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त्याग-धर्म का सोपान: राजसत्ता, कुलधर्म, और व्यक्तिगत अहं (राजमद) के बीच विवेक का उदय। इस काण्ड में ‘घर’ (अयोध्या) बाह्य-स्थान नहीं, अंतःकरण का राज्य है—जहाँ राम-आज्ञा के सामने वासनात्मक प्रतिरोध (लक्ष्मण का रोष) भी शुद्ध होकर मर्यादा-भक्ति में ढलता है, और भरत-चरित्र ‘अनासक्ति’ का आदर्श बनकर मुक्ति-सीढ़ी का दृढ़ पायदान होता है।
यह प्रकरण ‘घर/अयोध्या’ को बाह्य नगर नहीं, अंतःकरण का राज्य बनाकर दिखाता है—जहाँ राजसत्ता (अहं/राजमद) और कुलधर्म (मर्यादा) के बीच विवेक का उदय होता है। लक्ष्मण का रोष साधक की ‘क्रोध-शक्ति’ है: यदि वह स्वेच्छाचार बने तो विनाशकारी, पर राम-आज्ञा से जुड़ते ही वही शक्ति ‘सेवा-धर्म’ बन जाती है। आकाशवाणी का हस्तक्षेप ‘अंतरात्मा/दैवी-बोध’ का प्रतीक है—प्रशंसा के साथ चेतावनी कि बल का मूल्य तभी है जब नीति से बंधा हो। राम द्वारा भरत के राजमद-असम्भवत्व को अतिशयोक्ति-उपमानों से स्थिर करना (असंभव कार्यों की सूची) ‘निष्कामता’ की अचलता का प्रतीक है—जहाँ सत्ता का आकर्षण भी मन को डिगा नहीं सकता। आश्रम-प्रदेश ‘सुराज’ का रूपक बनता है: नियम-यम = शासन-व्यवस्था, शांति-सुमति = मंत्रणा/नीति, और रामचरण-आश्रय = राज्य का धर्माधार। अंततः ‘ज्ञानसभा’ का बिंब बताता है कि सर्वोच्च राजधर्म बाह्य विजय नहीं, भीतर का संयम और भक्ति-प्रकाश है।
Verse 470 (चौपाई)
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।। बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।। आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।। राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।। आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।। जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।। तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।। जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
वो उठा, हाथ जोड़े, मांगा कि अब युद्ध हो। जैसे वीर सो रहा हो और अब जाग गया हो। उसने जटा बांधी, कमर कस ली, धनुष और तीर हाथ में लिए। आज मैं राम का सेवक बन कर नाम कमाऊंगा, भरत को युद्ध की सीख दूंगा। राम ने अपनी बेइज्जती का फल पा लिया, अब दोनों भाई युद्ध की सेज पर सो जाएंगे। पूरा सेना बन में आए, आज मैं अपना पुराना गुस्सा दिखूंगा। जैसे शेर हाथियों के झुंड को फाड़ देता है, जैसे बाज़ शिकार को उठा ले जाता है। वैसे ही मैं भरत को उसकी पूरी सेना के साथ मार दूंगा, डर के बिना। अगर शंकर भी उसकी हेल्प करने आए, तब भी मैं उसे युद्ध में मार दूंगा, राम का नाम ले के।
Verse 471 (दोहा/सोरठा)
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान। सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।
लख्शमन बहुत गुस्से में था, उसने कसम खा ली। सब लोग उसकी बात सुन के मान गए। पूरी दुनिया डर गई। सब लोग भागने लगे।
Verse 472 (चौपाई)
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।। तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।। अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।। सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।। सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।। कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।। जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।। सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।
पूरी दुनिया डर में थी, आसमान से आवाज़ें आ रही थी। लख्शमन की ताकत सब जगह बधाई जा रही थी। दशरथ ने कहा, बेटा तुम्हारी ताकत और प्रभाव का क्या कहना, कौन समझ सकता है। कोई काम सही हो या गलत, सब अपनी समझ से बोलते हैं। जल्दी में काम करने वाले बाद में पछताते हैं। यह बात वेद में भी है, समझदार लोग यही कहते हैं। देवताओं की बात सुन के लख्शमन शर्मा गया। राम और सीता ने उसे इज्जत दी। दशरथ ने कहा, तुमने सही नीति बताई। राजो का घम सबसे मुश्किल होता है। जो राजा घम में डूब जाते हैं, उनके पास अच्चे लोग नहीं रहते। लख्शमन सुनो, भरत बहुत अच्छा है। ऐसा इंसान दुनिया में कभी नहीं देखा।
Verse 473 (दोहा/सोरठा)
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।
भरत में कभी राजो का घम नहीं आएगा, क्योंकि वो हरि और शिव के चरणों में है। क्या तलवार की मैयल दूध के समुंदर को सुका सकती है? कभी नहीं।
Verse 474 (चौपाई)
