Mahabharata Adhyaya 3
Drona ParvaAdhyaya 329 Versesभीष्म के पतन के बाद पाण्डव-पक्ष की ओर मनोवैज्ञानिक और सामरिक बढ़त; कौरव-पक्ष में भय और अस्थिरता।

Adhyaya 3

भीष्मपातने कर्णविलापः | Karṇa’s Lament upon Seeing Bhīṣma Fallen

Upa-parva: Bhīṣma-śayana (Episode of Bhīṣma on the Arrow-bed)

Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Bhīṣma lies on a śara-talpa (arrow-bed), his immense vitality seemingly “dried” like an ocean under great winds. A sequence of similes elevates the event to cosmic scale: a mountain felled, a sun fallen from the sky, Indra’s unimaginable defeat by Vṛtra—each image indexing both the elder’s stature and the army’s shock. Karṇa descends from his chariot, eyes blurred with tears, offers respectful salutation, and identifies himself, requesting Bhīṣma to look upon him with auspicious, steady speech and gaze. He then interprets Bhīṣma’s fall as a crisis of moral order and a collapse of Kuru security, stating that no other protector equals Bhīṣma in counsel, treasury matters, formations, and weapon-policy. Karṇa forecasts that from this day the Pāṇḍavas, especially Arjuna (Gāṇḍīva) aided by Kṛṣṇa, will terrify armies like fire with wind, making the campaign’s strategic environment drastically more hazardous. The chapter ends with Karṇa preparing, under instruction, to confront Arjuna—accepting either victory or death.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का दृश्य सुनाते हैं—अमित-तेजस्वी भीष्म शर-शय्या पर पड़े हैं, मानो प्रलय-वायु से सोख लिया गया समुद्र; उनके पतन से कौरव-आशा का आधार डगमगा गया है। → भीष्म के अभाव में कौरव-पक्ष की ढाल टूटती दिखती है; संजय रूपकों की बाढ़ में अर्जुन की प्रचण्डता उभारते हैं—बाण-समूह यमुना-प्रवाह की तरह फैलते हैं, और अग्नि-वायु की संयुक्त गति की भाँति वन (सेना) को मार्ग-मार्ग से भस्म करते हैं। साथ ही यह प्रश्न तीखा होता जाता है कि अर्जुन का सामना कौन कर सकता है। → संजय निर्णायक स्वर में कहते हैं—‘आपके सिवा दूसरा कौन राजा अर्जुन से युद्ध कर सकता है?’ गाण्डीव की टंकार और पांचजन्य की गर्जना से समस्त कौरव-सेनाओं में त्रास फैलने का चित्र चरम पर पहुँचता है; अर्जुन के बाण धार्तराष्ट्रों को चीरते हुए अग्नि-लपटों की तरह सब ओर फैलते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष भय और अनिवार्यता में टिकता है—कौरव-सेना अर्जुन की ध्वनि, वेग और प्रहार सहने में असमर्थ दिखती है; भीष्म-युग के अंत के बाद अब युद्ध का भार नए नेतृत्व और नए प्रतिरोध पर आ पड़ा है। → भीष्म के पतन के बाद कौरव-पक्ष में कौन-सा वीर/नेता अर्जुन के सम्मुख टिकेगा, और युद्ध की बागडोर किसके हाथ में जाएगी?

Shlokas

Verse 2

संजय कहते हैं--महाराज! अमित तेजस्वी महात्मा भीष्म बाण-शय्यापर सो रहे थे। उस समय वे प्रलयकालीन महावायुसमूहसे सोख लिये गये समुद्रके समान जान पड़ते थे ।।

