
Pitṛ-śrāddha-haviḥ-phala-nirdeśa (Offerings for Ancestors and Their Stated Results)
Upa-parva: Śrāddha-vidhi and Pitṛ-tarpaṇa Anuśāsana (Ancestral Rites Instruction Unit)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma which gifts to the pitṛs become imperishable (akṣaya), which oblation suits long duration, and what yields ‘ānantya’ (enduring continuity). Bhīṣma answers by enumerating śrāddha offerings recognized by specialists: sesame, grains (rice/barley), legumes, water, roots and fruits—stating that such śrāddha pleases the pitṛs for a month. He highlights sesame as primary and cites Manu on ‘vardhamāna-tila’ śrāddha being akṣaya. He then provides a comparative schedule of satisfaction durations linked to specific foods (including fish, various meats, dairy preparations like payasa with ghee), culminating in statements about offerings that are said to lead to ānantya at pitṛ-kṣaya. The chapter also includes a remembered gāthā attributed to pitṛ tradition, referencing Sanatkumāra’s earlier instruction, and mentions ritual occasions (e.g., trayodaśī, Maghā) and the ideal of having many sons so that at least one performs lineage-affirming rites at Gayā, associated with an ‘akṣayya’ banyan. The discourse closes by asserting that water, roots, fruits, meat, food, and anything mixed with honey can be directed toward ānantya in the pitṛ-kṣaya context.
Chapter Arc: दानधर्म के प्रसंग में देवगण ब्रह्मा के पास दौड़े आते हैं—तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियों को पीड़ित कर रहा है; जगत् की रक्षा का उपाय माँगा जाता है। → ब्रह्मा अपने समदर्शी स्वभाव का उद्घोष करते हैं—वे किसी के प्रति पक्षपात नहीं करते, पर अधर्म का पोषण भी उन्हें रुचिकर नहीं। समाधान खोजते हुए देव-ऋषि-समुदाय अग्नि के गूढ़ आविर्भाव, उसके आश्वत्थ-शमी में गमन, और तेज के रहस्य से जुड़ी घटनाओं की शृंखला में प्रवेश करता है; इसी से सुवर्ण-उत्पत्ति और दान-विधि का आधार बनता है। → अग्नि-तेज से गर्भ/आश्रय का स्पर्शमात्र ‘काञ्चनीभूत’ कर देता है—भूमि, पर्वत, द्रव्य सब स्वर्ण-प्रभा से भर उठते हैं; उसी तेज से एक दिव्य बालक त्रैलोक्य को प्रकाशित करता हुआ पर्वतों-नदियों-झरनों की ओर दौड़ पड़ता है, मानो सृष्टि के भीतर दान-धर्म का प्रत्यक्ष रूप चल पड़ा हो। → देवगण ब्रह्मा से वर/अनुग्रह पाकर संतुष्ट होते हैं; ब्रह्मा ‘तथेत्येव’ कहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं। आगे दानधर्म का व्यावहारिक निष्कर्ष दिया जाता है—सूर्योदय-काल में विधि-मन्त्रपूर्वक सुवर्ण-दान दुःस्वप्न आदि अशुभ का प्रतिहरण करता है और पुण्य-समृद्धि का हेतु बनता है। → वरुण-ईश्वरत्व और अग्नि-प्रकाश के व्यापक दावे के साथ यह संकेत छोड़ा जाता है कि यह तेज और जल-तत्त्व मिलकर जगत्-व्यवस्था को कैसे बाँधते हैं—अगले प्रसंग में उसी तत्त्व-समन्वय का विस्तार अपेक्षित है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८४ ॥। अपना छा | अफड--क+ पञ्चाशीतितमोब<् ध्याय: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अन्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध देवा ऊचु: असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवर: प्रभो । सुरानृषींश्व क्लिश्राति वधस्तस्य विधीयताम्
Para dewa berkata: “Wahai Tuhan, ada asura bernama Tāraka yang telah Engkau anugerahi karunia. Kini ia menyiksa para dewa dan para resi. Karena itu, tetapkanlah pembunuhannya.”
Verse 2
देवता बोले--प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ।। तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह । परित्रायस्व नो देव न हाुन्या गतिरस्ति न:,पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है। आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है
Para dewa berkata: “Wahai Tuhan, Daitya bernama Tāraka—yang dahulu Engkau beri anugerah—kini sangat menyiksa para dewa dan para resi. Karena itu, carikanlah jalan untuk memusnahkannya. Dari hal ini timbul ketakutan besar pada kami, wahai Kakek Agung. Lindungilah kami, wahai Yang Ilahi; sebab kami tiada tempat berlindung selain Engkau.”
Verse 3
ब्रह्मोवाच समोऊहं सर्वभूतानामधर्म नेह रोचये | हन्यतां तारक: क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता,ब्रद्माजीने कहा--मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अत: देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो
Brahmā berkata: “Aku bersikap sama terhadap semua makhluk; namun aku tidak menyukai adharma. Karena itu, segeralah bunuh Tāraka yang menindas rombongan para dewa dan resi.”
Verse 4
वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयु: सुरसत्तमा: । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वर:,सुरश्रेष्ठाणण! वेदों और धर्मोका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये
“Wahai yang terbaik di antara para dewa, Veda dan Dharma tidak akan lenyap. Aku telah menata di sini, sejak awal, cara untuk mencegahnya. Karena itu, lenyapkanlah kegelisahanmu yang seperti demam.”
Verse 5
देवा ऊचु वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वित: । देवैर्न शक््यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत्,देवता बोले--भगवन्! आपके ही वरदानसे वह दैत्य बलके घमंडसे भर गया है। देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसी दशामें वह कैसे शान्त हो सकता है?
Para dewa berkata: “Wahai Yang Terberkahi, karena anugerah-Mu Daitya itu menjadi mabuk oleh kesombongan kekuatan. Para dewa tak mampu membunuhnya. Dalam keadaan demikian, bagaimana mungkin ia dapat ditundukkan atau diredakan?”
Verse 6
स हि नैव सम देवानां नासुराणां न रक्षसाम् । वध्य: स्यामिति जग्राह वरं त्वत्त: पितामह,पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ
Bhishma berkata: “Wahai Kakek Agung, ia telah memperoleh anugerah ini darimu: ‘Semoga aku tidak terbunuh oleh para dewa, tidak pula oleh para asura, dan tidak oleh para raksasa.’”
Verse 7
देवाश्व शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुराकृते । न भविष्यति वो<पत्यमिति सर्वे जगत्पते,जगत्पते! पूर्वकालमें जब हमने रुद्राणीकी संततिका उच्छेद कर दिया, तब उन्होंने सब देवताओंको शाप दे दिया कि तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी
Bhishma berkata: “Wahai Penguasa jagat, pada masa lampau ketika kami memusnahkan keturunan Rudrani, Rudrani mengutuk semua dewa dengan berkata: ‘Kalian tidak akan memiliki keturunan.’”
Verse 8
ब्रह्मोवाच हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमा: । स उत्पादयितापत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम्,ब्रह्माजी बोले--सुरश्रेष्टण! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे। अतः देवद्रोहियोंके वधके लिये वे ही संतान उत्पन्न करेंगे
Brahma bersabda: “Wahai yang terbaik di antara para dewa, pada saat kutukan itu diucapkan, Agni—Hutashana—tidak hadir di sana. Karena itu, demi membinasakan para pembenci para dewa, dialah yang akan memperanakkan seorang putra.”
Verse 9
तद् वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् | मानुषानथ गन्धर्वान् नागानथ च पक्षिण:,वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँधकर अपने अचूक अस्त्र-शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है। दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा
Bhishma berkata: “Ia akan melampaui semuanya—para dewa, Dānava, Rākṣasa, manusia, Gandharva, Nāga, bahkan burung-burung—dan dengan daya senjata ilahinya yang tak pernah meleset, ia akan membunuh Asura yang menimbulkan ketakutan pada kalian; juga akan membinasakan musuh-musuh dewa lainnya.”
Verse 10
अस्त्रेणामोघपातेन शकक््या तं घातयिष्यति । यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रव:,वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँधकर अपने अचूक अस्त्र-शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है। दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा
Bhishma berkata: “Dengan pelepasan senjata ilahi yang tak pernah meleset, ia akan mampu membunuh musuh itu—dialah yang menimbulkan ketakutan pada kalian; dan ia pun akan membinasakan musuh-musuh dewa lainnya.”
Verse 11
सनातनो हि संकल्प: काम इत्यभिधीयते । रुद्रस्य तेज: प्रस्कन्नमग्नी निपतितं च यत्,सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं। उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है। द्वितीय अग्निके समान उस महान् तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे। वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा
Niat yang kekal itulah yang disebut Kāma (hasrat). Dari Kāma itu, daya-nyala Rudra yang terlepas dan jatuh ke dalam Agni telah diterima dan ditahan oleh Agni. Kelak para dewa akan menempatkan cahaya agung yang laksana api kedua itu ke dalam Sungai Gaṅgā dan melahirkannya sebagai seorang anak; anak itulah yang akan menjadi sebab kebinasaan musuh-musuh para dewa.
Verse 12
तत्तेजोडग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिति पावकम् | वधार्थ देवशत्रूणां गंगायां जनयिष्यति,सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं। उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है। द्वितीय अग्निके समान उस महान् तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे। वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा
Cahaya besar yang bersifat unsur-primordial itu—yang dipangku Agni sebagai ‘api kedua’—akan dilahirkan di Sungai Gaṅgā demi membinasakan musuh-musuh para dewa. Dari sana akan lahir seorang anak, dan anak itulah yang menjadi sebab kemenangan para dewa atas lawan-lawan mereka.
Verse 13
स तु नावाप त॑ शापं नष्ट: स हुतभुक् तदा । तस्माद् वो भयह्ृद् देवा: समुत्पत्स्यति पावकि:
Namun sesungguhnya ia tidak terkena kutukan itu; kutukan tersebut lenyap, dan pada saat itu ia menjadi Hutabhuk—yakni Agni. Karena itu, wahai para dewa, Pāvaka, sang penghapus takut, akan bangkit kembali di tengah kalian.
Verse 14
अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ।। अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम् | तारकस्य वधोपाय: कथितो वै मयानघा:,तुमलोग अग्निदेवकी खोज करो और उन्हें आज ही इस कार्यमें नियुक्त करो। निष्पाप देवताओ! तारकासुरके वधका यह उपाय मैंने बता दिया
Pada saat itu Agni-dewa bersembunyi; karena itu kutukan tersebut tidak menjangkaunya. Maka, wahai para dewa, putra yang akan lahir dari Agni akan melenyapkan seluruh ketakutan kalian. Carilah Jvalana (Agni) dan tugaskan dia pada pekerjaan ini hari ini juga. Wahai yang tanpa noda, telah kukatakan jalan untuk membunuh Tāraka.
Verse 15
न हि तेजस्विनां शापास्तेज:सु प्रभवन्ति वै । बलान्यतिबल प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै,तेजस्वी पुरुषोंके शाप तेजस्वियोंपर अपना प्रभाव नहीं दिखाते। साधारण बली कितने ही क्यों न हों, अत्यन्त बलशालीको पाकर दुर्बल हो जाते हैं
Kutukan orang-orang yang bercahaya dan kuat tidak sungguh-sungguh berdaya atas mereka yang juga bercahaya oleh tejas. Demikian pula kekuatan-kekuatan biasa—betapapun banyaknya—menjadi lemah ketika berhadapan dengan yang mahakuat.
Verse 16
हन्यादवध्यान् वरदानपि चैव तपस्विन: । संकल्पाभिरुचि: काम: सनातनतमो5भवत्,तपस्वी पुरुषका जो काम है, वही संकल्प एवं अभिरुचिके नामसे प्रसिद्ध है। वह सनातन या चिरस्थायी होता है। वह वर देनेवाले अवध्य पुरुषोंका भी वध कर सकता है
Bhīṣma berkata: Bahkan para pertapa yang dianggap “tak tersentuh”—yang telah memperoleh anugerah dan memiliki kuasa memberi karunia—dapat dijatuhkan oleh hasrat. Hasrat itu juga dikenal sebagai “tekad” (saṅkalpa) dan “kecenderungan” (abhiruci); ia paling purba dan bertahan lama. Ia menetap sebagai daya batin yang dalam, mampu menundukkan bahkan mereka yang telah mencapai kesempurnaan rohani; karena itu, dalam menapaki dharma, ia harus dipahami dan dikendalikan.
Verse 17
जगत्पतिरनिर्देश्य: सर्वग: सर्वभावन: । हृच्छय: सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभु:
Bhīṣma berkata: Penguasa jagat raya tak dapat dilukiskan secara tepat; Ia meresapi segalanya dan melahirkan segala keadaan wujud. Ia bersemayam di hati semua makhluk; Ia yang paling purba dan Mahakuasa—lebih agung bahkan daripada Rudra dalam kedaulatan.
