
स्कन्दोपाख्यानम् — उत्पातशान्तिः, स्वाहारूपविचारः, कौमारमङ्गलक्रियाः
Upa-parva: Skanda-Janma & Mahāsena Traditions (Mārkaṇḍeya-ākhyāna segment)
Mārkaṇḍeya describes sages reacting to severe portents by performing pacificatory rites. In the Caitraratha forest, residents debate the source of a great calamity, attributing it variously to Garuḍī/Suparṇī and to Svāhā’s actions, with uncertainty about the true agent. Suparṇī approaches Skanda and identifies herself as his mother. The Seven Ṛṣis, hearing of the powerful child’s birth, abandon six wives while Arundhatī is exempted, indicating a communal rupture shaped by suspicion. Svāhā claims the child as hers; Viśvāmitra follows Agni and comprehends the events, then seeks refuge in Kumāra and composes a divine hymn. He performs thirteen kaumāra auspicious rites (including jātakarman), and the chapter notes Skanda’s six-faced greatness and associated ritual elements (including references to the cock emblem and attendants). Viśvāmitra confirms Svāhā’s assumed forms and instructs that women are not to be held at fault; upon hearing the truth, the sages abandon their wives completely. The gods, concerned about Skanda’s overwhelming power, urge Indra to neutralize him; Indra hesitates, judging the child capable of overpowering even cosmic authorities. The Mothers (mātṛgaṇa) approach Skanda; unable to oppose him, they seek his protection, address him as their son, and are received with honor. Skanda grants them desired boons and sees Agni approaching as father; Agni stands guard with the Mothers. Specific Mothers are described as protectors, and Agni, as Naigameya with a goat-face, delights the mountain-dwelling child as if with toys—closing the unit with protective guardianship and cultic imagery.
Chapter Arc: धर्म की खोज में आया ब्राह्मण (कौशिक) उस ‘धर्मव्याध’ के घर पहुँचता है, जिसके विषय में उसे बताया गया था कि वही प्रत्यक्ष धर्म का ज्ञाता है—और वह सुनता है कि धर्म कोई दूर की तपस्या नहीं, घर के भीतर का आचरण है। → ब्राह्मण अपने शास्त्रीय ज्ञान और तप-आधारित मान्यताओं के साथ प्रश्न करता है; व्याध उत्तर देता है कि उसका ‘प्रत्यक्ष धर्म’ माता-पिता की सेवा है, और वही उसकी सिद्धि का कारण बना। वह बताता है कि प्राण-स्तुति (हृदयस्थ प्राण, नाभिस्थ समान आदि) जैसे उपनिषद्-प्रसंग भी अंततः जीवन-धर्म की ओर संकेत करते हैं—धर्म को शरीर-जीवन के केंद्र में उतारने की बात। → व्याध माता-पिता को ‘मद्दैवतं परम्’ कहकर घोषित करता है: देवताओं के प्रति जो कर्तव्य है, वही वह माता-पिता में करता है; पत्नी-पुत्र-प्राण-सुहृद् सब उसी सेवा के लिए हैं। फिर वह गृहस्थ-धर्म को सनातन बताकर कहता है कि जो माता-पिता, अतिथि, अग्नि/कर्तव्य-परंपरा आदि में सम्यक् वर्तता है, उसके लिए वे अग्नियाँ नित्य तृप्त हैं—यही प्रत्यक्ष धर्म है। → वृद्ध माता-पिता प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं; ब्राह्मण उस सेवा-धर्म को देखकर कृतज्ञता प्रकट करता है और उनके कुशल-क्षेम पूछता है—ज्ञान का अहं पिघलकर विनय और स्वीकार में बदलता है।
Verse 1
४. प्राणकी स्तुतिका वर्णन अथर्ववेदमें और प्रश्नोपनिषदमें बहुत आया है। - तात्पर्य यह है कि हृदयमें रहनेवाला प्राण, नाभिमें रहनेवाले समानसे जाकर मिलता है। इसी तरह गुदामें रहनेवाला अपान कंठवर्ती उदानसे जा मिलता है, इस दशामें प्राण, अपान और समानका नाभिमें संघर्ष होनेसे जो अग्नि उत्पन्न होती है, उसे ही 'जठरानल' नाम दिया गया है। वही इस शरीरमें अन्नको पचाकर उसके रससे शरीरको पुष्ट करता है। - प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम--ये सोलह कलाएँ हैं (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)। चतुर्दशाधिकद्विशततमो< ध्याय: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन मार्कण्डेय उवाच एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर । दृढ्प्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष- धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला
Markandeya berkata: “Wahai Yudhishthira, setelah Dharma-vyadha menjabarkan moksha-dharma dengan lengkap demikian, sang brahmana Kaushika—dengan hati yang teguh dipenuhi sukacita—berkata kepadanya sebagai berikut.”
