Verse 2.1
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥१॥
अगर तुम सोच रहे हो कि तुमने ब्रह्मा को पूरा समझ लिया, तो तुमने थोड़ा ही जाना है। तुमने सिर्फ इतना जाना है जो तुम्हारे अंदर है और जो देवियों में है। अभी और डिटेल में सोचना पड़ेगा, अभी पूरा क्लियर नहीं है।
Verse 2.2
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥
मैं यह नहीं कहता कि मैंने ब्रह्मा को पूरा जान लिया, और यह भी नहीं कहता कि मैं कुछ नहीं जानता। जो लोग सच में जानते हैं, वो यह भी जानते हैं कि ब्रह्मा को नॉर्मल चीज़ की तरह नहीं जाना जाता। इतना समझ लो, ब्रह्मा को जानना भी एक अलग बात है।
Verse 2.3
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥
जिसने उसे सोच के पकड़ने की कोशिश नहीं की, उसे सच में पता चल गया। जो लोग सोचते हैं कि हमने समझ लिया, वो असली में समझे नहीं। जो लोग उसे चीज़ जैसा जानते हैं, उन्हें वो नहीं मिलता। जो लोग उसे चीज़ नहीं मानते, उन्हें वो मिल जाता है।
Verse 2.4
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥
सच्चा ज्ञान वो है जो हर वक्त समझ में आता रहे। इससे आदमी अमरत्व पाता है। अपने आप से बल मिलती है। ज्ञान से अमरत्व मिलता है।
Verse 2.5
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदीहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥
अगर यहाँ जान लिया, तो सच में हाथ आ गया। अगर यहाँ नहीं जाना, तो बहुत बड़ा नुकसान हो गया। जो लोग समझदार हैं, वो हर जीव में उसे देख लेते हैं। फिर यह दुनिया छोड़ के अमर हो जाते हैं।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.