Verse 18
अग्निदेव इस जगत्के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ।। अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिह्ुुताशन: । स वो मनोगतं काम॑ देव: सम्पादयिष्यति
Bhishma berkata: Agni, Dewa Api, adalah pelindung dunia ini—tak terkatakan, meresapi segalanya, sumber segala sesuatu, bersemayam di hati semua makhluk, Mahakuasa, bahkan lebih tua daripada Rudra. Carilah segera Hutashana, sang gumpalan cahaya; dewa itu akan menuntaskan hasrat yang tersimpan di dalam benak kalian.
Verse 19
तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो। वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ।। एतद्ू वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मन: । जम्मु: संसिद्धसंकल्पा: पर्येषन्तो विभावसुम्,महात्मा ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सफलमनोरथ हुए देवता अग्निदेवका अन्वेषण करनेके लिये वहाँसे चले गये
Bhishma berkata: Kalian semua, segeralah mencari Agni, sang gumpalan cahaya; ia akan memenuhi keinginan yang kalian dambakan. Mendengar sabda sang mahatma itu, para dewa—teguh dalam tekad dan yakin akan keberhasilan—berangkat dari sana untuk mencari Vibhāvasu (Agni).
Verse 20
ततस्त्रैलेक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरै: सह । कांक्षन्तो दर्शन बल्लेः सर्वे तद्तमानसा:,तब देवताओंसहित ऋषियोंने तीनों लोकोंमें अग्निकी खोज प्रारम्भ की। उन सबका मन उन्हींमें लगा था और वे--सभी अग्निदेवका दर्शन करना चाहते थे
Kemudian para resi, bersama para dewa, mulai mencari Agni di tiga dunia. Pikiran mereka sepenuhnya tertuju pada tujuan itu, sebab semuanya merindukan darśana Agni, sang Dewa Api.
Verse 21
भुगुश्रेष्ठट उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे
Bhishma berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bhṛgu, engkau berhias tapa tertinggi, bercahaya dan termasyhur di segala dunia. Maka para Siddha dan para dewa, di seluruh alam, terus-menerus mencari Agni, sang Dewa Api (Havyavāhana).”
Verse 22
नष्टमात्मनि संलीनं नाधिजम्मुर्ठुताशनम् । ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान्,वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला --
Bhishma berkata: “Agni telah lenyap, tersembunyi dan menyatu ke dalam dirinya sendiri, sehingga para dewa tak dapat menjangkaunya. Maka para dewa pun gentar, namun tetap rindu menyaksikan Agni. Saat itulah seekor katak penghuni air—terbakar oleh kedahsyatan sinar api dan letih di hati—naik dari kedalaman Rasātala dan berbicara kepada para dewa.”
Verse 23
जलेचर: क्लान्तमनास्तेजसाग्ने: प्रदीपित: । उवाच देवान् मण्डूको रसातलतलोत्थित:,वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला --
Katak penghuni air itu, tersengat oleh nyala-teja Agni dan letih di hati, bangkit dari dasar Rasātala lalu berbicara kepada para dewa.
Verse 24
रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो । संतापादिह सम्प्राप्त: पावकप्रभवादहम्
“Wahai Tuan, dikatakan bahwa para dewa berada di dasar Rasātala dan bahwa Agni pun bersemayam di sana. Namun aku datang kemari karena tersiksa oleh panas yang membakar—derita ini timbul dari cahaya-kuasa Sang Pāvaka sendiri.”
Verse 25
“'देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ।। स संसुप्तो जले देवा भगवान् हव्यवाहन: । अप: संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम्,“देवगण! भगवान् अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं। हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं
“Wahai para dewa, Agni bersemayam di Rasātala. Sang Bhagavān Havyavāhana telah terlelap di dalam air, setelah menyatukan air dengan daya-teja miliknya; dan oleh sinar itulah kami tersengat, terbakar, dan menderita.”
Verse 26
तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसो: । तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्य वो यदि वल्लिना,“देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये
Bhīṣma berkata: “Wahai para dewa, jika kalian ingin memandang Vibhāvasu (Dewa Api, Agni), dan bila ada urusan yang hendak kalian selesaikan dengan sang pemegang tongkat, maka pergilah ke sana juga dan temuilah dia.”
Verse 27
गम्यतां साधयिष्यामो वयं हाग्निभयात् सुरा: । एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत्,“देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।! इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया
Bhīṣma berkata: “Pergilah; wahai para dewa! Kami pun akan mengurus diri kami—karena takut pada api, kami akan berpindah ke tempat lain.” Setelah berkata demikian, si katak segera menyelam ke dalam air.
Verse 28
हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै,अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि “तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा”
Bhīṣma berkata: Agni, Dewa Api, memahami perbuatan si katak yang suka mengadu domba. Mendekatinya, ia mengutuk: “Sungguh, engkau takkan mengenal rasa dan cita.”
Verse 29
त॑ वै संयुज्य शापेन मण्डूकं॑ त्वरितो ययौ । अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत्,मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया
Bhīṣma berkata: Setelah mengikatnya dengan kutuk itu, Agni segera pergi untuk berdiam di tempat lain. Sang Mahakuasa yang meresapi segalanya pun tidak lagi menampakkan diri secara terbuka.
Verse 30
देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्ड्रकानां भृगूत्तम । यत्तच्छूणु महाबाहो गदतो मम सर्वश:,भुगुश्रेष्॒ महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो
Bhīṣma berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum Bhṛgu, wahai yang berlengan perkasa, dengarkan dariku seluruh kisah tentang anugerah yang dahulu para dewa limpahkan kepada katak-katak Maṇḍraka.”
Verse 31
देवा ऊचु अग्निशापादजिद्नापि रसज्ञानबहिष्कृता: | सरस्वती बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ,देवता बोले--मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्नला नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे
Para dewa berkata: “Karena kutukan Agni, kalian akan tanpa lidah; maka kalian akan tersingkir dari pengetahuan tentang rasa. Namun, oleh anugerah Sarasvatī, kalian tetap akan mampu mengucapkan ujaran dalam banyak ragam.”
Verse 32
बिलवासं गतांश्रैव निराहारानचेतस: । गतासूनपि संशुष्कान् भूमि: संधारयिष्यति
Bhīṣma berkata: Bahkan mereka yang pergi tinggal di lubang dan gua—tanpa makanan, tanpa kesadaran—ya, bahkan tubuh yang telah tak bernyawa dan mengering pun, bumi tetap menanggung dan menopangnya.
Verse 33
इत्युक्त्वा तांस्ततो देवा: पुनरेव महीमिमाम्
Setelah berkata demikian kepada mereka, para dewa kembali menoleh kepada bumi ini.
Verse 34
अथ तान् द्विरद: वक्षित् सुरेन्द्रद्धिदोपम:
Lalu gajah perkasa itu—bercahaya dan menggentarkan laksana Indra—berbicara kepada mereka.
Verse 35
शशाप ज्वलन: सर्वान् द्विरदान् क्रोधमूर्च्छित:
Bhīṣma berkata: Dikuasai amarah hingga kehilangan kendali, Jvalana (Dewa Api) menjatuhkan kutuk atas semua gajah.
Verse 36
इत्युक्त्वा नि:सृतो5श्वत्थादग्निर्वारणसूचित: । प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्नि: सुषुप्सया,ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये। वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे
Setelah berkata demikian, Agni—yang ditunjukkan oleh gajah—keluar dari pohon aśvattha lalu masuk ke rongga (rahim) pohon śamī, karena ingin beristirahat dalam tidur yang lelap.
Verse 37
अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो । देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमा:,प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो
Wahai tuan, wahai yang terbaik dari garis Bhṛgu, dengarkanlah anugerah yang para dewa—teguh dalam keberanian—curahkan kepada bangsa Nāga karena berkenan hati.
Verse 38
देवा ऊचु प्रतीपया जिह्दयापि सर्वाहारं करिष्यथ | वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यज्जिताक्षराम्,देवता बोले--हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी
Para dewa bersabda: “Wahai para gajah! Dengan lidahmu yang terbalik pun engkau akan dapat menyantap segala jenis makanan; dan engkau akan dapat mengeluarkan suara dengan nyaring, namun tanpa melafalkan satu huruf pun dengan jelas.”
Verse 39
इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुससुर्दिवौकस: । अश्वत्थान्नि:सृतश्चाग्नि: शमीगर्भमुपाविशत्,ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अभश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे
Setelah berkata demikian, para penghuni surga kembali mengejar Agni. Sementara itu Agni, keluar dari pohon aśvattha, masuk dan bersembunyi di rongga (rahim) pohon śamī.
Verse 40
शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवा: समुपाद्रवन् । शशाप शुकममग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि
Wahai brāhmaṇa, ketika Śuka memberitahukan perkara itu, para dewa bergegas menyerbunya dengan gelisah. Maka Agni mengutuk Śuka: “Engkau akan menjadi tanpa ujaran.”
Verse 41
विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया--'तू वाणीसे रहित हो जायगा” ।। जिह्दामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक् तथा । दृष्टवा तु ज्वलनं देवा: शुकमूचुर्दयान्विता:
Bhishma berkata: “Kemudian Agni, sang pemakan persembahan, membalikkan lidah burung nuri itu juga, sehingga ia tak mampu lagi berkata-kata. Melihat api yang menyala-nyala, para dewa—tergerak oleh belas kasih—menyapa burung nuri itu.”
Verse 42
भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति । आवृत्तजिद्दस्य सतो वाक््यं कान््तं भविष्यति
Bhishma berkata: “Engkau tidak akan selamanya berada dalam wujud burung nuri dengan kehilangan suara. Bila seseorang sungguh berbudi dan telah berbalik dari kesalahan, ucapannya menjadi indah dan patut didengar.”
Verse 43
इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्लिमालक्ष्य देवता:,ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया। तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे
Bhishma berkata: “Setelah berkata demikian, para dewa melihat Agni di dalam rahim (inti) pohon śamī. Maka mereka menetapkan śamī itulah sebagai kediaman Agni yang suci dan disahkan bagi segala upacara. Sejak saat itu Agni tampak bersemayam di dalam śamī.”
Verse 44
तदेवायतन चक्कु: पुण्यं सर्वक्रियास्वपि । ततः प्रभृति चाप्यग्नि: शमीगर्भेषु दृश्यते,ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया। तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे
Bhishma berkata: “Itulah (śamī) yang menjadi kediaman suci dan tanda bagi segala ritus. Sejak saat itu Agni terlihat berada dalam rahim (inti) śamī.”
Verse 45
उत्पादने तथोपायमभिजम्मुश्न मानवा: । आपो रसालले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना,भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन््थन ही उपाय जाना। अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है
Bhishma berkata: “Wahai Bhārgava, untuk menampakkan api, manusia mengetahui upayanya: menyalakannya melalui gesekan (kayu śamī). Dan air di Rasātala yang bersentuhan dengan Citrabhānu (Dewa Api) menjadi panas oleh sinarnya; dengan melepaskan panas itu, air tersebut muncul sebagai mata air hangat di pegunungan.”
Verse 46
ता: पर्वतप्रस्नरवणैरूष्मां मुज्चन्ति भार्गव । पावकेनाधिशयता संतप्तास्तस्य तेजसा,भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन््थन ही उपाय जाना। अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है
Bhishma berkata: “Wahai Bhargava, air-air itu—dipanaskan oleh daya unggul Agni dan tersengat oleh sinarnya—melepaskan panasnya melalui mata air pegunungan.”
Verse 47
अथानिनिर्देवता दृष्टवा बभूव व्यथितस्तदा । किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावक:,उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे --'किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है?”
Lalu, ketika melihat para dewa berkumpul di sana, Agni menjadi gelisah. Ia bertanya kepada mereka: “Untuk tujuan apakah kalian datang ke sini?”
Verse 48
तमूचुर्विबुधा: सर्वे ते चैव परमर्षय: । त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद् भवान् कर्तुमरहति,तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले--“हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे। उसे तुम्हें करना चाहिये। उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा”
Maka semua dewa beserta para resi agung berkata kepadanya: “Kami akan menugaskanmu pada suatu pekerjaan; patutlah engkau melaksanakannya.”
Verse 49
कृते च तस्मिन् भविता तवापि सुमहान् गुण:,तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले--“हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे। उसे तुम्हें करना चाहिये। उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा”
“Dan bila tugas itu terselesaikan, kebajikan yang amat besar pun akan timbul bagimu.”
Verse 50
अग्निरुवाच ब्रूत यद् भवतां कार्य कर्तास्मि तदहं सुरा: । भवतां तु नियोज्यो5स्मि मा वो<त्रास्तु विचारणा,अग्निने कहा--देवताओ! आपलोगोंका जो कार्य है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, अतः उसे कहिये। मैं आपलोगोंका आज्ञापालक हूँ। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
Agni berkata: “Katakanlah tugas apa yang harus kulakukan, wahai para dewa; pasti akan kuselesaikan. Aku berada di bawah penugasan kalian—jangan ada keraguan dalam perkara ini.”