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।। गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।। मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।। लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।। सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।। भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।। गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।। कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
अंधेरे से सूरज को निगल जाना, आसमान को सरसों के बीज में समा देना, बादल को छोटी जगह में बंद कर देना। पानी के जीव एक बूंद में डूब जाते हैं। भगवान सब माफ करता है, पर अपनी बनाई हुई चीज को छोड़ देता है। मखी मेरु पर्वत को हवा से उड़ा सके, पर भरत में राजो का घम कभी नहीं आएगा। लख्शमन, तुम्हारी कसम ने पिताजी को शर्मा दिया। भरत जैसा अच्छा दोस्त कोई नहीं। अच्छे गुण दूध जैसे हैं, बुरी बातें पानी जैसे। भगवान ने दोनों को मिला के बनाया है। भरत सूरज की किरण जैसे हैं, जनम से ही अच्छा और बुरा अलग करता है। अच्छे गुण रख के बुरी बातें छोड़ दी, अपनी इज्जत से दुनिया रोशन कर दी। सब भरत की अच्छाई, उसका स्वभाव बताते हैं। राम प्यार के समुंदर में डूबे हैं।
Verse 475 (दोहा/सोरठा)
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।
राम की बात सुन के और भरत की प्यार देख के सब देवता खुश हो गए। सबने राम की तारीफ की, जो बहुत दयालु हैं।
Verse 476 (चौपाई)
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।। कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।। लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।। इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।। सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।। चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।। समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।। रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
अगर भरत दुनिया में पैदा नहीं होते, तो पूरी धरती पे धरम को ठीक से चलाने वाला कोई न होता। भरत के गुणों की कहानी इतनी गहरी है कि कवि भी उसको पूरा नहीं समझ सकते। रघुनाथ के बिना कौन जान सकता है? लक्ष्मण, राम और सीता ने देवियों की बात सुनी और इतना खुश हुए कि बताना मुश्किल है। इस दौरान भरत अपने सारे लोगों के साथ मंदाकिनी नदी में नहा रहे थे। उन्होंने सब लोगों को नदी के पास रुकने को कहा। फिर माँ, गुरु और सचिव से इजाज़त ले के चल दिए। भरत वहाँ जा रहे थे जहाँ सीता और राम थे। निषादों के राजा और छोटे भाई भी साथ थे। भरत को अपनी माँ के काम को समझ के शर्म आ रही थी। उनके मन में हज़ारों चिंता चल रही थी। मेरा नाम सुन के राम, लक्ष्मण और सीता उठ जाएँ और कहीं और न जाएँ।
Verse 477 (दोहा/सोरठा)
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर। अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
माँ, जो भी तुम करो, मुझे अपना मान के, वो मैं छोटा समझता हूँ। मेरे पाप और गल्तियाँ माफ करो और मुझे इज़्ज़त दो, अपना समझ के।
Verse 478 (चौपाई)
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।। मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।। जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।। अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।। फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।। जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।। भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।। देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
अगर तुम अपने मन को साफ कर दो और मुझे अपना सेवक मान के इज़्ज़त दो, तो मैं राम की शरण में जाता हूँ। राम मेरा असली मालिक है, और सारी गलती मेरी है। दुनिया की बड़ाई एक बर्तन है, चातक पक्षी और मछली अपने नियम फॉलो करते हैं। वो अपने काम में एक्सपर्ट हैं और हमेशा नए रहते हैं। ऐसे सोच सोच के वो रास्ते पे चल दिए। शर्म, प्यार और थकान से उनका बदन ढीला हो गया। अपनी माँ ने जो किया था उससे अपना मन फेर लिया। भक्ति, ताकत और सब्र के साथ आगे बढ़ रहे थे। जब रघुनाथ के स्वभाव को याद किया, तब पैर सही रास्ते पर आ गए। उस वक्त भरत कैसा फील कर रहे थे? जैसे पानी में मछली तैरती है, वैसे ही उनका मन था। भरत का दुख और प्यार देख के निषाद भी उस वक्त बेहाल हो गया।