サञ्जयは言った。「大王よ、無量の光輝を具えた大魂のビ―シュマは、矢の床の上に横たわっておられた。その時の御姿は、劫末の大風に吸い尽くされて干上がった大海のように見えた。全クシャトリヤを滅ぼし得るほどの師にして祖父、至高の弓の達人ビ―シュマが、サヴィヤサーチー・アルジュナによって神授の武器で打ち倒されたのを見て、あなたの御子らの勝利の望みは崩れ去った。自らの安泰を願う望みさえ失われ、護りの鎧も裂け砕けたかのようであった。渡り口も見いだせぬ無辺の深海で底を探る者のようなカウラヴァにとって、ビ―シュマは島のごとき拠り所であったが、今やパールタ(アルジュナ)によって矢の山として横たえられたのである。」

Verse 3

जयाशा तव पुत्राणां सम्भग्ना शर्म वर्म च । अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम्‌

サञ्जयは言った。「あなたの御子らの勝利の望みは砕け散り、安堵も護りの鎧もまた失われた。渡り口を見いだせず、測り知れぬ深みに足場を求める者にとって、ビ―シュマは島のごとき避難所であったが、パールタ(アルジュナ)によって倒されたのである。」

Verse 4

स्रोतसा यामुनेनेव शरौघेण परिप्लुतम्‌ । महेन्द्रेणेव मैनाकमसहां भुवि पातितम्‌

サञ्जयは言った。「そこは矢の奔流に呑まれ、満ちあふれるヤムナーの流れのようであった。見れば、まるでマヘーンドラ(インドラ)が耐え難きマイナーカ山を地上へ投げ落としたかのようであった。」

Verse 5

नभश्च्युतमिवादित्यं पतितं धरणीतले । शतक्रतुमिवाचिन्त्यं पुरा वृत्रेण निर्जितम्‌

サञ्जयは言った。彼は、天より落ちて地に横たわる太陽のごとく見え、また、百の祭祀を司る神々の王インドラ—思議を超えたその御方—が太古にヴリトラに屈した時の姿にも似ていた。大いなる力が地に落とされた象徴であり、戦の荒廃のただ中で偉大さが辱められるのを見て、道義の衝撃が胸を打つのである。

Verse 6

मोहन सर्वसैन्यस्य युधि भीष्मस्य पातनम्‌ । ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम्‌

サञ्जयは言った。「戦場におけるビーシュマの倒れ伏し—全軍を魅了し、結束させる力そのものであった御方の失墜—は、軍の冠が崩れ落ち、あらゆる弓手の標(しるし)たる栄光が失われるに等しい。これは単なる戦術上の逆転ではなく、戦の秩序に生じた道義と心の断裂である。」

Verse 7

धनंजयशरैरव्याप्तं पितरं ते महाव्रतम्‌ । तं॑ वीरशयने वीरं शयान पुरुषर्षभम्‌

サञ्जयは言った。汝の父—大いなる誓戒を守る者—は、ダナञ्जヤ(アルジュナ)の矢に貫かれたのではない。あの英雄、人中の雄は、英雄の床すなわち戦場に横たわり、勇者のごとく静かに憩っていた。この一句は、死に臨んで揺るがぬ武人の規範と、戦が父子の絆に課す道義の重みを示している。

Verse 8

भीष्ममाधिरथिरद्दृष्टवा भरतानां महाद्युति: । अवतीर्य रथादार्तों बाष्पव्याकुलिताक्षरम्‌

サञ्जयは言った。ビーシュマを見たとき、御者の子カルナは大いなる光輝を放ちながらも苦悶して戦車を降り、涙に言葉を詰まらせ、声はかすれて定まらなかった。祝福し慰めようとする声と、懇願する眼差しで彼は告げた。「おおバーラタよ、安らかであれ。われはカルナ。汝の清らかで吉祥なる言葉で、われに何か語り、福をもたらす慈しみの眼でわれを見てくれ。」

