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त्याग और आज्ञापालन का सोपान: राजधर्म के शिखर से वनगमन का अवरोह, जहाँ ‘लोक-मान्यता’ (जन-प्रेम) और ‘आत्म-निवेदन’ (ईश्वर-इच्छा) एक हो जाते हैं। यह चरण साधक को सिखाता है कि प्रियतम-धर्म (राम) का अनुसरण बाह्य सुख-सुविधा से ऊपर है; करुणा, शील और मर्यादा ही मुक्ति-पथ की पहली वास्तविक सीढ़ी है।
यह खंड ‘त्याग + आज्ञापालन’ को केवल राजकीय निर्णय नहीं, साधना का सोपान बनाता है। नगर का शोक ‘लोक-मान्यता’ (जन-प्रेम) में बदलकर बताता है कि अवतार का अधिकार महल तक सीमित नहीं—पथ, ग्राम, और वन भी उसका धाम हैं। कंद-मूल-फल का प्रसंग प्रतीक है: इन्द्रिय-सुख का परित्याग ‘कठोरता’ नहीं, दृष्टि-परिवर्तन है—जहाँ सादगी अमृत बन जाती है। वाल्मीकि-आश्रम ‘वन = अंतर्मुखता’ का संकेत है: बाह्य यात्रा का लक्ष्य भीतर का आश्रम है, जहाँ निर्गुण-अगोचर सत्य सगुण-चरित के सहारे हृदय में प्रत्यक्ष होता है। समग्रतः करुणा का शोधन होकर वह मर्यादा, वैराग्य और शान्ति में प्रतिष्ठित होती है—यही धर्म-तत्व।
Verse 245 (चौपाई)
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।। जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।। इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।। एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।
अगर यह कंद-मूल और फल खाते हैं, तो विधि ने दुनिया में अमृत जैसा खाना भी बनाया। कुछ लोग कहते हैं, यह तो अपने आप ही इतने प्यारे हैं, विधि ने बनाया ही नहीं। वेदों ने जो कहा है, जो कान, आँख और दिल समझ सकता है, वो देखो। चारों दुनिया में खोज के देखो, ऐसा मर्द कहाँ, ऐसी औरत कहाँ? इन्हें देख के विधि का दिल भी लग गया। शादी के लायक बनाने की कोशिश की। बहुत मेहनत की, कुछ नहीं हुआ। फिर ईश के जंगल में ले जाकर छुपा दिया। कुछ कहते हैं, हम ज़्यादा नहीं जानते, खुद को बहुत भगवान-भाग्य मानते हैं। जो लोग इन्हें देखते हैं, वो लोग भी हमें पुण्य मानते हैं।
Verse 246 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
लोग ऐसे ही बात करते रहे, प्यार से सब बातें मान ली, आँखों में आँसू आ गए। लोग सोचने लगे कि इतना नरम बदन लेकर यह कैसे चलेंगे, रास्ता तो बहुत मुश्किल है।
Verse 247 (चौपाई)
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।। परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।। जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।। सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।
औरतें प्यार में पागल हो गई थीं, शाम के वक्त चकोर की तरह चमक रही थीं। उनके पैर इतने नरम थे कि उन्होंने सोचा रास्ता कैसे चलेंगे, बहुत टेढ़ा-मेढ़ा है। उनके लाल पैर ज़मीन पर लगते तो ज़मीन शरमाती थी, जैसे कोई हमारे दिल को छू गया हो। लोग बोलने लगे कि भगवान ने अगर यह जंगल दिया है तो फूलों का रास्ता क्यों नहीं बनाया। अगर ब्रह्मा से रास्ता माँगना है तो उन्हें आँखों में रख लो। जो लोग वक्त पर नहीं पहुँचे, उन्होंने सीता और राम को देखा नहीं। लोग सुन के परेशान हो गए कि भाई इतना चले गए, और कितना आगे बढ़ेंगे। फिर लोग तेज़ी से दौड़ कर देखने गए और खुशी से वापस आए, उन्होंने अपना जन्म सफल कर लिया।
Verse 248 (दोहा/सोरठा)
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।। होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।
औरतें, बच्चे और बूढ़े लोग अपना सीना पीट रहे थे और पछतावा रहे थे। लोग प्यार में इतना डूब गए थे कि जहाँ राम जा रहे थे, वहीं लोग चल पड़े।
Verse 249 (चौपाई)
गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।। कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।। ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।। सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।। राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।
