त्याग-धर्म का सोपान: राजसत्ता, कुलधर्म, और व्यक्तिगत अहं (राजमद) के बीच विवेक का उदय। इस काण्ड में ‘घर’ (अयोध्या) बाह्य-स्थान नहीं, अंतःकरण का राज्य है—जहाँ राम-आज्ञा के सामने वासनात्मक प्रतिरोध (लक्ष्मण का रोष) भी शुद्ध होकर मर्यादा-भक्ति में ढलता है, और भरत-चरित्र ‘अनासक्ति’ का आदर्श बनकर मुक्ति-सीढ़ी का दृढ़ पायदान होता है।
इस खंड-खंडित पाठ-भाग (दोहा 230–239 के आसपास) में ‘वीर-रस’ का उफान (लक्ष्मण का रण-उद्यम) तुरंत ‘शान्त-रस’ और ‘दास्य/भ्रातृ-प्रेम’ में रूपान्तरित हो जाता है। देववाणी (आकाशवाणी) लक्ष्मण-बल की प्रशंसा करते हुए भी नीति-विवेक का संकेत देती है—उचित-अनुचित का विचार, सहसा कर्म का पश्चात्ताप, और राजमद की सर्वाधिक कठिनता। राम का उत्तर भरत के राजमद-असम्भवत्व को अतिशयोक्ति-अलंकारों से स्थिर करता है (मच्छर का मेरु उड़ाना, कांजी से क्षीरसिन्धु का नाश)। फिर दृश्य-रचना में आश्रम-प्रदेश ‘सुराज’ का रूपक बनता है—नियम-यम, शान्ति-सुमति, और रामचरण-आश्रय वाला चित्त। अन्ततः ‘ज्ञानसभा’ का बिम्ब उभरता है: मुनिमण्डली के मध्य सीता-राम ‘भक्ति-सच्चिदानन्द’ के साकार प्रतिरूप हैं। इस प्रकार काण्ड का यह भाग साधक को क्रोध-ऊर्जा से विवेक, और विवेक से प्रेम-समर्पण तक चढ़ाता है।
चौपाई 230.1-4
उठि कर जोरि रजायसु मागा।मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा।साजि सरासनु सायकु हाथा।।
आजु राम सेवक जसु लेऊँ।भरतहि समर सिखावन देऊँ।।
राम निरादर कर फलु पाई।सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।
आइ बना भल सकल समाजू।प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू।लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।
तैसेहिं भरतहि सेन समेता।सानुज निदरि निपातउँ खेता।।
जौं सहाय कर संकरु आई।तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
uṭhi kara jori rajāyasu māgā |manahũ bīra rasa sovata jāgā ||
bā̃dhi jaṭā sira kasi kaṭi bhāthā |sāji sarāsanu sāyaku hāthā ||
āju rāma sevaka jasu leū̃ |bharatahi samara sikhāvana deū̃ ||
rāma nirādara kara phalu pāī |sovahũ samara seja dou bhāī ||
āi banā bhala sakala samājū |pragaṭa karaũ risa pāchila ājū ||
jimi kari nikara dalai mṛgarājū |lei lapeṭi lavā jimi bājū ||
taisehiṁ bharatahi sena sametā |sānuja nidari nipātaũ khetā ||
jauṁ sahāya kara saṁkaru āī |tau māraũ rana rāma dohāī ||
हाथ जोड़कर उठकर उसने आज्ञा माँगी, मानो वीर रस सोता हुआ जाग गया हो। सिर पर जटाएँ बाँधीं, कमर में तरकश कसी, धनुष सजाकर हाथ में बाण लिया। "आज राम के सेवक का यश प्राप्त करूँ और भरत को युद्ध की शिक्षा दूँ। राम का अनादर करके जो फल पाया है, उसे भोगकर दोनों भाई युद्ध की सेज पर सो जाएँ। अच्छा ही हुआ कि सब समाज आ गया; आज मैं अपना पुराना क्रोध प्रकट करूँ। जैसे सिंह झुंड को फाड़ डालता है, और जैसे बाज लवा को लपेटकर ले जाता है, वैसे ही भरत को उसकी सेना और छोटे भाई सहित तुच्छ समझकर रणभूमि में गिरा दूँ। यदि सहायता के लिए शंकर भी आ जाएँ, तो राम की दोहाई देकर मैं उन्हें भी रण में मार डालूँ।"
