Deity · Ramcharitmanas
Rama in the Ramcharitmanas
रामNamed in 1,259 verses
Speaks in 233 verses
In this book
Key chapters
The chapters where Rama matters most.
त्याग-दीक्षा का सोपान: राजधर्म, गृहधर्म और व्यक्तिगत आसक्ति का परित्याग करके ‘वन-मार्ग’ को ‘अंतर-मार्ग’ बनाना। इस काण्ड में राम का निष्कासन केवल कथा-घटना नहीं, साधक-चित्त का संस्कार है, जहाँ विरह, करुण
सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’, चित्त का संस्कार, दृष्टि का शुद्धीकरण, और रूप-माधुर्य के द्वारा सगुण ब्रह्म में मन का स्थिरीकरण। इस काण्ड में कथा-श्रवण स्वयं साधना बनता है: बाल-लीला और मिथिला-लीला ‘आकर्
सोपान-प्रवेश: ‘दर्शन’ से ‘आसक्ति’ और ‘श्रद्धा’ से ‘वर-निश्चय’ तक। बालकाण्ड में भक्ति का जन्म ‘श्रवण-कीर्तन’ से नहीं, ‘साक्षात् रूप-दर्शन’ से भी होता है, नगर-नारी, बालक, मुनि-पत्नी, सबके हृदय में राम-रू
वन-मार्ग ‘अन्तर्मुख साधना’ का सोपान है: जहाँ गृह-धर्म की संरक्षा (राज्य/समाज) से हटकर साधक ‘विरह, भय, और विवेक’ के माध्यम से आसक्ति-छेदन करता है। यहाँ सीता-वियोग ‘जीव की आत्म-विस्मृति’ और राम का अन्वे
यह सोपान ‘सखा-धर्म’ और ‘वैराग्य-प्रबोधन’ का द्वार है: साधक-चित्त (सुग्रीव/वानर-समुदाय) को राज्य-भोग, भय, और प्रमाद से निकालकर ‘राम-काज’ में स्थिर करना। बालि-वध के बाद करुणा, ज्ञान, और नीति का संगम दिख
त्याग-धर्म का सोपान: राजधर्म, कुलधर्म और निजी प्रेम (स्नेह) के टकराव में ‘राम-आज्ञा’ को परम मानकर अहं-क्षय, शरणागति और निष्काम सेवा की सिद्धि। अयोध्या काण्ड साधक को ‘घर’ (सामाजिक भूमिका) के भीतर ही वै
यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परख’ है: राज-वैभव का द्वार खुलते ही त्याग का द्वार भी खुलता है। अयोध्या काण्ड में राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप करुणा, धीरज, और पितृ-आज्ञा-पालन के द्वारा साधक को सिख
This sopāna is the ‘beauty of bhakti in motion’: devotion becomes effective action (sevā + śaraṇāgati). In the presented unit, the staircase-step is crossed through Vibhīṣaṇa’s renunciation of adharma
त्याग-धर्म की देहरी: राज-सुख और गृह-आसक्ति के बीच ‘राम-रजाइ’ (दैवी आज्ञा) को सर्वोच्च मानकर मन का राज्य ईश्वर को अर्पित करना। यह सोपान साधक को ‘स्व’ के अधिकार-बोध से निकालकर ‘सेवक-भाव’ और लोकहित-धर्म
राज्याभिषेक-उपरांत ‘धर्म-स्थापन’ और ‘भक्ति-स्थैर्य’ का सोपान: साधक के भीतर राम-राज्य (अन्तःकरण-राज्य) की प्रतिष्ठा, जहाँ सेवा, सत्संग, और नाम-स्मरण जीवन-व्यवस्था बनते हैं। यह चरण ‘फल-श्रुति’ द्वारा पा
Key episodes
Rama and Sita in the Flower Garden (Pushpavatika)
Ramcharitmanas 1.23-1.24
The Boatman Washes Rama's Feet (Kevat)
Ramcharitmanas 2.11
Every verse that names Rama
1,259 verses
- 1.1.1
मैं सरस्वती और गणेश को प्रणाम करता हूँ। इन्हीं ने अक्षर बनाए, अर्थ बनाए, कविता के रस बनाए, छंद बनाए, और हर मंगल का काम किया। मैं पार्वती और शिव को प्रणाम करता हूँ। ये दोनों श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं। इनके बिना सिद्ध लोग भी अपने दिल के…
- 1.1.3
मैं अपने गुरु के चरण कमल की धूल को प्रणाम करता हूं। उसमें प्यारी खुशबू है, मीठी महक है, और भक्ति का रस है। ये अमृत की जड़ से बना एक खूबसूरत चूरन है। ये दुनिया की सारी बीमारियों का पूरा परिवार खत्म कर देता है। ये शिव जी के शरीर की सुद्ध राख…
- 1.1.5