Verse 51
देवा ऊचु असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पित: । अस्मान् प्रबाधते वीर्याद् वधस्तस्य विधीयताम्,देवता बोले--अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है। अतः तुम उसके वधका कोई उपाय करो
Para dewa berkata, “Wahai Agni! Ada seorang asura bernama Tāraka yang, mabuk oleh kesombongan karena anugerah Brahmā, menindas kami semua dengan kekuatan kepahlawanannya. Karena itu, tetapkanlah suatu cara untuk membinasakannya.”
Verse 52
इमान् देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा । ऋषींश्वापि महाभाग परित्रायस्व पावक,तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो
“Wahai yang terkasih, wahai Pāvaka yang mulia! Lindungilah para dewa ini, rombongan para Prajāpati, dan para ṛṣi juga.”
Verse 53
अपत्यं तेजसा युक्त प्रवीरं जनय प्रभो । यद् भयं नोअसुरात् तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन,प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे
“Wahai Tuhan, wahai Havyavāhana! Anugerahkanlah seorang putra yang bercahaya dan sungguh-sungguh pahlawan, yang akan melenyapkan ketakutan kami yang datang dari asura itu.”
Verse 54
शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम् | अन्यत्र भवतो वीर्य तस्मात् त्रायस्व नः प्रभो,प्रभो! महादेवी पार्वतीने हमलोगोंको संतानहीन होनेका शाप दे दिया है; अतः तुम्हारे बलवीर्यके सिवा हमारे लिये दूसरा कोई आश्रय नहीं रह गया है इसलिये हमलोगोंकी रक्षा करो
“Wahai Tuhan, Mahādevī telah mengutuk kami menjadi tanpa keturunan; karena itu, selain kekuatan dan daya kepahlawananmu, tiada lagi tempat berlindung bagi kami. Maka lindungilah kami, wahai Prabhu.”
Verse 55
इत्युक्त: स तथेत्युक्त्वा भगवान् हव्यवाहन: । जगामाथ दुराधर्षो गड़ां भागीरथीं प्रति,देवताओंके ऐसा कहनेपर “तथास्तु” कहकर दुर्धर्ष भगवान् हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये
Mendengar demikian, Havyavāhana yang ilahi menjawab, “Demikianlah,” lalu ia—yang tak tertandingi—berangkat menuju Gaṅgā Bhāgīrathī.
Verse 56
तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भ चास्यादधे तदा । ववृधे स तदा गर्भ: कक्षे कृष्णगतिर्यथा,वे वहाँ गंगाजीसे मिले। गंगाजीने उस समय भगवान् शंकरके उस तेजको गर्भरूपसे धारण किया। जैसे सूखे तिनकों अथवा लकड़ियोंके ढेरमें रखी हुई आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वह तेजस्वी गर्भ गंगाजीके भीतर बढ़ने लगा
Ia pun bersatu dengannya; pada saat itu Gaṅgā mengandung benihnya. Lalu embrio itu tumbuh di dalam dirinya, bagaikan api—meski jalannya tampak gelap—yang menyala berkobar ketika tersimpan di rongga atau tumpukan bahan bakar.
Verse 57
तेजसा तस्य देवस्य गंगा विह्ललचेतना । संतापमगमत् तीव्रं सोढुं सा न शशाक ह,अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया। वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं
Oleh daya menyala yang dianugerahkan dewa itu (Agni), batin Gaṅgā menjadi guncang. Ia dilanda panas yang amat dahsyat dan tak sanggup menanggungnya.
Verse 58
आठिते ज्वलनेनाथ गर्भ तेजा: समन्विते । गंगायामसुर: कश्चिद् भैरवं नादमानदत्,अन्निके द्वारा गंगाजीमें स्थापित किया हुआ वह तेजस्वी गर्भ जब बढ़ रहा था, उसी समय किसी असुरने वहाँ आकर सहसा बड़े जोरसे भयानक गर्जना की
Ketika embrio bercahaya—dipenuhi daya api—telah ditempatkan oleh Agni dan sedang tumbuh dalam perairan Gaṅgā, seorang asura tiba-tiba datang dan mengaum dengan mengerikan.
Verse 59
अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा । वित्रस्तोदभ्रान्तनयना गंगा विख्बुतलोचना,उस आकस्मिक महान् सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंस आँसू बहने लगा
Tersentak oleh auman yang mendadak dan dahsyat itu, Gaṅgā diliputi ketakutan. Matanya berputar dalam panik, pandangannya kacau, dan air mata pun menggenang.
Verse 60
विसंज्ञा नाशकद् गर्भ वोढुमात्मानमेव च । सा तु तेज:परीतांगी कम्पयन्तीव जाह्नवी,वे अचेत हो गयीं। अतः उस गर्भको और अपने-आपको भी न सम्हाल सकीं। उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे। विप्रवर! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई-सी अग्निसे बोलीं--“भगवन्! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ
Ia pun kehilangan kesadaran; ia tak mampu menanggung embrio itu, bahkan tak sanggup menopang dirinya sendiri. Seluruh tubuhnya diselubungi daya yang menyala. Wahai brahmana terbaik, saat itu sang dewi Jahnavī, terguncang oleh kekuatan embrio itu dan gemetar seakan berada dalam api, berkata: “Wahai Yang Mulia, aku tak sanggup menampung sinar-Mu ini.”
Verse 61
उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धता । ते न शक्तास्मि भगवंस्तेजसो5स्य विधारणे,वे अचेत हो गयीं। अतः उस गर्भको और अपने-आपको भी न सम्हाल सकीं। उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे। विप्रवर! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई-सी अग्निसे बोलीं--“भगवन्! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ
Wahai brahmana utama! Saat itu, Dewi Jāhnavī, terguncang oleh daya kandungan, gemetar dan berkata kepada Agni—“Wahai Bhagavan! Aku tak sanggup menanggung sinar-tejas-Mu ini.”
Verse 62
विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा । विह्वला चास्मि भगवंश्लेतो नष्टे च मेडनघ,“निष्पाप अग्निदेव! इसने मुझे मूर्च्छित-सी कर दिया है। मेरा स्वास्थ्य अब पहले-जैसा नहीं रह गया है। भगवन्! मैं बहुत घबरा गयी हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है
Wahai Agni yang tanpa noda! Ini membuatku seakan pingsan. Kesehatanku tak lagi seperti dahulu. Wahai Bhagavan! Aku sangat gelisah; kesadaranku seakan lenyap.
Verse 63
धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर । उत्स्रक्ष्येडहमिमं दुःखान्न तु कामात् कथंचन,“तपनेवालोंमें श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस गर्भको धारण किये रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। मैं असह्ाय दुःखसे ही इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छासे किसी प्रकार नहीं
Wahai Pāvaka, yang terbaik di antara para pertapa! Aku tak lagi punya kekuatan untuk terus mengandung ini. Hanya karena derita yang tak tertahankan aku akan melepaskannya—bukan, bagaimanapun juga, karena kehendak atau nafsu.
Verse 64
न तेजसो<स्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो । आपदर्थ हि सम्बन्ध: सुसूक्ष्मोडपि महाद्युते,“देव! विभावसो! महाद्युते! इस तेजके साथ मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। इस समय जो अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह भी देवताओंपर आयी हुई विपत्तिको टालनेके उद्देश्यसे ही है
Wahai dewa Vibhāvasu, yang bercahaya agung! Tak ada sentuhan nyata antara diriku dan daya api ini. Bahkan ikatan yang amat halus yang timbul kini pun semata-mata demi menolak malapetaka yang menimpa para dewa.
Verse 65
यदत्र गुणसम्पन्नमितरद् वा हुताशन । त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मा च केवलौ,“हुताशन! इस कार्यमें यदि कोई गुण या दोषमुक्त परिणाम हो अथवा केवल धर्म या अधर्म हो, उन सबका उत्तरदायित्व आपपर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ”
Wahai Hutāśana! Entah hasil perbuatan ini bernilai kebajikan atau sebaliknya, dan entah ia berujung semata pada dharma atau semata pada adharma—tanggung jawab atas semuanya, menurutku, berada pada dirimu saja.
Verse 66
तामुवाच ततो वल्लिर्धार्यतां धार्यतामिति । गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदय:,तब अग्निने गंगाजीसे कहा--देवि! यह गर्भ मेरे तेजसे युक्त है, इससे महान् गुणयुक्त फलका उदय होनेवाला है। इसे धारण करो, धारण करो
Lalu Vallī berkata kepadanya: “Tanggunglah—tanggunglah sungguh. Janin ini dipenuhi oleh tejas (daya api) dariku; darinya akan terbit buah agung yang kaya kebajikan.”
Verse 67
शक्ता हासि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा । न हि ते किंचिदप्राप्पमन्यतो धारणादृते,“देवि! तुम सारी पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भको धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है”
“Wahai Dewi! Engkau sanggup memikul dan menopang seluruh bumi; maka mengandung janin ini bukanlah hal yang mustahil bagimu—tiada yang tak terjangkau bagimu, kecuali apa yang mustahil tanpa tindakan menopang itu sendiri.”
Verse 68
सा वल्विना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा । समुत्ससर्ज तं॑ गर्भ मेरौ गिरिवरे तदा,देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया
Walau dicegah oleh para dewa dan oleh Valvī, Gaṅgā—yang utama di antara sungai-sungai—melepaskan janin itu; dan pada saat itu ia menaruhnya di Meru, gunung yang termulia.
Verse 69
समर्था धारणे चापि रुद्रतेज:प्रधर्षिता । नाशकत् _त॑ तदा गर्भ संधारयितुमोजसा,यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं
Walaupun Gaṅgā mampu mengandung, ia ditundukkan oleh tejas Rudra; maka pada saat itu, sekalipun dengan kekuatannya sendiri, ia tak sanggup menopang janin itu.
Verse 70
सा समुत्सृज्य तं दुःखाद् दीप्तवैश्वानरप्रभम् । दर्शयामास चाग्निस्तं तदा गंगां भूगूद्धह,भगुश्रेष्! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया। तत्पश्चात् अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा--'“देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो”
Dilanda duka, Gaṅgā menanggalkan janin itu, yang bercahaya laksana api Vaiśvānara. Lalu, wahai yang terbaik di antara para Bhṛgu, Agni menampakkan diri di hadapan Gaṅgā dan bertanya: “Dewi, apakah kandunganmu telah berakhir dengan selamat dan sejahtera? Bagaimanakah sinar sang anak—bagaimana wujudnya tampak, dan tejas macam apakah yang menyertainya? Katakan semuanya kepadaku.”
Verse 71
पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद् गर्भ: सुखोदय: । कीदृग्वर्णोडपि वा देवि कीद्ग्रूपश्च दृश्यते । तेजसा केन वा युक्त: सर्वमेतद् ब्रवीहि मे,भगुश्रेष्! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया। तत्पश्चात् अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा--'“देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो”
Bhīṣma berkata—Agni, setelah memandang Gaṅgā, yang utama di antara sungai-sungai, bertanya: “Wahai Dewi, apakah kandunganmu telah lahir dengan selamat dan bahagia? Bagaimanakah warna kulitnya, dan bagaimana wujudnya tampak? Dengan jenis sinar apakah ia dianugerahi? Katakanlah semuanya kepadaku.”
Verse 72
गंगोवाच जातरूप: स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ । सुवर्णो विमलो दीप्त: पर्वतं चावभासयत्,गंगा बोलीं--देव! वह गर्भ क्या है, सोना है। अनघ! वह तेजमें हूबहू आपके ही समान है। सुवर्ण-जैसी निर्मल कान्तिसे प्रकाशित होता है और सारे पर्वतको उद्धासित करता है
Gaṅgā berkata: “Wahai Dewa, janin itu sungguh terbuat dari emas. O yang tanpa noda, dalam pancaran ia persis sepertimu. Berkilau dengan kejernihan laksana emas, ia menerangi bahkan seluruh gunung.”
Verse 73
पद्मोत्पलविमिश्राणां हृदानामिव शीतल: । गन्धो5स्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतां वर,तपनेवालोंमें श्रेष्ठ अग्निदिव! कमल और उत्पलसे संयुक्त सरोवरोंके समान उसका अंग शीतल है और कदम्ब-पुष्पोंके समान उससे मीठी-मीठी सुगन्ध फैलती रहती है
Bhīṣma berkata: “Wahai yang terbaik di antara para pertapa, tubuhnya sejuk seperti telaga yang dihiasi teratai dan teratai biru; dan darinya menguar harum manis, sebanding dengan bunga kadamba.”
Verse 74
तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिशि: । यद् द्रव्यं परसंसृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च
Bhīṣma berkata: “Oleh pancaran janin itu—laksana sinar matahari—segala zat yang telah bercampur dan terserak di bumi maupun di dalam pegunungan tertarik dan terkumpul kembali.”
Verse 75
पर्यधावत शैलांश्व नदी: प्र्नवणानि च
Bhīṣma berkata: “Ia berlari menjelajah—melintasi pegunungan, menyusuri sungai-sungai, dan melalui lereng-lereng yang menurun.”
