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The Adhyātma Upaniṣad is a compact Vedāntic treatise traditionally associated with the Yajurveda and often transmitted within the wider stream of “minor” (sāmānya/saṃnyāsa-oriented) Upaniṣadic literature. Its title—“Adhyātma,” the inward Self—signals its program: to turn the seeker from ritual and external supports toward direct knowledge (jñāna) of Ātman as identical with Brahman. In tone and method it stands close to the Advaita Vedānta idiom: it employs discrimination (viveka), renunciation (vairāgya), and contemplative inquiry to dissolve the superimposition (adhyāsa) by which consciousness is mistaken for body, senses, and mind. Philosophically, the text is significant for presenting a clear pedagogy of interiorization: the “sacrifice” is re-read as an inner offering, the “pilgrimage” as a movement of attention into the heart of awareness, and liberation (mokṣa) as the cessation of ignorance (avidyā) rather than the production of a new state. It reiterates classic Upaniṣadic themes—neti neti (not this, not this), the witness-consciousness (sākṣin), and the unreality of the world as independently existent—while also emphasizing the practical disciplines that prepare the mind for non-dual insight: serenity, restraint, and sustained meditation on the mahāvākyas. Historically, the Adhyātma Upaniṣad reflects a mature phase of Vedāntic synthesis in which Upaniṣadic revelation is read through a systematic lens: the three states (waking, dream, deep sleep), the five sheaths (pañca-kośa), and the distinction between the changing instruments of experience and the unchanging knower. Its doctrinal center is the identity of jīva and Brahman: bondage is the jīva’s identification with limiting adjuncts (upādhis), and freedom is the recognition that the Self was never bound. The text thus functions as a bridge between early Upaniṣadic aphorisms and later scholastic Advaita expositions. Key themes include the critique of mere ritualism when divorced from knowledge, the inward “adhyātma-yajña” (inner sacrifice) of ego and desire, and the cultivation of steady abidance (nididhyāsana) in pure awareness. The Upaniṣad’s spiritual psychology is precise: mind is both the cause of bondage (when extroverted and desire-driven) and the instrument of liberation (when purified and made subtle). Liberation is described not as an event in time but as the ever-present nature of consciousness, revealed when ignorance is removed—like the sun uncovered by dispersing clouds.
Start ReadingĀtman–Brahman aikya: the individual Self is non-different from Brahman
Avidyā/adhyāsa as the root of bondage; knowledge (jñāna) as liberation
Viveka between the seer (dṛk/sākṣin) and the seen (dṛśya): body–mind are objects
Neti neti and pañca-kośa discernment to negate misidentification
Three states analysis (jāgrat–svapna–suṣupti) pointing to the turiya-like witness
Inner sacrifice (adhyātma-yajña): offering ego, desire, and doership into knowledge
Sādhana: śama, dama, uparati, titikṣā, śraddhā, samādhāna; and nididhyāsana on mahāvākyas
Jīvanmukti: freedom as recognition of ever-free consciousness, not a produced result
70 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यमस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन्यं पृथिवी न वेद । यस्यापःशरीरं यो अपोऽन्तरे संचरन्यमापो न विदुः । यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरे संचरन्यं तेजो न वेद । यस्य व...
