仙ヴィヤーサ、パラーシャラの子—大誓願を保ち、測り知れぬ深智を備え、万有を知り、あらゆる行為の究極の帰趨を見通す者—が私にこう告げた。『諸々の英雄は、自らの業の果を味わい尽くしたのち、ついにはそれぞれ本来の姿へと融け帰った。さらに、偉大な光輝と至高の輝きを具えたビーシュマは、再びヴァス(八神)の位へと入った』と。」
Verse 11
तेनोक्त कर्मणामन्ते प्रविशन्ति स्विकां तनुम् वसूनेव महातेजा भीष्म: प्राप महाद्युति:,कुरुनन्दन! जो सब कर्मोकी गतिको जाननेवाले, अगाध बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वज्ञ हैं उन महान् व्रतधारी, पुरातन मुनि, पराशरनन्दन व्यासजीने तो मुझसे यही कहा है कि “वे सभी वीर कर्मभोगके पश्चात् अन्ततोगत्वा अपने मूल स्वरूपमें ही मिल गये थे। महातेजस्वी, परम कान्तिमान् भीष्म वसुओंके स्वरूपमें ही प्रविष्ट हो गये”
ヴァイシャンパーヤナは言った。「語られた業の果が尽きるとき、彼らはそれぞれ自らの真の姿へと入る。かくして、力強く輝けるビーシュマ—大いなる光輝を具えた者—はヴァスの位に到った。」
Verse 12
अष्टावेव हि दृश्यन्ते वसवो भरतर्षभ । बृहस्पतिं विवेशाथ द्रोणो हाज्ञिरसां वरम्,भरतभूषण! यही कारण है कि वसु आठ ही देखे जाते हैं (अन्यथा भीष्मजीको लेकर नौ वसु हो जाते)। आचार्य द्रोणने आंगिरसोंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीके स्वरूपमें प्रवेश किया
ヴァイシャンパーヤナは言った。「まことに、ヴァスは八柱のみが見られる、バーラタ族の雄よ。ついでドローナは、アンギラス族の最勝者ブリハスパティ(Bṛhaspati)へと入った。」
Verse 13
कृतवर्मा तु हार्दिक्य: प्रविवेश मरुद्गणान् । सनत्कुमार प्रद्युम्न: प्रविवेश यथागतम्,हृदिकपुत्र कृतवर्मा मरुदगणोंमें मिल गया। प्रद्युम्म जैसे आये थे उसी तरह सनत्कुमारके स्वरूपमें प्रविष्ट हो गये
ヴァイシャンパーヤナは言った。フリーディカの子クリトヴァルマーはマルットの群へと入った。プラデュムナは真にサナトクマーラ(Sanatkumāra)であり、来たときのままに、その本来の姿へと還入した。
Verse 14
धृतराष्ट्रो धनेशस्य लोकान् प्राप दुरासदान् । धृतराष्ट्रेण सहिता गान्धारी च यशस्विनी,धृतराष्ट्रने धनाध्यक्ष कुबेरके दुर्लभ लोकोंको प्राप्त किया। उनके साथ यशस्विनी गान्धारी देवी भी थीं
ヴァイシャンパーヤナは言った。ドリタラーシュトラは、財宝の主ダネーシャ(クベーラ)の到り難き諸世界に至った。ドリタラーシュトラとともに、名高き王妃ガーンダーリーもまた赴いた。
Verse 15
पत्नीभ्यां सहित: पाण्डुमहेन्द्रसदनं ययौ । विराटद्रुपदौ चोभौ धृष्टकेतुश्न पार्थिव:,विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमा: । राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियोंके साथ महेन्द्रके भवनमें चले गये। राजा विराट, द्रपद, धृष्टकेतु, निशठ, अक्रूर, साम्ब, भानु, कम्प, विदूरथ, भूरिश्रवा, शल, पृथ्वीपति भूरि, कंस, उग्रसेन वसुदेव और अपने भाई शंखके साथ नरश्रेष्ठ उत्तर-ये सभी सत्पुरुष विश्वेदेवोंके स्वरूपमें मिल गये
ヴァイシャンパーヤナは語った。パーンドゥ王は二人の妃を伴い、マヘーンドラ(インドラ)の宮殿へ赴いた。同じく、ヴィラータ王とドルパダ王、そして王者ドゥリシュタケートゥ—人のうち最勝の者たち—は、ヴィシュヴェデーヴァ(諸神)の位へと入った。さらに、ニシャタ、アクルーラ、サーンバ、バーヌ、カンパ、ヴィドゥーラタ、ブーリシュラヴァー、シャラ、ブーリシュヴァ—地の主—、カンサ、ウグラセーナ、ヴァスデーヴァ、そしてウッタラは弟シャṅカとともに、いずれも人中の俊傑として、ヴィシュヴェデーヴァの姿へと合一した。
Verse 16
निशठाक्रूरसाम्बाश्व भानुः कम्पो विदूरथ: । भूरिश्रवा: शलश्वैव भूरिश्व पृथिवीपति:
ヴァイシャンパーヤナは語った。「ニシャタ、アクルーラ、サーンバ、アシュヴァ、バーヌ、カンパナ、ヴィドゥーラタ、ブーリシュラヴァー、シャラーシュヴァ、そしてブーリシュヴァ—地の主—(これらも名を挙げられた者たちである)。」
Verse 17
कंसश्रैवोग्रसेनश्व वसुदेवस्तथैव च । उत्तरश्न सह भ्रात्रा शड़्खेन नरपुड्भवः
