Ayodhya KandaPrakarana 2621 Verses

Prakarana 26

राजधर्म-त्याग-भक्ति की देहरी: यह सोपान ‘घर’ (अयोध्या/लोक-व्यवस्था) से ‘वन’ (वैराग्य/आत्मसमर्पण) की ओर संक्रमण है। यहाँ मुक्ति-सीढ़ी का मुख्य पायदान यह है कि ईश्वर-इच्छा (राम-रजाइ) के आगे निजी अधिकार, शोक, और राजनीति का आग्रह गल कर ‘सेवा-धर्म’ बनता है। निषाद-किरात-भिल्ल जैसे ‘सीमान्त’ जन भी प्रेम-भक्ति द्वारा उसी सोपान पर चढ़ते हैं—भक्ति का लोकतंत्रीकरण।

यह प्रकरण ‘घर’ से ‘वन’ की देहरी है—अयोध्या (व्यवस्था, अधिकार, राजनीति) से वन (वैराग्य, आत्मसमर्पण, सेवा) की ओर संक्रमण। कोल-किरात-भिल्ल का मधु/फल-मूल अर्पण प्रतीक है कि भक्ति का मूल्य ‘पद’ नहीं, ‘प्रेम’ है; पत्तों/परनों में भरा प्रसाद बताता है कि साधन साधारण हों तो भी भाव दिव्य हो सकता है। राम का कृपालु स्वीकार ‘समता’ का धर्म-चिह्न है—सामाजिक सीमाएँ भक्ति में विलीन। आगे भरत की नींद-भूख का लोप राजसुख-त्याग का संकेत है: भीतर की आग (करुणा) को नीति-वाणी ‘धर्म’ में ढालती है। ‘राम-रजाइ’ यहाँ सर्वोच्च प्रतीक-तत्त्व है—व्यक्तिगत अधिकार, शोक, और राजनीतिक आग्रह पिघलकर आज्ञापालन/सेवा-धर्म बनते हैं। राजा-धर्म का चरम रूप ‘स्व’ का विसर्जन और लोक-कल्याण हेतु अनासक्ति है।

Verses

चौपाई 250.1-4

कोल किरात भिल्ल बनबासी।मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी।कंद मूल फल अंकुर जूरी।।

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा।कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।

देहिं लोग बहु मोल न लेहीं।फेरत राम दोहाई देहीं।।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी।मानत साधु पेम पहिचानी।।

तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा।पावा दरसनु राम प्रसादा।।

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा।जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।

राम कृपाल निषाद नेवाजा।परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

kola kirāta bhilla banabāsī |madhu suci suṁdara svādu sudhā sī ||

bhari bhari parana puṭīṁ raci rurī |kaṁda mūla phala aṁkura jūrī ||

sabahi dehiṁ kari binaya pranāmā |kahi kahi svāda bheda guna nāmā ||

dehiṁ loga bahu mola na lehīṁ |pherata rāma dohāī dehīṁ ||

kahahiṁ saneha magana mṛdu bānī |mānata sādhu pema pahicānī ||

tumha sukṛtī hama nīca niṣādā |pāvā darasanu rāma prasādā ||

hamahi agama ati darasu tumhārā |jasa maru dharani devadhuni dhārā ||

rāma kṛpāla niṣāda nevājā |parijana prajau cahia jasa rājā ||

जंगल में रहने वाले कोल, किरात, भील लोगों ने शहद लाया। वो साफ था, सुंदर था, और मीठा था, जैसे अमृत हो। उन्हों ने पत्तों के छोटे छोटे बील्टे बनाए, और उनमे भर भर के कंद, जड़, फल और नए पौधे की पत्तियां डाल दी, गठरियों में बांध कर। सब को देते वक्त वो झुक कर प्रणाम करते, और हर एक चीज़ का स्वाद, किस किसम का है, क्या गुण है, और क्या नाम है, वो बताते रहते। लोग बहुत पैसे देते थे, पर जंगल वाले पैसे नहीं लेते थे। वापस करते वक्त उन्होंने राम की कसम खा कर दे दी। प्यार में डूबे हुए, उन्होंने नर्म भाषा में कहा: अच्छे लोग वही कुबूल करते हैं जो प्यार से दिया गया हो, यह पहचान कर। तुम पुण्य वाले लोग हो, हम तो नीचे निषाद हैं। राम की कृपा से हमें तुम्हारा दर्शन मिला है। तुम्हारा दर्शन हमें मिलना बहुत मुश्किल है, जैसे अम गंगा का पानी किसी सूने सीते ज़मीन पर बह जाए। राम दयालु हैं और निषाद लोगों का ख्याल रखते हैं। राजा जैसा होता है, उसके परिवार और प्रजा को भी वैसा होना चाहिए।