दोहा 230
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।
ati saroṣa mākhe lakhanu lakhi suni sapatha pravāna |sabhaya loka saba lokapati cāhata bhabhari bhagāna ||230||
लक्ष्मण अत्यन्त क्रोध से भर गए; और सब लोक तथा सभी लोकपतियों ने उन्हें देखकर और उनका प्रतिज्ञा-वचन सुनकर, भयभीत होकर घबराने लगे और भागना चाहने लगे।
चौपाई 231.1-4
जगु भय मगन गगन भइ बानी।लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा।को कहि सकइ को जाननिहारा।।
अनुचित उचित काजु किछु होऊ।समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
सहसा करि पाछैं पछिताहीं।कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने।राम सीयँ सादर सनमाने।।
कही तात तुम्ह नीति सुहाई।सब तें कठिन राजमदु भाई।।
जो अचवँत नृप मातहिं तेई।नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।
सुनहु लखन भल भरत सरीसा।बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।
jagu bhaya magana gagana bhai bānī |lakhana bāhubalu bipula bakhānī ||
tāta pratāpa prabhāu tumhārā |ko kahi sakai ko jānanihārā ||
anucita ucita kāju kichu hoū |samujhi karia bhala kaha sabu koū ||
sahasā kari pāchaiṁ pachitāhīṁ |kahahiṁ beda budha te budha nāhīṁ ||
suni sura bacana lakhana sakucāne |rāma sīyã sādara sanamāne ||
kahī tāta tumha nīti suhāī |saba teṁ kaṭhina rājamadu bhāī ||
jo acavãta nṛpa mātahiṁ teī |nāhina sādhusabhā jehiṁ seī ||
sunahu lakhana bhala bharata sarīsā |bidhi prapaṁca mahã sunā na dīsā ||
जग भय में मग्न हो गया और आकाश से वाणी हुई, जिसने लक्ष्मण के बाहुबल का विपुल वर्णन किया। तात, तुम्हारा प्रताप और प्रभाव कौन कह सकता है, कौन जानने वाला है? अनुचित या उचित जो भी कार्य हो, उसे सोच-समझकर करना चाहिए, ऐसा सब कहते हैं। जो अचानक कार्य करके पीछे पछताते हैं, वेद और बुद्धिमान कहते हैं कि उन्हें बुद्धिमान नहीं मानते। देव के वचन सुनकर लक्ष्मण लज्जित हुए, और राम और सीता ने उनका सादर सम्मान किया। तात, तुमने उचित नीति की बातें कहीं, पर भाई, सबमें सबसे कठिन राजमद है। जो राजा साधु-सभा में नहीं जाते, वे जैसे ही उसे पीते हैं, वेड़े हो जाते हैं। सुनो लक्ष्मण, ब्रह्मा की सृष्टि में भरत के समान उत्तम कोई सुना नहीं, देखा नहीं।
दोहा 231
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।
bharatahi hoi na rājamadu bidhi hari hara pada pāi |kabahũ ki kā̃jī sīkarani chīrasiṁdhu binasāi ||231||
भरत को ब्रह्मा, विष्णु अथवा शिव का पद प्राप्त हो जाए तब भी उनमें राज्य का गर्व नहीं होगा। क्या कभी छाछ की बूँदें दूध के समुद्र को नष्ट कर सकती हैं?