ヴァイシャンパーヤナは語った。「カンサ、またウグラセーナ、そしてヴァスデーヴァ。さらにウッタラも—弟シャṅカとともに—人中の最勝たる者たち(として名を挙げられた)。」
Verse 18
वर्चा नाम महातेजा: सोमपुत्र: प्रतापवान्
ヴァイシャンパーヤナは語った。ソーマの子で、ヴァルチャー(Varcā)と名づけられた、大いなる光輝を帯びた勇猛なる者がいた。
Verse 19
सोअभिमन्युर्नुसिंहस्य फाल्गुनस्य सुतो5भवत् | स युदृध्वा क्षत्रधर्मेण यथा नानन््य: पुमान् क्वचित्
ヴァイシャンパーヤナは語った。アビマンニュは、ファールグナ(アルジュナ)—人中の獅子—の子として生まれた。クシャトリヤの法(kṣatriya-dharma)に則って戦い、彼はどこにも比肩する者なき無双の勇士であることを示した。
Verse 20
विवेश सोम॑ धर्मात्मा कर्मणो<न्ते महारथ: । चन्द्रमाके महातेजस्वी और प्रतापी पुत्र जो वर्चा हैं, वे ही पुरुषसिंह अर्जुनके पुत्र होकर अभिमन्यु नामसे विख्यात हुए थे। उन्होंने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार ऐसा युद्ध किया था, जैसा दूसरा कोई पुरुष कभी नहीं कर सका था। उन धर्मात्मा महारथी अभिमन्युने अपना कार्य पूरा करके चन्द्रमामें ही प्रवेश किया ।। १८-१९ ह।। आविवेश रविं कर्णो निहतः पुरुषर्षभ:
ヴァイシャンパーヤナは語った。人々の中の雄牛たるカルナは、討たれるや太陽へと帰入した。ゆえに叙事詩はその死を単なる敗北としてではなく、宇宙的な根源への回帰として描き、勇武と義務、そして戦の道徳的帰結によって形づくられた定めの道程が成就したことを示すのである。
Verse 21
धृतराष्ट्रात्मजा: सर्वे यातुधाना बलोत्कटा:
ヴァイシャンパーヤナは語った。ドリタラーシュトラの子らは皆、ヤートゥダーナ(魔類)のごとく凶暴で、力もまた恐るべきものとして描かれた。この一句は、ダルマから切り離された権力が、真の高貴さではなく魔性の猛威として表されることを示している。
Verse 22
धर्ममेवाविशत् क्षत्ता राजा चैव युधिषछिर:,विदुर और राजा युधिष्ठिरने धर्मके ही स्वरूपमें प्रवेश किया। बलरामजी साक्षात् भगवान् अनन्तदेवके अवतार थे। वे रसातलमें अपने स्थानको चले गये। ये वे ही अनन्तदेव हैं जिन्होंने ब्रहद्माजीकी आज्ञा पाकर योगबलसे इस पृथ्वीकों धारण कर रखा है
ヴァイシャンパーヤナは語った。王の侍臣ヴィドゥラはダルマそのものへと入り、ユディシュティラ王もまたダルマの本体へと帰入した。バララーマはまことにアナンタデーヴァの化身であり、ラサータラにある自らの住処へと去った。彼こそ、祖父ブラフマーの命を受け、ヨーガの力によってこの大地を支えるアナンタである。
Verse 23
अनन्तो भगवान् देव: प्रविवेश रसातलम् | पितामहनियोगाद् वै यो योगाद् गामधारयत्,विदुर और राजा युधिष्ठिरने धर्मके ही स्वरूपमें प्रवेश किया। बलरामजी साक्षात् भगवान् अनन्तदेवके अवतार थे। वे रसातलमें अपने स्थानको चले गये। ये वे ही अनन्तदेव हैं जिन्होंने ब्रहद्माजीकी आज्ञा पाकर योगबलसे इस पृथ्वीकों धारण कर रखा है
ヴァイシャンパーヤナは語った。福徳具えた主、神アナンタはラサータラへと入り、自らの住処へ帰還した。彼こそ、祖父ブラフマーの命により、ヨーガの力をもって大地を支えるアナンタである。(同じ終結の流れの中で、ヴィドゥラとユディシュティラ王もまたダルマそのものへ帰入したと語られ、彼らの最期が単なる肉体の死ではなく、本質原理への回帰として描かれていることが示される。)
Verse 24
य: स नारायणो नाम देवदेव: सनातन: । तस्यांशो वासुदेवस्तु कर्मणो<डन्ते विवेश ह
ヴァイシャンパーヤナは語った。「ナーラーヤナと呼ばれる、神々の神にして永遠なる御方には、ヴァースデーヴァという流出の一分があった。そしてその神聖なる一分は、定められた事の成り行きが尽きる時に(この世へ)入ったのである。」
Verse 25
वे जो नारायण नामसे प्रसिद्ध सनातन देवाधिदेव हैं उन्हींके अंश वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण थे, जो अवतारका कार्य पूरा करके पुन: अपने स्वरूपमें प्रविष्ट हो गये ।। षोडश स्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रह: । अमज्जंस्ता: सरस्वत्यां कालेन जनमेजय,जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार स्त्रियाँ थीं, उन्होंने अवसर पाकर सरस्वती नदीमें कूदकर अपने प्राण दे दिये