दोहा 250

यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।⁠250।।

yaha jiyã jāni sãkocu taji karia chohu lakhi nehu |hamahi kṛtāratha karana lagi phala tṛna aṁkura lehu ||⁠250||

अपने दिल से ये समझ लो, अपनी झिझक छोड़ दो, हमारा प्यार देखो और हमारे ऊपर मेहरबानी करो। हमें आशीर्वाद देके हमारा जीवन सफल करने के लिए, ये फल, पत्ती और नए पौधे की कलम कुबूल कर लो।

चौपाई 251.1-4

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे।सेवा जोगु न भाग हमारे।।

देब काह हम तुम्हहि गोसाँई।ईधनु पात किरात मिताई।।

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई।लेहि न बासन बसन चोराई।।

हम जड़ जीव जीव गन घाती।कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।

पाप करत निसि बासर जाहीं।नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।

सपनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ।यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे।मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।

बचन सुनत पुरजन अनुरागे।तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

tumha priya pāhune bana pagu dhāre |sevā jogu na bhāga hamāre ||

deba kāha hama tumhahi gosā̃ī |īdhanu pāta kirāta mitāī ||

yaha hamāri ati baṛi sevakāī |lehi na bāsana basana corāī ||

hama jaṛa jīva jīva gana ghātī |kuṭila kucālī kumati kujātī ||

pāpa karata nisi bāsara jāhīṁ |nahiṁ paṭa kaṭi nahi peṭa aghāhīṁ ||

sapanehũ dharama buddhi kasa kāū |yaha raghunaṁdana darasa prabhāū ||

jaba teṁ prabhu pada paduma nihāre |miṭe dusaha dukha doṣa hamāre ||

bacana sunata purajana anurāge |tinha ke bhāga sarāhana lāge ||

आप हमारे प्यार मेहमान हैं, इस जंगल में आपने पैर रखा है। हमारी किस्मत नहीं कि हम आपकी सेवा के लायक हो। हम आपको क्या दें, प्रभु? किरातों की दोस्ती सिर्फ लकड़ी और पत्ते दे सकती है। हमारी सबसे बड़ी सेवा यही है कि हम आपके बर्तन और कपड़े चुरा के नहीं ले जाते। हम बेवकूब जीव हैं और जीव मारने वाले हैं, टेढ़े, बुरे किस्म के, बुरी सोच वाले और घटिया जनम वाले। रात दिन पाप करते रहते हैं, फिर भी कमर ढकने को कपड़ा नहीं और पेट कभी नहीं भरता। सपने में भी धरम का खयाल हमारे दिमाग में कहां आता? यह रघु कुल की शान राम के दर्शन का असर है। जब से प्रभु के चरण कमल देखे हैं, हमारे सहन ना होने वाले दुख और पाप सब मिट गए। ये बात सुनके शहर के लोग प्रेम से भर गए, और उन जंगल वालों की किस्मत की तारीफ करने लगे।

छंद 251

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।।

नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।

lāge sarāhana bhāga saba anurāga bacana sunāvahīṁ |bolani milani siya rāma carana sanehu lakhi sukhu pāvahīṁ ||

nara nāri nidarahiṁ nehu nija suni kola bhillani kī girā |tulasī kṛpā raghubaṁsamani kī loha lai laukā tirā ||