Verse 76
एवंरूप: स भगवान् पुत्रस्ते हव्यवाहन । सूर्यवैश्वानरसम: कान्त्या सोम इवापर:,हव्यवाहन! आपका एऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है। वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् है
Wahai Havyavāhana (Dewa Api), putramu yang mulia sungguh berwujud demikian. Dalam sinar ia setara dengan Surya dan Vaiśvānara; dan dalam kilau lembut ia laksana rembulan yang lain.
Verse 77
एवमुक््त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्य दिवौकसाम्
Setelah berkata demikian, sang dewi lenyap saat itu juga. Dan Pāvaka yang bercahaya pun, setelah menuntaskan tugas bagi para penghuni surga, berangkat dari sana.
Verse 78
जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन । भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ।। एतै: कर्मगुणैलोंके नामाग्ने: परिगीयते
Kemudian, wahai putra kebanggaan garis Bhārgava, ia pergi menuju negeri yang diinginkannya. Setelah berkata demikian, Dewi Gaṅgā lenyap di tempat itu juga; dan Dewa Agni yang bercahaya, setelah menuntaskan maksud para dewa, berangkat saat itu juga dari sana menuju tujuan pilihannya. Oleh perbuatan dan kebajikan semacam inilah nama Agni dimuliakan di dunia.
Verse 79
हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा । पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै
Para resi dan kaum bijak menyebutnya “Hiraṇyaretā.” Dan pada masa itu pula Dewi Bumi termasyhur sebagai “Vasumatī.”
Verse 80
इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं। उस समय अग्निजनित हिरण्य (वसु) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ।। स तु गर्भो महातेजा गांगेय: पावकोद्धव: । दिव्यं शरवण्णं प्राप्प ववृधेडद्भुतदर्शन:,अग्निके अंशसे उत्पन्न हुआ गंगाका वह महातेजस्वी गर्भ सरकण्डोंके दिव्य वनमें पहुँचकर बढ़ने और अद्भुत दिखायी देने लगा
Karena sekian banyak perbuatan dan kebajikan inilah para dewa dan resi di dunia menyapa Agni dengan nama “Hiraṇyaretā,” ia yang benihnya keemasan. Pada masa itu, sebab Dewi Bumi mengandung sari keemasan (Vasu) yang lahir dari Agni, ia pun termasyhur sebagai “Vasumatī,” sang pemilik kekayaan. Lalu embrio yang bercahaya itu—Gāṅgeya, terlahir dari Api—mencapai hutan ilahi Śaravaṇa (rimba ilalang) dan tumbuh di sana, tampak menakjubkan dipandang.
Verse 81
ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम् । पुत्रं वै ताश्न तं बाल॑ पुपुषु: स्तन््यविस््रवै:,प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाले उस तेजस्वी बालकको कृत्तिकाओंने देखा और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पालन-पोषण किया
Para Kṛttikā menyaksikan anak itu, yang sinarnya laksana matahari yang baru terbit. Menganggapnya sebagai putra mereka sendiri, mereka menumbuhkan dan membesarkannya dengan mengalirkan air susu dari payudara mereka kepadanya.
Verse 82
ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युति: । स्कन्नत्वात् स्कन्दतां चापि गुहावासाद् गुहो&भवत्,इसीलिये वह परम तेजस्वी कुमार “कार्तिकेय' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शिवके स्कन्दित (स्खलित) वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण उनका नाम 'स्कन्द' हुआ और पर्वतकी गुहामें निवास करनेसे वह “गुह” कहलाया
Sesudah itu, pemuda yang amat cemerlang itu dikenal sebagai Kārtikeya. Karena lahir dari benih yang tertumpah (skannita), ia juga menerima nama Skanda; dan karena berdiam di gua pegunungan, ia pun disebut Guha.
Verse 83
एवं सुवर्णमुत्पन्नममपत्यं जातवेदस: । तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठ देवानामपि भूषणम्,इस प्रकार अग्निसे संतानरूपमें सुवर्णकी उत्पत्ति हुई है। उसमें भी जाम्बूनद नामक सुवर्ण श्रेष्ठ है और वह देवताओंका भी भूषण है
Demikianlah emas lahir sebagai keturunan Agni, Jātavedas, sang yang mengetahui segala kelahiran. Di antara ragam emas, yang disebut Jāmbūnada adalah yang paling utama, dan menjadi perhiasan bahkan bagi para dewa.
Verse 84
ततः प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहतम् | रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च,तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ। वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आशभृषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है
Sejak saat itu pula, zat ini disebut ‘jātarūpa’ (emas). Ia dipandang sebagai permata terbaik di antara segala ratna, dan demikian pula sebagai perhiasan yang paling utama.
Verse 85
पवित्र च पवित्राणां मड्गलानां च मंगलम् । यत् सुवर्ण स भगवानग्निरीश: प्रजापति:,वह पवित्रोंमें भी अधिक पवित्र तथा मंगलोंमें भी अधिक मंगलमय है। जो सुवर्ण है, वही भगवान् अनिनि हैं, वही ईश्वर और प्रजापति हैं इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम पज्चाशीतितमो<ध्याय:
Emas adalah yang paling suci di antara segala yang suci, dan yang paling membawa berkah di antara segala yang membawa berkah. Sebab yang disebut emas itu tiada lain adalah Bhagavān Agni sendiri—Dialah Īśa dan Prajāpati.
Verse 86
पवित्राणां पवित्र हि कनकं द्विजसत्तमा: । अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाह्ृतम्
Bhīṣma bersabda: “Wahai yang terbaik di antara para dwija, emas sungguh yang paling suci di antara segala yang menyucikan. Ia disebut ‘jātarūpa’—zat yang hakikatnya mengandung sifat Agni dan Soma.”
Verse 87
द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ।। वसिष्ठ उवाच अपि चेदं पुरा राम श्रुत॑ मे ब्रह्म॒दर्शनम् । पितामहस्य यद् वृत्तं ब्रह्मण: परमात्मन:,वसिष्ठजी कहते हैं--परशुराम! परमात्मा पितामह ब्रह्माका जो ब्रह्मदर्शन नामक वृत्तान्त मैंने पूर्वकालमें सुना था, वह तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो
Vasiṣṭha bersabda: “Wahai dwija yang utama! Emas yang utuh dan murni adalah yang paling suci di antara benda-benda suci; ia disebut bersifat Agni dan Soma. Dan lagi, wahai Rāma (Paraśurāma), dahulu aku pernah mendengar kisah bernama ‘Penglihatan Brahman’—riwayat purba tentang Sang Kakek Semesta, Brahmā, Sang Diri Tertinggi. Akan kuceritakan kepadamu; dengarkan.”
Verse 88
देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् । ऐश्व॒र्यें वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो,प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देववा और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहसोरों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए
Vasiṣṭha bersabda: “Anakku, wahai Rāma—pada suatu masa Dewa agung Rudra, Sang Penguasa Tertinggi, mengenakan wujud Varuṇa dan bersemayam dalam kemegahan serta kedaulatan Varuṇa.”
Verse 89
आज ममुर्मुनय: सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमा: । यज्ञांगानि च सर्वाणि वषट्कारश्न मूर्तिमान्,प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देववा और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहसोरों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए
Vasiṣṭha bersabda: “Hari ini semua resi telah datang kepadaku, dan para dewa pun hadir dengan Agni di barisan depan. Segala anggota yajña juga telah tiba, bahkan seruan Vaṣaṭ pun tampak seolah berwujud.”
Verse 90
मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रश: । ऋग्वेदश्वागमत् तत्र पदक्रमविभूषित:,प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देववा और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहसोरों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए
Vasiṣṭha bersabda: “Di sana, nyanyian Sāman tampak hadir dalam wujud nyata, dan ribuan mantra Yajus pun datang. Ṛgveda juga tiba di tempat itu, dihiasi dengan tata cara pembacaan pada dan krama.”
Verse 91
लक्षणानि स्वरा: स्तोभा निरुक्तं सुरपद्धक्तय: । ओड्कारकश्नावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा,वेदोंके लक्षण, उदात्त आदि स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सुरपंक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्रस्वरूप प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे
Vasiṣṭha berkata: “Di sana hadir seluruh perangkat yang menegakkan Weda—tanda-tanda fonetik dan aksen, kidung-kidung ritual beserta stobha (refrain)-nya, ilmu nirukta (etimologi suci), rangkaian himne ilahi, suku kata Oṃ, serta ‘pengekangan’ dan ‘pelepasan’ (nigraha–pragraha) yang menjadi mata bagi yajña. Di tempat itu, tatanan Weda berdiri teguh sepenuhnya.”
Verse 92
वेदाक्ष॒ सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च । भूतं भव्यं भविष्यं च दधार भगवान् शिव:,वेद, उपनिषद्, विद्या और सावित्री देवी भी वहाँ आयी थीं। भगवान् शिवने भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंको धारण किया था
Vasiṣṭha berkata: “Weda beserta Upaniṣad-nya, pengetahuan suci, dan Dewi Sāvitrī pun hadir di sana. Dan Bhagavān Śiva menanggung dalam dirinya arus tiga waktu: yang telah berlalu, yang sedang berlangsung, dan yang akan datang.”
Verse 93
संजुहावात्मना55त्मानं स्वयमेव तदा प्रभो | यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत्,प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की
Vasiṣṭha berkata: “Wahai Tuan, saat itu Mahādeva sang pemanggul Pināka, dengan mengambil banyak rupa, menambah kemegahan yajña itu; dan oleh dirinya sendiri, ia mempersembahkan dirinya sendiri sebagai persembahan.”
Verse 94
द्यौर्नभ: पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपति: । सर्वविद्येश्वर: श्रीमानेष चापि विभावसु:,ये भगवान् शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं
Vasiṣṭha berkata: “Dialah surga, dialah langit, dialah bumi, dan dialah hamparan ruang yang luas; dan dialah pula raja ini. Dialah penguasa segala cabang pengetahuan, penuh kemuliaan; dan dialah juga Vibhāvasu—Api yang cemerlang. Demikianlah Bhagavān Śiva harus dipahami hadir di segala ranah dan rupa.”
Verse 95
एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणो5ग्नि: प्रजापति: । कीर्त्यते भगवान् देव: सर्वभूतपति: शिव:,ये ही भगवान् सर्वभूतपति महादेव ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति तथा कल्याणमय शम्भु आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं
Vasiṣṭha berkata: “Inilah Bhagavān Śiva, penguasa segala makhluk; ia dipuji dengan banyak nama ilahi: Brahmā, Śiva, Rudra, Varuṇa, Agni, dan Prajāpati. Walau disebut dalam beragam wujud, ia tetap satu—Tuhan yang mahabaik, pelindung dan tuan bagi semua makhluk.”
Verse 96
तस्य यज्ञ: पशुपतेस्तप: क्रतव एव च | दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्व॒ सदिगी श्व॒रा:,भुगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान् पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा। उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिकृपालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ तथा देव-माताएँ भी एक साथ आयी थीं
Vasiṣṭha berkata: “Dalam yajña Bhagavān Paśupati itu, tapa dan kratu (tata-ritus kurban) sendiri hadir. Dewi Dīkṣā, yang bercahaya oleh disiplin ikrarnya, pun datang; demikian pula para Arah (Penjuru) bersama para pelindungnya.” Maka yajña ilahi Paśupati pun berlangsung, menghimpun kekuatan-kekuatan penopang dharma untuk turut menyaksikan dan menegakkan tatanan suci.
Verse 97
देवपत्न्यश्न कन्याश्ष् देवानां चैव मातर: । आजम्मुः सहितास्तत्र तदा भगुकुलोद्वह,भुगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान् पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा। उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिकृपालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ तथा देव-माताएँ भी एक साथ आयी थीं
Para istri para dewa, para gadis surgawi, dan juga para ibu para dewa—semuanya datang ke sana bersama-sama pada saat itu, wahai yang termulia dari wangsa Bhṛgu.
Verse 98
यज्ञ पशुपते: प्रीता वरुणस्य महात्मन: । स्वयम्भुवस्तु ता दृष्टवा रेत: समपतद् भुवि,महात्मा वरुण पशुपतिके यज्ञमें आकर वे देवांगनाएँ बहुत प्रसन्न थीं। उस समय उन्हें देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजीका वीर्य स्खलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा
Dalam yajña Paśupati, para bidadari itu bersukacita. Namun ketika Svayambhū (Brahmā) memandang mereka, benihnya terlepas tanpa dikehendaki dan jatuh ke bumi.
Verse 99
तस्य शुक्रस्य विस्पन्दान् पांसून् संगृहा भूमित: । त्रास्यत् पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने,तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया
Pūṣan mengumpulkan dari tanah butir-butir debu yang bergetar, yang berasal dari benih itu; dengan kedua tangannya ia segera melemparkannya ke dalam api kurban yang sama.
Verse 100
ततस्तस्मिन् सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके । ब्रह्मणो जुद्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूव ह,तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ
Kemudian, ketika satra-yajña itu telah dimulai dan api suci menyala-nyala, terjadilah di sana suatu kemunculan yang terkait dengan Brahmā—daya generatifnya kembali terlepas.