ヴァイシャンパーヤナは言った。「ジャナメージャヤよ。ナーラーヤナの名で知られる永遠の神々の神、その御分身こそがヴァスデーヴァの子、聖なるクリシュナであった。化身の務めを果たし終えると、彼は再び自らの本来の姿へと帰入した。そののち時の巡りにより、かつてヴァスデーヴァ(聖クリシュナ)の妃であった一万六千の女たちは、サラスヴァティー河へ身を投げ、命を絶った。」
Verse 26
तत्र त्यक्त्वा शरीराणि दिवमारुरुहु: पुनः । ताश्चैवाप्सरसो भूत्वा वासुदेवमुपाविशन्,वहाँ देहत्याग करनेके पश्चात् वे सब-की-सब पुनः स्वर्गलोकमें जा पहुँचीं और अप्सराएँ होकर पुनः भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हो गयीं
そこで彼女たちは身を捨てたのち、皆ふたたび天界へと昇った。アプサラスとなって、ヴァスデーヴァ(聖クリシュナ)に仕えんがため再びその御前に立ち、神聖なる奉仕へと帰ったのである。
Verse 27
हतास्तस्मिन् महायुद्धे ये वीरास्तु महारथा: । घटोत्कचादयश्चैव देवान् यक्षांश्ष॒ भेजिरे,इस प्रकार उस महाभारत नामक महायुद्धमें जो-जो वीर महारथी घटोत्कच आदि मारे गये थे वे देवताओं और यक्षोंके लोकोंमें गये
ヴァイシャンパーヤナは言った。あの大戦において討たれた勇士たち、偉大なる戦車武者—ガトートカチャら—は、神々の界とヤクシャの界とに至った。
Verse 28
दुर्योधनसहायाश्न राक्षसा: परिकीर्तिता: । प्राप्तास्ते क्रमशो राजन् सर्वलोकाननुत्तमान्,राजन! जो दुर्योधनके सहायक थे, वे सब-के-सब राक्षस बताये गये हैं। उन्हें क्रमशः सभी उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई
ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ。ドゥルヨーダナに与した者たちは羅刹であると語られている。されど彼らもまた、定められた順に、ことごとく無上の諸世界へと至った。」
Verse 29
भवनं च महेन्द्रस्य कुबेरस्थ च धीमतः । वरुणस्य तथा लोकान् विविशु: पुरुषर्षभा:,ये श्रेष्ठ पुरुष क्रमश: देवराज इन्द्रके, बुद्धिमान् कुबेरके तथा वरुण देवताके लोकोंमें गये
ヴァイシャンパーヤナは言った。かの人中の雄たちは、定められた順に天上の住処へ入った。すなわち大いなるインドラ(マヘーンドラ)の宮殿、智あるクベーラの国、そして同じくヴァルナの諸界である。
Verse 30
एतत् ते सर्वमाख्यातं विस्तरेण महाद्ुते । कुरूणां चरितं कृत्स्नं पाण्डवानां च भारत,महातेजस्वी भरतनन्दन! यह सारा प्रसंग--कौरवों और पाण्डवोंका सम्पूर्ण चरित्र तुम्हें विस्तारके साथ बताया गया
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、偉大なる光輝を具える者よ。いま私は、クル族の全き来歴と行い、そしてパーンダヴァたちのそれをも、汝に余すところなく、詳らかに語り終えた。おお、バーラタよ。」
Verse 31
सौतिर्वाच एतच्छुत्वा द्विजश्रेष्ठा:स राजा जनमेजय: । विस्मितो5भवदत्यर्थ यज्ञकर्मान्तरेष्वथ,सौति कहते हैं--विप्रवरो! यज्ञकर्मके बीचमें जो अवसर प्राप्त होते थे, उन्हींमें यह महाभारतका आख्यान सुनकर राजा जनमेजयको बड़ा आश्चर्य हुआ
サウティは言った。「おお、二度生まれし者たちのうち最勝の方々よ。祭式の作法の合間にこの物語を聞いて、ジャナメージャヤ王はひときわ深い驚嘆に満たされた。」
Verse 32
ततः समापयामासु: कर्म तत् तस्य याजका: । आस्तीकश्चा भवत् प्रीत: परिमोक्ष्य भुजड्रमान्,तदनन्तर उनके पुरोहितोंने उस यज्ञकर्मको समाप्त कराया। सर्पोंको प्राणसंकटसे छुटकारा दिलाकर आस्तीक मुनिको भी बड़ी प्रसन्नता हुई
それから、祭儀を司る祭官たちは、その供犠の作法を終わりへと導いた。蛇たちを死の危難から救い出したゆえに、聖仙アースティーカもまた深く満ち足り、喜びに浸った。
Verse 33
ततो द्विजातीन् सर्वास्तान् दक्षिणाभिरतोषयत् । पूजिताश्चापि ते राज्ञा ततो जम्मुर्यथागतम्,राजाने यज्ञकर्ममें सम्मिलित हुए समस्त ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा देकर संतुष्ट किया तथा वे ब्राह्मण भी राजासे यथोचित सम्मान पाकर जैसे आये थे उसी तरह अपने घरको लौट गये
