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यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘अन्तः-राज्य’ का द्वार है: राजसुख के बीच राम-धर्म का चुनाव, और फिर वन-जीवन में भी ‘अयोध्या’ (अन्तर-नगर) की स्थापना। प्रस्तुत अंश में सोपान-गति स्पष्ट है—पहले ‘भक्त-लक्षण’ (अहंकार, काम-क्रोध-लोभ आदि का क्षय) का निरूपण, फिर ‘सत्संग-निर्देश’ (चित्रकूट-निवास), और अंततः ‘प्रकृति का रूपान्तरण’ (वन का मंगलमय हो जाना) जो संकेत करता है कि भगवान के सान्निध्य से बाह्य जगत भी साधना-क्षेत्र बन जाता है।
यह प्रकरण ‘त्याग-धर्म’ को बाह्य परित्याग से आगे ले जाकर ‘अन्तः-राज्य’ (चित्त-राज्य) की स्थापना बनाता है। ‘भक्त-लक्षण’ सूची मनोविज्ञान का साधना-शास्त्र है: काम-क्रोध-मद-मान-मोह, लोभ-छोभ, राग-द्रोह का क्षय = अहं-केन्द्र से राम-केन्द्र की ओर संक्रमण। पर-नारी को जननी समान देखना और पर-संपत्ति/पर-विपत्ति पर समभाव—समदृष्टि का सामाजिक रूप है, जहाँ नैतिकता मुक्ति-मार्ग का अनुशासन बनती है। चित्रकूट/मंदाकिनी ‘तीर्थ-भूगोल’ नहीं, ‘साधना-भूगोल’ है—जहाँ सत्संग, प्रकृति-समता और शरणागति एक प्रयोगशाला की तरह चित्त को निर्मल करते हैं। कोल-किरातों का प्रेम और वन का मंगलमय होना संकेत देता है कि भगवान का सान्निध्य केवल व्यक्ति नहीं, समाज और प्रकृति—तीनों का ‘धर्म-परिवर्तन’ कर देता है; बाह्य वन, भीतर का वन (वासनाएँ) बनकर शुद्धि का क्षेत्र बन जाता है।
Verse 266 (चौपाई)
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।। जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
जिनके अंदर न कोई काम है, न गुस्सा, न अहंकार, न दिखावा। न लोभ है, न डर, न अटैचमेंट, न किसी से दुश्मनी। जिनका दिल में न कोई धोखा है, न दिखावा, न माया। उनके दिल में राम बसेंगे। जो सबसे प्यारे हैं और सबका भला चाहते हैं। दुख और सुख में बराबर रहते हैं, तारीफ या गाली दोनों से दूर। सच बोलते हैं और अच्छे से सोच के बात करते हैं। जागते हैं या सोते हैं, तुम्हारी शरण में रहते हैं। तुम्हे छोड़ के कोई और रास्ता नहीं है। राम उनके मन में बसेंगे। दूसरी औरतों को माँ जैसा मानते हैं। दूसरों का पैसा ज़हर से भी बुरा मानते हैं। जो दूसरों की खुशी देख के खुश होते हैं। और दूसरों के दुख में दुखी होते हैं। जिनके लिए राम सबसे प्यारे हैं, उनके मन में तुम्हारा घर बनेगा।
Verse 267 (दोहा/सोरठा)
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।
जिनके लिए स्वामी, दोस्त, बाप, माँ, गुरु सब तुम ही हो। उनके मन के मंदिर में तुम बसना। सीता और तुम्हारा भाई दोनों उनके दिल में रहना।
Verse 268 (चौपाई)
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।। नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।। गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।। जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।। सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।
जो दूसरों की गल्तियाँ छोड़ के उनकी अच्छाई पकड़ते हैं। ब्राह्मण और गाय के लिए तकलीफ सहते हैं। दुनिया के रास्ते चलते हैं और समझदार हैं। उनका मन तुम्हारे घर में लगा रहता है। तुम्हारी अच्छाई अपनी मानते हैं और अपनी गल्तियाँ मानते हैं। हर तरह से तुमपे भरोसा रखते हैं। राम के भक्त उन्हें प्यारे लगते हैं। उनके दिल में सीता के साथ बसना। जात-पात, पैसा, धरम, बड़ी बातें, परिवार, घर, सुख सब छोड़ देते हैं। सिर्फ तुम्हे दिल में रखते हैं। उनके दिल में राम रहते हैं। स्वर्ग, नरक, मोक्ष सब बराबर है। जहाँ देखो वही ध्यान रखते हैं। काम, बात, मन सब तुम्हारा है। राम उनके दिल में घर बनाते हैं।
Verse 269 (दोहा/सोरठा)
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।
जो कभी तुमसे कुछ माँगते नहीं। बस दिल से प्यार करते हैं बिना किसी शर्त के। उनके मन में हमेशा तुम रहो। वही तुम्हारा असली घर है।
Verse 270 (चौपाई)
