त्याग-दीक्षा का सोपान: राजसुख-सम्पदा के मध्य ‘धर्म’ की पुकार, और ‘वियोग’ के भीतर ‘राम-पद-नेह’ का जागरण। यहाँ गृहस्थ-व्यवस्था (राजधर्म, पितृवचन, कुलमर्यादा) और परमार्थ (वैराग्य, विवेक, भक्ति) का निर्णायक संगम होता है—भक्त के भीतर ‘मोह-निद्रा’ टूटती है और वन-गमन ‘अन्तर-वन’ की साधना बनता है।
अयोध्या काण्ड का रस-आधार करुण और शान्त का अद्वैत-संयोग है: करुण इसलिए कि ‘धर्म’ की विजय भी हृदय को चीरती हुई आती है, और शान्त इसलिए कि वही पीड़ा विवेक बनकर मुक्ति-पथ खोलती है। प्रस्तुत अंश में रात्रि-प्रसंग (सीय-राम का शयन, लक्ष्मण का प्रहरी-भाव, निषाद का प्रेम-विषाद) ‘मोह-निशा’ का रूपक बन जाता है। लक्ष्मण का उपदेश कर्म-फल, स्वप्न-जागरण, विषय-विराग और राम-पद-नेह की ओर ले जाता है—यहाँ तुलसी का सिद्धान्त-गोंद (निर्गुण-परमार्थ और सगुण-लीला) स्पष्ट है: राम ब्रह्म-रूप हैं, फिर भी करुणा से मनुज-तन धरकर चरित करते हैं। सुमंत्र-राजाज्ञा, राम की धर्मनिष्ठा, और सीता की सहधर्मिणी-प्रतिज्ञा—ये तीनों मिलकर ‘त्याग’ को ‘भक्ति-सोपान’ बनाते हैं। इस खण्ड का स्थान-तत्त्व यह है कि भक्ति अब केवल भाव नहीं, निर्णय-रूप साधना बनती है।
चौपाई 90.1-4
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी।कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।
कछुक दूर सजि बान सरासन।जागन लगे बैठि बीरासन।।
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती।ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई।कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू।भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।
तनु पुलकित जलु लोचन बहई।बचन सप्रेम लखन सन कहई।।
भूपति भवन सुभायँ सुहावा।सुरपति सदनु न पटतर पावा।।
मनिमय रचित चारु चौबारे।जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।
uṭhe lakhanu prabhu sovata jānī |kahi sacivahi sovana mṛdu bānī ||
kachuka dūra saji bāna sarāsana |jāgana lage baiṭhi bīrāsana ||
gũha bolāi pāharū pratītī |ṭhāvã ṭhā̃va rākhe ati prītī ||
āpu lakhana pahiṁ baiṭheu jāī |kaṭi bhāthī sara cāpa caṛhāī ||
sovata prabhuhi nihāri niṣādū |bhayau prema basa hdayã biṣādū ||
tanu pulakita jalu locana bahaī |bacana saprema lakhana sana kahaī ||
bhūpati bhavana subhāyã suhāvā |surapati sadanu na paṭatara pāvā ||
manimaya racita cāru caubāre |janu ratipati nija hātha sãvāre ||
प्रभु को सोता हुआ जानकर लक्ष्मण उठे और कोमल वचन बोलकर सचिव को सो जाने के लिए कहा। थोड़ी दूर पर बाण और धनुष सजाकर वे वीरासन में बैठकर जागने लगे। गुह ने विश्वसनीय पहरेदारों को बुलाकर अत्यधिक प्रेम से उन्हें एक-एक स्थान पर नियुक्त किया। वे स्वयं लक्ष्मण के पास जाकर बैठ गए, कटि में बाण-युक्त तरकस और धनुष पर बाण चढ़ाकर। प्रभु को सोता हुआ देखकर निषाद प्रेम में वशीभूत हो गया और उसके हृदय में विषाद भर गया। उसका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों से जल बहने लगा और उसने प्रेम सहित लक्ष्मण से वचन कहे। राजा का भवन अपने स्वभाव से ही सुहावना है; सुरपति इंद्र का सदन भी इसके समान न पाता। मणियों से रचित उसके चारु चौबारे ऐसे लगते हैं मानो प्रेम के देवता ने अपने हाथों से सँवारे हों।
दोहा 90
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।
suci subicitra subhogamaya sumana sugaṁdha subāsa |palãga maṁju manidīpa jahã saba bidhi sakala supāsa ||90||
वह स्वच्छ, अति सुसज्जित और सर्व प्रकार के सुखों से परिपूर्ण है, जहाँ सुगन्धित पुष्पों और सुगन्धों की सुवास व्याप्त है; वहाँ सुंदर पलंग, मणियों से युक्त दीप और सब प्रकार से सकल सुख-सुविधाएँ हैं।