それから王は、すべての二度生まれのバラモンたちを、ふさわしい尊礼の贈り物(ダクシナー)によって満ち足らせた。さらに王より然るべく敬われたのち、彼らは去って、来たときのままにそれぞれの家へ帰っていった。
Verse 34
विसर्जयित्वा विप्रांस्तानू राजापि जनमेजय: । ततस्तक्षशिलाया: स पुनरायाद् गजाह्दयम्,उन ब्राह्मणोंको विदा करके राजा जनमेजय भी तक्षशिलासे फिर हस्तिनापुरको चले आये
ヴァイシャンパーヤナは言った。かのバラモンたちを恭しく暇(いとま)しめたのち、ジャナメージャヤ王もまたタクシャシラーを発ち、再びガジャーフヴァヤ(ハスティナープラ)へと帰還した。
Verse 35
एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायनकीर्तितम् । व्यासाज्ञया समज्ञातं सर्पसत्रे नूपस्य हि,इस प्रकार जनमेजयके सर्पयज्ञमें व्यासजीकी आज्ञासे मुनिवर वैशम्पायनजीने जो इतिहास सुनाया था तथा मैंने अपने पिता सूतजीसे जिसका ज्ञान प्राप्त किया था, वह सारा-का-सारा मैंने आपलोगोंके समक्ष यह वर्णन किया है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「この一切を、汝らに余すところなく語り尽くした——王の蛇祭において、ヴィヤーサの命により理解され、ヴァイシャンパーヤナによって宣説されたイティハーサの伝承である。聞き伝えられ、代々受け継がれてきたその全てを、今ここに汝らの前で語り終えた。」
Verse 36
पुण्योडयमितिहासाख्य: पवित्र चेदमुत्तमम् कृष्णेन मुनिना विप्र निर्मितं सत्यवादिना
ヴァイシャンパーヤナは言った。「この至高にして浄めの力ある著作は、イティハーサと呼ばれ、功徳の増長をもたらす。おおブラーフマナよ、これは真実を語る聖仙クリシュナによって編まれた。」
Verse 37
ब्रह्मन्! सत्यवादी मुनि व्यासजीके द्वारा निर्मित यह पुण्यमय इतिहास परम पवित्र एवं बहुत उत्तम है ।। सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सता | अतीन्द्रियेण शुचिना तपसा भावितात्मना,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おおブラーフマナよ。真実を語る聖仙ヴィヤーサによって編まれたこの功徳のイティハーサは、至上に清浄で、きわめて卓越している。全知にして祭式と正しい作法に通じ、ダルマの智に立脚し、真に徳ある人—感官を超える洞察を備え、清らかで、苦行の力によって内なる自己を錬磨した者—であるヴィヤーサは、サーンキヤとヨーガに精通し、多くのシャーストラに通暁する最勝の仙である。彼は天眼によって一切を見定め、偉大なる魂をもつパーンダヴァたち、ならびに富に恵まれ威光赫々たる他の諸王の名声を世に広めんがため、この歴史を著した。」
Verse 38
ऐश्व॒र्ये वर्तता चैव सांख्ययोगवता तथा । नैकतन्त्रविबुद्धेन दृष्टवा दिव्येन चक्षुषा,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「霊威を具え、サーンキヤとヨーガに安住し、多くの聖なる学の分野に目覚めた聖仙ヴィヤーサは、天眼をもって見定め、このイティハーサを著した。大心のパーンダヴァたち、ならびに富に恵まれ威光輝く他の諸王の名声が、世に広く行き渡るためである。」
Verse 39
कीर्ति प्रथणता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् | अन््येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम्,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「大心のパーンダヴァたちの名声、また富に恵まれ武威赫々たる他のクシャトリヤ諸王の名声が、世に広く行き渡るようにと、全知にして聖法の規定と正しい作法に通じ、ダルマを知る真の聖者であり、感官を超える知を具え、清浄にして苦行の力で内奥を洗い清め、霊威を帯び、サーンキヤとヨーガに精通し、多くのシャーストラに深く通暁する聖仙ヴィヤーサは、天眼をもって一切を見定め、この歴史を著したのである。」
Verse 40
यश्नेदं श्रावयेद् विद्वान् सदा पर्वणि पर्वणि । धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्म भूयाय कल्पते,जो दिद्वान् प्रत्येक पर्वपर सदा इसे दूसरोंको सुनाता है उसके सारे पाप धुल जाते हैं। उसका स्वर्गपर अधिकार हो जाता है, तथा वह ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य बन जाता है
賢者にして、常に章ごとにこの物語を誦し、また人々に聞かせる者は――その罪垢はことごとく洗い清められ、天界への権分を得、ついには梵(ブラフマン)の境地に至るにふさわしい者となる。
Verse 41