शरीर के अंदर एक गुफा में वो है जो कभी पैदा नहीं हुआ। वो हमेशा अकेला है। धरती उसका शरीर है, वो धरती के अंदर चलता है, लेकिन धरती उसे नहीं जानती। पानी उसका शरीर है, वो पानी के अंदर चलता है, लेकिन पानी उसे नहीं जानता। अग्नि उसका शरीर है, वो अग्नि के अंदर चलता है, लेकिन अग्नि उसे नहीं जानती। हवा उसका शरीर है, वो हवा के अंदर चलता है, लेकिन हवा उसे नहीं जानती। आकाश उसका शरीर है, वो आकाश के अंदर चलता है, लेकिन आकाश उसे नहीं जानता। मन उसका शरीर है, वो मन के अंदर चलता है, लेकिन मन उसे नहीं जानता। बुद्धि उसका शरीर है, वो बुद्धि के अंदर चलता है, लेकिन बुद्धि उसे नहीं जानती। अहंकार उसका शरीर है, वो अहंकार के अंदर चलता है, लेकिन अहंकार उसे नहीं जानता। चित्त उसका शरीर है, वो चित्त के अंदर चलता है, लेकिन चित्त उसे नहीं जानता। अव्यक्त उसका शरीर है, वो अव्यक्त के अंदर चलता है, लेकिन अव्यक्त उसे नहीं जानता। अक्षर उसका शरीर है, वो अक्षर के अंदर चलता है, लेकिन अक्षर उसे नहीं जानता। मौत उसका शरीर है, वो मौत के अंदर चलता है, लेकिन मौत उसे नहीं जानती। वो सभी जीवों के अंदर वाली आत्मा है। बिल्कुल साफ है, देवता है, एक है, नारायण है। शरीर और इंद्रियों को बोलके कहता है मैं और मेरा, यह गलत है। ज्ञानी लोग ब्रह्मन में रहके इस गलत बात को हटा देते हैं।
Antaryāmin (Inner Controller) doctrine; immanence and transcendence of Brahman/Ātman; critique of ahaṅkāra-based self-identification (adhyāsa)Verse 2
ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम् । सोऽहमित्येव तद्वृत्त्या स्वान्यत्रात्म्यमात्मनः॥२॥
अपने अंदर की आत्मा को जान लो। वो बुद्धि और उसके कामों को देखने वाला है। जब यह समझ आता है कि मैं वही हूं, तो अपने आप को शरीर से अलग समझने लगते हो।
Atman as sākṣin (witness-consciousness) and de-identification (adhyāsa-nivṛtti) via so’ham-vṛttiVerse 3
लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम् । शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु॥३॥
दुनिया के पीछे मत भागो। शरीर के पीछे मत भागो। शास्त्र के पीछे भी मत भागो। बस अपने आप को शरीर समझने की गलत बात को छोड़ो।
Adhyāsa-nivṛtti (removal of superimposition), Viveka–Vairāgya (discrimination and dispassion)Verse 4
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः । युक्त्या श्रुत्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सार्वात्म्यमात्मनः॥४॥
जब योगी अपनी आत्मा में हमेशा रहता है, तो उसका मन शांत हो जाता है। सोच के, शास्त्र पढ़ के, और खुद अनुभव कर के वो जान लेता है कि वो सबकी आत्मा है।
Ātman as Sarvātman (non-dual all-selfhood) and Manonāśa (dissolution of mind)Verse 5
निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नवसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि॥५॥
ज्यादा मत सोयो। दुनिया की बातें मत करो। शब्द और दूसरी चीजों में मत उलझो। अपनी आत्मा को मत भूलो। कभी-कभी अपनी आत्मा के बारे में सोचो।
Atman-smriti and nididhyasana (sustained contemplation) as discipline for kaivalya (liberation)Verse 6
मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः । त्यक्त्वा चण्डालवद्दूरं ब्रह्मभूय कृती भव॥६॥
यह बॉडी माँ बाप के मैल से बनी है। यह फ्लेश और गंदगी का बना है। इसे छोड़ दो, जैसे कोई बड़ा पापी आदमी को दूर कर देते हैं। फिर तुम खुद ब्रह्मा बन जाओ। अपना काम पूरा कर लो।
Dehātma-bhrānti-nivṛtti (removal of body-self error) leading to Brahma-bhāva (identity with Brahman)Verse 7
घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि । विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने॥७॥
जैसे एक घड़े के अंदर हवा है और बाहर भी हवा है, दोनों एक ही हैं। वैसे ही अपने आप को उस बड़े आप में मिला दो। कोई भेद नहीं रखना। फिर हमेशा चुप रहो, मुनिजी।