चौपाई 91.1-4
बिबिध बसन उपधान तुराई।छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं।निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।
ते सिय रामु साथरीं सोए।श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।
मातु पिता परिजन पुरबासी।सखा सुसील दास अरु दासी।।
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई।महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ।ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।
रामचंदु पति सो बैदेही।सोवत महि बिधि बाम न केही।।
सिय रघुबीर कि कानन जोगू।करम प्रधान सत्य कह लोगू।।
bibidha basana upadhāna turāī |chīra phena mṛdu bisada suhāī ||
tahã siya rāmu sayana nisi karahīṁ |nija chabi rati manoja madu harahīṁ ||
te siya rāmu sātharīṁ soe |śramita basana binu jāhiṁ na joe ||
mātu pitā parijana purabāsī |sakhā susīla dāsa aru dāsī ||
jogavahiṁ jinhahi prāna kī nāī |mahi sovata tei rāma gosāīṁ ||
pitā janaka jaga bidita prabhāū |sasura suresa sakhā raghurāū ||
rāmacaṁdu pati so baidehī |sovata mahi bidhi bāma na kehī ||
siya raghubīra ki kānana jogū |karama pradhāna satya kaha logū ||
वहाँ नाना प्रकार के वस्त्र, तकिये और गद्दे थे, कोमल, निर्मल और सुंदर, दूध की फेन के समान श्वेत। उस शय्या पर सीता और राम रात्रि में सोते थे, और अपने निज सौंदर्य से रति और कामदेव के गर्व को हर लेते थे। वे सीता और राम अब घास की शय्या पर सो रहे हैं, श्रांत, बिना आवरण के, जिन्हें देखना कठिन है। माता, पिता, बांधव और नगरवासी, सुशील सखा, दास और दासियाँ, जो उनकी रक्षा अपने प्राण के समान करते थे, वे गोस्वामी श्री राम अब धरती पर सो रहे हैं। उनके पिता जनक हैं, जिनकी प्रभुता संपूर्ण जगत में विख्यात है; ससुर रघुकुल के राजा दशरथ हैं, देवराज इंद्र के मित्र। रामचंद्र उनके पति हैं और वे वैदेही हैं, फिर भी वे धरती पर सोती हैं; विधि किसके प्रति विरोधी नहीं है? क्या सीता और रघुबीर वन के योग्य हैं? लोग सत्य कहते हैं कि कर्म ही प्रधान है।
दोहा 91
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।
kaikayanaṁdini maṁdamati kaṭhina kuṭilapanu kīnha |jehīṁ raghunaṁdana jānakihi sukha avasara dukhu dīnha ||91||
कैकेय नरेश की पुत्री मंदबुद्धि ने कठोर और कुटिल चाल चली, जिससे उसने रघुकुल के आनंद स्वरूप राम और जानकी को सुख के अवसर पर दुख दिया।
चौपाई 92.1-4
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी।कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।
भयउ बिषादु निषादहि भारी।राम सीय महि सयन निहारी।।
बोले लखन मधुर मृदु बानी।ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
जोग बियोग भोग भल मंदा।हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू।संपती बिपति करमु अरु कालू।।
धरनि धामु धनु पुर परिवारू।सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।मोह मूल परमारथु नाहीं।।
bhai dinakara kula biṭapa kuṭhārī |kumati kīnha saba bisva dukhārī ||
bhayau biṣādu niṣādahi bhārī |rāma sīya mahi sayana nihārī ||
bole lakhana madhura mṛdu bānī |gyāna birāga bhagati rasa sānī ||
kāhu na kou sukha dukha kara dātā |nija kṛta karama bhoga sabu bhrātā ||
joga biyoga bhoga bhala maṁdā |hita anahita madhyama bhrama phaṁdā ||
janamu maranu jahã lagi jaga jālū |saṁpatī bipati karamu aru kālū ||
dharani dhāmu dhanu pura parivārū |saragu naraku jahã lagi byavahārū ||
dekhia sunia gunia mana māhīṁ |moha mūla paramārathu nāhīṁ ||