कार्ष्ण॑ वेदमिमं सर्व शृणुयाद् यः समाहित: । ब्रह्महत्यादिपापानां कोटिस्तस्य विनश्यति,जो एकाग्रचित होकर इस सम्पूर्ण “कार्ष्ण वेदैं” का श्रवण करता है उसके ब्रह्महत्या आदि करोड़ों पापोंका नाश हो जाता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「心を収め、一点に専念して、この全き『カールシュナ・ヴェーダ』を聴聞する者は――婆羅門殺し(ブラフマハティヤー)に始まる無数の罪が滅び去る。」
Verse 42
यश्चेदं श्रावयेत् श्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्तत: । अक्षय्यमन्नपानं वै पितृंस्तस्योपतिष्ठते,जो श्राद्धकर्ममें ब्राह्यणोंको निकटसे महाभारतका थोड़ा-सा अंश भी सुना देता है, उसका दिया हुआ अन्नपान अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「シュラーダ(śrāddha)の儀において、婆羅門たちにこの(マハーバーラタ)の一節でも聴かせるなら、その者の供えた食と飲み物の功徳は尽きることなく、必ず祖霊(ピトリ)に届く。」
Verse 43
अब्वा यदेन: कुरुते इन्द्रियैर्मनसापि वा । महाभारतमाख्याय पश्चात् संध्यां प्रमुच्यते,मनुष्य अपनी इन्द्रियों तथा मनसे दिनभरमें जो पाप करता है वह सायंकालकी संध्याके समय महाभारतका पाठ करनेसे छूट जाता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「人が日中に犯した罪は――感官によるものでも、心に起こしたものでも――夕のサンディヤー(sandhyā)の時にマハーバーラタを誦して後、そこから解き放たれる。」
Verse 44
यद् रात्रौ कुरुते पापं ब्राह्मण: स्त्रीगणैर्व॒त: । महाभारतमाख्याय पूर्वा संध्यां प्रमुच्यते,ब्राह्मण रात्रिके समय स्त्रियोंक समुदायसे घिरकर जो पाप करता है वह प्रातःकालकी संध्याके समय महाभारतका पाठ करनेसे छूट जाता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「婆羅門が夜、女たちの群れに囲まれて犯したいかなる罪も――朝のサンディヤー(sandhyā)、すなわち暁の時にマハーバーラタを誦することで解き放たれる。」
Verse 45
भरतानां महज्जन्म तस्माद् भारतमुच्यते । महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते,इस ग्रन्थमें भरतवंशियोंके महान् जन्मकर्मका वर्णन है, इसलिये इसे महाभारत कहते हैं। महान् और भारी होनेके कारण भी इसका नाम महाभारत हुआ है। जो महाभारतकी इस व्युत्पत्तिको जानता और समझता है वह समस्त पापोंसे मुक्ता हो जाता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「この書はバラタの子孫の偉大なる誕生と業績を語るがゆえに『バーラタ』と呼ばれる。また、その偉大さにおいて広大であり、内容において重厚であるがゆえに『マハーバーラタ』と呼ばれる。この書名の語源的意義を真に知り悟る者は、あらゆる罪より解き放たれる。」
Verse 46
अष्टादशपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वश: । वेदा: साड्रास्तथैकत्र भारतं चैकत: स्थितम्,अठारह पुराणोंके निर्माता और वेदविद्याके महासागर महात्मा व्यास मुनिका यह सिंहनाद सुनो। वे कहते हैं--“अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित चारों वेद एक ओर तथा केवल महाभारत दूसरी ओर, यह अकेला ही उन सबके बराबर है!
ヴァイシャンパーヤナは言った。「一方には十八のプラーナ、あらゆるダルマシャーストラの全体、そして補助学(ヴェーダーンガ)を伴う四ヴェーダがある。他方にはマハーバーラタがただ一つ立つ。このように置けば、マハーバーラタ一巻はそれらすべてに等しい。」
Verse 47
श्रूयतां सिंहनादो5यमृषेस्तस्य महात्मन: । अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधे:,अठारह पुराणोंके निर्माता और वेदविद्याके महासागर महात्मा व्यास मुनिका यह सिंहनाद सुनो। वे कहते हैं--“अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित चारों वेद एक ओर तथा केवल महाभारत दूसरी ओर, यह अकेला ही उन सबके बराबर है!