सब लोग उन कोल और भिल लोगों की किस्मत की तारीफ करने लगे, और उनसे प्यार भरे शब्द बोलने लगे। सीता और राम के चरणों के प्रति उनका प्यार उनकी बातों और उनसे मिलने में दिखता था, और ये देख कर सब खुश हो गए। औरत और मर्द सब, कोल और भिल औरतों की बातें सुनकर अपने प्यार को छोटा समझने लगे। तुलसीदास कहते हैं, राम की कृपा से लोहा भी पानी पर तैर सकता है, जैसे कद्दू पैरता है।

सोरठा 251

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।⁠251।।

biharahiṁ bana cahu ora pratidina pramudita loga saba |jala jyoṁ dādura mora bhae pīna pāvasa prathama ||⁠251||

रोज़ सब लोग खुशी से जंगल में हर तरफ घूमते थे, जैसे पहली बारिश के पानी में मेंढक और मोर खुश हो जाते हैं।

चौपाई 252.1-4

पुर जन नारि मगन अति प्रीती।बासर जाहिं पलक सम बीती।।

सीय सासु प्रति बेष बनाई।सादर करइ सरिस सेवकाई।।

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ।माया सब सिय माया माहूँ।।

सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं।तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई।कुटिल रानि पछितानि अघाई।।

अवनि जमहि जाचति कैकेई।महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं।राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।

यहु संसउ सब के मन माहीं।राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

pura jana nāri magana ati prītī |bāsara jāhiṁ palaka sama bītī ||

sīya sāsu prati beṣa banāī |sādara karai sarisa sevakāī ||

lakhā na maramu rāma binu kāhū̃ |māyā saba siya māyā māhū̃ ||

sīyã sāsu sevā basa kīnhīṁ |tinha lahi sukha sikha āsiṣa dīnhīṁ ||

lakhi siya sahita sarala dou bhāī |kuṭila rāni pachitāni aghāī ||

avani jamahi jācati kaikeī |mahi na bīcu bidhi mīcu na deī ||

lokahũ beda bidita kabi kahahīṁ |rāma bimukha thalu naraka na lahahīṁ ||

yahu saṁsau saba ke mana māhīṁ |rāma gavanu bidhi avadha ki nāhīṁ ||

शहर की औरतों और आदमियों को इतनी छोटी प्रीत हो गयी थी कि दिन पलक झपकते निकल गए। सीता ने हर ससुर के हिसाब से अलग रूप बनाया, और सबको बराबर इज्जत देकर सेवा की। इसका राज राम के सिवा किसी को समझ नहीं आया, क्योंकि सीता ही माया है और ये माया के अंदर हुआ। सीता ने अपनी सेवा से ससुर को राजी कर लिया, उन्होंने खुश होकर उसको सलाह और आशीर्वाद दिया। सीता को उनके साथ देखकर, दोनों सीधे भाइयों के साथ, उस कमीन रानी को बहुत पछतावा हुआ। कैकेई ने ज़मीन से और यम से माँगा कि कोई जगह दे या मौत दे, पर ज़मीन ने जगह नहीं दी और किस्मत ने मौत नहीं दी। दुनिया में और वेदों में सब जानता है, और कवि भी कहते हैं, कि राम से मुँह मोड़नेवाले को नरक में भी जगह नहीं मिलती। सबके मन में ये शक था कि क्या किस्मत के हिसाब से राम अयोध्या वापस जायेंगे या नहीं।

दोहा 252

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।⁠252।।

nisi na nīda nahiṁ bhūkha dina bharatu bikala suci soca |nīca kīca bica magana jasa mīnahi salila sãkoca ||⁠252||

भरत को रात को नींद नहीं आती और दिन को भूख नहीं लगती। वो एकदम परेशान रहता है, और उसकी चिंता बिल्कुल साफ है, मतलब किसी गलत काम की चिंता नहीं। जैसे एक मछली सूखे हुए पानी की जगह कीचड़ में फंसी हो और पानी की कमी से तड़पे, वैसे ही वो परेशान है।

चौपाई 253.1-4

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली।ईति भीति जस पाकत साली।।

केहि बिधि होइ राम अभिषेकू।मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी।मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।

मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ।राम जननि हठ करबि कि काऊ।।

मोहि अनुचर कर केतिक बाता।तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।

जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू।हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।

एकउ जुगुति न मन ठहरानी।सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।

प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई।बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

kīnhī mātu misa kāla kucālī |īti bhīti jasa pākata sālī ||

kehi bidhi hoi rāma abhiṣekū |mohi avakalata upāu na ekū ||

avasi phirahiṁ gura āyasu mānī |muni puni kahaba rāma ruci jānī ||

mātu kahehũ bahurahiṁ raghurāū |rāma janani haṭha karabi ki kāū ||

mohi anucara kara ketika bātā |tehi mahã kusamau bāma bidhātā ||

jauṁ haṭha karaũ ta nipaṭa kukaramū |haragiri teṁ guru sevaka dharamū ||

ekau juguti na mana ṭhaharānī |socata bharatahi raini bihānī ||

prāta nahāi prabhuhi sira nāī |baiṭhata paṭhae riṣayã bolāī ||

किस्मत ने मेरी माँ को बहाना बनाकर ये खराब काम किया है, जैसे फसल पकने पर ही रोग और डर उसको बर्बाद कर देते हैं। राम का राजतिलक कैसे होगा? मुझे एक भी तरीका नहीं सूझ रहा। वो गुरु के हुकुम मान कर ज़रूर वापस मुड़ेंगे, पर रिशि पहले ये समझेगा कि राम खुद क्या चाहते हैं, तभी बोलेगा। अगर उनकी माँ कहे तो राम वापस आ सकते हैं, पर क्या राम की माँ कभी ज़िद करेगी? मैं तो सिर्फ एक नौकर हूँ, मेरी क्या औकात है? और ऊपर से वक्त बुरा है और किस्मत भी मेरे खिलाफ है। अगर मैं ज़िद करूँगा तो ये बिल्कुल गलत होगा। नौकर का अपने मालिक का धरम शिव के पहाड़ से भी भारी है। उसके दिमाग में कोई तरीका नहीं ठहरा। भरत सोचते रहे और रात गुज़र गई, सुबह हो गई। सुबह वो नहाए, अपने भगवान के आगे सिर झुकाया, और जैसे ही बैठने लगे, रिशि ने उन्हें बुलवा भेजा।

दोहा 253

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।⁠253।।

gura pada kamala pranāmu kari baiṭhe āyasu pāi |bipra mahājana saciva saba jure sabhāsada āi ||⁠253||

भरत ने गुरु के चरणों को प्रनाम किया, उनका आदेश पाकर बैठ गया, और ब्राह्मन, बड़े लोग, मंत्री और सभा के सारे सदस्य वहां आ के एक जगह जमा हो गये।

चौपाई 254.1-4

बोले मुनिबरु समय समाना।सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

धरम धुरीन भानुकुल भानू।राजा रामु स्वबस भगवानू।।

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू।राम जनमु जग मंगल हेतू।।

गुर पितु मातु बचन अनुसारी।खल दलु दलन देव हितकारी।।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु।कोउ न राम सम जान जथारथु।।