हर गाँव में लोग बहुत खुश थे, राम को देख के जैसे चाँद को देख रहे हो। जो भी खबर सुनते थे, लोग राजा और रानी को दोष देते थे। लोग एक दूसरे से बोलते थे कि राजा बहुत अच्छा है, उसने हमें अपनी आँखों का लहू दिया। लोग आपस में सिंपल बातें करते थे, प्यार भरी। लोग बोलते थे कि माँ-बाप धन्य है जिन्होंने राम को जन्मा, धन्य है वो शहर जहाँ से वो निकले। धन्य है वो देश, पहाड़, जंगल और गाँव, जहाँ भी राम जाते हैं वो जगह धन्य है। ब्रह्मा ने उसे पैदा कर के खुश हो गया, वो सबका प्यारा है। राम और लक्ष्मण की कथा रास्ते और जंगल में फैल गई।
Verse 250 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।
ऐसे ही रघु कुल के सूरज लोगों को रास्ते में खुशी दे रहे थे। वो चले जा रहे थे, सीता और लक्ष्मण उनके साथ थे, जंगल को देखते हुए।
Verse 251 (चौपाई)
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।। बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।। प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।। सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।। राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।। खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।
आगे राम चल रहे थे, लक्ष्मण पीछे चल रहा था। दोनों तपस्वी भेस में थे। बीच में सीता खूबसूरत लग रही थी, जैसे माया, ब्रह्मा और जीव के बीच में होती है। मैं फिर से वो खूबसूरती बताऊंगा जो मेरे दिल में बसी है। जैसे मधु और मदन के बीच में रति चमक रही हो। एक और मिसाल बताऊंगा जो मुझे अच्छी लगती है। जैसे रोहिणी, चाँद और बुध के बीच में चमकती है। सीता राम के पैरों के निशान पर चल रही थी। धरती पर पैर रख के चल रही थी, बहुत इज्जत से। सीता ने राम के पैरों के निशान से रास्ता बनाया। लक्ष्मण दाईं तरफ चल रहा था। राम, लक्ष्मण और सीता का प्यार कितना खूबसूरत है। बताना मुश्किल है, शब्दों से परे है। चिड़िया और हिरन उनकी खूबसूरती देख के खो गए। राम और उसके साथी उनके दिल में बस गए।
Verse 252 (दोहा/सोरठा)
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।
जितने लोगों ने राम और लक्ष्मण को सीता के साथ देखा, वो लोग बहुत खुश हो गए। उनके लिए यह मुश्किल रास्ता आसान हो गया। थकावट भी नहीं हुई, बिल्कुल फ्रेश फील हुआ।
Verse 253 (चौपाई)
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।। राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।। तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।। तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।। देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।। राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।। सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।
जिसके दिल में कोई नहीं रहता, ना सपने में भी, उसके दिल में राम, लक्ष्मण और सीता हमेशा रहें। यह बन में घूमने वाले हैं। वही इंसान राम के घर का रास्ता पाता है। जो रास्ता किसी रिशि ने कभी पाया है। फिर रघुवीर ने देखा कि सीता थक गई है। पास में एक बड़ा पेड़ था, पानी भी था। वहीं आराम किया, कंद मूल और फल खाया। सुबह नहा के चले गए। सुंदर जंगल, पहाड़ी और झील देखते हुए वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे। राम ने देखा कि रिशि का आश्रम कितना सुंदर है। पहाड़ियाँ, जंगल और पानी सब अच्छा है। झील में कमल खिले थे, पेड़ फूल लगे थे। मधुमक्खियाँ गुंगुना रही थी, रस में खो गई थी। चिड़िया और जानवर आवाज़ कर रहे थे। बिना दुश्मनी के खुश चल रहे थे।
Verse 254 (दोहा/सोरठा)
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।
साफ और सुंदर आश्रम देख के राम खुश हो गए। रिशि ने सुना कि राम आ रहे हैं, तो वो स्वागत करने आगे आ गए।
Verse 255 (चौपाई)
