
Sukta 1.161
Rbhus (collective seers/artisans) traditionally associated with this sukta; specific attribution not provided in input
Agni as dūta; narrative frame concerns the Rbhus and the transformation of the cup (camasá)
This hymn narrates the testing and glorification of the Ṛbhus—divine artisans—framed through Agni’s role as dūta (messenger) and the famed transformation of a single wooden cup (camasá) into multiple perfected forms. Through riddling questions, ritual dialogue, and references to the Soma pressings, it celebrates skill that becomes sacred power: workmanship aligned with ṛta (cosmic order) wins immortality and divine recognition.
Mantra 1
किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्किमीयते दूत्यं कद्यदूचिम । न निन्दिम चमसं यो महाकुलोऽग्ने भ्रातर्द्रुण इद्भूतिमूदिम ॥
सबसे बड़ी चीज़ क्या आई है? नए रूप में क्या आया है? कौनसा काम चल रहा है और हमने क्या बोला? हम उस कप को बुरा नहीं कहते। अग्नि, भाई, तू बड़ा है। उस लकड़ी के बर्तन से हम बढ़ाई माँगते हैं।
Mantra 2
एकं चमसं चतुरः कृणोतन तद्वो देवा अब्रुवन्तद्व आगमम् । सौधन्वना यद्येवा करिष्यथ साकं देवैर्यज्ञियासो भविष्यथ ॥
एक कप को चार बना दो। देवताओं ने तुमसे यही कहा और यही हुआ। सुधन्वन के बेटे, अगर तुम यह कर दोगे, तो देवताओं के साथ पूजा के लायक बन जाओगे।
Mantra 3
अग्निं दूतं प्रति यदब्रवीतनाश्वः कर्त्वो रथ उतेह कर्त्वः । धेनुः कर्त्वा युवशा कर्त्वा द्वा तानि भ्रातरनु वः कृत्व्येमसि ॥
जब अश्विनी रिशियों ने अग्नि को जवाब दिया, वो बोले, घोड़ा बनाओ, रथ भी बनाओ। गाय बनाओ, और दो जवान शक्तियों को भी बनाओ। भाइयों, यह काम हमने तुम्हारे बाद शुरू किया। अपनी इच्छा उन चीज़ों की तरफ करके हमने उनमें प्रवेश किया।
Mantra 4
चकृवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन् । यदावाख्यच्चमसाञ्चतुरः कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तर्न्यानजे ॥
ऋभवों ने काम पूरा किया, फिर उन्होंने पूछा, वो कहाँ है जो हमारा दूत बनके आया था? जब उसने चारों प्याले दिखाए जो बनाए गए थे, त्वष्टा वहाँ से चुपके से चला गया। वो औरतों के रूप में छुप गया।
Mantra 5
हनामैनाँ इति त्वष्टा यदब्रवीच्चमसं ये देवपानमनिन्दिषुः । अन्या नामानि कृण्वते सुते सचाँ अन्यैरेनान्कन्या नामभिः स्परत् ॥
त्वष्टा ने कहा मैं इन्हे मार डालूँगा। वो उस प्याले की बात कर रहा था जो देवताओं के लिए बना था, बिना किसी दोष के। ऋभु लोग अलग-अलग नाम लेते हैं जब सोम पीता जाता है। कन्या के नाम से वो उन्हे जीत लेती है।
Mantra 6
इन्द्रो हरी युयुजे अश्विना रथं बृहस्पतिर्विश्वरूपामुपाजत । ऋभुर्विभ्वा वाजो देवाँ अगच्छत स्वपसो यज्ञियं भागमैतन ॥
इंद्र ने अपनी दो शक्तियों को जोड़ा। अश्विनी कुमार ने अपना रथ जोड़ा। बृहस्पति उस शक्ति के पास गया जो सब रूप ले सकती है। ऋभु, विभु और वज देवताओं के पास गए। उनका काम पूरा था, उन्होंने यज्ञ में अपना हिस्सा पा लिया।
Mantra 7
निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन । सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन ॥
चमड़े से तुमने गाय का रूप बनाया, अपनी बुद्धि से। बूढ़े लोगों को तुमने वापस जवान बना दिया। सुधन्वन के बेटियों, तुमने एक घोड़े से दूसरा घोड़ा बना दिया। रथ जोड़ के तुम देवताओं के पास पहुँच गए।
Mantra 8
इदमुदकं पिबतेत्यब्रवीतनेदं वा घा पिबता मुञ्जनेजनम् । सौधन्वना यदि तन्नेव हर्यथ तृतीये घा सवने मादयाध्वै ॥
उन्होंने कहा, "यह पानी पियो।" हाँ, सच में पियो, यह मुंजे से बना साफ करने वाला पानी है। सौधन्वनस, अगर तुम्हे यह पसंद नहीं आता, तो तीसरे स्टेप में तुम्हे नशा हो जाएगा। तब तुम काम में इतने मगन हो जाओगे कि मज़ा ही आ जाएगा।
Mantra 9
आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीदग्निर्भूयिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत् । वधर्यन्तीं बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत ॥