चौपाई 232.1-4
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई।गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी।सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई।होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।
लखन तुम्हार सपथ पितु आना।सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता।मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा।जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी।निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ।पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
timiru taruna taranihi maku gilaī |gaganu magana maku meghahiṁ milaī ||
gopada jala būṛahiṁ ghaṭajonī |sahaja chamā baru chāṛai chonī ||
masaka phū̃ka maku meru uṛāī |hoi na nṛpamadu bharatahi bhāī ||
lakhana tumhāra sapatha pitu ānā |suci subaṁdhu nahiṁ bharata samānā ||
saguna khīru avaguna jalu tātā |milai racai parapaṁcu bidhātā ||
bharatu haṁsa rabibaṁsa taṛāgā |janami kīnha guna doṣa bibhāgā ||
gahi guna paya taji avaguna bārī |nija jasa jagata kīnhi ujiārī ||
kahata bharata guna sīlu subhāū |pema payodhi magana raghurāū ||
अंधकार नवयुवक सूर्य को शायद निगल जाए, और आकाश बादलों में लीन होकर उनमें मिल जाए। घटज अगस्त्य गोपद के जल में डूब जाएँ, और पृथ्वी अपनी स्वाभाविक क्षमा भी त्याग दे। मच्छर के फूँक से मेरु पर्वत उड़ जाए, पर भरत में राज-गर्व उत्पन्न नहीं हो सकता, भाई। लक्ष्मण, तुम्हारी और पिता की शपथ: भरत के समान पवित्र और अच्छा बंधु नहीं है। गुण दूध है और अवगुण जल, भाई; विधाता दोनों को मिलाकर संसार की रचना करता है। भरत सूर्यवंश नामक सरोवर का हंस है; जन्म से ही उसने गुण और दोष का विभाग कर दिया। गुण रूपी दूध ग्रहण कर और अवगुण रूपी जल त्यागकर, उसने अपने यश से जगत को आलोकित किया। भरत के गुण, स्वभाव और चरित्र का वर्णन करते हुए रघुराज प्रेम के सागर में मग्न हो गए।
दोहा 232
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।
suni raghubara bānī bibudha dekhi bharata para hetu |sakala sarāhata rāma so prabhu ko kṛpāniketu ||232||
श्री रघुकुल-शिरोमणि राम के वचन सुनकर और भरत पर उनके प्रेम को देखकर सम्पूर्ण देवता उस प्रभु राम की स्तुति करने लगे, जो करुणा के धाम हैं।
चौपाई 233.1-4
जौं न होत जग जनम भरत को।सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा।को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी।अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।
इहाँ भरतु सब सहित सहाए।मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।
सरित समीप राखि सब लोगा।मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।
चले भरतु जहँ सिय रघुराई।साथ निषादनाथु लघु भाई।।
समुझि मातु करतब सकुचाहीं।करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ।उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
jauṁ na hota jaga janama bharata ko |sakala dharama dhura dharani dharata ko ||
kabi kula agama bharata guna gāthā |ko jānai tumha binu raghunāthā ||
lakhana rāma siyã suni sura bānī |ati sukhu laheu na jāi bakhānī ||
ihā̃ bharatu saba sahita sahāe |maṁdākinīṁ punīta nahāe ||
sarita samīpa rākhi saba logā |māgi mātu gura saciva niyogā ||
cale bharatu jahã siya raghurāī |sātha niṣādanāthu laghu bhāī ||
samujhi mātu karataba sakucāhīṁ |karata kutaraka koṭi mana māhīṁ ||
rāmu lakhanu siya suni mama nāū̃ |uṭhi jani anata jāhiṁ taji ṭhāū̃ ||
यदि भरत का जग में जन्म न हुआ होता, तो धरती पर सम्पूर्ण धर्म का भार कौन धारण करता? भरत के गुणों की कथा कवि कुल के लिए भी अगम्य है; हे रघुनाथ, तुम्हारे बिना वह कौन जान सकता है? लक्ष्मण, राम और सीता ने देवों की वाणी सुनकर ऐसा परम आनन्द पाया जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरत ने अपनी सम्पूर्ण सेना सहित पवित्र मन्दाकिनी में स्नान किया। सब लोगों को नदी के समीप रोककर, माताओं, गुरु और मन्त्री से आज्ञा लेकर, भरत वहाँ चले जहाँ सीता और रघुराज थे, निषादनाथ और छोटे भाई साथ थे। माता का कृत्य स्मरण कर वे लज्जा से भर उठे, और मन में कोटि अनर्थ तर्क उठाते रहे। मेरा नाम सुनकर राम, लक्ष्मण और सीता उठकर इस स्थान को त्याग कहीं और न चले जाएँ।