Atman–Brahman non-difference; upādhi-limitation and its sublation (bādha) through jñānaVerse 8
स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना । ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत्॥८॥
अपने अंदर जो चमक है, उसके बसे खड़े हो जाओ। यह खुद से बनी है। फिर छोटा ब्रह्मांड और बड़ा ब्रह्मांड, दोनों को छोड़ दो। जैसे कोई गंदा बर्तन फेंक देते हैं।
Atman/Brahman as svayaṃ-prakāśa (self-revealing consciousness) and adhiṣṭhāna (substratum); renunciation of identification with macrocosm and microcosmVerse 9
चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम् । निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा॥९॥
जो मैं हूँ, यह बॉडी वाली फीलिंग है। इसको उस चमक वाले आप में रख दो जो हमेशा खुश रहता है। फिर अपना सूक्ष्म बॉडी छोड़ दो। सिर्फ ब्रह्मा बनिये रहो, हमेशा।
Atman as pure consciousness (cit) and ever-present bliss (ānanda); negation of body–mind identification; kevala (non-dual) abidingVerse 10
यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तःपुरं यथा । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भवानघ॥१०॥
जैसे शीशे में कोई कमरा दिखता है, वैसे ही यह दुनिया दिखती है। उस जगह पे तुम खुद ब्रह्मा हो। यह जान के तुम्हारा काम हो गया। तुम कोई पाप नहीं कर सकते।
Brahman–Atman identity; jagat as ābhāsa (appearance) and adhiṣṭhāna (substratum)Verse 11
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते । चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः॥११॥
जब आदमी अहंकार के जाल से आज़ाद हो जाता है, तब उसका असली रूप सामने आता है। वो चाँद की तरह साफ है, पूरा है, हमेशा खुश है, और खुद से चमकता है।
Atman as self-luminous, ever-blissful fullness; removal of ahaṃkāra (ego-notion) as liberationVerse 12
क्रियानाशाद्भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः । वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते॥१२॥
जब करम करना बंद हो जाता है, तो चिंता भी खत्म हो जाती है। उससे वो पुरानी आदतें मिट जाती हैं। जब यह आदतें पूरा खत्म हो जाती हैं, तब आदमी मुक्त हो जाता है। ज़िंदा रहते हुए भी आज़ादी मिल जाती है।
Vāsanā-kṣaya and Jīvanmukti (liberation-in-life) through nirodha of pravṛtti and citta-vikṣepaVerse 13
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनम् । सद्भावभावानादाढ्याद्वासनालयमश्नुते॥१३॥
हर जगह, हर चीज़ में सिर्फ ब्रह्म दिखता है। जब आदमी सच्चाई को दिल में बसा लेता है, तब वो उस पास पहुँच जाता है जहाँ सब विचार रहते हैं।
Brahman-realization through sarvātma-bhāva (all-pervasive Brahman vision) and vāsanā-transformationVerse 14
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यज़् कदाचन । प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः॥१४॥
ब्रह्म में रहते हुए कभी ध्यान नहीं हरना चाहिए। जो लोग ब्रह्म को जानते हैं, वो कहते हैं कि ध्यान भूलना मौत जैसा है।
Brahma-niṣṭhā (steadfast abidance in Brahman) and the peril of pramāda (heedlessness) in vidyā-mārgaVerse 15
यथापकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति । आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम्॥१५॥
जैसे पानी में कोई घास निकल के बाहर आ जाए, तो एक पल भी नहीं रहती। वैसे ही माया उस ज्ञानी को भी ढाक लेती है जब वो बाहर की तरफ देखने लगता है।
Māyā/Avidyā as veiling (āvaraṇa) and the danger of extroversion (parāṅmukhatā)Verse 16
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः । समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ॥१६॥
जिसका कैवल्य, यनि अलग होने का ग्यान, ज़िन्दगी में ही हो गया वो ऐसा है। शरीर के बाद भी वो अकेला रहता है, किसी से जुड़ा नहीं। समाधि में पक्का हो जाओ। सोच-विचार छोड़ के, बिना किसी शक के, खड़े रहो।
