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Sukta 8.72
Ritual action centered on the Adhvaryu (and implicitly Agni/yajña)
This hymn is a liturgical instruction and praise centered on the Adhvaryu’s correct performance—preparing the havis, moving by ordinance (praśāsana), and advancing the sacrifice so it “wins” its goal. Through vivid libation imagery (pouring into the deep, wide-circling vessel) it links precise ritual action with the cosmic circulation of soma/oblation and the sustaining order of yajña. The closing vision hints at a deeper layer: the “station” (pada) of the desirable power is spread around heaven by the tongue—suggesting Vāk (sacral utterance) as the subtle force that completes the rite.
Mantra 1
हविष्कृणुध्वमा गमदध्वर्युर्वनते पुनः । विद्वाँ अस्य प्रशासनम् ॥
हवन का सामान तैयार करो। अध्वर्यु फिर आगे आए, यह आशीर्वाद है। वो जानता है कि काम कैसे करना है, सही नियम से चल रहा है।
Mantra 2
नि तिग्ममभ्यंशुं सीदद्धोता मनावधि । जुषाणो अस्य सख्यम् ॥
होता वहाँ बैठो जहाँ तेज़ चमक है, मन के पास। इस शक्ति की दोस्ती क़ुबूल करो, सही काम में जुड़ जाओ।
Mantra 3
अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया । गृभ्णन्ति जिह्वया ससम् ॥
लोग अंदर ढूँढ़ते हैं उस रुद्र को, सोच के साथ। जीभ से पकड़ते हैं उसे, बड़े शक्ति वाले को, शब्दों के दम से।
Mantra 4
जाम्यतीतपे धनुर्वयोधा अरुहद्वनम् । दृषदं जिह्वयावधीत् ॥
रिश्ते में उसने धनुष जला दिया। जीवन देने वाला पेड़ पर चढ़ गया। जीभ से उसने सख्त चीज़ को मारा, शब्द बनी हथियार।
Mantra 5
चरन्वत्सो रुशन्निह निदातारं न विन्दते । वेति स्तोतव अम्ब्यम् ॥
लाल बच्हा इधर उधर चल रहा है, कोई उसे ठिकाने नहीं लगा रहा। वो माँ ढूँढ़ता है, गाने वाले, खिलाने वाली शक्ति को चाहता है।
Mantra 6
उतो न्वस्य यन्महदश्वावद्योजनं बृहद् । दामा रथस्य ददृशे ॥
उसकी सवारी बहुत बड़ी है। घोड़ा गाड़ी चलाता है, और उसका रास्ता बहुत लंबा है। गाड़ी की रस्सी साफ दिखती है। सब कुछ ठीक से जुड़ा है, सब काम कर रहा है।
Mantra 7
दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः । तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे ॥
सात तान के एक चीज़ निकालते हैं। फिर दो और पाँच मिल के उसे बहने देते हैं। यह सब नदी के पास होता है। वहाँ एक अलग रोशनी आती है।
Mantra 8
आ दशभिर्विवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत् । खेदया त्रिवृता दिवः ॥
इंद्र दस ताकत ले के आता है। वो छुपा हुआ खज़ाना बाहर निकालता है। थकावट दूर करता है। आसमान के तीन दरवाज़े खोल देता है।
Mantra 9
परि त्रिधातुरध्वरं जूर्णिरेति नवीयसी । मध्वा होतारो अञ्जते ॥
यज्ञ के चारों ताकत चलती है। वो ताकत ताज़ी होती है। पूजा करने वाले लोग मीठा ले के तैयार होते हैं। अपना काम शुरू करते हैं।
Mantra 10
सिञ्चन्ति नमसावतमुच्चाचक्रं परिज्मानम् । नीचीनबारमक्षितम् ॥
लोग झुक के पानी डालते हैं। बड़ा बर्तन है, गोल गोल है। वो सब जगह चलता है। बोझ उठाता है, पर टूटता नहीं।
Mantra 11
अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु । अवतस्य विसर्जने ॥
पिसने वाले पत्थर पास आके मिलते हैं। वो कमल के फूल जैसा प्याला भरते हैं। उसमे मधुर रस डालते हैं। यह तब होता है जब गेहराई खुलती है।
Mantra 12
गाव उपावतावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥
गाइयाँ, रोशनी की किरण, पास आती हैं। यह बड़ी शक्ति यज्ञ में खुशी देती है। उसके दोनों कान सोने के हैं। वो सच्ची पुकार सुन लेती है और स्वीकार करती है।
Mantra 13
आ सुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम् । रसा दधीत वृषभम् ॥
निकले हुए सोम रस में शक्ति डालो। यह शक्ति आसमान और धरती दोनों के लिए है। खुशी के रस से भलाई पैदा करो। उसमे ताकत भरो।
Mantra 14
ते जानत स्वमोक्यं सं वत्सासो न मातृभिः । मिथो नसन्त जामिभिः ॥
वो अपना असली घर पहचान लेते हैं। जैसे बछड़े अपनी माँ के पास आते हैं, वैसे ही वो मिलते हैं। अपने लोग अपने लोग से जुड़ जाते हैं।
Mantra 15
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि । इन्द्रे अग्ना नमः स्वः ॥
फूलों की माला के पास वो पुकारते हैं। आसमान में मज़बूत स्थापना बनाते हैं। इंद्र और अग्नि को प्रणाम करते हैं। यह रोशनी वाली दुनिया में होता है।
Mantra 16
अधुक्षत्पिप्युषीमिषमूर्जं सप्तपदीमरिः । सूर्यस्य सप्त रश्मिभिः ॥
भगवान ने पूरा पोषण निकाल लिया है, जो फैल रहा है और सात लेवल पर चल रहा है। सूर्य के सात किरण के साथ यह काम हुआ है। यह ताकत और पोषण सबको मिलता है।
Mantra 17
सोमस्य मित्रावरुणोदिता सूर आ ददे । तदातुरस्य भेषजम् ॥
मित्र और वरुण ने सोम की ताकत दी है। यह सूर्य के साथ उठता है और सही ढंग से चलता है। जो भी बीम्मर है उसके लिए यह दवा बन जाता है।
Mantra 18
उतो न्वस्य यत्पदं हर्यतस्य निधान्यम् । परि द्यां जिह्वयातनत् ॥
उसकी जगह है जो सबको अच्छी लगती है, उसमे कुछ छुपा हुआ है। उसने अपनी जीभ से आसमान को घेर लिया है। बोली की ताकत आसमान को घेर लेती है।
The hymn focuses on the Adhvaryu—the priest responsible for the practical, step-by-step actions of the sacrifice—while also implying Agni and Soma as the receiving and circulating powers.
It stresses doing the rite by ordinance and correct sequence: prepare the oblation, proceed properly, and pour with reverence so the sacrifice becomes effective and enduring.
It points to sacred speech (Vāk) as more than sound: the tongue symbolizes mantra and utterance that ‘completes’ the rite by establishing a subtle order that reaches and stabilizes the cosmic space (dyu).
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