दोहा 233
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
mātu mate mahũ māni mohi jo kachu karahiṁ so thora |agha avaguna chami ādarahiṁ samujhi āpanī ora ||233||
माता के कारस्थान में मुझे भागी मानकर वे जो कुछ भी मेरे साथ करें, वह बहुत थोड़ा है। अथवा अपनी उदारता समझकर वे मेरे पाप और दोषों को क्षमा कर आदरपूर्वक मेरा स्वागत करें।
चौपाई 234.1-4
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी।जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।
मोरें सरन रामहि की पनही।राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।
जग जस भाजन चातक मीना।नेम पेम निज निपुन नबीना।।
अस मन गुनत चले मग जाता।सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी।चलत भगति बल धीरज धोरी।।
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ।तब पथ परत उताइल पाऊ।।
भरत दसा तेहि अवसर कैसी।जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।
देखि भरत कर सोचु सनेहू।भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
jauṁ pariharahiṁ malina manu jānī |jau sanamānahiṁ sevaku mānī ||
moreṁ sarana rāmahi kī panahī |rāma susvāmi dosu saba janahī ||
jaga jasa bhājana cātaka mīnā |nema pema nija nipuna nabīnā ||
asa mana gunata cale maga jātā |sakuca sanehã sithila saba gātā ||
pherata manahũ mātu kṛta khorī |calata bhagati bala dhīraja dhorī ||
jaba samujhata raghunātha subhāū |taba patha parata utāila pāū ||
bharata dasā tehi avasara kaisī |jala prabāhã jala ali gati jaisī ||
dekhi bharata kara socu sanehū |bhā niṣāda tehi samayã bidehū ||
यदि वे मेरे मन को मलिन जानकर मुझे त्याग दें, अथवा मुझे सेवक मानकर सम्मान दें, तो भी मेरी शरण राम की पादुका ही है। राम उदार स्वामी हैं, सब दोष सेवक का है। चातक और मीन जगत के यश के भाजन हैं, क्योंकि उनके नियम और प्रेम सदा निपुण और नवीन हैं। इस प्रकार मन में विचार करते हुए वह मार्ग पर चला जा रहा था, लज्जा और प्रेम से सम्पूर्ण शरीर शिथिल हो गया था। मानो माता का अपराध उसे पीछे फेर रहा हो, और भक्ति का बल, धैर्य रूपी बलवान बैल के समान, उसे आगे खींच रहा हो। जब वह रघुनाथ के स्वभाव को समझता, तब उसके चरण मार्ग पर तेजी से चलने लगते। उस अवसर पर भरत की दशा कैसी थी? जैसे जल के प्रवाह में जल का कीट बहता जाता है। भरत का सोच और प्रेम देखकर निषाद उस समय बेहाल हो गया, शरीर के सब भान खो गए।
दोहा 234
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
lage hona maṁgala saguna suni guni kahata niṣādu |miṭihi socu hoihi haraṣu puni parināma biṣādu ||234||
मंगल शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और मनन करके निषाद ने कहा - तुम्हारा सोच मिट जाएगा, हर्ष होगा, और फिर अंत में विषाद होगा।
चौपाई 235.1-4
सेवक बचन सत्य सब जाने।आश्रम निकट जाइ निअराने।।
भरत दीख बन सैल समाजू।मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी।त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
जाइ सुराज सुदेस सुखारी।होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
राम बास बन संपति भ्राजा।सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू।बिपिन सुहावन पावन देसू।।
भट जम नियम सैल रजधानी।सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
सकल अंग संपन्न सुराऊ।राम चरन आश्रित चित चाऊ।।
sevaka bacana satya saba jāne |āśrama nikaṭa jāi niarāne ||
bharata dīkha bana saila samājū |mudita chudhita janu pāi sunājū ||
īti bhīti janu prajā dukhārī |tribidha tāpa pīṛita graha mārī ||
jāi surāja sudesa sukhārī |hohiṁ bharata gati tehi anuhārī ||
rāma bāsa bana saṁpati bhrājā |sukhī prajā janu pāi surājā ||