Jīvanmukti and videhamukti; nirvikalpa-samādhi; kaivalya as non-dual liberationVerse 17
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा । समाधिना विकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम्॥१७॥
तब दिल में जो अग्यान का गाँठ है वो पूरा खुल जाता है। समाधि के ज़रिये, जब अद्वैत, यनि दो नहीं बस एक, का ग्यान होता है, तब यह गाँथ गायब हो जाती है।
Avidyā-granthi (knot of ignorance) and aparokṣa-jñāna (immediate realization) of non-dual ĀtmanVerse 18
अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन् । उदासीनतया तेषु तिष्ठेद्घटपटादिवत्॥१८॥
यहाँ अपने आप को पक्का समझो कि मैं आत्मा हूँ। मैं, मैं करना छोड़ दो। इन सब से अलग हो के देखो, जैसे कोई हाँडा या कपड़ा देखते हैं, बस देखा, अपना नहीं।
Ātman-niṣṭhā and ahaṅkāra-tyāga (abidance in the Self; relinquishing ego-identification)Verse 19
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं मृषामात्रा उपाधयः । ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम्॥१९॥
ब्रह्मा से लेकर घास के पात तक, यह सब दिखने वाली चीज़ें बस धोखा है। इसलिए अपने आप को पूरा समझो, जो सब में एक ही है।
Upādhi (limiting adjunct) and mithyātva of the empirical order; realization of pūrṇa-ātman / ekātman (non-dual Self)Verse 20
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः । स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किंचन॥२०॥
वो खुद ब्रह्मा है, वो खुद विष्णु है, वो खुद इंद्र है, वो खुद शिव है। यह पूरा दुनिया भी वोही है। उसके अलावा कुछ भी नहीं है।
Non-duality (advaya/advaita): identity of the absolute with all deities and the cosmos; denial of any second realityVerse 21
स्वात्मन्यारोपिता शेषाभासवस्तुनिरासतः । स्वयमेव परंब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम्॥२१॥
जब तुम अपने आप पर जो भी बात चिपका ली है, वो सच में नहीं है यह समझ में आता है। तब खुद से ही वो बड़ा ब्रह्मन दिखने लगता है। वो पूरा है, दूसरा कोई नहीं, और उससे कोई काम नहीं करना पड़ता।
Adhyāsa (superimposition) and its sublation revealing nirguṇa BrahmanVerse 22
असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि । निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः॥२२॥
यह सारी दुनिया जो दिखती है, बस दिमाग की बात है। सच में तो बस एक ही चीज़ है। उसमें कोई बदलाव नहीं, कोई शकल नहीं, कोई खास बात नहीं। फिर अलग-अलग होने का सवाल ही कहाँ से आता है?
Advaita non-duality; mithyātva of jagat; nirguṇa Brahman; bheda-nivṛtti (negation of difference)Verse 23
द्रष्टृदर्शनदृश्यादिभावशून्ये निरामये । कल्पार्णव इवात्यन्तं परिपूर्णे चिदात्मनि॥२३॥
उस चेतना रूप आप में जो देखने वाला, देखना और जो दिखता है, ऐसे सब से आज़ाद है। बिल्कुल ठीक है, कोई बीमारी नहीं। जैसे समुंदर में पानी भरा है, वैसे ही उसमें सब कुछ भरा है।
Non-dual consciousness (cidātman) beyond the tripartite structure of cognition (knower–knowing–known)Verse 24
तेजसीव तमो यत्र विलीनं भ्रान्तिकारणम् । अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः॥२४॥
जैसे रोशनी आते ही अंधेरा खत्म हो जाता है, वैसे ही उस एक सच में गलती का कारण भी खत्म हो जाता है। उस बड़े तत्व में दूसरा कोई नहीं है, कोई खास बात नहीं है। फिर अलग होने का सवाल ही कहाँ से आता है?
Advaita (non-duality); avidyā-bhrānti (ignorance as the cause of error) and its sublation by jñānaVerse 25
एकात्मके परे तत्त्वे भेदकर्ता कथं वसेत् । सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः॥२५॥
उस बड़े तत्व में जो खुद एक है, कोई अलग करने वाला कैसे रह सकता है? जब तुम गहरी नींद सोते हो तब तो बस सुखी लगता है, कोई अलग-अलग चीज़ें नहीं दिखती। किसने देखा है वहाँ कोई फरक?
