
Sukta 1.34
Gautama Rāhūgaṇa (traditional for RV 1.34)
Jagatī
This hymn invokes the Aśvinau (Nāsatyas) to come repeatedly—“thrice today” and “day by day”—with their swift chariot, bringing ever-new inspiration, protection, and life-sustaining aid. It praises their wide-ranging movement, timely rescue-power, and their capacity to bestow wealth rich in heroic strength (suvīra), culminating in a direct plea for growth and victory in the gaining of vigor.
Mantra 1
त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वां याम उत रातिरश्विना । युवोर्हि यन्त्रं हिम्येव वाससोऽभ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभिः ॥
अश्विन भाई, आज तीन बार हमारे साथ रहो। तुम्हारी नॉलेज हमेशा नई है और तुम्हारा गिफ़्ट बड़ा है। तुम्हारी ताकत ऐसे काम करती है जैसे सर्दी में कपड़ा सारे बदन को ढक लेता है। हमें सोचने वाले लोगों की मदद के लिए जल्दी आओ।
Mantra 2
त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः । त्रयः स्कम्भासः स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा ॥
अश्विन भाई, तुम्हारी गाड़ी में तीन पहिए हैं जो मधु ले के आते हैं। सब लोग सोम की इच्छा के पीछे चलते हैं। तुम्हारी गाड़ी के तीन खंभे उसे संभालते हैं। तुम रात को तीन बार चलते हो और दिन में भी तीन बार। अंधेरे और उजाले के बीच तुम रास्ता दिखाते हो।
Mantra 3
समाने अहन्त्रिरवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम् । त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम् ॥
अश्विन भाई, एक ही दिन में तीन बार अंधेरे को भगाओ। जो रोशनी को रोकता है, उसको खत्म करो। हमारी पूजा में मीठा मिलाओ, जैसे शहद हो। तीन बार हमारे लिए ताकत लाओ। रात हो या सुबह, तुम दोनों हमारे काम आते हो।
Mantra 4
त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम् । त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम् ॥
तीन बार आओ, जैसे रास्ता घूम के आता है। जो लोग सच का धरम रखते हैं, उनके पास तीन बार जाओ। जो जगह सुरक्षित है, वहाँ सिखाओ। तीन बार खुशी लाओ, अश्विन भाई। हमारे अंदर ताकत भरो, जैसे पानी भर जाए।
Mantra 5
त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः । त्रिः सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहिता रुहद्रथम् ॥
तीन बार हमारे लिए धन लाओ, अश्विन भाई। तीन बार हमें देवता बना दो। हमारे खयालों की रक्षा करो। तीन बार अच्छी किस्मत दो, और नाम रोशन करो। सूरज की बेटी तुम्हारी तीसरी सीट वाली गाड़ी पर बैठती है।
Mantra 6
त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्यः । ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती ॥
अश्विन भाई, तीन बार आसमानी दवा लाओ। तीन बार दुनिया की दवा लाओ। पानी से जो दवा निकलती है, वो भी लाओ। हमारे घर के बच्चे को शांति दो। उसकी हिफाजत करो, तीन तरह से सुरक्षित रखो।
Mantra 7
त्रिर्नो अश्विना यजता दिवेदिवे परि त्रिधातु पृथिवीमशायतम् । तिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वातः स्वसराणि गच्छतम् ॥
अश्विन भाई, रोज तीन बार आओ। धरती को तीन हिस्सों में बाँट के रखो। नसत्य भाई, तुम्हारी तीन रास्ते हैं जो दूर से आते हैं। तुम साँस की तरह हो, जो सुबह-सुबह नए उजाले के साथ आता है।
Mantra 8
त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम् । तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम् ॥
अश्विन भाई, तीन बार आप आए हो, सात नदियों के साथ जो सात माओं से बनी हैं। तीन जगह लोग आपको पुकारते हैं और सामग्री तैयार करते हैं। आप धरती के तीन हिस्से की हिफाजत करते हो। उसके ऊपर आसमान की चोटी भी आपकी नज़र में है। दिन और रात की रोशनी से सब ठीक चल रहा है।
Mantra 9
क्व त्री चक्रा त्रिवृतो रथस्य क्व त्रयो वन्धुरो ये सनीळाः । कदा योगो वाजिनो रासभस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः ॥
आपकी गाड़ी के तीन पहिए कहाँ हैं? गाड़ी जो तीन तरफ मुड़ी है। उसके तीन सीट भी कहाँ हैं जो एक साथ जुड़े हैं? कब आपके घोड़े तैयार होंगे? तब आप नासत्य भाई यज्ञ के पास आओगे।
Mantra 10
आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिः । युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तमिष्यति ॥
आइए नासत्य भाई, लोग आपको पुकार रहे हैं। आप शहद जैसा अमृत पियो। सविता देवता सूरज की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा है। वो गाड़ी चमक रही है और उसमें घी भरा है। यह सब सच्चाई के लिए हो रहा है।
Mantra 11
आ नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना । प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा ॥
नासत्य भाई, यहाँ आइए। बात-ईस देवियों के साथ आइए। अश्विन भाई, शहद के पानी के लिए आइए। हमारी उम्र लंबी करो, बीमारी से बचाओ। बुरी बातें मिटाओ, दुश्मनी दूर करो। हमारे साथ खड़े रहो।
Mantra 12
आ नो अश्विना त्रिवृता रथेनार्वाञ्चं रयिं वहतं सुवीरम् । शृण्वन्ता वामवसे जोहवीमि वृधे च नो भवतं वाजसातौ ॥
अश्विन भाई, हमारे पास आइए। अपनी तीसरी गाड़ी लेकर आइए। धन लाओ, पैसा लाओ, जो हमारे काम आए। मैं आपको पुकारता हूँ, सुनो और मदद करो। हमें आगे बढ़ाओ और जीत दिलाओ।
An urgent summons: the Aśvins are asked to be present ‘even thrice today,’ bringing ever-new knowledge and broad gifts (RV 1.34.1).
Their mobility and protective harness are praised; the hymn expands into their daily, threefold movement and their life-breath-like going toward the dawn-lights (as a recurring cosmic rhythm).
The vivid image of the triple-coursing chariot bringing inward-turning wealth rich in heroic power (RV 1.34.12), paired with the plea that they hear and come for help.
A concluding request for increase and success in the winning of strength—placing the sacrificer under the Aśvins’ ongoing, repeatable care day after day.
त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसात्रिर्नो अश्विना यजता दिवेदिवेआ नो अश्विना त्रिवृता रथेनThe Aśvinau are twin Vedic deities, swift chariot-riders and healers, famous for timely rescue, restoring health, and bringing prosperity at the turning of day—especially around dawn.
“Thrice” points to their repeated, dependable help across the day’s cycles (morning, midday, evening) and also suggests a threefold cosmic rhythm—orderly movement that sustains life and ritual time.
The hymn asks the Aśvins to arrive quickly with protection and ‘ever-new’ inspiration, and to bring wealth that includes heroic strength (suvīra), ending with a prayer for increase and success in gaining vigor (vājasāti).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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