Verse 101
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रे ख्रुवेण परिगृह्म सः । आज्यवन्मन्त्रतश्नापि सोडजुहोद् भूगुनन्दन,भृगुनन्दन! स्खलित होते ही उस वीर्यको खुवेमें लेकर उन्होंने स्वयं ही मन्त्र पढ़ते हुए घीकी भाँति उसका होम कर दिया
Begitu benih itu terjatuh, ia segera mengumpulkannya dengan khruva, sendok persembahan. Lalu, wahai kebanggaan kaum Bhṛgu, ia sendiri melafalkan mantra dan mempersembahkannya ke dalam api laksana ghee yang disucikan.
Verse 102
ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान् । तस्य तत् तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम्,शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस त्रिगुणात्मक वीर्यसे चतुर्विध प्राणिसमुदायको जन्म दिया। उनके वीर्यका जो रजोमय अंश था, उससे जगतमें तैजस प्रवृत्तिप्रधान जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई
Kemudian sosok yang perkasa itu melahirkan himpunan makhluk. Dari pancaran dayanya sendiri muncullah di dunia-dunia ciptaan ‘taijasa’—wujud-wujud yang ditandai oleh gerak dan daya-kerja.
Verse 103
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम् । स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च,तमोमय अंशसे तामस पदार्थ--स्थावर वृक्ष आदि प्रकट हुए और जो साच्चिक अंश था, वह राजस और तामस दोनोंमें अन्तर्भूत हो गया। वह सत्त्वगुण अर्थात् प्रकाशस्वरूपा बुद्धिका नित्यस्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण विश्व भी उस बुद्धिका कार्य होनेसे उसका ही स्वरूप है
Dari tamas lahir keadaan-keadaan yang tamasik; sedangkan sattva meresapi keduanya—rajas dan tamas. Sattva itu adalah sifat abadi dari tejas; bahkan ākāśa pun merupakan perwujudan dari prinsip yang sama.
Verse 104
सर्वभूतेषु च तथा सत्त्वं तेजस्तथोत्तमम् | शुक्रे हुते5ग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रय: प्रभो
Demikian pula, pada semua makhluk terdapat sattva dan kilau tertinggi. Wahai tuan, ketika benih itu dipersembahkan ke dalam api tersebut, tampaklah tiga sosok di sana.
Verse 105
पुरुषा वपुषा युक्ता: स्वैः स्वै: प्रसवजैर्गुणै: । अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वमुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है। प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे || १०४ $ ।। भृगित्येव भृगुः पूर्वमंगारेभ्यो$ड्रिराभवत्,भृग् अर्थात् अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम “भृगु” हुआ। अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम “अंगिरा' हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृगु होती है उससे “कवि' नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भूगु कहलाये
Mereka adalah pribadi-pribadi berwujud jasmani, masing-masing dianugerahi sifat-sifat yang lahir dari sebab kelahirannya sendiri.
Verse 106
अंगारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरो5भवत् । सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद् भगु: स्मृत:,भृग् अर्थात् अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम “भृगु” हुआ। अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम “अंगिरा' हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृगु होती है उससे “कवि' नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भूगु कहलाये
Dari ketergantungan pada bara yang menyala, lahirlah satu wujud lain yang dikenal sebagai ‘Kavi’. Bhṛgu terlahir bersama nyala api; karena itu ia dikenang dengan nama ‘Bhagu/Bhṛgu’.
Verse 107
मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीच: कश्यपो हाभूत् | अंगारेभ्यो5ज़ितिस्तात वालखिल्या: कुशोच्चयात्,उसी अग्निकी मरीचियोंसे मरीचि उत्पन्न हुए; जिनके पुत्र मारीच--कश्यप नामसे विख्यात हैं। तात! अंगारोंसे अंगिरा और कुशोंके ढेरसे वालखिल्य नामक ऋषि प्रकट हुए थे
Dari sinar-sinar (marīci) muncullah resi Marīci; dan putranya termasyhur sebagai Kaśyapa, keturunan Marīci. Wahai anakku, dari bara menyala lahir Aṅgirā, dan dari tumpukan rumput kuśa menampakkan diri para resi yang disebut Vālakhilya.
Verse 108
अन्रैवात्रेति च विभो जातमत्रिं वदन्त्यपि | तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मता:,विभो! अत्रैव--उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग “अत्रि” कहते हैं। भस्म--राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र-ज्ञान और सदगुणोंके अभिलाषी होते हैं। अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप-सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं
Wahai yang perkasa, dari gugusan kuśa itu juga lahir seorang Brahmarṣi lain, yang oleh orang-orang disebut Atri. Demikian pula, dari tumpukan abu yang telah disaring muncullah para Vaikhānasa, yang dihormati di antara kelompok para Brahmarṣi.
Verse 109
वैखानसा: समुत्पन्नास्तप: श्रुतगुणेप्सव: । अश्रुतो<स्य समुत्पन्नावश्चिनौ रूपसम्मतौ,विभो! अत्रैव--उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग “अत्रि” कहते हैं। भस्म--राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र-ज्ञान और सदगुणोंके अभिलाषी होते हैं। अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप-सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं
Lahir para resi Vaikhānasa—mereka tekun bertapa, haus akan pendengaran śāstra, dan mendambakan kebajikan. Dari air mata Agni terlahir dua Aśvin, yang dimuliakan di mana-mana karena keelokan dan keunggulan mereka.
Verse 110
शेषा: प्रजानां पतय: स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे । ऋषयो रोमकूपेभ्य: स्वेदाच्छन्दो बलान्मन:,शेष प्रजापतिगण उनके श्रवण आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए। रोमकूपोंसे ऋषि, पसीनेसे छन््द और वीर्यसे मनकी उत्पत्ति हुई
Para penguasa makhluk yang tersisa lahir dari saluran-saluran dirinya (arus indria). Dari pori-pori rambutnya muncul para resi; dari keringatnya lahir metrum-metrum Weda; dan dari daya hidup/virya-nya lahirlah pikiran.
Verse 111
एतस्मात् कारणादाहुरग्नि: सर्वास्तु देवता: । ऋषय: श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात्,इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है
Karena itulah para resi yang kaya akan pengetahuan śruti, dengan memandang Weda sebagai otoritas tertinggi, menyatakan bahwa Agni pada hakikatnya adalah seluruh para dewa. Dalam api yajña, yang ilahi didekati dan dimuliakan, dan dharma ditegakkan melalui tata-ritus yang ditetapkan.
Verse 112
यानि दारुणि निर्यासास्ते मासा: पक्षसंज्ञिता: अहोरात्रा मुहूर्ताश्न पित्त ज्योतिश्न दारुणम्,उस यज्ञमें जो समिधाएँ काममें ली गयीं तथा उनसे जो रस निकला, वे ही सब मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्तरूप हो गये और अग्निका जो पित्त था, वह उग्र तेज होकर प्रकट हुआ
Vasiṣṭha berkata: “Getah keras yang mengalir dari kayu bakar yajña menjelma menjadi ukuran waktu—bulan, paruh-bulan (pakṣa), siang dan malam, bahkan muhūrta. Dan empedu Agni tampak sebagai cahaya yang garang, menyala-nyala.”
Verse 113
रौद्रे लोहितमित्याहुलोहितात् कनकं स्मृतम् । तन्मैत्रमिति विज्ञेयं धूमाच्च वसव: स्मृता:
Vasiṣṭha berkata: “Dalam aspek Rudra ia disebut ‘lohita’ (yang merah); dari lohita itu, emas (kanaka) dikatakan muncul. Emas itu hendaknya dipahami sebagai ‘maitra’—milik Mitra, asas kerukunan dan persahabatan. Dan dari asap, para Vasu diingat berasal.”
Verse 114
अग्निके तेजको लोहित कहते हैं, उस लोहितसे कनक उत्पन्न हुआ। उस कनकको मैत्र जानना चाहिये तथा अग्निके धूमसे वसुओंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ।। अर्चिषो याश्ष ते रुद्रास्तथा5<5दित्या महाप्रभा: । उद्दिष्टास्ते तथांगारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिता:,अग्निकी जो लपटें होती हैं, वे ही एकादश रुद्र तथा अत्यन्त तेजस्वी द्वादश आदित्य हैं, तथा उस यज्ञमें जो दूसरे-दूसरे अंगारे थे वे ही आकाशस्थित नक्षत्रमण्डलोंमें ज्योति:पुंजके रूपमें स्थित हैं
Vasiṣṭha berkata: Mereka menyebut merahnya daya Agni sebagai ‘lohita’; dari lohita itu lahir kanaka, emas. Emas itu hendaknya dipahami sebagai ‘maitra’—milik Mitra; dan dari asap Agni diajarkan asal-usul para Vasu. Nyala-nyala Agni itulah sebelas Rudra dan dua belas Āditya yang amat cemerlang; dan bara-bara yang ditunjukkan dalam api yajña itu adalah gugus-gugus cahaya yang berdiri di langit sebagai rasi bintang.
Verse 115
आदिकर्ता च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद् ध्रुवम् । सर्वकामदमित्याहुस्तद्रहस्यमुवाच ह
Vasiṣṭha berkata: “Dialah pencipta mula dunia; Dialah Brahman Tertinggi, Kenyataan yang tak tergoyahkan. Para bijak menyebut-Nya pemberi segala tujuan yang diinginkan. Itulah ajaran rahasia yang kini telah kukatakan.”
Verse 116
इस लोकके जो आदि स्रष्टा हैं, उन ब्रह्माजीका कथन है कि अग्नि परब्रह्मस्वरूप है। वही अविनाशी परब्रह्म परमात्मा है और वही सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। यह गोपनीय रहस्य ज्ञानी पुरुष बताते हैं ।। ततोडब्रवीन्महादेवो वरुण: पवनात्मक: । मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह,तब वरुण एवं वायुरूप महादेवजीने कहा--“देवताओ! यह मेरा दिव्य यज्ञ है। मैं ही इस यज्ञका गृहस्थ यजमान हूँ
Vasiṣṭha berkata: Brahmā, pencipta mula-mula dunia ini, telah menyatakan bahwa Agni berhakikat Brahman Tertinggi. Dialah Parabrahman yang tak binasa, Paramātman, pemberi segala tujuan yang diinginkan. Para bijak menyebutnya sebagai kebenaran rahasia yang dijaga. Lalu Mahādeva—menampakkan diri sebagai Varuṇa dan sebagai daya berwatak angin—memaklumkan: “Inilah sattrayajña ilahiku; di sini akulah sendiri gṛhapati, pelindung dan patron upacara.”
Verse 117
त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशय: । इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत्,“आकाशचारी देवगण! पहले जो तीन पुरुष प्रकट हुए हैं, वे भूगु, अंगिरा और कवि मेरे पुत्र हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको तुम जान लो; क्योंकि इस यज्ञका जो कुछ फल है, उसपर मेरा ही अधिकार है”
Vasiṣṭha berkata: “Tiga keturunan yang lahir lebih dahulu itu adalah milikku—tanpa keraguan. Ketahuilah, wahai para penghuni angkasa: buah dari kurban ini sungguh menjadi hakku.”
Verse 118
अग्निरुवाच मदड्गलेभ्य: प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च । ममैव तान्यपत्यानि वरुणो हवशात्मक:,अग्नि बोले--ये तीनों संतानें मेरे अंगोंसे उत्पन्न हुई हैं और मेरे ही आश्रयमें विधाताने इनकी सृष्टि की है। अतः ये तीनों मेरे ही पुत्र हैं। वरुणरूपधारी महादेवजीका इनपर कोई अधिकार नहीं है
Agni berkata: “Keturunan ini lahir dari anggota tubuhku sendiri, dan Sang Pencipta mewujudkan mereka ketika mereka bersandar pada penopangku. Karena itu, ketiganya adalah anak-anakku. Varuṇa—meski berwujud sebagai havis (persembahan)—tidak memiliki hak atas mereka.”
Verse 119
अथाब्रवील्लोकगुरुब्रह्मा लोकपितामह: । ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्र हुतं हि तत्
Kemudian Brahmā, guru dunia dan kakek agung segala makhluk, bersabda: “Keturunan itu sesungguhnya milikku; sebab benih (śukra) itu telah dipersembahkan ke dalam diriku—sebagai oblation.”
Verse 120
तदनन्तर लोकपितामह लोकगुरु ब्रह्माजीने कहा--“ये सब मेरी ही संतानें हैं; क्योंकि मेरे ही वीर्यकी आहुति दी गयी है; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई है ।। अहं कर्ता हि सत्रस्य होता शुक्रस्प चैव ह । यस्य बीजं फलं॑ तस्य शुक्र चेत् कारणं मतम्,“मैं ही यज्ञका कर्ता और अपने वीर्यका हवन करनेवाला हूँ। जिसका बीज होता है उसको ही उसका फल मिलता है। यदि इनकी उत्पत्तिमें वीर्यकोी ही कारण माना जाय तो निश्चय ही ये मेरे पुत्र हैं!