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।। मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।। सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।। बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।। तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।। तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।। अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।
राम ने रिशि को प्रणाम किया। ब्राह्मण रिशि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। राम की खूबसूरती देख के रिशि की आँखें भर आई। उन्होंने इज्जत दी और आश्रम में ले आए। रिशि को मेहमान बहुत प्यारा लगा। उन्होंने मीठा फल, कंद मूल और शहद मंगवाया। सीता, लक्ष्मण और राम ने फल खाया। फिर रिशि ने उन्हें सुंदर आश्रम दिया। वाल्मीकि बहुत खुश थे। राम को देख के दिल खुश हो गया। राम ने हाथ जोड़े और बोला, तुम सुनो। आप तीनों वक्त देख सकते हो। पूरा दुनिया आपके हाथ में है जैसे एक फल। राम ने सारी बात बताई। कैसे वन रानी को दिया गया था, वो सब बता दिया।
Verse 256 (दोहा/सोरठा)
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
बाबा के बोल के लिए, माँ के भले के लिए, और भाई भरत के लिए, प्रभु, तुम्हे देखना ही सबसे बड़ा पुण्य है। यह मेरा सब काम आया।
Verse 257 (चौपाई)
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।। अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।। मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।। मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।। अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।। तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।। सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।। कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।
तुम्हारे चरण देख के, मुनि राजा, हमारे सारे अच्छे काम सफल हो गए। अब जहाँ तुम बोलो, वहाँ कोई मुनि को परेशानी नहीं होगी। जो तपस्वी रिशि दुख देते हैं, वो राजा को आग के बिना जला देते हैं। ब्राह्मण का गुस्सा इतना बड़ा होता है कि वो करोड़ कुल को बरबाद कर देता है। यह जान के बताओ कि मैं सीता और लक्ष्मण के साथ कहाँ जाऊँ। वहाँ मैं सुंदर पात की झोपड़ी बना के कुछ टाइम रहूँगा। राम की सिंपल बात सुन के वाइज़ मुनि ने कहा, "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।" तुम रघु कुल के हो, वेद का पुल तोड़ने वाले हो, ऐसा क्यों नहीं कहोगे?
Verse 258 (छंद)
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की।। जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।
हे राम, तुम वेद का पुल बचाते हो, तुम जग के मालिक हो, और जानकी तुम्हारी माया है। जो दुनिया बनाता है, चलाता है, और बरबाद करता है, वो कृपा के खजाने से मिलता है। जिसके हज़ार सिर हैं, जो नाग है, जो पहाड़ है, जो लक्ष्मण है, और सब चलती-चीज़ का मालिक है। देवता का काम करने के लिए इंसान का शरीर लेकर तुम निकले हो बुरा लोग और राक्षस को खत्म करने।
Verse 259 (दोहा/सोरठा)
राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह।।126।।
तुम्हारा रूप, राम, बोल से परे है और दिमाग से भी परे है। यह दिखता नहीं, बया नहीं जा सकता, और वेद हमेशा कहते हैं कि यह "नहीं, नहीं"।
Verse 260 (चौपाई)
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।। तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।। चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।। राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।
