
Sukta 8.71
Agni
This hymn to Agni is a protective and prosperity-invoking prayer: the singers ask the Fire-god to guard them with his great powers from want, hostility, and human hatred. Agni is praised as the rightful lord of riches (vasu), the one whose gift must not be driven away by ungodly forces, and as a clan-protector who brings peace, well-being, and a secure abode for the seers’ inspired energies.
Mantra 1
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः । उत द्विषो मर्त्यस्य ॥
अग्नि, तुम अपनी बड़ी शक्ति से हमे बचाओ। हुमें हर तरह की कमी से बचाओ, और दुश्मन लोगों की नफ़रत से भी।
Mantra 2
नहि मन्युः पौरुषेय ईशे हि वः प्रियजात । त्वमिदसि क्षपावान् ॥
कोई इंसान का गुस्सा तुमपे राज नहीं कर सकता। तुम प्यारे से पैदा हुए हो। तुम अकेली रात के मालिक हो, अंधेरे में भी रास्ता दिखाते हो।
Mantra 3
स नो विश्वेभिर्देवेभिरूर्जो नपाद्भद्रशोचे । रयिं देहि विश्ववारम् ॥
तुम सारे देवता लोगों के साथ आओ। तुम्हारी ज्वाला अच्छी है। हुमें वो सब दो जो हमारे लिए अच्छा हो, जो हुमें खुश रखे।
Mantra 4
न तमग्ने अरातयो मर्तं युवन्त रायः । यं त्रायसे दाश्वांसम् ॥
अग्नि, जो इंसान तुम्हारे लिए हवन करता है, तुम उसकी हिफ़ाज़त करो। उस्से दुश्मन लोग उसका माल नहीं चीन सकते, जो तुम उसके साथ हो।
Mantra 5
यं त्वं विप्र मेधसातावग्ने हिनोषि धनाय । स तवोती गोषु गन्ता ॥
अग्नि, जिको तुम समझ और बुद्धि देने के लिए आगे बढ़ाते हो, वो आदमी समझदार बन जाता है। तुम्हारी वजह से उसकी लाइफ में चमक आती है।
Mantra 6
त्वं रयिं पुरुवीरमग्ने दाशुषे मर्ताय । प्र णो नय वस्यो अच्छ ॥
अग्नि, जो इंसान भगवान को पूजा करके आता है, तुम उसको बहुत ताकत और धन देते हो। हमें भी आगे ले चलो, अच्छे और खुशहाल जिंदगी की तरफ।
Mantra 7
उरुष्या णो मा परा दा अघायते जातवेदः । दुराध्ये मर्ताय ॥
जातवेदस, तुम हमारी पूरी तरह से रक्षा करो। हमें उस इंसान के हाथ मत देना जो हमे तकलीफ देना चाहता है। ना ही उस इंसान के पास, जिसका दिमाग गलत दिशा में चल रहा है।
Mantra 8
अग्ने माकिष्टे देवस्य रातिमदेवो युयोत । त्वमीशिषे वसूनाम् ॥
अग्नि, कोई बुरा इंसान तुम्हारी भगवान की देन को हमसे दूर मत जाने दो। तुम ही असली मालिक हो धन और सम्पन्नता का।
Mantra 9
स नो वस्व उप मास्यूर्जो नपान्माहिनस्य । सखे वसो जरितृभ्यः ॥
वसु, तुम हमारे पास आओ। तुम बड़े ताकतवाले हो और पालने वाली शक्ति के हो। जो लोग तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके दोस्त बनो।
Mantra 10
अच्छा नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम् । अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये ॥
हमारी बातें उस अग्नि की तरफ जाएं जो चमकता हुआ दिखता है। हमारी पूजा और नम्र भाव उस शक्ति की तरफ जाएं जो बहुत धन वाली है और जिसकी बहुत तारीफ होती है, ताकि हमारी रक्षा हो।
Mantra 11
अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम् । द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वा होता मन्द्रतमो विशि ॥
अग्नि को बुलाते हैं जो शक्ति का बेटा है। उसे जातवेदस कहते हैं क्योंकि वो सब जानता है। वो अमृत है, मरने वाला नहीं, फिर भी लोगों के बीच रहता है। यज्ञ का पुरोहित बन के आता है। सबसे ज़्यादा खुशी देने वाला है।
Mantra 12
अग्निं वो देवयज्ययाग्निं प्रयत्यध्वरे । अग्निं धीषु प्रथममग्निमर्वत्यग्निं क्षैत्राय साधसे ॥
अग्नि को देवताओं के लिए बुलाते हैं। यज्ञ में सबसे आगे चलता है। सोच में पहली शक्ति है। आगे बढ़ाने वाली ताकत है। काम के क्षेत्र में सही पूरा करता है।
Mantra 13
अग्निरिषां सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम् । अग्निं तोके तनये शश्वदीमहे वसुं सन्तं तनूपाम् ॥
अग्नि हमारे साथ दोस्ती निभाए। जो अच्छी चीज़ों का मालिक है, वो हमें बढ़ाए। हम हमेशा अपने घर में अग्नि को ढूंढ़ते हैं। वो सोने जैसा ख़ज़ाना है जो हमारे अंदर से रक्षा करता है।
Mantra 14
अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम् । अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरोऽग्निं सुदीतये छर्दिः ॥
अग्नि को गाके बुलाओ मदद के लिए। उसकी आग चमकदार है। लोग उसे बहुत गाते हैं, सब सुनते हैं। अग्नि को बुलाओ शांति और सुख के लिए।
Mantra 15
अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे । विश्वासु विक्ष्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुॠषूणाम् ॥
अग्नि को दुश्मन दूर भगाने के लिए बुलाते हैं। शांति और सुख देने के लिए भी बुलाते हैं। वो सब जगह रक्षा करता है जैसे कोई गार्ड हो। रिशियों की शक्ति उसमें रहती है।
A direct plea to Agni to protect the worshippers with vast powers from want and hostile forces, including human enmity.
The hymn reinforces Agni’s role as giver and guardian of divine gifts, insisting that no ungodly agency should push away his bounty; Agni is affirmed as master of riches.
Agni is acclaimed as the force that drives away hostility and grants peace and well-being, extending his protection across all clans.
The hymn ends by envisioning Agni as a steadfast protector and ‘abiding home’ for the seers’ swift, inspired powers—stable safety, prosperity, and sacred presence.
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः । उत द्विषो मर्त्यस्य ॥tvam īśiṣe vasūnām
अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे । विश्वासु विक्ष्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुॠषूणाम् ॥It asks Agni to protect the worshippers from lack, hostile forces, and human hatred, and to secure divine gifts like wealth, peace, and well-being.
It means the singers want no ungodly or disruptive force—outer or inner—to block the benefits that come through right worship and Agni’s grace.
It can be recited during a simple lamp/fire offering (with ghee) at dawn or dusk as a prayer for protection, harmony in the household, and steady prosperity.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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