Verse 9

अभिवाद्याज्जलिं बद्ध्वा वन्दमानो5भ्यभाषत | उस युद्धस्थलमें भीष्मका गिराया जाना समस्त सैनिकोंको मोहमें डालनेवाला था। आपके ज्येष्ठ पिता महान व्रतधारी भीष्म समस्त सैनिकोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंके शिरोमणि थे। वे अर्जुनके बाणोंसे व्याप्त होकर वीरशय्यापर सो रहे थे। उन भरतवंशी वीर पुरुषप्रवर भीष्मको उस अवस्थामें देखकर अधिरथपुत्र महातेजस्वी कर्ण अत्यन्त आर्त होकर रथसे उतर पड़ा और अंजलि बाँध अभिवादनपूर्वक प्रणाम करके आँसूसे गदगद वाणीमें इस प्रकार बोला-- || ६--८ $ || कर्णोडहमस्मि भद्रें ते वद मामभि भारत

サञ्जयは言った。彼は敬礼し、合掌してアーンジャリ(añjali)を結び、礼拝してから語りかけた。「われはカルナ。汝に吉祥あれ。おおバーラタよ、われに言葉を賜れ。」 戦場の背後では、武人の第一にして弓手の冠たるビーシュマの倒れ伏しが、全軍を惑乱に陥れていた。矢の床に横たわる大誓戒の守護者を見て、カルナは悲嘆と敬意に満たされて戦車を降り、合掌して近づき、涙に声を詰まらせてこう告げた—戦の混沌のただ中でさえ、猛き戦士が長老と誓いと武の卓越に礼を尽くす、倫理の一瞬である。

Verse 10

00/वी00५ (0. न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित्‌ समश्लुते

サンジャヤは言った。「まことに、この世では善行の果報を真に味わう者は誰もいない。」

Verse 11

कोशसंचयने मन्त्रे व्यूहे प्रहरणेषु च

サンジャヤは言った。「財の蓄えと運用においても、策謀と評議においても、陣形の布置においても、また武器の扱いにおいても——(彼は群を抜いていた)。」

Verse 12

नाहमन्यं प्रपश्यामि कुरूणां कुरुपुड्रव । बुद्धया विशुद्धया युक्तो यः कुरूंस्तारयेद्‌ भयात्‌

サンジャヤは言った。「おお、クル族の最勝者よ。清らかに磨き抜かれた判断力を備え、この危難を越えてクル族を導き、恐れから救い出せる者を、私は他に見いだせない。」

Verse 13

योधांस्तु बहुधा हत्वा पितृलोकं॑ गमिष्यति । 'कुरुश्रेष्ठ। कोश-संग्रह

サンジャヤは言った。「多くの戦士を討ち果たしたのち、彼は祖霊の世界――ピトリローカへ赴くであろう。」

Verse 14

पाण्डवा भरतगश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षयम्‌ । “भरतश्रेष्ठ) आजसे क्रोधमें भरे हुए पाण्डव उसी प्रकार कौरवोंका विनाश करेंगे, जैसे व्याप्र हिरनोंका ।। अद्य गाण्डीवघोषस्य वीर्यज्ञा: सव्यसाचिन:

サンジャヤは言った。「おお、バーラタ族の最勝者よ。今日、パーンダヴァらはクル族の滅亡をもたらすであろう。今日より、怒りに満ちた彼らは、虎が鹿を屠るようにカウラヴァを滅ぼす。さらに、左利きの名射手—ガーンディーヴァを弓とし、その咆哮が名高い者—の武威を知る者は、憤怒のうちに解き放たれる彼の力を目の当たりにするであろう。」

Verse 15

कुरव: संत्रसिष्यन्ति वज़्पाणेरिवासुरा: । “आज गाण्डीवकी टंकार करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जाननेवाले कौरव उनसे उसी प्रकार डरेंगे, जैसे वज्रधारी इन्द्रसे असुर भयभीत होते हैं ।।

サンジャヤは言った。「クル族は、雷霆の武器ヴァジュラを携えるインドラの前でアスラが震え上がるように、震えおののくであろう。今日、ガーンディーヴァから放たれる矢の轟きそのものが恐怖を打ち込み—両手に等しく弓を操るサヴィヤサーチー、アルジュナの武威を告げ、戦の道義と策の転回を予兆するのだ。」