ヴァイシャンパーヤナは言った。「十八のプラーナを編み、ヴェーダの知を海のごとく湛える大聖ヴィヤーサ、その獅子吼の宣言を聞け。」
Verse 48
त्रिभिवर्षरिदं पूर्ण कृष्णद्वैपायन: प्रभु: । अखिल भारतं॑ चेदं चकार भगवान् मुनि:,मुनिवर भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने तीन वर्षोमें इस सम्पूर्ण महाभारतको पूर्ण किया था
ヴァイシャンパーヤナは言った。大いなる力を備えたクリシュナ・ドヴァイパーヤナ(ヴィヤーサ)という祝福された聖仙は、この全『バーラタ』を三年にして完成させた。
Verse 49
आकर्णयय भक््त्या सततं जयाख्यं भारतं महत् । श्रीक्ष कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिता: सदा,जो जय नामक इस महाभारत इतिहासको सदा भक्तिपूर्वक सुनता रहता है उसके यहाँ श्री, कीर्ति और विद्या तीनों साथ-साथ रहती हैं
ヴァイシャンパーヤナは言った。「『ジャヤ』とも呼ばれるこの偉大なるバーラタを、信心をもって絶えず聴聞する者には、繁栄と名声と学知とが常に相伴って宿る。」
Verse 50
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित्,भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें जो कुछ महाभारतमें कहा गया है, वही अन्यत्र है। जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バーラタ族の雄牛よ。ここ『マハーバーラタ』において、ダルマ、アルタ(世俗の利得)、カーマ(欲望)、モークシャ(解脱)について説かれるものは、他のところにもまた見いだされる。だが、ここに見いだされぬものは、いずこにも存在しないのだ。」
Verse 51
जयो नामेतिहासो<यं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता । ब्राह्मणेन च राज्ञा च गर्भिण्या चैव योषिता,मोक्षकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मणको, राज्य चाहनेवाले क्षत्रियको तथा उत्तम पुत्र॒की इच्छा रखनेवाली गर्भिणी स्त्रीकों भी इस जय नामक इतिहासका श्रवण करना चाहिये
ヴァイシャンパーヤナは言った。「『ジャヤ』と名づけられたこの聖なる物語は、モークシャを求める者が聴くべきである。また、バラモンも、王も、そして優れた子を望む身重の女も、同じくこれを聴くべきである。」
Verse 52
स्वर्गकामो लभेत् स्वर्ग जयकामो लभेज्जयम् | गर्भिणी लभते पुत्र कन््यां वा बहुभागिनीम्,महाभारतका श्रवण या पाठ करनेवाला मनुष्य यदि स्वर्गकी इच्छा करे तो उसे स्वर्ग मिलता है और युद्धमें विजय पाना चाहे तो विजय मिलती है। इसी प्रकार गर्भिणी स्त्रीको महाभारतके श्रवणसे सुयोग्य पुत्र या परम सौभाग्यशालिनी कन्याकी प्राप्ति होती है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「天界を望む者は天界を得、勝利を望む者は勝利を得る。同じく、身重の女は『マハーバーラタ』を聴聞し(あるいは誦する)ことによって、ふさわしき男子を得る。さもなくば、大いなる福運を具えた娘を得る。」
Verse 53
अनागतश्र मोक्षश्न कृष्णद्वैपायन: प्रभु: । संदर्भ भारतस्यास्य कृतवान् धर्मकाम्यया
ヴァイシャンパーヤナは言った。「来たらんとする艱難からの解脱の道を知る、尊きクリシュナ・ドヴァイパーヤナ(ヴィヤーサ)こそ、ダルマを護り興さんとの願いによって、この『バーラタ』を編み、整えたのである。」
Verse 54
नित्यसिद्ध मोक्षस्वरूप भगवान् कृष्णद्वैपायनने धर्मकी कामनासे इस महाभारतसंदर्भकी रचना की है ।। षष्टिं शतसहस््राणि चकारान्यां स संहिताम् । त्रिंशच्छतसहस््राणि देवलोके प्रतिष्ठितम्,उन्होंने पहले साठ लाख श्लोकोंकी महाभारत-संहिता बनायी थी। उसमें तीस लाख श्लोकोंकी संहिताका देवलोकमें प्रचार हुआ। पंद्रह लाखकी दूसरी संहिता पितृलोकमें प्रचलित हुई। चौदह लाख श्लोकोंकी तीसरी संहिताका यक्षलोकमें आदर हुआ तथा एक लाख श्लोकोंकी चौथी संहिता मनुष्योंमें प्रचारित हुई
ヴァイシャンパーヤナは言った。「常に成就せる解脱そのものを本性とする、福徳具足のクリシュナ・ドヴァイパーヤナ(ヴィヤーサ)は、ダルマを願うがゆえに、この『マハーバーラタ』の編纂を成した。まず彼は六百万のシュローカから成るサンヒターを作り、そのうち三百万のシュローカは天界において確立し流布した。(他の諸本は祖霊界とヤクシャ界に行われ、人間界には十万詩節の本が広まった。)」
Verse 55
पित्रये पज्चदशं ज्ञेयं यक्षलोके चतुर्दश । एकं शतसहसंर तु मानुषेषु प्रभाषितम्,उन्होंने पहले साठ लाख श्लोकोंकी महाभारत-संहिता बनायी थी। उसमें तीस लाख श्लोकोंकी संहिताका देवलोकमें प्रचार हुआ। पंद्रह लाखकी दूसरी संहिता पितृलोकमें प्रचलित हुई। चौदह लाख श्लोकोंकी तीसरी संहिताका यक्षलोकमें आदर हुआ तथा एक लाख श्लोकोंकी चौथी संहिता मनुष्योंमें प्रचारित हुई
ヴァイシャンパーヤナは言った。「祖霊の界(ピトリ・ローカ)では十五(ラク)、夜叉の界(ヤクシャ・ローカ)では十四(ラク)と知られる。だが人間界では、十万の偈として誦されるのである。」
Verse 56
नारदो5श्रावयद् देवानसितो देवल: पितृन् | रक्षोयक्षात् शुको मर्त्यान् वैशम्पायन एव तु,देवताओंको देवर्षि नारदने, पितरोंको असित देवलने, यक्ष और राक्षसोंको शुकदेवजीने और मनुष्योंको वैशम्पायनजीने ही पहले-पहल महाभारत-संहिता सुनायी है
ヴァイシャンパーヤナは言った。ナーラダは神々にこれを誦し、アシタ・デーヴァラは祖霊(ピトリ)に誦し、シュカは夜叉と羅刹に誦した。そして人間に対しては、ヴァイシャンパーヤナ自身が最初に『マハーバーラタ・サンヒター』を誦したのである。