वह सूर्यवंश रूपी वृक्ष की कुल्हाड़ी बन गई; उसके दुष्ट मन ने सारे संसार को दुखी कर दिया। निषाद को भारी शोक हुआ जब उसने राम और सीता को धरती पर शैया लेते देखा। लक्ष्मण ने मधुर और कोमल वाणी में कहा, जिसमें ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का रस भरा था। कोई भी दूसरे को सुख या दुख देने वाला नहीं है। हे भाई, सब अपने किए कर्मों का फल भोगते हैं। मिलन और वियोग, भोग, अच्छे और बुरे, मित्र, शत्रु और उदासीन: ये सब भ्रम के फंदे हैं। जन्म और मृत्यु, और जहाँ तक जग का जाल है, संपत्ति और विपत्ति, कर्म और काल; धरती, घर, धन, नगर और परिवार, स्वर्ग और नरक, और जहाँ तक संसार का व्यवहार है; जो कुछ देखा, सुना या मन में कल्पित जाता है: मोह ही उसका मूल है, और उसमें परमार्थ नहीं है।
दोहा 92
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।
sapaneṁ hoi bhikhāri nṛpa raṁku nākapati hoi |jāgeṁ lābhu na hāni kachu timi prapaṁca jiyã joi ||92||
सपने में राजा भिखारी हो जाता है और कंगल स्वर्ग का स्वामी हो जाता है; जागने पर न किसी को लाभ होता है न हानि। इसी प्रकार हृदय में जगत के भ्रम को विचारो।
चौपाई 93.1-4
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू।काहुहि बादि न देइअ दोसू।।
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।परमारथी प्रपंच बियोगी।।
जानिअ तबहिं जीव जग जागा।जब जब बिषय बिलास बिरागा।।
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा।तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।
सखा परम परमारथु एहू।मन क्रम बचन राम पद नेहू।।
राम ब्रह्म परमारथ रूपा।अबिगत अलख अनादि अनूपा।।
सकल बिकार रहित गतभेदा।कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।।
asa bicāri nahiṁ kījaa rosū |kāhuhi bādi na deia dosū ||
moha nisā̃ sabu sovanihārā |dekhia sapana aneka prakārā ||
ehiṁ jaga jāmini jāgahiṁ jogī |paramārathī prapaṁca biyogī ||
jānia tabahiṁ jīva jaga jāgā |jaba jaba biṣaya bilāsa birāgā ||
hoi bibeku moha bhrama bhāgā |taba raghunātha carana anurāgā ||
sakhā parama paramārathu ehū |mana krama bacana rāma pada nehū ||
rāma brahma paramāratha rūpā |abigata alakha anādi anūpā ||
sakala bikāra rahita gatabhedā |kahi nita neti nirūpahiṁ bedā ||
ऐसा विचारकर क्रोध न करना चाहिए और किसी पर व्यर्थ दोष न लगाना चाहिए। सब मोह की रात में सोने वाले हैं और अनेक प्रकार के स्वप्न देखते हैं। इस जगत की रात में केवल योगी जागते हैं, जो परमार्थ के अन्वेषक हैं और प्रपंच से वियोगी हो चुके हैं। जीव तभी जग में जागा समझा जाए, जब-जब उसका विषय-विलास से वैराग्य होता है। तब विवेक होता है, मोह का भ्रम भाग जाता है, और तब रघुनाथ के चरणों में अनुराग होता है। हे सखा, यही परम परमार्थ है - मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम। राम ब्रह्म हैं, परमार्थ के स्वरूप, अव्यक्त, अलक्ष्य, अनादि और अनूप। वे सब विकारों से रहित और भेद-रहित हैं; वेद उनका निरूपण करते हैं, सदा 'नेति नेति' कहते हुए।
दोहा 93
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
bhagata bhūmi bhūsura surabhi sura hita lāgi kṛpāla |karata carita dhari manuja tanu sunata miṭahi jaga jāla ||93||
भक्तों, पृथ्वी, ब्राह्मणों, गोओं और देवताओं के हित के लिए कृपालु भगवान मनुष्य शरीर धारण करके चरित्र करते हैं, और उन्हें सुनने से जगत का जाल मिट जाता है।
चौपाई 94.1-4
सखा समुझि अस परिहरि मोहु।सिय रघुबीर चरन रत होहू।।
कहत राम गुन भा भिनुसारा।जागे जग मंगल सुखदारा।।
सकल सोच करि राम नहावा।सुचि सुजान बट छीर मगावा।।
अनुज सहित सिर जटा बनाए।देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना।कह कर जोरि बचन अति दीना।।