saciva birāgu bibeku naresū |bipina suhāvana pāvana desū ||
bhaṭa jama niyama saila rajadhānī |sāṁti sumati suci suṁdara rānī ||
sakala aṁga saṁpanna surāū |rāma carana āśrita cita cāū ||
भरत को अपने सेवक के सब वचन सत्य ज्ञात हुए, और वे आगे बढ़कर आश्रम के निकट पहुँचे। भरत ने वन और पर्वतों का समाज देखा, और आनंदित हुए, जैसे कोई भूखा व्यक्ति उत्तम भोजन पाकर प्रसन्न हो। जैसे भय और आपदा से पीड़ित प्रजा, त्रिविध तापों से त्रस्त, दुर्ग्रह और रोग से ग्रस्त, किसी सुराज और सुदेश में जाकर सुखी हो जाती है, वैसी ही भरत की गति अर्थात मन की दशा थी। जिस वन में राम निवास करते थे, वह संपत्ति से भास्वर था, जैसे सुखी प्रजा किसी सुराजा को पाकर होती है। वैराग्य और विवेक सचिव थे, और सुहावना पावन वन देश था। यम और नियम सैनिक थे, पर्वत राजधानी था, और शांति तथा सुमति निर्मल सुंदर रानियाँ थीं। वह राजा सब अंगों से संपन्न था, और राम चरणों के आश्रित उसका चित्त आनंद से पूर्ण था।
दोहा 235
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
jīti moha mahipālu dala sahita bibeka bhuālu |karata akaṁṭaka rāju purã sukha saṁpadā sukālu ||235||
मोह राजा को उसकी सेना सहित जीतकर, विवेक राजा बिना किसी अड़चन के नगर में राज्य करते हैं, और उस नगर में सुख, संपदा तथा सुकाल विद्यमान हैं।
चौपाई 236.1-4
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे।जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना।प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।
खगहा करि हरि बाघ बराहा।देखि महिष बृष साजु सराहा।।
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा।जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं।मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।
चक चकोर चातक सुक पिक गन।कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
अलिगन गावत नाचत मोरा।जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।
बेलि बिटप तृन सफल सफूला।सब समाजु मुद मंगल मूला।।
bana pradesa muni bāsa ghanere |janu pura nagara gāũ gana khere ||
bipula bicitra bihaga mṛga nānā |prajā samāju na jāi bakhānā ||
khagahā kari hari bāgha barāhā |dekhi mahiṣa bṛṣa sāju sarāhā ||
bayaru bihāi carahiṁ eka saṁgā |jahã tahã manahũ sena caturaṁgā ||
jharanā jharahiṁ matta gaja gājahiṁ |manahũ nisāna bibidhi bidhi bājahiṁ ||
caka cakora cātaka suka pika gana |kūjata maṁju marāla mudita mana ||
aligana gāvata nācata morā |janu surāja maṁgala cahu orā ||
beli biṭapa tṛna saphala saphūlā |saba samāju muda maṁgala mūlā ||
वन प्रदेश में मुनियों के अनेक निवास थे, मानो पुर, नगर, गाँव और बस्तियाँ हों। बहुत से विचित्र और नाना प्रकार के पक्षी और प्राणी प्रजा के समान थे, उस समाज की विशालता का वर्णन नहीं किया जा सकता। गेंडे, हाथी, सिंह, बाघ, वाराह, भैंस और बैल, उन्हें देखकर उस साज-सज्जा की प्रशंसा होती थी। वैर भूलकर वे एक साथ चरते थे, मानो यहाँ-वहाँ चतुरंग सेना खड़ी हो। झरने झरते थे और मत्त हाथी चिंघाड़ते थे, मानो नाना प्रकार के नगाड़े बज रहे हों। चकवा, चकोर, चातक, सुग्गे और कोयलों के झुंड मधुर कूजन करते थे और कोमल मराल मन में हर्षित थे। भँवरों के झुंड गाते थे और मोर नाचते थे, मानो किसी सुराज में चारों ओर मंगल हो रहा हो। बेलियाँ, वृक्ष और तृण फलों और फूलों से भरे हुए थे, यह सम्पूर्ण समाज आनंद और मंगल का मूल था।
दोहा 236
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
rāma saila sobhā nirakhi bharata hṛdayã ati pemu |tāpasa tapa phalu pāi jimi sukhī sirāneṁ nemu ||236||
राम रूपी पर्वत की सुंदरता को देखकर भरत के हृदय में अत्यधिक प्रेम उमड़ा, जैसे तपस्वी को तप का फल मिलने पर व्रत पूरा होने से सुखी होने लगता है।
चौपाई 237.1-4
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई।कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।पाकरि जंबु रसाल तमाला।।
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा।मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।
