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त्याग-दीक्षा का सोपान: राजसुख-सम्पदा के मध्य ‘धर्म’ की पुकार, और ‘वियोग’ के भीतर ‘राम-पद-नेह’ का जागरण। यहाँ गृहस्थ-व्यवस्था (राजधर्म, पितृवचन, कुलमर्यादा) और परमार्थ (वैराग्य, विवेक, भक्ति) का निर्णायक संगम होता है—भक्त के भीतर ‘मोह-निद्रा’ टूटती है और वन-गमन ‘अन्तर-वन’ की साधना बनता है।
यह खण्ड ‘रात्रि-प्रसंग’ को ‘मोह-निशा’ का रूपक बनाकर दिखाता है: देह-शयन के बीच चेतना का जागरण आवश्यक है। लक्ष्मण का प्रहरी-भाव साधक के भीतर के ‘विवेक-रक्षक’ का प्रतीक है—जो विषय-आकर्षण, भय, और शोक के अँधेरे में भी राम-मार्ग की रक्षा करता है। ‘कछुक दूर सजि बान…’ जैसे संकेत त्याग को निष्क्रिय विरक्ति नहीं, बल्कि सजग धर्म-यात्रा बनाते हैं: साधना में शस्त्र ‘बाह्य’ नहीं, ‘अन्तःकरण’ की दृढ़ता है। यहाँ तुलसी का सिद्धान्त-संगम उभरता है—राम ब्रह्म-रूप होकर भी करुणा से मनुज-चरित करते हैं; इसी से भक्त का वियोग भी ‘राम-पद-नेह’ में पकता है। गृहस्थ-व्यवस्था (राजधर्म/पितृवचन/कुलमर्यादा) और परमार्थ (वैराग्य/विवेक/भक्ति) का निर्णायक संगम यही है: त्याग पीड़ा देता है, पर वही पीड़ा शान्ति और मुक्ति-पथ का द्वार खोलती है।
Verse 184 (चौपाई)
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।। कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।। गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।। आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।। सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।। तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।। भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।। मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।
लक्ष्मण उठा जब वो समझा कि राम सो रहे हैं। उसने मंत्री को आराम करने को कहा। उसने धन और बाण लिया और थोड़ा दूर जाकर बैठ गया। वो जागने लगा। गुह ने एक नाव वाले को बुलाया जिस पर उसको भरोसा था। उसने उसे जगह-जगह पर रख लिया। लक्ष्मण खुद पास जाकर बैठ गया, कमर में बाण और हाथ में धन। राम को सोते हुए देख कर निषाद का दिल भर गया। उसके शरीर में रोमांच आया, आँखों से आँसू आ गए। उसने लक्ष्मण से प्यार से कहा, राजा का महल कितना अच्छा है, इंद्र के घर से भी ज़्यादा। उसके बालकनी में नग हैं, मानो किसी ने अपने हाथ से बनाया हो।
Verse 185 (दोहा/सोरठा)
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास। पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।
वहाँ सब साफ और सुंदर था। फूलों की खुशबू थी, अच्छा बिस्तर था, दिए जल रहे थे। सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट था।
Verse 186 (चौपाई)
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।। तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।। ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।। मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।। जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।। पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।। रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।। सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।
अलग-अलग कपड़े और तकिए लगाए गए थे। दूध जैसा सफेद झाग, नरम और साफ, सब अच्छा लग रहा था। वहाँ सीता और राम रात को सोते रहे। उनकी खूबसूरती इतनी थी कि प्यार का भगवान भी देख के मदहोश हो गया। दोनों सीता और राम एक ही बिस्तर पर सोए। उनके कपड़े में पद गए थे, फिर भी उन्होंने बदलने की कोशिश नहीं की। माँ, बाप, रिश्तेदार, शहर के लोग। दोस्त, अच्छे लोग, नौकर और नौकरानी। जिन्हें वो अपनी जान से भी प्यारा रखते थे, उस ज़मीन पर भगवान राम सोए। सीता के बाप जनक हैं, दुनिया में सब जानते हैं उनकी बात। ससुर देवताओं के राजा हैं, दोस्त रघु कुल के स्वामी हैं। रामचंद्र विदेह की बेटी के पति हैं। वो ज़मीन पर सोई हुई थी, कोई उसके बराबर नहीं था। लोग बोलते हैं, कर्म ही सबसे बड़ा है, यह सच है।
Verse 187 (दोहा/सोरठा)
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।