नाथ कहेउ अस कोसलनाथा।लै रथु जाहु राम कें साथा।।
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई।आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।
लखनु रामु सिय आनेहु फेरी।संसय सकल सँकोच निबेरी।।
sakhā samujhi asa parihari mohu |siya raghubīra carana rata hohū ||
kahata rāma guna bhā bhinusārā |jāge jaga maṁgala sukhadārā ||
sakala soca kari rāma nahāvā |suci sujāna baṭa chīra magāvā ||
anuja sahita sira jaṭā banāe |dekhi sumaṁtra nayana jala chāe ||
hṛdayã dāhu ati badana malīnā |kaha kara jori bacana ati dīnā ||
nātha kaheu asa kosalanāthā |lai rathu jāhu rāma keṁ sāthā ||
banu dekhāi surasari anhavāī |ānehu pheri begi dou bhāī ||
lakhanu rāmu siya ānehu pherī |saṁsaya sakala sãkoca niberī ||
हे सखा, ऐसा समझकर मोह त्याग दो, और सीता और रघुबीर के चरणों में रत रहो। राम के गुण कहते-कहते भोर हो गई, और जगत के मंगल और सुख देने वाले जाग उठे। राम ने सकल शौचादि करके स्नान किया, फिर शुचिशील सुजान ने बट का क्षीर मँगवाया। अनुज सहित सिर पर जटाएँ बनाईं। यह देखकर सुमंत्र के नयनों में जल छा गया। हृदय में अत्यंत दाह था और मुख मलीन था; हाथ जोड़कर अति दीन वचन बोले। "नाथ, कोसलनाथ ने मुझसे यह कहा: 'रथ लेकर राम के साथ जाओ।' 'वन दिखलाकर, गंगा में स्नान कराकर, दोनों भाइयों को शीघ्र लौटा लाओ।' 'लक्ष्मण, राम और सीता को लौटा लाओ, सब संशय और संकोच दूर करके।'"
दोहा 94
नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।
nṛpa asa kaheu gosāīṁ jasa kahai karauṁ bali soi |kari binatī pāyanha pareu dīnha bāla jimi roi ||94||
राजा ने ऐसा कहा, स्वामी; परन्तु आप जो आज्ञा दें, मैं वही करूँ, मैं आपका बलि हूँ। ऐसी प्रार्थना करके सुमन्त्र राम के चरणों में गिर पड़े और बालक की भाँति रोने लगे।
चौपाई 95.1-4
तात कृपा करि कीजिअ सोई।जातें अवध अनाथ न होई।।
मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा।तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।
सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा।सहे धरम हित कोटि कलेसा।।
रंतिदेव बलि भूप सुजाना।धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।
धरमु न दूसर सत्य समाना।आगम निगम पुरान बखाना।।
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा।तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।
संभावित कहुँ अपजस लाहू।मरन कोटि सम दारुन दाहू।।
तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ।दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।
tāta kṛpā kari kījia soī |jāteṁ avadha anātha na hoī ||
maṁtrahi rāma uṭhāi prabodhā |tāta dharama matu tumha sabu sodhā ||
sibi dadhīci haricaṁda naresā |sahe dharama hita koṭi kalesā ||
raṁtideva bali bhūpa sujānā |dharamu dhareu sahi saṁkaṭa nānā ||
dharamu na dūsara satya samānā |āgama nigama purāna bakhānā ||
maiṁ soi dharamu sulabha kari pāvā |tajeṁ tihū̃ pura apajasu chāvā ||
saṁbhāvita kahũ apajasa lāhū |marana koṭi sama dāruna dāhū ||
tumha sana tāta bahuta kā kahaū̃ |diẽ utaru phiri pātaku lahaū̃ ||
हे पिता, कृपा करके वही कीजिए जिससे अयोध्या अनाथ न हो। राम ने मंत्री को उठाकर सांत्वना दी: "हे पिता, आपने धर्म के सारे मार्ग को खोजकर समझ लिया।" शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चंद्र ने धर्म के लिए करोड़ों कष्ट सहे। रंतिदेव और विद्वान राजा बलि ने अनेक संकटों को सहकर धर्म धारण किया। सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं; ऐसा आगम, निगम और पुराण बखान करते हैं। मैंने वही धर्म सुगमता से पा लिया; यदि उसे त्यागूँ तो तीनों लोकों में अपयश फैल जाए। सम्मानित के लिए अपयश पाना एक भयंकर दाह है, करोड़ मृत्युओं के समान। हे पिता, आपसे और बहुत क्या कहूँ? उत्तर देकर मैं फिर पाप ही लूँगा।