नील सघन पल्ल्व फल लाला।अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी।बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।
ए तरु सरित समीप गोसाँई।रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए।कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।
बट छायाँ बेदिका बनाई।सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।
taba kevaṭa ū̃ceṁ caṛhi dhāī |kaheu bharata sana bhujā uṭhāī ||
nātha dekhiahiṁ biṭapa bisālā |pākari jaṁbu rasāla tamālā ||
jinha tarubaranha madhya baṭu sohā |maṁju bisāla dekhi manu mohā ||
nīla saghana pallva phala lālā |abirala chāhã sukhada saba kālā ||
mānahũ timira arunamaya rāsī |biracī bidhi sãkeli suṣamā sī ||
e taru sarita samīpa gosā̃ī |raghubara paranakuṭī jahã chāī ||
tulasī tarubara bibidha suhāe |kahũ kahũ siyã kahũ lakhana lagāe ||
baṭa chāyā̃ bedikā banāī |siyã nija pāni saroja suhāī ||
तब केवट ऊँचे स्थान पर चढ़कर दौड़ा, और भुजा उठाकर भरत से कहा। "नाथ, उन विशाल वृक्षों को देखिए: पाकड़, जामुन, आम और तमाल।" "उन उत्तम वृक्षों के बीच एक बरगद सुशोभित है, सुंदर और विशाल, देखकर मन मोहित होता है।" "उसके सघन पत्ते नीले हैं और फल लाल हैं, और उसकी अखंड छाया सब काल सुख देती है।" "मानो अंधकार और लालिमा का संघ हो, जैसे ब्रह्मा ने सारी सुंदरता इकट्ठी करके रचा हो।" "ये वृक्ष, स्वामी, नदी के समीप हैं, जहाँ रघुवर ने अपनी पर्ण-कुटिया बनाई है।" "वहाँ अनेक सुंदर तुलसी के पौधे हैं, कहीं सीता ने और कहीं लक्ष्मण ने लगाए हैं।" "बरगद की छाया में सीता ने अपने कमल-हाथों से एक सुंदर वेदी बनाई है।"
दोहा 237
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।
jahā̃ baiṭhi munigana sahita nita siya rāmu sujāna |sunahiṁ kathā itihāsa saba āgama nigama purāna ||237||
जहाँ श्री सिया और सर्वज्ञ श्री राम मुनियों के सहित बैठकर नित्य कथाएँ, इतिहास, सम्पूर्ण आगम, निगम और पुराण सुनते हैं।
चौपाई 238.1-4
सखा बचन सुनि बिटप निहारी।उमगे भरत बिलोचन बारी।।
करत प्रनाम चले दोउ भाई।कहत प्रीति सारद सकुचाई।।
हरषहिं निरखि राम पद अंका।मानहुँ पारसु पायउ रंका।।
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं।रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।
देखि भरत गति अकथ अतीवा।प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।
सखहि सनेह बिबस मग भूला।कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे।सहज सनेहु सराहन लागे।।
होत न भूतल भाउ भरत को।अचर सचर चर अचर करत को।।
sakhā bacana suni biṭapa nihārī |umage bharata bilocana bārī ||
karata pranāma cale dou bhāī |kahata prīti sārada sakucāī ||
haraṣahiṁ nirakhi rāma pada aṁkā |mānahũ pārasu pāyau raṁkā ||
raja sira dhari hiyã nayananhi lāvahiṁ |raghubara milana sarisa sukha pāvahiṁ ||
dekhi bharata gati akatha atīvā |prema magana mṛga khaga jaṛa jīvā ||
sakhahi saneha bibasa maga bhūlā |kahi supaṁtha sura baraṣahiṁ phūlā ||
nirakhi siddha sādhaka anurāge |sahaja sanehu sarāhana lāge ||
hota na bhūtala bhāu bharata ko |acara sacara cara acara karata ko ||
मित्र के वचन सुनकर और वृक्ष को निहारकर भरत की आँखों से आँसू बहने लगे। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले गए; उनके प्रेम का वर्णन करते हुए सरस्वती भी सकुचाती हैं। राम के चरण-चिह्नों को देखकर वे हर्षित हुए, जैसे कोई दरिद्र पारस पा ले। धूल को सिर पर धारण करके हृदय और नयनों से लगाते हुए उन्हें रघुवर से मिलने जैसा सुख प्राप्त हुआ। भरत की अवस्था को देखकर, जो अत्यंत अकथनीय थी, प्रेम में मग्न हो गए मृग, पक्षी, जड़ और चेतन जीव। मित्र प्रेम में वशीभूत होकर मार्ग भटक गया; देवताओं ने सही मार्ग बताया और फूल बरसाए। उन्हें देखकर सिद्ध और साधक अनुराग से भर गए और उनके सहज प्रेम की सराहना करने लगे। यदि पृथ्वी पर भरत जैसा भाव न होता, तो अचर को सचर और सचर को अचर करने वाला कौन होता?