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।। कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।। चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।। सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।। नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।। सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।। अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।। चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।
मुनि ने अपना आश्रम दिखाया। प्यार से बात की और राम को अच्छा लगा। मुनि ने कहा, सुनो सूर्यवंशी के राजकुमार। मैं तुम्हे एक ऐसा आश्रम बताता हूँ जहाँ इस समय रहना अच्छा है। चित्रकूट पर्वत पर रहो। वहाँ सब कुछ ठीक रहेगा। पहाड़ सुंदर है, जंगल अच्छा है। हाथी, शेर, हिरण, चिड़ियाँ सब खेलते हैं। नदी पवित्र है, पुरानी किताबों में लिखी है। अत्रि ऋषि की पत्नी ने अपने तप से लाई थी। इसका नाम मंदाकिनी है। यह सब पाप धोकर ले जाती है। अत्रि और दूसरे बड़े ऋषि वहाँ रहते हैं। योग, जप, तप करते हैं। चलो तुम्हारा काम पूरा होगा। राम, इस पहाड़ को अपना घर बना लो।
Verse 271 (दोहा/सोरठा)
चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ। आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।
बड़े रिशि ने चित्रकूट की बहुत बड़ाई गाई। फिर राम, सीता और लखन, यह दोनों भाई, वहाँ आए और नदी में नहाए।
Verse 272 (चौपाई)
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।। लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।। नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।। चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।। अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।। रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।। कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।। बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।
राम ने लखन से कहा कि यहाँ अच्छी जगह है, यहीं कहीं बसे कर लेते हैं। लखन ने देखा और अच्छी जगह चुनी। वो चारों तरफ घूमा जैसे धनुष के साथ इंद्रधनुष होता है। नदी, तालाब, पेड़ों की छाँव, पानी और जंगल, सब अच्छा था। यहाँ आके कलि युग की सारी बुराई दूर हो जाती थी। चित्रकूट ऐसा लग रहा था जैसे एक शिकारी जो कभी चूकता नहीं, दुख और तकलीफ को मार देता है। ऐसा बोल के लखन ने जगह दिखाई। ज़मीन देख के राम को सुकून मिला। राम के मन में खुशी आई। देवताओं को पता चल गया और वो चले गए, देवताओं के सरदार के साथ। कोल और किरात लोग भी वहाँ आए। उन्होंने पत्तों से अच्छे-अच्छे घर बनाए। दो हॉल इतने सुंदर थे कि बताना मुश्किल है, एक छोटा और प्यारा, दूसरा बड़ा और खुला।
Verse 273 (दोहा/सोरठा)
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।
लखन और जानकी के साथ प्रभु उस प्यारे घर में चमके। वो ऐसा लग रहा था जैसे प्यार का देवता बना हो, रिशि का भेस पहने, रति और ऋतु का राजा उसके साथ खड़ा हो।
Verse 274 (चौपाई)
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।। राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।। बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।। करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।। चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।। आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।। मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।। सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।
उस वक़्त देवता, नाग, किन्नर और चारों दिशा के रक्षक चित्रकूट आए। सबने राम को प्रणाम किया। देवता खुश थे क्योंकि उन्होंने राम को देख लिया। फूल बरसाते हुए देवता बोले कि आज हम धन्य हो गए। अपनी-दुख की बात बताके वो खुश होके अपने घर चले गए। जब रघु कुल का चाँद चित्रकूट में बसे, तो सुन-सुन के रिशि वहाँ आए। रिशियों की टोली ने उन्हें देख के खुशी हुई और उनका प्रणाम किया। रिशियों ने राम को दिल से लगा लिया और आशीर्वाद दिया कि सब काम सफल हो। सीता, लखन और राम की खूबसूरती देख के वो बोले कि अब हमारी साधन पूरी हो गई।
Verse 275 (दोहा/सोरठा)
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद। करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।