दोहा 95
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
pitu pada gahi kahi koṭi nati binaya karaba kara jori |ciṁtā kavanihu bāta kai tāta karia jani mori ||95||
मेरे पिता के चरण पकड़कर करोड़ बार प्रणाम करते हुए और हाथ जोड़कर विनती करना - हे तात, मेरे विषय में किसी भी बात की चिंता न करें।
चौपाई 96.1-4
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें।बिनती करउँ तात कर जोरें।।
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें।दुख न पाव पितु सोच हमारें।।
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू।भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।
पुनि कछु लखन कही कटु बानी।प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।
सकुचि राम निज सपथ देवाई।लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।
कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू।सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया।सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।
नतरु निपट अवलंब बिहीना।मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।
tumha puni pitu sama ati hita moreṁ |binatī karaũ tāta kara joreṁ ||
saba bidhi soi karatabya tumhāreṁ |dukha na pāva pitu soca hamāreṁ ||
suni raghunātha saciva saṁbādū |bhayau saparijana bikala niṣādū ||
puni kachu lakhana kahī kaṭu bānī |prabhu baraje baṛa anucita jānī ||
sakuci rāma nija sapatha devāī |lakhana sãdesu kahia jani jāī ||
kaha sumaṁtru puni bhūpa sãdesū |sahi na sakihi siya bipina kalesū ||
jehi bidhi avadha āva phiri sīyā |soi raghubarahi tumhahi karanīyā ||
nataru nipaṭa avalaṁba bihīnā |maiṁ na jiaba jimi jala binu mīnā ||
तुम मुझे पिता के समान अतिशय प्रिय हो; हे तात, मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ। सब प्रकार से यही आपका कर्तव्य है कि मेरे पिता को हमारे कारण कोई शोक न पहुँचे। रघुनाथ और सचिव का यह संवाद सुनकर निषाद अपने सपरिवार व्याकुल हो गया। तब लक्ष्मण ने कुछ कटु वचन कहे, पर प्रभु ने उन्हें अति अनुचित जानकर रोका। राम ने सकुचाकर लक्ष्मण से अपनी प्रतिज्ञा दिलाई कि तुम यह संदेश लेकर न जाना। फिर सुमंत्र ने राजा का संदेश दिया कि सीता वन के क्लेश सहन न सकेंगी। जिस प्रकार से सीता अयोध्या लौट आवें, वैसा ही हे रघुवर, आपको करना चाहिए। अन्यथा निपट आश्रय रहित होकर मैं जीवित न रहूँगा, जैसे जल के बिना मीन।
दोहा 96
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
maikeṁ sasareṁ sakala sukha jabahiṁ jahā̃ manu māna |tãha taba rahihi sukhena siya jaba lagi bipati bihāna ||96||
मायके या ससुराल में सब सुख हैं, जब और जहाँ मन प्रसन्न हो, वहीं तब सीता सुखपूर्वक रहें, जब तक यह विपत्ति बीत न जाए।
चौपाई 97.1-4
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती।आरति प्रीति न सो कहि जाती।।
पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना।सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू।फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।
सुनि पति बचन कहति बैदेही।सुनहु प्रानपति परम सनेही।।
प्रभु करुनामय परम बिबेकी।तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई।कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई।कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।
तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी।उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।
binatī bhūpa kīnha jehi bhā̃tī |ārati prīti na so kahi jātī ||
pitu sãdesu suni kṛpānidhānā |siyahi dīnha sikha koṭi bidhānā ||
sāsu sasura gura priya parivārū |phiratu ta saba kara miṭai khabhārū ||
suni pati bacana kahati baidehī |sunahu prānapati parama sanehī ||
prabhu karunāmaya parama bibekī |tanu taji rahati chā̃ha kimi cheṁkī ||
prabhā jāi kahã bhānu bihāī |kahã caṁdrikā caṁdu taji jāī ||
patihi premamaya binaya sunāī |kahati saciva sana girā suhāī ||
tumha pitu sasura sarisa hitakārī |utaru deũ phiri anucita bhārī ||
राजा ने जिस प्रकार विनती की, उसमें जो व्याकुलता और प्रेम था, वह कहा नहीं जा सकता। पिता का संदेश सुनकर कृपानिधान प्रभु ने सीता को कोटि उपायों से शिक्षा दी। सास, ससुर, गुरु और प्रिय परिवार, यदि तुम लौटो तो सबका दुःख दूर हो जाएगा। पति के वचन सुनकर वैदेही बोलीं, सुनो, मेरे प्राणपति, परम प्रियतम। प्रभु, तुम करुणामय और परम विवेकी हो। शरीर छोड़कर छाया कैसे रुक सकती है? सूर्य को छोड़कर प्रभा कहाँ जा सकती है? चंद्र को त्यागकर चंद्रिका कहाँ जा सकती है? पति को प्रेममय विनती सुनाकर वह सचिव के पास सुहावने वचन कहने लगीं। तुम पिता और ससुर के समान हितकारी हो; मैं तुम्हें उत्तर दूँ, वह बड़ा अनुचित होगा।
दोहा 97
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
ārati basa sanamukha bhaiũ bilagu na mānaba tāta |ārajasuta pada kamala binu bādi jahā̃ lagi nāta ||97||
आर्ति के वश में होकर मैंने आपके सामने प्रत्युत्तर दिया है, हे तात, इसे बुरा न मानिए। राजकुमार के चरण-कमलों के बिना जहाँ तक नाते-रिश्ते हैं, सब व्यर्थ हैं।
चौपाई 98.1-4
पितु बैभव बिलास मैं डीठा।नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें।पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ।भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
आगें होइ जेहि सुरपति लेई।अरध सिंघासन आसनु देई।।
ससुरु एतादृस अवध निवासू।प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।
बिनु रघुपति पद पदुम परागा।मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।
अगम पंथ बनभूमि पहारा।करि केहरि सर सरित अपारा।।
कोल किरात कुरंग बिहंगा।मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।
pitu baibhava bilāsa maiṁ ḍīṭhā |nṛpa mani mukuṭa milita pada pīṭhā ||
sukhanidhāna asa pitu gṛha moreṁ |piya bihīna mana bhāva na bhoreṁ ||
sasura cakkavai kosalarāū |bhuvana cāridasa pragaṭa prabhāū ||
āgeṁ hoi jehi surapati leī |aradha siṁghāsana āsanu deī ||
sasuru etādṛsa avadha nivāsū |priya parivāru mātu sama sāsū ||
binu raghupati pada paduma parāgā |mohi keu sapanehũ sukhada na lāgā ||
agama paṁtha banabhūmi pahārā |kari kehari sara sarita apārā ||
kola kirāta kuraṁga bihaṁgā |mohi saba sukhada prānapati saṁgā ||
मैंने अपने पिता के घर का वैभव और विलास देखा है, जहाँ राजाओं के रत्नजड़ित मुकुट उनके चरण-पीठ पर जुटे रहते हैं। ऐसा मेरा पिता का घर सुखों का भंडार है, पर प्रियतम के बिन मन को नहीं भाता, बिलकुल भी नहीं। मेरे ससुर चक्रवर्ती कोसलराज हैं, जिनकी प्रभुता चौदह भुवनों में प्रगट है। आगे बढ़कर स्वर्पति इन्द्र उन्हें ले जाते हैं और अपने सिंहासन का आधा आसन देते हैं। ऐसे हैं मेरे ससुर और अयोध्या मेरा निवास है; परिवार प्रिय है और सासु माता के समान हैं। पर रघुपति के चरण-कमल के रज के बिन, मुझे कुछ भी स्वप्न में भी सुखद नहीं लगा। अगम्य मार्ग है, वनभूमि, पहाड़, हाथी, शेर, सरोवर और अपार नदियाँ। कोल, किरात, हिरण और पक्षी: प्राणपति के संग में ये सब मुझे सुखद लगते हैं।