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला।माया जीव करम कुलि काला।।

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई।जोग सिद्धि निगमागम गाई।।

करि बिचार जियँ देखहु नीकें।राम रजाइ सीस सबही कें।।

bole munibaru samaya samānā |sunahu sabhāsada bharata sujānā ||

dharama dhurīna bhānukula bhānū |rājā rāmu svabasa bhagavānū ||

satyasaṁdha pālaka śruti setū |rāma janamu jaga maṁgala hetū ||

gura pitu mātu bacana anusārī |khala dalu dalana deva hitakārī ||

nīti prīti paramāratha svārathu |kou na rāma sama jāna jathārathu ||

bidhi hari haru sasi rabi disipālā |māyā jīva karama kuli kālā ||

ahipa mahipa jahã lagi prabhutāī |joga siddhi nigamāgama gāī ||

kari bicāra jiyã dekhahu nīkeṁ |rāma rajāi sīsa sabahī keṁ ||

सबसे बड़ा रिशि ने वक्त के हिसाब से बात की। सब लोग सुनो, और तू भी भरत, तू समझदार है। राम राजा है, सूरज वंश से आए हैं, धरम का बोझ उठाते हैं। वो खुद भगवान हैं, अपनी मर्जी से चलते हैं, किसी के आगे नहीं झुकते। जो बात करते हैं उसपे खरे उठते हैं, वेदों की रक्षा करते हैं। राम इस दुनिया के लिए, सबके भलाई के लिए पैदा हुए। गुरु, पिता और माँ की बात मानते हैं। बुरे लोगों की तोड़ी मारते हैं और भगवानों का भला करते हैं। चालों में, प्यार में, बड़े काम में और अपने काम में, कोई नहीं जानता सच जैसा राम जानता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, चाँद, सूरज और दिशा के रक्षक, माया, जीव, कर्म और काल के रूप, नाग के स्वामी, धरती के स्वामी, जहाँ तक किसी की ताकत है, और जो योग और सिद्धि वेद और आगम में गाए गए हैं, सब अपने दिल में सोच के देखो। राम का हुकुम सबके सिर पे है।

दोहा 254

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।⁠254।।

rākheṁ rāma rajāi rukha hama saba kara hita hoi |samujhi sayāne karahu aba saba mili saṁmata soi ||⁠254||

अगर हम सब राम के हुकुम और मर्जी के हिसाब से चलें, तोह हम सबके लिए भला होगा। समझदार लोग सोच समझ कर देखो, और अब सब मिलकर उसी बात पर एक मत हो जाओ।

चौपाई 255.1-4

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू।मंगल मोद मूल मग एकू।।

केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ।कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।

सब सादर सुनि मुनिबर बानी।नय परमारथ स्वारथ सानी।।

उतरु न आव लोग भए भोरे।तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।

भानुबंस भए भूप घनेरे।अधिक एक तें एक बड़ेरे।।

जनमु हेतु सब कहँ पितु माता।करम सुभासुभ देइ बिधाता।।

दलि दुख सजइ सकल कल्याना।अस असीस राउरि जगु जाना।।

सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी।सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

saba kahũ sukhada rāma abhiṣekū |maṁgala moda mūla maga ekū ||

kehi bidhi avadha calahiṁ raghurāū |kahahu samujhi soi karia upāū ||

saba sādara suni munibara bānī |naya paramāratha svāratha sānī ||

utaru na āva loga bhae bhore |taba siru nāi bharata kara jore ||

bhānubaṁsa bhae bhūpa ghanere |adhika eka teṁ eka baṛere ||

janamu hetu saba kahã pitu mātā |karama subhāsubha dei bidhātā ||

dali dukha sajai sakala kalyānā |asa asīsa rāuri jagu jānā ||

so gosāĩ bidhi gati jehiṁ cheṁkī |sakai ko ṭāri ṭeka jo ṭekī ||

सब को खुशी राम के राज तिलक से मिलती है। यही एक रास्ता है जहां से सब मंगल और खुशी की शुरुआत होती है। कैसे राम को अयोध्या वापस बुलाया जा सकता है? सोच समझ कर बताओ, और फिर वही प्लान हम अमल करेंगे। सब ने बड़े रिशी की बात इज्जत से सुनी। उनकी बात में समझदारी थी, सबसे बड़ा भलाई का काम था, और दुनियावी फायदा भी था। कोई जवाब नहीं मिला। लोग परेशान हो गए। तब भरत ने सिर झुकाया, हाथ जोड़ कर बोला। सूर्य वंश में बहुत सारे राजा हुए हैं। हर एक पिछले राजा से बड़ा था। सब के जनम के पीछे माता पिता का कारण होता है। पर अच्छे बुरे कर्म विधाता ही देता है। आप का आशीर्वाद दुख मिटाकर हर तरह की भलाई लाता है। ये बात पूरी दुनिया जानती है। आप वही मालिक हैं जिसने विधि की गति रोक दी। जो फैसला आप पक्का कर दें, उसे कौन पलट सकता है?