Advaita (non-duality) using suṣupti (deep sleep) as phenomenological evidence against intrinsic bheda (difference)Verse 26
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन । अतश्चित्तं समाधेयि प्रत्यग्रूपे परात्मनि॥२६॥
सारे विकल्प दिमाग से आते हैं। जब दिमाग नहीं रहता, कोई विकल्प भी नहीं रहता। इसलिए दिमाग को शांत करो। उसे अपने अंदर वाले परम आत्मा में समेट दो।
Vikalpa-nivṛtti through citta-laya/nirodha; absorption of mind in Pratyag-Ātman (Advaita non-dualism)Verse 27
अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि॥२७॥
जब तुम अपने आप को पहचानो, तो तुम बिना किसी टूटे के खुश हो। बाहर हो या अंदर, हमेशा खुशी का मज़ा लो। यह खुशी तुम्हारे अंदर ही है।
Atman as Akhaṇḍānanda (non-dual, unbroken bliss); aparokṣa-jñāna and sahajānandaVerse 28
वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम्॥२८॥
जब दिल लगाओ छोड़ो, तो समझ आता है। समझ आने पर, भाग-दौड़ छूट जाती है। अपनी खुशी को महसूस करके जो शांति मिलती है, वही असली फल है।
Sādhana-krama (progression of spiritual disciplines): vairāgya → bodha (jñāna) → uparati → śānti rooted in svānanda-anubhavaVerse 29
यद्युत्तरोत्तराभावे पूर्वरूपं तु निष्फलम् । निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः॥२९॥
अगला लेवल नहीं मिलने पर, पहले वाला काम नहीं आता। सब छोड़ के जो शांति मिलती है, वही सबसे बड़ी सैटिस्फैक्शन है। खुशी का कोई कंपेरिज़न नहीं।
Nivṛtti (cessation) as the hallmark of mokṣa; hierarchy of sādhanā culminating in intrinsic ānandaVerse 30
मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः । पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः॥३०॥
माया की वजह से दुनिया बनती है। वो सब जानता है, पर सीधा नहीं दिखता। उसमें सच्चाई है। इसको तत् कहते हैं, यानी वो।
Tat-padārtha (meaning of ‘tat’ in mahāvākya), Īśvara as māyopahita-brahman; satya/jñāna-type svarūpa-lakṣaṇa vs. omniscience-type taṭastha-lakṣaṇaVerse 31
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः । अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः॥३१॥
जब तुम कहते हो 'मैं', उसके पीछे जो चमक रहा है वो असली चीज़ है। यह दोनों जगह दिखता है - तुम्हारे 'मैं' के ख़याल में और 'मैं' शब्द में। यह वो समझ है जो तुम्हारे अंदर से आती है। इसी को 'तू' कहा जाता है।
Tvam-pada (the ‘thou’ term) analysis; jīva as consciousness associated with antaḥkaraṇa; adhyāsa/conditioning of pure consciousnessVerse 32
मायाविद्ये विहायैव उपाधी परजीवयोः । अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्म विलक्ष्यते॥३२॥
माया और अज्ञान को साइड में रख दो। यह दोनों चीज़ें तुम्हे लिमिट करती हैं - एक ब्रह्मन की तरफ़ से, दूसरी जीव की तरफ़ से। जब इन्हें हटा दोगे, तो ब्रह्मन दिखेगा। वो एक पूरा है, बिना टुकड़ों के। उसमें बस होना है, समझना है, और खुशी है।
Upādhi-apavāda (negation of limiting adjuncts) revealing akhaṇḍa-brahman; saccidānanda-lakṣaṇaVerse 33
इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या संभावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत्॥३३॥
पहले उपनिषद की बातें सुनो और समझो कि उनका मतलब क्या है। यह सुन्ना है। फिर सोचो कि क्या यह सच लग रहा है, क्या यह पॉसिबल है। अपनी बुद्धि से चेक करो। यह सोचना है।
Epistemology of Vedānta (śravaṇa–manana as stages in brahmajñāna); śabda-pramāṇa supported by yuktiVerse 34
ताभ्यं निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् । एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते॥३४॥
जब तुमने बहुत सुन लिया और सोच लिया, और अब तुम्हे कोई शक नहीं रहती, तब तुम्हारा मन वहीं जम जाता है। वो एक ही चीज़ पर टिका रहता है, बिना हिले। इसी को गहरी ध्यान कहते हैं।
Nididhyāsana (contemplative assimilation) as the third discipline after śravaṇa and manana; removal of viparīta-bhāvanā and stabilization in brahma-jñānaVerse 35
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते॥३५॥