दोहा 98
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
sāsu sasura sana mori hũti binaya karabi pari pāyã |mora socu jani karia kachu maiṁ bana sukhī subhāyã ||98||
सास और ससुर के चरणों में पड़कर मेरी ओर से विनती करना। मेरे लिए कुछ चिंता मत करो, मैं वन में स्वभाव से सुखी हूँ।
चौपाई 99.1-4
प्राननाथ प्रिय देवर साथा।बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।
नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें।मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी।भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।
नयन सूझ नहिं सुनइ न काना।कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति।तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।
जतन अनेक साथ हित कीन्हे।उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।
मेटि जाइ नहिं राम रजाई।कठिन करम गति कछु न बसाई।।
राम लखन सिय पद सिरु नाई।फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।
prānanātha priya devara sāthā |bīra dhurīna dhareṁ dhanu bhāthā ||
nahiṁ maga śramu bhramu dukha mana moreṁ |mohi lagi socu karia jani bhoreṁ ||
suni sumaṁtru siya sītali bānī |bhayau bikala janu phani mani hānī ||
nayana sūjha nahiṁ sunai na kānā |kahi na sakai kachu ati akulānā ||
rāma prabodhu kīnha bahu bhā̃ti |tadapi hoti nahiṁ sītali chātī ||
jatana aneka sātha hita kīnhe |ucita utara raghunaṁdana dīnhe ||
meṭi jāi nahiṁ rāma rajāī |kaṭhina karama gati kachu na basāī ||
rāma lakhana siya pada siru nāī |phireu banika jimi mūra gavā̃ī ||
प्राणनाथ और प्रिय देवर के साथ, दोनों शूरवीरों के श्रेष्ठ, धनुष और तरकश धारण किए हुए, मार्ग में मुझे न थकावट है, न भ्रम है, न मन में दुख है। मेरे लिए भूल से भी चिंता न करो। सीता की शीतल वाणी सुनकर सुमंत्र व्याकुल हो गए, जैसे कोई सर्प अपना मणि खो बैठे। उनके नेत्र नहीं देख सकते, कान नहीं सुन सकते, अत्यंत व्याकुल होने से कुछ कह नहीं सकते थे। राम ने उन्हें बहुत प्रकार से सांत्वना दी, तो भी उनका हृदय शीतल न होता था। उन्होंने साथ जाने के लिए अनेक प्रयत्न किए, और रघुनंदन ने प्रत्येक का उचित उत्तर दिया। राम की आज्ञा मिटाई नहीं जा सकती, कठिन कर्म की गति है, कुछ भी उनके वश में नहीं। राम, लक्ष्मण और सीता के चरणों में सिर नवाकर वे लौट पड़े, जैसे कोई वणिक अपना मूलधन गँवाकर लौटे।
दोहा 99
रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।
ratha hā̃keu haya rāma tana heri heri hihināhiṁ |dekhi niṣāda biṣādabasa dhunahiṁ sīsa pachitāhiṁ ||99||
रथ चलाते हुए राम के शरीर को बार-बार देख-देखकर घोड़े हिनहिनाते रहे। यह देखकर निषाद शोक से व्याप्त हो गए और सिर पीट-पीटकर पछताते रहे।
(1) ‘जागरण’ की भक्ति: लक्ष्मण का प्रहरी-भाव बताता है कि प्रेम केवल भावुकता नहीं—सतर्क सेवा और धर्म-रक्षा है। (2) वियोग से नेह: रात्रि का सन्नाटा और आगामी वियोग भक्त के भीतर राम-पद-नेह को गाढ़ा करता है; करुणा ही शुद्ध भक्ति का ईंधन बनती है। (3) कर्म-फल/स्वप्न-जागरण का संकेत: संसार-स्वप्न से जागकर राम-आश्रय लेना—विषय-विराग का व्यावहारिक रूप। (4) सगुण-निर्गुण संगति: राम ब्रह्म-रूप होकर भी मनुज-लीला करते हैं—भक्त के लिए यह आश्वासन है कि परम सत्य करुणा बनकर निकट आता है। (5) त्याग का रूपान्तरण: राजसुख-सम्पदा के बीच ‘धर्म’ की पुकार सुनकर लिया गया निर्णय ही साधना है; वन-गमन बाह्य यात्रा नहीं, ‘अन्तर-वन’ में प्रवेश है।