दोहा 255

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।⁠255।।

būjhia mohi upāu aba so saba mora abhāgu |suni sanehamaya bacana gura ura umagā anurāgu ||⁠255||

तुम मुझसे अब कोई रास्ता पूछो, यह सब मेरी बदकिस्मती की वजह से है। भरत के प्यार भरे बोल सुन के गुरु के दिल में उनके लिए प्यार छा गया।

चौपाई 256.1-4

तात बात फुरि राम कृपाहीं।राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

सकुचउँ तात कहत एक बाता।अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई।फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।

सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता।भे प्रमोद परिपूरन गाता।।

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा।जनु जिय राउ रामु भए राजा।।

बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी।सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे।फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।

कानन करउँ जनम भरि बासू।एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

tāta bāta phuri rāma kṛpāhīṁ |rāma bimukha sidhi sapanehũ nāhīṁ ||

sakucaũ tāta kahata eka bātā |aradha tajahiṁ budha sarabasa jātā ||

tumha kānana gavanahu dou bhāī |pheriahiṁ lakhana sīya raghurāī ||

suni subacana haraṣe dou bhrātā |bhe pramoda paripūrana gātā ||

mana prasanna tana teju birājā |janu jiya rāu rāmu bhae rājā ||

bahuta lābha loganha laghu hānī |sama dukha sukha saba rovahiṁ rānī ||

kahahiṁ bharatu muni kahā so kīnhe |phalu jaga jīvanha abhimata dīnhe ||

kānana karaũ janama bhari bāsū |ehiṁ teṁ adhika na mora supāsū ||

बेटा, जो तुम कह रहे हो वही सही है, सब राम की कृपा से हो रहा है। राम के बिना किसी को सपने में भी कामयाबी नहीं मिलती। बेटा, एक बात कहने में थोड़ा शर्म आता है। जब सब कुछ जा रहा हो, तो समझदार आदमी आधा छोड़ देते हैं ताकि बाकी बचा सके। तुम दोनों भाई जंगल में चले जाओ। फिर लक्ष्मण, सीता और रघु के स्वामी को वापस लाया जा सकता है। ये अच्छी बातें सुनकर दोनों भाई बहुत खुश हुए। उनका पूरा बदन खुशी से भर गया। उनका मन प्रसन्न हुआ और उनके बदन में तेज चमका। जैसे राजा वापस ज़िंदा हो गया हो और राम को राजा बना दिया गया हो। लोगों को बहुत फायदा और थोड़ा नुकसान लगा। पर सारी रानियां रोने लगी, क्योंकि उनका दुख और खुशी बराबर हो गया था। भरत ने कहा, जो रिशि ने कहा है वही हो गया। उन्होंने दुनिया के सारे जीवों को वो फल दे दिया जो वो चाहते थे। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी जंगल में रहूंगा। मेरे लिए इससे बड़ा सुख और कुछ नहीं है।

दोहा 256

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।⁠256।।

ãtarajāmī rāmu siya tumha sarabagya sujāna |jo phura kahahu ta nātha nija kījia bacanu pravāna ||⁠256||

राम और सीता सबके दिल की बात जानते हैं, और आप, मेरे नाथ, सब कुछ जानते हैं और समझदार हैं. अगर आप जो बोल रहे हैं वो सच है, तो प्रभु, अपने ही बोल को सच करके दिखाइये.

चौपाई 257.1-4

भरत बचन सुनि देखि सनेहू।सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

भरत महा महिमा जलरासी।मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।

गा चह पार जतनु हियँ हेरा।पावति नाव न बोहितु बेरा।।

औरु करिहि को भरत बड़ाई।सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए।सहित समाज राम पहिं आए।।

प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु।बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।