कैकेयी की बेटी ने बहुत बुरे काम किए। उसने धोखा और चालाकी से काम लिया। इससे उसने राम और सीता की खुशी के वक़्त भी दुख दे दिया।
Verse 188 (चौपाई)
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।। भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।। बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।। काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।। जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।। जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।। धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।। देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
वो सूरज वंश के पेड़ का आरी बन गई। उसकी बुरी बात से पूरा दुनिया दुखी हो गया। निषाद को बहुत दुख हुआ। उसने देखा कि राम और सीता ज़मीन पर सो रहे हैं। लक्ष्मण ने मधुर और नरम आवाज़ में कहा। उसमे ज्ञान, वैराग्य और भक्ति सब था। कोई भी किसी को खुशी या दुख नहीं देता। भाई, तुम अपने करम का फल खुद भोगते हो। मिलना, अलग होना, सुख, दुख, अच्छा, बुरा। सब माया के फंदे हैं। जनम और मरण, जब तक दुनिया चलता है। धन और दुख, करम और वक़्त की बात है। ज़मीन, घर, पैसा, शहर और परिवार। स्वर्ग और नरक, जब तक दुनिया चलता है। जो भी देखो, सुनो या सोचो मन में। माया की जड़ में कोई असली फायदा नहीं है।
Verse 189 (दोहा/सोरठा)
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।
सपने में राजा भिखारी बन सकता है, और भिखारी राजा बन सकता है। जब वो उठता है, न फायदा होता है न नुकसान। यह दुनिया भी वैसे ही है, मन को फंसाती है।
Verse 190 (चौपाई)
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।। मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।। जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।। होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।। सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।। राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।। सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।
ऐसे सोच के गुस्सा नहीं करना चाहिए। किसी को भी बेवजह दोष नहीं देना चाहिए। सब लोग माया की रात में सो रहे हैं। वो अनेक तरह के सपने देख रहे हैं। इस दुनिया में सिर्फ योगी जागते हैं। सच्चाई ढूंढने वाले लोग दुनिया से अलग हो जाते हैं। तब जान के जीव दुनिया में जागता है, जब वो खुशी और सुख से दूर होता है। जब समझ आती है और माया भाग जाती है, तब राम के चरणों में प्यार आता है। दोस्त, यह सबसे बड़ा फायदा है। मन, काम और बात से राम के चरणों में प्यार करना। राम ही परम सत्य है, वो सबसे बड़े फायदा का रूप है। वो दिखता नहीं, शुरू से है, कोई उसके जैसा नहीं। वो सब बुरी बातों से मुक्त है, कोई भेद नहीं। वेद भी कहते हैं, वो ऐसा नहीं है, वो वैसा नहीं है।
Verse 191 (दोहा/सोरठा)
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
भगवान, आप बहुत दयालु हैं। भक्तों, दुनिया, भगवान और गायों के लिए आप इंसान का शरीर लेके आए। आप यह सब खेल दिखाते हैं। जब लोग आपकी बात सुनते हैं, तो दुनिया के सारे जाल टूट जाते हैं।
Verse 192 (चौपाई)
सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।। कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।। सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।। अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।। हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।। नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।। बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।। लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।
दोस्त, यह समझ के मोह छोड़ दो। सीता और राम के चरणों में लग जाओ। राम के गुण गाते-गाते रात निकल गई। सुबह हुई और दुनिया खुश हो गई। राम ने नहा-धोके सब चिंता छोड़ दी। सुमंत्र ने बरगद के पेड़ को दूध से सिंचा दिया। राम और लक्ष्मण ने जटा बनाई। यह देखके सुमंत्र की आँखों में पानी आ गया। उसका दिल जल रहा था, चेहरा उतर गया था। उसने हाथ जोड़के बहुत विनम्रता से कहा। प्रभु, अयोध्या के राजा, रथ लेके राम के साथ जाओ। उन्हें जंगल और गंगा दिखाके लाओ। जल्दी से दोनों भाइयों को वापस लाओ। लक्ष्मण, राम और सीता सबको वापस लाओ। सब शक दूर कर दो।