Vasiṣṭha berkata: “Akulah pelaksana sattrayajña ini, dan akulah pula hotṛ yang mempersembahkan oblation berupa benih (śukra). Buahnya milik dia yang benihnya. Jika dalam kelahiran mereka benih saja dianggap sebab penentu, maka pastilah mereka anak-anakku.”
Verse 121
ततोडब्रुवन् देवगणा: पितामहमुपेत्य वै । कृताञ्जलिपुटा: सर्वे शिरोभिरभिवन्द्य च,इस प्रकार विवाद उपस्थित होनेपर समस्त देवताओंने ब्रह्माजीके पास जा दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनको प्रणाम किया और कहा--
Ketika perselisihan itu pun timbul, seluruh bala para dewa mendatangi Pitāmaha Brahmā. Dengan kedua telapak tangan dirapatkan penuh hormat dan kepala tertunduk, mereka memberi penghormatan, lalu berkata—
Verse 122
वयं च भगवन् सर्वे जगच्च सचराचरम् | तवैव प्रसवा: सर्वे तस्मादग्निर्विभावसु:
Wahai Bhagavan, kami semua—dan seluruh jagat raya beserta yang bergerak maupun yang tak bergerak—lahir semata-mata dari-Mu. Karena itu Agni, Sang Api yang bercahaya (Vibhāvasu), pun adalah keturunan-Mu sendiri.
Verse 123
निसर्गाद् ब्रह्मणश्वापि वरुणो यादसाम्पति:,तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे जलजन्तुओंके स्वामी वरुणरूपी भगवान् शिवने सबसे पहले सूर्यके समान तेजस्वी भृगुको पुत्ररूपमें ग्रहण किया। फिर उन्होंने ही अंगिराको अग्निकी संतान निश्चित किया
Dari pancaran alami Brahmā, Varuṇa pun muncul sebagai penguasa makhluk-makhluk air. Lalu, atas titah Brahmā, Sang Dewa Śiva—dengan mengambil wujud Varuṇa, penguasa segala yang lahir dari air—mula-mula menerima Bhṛgu yang cemerlang laksana matahari sebagai putra; kemudian menetapkan Aṅgiras sebagai keturunan Agni.
Verse 124
जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम् । ईश्वरो$ज्लिरिसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत्,तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे जलजन्तुओंके स्वामी वरुणरूपी भगवान् शिवने सबसे पहले सूर्यके समान तेजस्वी भृगुको पुत्ररूपमें ग्रहण किया। फिर उन्होंने ही अंगिराको अग्निकी संतान निश्चित किया
Sang Īśvara mula-mula menerima Bhṛgu yang bercahaya laksana matahari sebagai putranya. Lalu Sang Īśvara yang sama menetapkan Aṅgiras sebagai keturunan Agni demi kelangsungan progeni.
Verse 125
पितामहस्त्वपत्यं वै कविं जग्राह तत्त्ववित् | तदा स वारुण: ख्यातो भृगुः प्रसव कर्मवित्,तदनन्तर तत्त्वज्ञानी ब्रह्माने कविको अपनी संतानके रूपमें ग्रहण किया। उस समय संतानके कर्तव्यको जाननेवाले महर्षि भूगु वारुण नामसे विख्यात हुए। तेजस्वी अंगिरा आग्नेय तथा महायशस्वी कवि ब्राह्म नामसे विख्यात हुए। भूगु और अंगिरा--ये दोनों लोकमें जगत्की सृष्टिका विस्तार करनेवाले बतलाये गये हैं
Pitāmaha, sang pengetahu kebenaran, menerima Kavi sebagai keturunannya sendiri. Sejak saat itu Bhṛgu—yang memahami tata dan dharma kelahiran—termashyur dengan sebutan Vāruṇa.
Verse 126
आग्नेयस्त्वंगिरा: श्रीमान् कविर्राह्मो महायशा: । भार्गवांगिरसौ लोके लोकसंतानलक्षणौ,तदनन्तर तत्त्वज्ञानी ब्रह्माने कविको अपनी संतानके रूपमें ग्रहण किया। उस समय संतानके कर्तव्यको जाननेवाले महर्षि भूगु वारुण नामसे विख्यात हुए। तेजस्वी अंगिरा आग्नेय तथा महायशस्वी कवि ब्राह्म नामसे विख्यात हुए। भूगु और अंगिरा--ये दोनों लोकमें जगत्की सृष्टिका विस्तार करनेवाले बतलाये गये हैं
Vasiṣṭha berkata: “Aṅgiras yang bercahaya dan termasyhur dikenal sebagai Āgneya; dan sang resi-kawi yang masyhur dikenal sebagai Brāhma. Bhṛgu dan Aṅgiras—keduanya disebut di dunia sebagai penanda sumber garis-keturunan; melalui keturunan merekalah ciptaan berkembang meluas.”
Verse 127
एते हि प्रस्रवा: सर्वे प्रजानां पतयस्त्रय: । सर्व संतानमेतेषामिदमित्युपधारय,इस प्रकार ये तीन प्रजापति हैं और शेष सब लोग इनकी संतानें हैं। यह सारा जगत् इन्हींकी संतति हैं, इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो
Vasiṣṭha berkata: “Merekalah sumber-sumber penciptaan—tiga penguasa makhluk (Prajāpati). Pahamilah sungguh-sungguh: semua yang lain adalah keturunan mereka; seluruh dunia ini berasal dari garis mereka.”
Verse 128
भगोस्तु पुत्रा: सप्तासन् सर्वे तुल्या भगोर्गुणै: । च्यवनो वज्शीर्षश्न॒ शुचिरौर्वस्तथैव च,भृगुके सात पुत्र व्यापक हुए, जो उन्हींके समान गुणवान् थे। च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्र, वरेण्य, तथा सवन--ये ही उन सातोंके नाम हैं। सभी भृगुवंशी सामान्यतः वारुण कहलाते हैं। जिनके वंशमें तुम भी उत्पन्न हुए हो
Vasiṣṭha berkata: “Bhaga mempunyai tujuh putra, semuanya setara dengan Bhaga dalam kebajikan. Nama mereka: Cyavana, Vajraśīrṣa, Śuci, Aurva, Śukra, Vareṇya, dan Savana—itulah tujuh yang dikenang. Mereka yang berasal dari garis Bhṛgu umumnya disebut ‘Vāruṇa’; dan dalam garis itulah engkau pun terlahir.”
Verse 129
शुक्रो वरेण्यश्न विभु: सवनश्चेति सप्त ते । भार्गवा वारुणा: सर्वे येषां वंशे भवानपि,भृगुके सात पुत्र व्यापक हुए, जो उन्हींके समान गुणवान् थे। च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्र, वरेण्य, तथा सवन--ये ही उन सातोंके नाम हैं। सभी भृगुवंशी सामान्यतः वारुण कहलाते हैं। जिनके वंशमें तुम भी उत्पन्न हुए हो
Vasiṣṭha berkata: “Śukra, Vareṇya, Vibhu, dan Savana—bersama yang lain, genap tujuh. Semuanya adalah Bhārgava dan menurut tradisi disebut ‘Vāruṇa’; dan dalam garis itulah engkau pun lahir.”
Verse 130
अष्टौ चांगिरस: पुत्रा वारुणास्ते5प्युदाह्नता: । बृहस्पतिरुतथ्यश्ष पयस्य: शान्तिरेव च,अंगिराके आठ पुत्र हैं, वे भी वारुण कहलाते हैं (वरुणके यज्ञमें उत्पन्न होनेसे ही उनकी वारुण संज्ञा हुई है)। उनके नाम इस प्रकार हैं--बृहस्पति, उतथ्य,पयस्य, शान्ति, घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा। ये आठ अग्निके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। अतः आग्नेय कहलाते हैं। वे सब-के-सब ज्ञाननिष्ठ एवं निरामय (रोग-शोकसे रहित) हैं
Vasiṣṭha berkata: “Aṅgiras mempunyai delapan putra; mereka pun disebut ‘Vāruṇa’. Nama mereka: Bṛhaspati, Utathya, Payasya, Śānti, Ghora, Virūpa, Saṃvarta, dan yang kedelapan, Sudhanvan. Terlahir dalam garis Agni, maka mereka disebut Āgneya. Semuanya teguh dalam pengetahuan dan bebas dari derita.”
Verse 131
घोरो विरूप: संवर्त: सुधन्वा चाष्टम: स्मृत: । एतेडष्टौ वहल्लिजा: सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामया:,अंगिराके आठ पुत्र हैं, वे भी वारुण कहलाते हैं (वरुणके यज्ञमें उत्पन्न होनेसे ही उनकी वारुण संज्ञा हुई है)। उनके नाम इस प्रकार हैं--बृहस्पति, उतथ्य,पयस्य, शान्ति, घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा। ये आठ अग्निके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। अतः आग्नेय कहलाते हैं। वे सब-के-सब ज्ञाननिष्ठ एवं निरामय (रोग-शोकसे रहित) हैं
Vasiṣṭha berkata: “Ghora, Virūpa, Saṃvarta, dan yang kedelapan, Sudhanvā—mereka dikenang di antara mereka. Kedelapan ini, terlahir dalam garis keturunan Agni, teguh dalam pengetahuan rohani dan bebas dari derita.”
Verse 132
ब्रह्मणस्तु कवे: पुत्रा वारुणास्तेडप्युदाह्मता: । अष्टौ प्रसवजैर्युक्ता गुणैब्रह्मविद: शुभा:,ब्रह्माके पुत्र जो कवि हैं, उनके पुत्रोंकी भी वारुण संज्ञा है। वे आठ हैं और सभी पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं। उन्हें शुभलक्षण एवं ब्रह्मज्ञानी माना गया है
Vasiṣṭha berkata: “Putra-putra Kavi, yang merupakan putra Brahmā, juga disebut ‘Vāruṇa’. Mereka berjumlah delapan, dianugerahi kebajikan alami seorang putra sejati; bertanda mulia dan dikenal sebagai para pengenal Brahman.”
Verse 133
कवि: काव्यश्न धृष्णुश्न बुद्धिमानूशना तथा । भगुश्न विरजाश्वैव काशी चोग्रश्न धर्मवित्,उनके नाम ये हैं--कवि, काव्य, धुृष्णु, बुद्धिमान शुक्राचार्य, भूगु, विरजा, काशी तथा धर्मज्ञ उग्र
Vasiṣṭha berkata: “Nama-nama mereka ialah—Kavi, Kāvya, Dhṛṣṇu, Uśanā yang bijaksana (Śukrācārya), Bhṛgu, Virajā, Kāśī, dan Ugra, sang pengenal dharma.”
Verse 134
अष्टौ कविसुता होते सर्वमेभिर्जगत् ततम् । प्रजापतय एते हि प्रजाभागैरिह प्रजा:,ये आठ कवितके पुत्र हैं। इन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है। ये आठों प्रजापति हैं और प्रजाके गुणोंसे युक्त होनेके कारण प्रजा भी कहे गये हैं
Vasiṣṭha berkata: “Inilah delapan putra Kavi; melalui merekalah seluruh jagat ini meresap dan terpenuhi. Kedelapan ini sungguh para Prajāpati; dan karena mengambil bagian dalam unsur serta fungsi keturunan di sini, mereka pun disebut ‘prajā’.”
Verse 135
एवमड्रिरसश्लैव कवेश्ष प्रसवान्वयै: । भगोश्व भूगुशार्दूल वंशजै: सततं जगत्
Vasiṣṭha berkata: “Demikian pula, wahai harimau di antara kaum Bhṛgu, oleh garis keturunan yang lahir dari Aḍrirasa dan dari Kavi, dan juga oleh para keturunan Bhaga, dunia ini senantiasa ditopang dan diteruskan.”
Verse 136
भुगुश्रेष्ठी इस प्रकार अंगिरा, कवि और भृगुके वंशजों तथा संतान-परम्पराओंसे सारा जगत् व्याप्त है ।। वरुणश्चादितो विप्र जग्राह प्रभुरीश्चर: । कविं तात भृगुं चापि तस्मात् तौ वारुणौ स्मृती,विप्रवर! तात! प्रभावशाली जलेश्वर वरुणरूप शिवने पहले कवि और भृगुको पुत्ररूपसे ग्रहण किया था, इसलिये वे वारुण कहलाये
Vasiṣṭha bersabda: “Wahai brāhmaṇa utama! Dahulu Śiva, Sang Mahakuasa dalam wujud Varuṇa—penguasa segala perairan—menerima Kavi dan Bhṛgu sebagai putra-putranya. Karena itu kedua resi itu dikenang sebagai ‘Vāruṇa’.”