Verse 2
न्याययुक्तमिदं सर्व भवता परिकीर्तितम् | न ते>स्त्यविदितं किंचिद् धर्मेष्विह हि दृश्यते,“तात! तुमने मुझसे जो कुछ कहा, यह सब न्याययुक्त है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ धर्मके विषयमें कोई ऐसी बात नहीं दिखायी देती जो तुम्हें ज्ञात न हो”
Wahai ayahanda, segala yang engkau katakan selaras dengan keadilan dan nalar yang benar. Dalam perkara dharma di sini, aku melihat tiada sesuatu pun yang tidak engkau ketahui.
Verse 3
व्याध उवाच प्रत्यक्ष मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम । येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुड़व,धर्मव्याधने कहा--विप्रवर! अब मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है, जिसके प्रभावसे मुझे यह सिद्धि प्राप्त हुई है, ब्राह्मणश्रेष्ठट उसका भी दर्शन कर लीजिये
Sang pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, pandanglah dharmaku yang nyata—yang kulaksanakan di hadapan mata. Dengan jalan perilaku benar inilah, wahai brahmana terkemuka, aku meraih pencapaian rohani ini.”
Verse 4
उत्तिष्ठ भगवन् क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम् द्रष्टमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे,भगवन! आप धर्मके ज्ञाता हैं, उठिये और शीघ्र घरके भीतर चलकर मेरे माता-पिताका दर्शन कीजिये
Sang pemburu berkata, “Bangkitlah, tuan yang mulia; segeralah masuk ke bagian dalam rumahku. Wahai yang mengetahui dharma, patutlah engkau menemui ibu dan ayahku.”
Verse 5
मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त: स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम् । सौध॑ हृद्यं चतु:ःशालमतीव च मनोरमम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--धर्मव्याधके ऐसा कहनेपर कौशिक ब्राह्मणने भीतर प्रवेश करके देखा--एक बहुत सुन्दर साफ-सुथरा घर था, उसकी दीवारोंपर चूनेसे सफेदी की हुई थी। उसमें चार कमरे थे, वह भवन बहुत प्रिय और मनको लुभा लेनेवाला था, ऐसा जान पड़ता था, मानो देवताओंका निवासस्थान हो। देवता भी उसका आदर करते थे। एक ओर सोनेके लिये शय्या बिछी थी और दूसरी ओर बैठनेके लिये आसन रखे गये थे। वहाँ धूप और चन्दन, केसर आदिकी उत्तम गन्ध फैल रही थी
Mārkaṇḍeya berkata, “Setelah demikian dikatakan, ia pun masuk ke dalam dan melihat sebuah kediaman yang sangat dimuliakan—sebuah rumah besar yang elok, menyejukkan hati, berkamar empat, dan amat memikat.”
Verse 6
देवतागृहसंकाशं दैवतैश्व सुपूजितम् । शयनासनसम्बाधं गन्धैश्न परमैर्युतम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--धर्मव्याधके ऐसा कहनेपर कौशिक ब्राह्मणने भीतर प्रवेश करके देखा--एक बहुत सुन्दर साफ-सुथरा घर था, उसकी दीवारोंपर चूनेसे सफेदी की हुई थी। उसमें चार कमरे थे, वह भवन बहुत प्रिय और मनको लुभा लेनेवाला था, ऐसा जान पड़ता था, मानो देवताओंका निवासस्थान हो। देवता भी उसका आदर करते थे। एक ओर सोनेके लिये शय्या बिछी थी और दूसरी ओर बैठनेके लिये आसन रखे गये थे। वहाँ धूप और चन्दन, केसर आदिकी उत्तम गन्ध फैल रही थी
“Rupanya laksana kediaman para dewa, bahkan dimuliakan oleh yang ilahi. Di sana tersedia tempat berbaring dan tempat duduk dengan baik, dan seluruhnya dipenuhi wewangian terbaik.”