बोले मुनिबरु बचन बिचारी।देस काल अवसर अनुहारी।।

सुनहु राम सरबग्य सुजाना।धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

bharata bacana suni dekhi sanehū |sabhā sahita muni bhae bidehū ||

bharata mahā mahimā jalarāsī |muni mati ṭhāṛhi tīra abalā sī ||

gā caha pāra jatanu hiyã herā |pāvati nāva na bohitu berā ||

auru karihi ko bharata baṛāī |sarasī sīpi ki siṁdhu samāī ||

bharatu munihi mana bhītara bhāe |sahita samāja rāma pahiṁ āe ||

prabhu pranāmu kari dīnha suāsanu |baiṭhe saba suni muni anusāsanu ||

bole munibaru bacana bicārī |desa kāla avasara anuhārī ||

sunahu rāma sarabagya sujānā |dharama nīti guna gyāna nidhānā ||

भरत की बात सुनकर और उसका प्यार देख कर, रिशी वसिष्ठ पूरी सभा के साथ बेहोश जैसा हो गया। भरत की बहुत बड़ी महिमा एक बड़ा पानी जैसी थी, और रिशी का दिमाग उस पानी के किनारे खड़ी एक औरत जैसा था, जो कुछ कर नहीं सकता। वो आर पार करना चाहती थी और अपने दिल में कोई तरीका ढूंढ रही थी, पर उसको ना कोई नाव मिली, ना कोई जहाज, ना कोई डूंगी। तो फिर और कौन भरत की बड़ाई करेगा? क्या एक छोटे पानी के गड्ढे या एक खाली सीपी में समुंदर समा सकता है? भरत रिशी के दिल के अंदर उतर गया था, और रिशी पूरी टीम के साथ राम के पास आया। प्रभु ने उसको प्रणाम किया और अच्छी जगह दी, और सब रिशी के कहने पर बैठ गए। सबसे बड़े रिशी ने सोच समझ कर बात कही, जो जगह, वक्त और मौके के हिसाब से ठीक थी। राम, सुनो। तू सब कुछ जानता है और समझदार है। तू धरम, नीति, गुण और ग्यान का खजाना है।

दोहा 257

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।⁠257।।

saba ke ura aṁtara basahu jānahu bhāu kubhāu |purajana jananī bharata hita hoi so kahia upāu ||⁠257||

तू सब के दिल मे रहता है, और सब के अच्चे और बुरे भल तो जानता है. हमें बता, ऐसा क्या करें जो शहर के लोगों के लिए, माताओं के लिए, और भरत के लिए अच्छा हो.

चौपाई 258.1-4

आरत कहहिं बिचारि न काऊ।सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।

सब कर हित रुख राउरि राखें।आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।

प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।माथें मानि करौ सिख सोई।।

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।

कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा।भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी।भरत भगति बस भइ मति मोरी।।

मोरें जान भरत रुचि राखि।जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

ārata kahahiṁ bicāri na kāū |sūjha jūārihi āpana dāū ||

suni muni bacana kahata raghurāū |nātha tumhārehi hātha upāū ||

saba kara hita rukha rāuri rākheṁ |āyasu kiẽ mudita phura bhāṣeṁ ||

prathama jo āyasu mo kahũ hoī |mātheṁ māni karau sikha soī ||

puni jehi kahã jasa kahaba gosāīṁ |so saba bhā̃ti ghaṭihi sevakāīṁ ||

kaha muni rāma satya tumha bhāṣā |bharata sanehã bicāru na rākhā ||

tehi teṁ kahaũ bahori bahorī |bharata bhagati basa bhai mati morī ||

moreṁ jāna bharata ruci rākhi |jo kījia so subha siva sākhī ||

मुसीबत में जो फंसे होते हैं वो सोच समझ कर बात नहीं करते, और जुआरी को अपना ही चल दिखता है। रिशी की बात सुनकर राम ने कहा, प्रभु, उपाय आपके ही हाथ में है। सबका भला आपकी मरजी के हिसाब से रखने में है। आपका आदेश माना तो सब खुश होंगे, और मैं सच बोल रहा हूँ। सबसे पहले जो आदेश मुझे मिलेगा, मैं उसको सर पे रख कर मानूँगा। फिर स्वामी, जिसे जो आप कहेंगे, वो हर तरह से अपनी सेवा पूरी करेगा। रिशी ने कहा, राम, तुमने सच कहा। पर भरत के प्यार ने सोचने की जगह नहीं छोड़ी। इसलिए मैं बार बार कह रहा हूँ कि मेरा दिमाग भरत की भक्ति के बस में आ गया है। मेरे हिसाब से जो कुछ भरत की मरजी के हिसाब से होगा वो अच्छा ही होगा, शिव साक्षी।

