Opening the text
त्याग-दीक्षा का सोपान: राजधर्म, गृहधर्म और व्यक्तिगत आसक्ति का परित्याग करके ‘वन-मार्ग’ को ‘अंतर-मार्ग’ बनाना। इस काण्ड में राम का निष्कासन केवल कथा-घटना नहीं, साधक-चित्त का संस्कार है—जहाँ विरह, करुणा, और शरणागति मिलकर ‘भवसागर-तरन’ की तैयारी कराते हैं।
यह प्रकरण निष्कासन को ‘घटना’ नहीं, ‘संस्कार’ बनाता है। (क) ‘वन-मार्ग’ = ‘अंतर-मार्ग’: राजसुख/गृहासक्ति का परित्याग भीतर की यात्रा है; अयोध्या का छूटना अहं-आधार का छूटना। (ख) गंगातट: ‘अहं-तट’ और ‘प्रवाह’: तट पर खड़ा मन नियंत्रण/गणना करता है; प्रवाह में उतरना भरोसा और शरणागति है। (ग) केवट का ‘पद-रज भय’: यह अविश्वास नहीं, प्रेम की सावधानी—राम-चरण की महिमा को ‘लोक-न्याय’ में बाँधकर भी ‘अलौकिक’ स्वीकार करना; चरण-रज से ‘पत्थर-तरणी’ (अहं/जड़ता) का संकेत। (घ) ‘उतराई’ का निषेध: निष्काम दास्य—सेवा का मूल्य नहीं, सेवा का भाव; भक्ति का अर्थ ‘लेन-देन’ नहीं, ‘समर्पण’। (ङ) प्रयाग-वर्णन: तीर्थ का बाह्य महात्म्य ‘तीर्थपति-दर्शन’ में अंतर्मुख—तीर्थ का फल ‘राम-समागम’ है, न कि केवल कर्मफल-संचय। (च) भरद्वाज-आश्रम: तप-जप-त्याग का सार ‘दर्शन-लाभ’—कर्मकाण्ड-आश्रय से नाम-आश्रय और अनन्य-भक्ति की स्थिरता।
Verse 204 (चौपाई)
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।। बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।। चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।। एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।। जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
जिस इंसान के जाने से जानवर भी इतना दुखी हो गया, तो प्रजा, माँ और बाप कैसे जिएंगे? राम ने सुमंत्र को जबरदस्ती वापस भेजा। फिर वो गंगा के किनारे गए। उसने नाव माँगी पर कोई नाव वाला नहीं आया। एक आदमी बोला, मैं आपका राज़ जानता हूँ। आपके पाँव की धूल से सब काम होता है। इंसान बनके यह सब करना क्या ज़रूरी है? पत्थर को छुआ तो वो औरत बन गई। लकड़ी पत्थर से नरम है। नाव भी औरत बन गई और रिशि के पास चली गई। मेरी नाव भी रास्ते निकल गई। इससे मेरा पूरा परिवार चलता है। मुझे और कुछ नहीं आता। प्रभु, अगर आपको पार जाना है तो मुझे बोलो मैं आपके पाँव धो दूँ।
Verse 205 (छंद)
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं।। बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।
मैं आपके पाँव धो कर आपको नाव में बिठाऊँगा। प्रभु, मैं उतरना नहीं चाहता। राम, मैं आपको सच्ची बताता हूँ, दशरथ की कसम खाता हूँ। लेकिन लक्ष्मण, मुझे तब तक मारना जब तक मैं उसके पाँव नहीं धो देता। तब तक तुलसीदास, प्रभु, आपको पार नहीं उतारेगा।
Verse 206 (दोहा/सोरठा)
सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।100।।
केवट की बातें सुन के सीता मुस्कुरा दी। उसके शब्द में प्यार था और बात कुछ अलग थी। सीता के दिल में दया आ गई। वो लक्ष्मण को देखने लगी।
Verse 207 (चौपाई)
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।। वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।। जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।। सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।। पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।। केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।। अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।। बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
राम ने मुस्कुरा के बोला, जो करना है वो कर। तुम्हारी नाव नहीं जा सकती। पानी जल्दी लाओ और मेरे पाँव धो दो। थोड़ा टाइम लगेगा, फिर मैं तुम्हे पार उतारूंगा। जिसका नाम एक बार भी याद कर लो, वो इंसान इस दुनिया के समुंदर से पार हो जाता है। वही राम ने केवट की बात मान ली। राम ने यह दुनिया को एक तुइल के बराबर भी नहीं समझा। गंगा ने राम के पाँव और नाखून देख के खुशी मनाई। राम की बात सुन के उसका दिल भर गया। केवट ने राम से परमिशन ली। एक बरतन में पानी भर के लाया। बहुत खुशी हुई, प्यार बढ़ गया। उसने राम के पाँव धोने शुरू किए। देवताओं ने फूल बरसाए, सब खुश थे। इतना पुण्य किसी का नहीं है।