Verse 7
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ “लोक मिलाकर कुल ४३३ “लोक हैं) 3 “5 (9) #2६.# #2 5-7 ३. देखिये प्रश्नोपनिषद् प्रश्न ३ मन्त्र ९। २. देखिये प्रश्नोपनिषद् २२२, ३ और उसके आगेका प्रकरण। 3. देखिये प्रश्नोपनिषद् ३।३ तथा २,तत्र शुक्लाम्बरधरौ पितरावस्य पूजितौ । कृताहारी तु संतुष्टावुपविष्टी वरासने । धर्मव्याधस्तु तौ दृष्टवा पादेषु शिरसापतत् एक सुन्दर आसनपर धर्मव्याधके माता-पिता भोजन करके संतुष्ट हो बैठे हुए थे। उस दोनोंके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे और पुष्प, चन्दन आदिसे उनकी पूजा की गयी थी। धर्मव्याधने उन दोनोंको देखते ही चरणोंमें मस्तक रख दिया और पृथ्वीपर पड़कर साष्टांग प्रणाम किया
Di sana ayah dan ibunya, mengenakan pakaian putih dan dimuliakan dengan persembahan, duduk puas setelah makan di atas tempat duduk yang utama. Melihat mereka, Dharmavyādha segera menundukkan kepala di kaki mereka dan menjatuhkan diri bersujud penuh hormat.
Verse 8
वृद्धावृचतु: उत्तिष्ठीत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु । प्रीतो स्वस्तव शौचेन दीर्घमायुरवाप्रुहि,तब बूढ़े माता-पिताने (स्नेहपूर्वक) कहा--बेटा! उठो! उठो! तुम धर्मके जानकार हो, धर्म तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करे। हम दोनों तुम्हारे शुद्ध आचार-विचार तथा सेवासे बहुत प्रसन्न हैं। तुम्हारी आयु बड़ी हो
Kedua orang tua yang telah lanjut usia itu berkata, “Bangkitlah, bangkitlah, wahai yang mengetahui dharma; semoga Dharma melindungimu dari segala penjuru. Kami berkenan atas kesucian perilakumu dan baktimu. Raihlah umur panjang.”
Verse 9
गतिमिष्टां तपो ज्ञानं मेधां च परमां गत: । सत्पुत्रेण त्वया पुत्र नित्यं काले सुपूजिती,तुमने उत्तम गति, तप, ज्ञान और श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त की है, बेटा! तुम सुपुत्र हो। तुमने नित्य नियमपूर्वक समयानुसार हमारा पूजन--आदर-सत्कार किया है
Mārkaṇḍeya berkata: “Engkau telah mencapai tujuan yang diidamkan—bersama tapa, pengetahuan sejati, dan kebijaksanaan tertinggi. Wahai anakku, engkau putra yang utama; olehmu, sebagai putra yang baik, aku senantiasa dihormati dan dipuja pada waktunya dengan penuh takzim.”
Verse 10
कौशिक ब्राह्मण और माता-पिताके भक्त धर्मव्याध (सुखमावां वसावो<त्र देवलोकगताविव) न तेडन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते । प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वित:,हम इस घरमें इस प्रकार सुखसे रहते हैं मानो देवलोकमें पहुँच गये हों। देवताओंमें भी तुम्हारे लिये हम दोनोंके सिवा और कोई देवता नहीं है। तुम हमें ही देवता मानते हो। अपने मनको पवित्र एवं संयममें रखनेके कारण तुम द्विजोचित शम-दमसे सम्पन्न हो
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Kaushika, kami berdua tinggal di rumah ini dengan kenyamanan seakan telah mencapai alam para dewa. Bagimu, bahkan di antara para dewa pun tiada sesembahan selain kami berdua; engkau memandang kami sajalah sebagai ilahi. Karena engkau menjaga diri tetap suci dan terkendali, engkau dianugerahi ketenangan dan pengendalian diri yang layak bagi kaum dwija.”