दुनिया तुम्हे देखने वाला समझती है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तुम्हे नचाते हैं। फिर भी वो तुम्हारा राज़ नहीं जानते। और और कौन तुम्हे जान सकता है? वोही जानता है जिसको तुम समझाओ। तुम्हे जानके इंसान तुम में मिल जाता है। तुम्हारी कृपा से ही, रघुनंदन, भक्त तुम्हे जानते हैं। तुम भक्त के दिल में चंदन हो। तुम्हारा शरीर सुख से भरा है, कोई दोष नहीं। तुम संत और देवता का काम करने के लिए इंसान बने हो। बोलना और करना ऐसे जैसे नॉर्मल राजा करता है। राम को देख के और उसकी कहानी सुन के, मूर्ख मोह में पड़ जाते हैं और वाइज़ खुश हो जाते हैं। तुम जो भी बोलो या करो, वो सच है। जैसे करना है, वैसे ही करना पड़ेगा।
Verse 261 (दोहा/सोरठा)
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।
आप मुझसे पूछ रहे हो कि मैं कहाँ रहूँ। मैं पूछने में शर्मा रहा हूँ। आप मुझे वो जगह बताओ जहाँ आप नहीं होंगे। मैं वहाँ अपना ठिकाना दिखा दूँगा।
Verse 262 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।। बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।। सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।। निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
मुनि के प्यार भरे बात सुन के राम अंदर ही मुस्कुरा दिए। वाल्मीकि हँस के फिर बोले, उनकी बात मीठी थी जैसे शहद। सुनो राम, मैं अब तुम्हे बताता हूँ कहाँ रहना। सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ बसो। जिनके कान समुंदर जैसे हैं, तुम्हारी कहानी उनमें नदियों की तरह भरती है। वो कभी भरते नहीं। उनके दिल में तुम्हारा घर है। जिनकी आँखें तुमने प्यास भरी हैं, वो तुम्हे देखने के इंतज़ार में रहते हैं। वो नदिया, समुंदर, तालाब सब छोड़ा करते हैं। तुम्हारे चेहरे की एक बूँद से ही खुश हो जाते हैं। उनके दिल का घर सुख देता है। वहाँ रहो भाई, सीता के साथ, रघु के बेटे।
Verse 263 (दोहा/सोरठा)
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।
तुम्हारी कीर्ति एक साफ़ हंसी है जो मन के ताल से गुणों के मोती चुनती है। राम, उसके दिल में बसो।
Verse 264 (चौपाई)
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।। तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।। सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।। चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।। तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
भगवान का प्रसाद साफ़ है, सुंदर है, खुशबू वाला है। वो उसे नाक से इज़्ज़त से लेते हैं। पहले तुम्हे खिलाके खाते हैं। प्रसाद को कपड़ा और गेहना बना पहनते हैं। देवता, गुरु, ब्राह्मण को देख के सर झुकाते हैं। प्यार से बिनया करते हैं। हाथ से राम के चरण की पूजा करते हैं। दिल में सिर्फ़ राम पर भरोसा रखते हैं। राम के चरण की तीरथ पर जाते हैं। राम उनके मन में बसो। तुम्हारा मंत्र रोज़ जपते हैं। तुम्हे अपने परिवार के साथ पूजते हैं। तर्पण, होम जैसे कर्म करते हैं। ब्राह्मण को खिलाके बहुत दान देते हैं। गुरु को तुमसे भी बड़ा मानते हैं। सब तरह से इज़्ज़त से सेवा करते हैं।
Verse 265 (दोहा/सोरठा)
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।।129।।
सब कुछ करके वो एक ही चीज़ माँगते हैं। राम के चरण में प्यार हो। उनके मन के मंदिर में दोनों बसो, सीता और रघु के बेटे।
परंपरा में इसे ‘दर्शन-माहात्म्य’ खंड माना जाता है: राम-सीता-लक्ष्मण के वन-पथ-दर्शन का वर्णन सुनने/पढ़ने से मन में प्रेम-वैराग्य जागता है, तीर्थ-भाव (चरन-तीरथ) और साधु-संग की रुचि बढ़ती है, तथा ‘हृदय-आश्रम’ में राम-निवास की आकांक्षा दृढ़ होती है—यही इसका मुख्य पुण्य-फल कहा जाता है।
अनेक रामानंदी/मानस-परंपराओं में सामान्य राम-नाम समपुट लिया जाता है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम’—विशेषकर दोहा 126–129 (राम की अगोचरता और भक्त-हृदय-निवास) के साथ। कुछ पाठ-परंपराएँ ‘राम’ नाम का एक-एक समपुट प्रत्येक दोहा के आरंभ/अंत में जोड़कर जप-लय बनाती हैं।
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