एक ने कहा, "पानी बहुत होना चाहिए।" दूसरे ने कहा, "अग्नि बहुत होना चाहिए।" किसी ने यह भी कहा कि आगे बढ़ने की ताकत बहुत लोगों के काम आएगी। सच बोलते हुए उन्होंने प्याले बनाए जो खुशी रख सकते थे।
Mantra 10
श्रोणामेक उदकं गामवाजति मांसमेकः पिंशति सूनयाभृतम् । आ निम्रुचः शकृदेको अपाभरत्किं स्वित्पुत्रेभ्यः पितरा उपावतुः ॥
एक गाय को पानी के पास ले गया। एक ने मांस काटना शुरू किया जो किसी ने लाया था। एक ने गंदे जगह से गोबर हटा दिया। बच्चों के लिए माँ-बाप ने क्या मदद की थी, यह सोचने का टाइम था।
Mantra 11
उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः । अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ ॥
ऊपर वाली जगह पे तुमने उसके लिए घास बना दी। नीचे वाली जगह पे पानी बना दिया। काम करने वाले लोगों, तुमने जो छुपा के रखा है उस घर में, आज र्भुस तुम उसका पीछा नहीं कर रहे हो। उस काम को छोड़ना मत।
Mantra 12
सम्मील्य यद्भुवना पर्यसर्पत क्व स्वित्तात्या पितरा व आसतुः । अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन ॥
जब तुम अपने आप को बंद करके दुनिया घूम रहे थे, तब तुम्हारे माँ-बाप कहाँ थे? तुमने उस पे बड़ा श्राप दिया जिसने तुम्हारा काम तोड़ने की कोशिश की। पर जिसने आगे बढ़ने का बोला, उसको तुमने जवाब दिया और काम आगे बढ़ा दिया।
Mantra 13
सुषुप्वांस ऋभवस्तदपृच्छतागोह्य क इदं नो अबूबुधत् । श्वानं बस्तो बोधयितारमब्रवीत्संवत्सर इदमद्या व्यख्यत ॥
रिभु लोग गहरी नींद में सो रहे थे। उन्होंने पूछा, अरे छुपनेवाले, कौन हमें उठाया? बस्ता ने कहा कुत्ता जगाया। पर असली बात यह थी, साल ने खोला यह राज़। टाइम खुद ने सही वक्त पर दिखा दिया।
Mantra 14
दिवा यान्ति मरुतो भूम्याग्निरयं वातो अन्तरिक्षेण याति । अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः ॥
मरुत लोग दिन में चलते हैं। अग्नि धरती पर चलता है। हवा आसमान के बीच से गुज़रती है। वरुण पानी और समुंदर से आता है। सब तुम्हे ढूंढ रहे हैं, ताकत के बेटे। सारी शक्तियाँ उसके पास आ रही हैं जो काम में परफेक्ट हो।
Riddling inquiry around what is ‘best’ and ‘youngest,’ and what mission is moving—introducing Agni as brotherly messenger and the problem of ritual perfection (the cup/vessel).
The hymn unfolds as a narrative of testing, instruction, and refinement: the Ṛbhus’ craft is evaluated, their discipline is hinted through ritual dialogue (water as cleanser; Soma-rapture in the third pressing), and workmanship becomes a sacred qualification.
The transformation motif—symbolized by the camasá and the rite’s ‘ripening’—peaks as perfected work earns divine delight and recognition, turning human-like artisans into god-like powers.
A cosmic panorama closes the hymn: Maruts, Agni, Vāta, and Varuṇa move in their domains, all ‘seeking’ the children of power (the Ṛbhus), affirming that perfected skill harmonized with ṛta draws universal support.
किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्किमीयते दूत्यं कद्यदूचिम । न निन्दिम चमसं यो महाकुलोऽग्ने भ्रातर्द्रुण इद्भूतिमूदिम ॥tṛtīye ghā savane mādayādhvai
दिवा यान्ति मरुतो भूम्याग्निरयं वातो अन्तरिक्षेण याति । अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः ॥The Ṛbhus are a group of inspired artisan-seers celebrated for extraordinary skill. In Vedic thought, their flawless work becomes a spiritual achievement that wins them divine status.
Agni carries offerings and words of praise from humans to the gods. In this hymn he also mediates the recognition of the Ṛbhus’ perfected work, acting like a bridge between worlds.
The third savana is the third Soma pressing in the day’s Soma ritual. The hymn uses it as an image of ripening and fulfillment—where the workers’ effort culminates in ritual joy and divine approval.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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