Verse 11
पितु: पितामहा ये च तथैव प्रपितामहा: । प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया,वत्स! मेरे पिताके पितामह और प्रपितामह आदि सभी तुम्हारे इन्द्रियसंयमसे सदा प्रसन्न रहते हैं। हम दोनों भी तुम्हारे द्वारा की हुई पूजा-सेवासे बहुत संतुष्ट हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai anak, kakek, buyut, dan para leluhurmu senantiasa berkenan oleh pengendalian indramu. Dan kami berdua pun amat puas oleh pemujaan serta pelayanan penuh hormat yang engkau persembahkan.”
Verse 12
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते । नचान्या हि तथा बुद्धिर्दश्यते साम्प्रतं तव,तुम मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी हम दोनोंकी सेवा नहीं छोड़ते। इस समय भी तुम्हारा विचार इसके प्रतिकूल नहीं दिखायी देता
Mārkaṇḍeya berkata: “Pengabdianmu tidak pernah berkurang—baik dalam pikiran, perbuatan, maupun ucapan. Bahkan kini pun tak tampak padamu niat lain yang berlawanan dengan kesetiaan itu.”
Verse 13
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ । तथा त्वया कृतं सर्व तद्विशिष्टं च पुत्रक,बेटा! जमदग्निनन्दन परशुरामने जिस प्रकार अपने वृद्ध माता-पिताकी सेवा-पूजा की थी, उसी प्रकार तथा उससे भी बढ़कर तुमने हमारी सब सेवाएँ की हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai anakku, sebagaimana Rāma Jāmadagnya (Paraśurāma) memuliakan dan melayani kedua orang tuanya yang telah lanjut usia, demikian pula engkau telah melakukan segala pelayanan kepada kami—bahkan melampauinya, duhai putraku.”
Verse 14
ततस्तं ब्राह्मुणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत् । तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा,तदनन्तर धर्मव्याधने अपने माता-पिताको उस कौशिक ब्राह्मणका परिचय दिया। तब उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक ब्राह्मणका पूजन किया
Kemudian si pemburu yang saleh memperkenalkan brahmana itu kepada ayah dan ibunya. Maka kedua orang tua itu menyambut sang brahmana dengan jamuan yang semestinya, serta memuliakannya dengan penghormatan dan pemujaan penuh takzim.
Verse 15
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विज: पप्रच्छ तावुभौ । सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे
Setelah menerima penghormatan itu dan membalasnya dengan hormat, sang dwija bertanya kepada keduanya, “Apakah di rumah kalian semuanya sejahtera—bersama putra-putra yang baik dan para pelayan?”
Verse 16
वृद्धावृचतु: कुशल नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वश: । कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवज्निति,उन वृद्धोंने उत्तर दिया--ब्रह्मन! इस घरमें हम दोनों सकुशल हैं। हमारे सेवक तथा कुटुम्बके लोग भी कुशलसे हैं। भगवन्! अपना समाचार कहें, आप यहाँ सकुशल पहुँच गये न? किसी विघ्न-बाधाका सामना तो नहीं करना पड़ा?
Kedua orang tua itu menjawab, “Wahai brahmana, kami berdua sejahtera di rumah, dan seluruh para pelayan serta seisi rumah pun baik dalam segala hal. Wahai yang mulia, apakah engkau juga tiba di sini dengan selamat tanpa rintangan? Adakah hambatan di perjalanan?”
Verse 17
मार्कण्डेय उवाच बाढमित्येव तौ विप्र: प्रत्युवाच मुदान्वित: । धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्! तब कौशिक ब्राह्मणने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया--'हाँ, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।' तदनन्तर धर्मव्याधने अपने पिता-माताकी ओर देखते हुए कौशिक ब्राह्मणसे कहा
Markandeya berkata: Sang brahmana menjawab dengan gembira, “Sungguh, ya,” menegaskan bahwa ia tidak mengalami bahaya. Lalu si pemburu yang saleh, setelah memandang ayah dan ibunya, berbicara kepada brahmana itu.