Verse 208 (दोहा/सोरठा)
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।
केवट ने राम के पाँव धो दिए, पानी पिया। फिर राम को पार ले गया, सीता और लक्ष्मण भी साथ थे। अपने पूर्वज भी इससे पार हो गए। राम खुशी खुशी आगे बढ़ गया।
Verse 209 (चौपाई)
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।। केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।। पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।। नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।। फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
सब ने नदी पार की, रेत पर खड़े हो गए। सीता, राम, गुह और लक्ष्मण सब साथ थे। केवट भी पार गया और राम को प्रणाम किया। राम को कोई शर्म नहीं हुई, वो कुछ नहीं बोला। सीता को पता था उसके पति का दिल क्या चाहता है। उसने अपनी अंगूठी उतार के दे दी, खुशी से। राम ने बोला, अपना किराया ले लो। केवट ने राम के पाँव पकड़ लिए, रोने लगा। प्रभु, आज मैंने क्या नहीं पाया? मेरे सारे पाप, दुख और गरीबी सब मिट गया। बहुत टाइम से मैं मजदूरी करता था। आज भगवान ने मुझे बहुत अच्छा दिया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए प्रभु। तुम्हारी कृपा मुझ पर है। जब वापस आओ तो जो दोगे, वो मैं सर पे रख लूँगा।
Verse 210 (दोहा/सोरठा)
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
राम, लक्ष्मण और सीता ने बहुत कुछ दिया। पर केवट ने कुछ नहीं लिया। राम ने उसे आशीर्वाद दिया और साफ भक्ति का वरदान दिया।
Verse 211 (चौपाई)
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।। सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।। पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।। सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।। सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।। लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।। तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।। तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।
फिर रघु कुल के हेड ने नहा कर धरा की पूजा की और उसे अपने सिर पर रख लिया। हाथ जोड़ कर सीता से कहा, मैं तुम्हारे दिल की इच्छा पूरी कर दूंगा। मैं अपने पति और देवर के साथ सालिम वापस आकर तुम्हारी पूजा करूंगी। सीता की ये बात सुनकर, प्यार भरी नदी का पानी साफ हो गया और उसकी बात भी बड़ी प्यारी लगने लगी। नदी ने कहा, सुनो रघु के वीर, विदेह की प्रिय बेटी, तुम्हारी बड़ाई पूरी दुनिया में फैली है। देवता भी तुम्हे देखते हैं और सब सिद्ध हाथ जोड़ कर तुम्हारी सेवा करते हैं। तुमने मुझे इतना नीचा दिखाया, मुझ पर कृपा की और मुझे इज्जत दी। फिर भी देवी, मैं तुम्हे आशीर्वाद देता हूं, तुम्हारी अपनी दिल की इच्छा पूरी हो।
Verse 212 (दोहा/सोरठा)
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।
भगवान तुम अपने पति और देवर के साथ सालिम कोसल वापस आओ। मेरी पूजा करो और तुम्हारी अच्छी बड़ाई पूरी दुनिया में रहेगी।
Verse 213 (चौपाई)
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।। तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।। दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।। नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।। जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।। तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।। सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।। पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।
गंगा की ये बात सुनकर जो बड़ी मंगल वाली थी, सीता खुश हो गई और नदी भी उनकी तरफ हो गई। फिर प्रभु ने गुह से कहा, तुम घर जाओ। ये सुन कर गुह का चेहरा उदास हो गया पर दिल में दुख था। गुह ने हाथ जोड़ कर अर्ज किया, सुनो मेरी विनय, रघु कुल के रत्न। नाथ, मुझे साथ रखना और मुझे रास्ता दिखाना, चार दिन तुम्हारे चरणों की सेवा करने दो। जिस जंगल में आप रहेंगे, मैं वहां एक अच्छी झोपड़ी बना दूंगा। फिर जो आप कहेंगे वही करूंगा, रघु वीर की कसम। राम ने गुह के दिल में प्यार देख कर उसे अपना लिया और गुह खुश हो गया। फिर गुह ने अपने सब लोगों को बुलाया, सबको खुश करके विदा ली।