दोहा 238
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
pema amia maṁdaru birahu bharatu payodhi gãbhīra |mathi pragaṭeu sura sādhu hita kṛpāsiṁdhu raghubīra ||238||
प्रेम अमृत था, विरह मंदराचल था और भरत गंभीर सागर थे। उस सागर को मथकर रघुबीर, जो करुणा के सिंधु हैं, देवताओं और साधुओं के हित के लिए अमृत प्रकट कर लाए।
चौपाई 239.1-4
सखा समेत मनोहर जोटा।लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन।सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।
करत प्रबेस मिटे दुख दावा।जनु जोगीं परमारथु पावा।।
देखे भरत लखन प्रभु आगे।पूँछे बचन कहत अनुरागे।।
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें।तून कसें कर सरु धनु काँधें।।
बेदी पर मुनि साधु समाजू।सीय सहित राजत रघुराजू।।
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा।जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
कर कमलनि धनु सायकु फेरत।जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
sakhā sameta manohara joṭā |lakheu na lakhana saghana bana oṭā ||
bharata dīkha prabhu āśramu pāvana |sakala sumaṁgala sadanu suhāvana ||
karata prabesa miṭe dukha dāvā |janu jogīṁ paramārathu pāvā ||
dekhe bharata lakhana prabhu āge |pū̃che bacana kahata anurāge ||
sīsa jaṭā kaṭi muni paṭa bā̃dheṁ |tūna kaseṁ kara saru dhanu kā̃dheṁ ||
bedī para muni sādhu samājū |sīya sahita rājata raghurājū ||
balakala basana jaṭila tanu syāmā |janu muni beṣa kīnha rati kāmā ||
kara kamalani dhanu sāyaku pherata |jiya kī jarani harata hãsi herata ||
सखा सहित मनोहर जोड़ी को लक्ष्मण नहीं देख सके, क्योंकि घने वन की ओट थी। भरत ने प्रभु का पवित्र आश्रम देखा, जो सम्पूर्ण मंगलों का सुहावना घर था। प्रवेश करते ही उनके दुखों की ज्वाला मिट गई, जैसे योगियों को परमार्थ प्राप्त होने पर। भरत ने लक्ष्मण को प्रभु के आगे देखा, जो उनके प्रश्नों का उत्तर देते और प्रेमपूर्वक बातें कहते थे। सिर पर जटाएँ, कमर में मुनि का वस्त्र बँधा, तूणीर कसा हुआ, हाथ में बाण, और कंधे पर धनुष था। वेदी पर मुनियों और साधुओं की सभा में, सीता सहित रघुराज शोभा रहे थे। बलकल वस्त्र पहने, जटाजूट और श्याम शरीर लिए, वे जैसे रति और कामदेव मुनि वेष धारण कर बैठे थे। वे कमल-हाथों में धनुष-बाण घुमाते, और हँसते-हँसते दृष्टि डालकर हृदय की जलन दूर कर देते।
दोहा 239
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
lasata maṁju muni maṁḍalī madhya sīya raghucaṁdu |gyāna sabhā̃ janu tanu dhare bhagati saccidānaṁdu ||239||
सुंदर मुनि मंडली के मध्य में सीता और रघुकुल के चंद्र राम शोभायमान हैं, मानो ज्ञान की सभा में भक्ति और सच्चिदानंद ने शरीर धारण कर लिया हो।