Verse 18
व्याध उवाच पिता माता च भगवन्नेतौ मद्दैवतं परम् । यद् दैवतेभ्य: कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्पयहम्,धर्मव्याध बोला--भगवन्! ये माता-पिता ही मेरे प्रधान देवता हैं। जो कुछ देवताओंके लिये करना चाहिये, वह मैं इन्हीं दोनोंके लिये करता हूँ
Sang pemburu berkata, “Wahai yang mulia, ayah dan ibuku—merekalah dewa tertinggi bagiku. Apa pun bakti yang patut dipersembahkan kepada para dewa, bakti itulah yang kupersembahkan kepada keduanya.”
Verse 19
त्रयस्त्रिंशद् यथा देवा: सर्वे शक्रपुरोगमा: । सम्पूज्या: सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम,जैसे समस्त संसारके लिये इन्द्र आदि तैंतीस- देवता पूजनीय हैं, उसी प्रकार मेरे लिये ये दोनों बूढ़े माता-पिता ही आराधनीय हैं
Sang pemburu berkata: “Sebagaimana tiga puluh tiga dewa, dipimpin Indra, dihormati oleh seluruh dunia, demikian pula bagiku kedua orang tua renta ini—ibuku dan ayahku—adalah yang patut disembah.”
Verse 20
उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजा: । कुर्वन्ति तद्धदेताभ्यां करोम्पहमतन्द्रित:,द्विजलोग देवताओंके लिये जैसे नाना प्रकारके उपहार समर्पण करते हैं, उसी प्रकार मैं इनके लिये करता हूँ। इनकी सेवामें मुझे आलस्य नहीं होता
Sang pemburu berkata: “Sebagaimana para brahmana membawa dan mempersembahkan beragam persembahan kepada para dewa, demikian pula aku mempersembahkannya kepada kedua orang tua ini. Dalam melayani mereka, aku tak pernah lalai atau bermalas-malasan.”
Verse 21
एतौ मे परम॑ ब्रह्मनू पिता माता च दैवतम् । एतौ पुष्पै: फलै रत्नैस्तोषयामि सदा द्विज,ब्रह्मन्! ये माता-पिता ही मेरे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। मैं सदा फ़ूल, फल तथा रत्नोंसे इन्हींको संतुष्ट करता हूँ
Sang pemburu berkata: “Wahai Brahmana, kedua ini—ayah dan ibuku—adalah ketuhanan tertinggiku. Wahai yang dua kali lahir, senantiasa kuhibur dan kumuliakan mereka dengan bunga, buah, dan permata.”
Verse 22
एतावेवाग्नयो महां यान् वदन्ति मनीषिण: । यज्ञा वेदाश्न॒ चत्वार: सर्वमेतो मम द्विज,विप्रवर! जिन्हें विद्वान लोग “अग्नि” कहते हैं, वे मेरे लिये ये ही हैं। चारों वेद और यज्ञ सब कुछ मेरे लिये ये माता-पिता ही हैं
Sang pemburu berkata: “Wahai brahmana utama, ‘api-api agung’ yang disebut para bijak—bagiku itulah kedua orang tua ini. Keempat Weda dan segala yajña: semuanya, wahai yang dua kali lahir, bagiku terwujud dalam ibu dan ayahku.”
Verse 23
एतदर्थ मम प्राणा भार्या पुत्र: सुहृज्जन: । सपुत्रदार: शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम्,मेरे प्राण, स्त्री, पुत्र, और सुहृद् सब इन्हींकी सेवाके लिये हैं। मैं स्त्री और पुत्रोंके साथ प्रतिदिन इन्हींकी शुश्रूषामें लगा रहता हूँ
Sang pemburu berkata: “Untuk tujuan inilah hidupku—istriku, putraku, dan para kerabat yang mengasihiku—berada. Bersama istri dan anak-anakku, setiap hari tanpa putus aku menekuni pelayanan bakti kepada kedua orang tua itu.”