धीरे-धीरे यह भी छोड़ दो कि 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' और 'यह ध्यान है'। बस एक ही चीज़ पर मन लगा हो। जैसे शांत हवा में दिया जलता है, बिना हिले, वैसे मन एक जगह स्थिर हो जाए। इसी को समाधि कहते हैं।
Samādhi (one-pointed absorption) as a culminating mode of dhyāna leading toward non-dual insightVerse 36
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिताः॥३६॥
उस वक्त दिमाग की बातें समझ में नहीं आती। वो अंदर ही रहती हैं, बस। बाद में जब याद आता है, तब पता चलता है कि वो थे भी। जैसे नींद से उठ के याद रखो, तब पता चलता है कि सपने में क्या देखा।
Vṛtti (mental modification), sākṣin (witness Self), and epistemology of inference from memoryVerse 37
अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः । अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते॥३७॥
इस दुनिया में हम कब से फंसे हैं, कोई याद नहीं। इतने सारे कर्म भी जमा हो गए। लेकिन इस तरह से सब खत्म हो जाता है। अच्छी बातें बढ़ने लगती हैं और बुरियाँ घटती हैं।
Karma (sañcita) dissolution; purification (śuddhi) as a condition for liberation-oriented knowledge/practiceVerse 38
धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः । वर्षत्येष यथा धर्मामृतधाराः सहस्रशः॥३८॥
जो लोग योग के बारे में सबसे ज्यादा जानते हैं, वो इस समाधि को धरम का बादल कहते हैं। क्योंकि इसमें से हज़ारों बातें टपकती हैं जैसे अमृत बरस रहा हो। धरम की बातें, साफ-साफ।
Samādhi as dharmamegha (culminating yogic absorption producing effortless outflow of dharma)Verse 39
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते । समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये॥ वाक्यमप्रतिबद्धं सत्प्राक्परोक्षावभासिते । करामलकमवद्बोधपरोक्षं प्रसूयते॥३९-४०॥
इस तरह से मन की सारी पुरानी आदतें खत्म हो जाती हैं। जो भी पाप-पुण्य जमा हुआ था, उसकी जड़ से खोद कर फेंक दिया जाता है। तब शास्त्र की बात ऐसे काम करती है जैसे कोई रोका न हो। जो पहले सिर्फ सुनने में आता था, अब आँखों के सामने है। जैसे हाथ में फल रखा हो, इतना साफ दिखता है।
Aparokṣa-jñāna (immediate Self-knowledge) via vāsanā-kṣaya and karma-kṣaya; functioning of śabda-pramāṇa when obstacles are removedVerse 40
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते । समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये॥ वाक्यमप्रतिबद्धं सत्प्राक्परोक्षावभासिते । करामलकमवद्बोधपरोक्षं प्रसूयते॥३९-४०॥
इस तरह से मन की सारी पुरानी आदतें खत्म हो जाती हैं। जो भी पाप-पुण्य जमा हुआ था, उसकी जड़ से खोद कर फेंक दिया जाता है। तब शास्त्र की बात ऐसे काम करती है जैसे कोई रोका न हो। जो पहले सिर्फ सुनने में आता था, अब आँखों के सामने है। जैसे हाथ में फल रखा हो, इतना साफ दिखता है।
Vāsanā-kṣaya and karma-kṣaya as prerequisites for aparokṣa-jñāna (immediate realization of Sat/Brahman)Verse 41
वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः । अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः॥४१॥
जब चीज़ों के मज़्ज़े के लिए मन में कोई इच्छा नहीं उठती, यह वैराग्य का पूरा लेवल है। और जब 'मैं' 'मैं' करने का भाव नहीं उठता, यह ज्ञान का सबसे बड़ा लेवल है।
Vairāgya (dispassion), Vāsanā-kṣaya (exhaustion of latent tendencies), Ahaṃkāra-nivṛtti (cessation of ego-sense), Jñāna-niṣṭhā (abidance in knowledge)Verse 42
लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा । स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते॥४२॥
जब मन की बातें शांत हो जाएँ और वापस नहीं आएँ, यह उपरति का साइन है। ऐसा संन्यासी जो हमेशा खुश रहता है, वो स्थित-प्रज्ञा कहलाता है।
Uparati (withdrawal) and nirodha of vṛttis as a mark of sthitaprajñā leading to ānanda (Brahmānanda)Verse 43
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः । ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनि॥ निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते । सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥४३-४४॥