Verse 16

समिद्धो5ग्निर्यथा वीर महाज्वालो द्रुमान्‌ दहेत्‌

サンジャヤは言った。「勇士よ、よく焚きつけられ、大いなる炎を上げる火が樹々を焼き尽くすように、あの戦士の憤怒と力もまた、前に立つ者すべてを呑み込まんばかりであった。」

Verse 17

येन येन प्रसरतो वाय्वग्नी सहितौ वने

サンジャヤは言った。「風と火とが相携えて森を駆け広がるところでは……」(彼は、ひとたび放たれれば容易に抑えがたく、進む先々を呑み尽くす破壊の迅速さを描き始める—戦の暴虐を、そのような制御困難な力として示す比喩である。)

Verse 18

तेन तेन प्रदहतो भूरिगुल्मतृणद्रुमान्‌ “वायु और अग्निदेव--ये दोनों एक साथ वनमें जिस-जिस मार्गसे फैलते हैं, उसी- उसीके द्वारा बहुत-से तृण, वृक्ष और लताओंको भस्म करते जाते हैं ।।

サンジャヤは言った。「風と火とが森をともに進み、通る道ごとに広がって、茂みや草や樹々を幾重にも焼き尽くしてゆくように、彼もまたそうであった。風に煽られて大火となる火がかくのごとく、そして疑いなくパールタ(アルジュナ)もまた—ひとたび動き出せば、その行く手のすべてを呑み尽くす力であった。」

Verse 19

यथा वायुर्नरव्यात्र तथा कृष्णो न संशय: । 'पुरुषसिंह! जैसी प्रज्वलित अग्नि होती है, वैसे ही कुन्तीकुमार अर्जुन हैं--इसमें संशय नहीं है और जैसी वायु होती है, वैसे ही श्रीकृष्ण हैं, इसमें भी संशय नहीं है ।।

サンジャヤは言った。「風が—迅く、抗しがたく、遍く行き渡る—そのようにクリシュナもまた然り。疑いはない。」戦の倫理的枠組みにおいて、この一句は、アルジュナの武力がクリシュナの断乎たる導きの力によって方向づけられ、効力を得ることを示し、正しい導きなき力は未完であると示唆する。

Verse 20

कपिथ्वजस्योत्यततो रथस्यामित्रकर्षिण:

サンジャヤは言った。「猿の旗を掲げ、敵を屈する勇士の戦車が、勢いよく前へと突進したとき……」

Verse 21

को हार्जुनं योधयितु त्वदन्य: पार्थिवो5हति

サンジャヤは言った。「諸王のうち、あなた以外に誰がアルジュナと戦うにふさわしいでしょうか。賢者たちは彼の神々しい業を称えます。彼は人ならぬ者—アスラやダイティヤ—とも戦い、さらに三つ目の大いなる主シャンカラ(シヴァ)とも戦って、その御方から最上の恩寵を得ました。それは、感官を制し得ぬ者にはまことに得難いものです。かつてあなたでさえ彼を打ち負かせなかったのに、今日、戦場で誰が彼に勝てましょうか。」

Verse 22

यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिण: । अमानुषैश्च संग्रामस्त्रयम्बकेण महात्मना

サンジャヤは言った。「賢者たちがその業をまことに神々しいと語る者—非人の者どもとも戦い、また大いなる心をもつ三つ目の主(シヴァ)とも戦った者—そのアルジュナに、あなた以外のどの王が戦で対峙できましょうか。」

Verse 23

तस्माच्चैव वर प्राप्तो दुष्प्रपमकृतात्मभि: । को<न्य: शक्तो रणे जेतुं पूर्व यो न जितस्त्वया

サンジャヤは言った。「さらに彼は、その恩寵を得ました—自らを制し得ぬ者には得難いものです。かつてあなたでさえ征し得なかったその者を、戦場で誰が打ち破れましょうか。」