Verse 57
इतिहासमिमं पुण्यं महार्थ वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रत:,शौनकजी! जो मनुष्य ब्राह्मणोंको आगे करके गम्भीर अर्थसे परिपूर्ण और वेदकी समानता करनेवाले इस व्यासप्रणीत पवित्र इतिहासका श्रवण करता है वह इस जगतमें सारे मनोवाड्छित भोगों और उत्तम कीर्तिको पाकर परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे तनिक भी संशय नहीं है
ヴァイシャンパーヤナは言った。ヴィヤーサが作り、語り伝えたこの清浄なる歴史譚は、義理深く、権威においてヴェーダに比すべきものである。これを、まずブラーフマナを先に立て(すなわち彼らを敬い、その臨席のもとで)聴聞する者は、この世において望む享楽とすぐれた名声を得、ついには最高の成就に至る。
Verse 58
स नर: सर्वकामांश्व कीर्ति प्राप्पेह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशय:,शौनकजी! जो मनुष्य ब्राह्मणोंको आगे करके गम्भीर अर्थसे परिपूर्ण और वेदकी समानता करनेवाले इस व्यासप्रणीत पवित्र इतिहासका श्रवण करता है वह इस जगतमें सारे मनोवाड्छित भोगों और उत्तम कीर्तिको पाकर परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे तनिक भी संशय नहीं है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、シャウナカよ。ヴィヤーサの作になるこの清浄なる歴史譚—義理深く、ヴェーダに比すべきもの—を、ブラーフマナを先に立てて聴聞する者は、この世において望む享楽のすべてと高き名声を得、のちに最高の完成へと至る。これについて、我に微塵の疑いもない。」
Verse 59
भारताध्ययनात् पुण्यादपि पादमधीयत: । श्रद्धया परया भक्त्या श्राव्यते चापि येन तु,जो अत्यन्त श्रद्धा और भक्तिके साथ महाभारतके एक अंशको भी सुनता या दूसरोंको सुनाता है उसे सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका पुण्य प्राप्त होता है और उसीके प्रभावसे उसे उत्तम सिद्धि मिल जाती है
ヴァイシャンパーヤナは言った。たとえ一偈の四分の一を学ぶにすぎずとも、その功徳は『バーラタ』全巻を学ぶ功徳をも上回る。至上の信と篤い帰依をもってこれを聴聞する者、あるいは他者のために誦させる者は、『マハーバーラタ』を学ぶ果報を余すところなく得、まさにその力によって最高の霊的成就に至る。
Verse 60
य इमां संहितां पुण्यां पुत्रमध्यापयच्छुकम् । मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे,जिन भगवान् वेदव्यासने इस पवित्र संहिताको प्रकट करके अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया था (वे महाभारतके सारभूत उपदेशका इस प्रकार वर्णन करते हैं--) “मनुष्य इस जगतमें हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके संयोग-वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे
ヴァイシャンパーヤナは言った。「この聖なる編纂を世に顕し、わが子シュカに授け教えた方—世尊ヴェーダヴィヤーサは、(かくして『マハーバーラタ』の要諦を説き示す):輪廻(サンサーラ)の世において、人はすでに、いまも、そしてこれからも、幾千の父母、幾百の妻子との邂逅と離別を経験し続ける。かかる絆はサンサーラにおいて、結ばれては断たれ、断たれてはまた結ばれるのだ。」
Verse 61
हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्,अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किंतु विद्वान पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「日ごとに、歓喜の機会は幾千、恐怖の機会は幾百と、愚者を襲う。されど賢者を圧し伏せることはできぬ。」
Verse 62
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शूणोति मे । धर्मादर्थक्ष॒ कामश्ष॒ स किमर्थ न सेव्यते,“मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते
ヴァイシャンパーヤナは言った。「われは両腕を高く掲げ、幾度も幾度も叫び告げるが、誰ひとり耳を貸さぬ。ダルマからは解脱のみならず、繁栄も、正しき歓楽も成るというのに—それでも人はなぜダルマを修めようとしないのか。」
Verse 63
न जातु कामाजन्न भयान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो: । नित्यो धर्म: सुखदुः:खे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:,“कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य'
ヴァイシャンパーヤナは言った。「欲より、恐れより、貪りより、あるいは命を保つためであっても、決してダルマを捨ててはならぬ。ダルマは常住であり、楽と苦は無常である。同じく、自己(ジーヴァ)は常住であり、その束縛の因は無常である。」
Verse 64
इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । स भारतफल प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति,यह महाभारतका सारभूत उपदेश 'भारत-सावित्री” के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「朝まだきに起き、この『バーラタ・サーヴィトリー』—『マハーバーラタ』より精髄として抽出された教え—を誦する者は、全叙事詩を学ぶに等しい功徳を得、その果によって至上のブラフマン(パラ・ブラフマン)に到達する。」
Verse 65
यथा समुद्रो भगवान् यथा हि हिमवान् गिरि: । ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते,जैसे ऐश्वर्यशशाली समुद्र और हिमालय पर्वत दोनों ही रत्नोंकी निधि कहे गये हैं, उसी प्रकार महाभारत भी नाना प्रकारके उपदेशमय रत्नोंका भण्डार कहलाता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「栄光ある大海と、ヒマヴァーン(ヒマラヤ)の山とが、ともに宝玉の蔵として名高いように、マハーバーラタもまた、宝玉のごとき教えを数多く収めた宝庫であると語られる。」