Verse 193 (दोहा/सोरठा)
नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।
राजा ने कहा, प्रभु, आप जो कहोगे वही करूँगा। उसने विनती की और उनके चरणों में गिर गया। बच्चे की तरह रोने लगा।
Verse 194 (चौपाई)
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।। मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।। सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।। रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।। धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।। मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।। संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।। तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।
पिता, ऐसा कृपा करो कि अयोध्या अनाथ न हो। राजा ने राम को उठाया और कहा, पिता, आपने धरम के सब काम देखे हैं। शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चंद्र ने धरम के लिए करोड़ तकलीफें सहें। रंतिदेव और बलि जैसे बड़े राजा भी धरम पकड़े और बहुत संकट सहे। धरम के बराबर सिर्फ सत्य है। यह शास्त्रों और वेदों में लिखा है। मैं यह धरम आसानी से पा गया। अगर छोड़ूँगा तो तीनों दुनिया में बदनामी होगी। जहाँ इज्जत थी वहाँ बदनामी मरने से भी बुरी है। पिता, आपसे और क्या कहूँ? आपका कहना मानूँगा तो पाप लगेगा।
Verse 195 (दोहा/सोरठा)
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि। चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
मैं पिता के चरणों को पकड़के करोड़ प्रणाम करता हूँ। हाथ जोड़के विनती करता हूँ। पिता, किसी बात की चिंता मत करो। मेरा दिल मत दुखाओ।
Verse 196 (चौपाई)
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।। सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।। सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।। पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।। सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।। कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।। जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।। नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।
तुम मेरे लिए पिता जैसे हो, बहुत प्यारे हो। हाथ जोड़ के कहता हूँ, बाप जैसे। जो तुम्हारा काम है वो करो, ऐसा करो कि मेरे बाप को दुख न हो। जब रघुनाथ और सचिव की बात सुनी, निषाद और उसके परिवार लोग बहुत दुखी हो गए। फिर लक्ष्मण ने कुछ कड़वी बात कही। प्रभ ने उन्हे रोका, यह गलत समझ के। राम ने शर्मा के उनसे कसम खिलाई। लक्ष्मण, संदेश दे के मत जाओ। सुमंत्र ने राजा से फिर कहा, सीता जंगल के दुख को सहन नहीं कर पायेगी। जिस तरह सीता अयोध्या वापस आए, वो आपको करना होगा। नहीं तो मैं बिल्कुल अकेला हो जाऊँगा, मैं जिऊँगा नहीं, जैसे पानी के बिना मछली नहीं जिती।
Verse 197 (दोहा/सोरठा)
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।। तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
माइके और ससुराल में सब सुख है जहाँ मेरा मन खुश रहता है। वहाँ सीता तब तक खुश रहेगी जब तक यह मुसीबत खत्म नहीं होती।
Verse 198 (चौपाई)
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।। पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।। सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।। सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।। प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।। प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।। पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।। तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।
राजा ने ऐसे बिनती की, उसका दुख और प्यार बताया नहीं जा सकता। बाप का संदेश सुन कर, दया के सागर ने सीता को बहुत समझाया। सास, ससुर, गुरु और परिवार सब प्यारे हैं। तुम वापस आ जाओ तो सब का चिंता मिट जाएगा। पति के बात सुन कर सीता बोली, सुनो मेरे प्राणपति, मेरे प्यारे। प्रभ दयालु हैं और समझदार हैं। शरीर छोड़ के छाया कैसे रह सकती है? सूरज के बाद उजाला कहाँ जाता है? चाँद के बाद चाँदनी कहाँ जाती है? उसने पति से प्यार से बिनती की, सचिव से अच्छी बात कही। तुम मेरे पिता और ससुर जैसे हो, मेरे भलाई चाहते हो। मैं जवाब देता हूँ, यह थोड़ा गलत है।