Verse 137
जग्राहांगिरसं देव: शिखी तस्माद्भधुताशन: । तस्मादांगिरसा ज्ञेया: सर्व एव तदन्वया:,ज्वालाओंसे सुशोभित होनेवाले अग्निदेवने वरुणरूप शिवसे अंगिराको पुत्ररूपमें प्राप्त किया; इसलिये अंगिराके वंशमें उत्पन्न हुए सभी पुत्र अग्निवंशी एवं वारुण नामसे भी जानने योग्य हैं
Vasiṣṭha bersabda: “Dewa Agni, yang bermahkota nyala api, menerima Aṅgiras sebagai putranya; karena itu semua yang lahir dalam garis keturunan Aṅgiras harus dipahami sebagai keturunan Agni, dan juga dikenal dengan sebutan yang terkait Varuṇa.”
Verse 138
ब्रह्मा पितामह: पूर्व देवताभि: प्रसादित: । इमे नः संतरिष्यन्ति प्रजाभिर्जगती श्वरा:,पूर्वकालमें देवताओंने पितामह ब्रह्माको प्रसन्न किया और कहा--'प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे ये भूगु आदिके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते हुए अपनी संतानोंद्वारा हमारा संकटसे उद्धार करें। ये सभी प्रजापति हों और सभी अत्यन्त तपस्वी हों। ये आपके कृपाप्रसादसे इस समय इस सम्पूर्ण लोकका संकटसे उद्धार करेंगे
Vasiṣṭha bersabda: “Pada masa silam para dewa menyanjung dan menyenangkan Pitāmaha Brahmā. Mereka memohon, ‘Wahai Prabhu, berkenanlah: semoga para keturunan Bhṛgu dan para resi sejenisnya, sambil memelihara bumi, melalui keturunan mereka menyelamatkan kami dari kesusahan. Biarlah mereka semua menjadi Prajāpati dan pertapa agung. Dengan anugerah rahmat-Mu, pada saat ini mereka akan menyelamatkan seluruh dunia dari bahaya.’”
Verse 139
सर्वे प्रजानां पतय: सर्वे चातितपस्विन: । त्वत्प्रसादादिमं लोक॑ तारयिष्यन्ति साम्प्रतम्,पूर्वकालमें देवताओंने पितामह ब्रह्माको प्रसन्न किया और कहा--'प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे ये भूगु आदिके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते हुए अपनी संतानोंद्वारा हमारा संकटसे उद्धार करें। ये सभी प्रजापति हों और सभी अत्यन्त तपस्वी हों। ये आपके कृपाप्रसादसे इस समय इस सम्पूर्ण लोकका संकटसे उद्धार करेंगे
Vasiṣṭha bersabda: “Mereka semua akan menjadi pelindung dan penguasa makhluk; semuanya akan sangat bertapa. Berkat anugerah-Mu, pada saat ini juga mereka akan menyelamatkan dunia ini dari bahaya.”
Verse 140
तथैव वंशकर्तारस्तव तेजोविवर्धना: । भवेयुर्वेदविदुष: सर्वे च कृतिनस्तथा,“आपकी दयासे ये सब लोग वंशप्रवर्तक, आपके तेजकी वृद्धि करनेवाले तथा वेदज्ञ पुण्यात्मा हों
Vasiṣṭha bersabda: “Demikian pula, semoga mereka semua menjadi perintis dan penegak garis keturunan, penambah kemuliaan-Mu; semoga semuanya menguasai Weda, serta menjadi insan yang berhasil dalam laku dan berbudi utama.”
Verse 141
देवपक्षचरा: सौम्या: प्राजापत्या महर्षय: । आप्नवन्ति तपश्चैव ब्रह्मचर्य परं तथा,“इन सबका स्वभाव सौम्य हो। प्रजापतियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ये महर्षिगण सदा देवताओंके पक्षमें रहें तथा तप और उत्तम ब्रह्मचर्यका बल प्राप्त करें
Vasiṣṭha berkata: “Semoga para resi agung ini, yang lahir dalam garis Prajāpati, berwatak lembut, senantiasa berpihak pada para dewa, dan meraih kekuatan yang lahir dari tapa serta brahmacarya tertinggi (laku selibat yang disiplin).”
Verse 142
सर्वे हि वयमेते च तवैव प्रसव: प्रभो | देवानां ब्राह्मणानां च त्वं हि कर्ता पितामह,'प्रभो! पितामह! ये सब और हमलोग आपहीकी संतान हैं; क्योंकि देवताओं और ब्राह्मणोंकी सृष्टि करनेवाले आप ही हैं
Vasiṣṭha berkata: “Wahai Tuhan, wahai Kakek Agung segala makhluk! Kami semua—dan mereka ini juga—sesungguhnya adalah keturunanmu sendiri. Sebab engkaulah pencipta, leluhur mula, bagi para dewa dan kaum Brahmana.”
Verse 143
मारीचमादित: कृत्वा सर्वे चैवाथ भार्गवा: । अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमयाम पितामह,“पितामह! कश्यपसे लेकर समस्त भृगुवंशियोंतक हम सब लोग आपहीकी संतान हैं --ऐसा सोचकर आपसे अपनी भूलोंके लिये क्षमा चाहते हैं
Vasiṣṭha berkata: “Wahai Kakek Agung! Mulai dari Mārīca, kami semua kaum Bhārgava, menyadari diri sebagai keturunanmu, memohon ampun kepadamu atas segala kekhilafan kami.”
Verse 144
ते त्वनेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजा: । स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा,“वे प्रजापतिगण इसी रूपसे प्रजाओंको उत्पन्न करेंगे और सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर प्रलयपर्यन्त अपने-आपको मर्यादामें स्थापित किये रहेंगे”
Vasiṣṭha berkata: “Mereka, dalam wujud yang sama ini, akan melahirkan makhluk-makhluk. Dan sejak awal yuga hingga akhir yuga (pralaya), mereka akan menegakkan diri dalam batas-batas yang telah ditetapkan—memelihara tatanan kosmis dan kedudukan yang semestinya.”
Verse 145
इत्युक्त:ः स तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामह: । तथेत्येवाब्रवीत् प्रीतस्तेडपि जग्मुर्यथागतम्,देवताओंके ऐसा कहनेपर लोकपितामह ब्रह्मा प्रसन्न होकर बोले--“तथास्तु (ऐसा ही हो)।' तत्पश्चात् देवता जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये
Ketika para dewa berkata demikian, Brahmā—Pitamaha, Bapa segala loka—menjadi berkenan dan menjawab, “Tathāstu, demikianlah adanya.” Sesudah itu para dewa pun berangkat pulang, kembali sebagaimana mereka datang.
Verse 146
एवमेतत् पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मन: । देवश्रेष्टस्य लोकादौ वारुणीं बिशभ्रतस्तनुम्
Vasiṣṭha berkata: “Demikianlah yang terjadi pada zaman purba—dalam yajña sang Mahātman, yang termulia di antara para dewa. Pada awal mula dunia, ia mengenakan wujud Vāruṇī.”
Verse 147
इस प्रकार पूर्वकालमें जब कि सृष्टिके प्रारम्भका समय था, वरुण-शरीर धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महात्मा रुद्रके यञ्ञमें पूर्वोक्त वृत्तान्त घटित हुआ था ।। अन्निर्तब्रह्मा पशुपति: शर्वो रुद्र: प्रजापति: । अग्नेरपत्यमेतद् वै सुवर्णमिति धारणा,अन्न ही ब्रह्मा, पशुपति, शर्व, रुद्र और प्रजापतिरूप हैं। यह सुवर्ण अग्निकी ही संतान है--ऐसी सबकी मान्यता है
Vasiṣṭha berkata: “Demikianlah pada zaman purba, pada awal penciptaan, peristiwa yang telah disebutkan itu terjadi dalam yajña Mahātman Rudra, dewa termulia, yang mengenakan wujud terkait Varuṇa. Makanan dipandang sebagai Brahmā, Paśupati, Śarva, Rudra, dan Prajāpati; dan emas diyakini oleh semua sebagai keturunan Agni.”
Verse 148
अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काउ्चनम् | जामदग्न्य प्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात्,जमदग्निनन्दन परशुराम! वेद-प्रमाणका ज्ञाता पुरुष वैदिक श्रुतिके दृष्टान्तके अनुसार अग्निके अभावमें उसके स्थानपर सुवर्णका उपयोग करता है
Vasiṣṭha berkata: “Bila api tidak tersedia, maka—sebagaimana ditunjukkan oleh wahyu Veda—seorang yang mengetahui pramāṇa boleh memakai emas pada tempat-tempat yang semestinya memerlukan api. Wahai Paraśurāma, putra Jamadagni.”
Verse 149
कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते । वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे,कुशोंके समूहपर, उसपर रखे हुए सुवर्णपर, बाँबीके छिद्रमें, बकरेके दाहिने कानपर, जिस मार्गसे छकड़ा आता-जाता हो उस भूमिपर, दूसरेके जलाशयमें तथा ब्राह्मणके हाथपर वैदिक प्रमाण माननेवाले पुरुष अग्निस्वरूप मानकर होम आदि कर्म करते हैं और वह होमकार्य सम्पन्न होनेपर भगवान् अग्निदेव आनन्ददायिनी समृद्धिका अनुभव करते हैं
Vasiṣṭha berkata: “Ada yang mempersembahkan oblation dengan menganggapnya sebagai wujud Agni—di atas rumpun atau batang kuśa, pada emas yang diletakkan di sana, pada lubang sarang semut (anthill), atau pada telinga kanan seekor kambing.”
Verse 150
शकटोर्व्याँ परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा | हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन््यते,कुशोंके समूहपर, उसपर रखे हुए सुवर्णपर, बाँबीके छिद्रमें, बकरेके दाहिने कानपर, जिस मार्गसे छकड़ा आता-जाता हो उस भूमिपर, दूसरेके जलाशयमें तथा ब्राह्मणके हाथपर वैदिक प्रमाण माननेवाले पुरुष अग्निस्वरूप मानकर होम आदि कर्म करते हैं और वह होमकार्य सम्पन्न होनेपर भगवान् अग्निदेव आनन्ददायिनी समृद्धिका अनुभव करते हैं
Vasiṣṭha berkata: “Bahkan di jalan bekas roda pedati, di air milik orang lain, atau di telapak tangan seorang brāhmaṇa—bila oblation dipersembahkan dengan semestinya, Tuhan Agni menerimanya di sana dan menganggapnya sebagai pertambahan yang membawa sukacita dan kemakmuran.”
Verse 151
तस्मादग्निपरा: सर्वे देवता इति शुश्रुम । ब्रहद्मणो हि प्रभूतो5ग्निरग्नेरपि च काउ्चनम्,अतः सब देवताओंमें अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। यह हमने सुना है। ब्रह्मासे अग्निकी उत्पत्ति भी है और अग्निसे सुवर्णकी
Karena itu, kami telah mendengar bahwa semua dewa bergantung pada Agni dan memperoleh sandaran darinya. Sebab Agni lahir dari Brahmā, dan dari Agni pula kemudian lahir emas. Maka di antara segala dewa, Agni dipandang paling utama—sebagai pembawa persembahan dan sumber kemakmuran suci.
Verse 152
तस्माद् ये वै प्रयच्छन्ति सुवर्ण धर्मदर्शिन: । देवतास्ते प्रयच्छन्ति समस्ता इति नः श्रुतम्,इसलिये जो धर्मदर्शी पुरुष सुवर्णका दान करते हैं; वे समस्त देवताओंका ही दान करते हैं, यह हमारे सुननेमें आया है
Karena itu, orang-orang yang berpandangan jernih dalam dharma dan memberikan sedekah emas dikatakan seakan-akan memberi kepada semua dewa sekaligus—demikianlah yang kami dengar dari tradisi. Pemberian emas dipandang sebagai persembahan yang menyeluruh.
Verse 153
तस्य चातमसो लोका गच्छत: परमां गतिम् । स्वलोके राजराज्येन सो5भिषिच्येत भार्गव,सुवर्णदाता परमगतिको प्राप्त होता है, उसे अन्धकाररहित ज्योतिर्मय लोक मिलते हैं। भृगुनन्दन! स्वर्गलोकमें उसका राजाधिराज (कुबेर) के पदपर अभिषेक किया जाता है
Pemberi emas, ketika melangkah menuju tujuan tertinggi, mencapai dunia-dunia yang bebas dari kegelapan—alam yang bercahaya. Wahai Bhārgava, di surga miliknya ia ditahbiskan pada kedaulatan agung, bahkan menjadi raja di antara para raja.
Verse 154
आदित्योदयसम्प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम् । ददाति काज्चन यो वै दुःस्वप्रं प्रतिहन्ति सः,जो सूर्योदय-कालमें विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर सुवर्णका दान करता है, वह अपने पाप और दुःस्वप्रको नष्ट कर डालता है
Pada saat matahari terbit, siapa yang menurut tata-ritus yang ditetapkan, dengan mantra-mantra suci di depan, memberikan sedekah emas—ia menangkis mimpi buruk dan menyingkirkan kesialan serta noda moral yang menyertainya.