जिसका आप ब्रह्म में घुल के रहता है, जो बदलता नहीं और जो करता नहीं। जब ब्रह्म और आप दोनों साफ हो जाते हैं, तो एक ही में डूब के रहते हो। वो सोच जो बिना किसी भेद के सिर्फ चेतना में है, उसे प्रज्ञा कहते हैं। जिसमें यह हमेशा रहता है, वो जीवन-मुक्त है।
Jīvanmukti; akhaṇḍākāra-vṛtti (non-dual cognitive mode); Brahman–Ātman abhedaVerse 44
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः । ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनि॥ निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते । सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥४३-४४॥
जिसका आप ब्रह्म में घुल के रहता है, जो बदलता नहीं और जो करता नहीं। जब ब्रह्म और आप दोनों साफ हो जाते हैं, तो एक ही में डूब के रहते हो। वो सोच जो बिना किसी भेद के सिर्फ चेतना में है, उसे प्रज्ञा कहते हैं। जिसमें यह हमेशा रहता है, वो जीवन-मुक्त है।
Jīvanmukti; Brahmātmaikya (identity of Brahman and Ātman); nirvikalpa-jñāna/vṛttiVerse 45
देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके । यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते॥४५॥
जिसे शरीर के बारे में कभी 'मैं' नहीं लगता। न ही दुनिया की चीज़ों में 'यह मेरा है' का भाव होता है। ऐसा आदमी जीवन-मुक्त कहलाता है।
Jīvanmukti; adhyāsa (superimposition) of ahaṃ-bhāva and idam-bhāva; discrimination of Ātman vs. anātmanVerse 46
न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः । प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते॥४६॥
जो इंसान समझ लेता है कि अंदर का ब्रह्म और बाहर की दुनिया में कोई फरक नहीं है। वो समझ के देखता है कि ब्रह्म और सृष्टि में कोई भेद नहीं। ऐसा इंसान को जीवनमुक्त कहते हैं। यह वो है जो ज़िन्दा रहते हुए भी मुक्त हो गया।
Non-difference (abheda) of Ātman/Brahman and the manifested world; jīvanmukti; pratyag-brahmanVerse 47
साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन्पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः । समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥४७॥
ऐसा इंसान जिको अच्छे लोग पूजा करें या बुरे लोग सताएं। उसका मन दोनों में समे रहता है। न वो खुश होता है जब कोई उसकी तारीफ करे। न दुखता है जब कोई बुरा बोले। ऐसा आदमी भी जीवनमुक्त है।
Jīvanmukti; samatā (equanimity) as a mark of realized knowledgeVerse 48
विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः । अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः॥४८॥
जब किसी को ब्रह्म का असली चीज़ समझ आ जाता है। तब उसके लिए पुराना जनम-मरण का चक्कर खत्म हो जाता है। अगर अभी भी वही पुरानी बातें चल रही हैं। तो समझो ब्रह्म का ज्ञान हुआ ही नहीं। वो अभी भी बाहर की दुनिया में फंसा हुआ है।
Brahma-jñāna as the direct negation of saṃsāra (avidyā-kṛta bandha)Verse 49
सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते । फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो नहि कुत्रचित्॥४९॥
जब तक तुम्हे सुख दुख का एहसास होता है। तब तक पुराने करम का फल मिलता रहता है। जो काम किए थे, उनका रिज़ल्ट आता है। बिना काम किए कोई रिज़ल्ट नहीं मिलता। यह सिंपल बात है।
Karma theory (prārabdha) and causality of experience; relation of embodied experience to residual karma even for a knowerVerse 50
अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम् । संचितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत्॥५०॥
जब इंसान सच में समझ लेता है कि मैं ब्रह्म हूँ। तब लाखों जनमों के करम जो जमा थे, सब खत्म हो जाते हैं। जैसे नींद में सपना देखो, उसमें बड़े बड़े काम करो। फिर जब आँख खुले तो वो सब गायब। ज्ञान होने के बाद करम ऐसे ही गायब हो जाते हैं।
Atman–Brahman identity; jñāna as the destroyer of sañcita-karma; avidyā-nivṛttiAnswers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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