दोहा 258

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।⁠258।।

bharata binaya sādara sunia karia bicāru bahori |karaba sādhumata lokamata nṛpanaya nigama nicori ||⁠258||

भरत की रिक्वेस्ट को इज्जत से सुन लो, फिर उस पर सोचो। फिर जब करना हो तो साधुओं की राय, लोगों का खयाल, राजाओं की पॉलिसी और वेदों का सार, इन सब को ध्यान में रख कर करो।

चौपाई 259.1-4

गुरु अनुराग भरत पर देखी।राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

भरतहि धरम धुरंधर जानी।निज सेवक तन मानस बानी।।

बोले गुर आयस अनुकूला।बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।

नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।भयउ न भुअन भरत सम भाई।।

जे गुर पद अंबुज अनुरागी।ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।

राउर जा पर अस अनुरागू।को कहि सकइ भरत कर भागू।।

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई।करत बदन पर भरत बड़ाई।।

भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई।अस कहि राम रहे अरगाई।।

guru anurāga bharata para dekhī |rāma hdayã ānaṁdu biseṣī ||

bharatahi dharama dhuraṁdhara jānī |nija sevaka tana mānasa bānī ||

bole gura āyasa anukūlā |bacana maṁju mṛdu maṁgalamūlā ||

nātha sapatha pitu carana dohāī |bhayau na bhuana bharata sama bhāī ||

je gura pada aṁbuja anurāgī |te lokahũ bedahũ baṛabhāgī ||

rāura jā para asa anurāgū |ko kahi sakai bharata kara bhāgū ||

lakhi laghu baṁdhu buddhi sakucāī |karata badana para bharata baṛāī ||

bharatu kahahīṁ soi kiẽ bhalāī |asa kahi rāma rahe aragāī ||

गुरु का भरत पर प्यार देख कर, राम के दिल में खास खुशी हुई। राम जानते थे कि भरत धरम के पक्के हैं, और तन, मन और बानी से अपना सेवक हैं। गुरु के आदेश को मानते हुए, राम ने मुलायम और नरम बात कही, जो हर तरह की भलाई की जड़ थी। स्वामी, आपकी और मेरे पिता के चरणों की कसम, दुनिया में भरत जैसा भाई कभी नहीं हुआ। जो अपने गुरु के चरणों से प्यार करते हैं, वो दुनिया में भी और वेदों में भी सबसे भाग्यशाली हैं। जिस पर आपका इतना प्यार है, उस भरत की किस्मत का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। अपने छोटे भाई को देख कर, मुझे शरम आती है उसके सामने उसकी तारीफ करनी। भरत जो कहे वही करना हमारे लिए भलाई होगी। ये कह कर राम चुप हो गए।

दोहा 259

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।⁠259।।

taba muni bole bharata sana saba sãkocu taji tāta |kṛpāsiṁdhu priya baṁdhu sana kahahu hṛdaya kai bāta ||⁠259||

तब रिशि ने भरत से कहा, बेटा, अपनी सारी झिझक छोड़ दे। अपने प्यारे भाई से दिल की बात बता दे, जो बड़ा दयालु हैं।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता अनुसार इस खंड का पाठ ‘दास्य-भाव’ और ‘राम-रजाइ’ की स्वीकृति दृढ़ करता है; शोक-व्याकुल मन को शान्ति देता है और सेवा-धर्म की प्रेरणा से ‘सत्संग-लाभ’ तथा गृह-कलह/अहंकार-क्षय का फल माना जाता है—विशेषतः भरत-चरित्र के श्रवण से त्याग-बुद्धि प्रबल होती है।

सामान्य रूप से राम-नाम-सम्पुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम रामाय नमः’ का जप-सम्पुट प्रचलित है; भरत-त्याग/आज्ञापालन भाव में ‘राम-रजाइ’ पर टिकने हेतु ‘राम’ नाम-सम्पुट को ही सर्वोत्तम माना जाता है।

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