Verse 214 (दोहा/सोरठा)
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।
फिर रघु के नाथ ने शिव को याद करके नदी को सिर से नमस्ते किया। अपने दोस्त, भाई और सीता के साथ जंगल के लिए निकल पड़े।
Verse 215 (चौपाई)
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।। प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।। सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।। चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।। छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।। सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।। संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।
उस दिन उन्होंने पेड़ों के नीचे आराम किया। लक्ष्मण ने दोस्तों के लिए पत्ती से अच्छे अच्छे शेड बनाए। सुबह होने पर रघु के नाथ ने नहाना पूजा करके तीर्थ राजा को देखने गए। वहां सच्चाई और श्रद्धा उनके साथी थे, उनकी पत्नी बड़ी प्यारी थी, माधव जैसी मित्र जो उनका भला चाहती थी। उनके पास चार चीजें भरपूर थी, और देश भी बड़ा अच्छा था। वहां कोई दुश्मन के पास जा भी नहीं सकता था, इतना मजबूत किला था। उनकी सेना में सब से अच्छे तीर्थ थे, जो पाप को मिटा देते थे। संगम उनका सिंहासन था, अक्षय वट छता था, और गंगा यमुना की लहरों से दर्द और गरीबी दूर हो जाती थी।
Verse 216 (दोहा/सोरठा)
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
जो लोग अच्छे काम करते हैं और साफ दिल वाले हैं, वो राम की सेवा करते हैं। वो अपने मन्न की सारी इच्छा पा लेते हैं। वेद, पुरान और रिशि लोग राम के गुणों का गाना गाते हैं। राम के गुण इतने साफ हैं, कोई दोष नहीं।
Verse 217 (चौपाई)
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।। कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।। करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।। एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।। तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।। मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
कौन प्रयाग की बड़ाई को पूरा बता सकता है? यह पाप के पिले को खा जाता है, जैसे शेर हाथी को खा जाता है। राम ने प्रयाग को देखा जो तीर्थों का राजा है। इतना प्यारा लग रहा था। राम खुश हो गए क्योंकि वो खुशियों का समुंदर हैं। राम ने सीता और लक्ष्मण को बताया कि प्रयाग कितना बड़ा है। वो अपने दोस्तों को भी सुना रहे थे कि भगवान ने क्या कहा था। राम ने प्रणाम किया और वन के बगीचे देखे। उन्होंने प्यार से बताया कि यह जगह कितनी खास है। फिर वो बेनी संगम के पास गए। यह जगह सबसे अच्छा फल देती है जो इसे याद करता है। खुश हो के नहाए और शिव की पूजा की। तीर्थ के देवता की भी पूजा की, जैसे विधि होती है। फिर राम भरद्वाज रिशि के पास गए। दंडवत प्रणाम किया, तो रिशि ने उन्हे दिल से लगा लिया। रिशि के मन में इतनी खुशी थी जो शब्दों में नहीं बता सकते। जैसे ब्रह्मा के साथ वाली खुशी मिल गई हो।
Verse 218 (दोहा/सोरठा)
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
रिशि ने आशीर्वाद दिया, उनका मन इतना खुश था। उन्हे लग रहा था जैसे विधि ने उनके अच्छे काम का फल सामने ला के रख दिया हो।
Verse 219 (चौपाई)
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।। कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।। सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।। भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।। आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।। सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।। लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।। अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