प्रभु ने रिशियों की टोली का सही सम्मान किया और उनका विदाई किया। वो सब अपने-आश्रम वापस गए, मन खुश कर के, वहाँ जाके योग, जप और तप करते हैं।
Verse 276 (चौपाई)
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।। कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।। तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।। कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।। करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।। चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।। राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।। प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।
कोल और किरात लोगों को यह खबर मिली। वो इतने खुश हुए जैसे उनके घर नयी खजाना आ गयी हो। उन्होंने अपनी टोकरियाँ कंद, मूल और फल से भर ली। फिर चले गए जैसे कोई गरीब सोना लूटने जा रहा हो। जिन लोगों ने रघुकुल के दोनों भाइयों को देखा, उनसे रास्ता पूछा। सब रघुकुल के स्वामी के बारे में सुन-सुन के आए। फिर सबने राम जी को देखा। हाथ जोड़ के उनके सामने झुके। प्रभु को बड़े प्यार से देखा। वो वहाँ-कहाँ खड़े हो गए जैसे कोई फोटो हो। उनका शरीर खुशी से काँप गया और आँखों में पानी आ गया। सब राम के प्यार में डूब गए। राम ने प्यार से बात की और सबकी इज्जत की। बार-बार हाथ जोड़ के प्रभु को प्रणाम किया। और झुक के नरम-नरम बात की।
Verse 277 (दोहा/सोरठा)
अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।
अब प्रभु, आपके चरण देख के हम सबको एक मालिक मिल गया। कोसल के राजा, हमारा यहाँ आना बहुत भाग्य वाली बात हुई।
Verse 278 (चौपाई)
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।। धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।। हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।। कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।। हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।। बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।। तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।। हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।
धन्य है वो ज़मीन, बन का रास्ता और पहाड़ जहाँ-जहाँ आपने पाँव रखे। धन्य है वो चिड़िया और हिरण जो जंगल में घूमते हैं। उनका जन्म सफल हो गया क्योंकि उन्होंने आपको देख लिया। हम सब अपने परिवार के साथ धन्य हैं। आपका दर्शन देख के हमारी आँखें भर गई। हमने सोच-विचार के एक अच्छा जगह बस लिया है। यहाँ हम हर ऋतु में खुश रहेंगे। हम हर तरह से आपकी सेवा करेंगे। शेर, साँप और बाघ सब पकड़ लेंगे। जंगल, पहाड़ और गुफा सब हमारे हैं। हर कदम पर आपके चरणों को प्रणाम करते हैं। वहाँ-वहाँ आपको शिकार खिलाएंगे। तालाब, झरना और पानी के जगह दिखाएंगे। हम आपके सेवक हैं, पूरा परिवार लेकर। प्रभु, आप हुकुम देने में मत शर्माएँ।
Verse 279 (दोहा/सोरठा)
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।
वेद के बोल और रिशियों के मन भी प्रभु की दया को नहीं पा सकते। किरात लोगों की बात सुन के प्रभु खुश हो गए। जैसे बाप अपने बच्चे की बात सुन के खुश होता है।
Verse 280 (चौपाई)
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।। राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।। बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।। एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।। जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।। फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।। सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।। गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।
समझो कि राम सिर्फ प्यार से प्यार करते हैं। जो यह जानते हैं, वो इसे अपने मन में रखें। फिर राम ने जंगल के सब जीवों को खुश कर दिया। नरम बात बोल के और प्यार से उनका ख्याल रखा। सिर झुका के उनसे विदा ली। प्रभु के गुण गाते-गाते घर चले गए। इस तरह सीता के साथ दोनों भाई जंगल में रहने लगे। देवता और रishi सब खुश थे। जिस दिन रघुकुल के स्वामी वहाँ आए, उस दिन से बन मंगल हो गया। पेड़-फूल फलने लगे, अनेक तरह से। सुंदर बेल-पत बन गए जैसे छाँव की छत। स्वर्ग के पेड़ जैसा लगने लगा। मानो देवता अपने बाग छोड़ के आए हो। एक के बाद एक सुंदर कुंजियाँ बनी। मधुमक्खियाँ गूँजने लगी। तीन तरह की हवा चलती थी जो सुख देती थी।