Verse 479 (दोहा/सोरठा)
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु। मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
अच्छे शुभ संकेत दिखने लगे। निषाद ने उनका मतलब बताया कि चिंता मिट जाएगी, खुशी आएगी और आखिर में सब ठीक हो जाएगा।
Verse 480 (चौपाई)
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।। भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।। ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।। जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।। राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।। सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।। भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।
सेवक की बात सच मान के वो आश्रम के पास पहुँच गए। भरत ने जंगल और पहाड़ियों का नज़ारा देखा, खुशी से भरे जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो। अंदर से भूख थी। डर और चिंता थी, जैसे कोई दुखी प्रजा हो। तीन तरह की परेशानी थी और ग्रह भी बुरा फल दे रहे थे। वो अच्छे राज वाले देश की तरफ जा रहे थे जहाँ लोग खुश थे। भरत की हालत भी वैसी हो रही थी। राम का जंगल में रहना इतना चमकदार था, जैसे कोई ख़ज़ाना हो। लोग खुश थे जैसे अच्छा राजा मिल गया हो। राजा का सचिव बड़ा समझदार और विवेकी था। जंगल सुंदर था और पवित्र देश था। सैनिक इतने डिसिप्लिन्ड थे जैसे यमराज के आदमी हों। पहाड़ी राजधानी जैसी थी। शांति, बुद्धि, साफ-दिल और सुंदरता रानी जैसी थी। हर चीज़ परफेक्ट थी जैसे अच्छे राजा में होनी चाहिए। मन बस राम के चरणों में था।
Verse 481 (दोहा/सोरठा)
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु। करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
राजा ने मोह को हरा लिया। वो अपने पूरे परिवार के साथ बुद्धि में मगन हो गए। उन्होंने शहर में किसी रुकावट के बिना राज किया। लोग खुश थे, सब कुछ अच्छा चल रहा था, मौसम भी अच्छा था।
Verse 482 (चौपाई)
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।। बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।। खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।। बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।। झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।। चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।। अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।। बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।
जंगल में बहुत सारे रिशि रहते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई शहर या गाँव हो। वहाँ अलग-अलग तरह के पक्षी और हिरन थे। इतने जानवर थे कि गिनने का नाम नहीं। मोर, शेर और सुअर सब दिखाई देते थे। भैंस और बैल भी थे, सब अच्छे लग रहे थे। दुश्मन भी साथ में चर रहे थे। ऐसा लगता था जैसे कोई सेना खड़ी हो। झरने से पानी गिर रहा था, हाथी चिल्लाते थे। बजने वाले साज़ जैसे बज रहे हो। पक्षी गा रहे थे, स्वान्स खुश थे। मधुमक्खी और मोर नाच रहे थे। चारों तरफ अच्छी बात थी। पेड़-पौधों में फल-फूल लग गए थे। सब खुशी का असल था।
Verse 483 (दोहा/सोरठा)
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु। तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
भरत ने राम के पहाड़ की खूबसूरती देखी। उनका दिल प्यार से भर गया। जैसे कोई साधु अपनी तपस्या का फल पाके खुश हो, वैसे ही भरत खुश थे। उनका व्रत पूरा हो गया।
Verse 484 (चौपाई)
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।। नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।। जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।। नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।। मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।। ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।। तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।। बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।
केवट ने ऊँचा पेड़ चढ़ा और भरत को हाथ उठा के बोला। राजा, वहाँ बड़े पेड़ देखो। आम, जामुन और तमाल के पेड़ हैं। उन पेड़ों में से बरगद सबसे अच्छा लग रहा था। इतना बड़ा और सुंदर था कि दिल खुश हो गया। उसके पत्ते घने थे, फल लाल थे। छाया इतना अच्छा था कि कभी भी सुख देता था। ऐसा लगता था जैसे अंधेरा भी चमक रहा हो। पेड़ नदी के पास है, जहाँ राम का छोटा सा घर है। तुलसी के पेड़ भी थे। सीता ने यहाँ-यहाँ लगाए थे, लक्ष्मण ने भी। बरगद की छाया में सीता ने चबूतरा बनाया था। अपने हाथ से सुंदर बनाया था।