रिशि ने पूछा कि सब ठीक है या नहीं। बैठने के लिए आसन दिए। प्यार से पूजा किया और उन्हे खुश कर दिया। रिशि ने कंद, मूल, फल और नए पौधे ला के दिए। मन का खाना जैसे अमृत हो। सीता, लक्ष्मण और साथी लोग भी खुश थे। राम ने मूल और फल बड़े मज़े से खाए। राम थक गए थे, अब आराम से बैठे। भरद्वाज ने नरम आवाज़ में कहा। आज मेरा तप सफल हुआ, मेरा तीर्थ यात्रा सफल हुआ। आज मेरा जप, योग और वैराग सब कुछ सफल हुआ। सारी अच्छी चीज़ें सफल हो गई क्योंकि मैंने तुम्हे देख लिया राम। इससे बड़ा कोई लाभ नहीं, कोई खुशी नहीं। तुम्हारी नज़र में मेरी सारी उम्मीन पूरी हो गई। अब एक वरदान देना, मुझे अपने चरणों में रखना।
Verse 220 (दोहा/सोरठा)
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
जब तक तुम अपने काम, बात और मन से धोखा छोड़ नहीं देते, तब तक तुम मेरे नहीं हो। तब तक तुम्हे सपने में भी सुख नहीं मिलेगा, चाहे तुम लाख उपाय करो।
Verse 221 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।। सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।। मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।। यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।। राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।
मुनि के बात सुन के राम थोड़ा शर्मा गए। लेकिन उनके दिल में भक्ति और खुशी भर गई। फिर रघु कुल के प्रभु ने मुनि को पूरा किस्सा सुना दिया। उन्होंने अलग-अलग तरीके से सब बताया। मुनि ने कहा, यह बहुत बड़ी बात है। तुम्हारे घर में सारे गुण हैं। क्योंकि तुम इतना इज्जत करते हो सबकी। फिर मुनि और राम ने एक दूसरे को प्रणाम किया। दोनों को वो खुशी मिली जो बातों में नहीं बता सकते। जब प्रयाग के लोगों को यह पता चला, वो सब भरद्वाज के आश्रम आ गए। यह लोग देखना चाहते थे दशरथ के बेटों को। राम ने सबको प्रणाम किया। सब लोग खुश हो गए। उनकी आँखें राम को देख के तृप्त हो गई। सबने आशीर्वाद दिया और खुशी पा के वापस चले गए। वापस जाते वक्त उनकी सुंदरता की तारीफ करते रहे।
Verse 222 (दोहा/सोरठा)
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।
राम ने रात को आराम किया। सुबह होने पर प्रयाग में नहाए। फिर सीता और लखन के साथ चले गए। उनका दिल खुश था। मुनि को सर झुका के प्रणाम किया।
Verse 223 (चौपाई)
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।। साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।। सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।। मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।। ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।। होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।
राम ने प्यार से मुनि से पूछा कि हम किस रास्ते जाएँ। मुनि अंदर ही अंदर मुस्कुराए। उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए सारे रास्ते आसान हैं। फिर मुनि ने अपने शिष्यों को बुलाया। सुन के पचास लोग आ गए। सबके दिल खुश थे। सबको राम से बहुत प्यार था। हर कोई कहता था कि हमारा रास्ता देखो। मुनि ने उनको चार बरगद के पेड़ दिए जो साथ चलें। यह पेड़ बहुत पुराने थे और नेकी करते रहे थे। प्रणाम कर के मुनि से आशीर्वाद लिया। फिर रघु कुल के प्रभु खुशी से चले गए। जब गाँव के पास पहुँचे तो लोग देखने के लिए दौड़ कर आए। औरतें और मर्द सब आ गए। उनका जनम सफल हो गया जो राम का दर्शन हुआ। लेकिन जब राम ने उन्हे वापस भेजा तो दुखी हो गए।
Verse 224 (दोहा/सोरठा)
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।
बरगद के पेड़ों को प्रणाम कर के उनसे विदा लिया। उनका काम बन गया जो मन चाहते थे। फिर यमुना पार कर के उसमें नहाए। उनका बदन काले रंग का हो गया जैसे यमुना का पानी है।
परम्परा में केवट-प्रसंग का पाठ ‘दास्य-भाव’ दृढ़ करता है और ‘भवसागर-तरण’ का स्मरण कराता है—विशेषतः नाम-स्मरण के साथ पढ़ने से शरणागति, निष्काम सेवा, और तीर्थ-भाव (अन्तःकरण-शुद्धि) की वृद्धि मानी जाती है।
सामान्य वैष्णव-परम्परा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-सम्पुट, अथवा ‘राम’ नाम का जप-सम्पुट (प्रत्येक दोहा/चौपाई के पूर्व/पश्चात) प्रचलित है; कुछ पाठ-परम्पराएँ ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-स्मरण को भी सम्पुट-रूप में रखती हैं।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.