Verse 66
कार्ष्ण वेदमिमं विद्वान् श्रावयित्वार्थम क्षुते । इदं भारतमाख्यानं यः पठेत् सुसमाहितः । स गच्छेत् परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशय:,जो दिद्वान् श्रीकृष्णद्वैपायनके द्वारा प्रसिद्ध किये गये इस महाभारतरूप पठ्चम वेदको सुनाता है उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। जो एकाग्रचित्त होकर इस भारत-उपाख्यानका पाठ करता है वह मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे संशय नहीं है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「このカールシュナ・ヴェーダを学識ある者が誦読させるなら、その真の果報を得る。さらに、心をよく収めてこのバーラタの物語を誦する者は、最高の成就—解脱(モークシャ)—に至る。これについて私に疑いはない。」
Verse 67
द्वैपायनोष्ठपुटनि:सृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं कि तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन,जो वेदव्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है उसे पुष्करतीर्थके जलमें गोता लगानेकी क्या आवश्यकता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「このマハーバーラタは、ドヴァイパーヤナ(ヴィヤーサ)の唇より流れ出た、量り知れぬ聖なる言葉であり、功徳を与え、清め、罪を滅し、吉祥をもたらす。これを朗誦されるままに真実に受け取る者に、プシュカラの水での儀礼的沐浴が何の要ろうか。」
Verse 68
यो गोशतं कनकश्ड्रमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव,सौ गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको जो गौएँ दान देता है और जो महाभारतकथाका प्रतिदिन श्रवणमात्र करता है, इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「ヴェーダに通じ、聖なる学識に富むバラモンに、角を黄金で飾った百頭の牛を施す者と、清らかなバーラタの物語を絶えず聴聞する者と—この二者の得る果報は等しい。」
Verse 173
विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमा: । राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियोंके साथ महेन्द्रके भवनमें चले गये। राजा विराट, द्रपद, धृष्टकेतु, निशठ, अक्रूर, साम्ब, भानु, कम्प, विदूरथ, भूरिश्रवा, शल, पृथ्वीपति भूरि, कंस, उग्रसेन वसुदेव और अपने भाई शंखके साथ नरश्रेष्ठ उत्तर-ये सभी सत्पुरुष विश्वेदेवोंके स्वरूपमें मिल गये
ヴァイシャンパーヤナは言った。「かの人中の最勝者たちは、ヴィシュヴェーデーヴァの群れへと入った。パーンドゥ王は二人の妃とともに、マヘーンドラ(インドラ)の宮殿へ赴いた。ヴィラाट王、ドルパダ、ドリシュタケートゥ、ニシャタ、アクルーラ、サーンバ、バーヌ、カンパ、ヴィドゥーラタ、ブーリシュラヴァス、シャラ、ブーリ王、カンサ、ウグラセーナ、ヴァスデーヴァ、そして人中第一のウッタラは兄弟シャンクハとともに—これらすべての徳ある者たちは合一し、ヴィシュヴェーデーヴァの姿と位階を帯びたのである。」
Verse 206
द्वापरं शकुनि: प्राप धृष्टद्युम्नस्तु पावकम् । पुरुषप्रवर कर्ण जो अर्जुनके द्वारा मारे गये थे, सूर्यमें प्रविष्ट हुए। शकुनिने द्वापरमें और धृष्टद्युम्नने अग्निके स्वरूपमें प्रवेश किया
ヴァイシャンパーヤナは言った。「シャクニはドヴァーパラの原理に至り、ドリシュタデュムナは火(アグニ)へと入った。アルジュナに討たれた、人々の中で最も優れたカルナは、太陽(スーリヤ)へと入った。かくしてシャクニはドヴァーパラに融け、ドリシュタデュムナはアグニそのものの姿へと融け入った。」
Verse 2136
ऋद्धिमन्तो महात्मान: शस्त्रपूता दिव॑ गता: । धृतराष्ट्रके सभी पुत्र स्वर्गभोगके पश्चात् मूलतः बलोन्मत्त यातुधान (राक्षस) थे। वे समृद्धिशाली महामनस्वी क्षत्रिय होकर युद्धमें शस्त्रोंके आघातसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये थे
ヴァイシャンパーヤナは言った。「彼らは富み、また大いなる魂を備え、武器によって清められて天に赴いた。持国王(ドリタラーシュトラ)の息子たちは皆—天界の果報を享受したのち—本来の性は、力に酔い荒ぶるヤートゥダーナ(羅刹)の類であった。されど富み、志高きクシャトリヤとして、戦場で武器の打撃により浄められ、天界に到ったのである。」
He asks whether the warriors’ heavenly attainments are permanent or time-bound and what final destiny (gati) they reach at the completion of their karma, seeking a principled account rather than mere praise.
The text presents destiny as karma-governed and intelligible: all beings reach an outcome at the end of action, and individuals are described as returning to or merging with their appropriate cosmic principles or divine domains.
Yes. It asserts the Mahābhārata’s sanctity and efficacy—recitation, study, and teaching are described as purifying and merit-producing—thereby framing the epic as both ethical instruction and ritual-knowledge transmission.