Verse 199 (दोहा/सोरठा)
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
मैं बहुत दुखी होके आपके पास आया हूँ, मुझे मत भगाओ बाप। दशरथ पुत्र के चरण कमल के बिना मैं जिऊँगा नहीं, जान तक नहीं बचेगी।
Verse 200 (चौपाई)
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।। सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।। ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।। ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।। बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।। अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।। कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।
मैंने अपने बाप की दौलत और शौक देखा है। उसके पाँव मति और मोती जड़े आसन पर थे। मेरे बाप का घर सुख का खजाना है। लेकिन अब मेरे प्यारे के बिना मेरा मन खुश नहीं होता। मेरा ससुर कोसल का राजा है, चौदह दुनिया में उसकी बड़ाई है। देवता के राजा ने उस्से आगे बुलाया और आधा सिंहासन दिया। मेरा ससुर अयोध्या में रहता है, प्यारा परिवार है, सास माँ जैसी है। रघुपति के चरण कमल के रज के बिना मुझे सपने में भी सुख नहीं लगा। जंगल का रास्ता मुश्किल है, पहाड़, हाथी, शेर, झील और बड़ी नदियाँ हैं। कोल, किरात, हिरन और चिड़ियाँ, सब मुझे खुश करते हैं जब मेरे प्राणपति मेरे साथ हैं।
Verse 201 (दोहा/सोरठा)
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।। मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
मैं अपने ससुर और सास के पास जाके उनके पाँव पकड़ूँगी। उनसे बिनती करूँगी कि मुझे माफ कर दें। मेरे लिए चिंता मत करो। मैं जंगल में खुश रहूँगी, यह मेरा स्वभाव है।
Verse 202 (चौपाई)
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।। नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।। सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।। नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।। राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।। जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।। मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।। राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।
मेरे प्राण प्यारे, मेरे देवर मेरा साथ दे रहे हैं। वो बहादुर वीर हैं, हाथ में धनुष लिए चल रहे हैं। रास्ते में न थकावट होगी, न भटकना होगा, न दिल में दुख होगा। मेरे लिए तुम चिंता मत करना। सीता की यह बात सुनके सुमंत्र बहुत दुखी हो गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी जान ली हो। उसकी आँखें देख नहीं पा रही थीं, कान सुन नहीं पा रहे थे। कुछ बोल नहीं पा रहा था, बहुत परेशान था। उसने राम को बहुत समझाया, पर उसका दिल नहीं माना। उसने बहुत कोशिश की, अच्छा सलाह दी। रघुकुल के पुत्र ने सही जवाब दिया। पर राम का फैसला नहीं बदला। उनका इरादा पक्का था। राम, लक्ष्मण और सीता ने उसके पाँव सर लगाए। वो वापस गया जैसे कोई सौदागर सब कुछ हार के वापस जाता है।
Verse 203 (दोहा/सोरठा)
-रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।
राम ने रथ चलाया और बार-बार सुमंत्र को देखते रहे। सुमंत्र रो रहा था। निषाद को देख के जो दुखी हो रहा था, वो अपना सर पकड़ के पछता रहे थे।
परम्परागत मान्यता अनुसार इस खण्ड का पाठ ‘मोह-भ्रम’ शान्त करता है, वैराग्य-विवेक जगाता है, और ‘राम-पद-नेह’ दृढ़ करता है—विशेषतः गृहस्थ-धर्म में रहकर भी त्याग-बुद्धि और शरणागति की सिद्धि देता है (लक्ष्मण-उपदेश: ‘जागें लाभु न हानि…’ तथा ‘मन क्रम बचन राम पद नेहू’ के भावानुसार)।
सामान्य मानस-परम्परा में इस प्रकार के वैराग्य/शरणागति प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम) का संकीर्तन-सम्पुट प्रचलित है; कुछ पाठ-परम्पराओं में ‘राम रामेति रामेति…’ नाम-सम्पुट भी जोड़ा जाता है (स्थानीय संप्रदाय/पाठ-रीति अनुसार)।
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