Verse 485 (दोहा/सोरठा)
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।
वहाँ सीता और राम रोज़ बैठते थे। रिशि भी साथ में होते थे। वो पुरानी कहानियाँ सुनते थे। वेद, पुराण सब सुनते थे।
Verse 486 (चौपाई)
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।। करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।। हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।। रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।। देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।। सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।। निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।। होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।
जब उसने अपने दोस्त की बात सुनी और जंगल को देखा, भरत की आँखों में आँसू आ गए। दोनों भाई आगे बढ़े, झुक के प्रणाम किया। थोड़ा शर्मा के भी उन्होंने अपना प्यार दिखाया। राम के पैर देख के दोनों खुश हो गए, जैसे कोई गरीब को पास मिल जाए। उन्होंने सर पर धूल ली, उस्से अपने दिल और आँखों से लगाया। रघु के स्वामी से मिलने जैसा सुख मिला। भरत की यह हालत देख के, हर कोई प्यार में डूब गया। हिरन, चिड़िया, और छोटे जानवर भी। इतना प्यार में वो दोस्त रास्ता भूल गया। देवता ने सही रास्ता बताया और ऊपर से फूल बरसाए। सिद्ध और साधक लोग देख के बड़े खुश हुए। उन्होंने भरत का प्यार सराहा। भरत जैसा प्यार ज़मीन पर किसी का नहीं। वो चलने वाले और न चलने वाले, सब को प्यार में ला देता है।
Verse 487 (दोहा/सोरठा)
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर। मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
प्यार अमृत है, बिछड़ना एक पहाड़ है। भरत समुंदर जैसा गहरा है। इन सब को मिला के रघु के स्वामी प्रकट हुए। वो दया के समुंदर हैं, देवता और संत लोगों के लिए।
Verse 488 (चौपाई)
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।। भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।। करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।। देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।। सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।। बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।। बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।। कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
अपने दोस्त के साथ लक्ष्मण घने जंगल में कुछ दिखा नहीं। भरत ने प्रभु का आश्रम देखा, जो पवित्र है और बहुत सुंदर है। जैसे ही अंदर गया, सारा दुख गायब हो गया। जैसे कोई योगी को परमार्थ मिल गया हो। भरत ने आगे लक्ष्मण और प्रभु को देखा। उनसे प्यार से बात की और सवाल पूछे। उनके सर पर जटें थी, कमर पर बार्क का कपड़ा था। कंधे पर धनुष और हाथ में बाण था। वेदी पर मुनि और साधु लोग बैठे थे। सीता के साथ रघु के राजा चमक रहे थे। काले शरीर पर बार्क का कपड़ा, जटें वाले बाल। जैसे प्यार ने मुनि का बना लिया हो। कमल जैसे हाथों में धनुष और बाण था। वो दिल की जलन दूर करता था, मुस्कुरा के देखता था।
Verse 489 (दोहा/सोरठा)
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु। ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
मुनि लोगों की मंडली में सीता और रघु के चंद्र चमक रहे हैं। ज्ञान की सभा में जैसे वो शरीर में आए हैं। भक्ति, सत, चित और आनंद की मूरत।
परंपरागत मान्यता में भरत-चरित्र और राजमद-निवारण वाले प्रसंग का पाठ क्रोध, अहं, और भ्रातृ-कलह के संस्कारों को शांत करता है; सेवकभाव, विनय, और ‘मर्यादा’ की बुद्धि दृढ़ होती है—विशेषतः घर-परिवार/सत्ता-संबंधी विवादों में मन को धर्म-मार्ग पर स्थिर करने वाला माना जाता है।
सामान्य मानस-पारायण परंपरा में रामनाम-सम्पुट (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘राम’ नाम का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; भरत-प्रसंग में कुछ परंपराएँ ‘भरत चरित करहु बिसेसा’ (मानस-भाव-सम्पुट) रूप से भी स्मरण कराती हैं, पर निश्चित एकरूप ‘अनिवार्य’ सम्पुट सम्प्रदायानुसार बदलता है।
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