Verse 155
ददात्युदितमात्रे यस्तस्य पाप्मा विधूयते । मध्याद्वे ददतो रुक्मं हन्ति पापमनागतम्,सूर्योदयके समय जो सुवर्णदान करता है, उसका सारा पाप धुल जाता है, तथा जो मध्याह्नकालमें सोना दान करता है, वह अपने भविष्य पापोंका नाश कर देता है
Siapa yang memberi (emas) tepat pada saat matahari terbit, dosanya yang menumpuk tersapu bersih. Dan siapa yang memberi emas pada tengah hari, ia memusnahkan dosa yang belum muncul—yang seandainya akan datang di masa depan.
Verse 156
ददाति पश्िमां संध्यां यः सुवर्ण यतव्रतः । ब्रह्मवाय्वग्निसोमानां सालोक्यमुपयाति सः,जो सायं संध्याके समय व्रतका पालन करते हुए सुवर्ण दान देता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमाके लोकोंमें जाता है
Vasiṣṭha berkata: Barangsiapa, sambil menegakkan laku tapa dan ikrar yang tertib, mempersembahkan dana emas pada waktu sandhyā senja di arah barat, ia mencapai sahalokya—berdiam di alam yang sama—dengan Brahmā, Vāyu, Agni, dan Soma.
Verse 157
सेन्द्रेषु चैव लोकेषु प्रतिष्ठां विन्दते शुभाम् इह लोके यश: प्राप्प शान्तपाप्मा च मोदते,इन्द्रसहित सभी लोकपालोंके लोकोंमें उसे शुभ सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही वह इस लोकमें यशस्वी एवं पापरहित होकर आनन्द भोगता है
Di alam-alam yang dipimpin Indra beserta para penjaga penjuru, ia memperoleh kedudukan dan kehormatan yang mulia. Dan di dunia ini pun ia meraih nama baik; dosanya mereda, batinnya tenteram, lalu ia hidup dalam sukacita.
Verse 158
ततः सम्पद्यते<न्येषु लोकेष्वप्रतिम: सदा । अनावृतगतिश्चैव कामचारो भवत्युत
Sesudah itu, di alam-alam lain pun ia senantiasa mencapai keadaan yang tiada banding. Perjalanannya tak terhalang, dan ia memperoleh kebebasan bergerak—dapat pergi ke mana pun sesuai kehendaknya.
Verse 159
१५८ ।। नच क्षरति तेभ्यश्व यशश्रैवाप्तुते महत् । सुवर्णमक्षयं दत्त्वा लोकांश्षाप्रोति पुष्कलान्,सुवर्ण अक्षय द्रव्य है, उसका दान करनेवाले मनुष्यको पुण्यलोकोंसे नीचे नहीं आना पड़ता। संसारमें उसे महान् यशकी प्राप्ति होती है तथा परलोकमें उसे अनेक समृद्धिशाली पुण्यलोक प्राप्त होते हैं
Orang yang mendanakan emas yang tak binasa tidak jatuh dari alam-alam kebajikan itu. Di dunia ini ia meraih kemasyhuran besar, dan di alam sesudah mati ia memperoleh banyak surga yang makmur dan berlimpah.
Verse 160
यस्तु संजनयित्वाग्निमादित्योदयन प्रति । दद्याद् वै व्रतमुद्दिश्य सर्वकामान् समश्चुते,जो मनुष्य सूर्योदयके समय अग्नि प्रकट करके किसी व्रतके उद्देश्यसे सुवर्णदान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है
Barangsiapa menyalakan api suci saat matahari terbit, menghadap Sang Surya yang sedang naik, lalu mendanakan emas dengan niat menjalankan ikrar (vrata), ia memperoleh pemenuhan segala keinginan.
Verse 161
अग्निमित्येव तत् प्राहु: प्रदानं च सुखावहम् । यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम्,सुवर्णको अग्निस्वरूप ही कहते हैं। उसका दान सुख देनेवाला होता है। वह यशथेष्ट पुण्यको उत्पन्न करने-वाला और दानेच्छाका प्रवर्तक माना गया है
Vasiṣṭha berkata: “Pemberian ini sungguh disebut ‘Agni’ (Api), dan persembahannya mendatangkan kebahagiaan. Ia dikenang sebagai sesuatu yang, dipenuhi kebajikan sesuai kehendak, menggerakkan dorongan untuk memberi—menumbuhkan pahala dan nama baik menurut niat seseorang.”
Verse 162
एषा सुवर्णस्योत्पत्ति: कथिता ते मयानघ । कार्तिकेयस्य च विभो तद् विद्धि भूगुनन्दन,प्रभो! निष्पाप भृगुनन्दन! यह मैंने तुम्हें सुवर्ण और कार्तिकेयकी उत्पत्ति बतायी है। इसे अच्छी तरह समझ लो
Vasiṣṭha berkata: “Wahai yang tanpa dosa, telah kujelaskan kepadamu asal-usul emas, dan juga asal-usul Kārttikeya yang perkasa. Wahai kebanggaan keturunan Bhṛgu, pahamilah ini dengan sungguh-sungguh.”
Verse 163
कार्तिकेयस्तु संवृद्ध:ः कालेन महता तदा | देवैः सेनापतित्वेन वृतः सेन्द्रैर्भगूद्धह,भुगुश्रेष्ठ! कार्तिकेय जब दीर्घकालमें बड़े हुए तब इन्द्र आदि देवताओंने उनका अपने सेनापतिके पदपर वरण किया
Vasiṣṭha berkata: “Wahai yang utama di antara keturunan Bhṛgu, ketika Kārtikeya telah tumbuh matang dan kuat setelah waktu yang panjang, para dewa—dipimpin Indra—memilihnya dan mengangkatnya sebagai panglima tertinggi.”
Verse 164
जघान तारक चापि दैत्यमन्यांस्तथासुरान् । त्रिदशेन्द्राज्ञया ब्रहाँल्लोकानां हितकाम्यया,ब्रह्मन! उन्होंने लोकोंके हितकी कामना एवं देवराज इन्द्रकी आज्ञासे प्रेरित हो तारकासुर तथा अन्य दैत्योंका संहार कर डाला
Vasiṣṭha berkata: “Wahai Brahmana, demi kesejahteraan dunia-dunia dan atas perintah Indra, raja para dewa, ia menewaskan Tāraka serta Daitiya dan Asura lainnya.”
Verse 165
सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो । तस्मात् सुवर्ण विप्रेभ्य: प्रयच्छ ददतां वर,प्रभो! दाताओंमें श्रेष्ठ) इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णदानका माहात्म्य बताया है। इसलिये अब तुम ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करो
Vasiṣṭha berkata: “Wahai yang perkasa, telah kujelaskan kepadamu kebajikan dan pahala yang terkait dengan sedekah emas. Karena itu, wahai tuan—yang terbaik di antara para dermawan—karanglah emas sebagai pemberian kepada para Brahmana.”
Verse 166
भीष्म उवाच इत्युक्त:स वसिष्ठेन जामदग्न्य: प्रतापवान् । ददै सुवर्ण विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्बिषात्
Bhishma berkata: Setelah dinasihati demikian oleh Vasiṣṭha, Jāmadagnya yang gagah perkasa menganugerahkan emas kepada para brāhmaṇa; dan konon, dengan itu ia terbebas dari dosanya.
Verse 167
भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी परशुरामजीने ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान किया। इससे वे सब पापोंसे छुटकारा पा गये ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं सुवर्णस्य महीपते । प्रदानस्य फलं चैव जन्म चास्य युधिछिर,राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानका फल यह सब कुछ बता दिया
Bhishma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, setelah Vasiṣṭha berkata demikian, Parashurama yang perkasa menganugerahkan emas kepada para brāhmaṇa; dengan pemberian itu ia terbebas dari segala dosa. Wahai raja, asal-usul emas dan buah dari mendermakannya—semuanya telah kuceritakan kepadamu, wahai Yudhiṣṭhira.”
Verse 168
तस्मात् त्वमपि विप्रेभ्य: प्रयच्छ कनकं बहु । ददत्सुवर्ण नृपते किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसि,अतः नरेश्वर! अब तुम भी ब्राह्मणोंको बहुत-सा सुवर्ण दान करो। सुवर्ण दान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे
Karena itu, engkau pun hendaknya menganugerahkan emas yang berlimpah kepada para brāhmaṇa. Dengan mendermakan emas, wahai raja, engkau akan segera terbebas dari dosa.
Verse 231
परेण तपसा युक्ता: श्रीमन््तो लोकविश्रुता: | लोकानन्वचरन् सिद्धा: सर्व एव भृगूत्तम
Bhishma berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bhṛgu, semua resi yang telah sempurna itu berhiaskan tapa yang tertinggi, makmur, dan termasyhur di segenap alam; mereka bergerak bebas menelusuri berbagai loka.”
Verse 323
तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ । बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी--वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुन: जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे
Bhishma berkata: Bahkan pada malam yang pekat oleh kegelapan, engkau akan tetap bergerak. Walau bersembunyi di liang dan, karena tiada makanan, menjadi tak sadar seakan tanpa nyawa—mengering—namun bumi tetap menanggungmu; dan ketika hujan membawa air, engkau akan hidup kembali. Demikian, di tengah gulita pun engkau terus menempuh jalanmu.
Verse 336
परीयुज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन् हुताशनम् । मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके
Mencari cara untuk menyalakan kembali api suci, mereka tidak juga menemukan Agni, sang Dewa Api. Setelah berkata demikian kepada katak, para dewa kembali mengembara di bumi untuk mencari Agni; namun di mana pun mereka mencari, ia tak juga tampak.
Verse 343
अश्रृत्थस्थो3ग्निरित्येवमाह देवान् भृगूद्गवह | भुगुश्रेष्ठ॒ तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला--'अश्वत्थ अग्निरूप है'
Bhṛgu, yang termulia di antara keturunannya, berkata kepada para dewa: “Agni bersemayam pada pohon aśvattha.” Setelah itu Indra, raja para dewa—laksana Airāvata, penguasa gajah yang perkasa—menegaskan kepada para dewa: “Aśvattha itu bersifat api.”
Verse 353
प्रतीपा भवतां जिह्दा भवित्रीति भृगूद्गह | भगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्लल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा--तुमलोगोंकी जिह्ला उलटी हो जायगी”
Bhṛgu berkata: “Lidah kalian akan menjadi terbalik.” Mendengar itu, Agni diliputi amarah dan mengutuk semua gajah, seraya menyatakan: “Lidah kalian akan terbalik.”
Verse 426
अग्निदेवने उसकी भी जिह्ला उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा--“तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा--कुछ- कुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।। बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम् | 'जैसे बड़े-बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अदभुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी”
Agni membalikkan lidah Shuka. Lalu, ketika para dewa melihat Agni menampakkan diri, mereka tergerak oleh belas kasih dan berkata kepada Shuka: “Walau engkau tinggal dalam rahim seekor burung nuri, engkau tidak akan sepenuhnya kehilangan ujaran; engkau masih dapat berbicara sedikit. Meski lidahmu terbalik, suaramu akan amat manis dan memesona. Seperti celoteh cadel seorang anak—ajaib dan tak jelas—yang terdengar manis bahkan bagi orang tua, demikian pula tuturmu akan menyenangkan semua.”
Verse 743
तत् सर्व काज्चनीभूतं समन्तात् प्रत्यदृश्यत । सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा
Di sekeliling, semuanya tampak berubah menjadi emas. Laksana sinar matahari, sumber yang menakjubkan itu membuat apa pun yang disentuhnya—entah tanah atau benda apa pun di pegunungan—berkilau dari segala sisi seakan telah menjadi emas murni.
Verse 756
व्यादीपयंस्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् । वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था
Dengan sinar tejasnya sendiri menerangi seluruh triloka—segala yang bergerak maupun tak bergerak—anak itu, berkilau oleh kemuliaan, mulai berlari menuju pegunungan, sungai-sungai, dan air terjun.
Verse 1223
वरुणश्रेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् | “भगवन्! हम सब लोग और चराचरसहित सारा जगत् ये सब-के-सब आपकी ही संतान हैं। अत: अब ये प्रकाशमान अग्नि और ये वरुणरूपधारी ईश्वर महादेव भी अपना मनोवांछित फल प्राप्त करें!
Semoga Sang Dewa, yang termulia laksana Varuṇa, menganugerahkan harapan yang diinginkan. Wahai Bhagavan, kami semua dan seluruh jagat beserta segala yang bergerak maupun tak bergerak adalah keturunan-Mu sendiri; maka biarlah Agni yang bercahaya ini, dan Mahādeva—Sang Īśvara yang mengambil wujud Varuṇa—kini memperoleh buah dari hasrat batin masing-masing.
It asks which offerings to pitṛs yield akṣaya (imperishable benefit), which oblations produce long-lasting satisfaction, and what is described as leading to ānantya within the śrāddha framework.
Sesame (tila) is given primacy, with tradition attributing akṣaya quality to specific sesame-based śrāddha; the chapter also presents a ranked, substance-based account of how long different offerings are said to please the pitṛs.
Yes. Bhīṣma references authoritative tradition (including Manu) and introduces a gāthā connected to pitṛ song, attributing prior instruction to Sanatkumāra, thereby positioning the teaching as received and standardized rather than merely personal opinion.