Verse 281 (दोहा/सोरठा)
नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर। भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।
नीलकंठ, कलकंठ, तोता, चातक, चक्वा और चकोर, यह सब पक्षी अलग-अलग तरह से बोलते हैं। उनकी आवाज़ कान को सुख देती है और दिल चुरा लेती है।
Verse 282 (चौपाई)
केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।। फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।। बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।। सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।। सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।। उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।। सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।। बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।
मोर, बाघ, बंदर, सूअर और हिरण, यह सब दुश्मनी छोड़ के साथ-साथ घूमते हैं। जब यह घूमते हुए राम की खूबसूरती देखते हैं, हिरण के झुंड खुश हो जाते हैं। जहाँ भी कोई पवित्र जंगल है दुनिया में, राम को देख के सब खुश हो जाते हैं। गंगा, यमुना, सूर्य-पुत्री, मेरु-पुत्री और गोदावरी, यह सब धन्य हैं। सारे ताल, समुंदर, नदियाँ मंदाकिनी की तारीफ करती हैं। उदय और अस्त गिरि, कैलाश, मंदर, मेरु और देवताओं के सब घर, हिमालय और बाकी सब पहाड़ चित्रकूट की महिमा गाते हैं। विधि खुशी से भरा हुआ, बिना मेहनत किये बड़ी बड़ाई पा गया।
Verse 283 (दोहा/सोरठा)
चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।
चित्रकूट के पक्षी, हिरण, बेल, पेड़ और घास, यह सब दिन-रात कहते हैं कि हमने बहुत पुण्य किया है, हम धन्य हैं।
Verse 284 (चौपाई)
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।। परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।। सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।। महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।। पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।। कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।। सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।। सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।
जिनके पास आँखें हैं, वो रघुकुल के सबसे बड़े को देख के जनम का फल पा जाते हैं और दुख दूर हो जाता है। उसके चरण की धूल को छू के अचल लोग भी खुश हो जाते हैं और वो भी परम पद के अधिकारी बन जाते हैं। वो जंगल और पहाड़ अपने आप में सुंदर है, मंगल से भरा है, सबसे ज़्यादा पावन है। उसकी महिमा कैसे बताएँ? वहाँ सुख के समुंदर ने रहना किया था। अयोध्या छोड़ के, क्षीर समुंदर भी छोड़ के, जहाँ सीता, लक्ष्मण और राम रहने आए। उस जंगल की खूबसूरती कोई नहीं बता सकता, अगर हज़ारों ब्रह्मा भी हो जाएँ। मैं कैसे बताऊँ? कछुआ उठाऊँ या मंदर पहाड़ उठाऊँ। लक्ष्मण अपने शरीर, मन और वाणी से उसकी सेवा करता है, उसका शील और प्यार बताया नहीं जा सकता।
Verse 285 (दोहा/सोरठा)
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।
हर पल सीता राम के चरणों को देखती थी, अपना प्यार समझ के। लक्ष्मण ने सपने में भी कभी अपने आप को, अपने दिल को, अपने माता-पिता को या घर को नहीं सोचा।
परंपरागत मान्यता के अनुसार दोहा 130–131 के ‘भक्त-लक्षण’ का पाठ/श्रवण चित्त-शुद्धि, परदोष-दर्शन से निवृत्ति, और शरणागति की दृढ़ता देता है; चित्रकूट-प्रसंग (132–139) का पाठ ‘तीर्थ-स्मरण’ के समान पुण्यकारी माना जाता है और गृहस्थ/वनस्थ दोनों के लिए ‘राम-निवास’ (मन में) की सिद्धि का साधन कहा जाता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में शरणागति-प्रधान संपुट जोड़ा जाता है: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम रामेति रामेति…’ (नाम-संपुट) — विशेषतः दोहा 131 के बाद, क्योंकि वहीं ‘बसहु निरंतर तासु मन’ का शरण-निष्कर्ष आता है।
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