Verse 24
स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये । आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम,द्विजश्रेष्ठ! मैं स्वयं ही इन्हें नहलाता हूँ, इनके चरण धोता हूँ और स्वयं ही भोजन परोसकर इन्हें जिमाता हूँ
Wahai brahmana terbaik! Aku sendiri memandikan kedua orang ini dan membasuh kaki mereka; aku sendiri menyediakan makanan dan dengan tanganku sendiri menyajikannya serta menyuapi mereka.
Verse 25
अनुकूलं तथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये । अधर्मेणापि संयुक्त प्रियमाभ्यां करोम्पहम्,मैं वही बात बोलता हूँ, जो इनके मनके अनुकूल हो, जो इन्हें प्रिय न लगे, ऐसी बात मुँहले कभी नहीं निकालता। इनको पसंद हो, तो मैं अधर्मयुक्त कार्य भी कर सकता हूँ
Aku hanya mengucapkan kata-kata yang menyenangkan hati mereka dan menghindari ucapan yang membuat mereka tidak berkenan. Bahkan bila harus bersentuhan dengan adharma, aku tetap melakukan apa yang membuat mereka senang.
Verse 26
धर्ममेव गुरु ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम । अलन्हद्रित: सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्पहम्,विप्रवर! इस प्रकार माता-पिताकी सेवारूप धर्मको ही महान् मानकर मैं उसका पालन करता हूँ। ब्रह्म! आलस्य छोड़कर मैं सदा इन्हीं दोनोंकी सेवामें लगा रहता हूँ
Wahai brahmana terbaik! Mengetahui Dharma semata sebagai guruku, aku hidup menurutnya. Wahai brahmana, setelah menyingkirkan kemalasan, aku senantiasa tekun dalam shushrusha—pelayanan penuh perhatian—kepada mereka berdua.
Verse 27
पज्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषत: । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्न द्विजसत्तम,ब्राह्मणश्रेष्ठ! उन्नति चाहनेवाले पुरुषके पाँच ही गुरु हैं--पिता, माता, अग्नि, परमात्मा तथा गुरु
Wahai brahmana mulia! Bagi seorang yang mendambakan kemajuan sejati, ada lima guru: ayah, ibu, api suci (Agni), Atman (Tuhan di dalam), dan sang acarya.
Verse 28
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम । भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीणर्णास्तु नित्यश: । गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एव धर्म: सनातन:,द्विजश्रेष्ठस जो इन सबके प्रति उत्तम बर्ताव करेगा, उस गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवालेके द्वारा सदा सब अग्नियोंकी सेवा सम्पन्न होती रहेगी। यही सनातन धर्म है
Wahai yang terbaik di antara kaum dwija! Siapa pun yang, sambil menjalani hidup berumah tangga, berperilaku benar terhadap semuanya ini, maka seakan-akan semua api suci telah senantiasa dipelihara dan dilayani olehnya menurut tata cara. Inilah dharma abadi bagi seorang grihastha.
Verse 153
अनामयं च वां कच्चित् सदैवेह शरीरयो: । ब्राह्मणने उनके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकट की और उनसे पूछा--“आप दोनों इस घरमें अपने सुयोग्य पुत्र तथा सेवकोंके साथ सकुशल तो हैं न? आप दोनों शरीरसे भी सदा नीरोग रहते हैं न?”
Mārkaṇḍeya menerima pemujaan mereka dengan rasa syukur lalu bertanya: “Apakah kalian berdua sejahtera dan bebas dari penyakit? Apakah tubuh kalian di tempat ini senantiasa tetap sehat?”
Verse 214
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे चतुर्दशाधिकद्विशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपवके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध- संवादविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—khususnya bagian Markandeya Samāsya—berakhirlah bab ke-214, yakni dialog antara Brāhmaṇa dan Vyādha.
The dilemma concerns assigning blame amid deception and rumor: competing attributions (Suparṇī/Garuḍī vs. Svāhā) lead to social punishment of the sages’ wives until Viśvāmitra clarifies the underlying facts and ethical responsibility.
The chapter models epistemic restraint in ethical judgment: communal stability depends on verifying causes, correcting misattribution, and using ritual-ethical procedures to restore order rather than amplifying suspicion.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the meta-function is etiological and instructional—explaining Skanda’s cultic features and demonstrating how knowledge and rites resolve social and cosmic anxiety.