अयोध्या काण्ड का रस-आधार करुण और शान्त का अद्वैत-संयोग है: करुण इसलिए कि ‘धर्म’ की विजय भी हृदय को चीरती हुई आती है, और शान्त इसलिए कि वही पीड़ा विवेक बनकर मुक्ति-पथ खोलती है। प्रस्तुत अंश में रात्रि-प्रसंग (सीय-राम का शयन, लक्ष्मण का प्रहरी-भाव, निषाद का प्रेम-विषाद) ‘मोह-निशा’ का रूपक बन जाता है। लक्ष्मण का उपदेश कर्म-फल, स्वप्न-जागरण, विषय-विराग और राम-पद-नेह की ओर ले जाता है—यहाँ तुलसी का सिद्धान्त-गोंद (निर्गुण-परमार्थ और सगुण-लीला) स्पष्ट है: राम ब्रह्म-रूप हैं, फिर भी करुणा से मनुज-तन धरकर चरित करते हैं। सुमंत्र-राजाज्ञा, राम की धर्मनिष्ठा, और सीता की सहधर्मिणी-प्रतिज्ञा—ये तीनों मिलकर ‘त्याग’ को ‘भक्ति-सोपान’ बनाते हैं। इस खण्ड का स्थान-तत्त्व यह है कि भक्ति अब केवल भाव नहीं, निर्णय-रूप साधना बनती है।
करुण-शान्त का क्रमिक अद्वैत-संयोग। आरम्भ में ‘मोह-निशा’ का सघन भाव—रात्रि का सन्नाटा, वन-गमन की अनिवार्यता, और भीतर-भीतर उठती वियोग-छाया। फिर लक्ष्मण का ‘प्रहरी-भाव’ करुणा को तेजस्वी कर्तव्य-रस में बदलता है: जागरण, सावधानी, और धर्म-रक्षा का संकल्प। मध्य में उपदेश-स्वर (कर्म-फल, स्वप्न-जागरण, विषय-विराग) करुण को विवेक में रूपान्तरित करता है—हृदय की पीड़ा ‘शान्त’ का द्वार बनती है। अंततः राम-पद-नेह का उदय: त्याग अब केवल दुख नहीं, साधना का सोपान बनता है; रात्रि-प्रसंग ‘अन्तर-वन’ की तैयारी में परिणत होकर स्थिर शान्त-रस पर टिकता है।
लक्ष्मण का प्रहरी-रूप (बाण-सरासन सजाकर वीरासन), निषाद का प्रेम-विषाद, लक्ष्मण का विवेक-उपदेश (स्वप्न-जागरण रूपक), सुमंत्र को राजा का आदेश, राम का धर्म-स्थापन, सीता का वन-गमन हेतु दृढ़ विनय, और अंततः रथ का चलना—निषाद का पछिताना
दास्य (लक्ष्मण का सेवक-प्रहरी भाव), सख्य (लक्ष्मण द्वारा ‘सखा’ संबोधन और हितोपदेश), तथा शान्त-भक्ति (विषय-विराग, प्रपंच-स्वप्न दृष्टि) का प्रबल संयोग
लक्ष्मण-वाणी में ‘राम ब्रह्म परमारथ रूपा… नेति नेति’ द्वारा निर्गुण-अद्वैत का संकेत है, पर उसी के साथ ‘कृपालु धरि मनुज तनु करत चरित’ द्वारा सगुण-ईश्वर की लीला-सुलभता स्थापित होती है। फलतः ब्रह्म ‘अविगत अलख’ भी है और ‘राम-पद-नेह’ का विषय भी—तुलसी का समन्वय यह कि निर्गुण सत्य का आस्वाद सगुण-भक्ति के माध्यम से सहज होता है।
वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड: राम-सीता-लक्ष्मण का प्रस्थान-पूर्व रात्रि/तैयारी, सुमंत्र का रथ-कार्य, तथा निषाद-सम्बन्धी प्रसंगों के समतुल्य; अध्यात्मरामायण में भी ‘वैराग्य-विवेक’ का बल
मृदु बानी, कछुक दूर, गुँह बोलाइ (गुप्त/चुपचाप बुलाकर), ठावँ ठाँव, कटि भाथी, मन क्रम बचन, जियँ जोइ (जिया में जान/देख), जागें लाभु न हानि, जतन अनेक, जिमि (जैसे), बिकल, निपट अवलंब बिहीना
90-99; सोरठा (दोहा/सोरठा शीर्षक के अंतर्गत; पाठ-परम्परा अनुसार कुछ स्थलों पर सोरठा-पाठ)
दोहा 90 से दोहा 99 (अयोध्या काण्ड; रात्रि-जागरण से रथ-प्रस्थान तक)
परम्परागत मान्यता अनुसार इस खण्ड का पाठ ‘मोह-भ्रम’ शान्त करता है, वैराग्य-विवेक जगाता है, और ‘राम-पद-नेह’ दृढ़ करता है—विशेषतः गृहस्थ-धर्म में रहकर भी त्याग-बुद्धि और शरणागति की सिद्धि देता है (लक्ष्मण-उपदेश: ‘जागें लाभु न हानि…’ तथा ‘मन क्रम बचन राम पद नेहू’ के भावानुसार)।
सामान्य मानस-परम्परा में इस प्रकार के वैराग्य/शरणागति प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम) का संकीर्तन-सम्पुट प्रचलित है; कुछ पाठ-परम्पराओं में ‘राम रामेति रामेति…’ नाम-सम्पुट भी जोड़ा जाता है (स्थानीय संप्रदाय/पाठ-रीति अनुसार)।
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