Verse 24

जितो येन रणे रामो भवता वीर्यशालिना । क्षत्रियान्तकरो घोरो देवदानवदर्पहा

サンジャヤは言った。「武勇に輝くあなたこそ、戦いにおいてラーマ(パラシュラーマ)を打ち破ったお方—クシャトリヤを滅ぼす恐るべき者、神々と魔族の驕りを砕く者—その人です。」

Verse 25

तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड- ममृष्यमाणो भवता चानुशिष्ट: । आशीदविपष॑ दृष्टिहरं सुघोरं शूरं शक्ष्याम्यस्त्रबलान्निहन्तुम्‌

サンジャヤは言った。「本日、もし陛下が命じ給うなら、私は—憤激に燃え、御命令のもとに—戦場に鍛えられたあのパーンダヴァを討ち果たすことができましょう。視界を奪う最も恐るべき毒蛇のごとく、勇士アルジュナもまた、我が武器の威力によって屠ることができます。」

Verse 103

यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह । “निश्चय ही इस लोकमें कोई भी अपने पुण्यकर्मोंका फल यहाँ नहीं भोगता है; क्योंकि आप वृद्धावस्थातक सदा धर्ममें ही तत्पर रहे हैं

サンジャヤは言った。「ここに、ダルマに篤い老翁が、むき出しの大地に身を横たえている。まるでこの世では、誰ひとり功徳の果報をこの場で真に味わえぬかのようだ—老いに至るまで正しさに堅く立った者でさえ、今やこの有様で地に伏しているのだから。」

Verse 153

त्रासयिष्यति बाणानां कुरूनन्यांश्व पार्थिवान्‌ । “आज गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंका वज्रपातके समान शब्द कौरवों तथा अन्य राजाओंको भयभीत कर देगा

サンジャヤは言った。「クル族も、ほかの諸王もまた、今まさに放たれようとする矢によって恐怖にとらわれるであろう。」

Verse 166

धार्तराष्ट्रान्‌ प्रथक्ष्यन्ति तथा बाणा: किरीटिन: । “वीर! जैसे बड़ी-बड़ी लपटोंसे युक्त प्रज्वलित हुई आग वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देती है

サンジャヤは言った。「勇士よ! 大いなる炎の舌をもって燃えさかる火が樹々を焼き尽くし灰とするように、冠を戴くアルジュナの矢は、ドリタラーシュトラの子らとその軍勢を焼き焦がし、呑み尽くすであろう。」

Verse 193

श्र॒ुत्वा सर्वाणि सैन्यानि त्रासं यास्यन्ति भारत | “भारत! बजते हुए पांचजन्य और टंकारते हुए गाण्डीव धनुषकी भयंकर ध्वनि सुनकर आज सारी कौरव सेनाएँ भयभीत हो उठेंगी

サンジャヤは言った。「おお、バーラタ(ドリタラーシュトラ)よ。それを聞けば、そなたの全軍は恐怖にとらわれるであろう。」

Verse 206

शब्दं सोढुं न शक्ष्यन्ति त्वामृते वीर पार्थिवा: | “वीर! शत्रुसूदन कपिध्वज अर्जुनके उड़ते हुए रथकी घरघराहटको आपके सिवा दूसरे राजा नहीं सह सकेंगे

サンジャヤは言った。「勇士よ、そなたを除いては、他の王たちはその響きを耐え忍ぶことができぬ。」

Frequently Asked Questions

The chapter frames a tension between rightful reliance on a dharmic elder as institutional protector and the reality that war exposes even the most revered to vulnerability; leaders must act despite grief, uncertainty, and the destabilization of moral-psychological order.

It underscores that strategic capacity is inseparable from counsel, legitimacy, and morale: when a central ethical authority collapses, disciplined speech, ritual respect, and clear-eyed assessment must replace denial and impulsive escalation.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-layer functions through Sañjaya’s evaluative reportage and Karṇa’s prognostic reasoning, positioning the episode as a structural marker for the war’s ethical and strategic deterioration.

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