मुख्य शिक्षा यह है कि भक्ति में ‘उर्जा’ का शुद्धीकरण होता है—लक्ष्मण का क्रोध राम-आज्ञा के अधीन आते ही दास्य-भाव बन जाता है। देववाणी बताती है कि बल/पराक्रम का मूल्य नीति-विवेक से बंधने पर ही है; अन्यथा राजमद और आवेग साधक को गिरा सकते हैं। भरत का आदर्श दिखाता है कि सच्चा भक्त सत्ता, प्रतिष्ठा और अधिकार के आकर्षण से अछूता रह सकता है—अनासक्ति ही त्याग-धर्म की रीढ़ है। आश्रम का ‘सुराज’ रूपक साधक को सिखाता है कि अंतःकरण का राज्य नियम-यम, शांति-सुमति और रामचरण-आश्रय से चलता है। ‘ज्ञानसभा’ में सीता-राम का सच्चिदानंद-प्रतिरूप यह संकेत देता है कि अंतिम लक्ष्य बाह्य न्याय नहीं, भीतर की शांति, प्रेम और समर्पण में प्रभु की सजीव उपस्थिति है।
इस खंड-खंडित पाठ-खंड (दोहा 230–239 के आसपास) में ‘वीर-रस’ का उफान (लक्ष्मण का रण-उद्यम) तुरंत ‘शांत-रस’ और ‘दास्य/भ्रातृ-प्रेम’ में रूपांतरित होता है। देववाणी (आकाशवाणी) लक्ष्मण-बल की प्रशंसा करते हुए भी नीति-विवेक का संकेत देती है—अनुचित-उचित का विचार, सहसा कर्म का पश्चात्ताप, और राजमद की सर्वाधिक कठिनता। राम का उत्तर भरत के राजमद-असम्भवत्व को अतिशयोक्ति-अलंकारों से स्थिर करता है (मच्छर का मेरु उड़ाना, कांजी से क्षीरसिंधु का नाश)। फिर दृश्य-रचना में आश्रम-प्रदेश ‘सुराज’ का रूपक बनता है—नियम-जम, शांति-सुमति, और रामचरण-आश्रय वाला चित्त। अंततः ‘ज्ञानसभा’ का बिंब उभरता है: मुनिमंडली के मध्य सीता-राम ‘भक्ति सच्चिदानंद’ का साकार-प्रतिरूप। इस प्रकार काण्ड का यह भाग साधक को क्रोध-ऊर्जा से विवेक, और विवेक से प्रेम-समर्पण तक चढ़ाता है।
आरंभ में ‘वीर-रस’ का तीव्र उभार—लक्ष्मण का उठ खड़ा होना, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगना, और भीतर सोया रण-उद्यम जाग पड़ना। तत्क्षण यह उर्जा ‘मर्यादा’ के स्पर्श से संयमित होकर ‘शांत-रस’ की ओर मुड़ती है—आकाशवाणी प्रशंसा करते हुए भी नीति-विवेक का संकेत देती है, जिससे आवेग में ‘विचार’ प्रवेश करता है। फिर ‘दास्य-भाव/भ्रातृ-प्रेम’ प्रबल होता है—राम का वचन-प्रधान अनुशासन लक्ष्मण के रोष को सेवा-धर्म में ढाल देता है। मध्य में ‘नीति-रस’ और ‘वैराग्य’ का स्वर—राजमद की कठिनता, अनुचित-उचित का विवेक, और सहसा कर्म के पश्चात्ताप की संभावना। अंत में ‘अद्भुत + शांत + भक्ति-रस’ का स्थायी भाव—आश्रम-प्रदेश का सुराज-रूपक, मुनिमंडली की ज्ञानसभा, और सीता-राम का सच्चिदानंद-स्वरूप; क्रोध-ऊर्जा का परिष्कार होकर प्रेम-समर्पण में प्रतिष्ठित होना।
परंपरागत मान्यता में भरत-चरित्र और राजमद-निवारण वाले प्रसंग का पाठ क्रोध, अहं, और भ्रातृ-कलह के संस्कारों को शांत करता है; सेवकभाव, विनय, और ‘मर्यादा’ की बुद्धि दृढ़ होती है—विशेषतः घर-परिवार/सत्ता-संबंधी विवादों में मन को धर्म-मार्ग पर स्थिर करने वाला माना जाता है।
सामान्य मानस-पारायण परंपरा में रामनाम-सम्पुट (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘राम’ नाम का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; भरत-प्रसंग में कुछ परंपराएँ ‘भरत चरित करहु बिसेसा’ (मानस-भाव-सम्पुट) रूप से भी स्मरण कराती हैं, पर निश्चित एकरूप ‘अनिवार्य’ सम्पुट सम्प्रदायानुसार बदलता है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.