गुरु के चरणों की धूल एक नरम और सुंदर कजल है, आँखों के लिए अमृत है, जो आँख की हर खराबी को खत्म कर देती है। उस कजल से समझ की आँखों को साफ करके मैं राम के करमों को बताता हूँ, जो जनम मरण के चक्कर से आज़ाद कर देते हैं। पहले मैं ब्राह्मण के…
- 1.1.7
यहाँ नहाने का फल तुरंत दिखता है। कौवा कोयल बन जाता है और बगुला हंस बन जाता है। कोई इस सुन कर हैरान न हो। सतसंग की महिमा कोई छिपी हुई बात नहीं है। वाल्मीकि, नारद और मटके से पैदा हुए अगस्त्य ने अपने अपने मुँह से अपनी अपनी कहानी कह दी है।…
- 1.1.8
मैं उन संतों को प्रणाम करता हूँ जिनका दिमाग सबके लिए बराबर है। उनके लिए कोई अपना नहीं और कोई दुश्मन नहीं। जैसे अच्छे फूल हाथ में जोड़ कर पकड़ें तो दोनों हाथ को एक जैसी खुशबू देते हैं, वैसे ही वो सबके साथ बराबर रखते हैं। हे संतो, तुम सिम्पल…
- 1.1.15
जब भगवान ऐसी समझ देता है, तब इंसान अपनी गलतियों को छोड़ कर अच्छी बातों में लग जाता है। लेकिन वक्त, स्वभाव और पुराने करम की वजह से, अच्छे लोग भी कभी कभी गलती कर ही बैठते हैं। पर भगवान के भक्त उन गलती को ठीक कर देते हैं, दुख और दोष को मिटा…
- 1.1.16
ग्रह, दवाई, पानी, हवा और कपड़े, बुरे योग से मिलने पर बुरे बन जाते हैं, अच्छे योग से मिलने पर अच्छे। जो लोग अच्छे लक्षण पहचानते हैं वो ये समझ जाते हैं। दोनों पक्ष रोशनी और अंधेरे में बराबर हैं, फिर भी विधि ने अलग अलग नाम दिए। एक में चाँद…
- 1.1.17
चौसठ लाख तरह के जीव हैं, चार तरह से पैदा होते हैं, पानी में, ज़मीन पर और आसमान में रहते हैं। मैं समझता हूँ कि पूरा जगान सीता और राम से भरा हुआ है, इसलिए सब को हाथ जोड़ कर प्रणाम करता हूँ। हे दया के खानी, मुझे भी अपना नौकर मानो, और सब मिलकर…
- 1.1.19
बुरे लोग मज़ाक उड़ाएंगे तो भी मेरा फायदा होगा। कौवा कोएल की मीठी आवाज़ को खराब बोलता है। बगुला हंस पर हँसी करता है, और मेंढक चातक पर। वैसे ही गंदी सोच वाले बुरे लोग साफ़ बात पर हँसी करते हैं। जिन्हें काव्य का स्वाद नहीं और राम के चरणों से…
- 1.2.21
इस काव्य में राम का नाम है। बहुत पवित्र है। पुरान और वेदों का सार है। ये नाम मंगल का घर है। हर तरह के अमंगल को दूर करता है। शिव और पार्वती मिलकर इसे जपते हैं। कोई भी अच्हा कवि चाहे कितनी भी सुंदर रचना करे, राम के नाम के बिना उसमे चमक नहीं…
- 1.2.23
मेरी कविता राम की महिमा के साथ जुडी है तो सबको बहुत प्यारी लगेगी। मलय पहाद से जब लकडी आती है तो कोई ये नहीं सोचता कि कौनसी लकडी है। चंदन के जंगल के साथ जुडने की वजह से उसकी इज्जत होती है। गाय का रंग काला हो सकता है पर उसका दूध बिलकुल साफ…
- 1.2.25
कविता के मोती को कुशलती से बेध कर, फिर राम की कहानी के अच्छे धागे में पिरोया गया है। अच्छे लोग उन्हें अपने साफ दिल पे पेहनते हैं। वहां से बहुत सुंदरता आती है और दिल को बहुत खुशी मिलती है।
- 1.2.26
जो लोग इस खतरनाक कलि युग में पैदा होते हैं, उनके काम करने का तरीका कौवे जैसा है, बस दिखने में हंस जैसे लगते हैं। ये लोग बुरा रास्ता पकड़ते हैं, वेदों का रास्ता छोड़ देते हैं। ये धोखे का पिंड हैं और कलि युग की गंदगी के भंडार हैं। ये लोग…
- 1.2.28
सबको पता है भगवान कितने बड़े हैं, फिर भी कोई चुप नहीं रह पाया, सब उनकी तारीफ करते ही रहते हैं। इसलिए वेदों में यह बात लिखी गयी है कि भक्ति की ताकत कितनी बड़ी है, और इसको बहुत तरीके से बताया गया है। एक ऐसा है जो कोई चाहत नहीं रखता, जिसका…
- 1.2.30
ऐसे ही अपने मन को बल दिखाता हुआ, मैं रघु के स्वामी की सुंदर कथा सुनाऊँगा। बहुत से बड़े कवि हुए, व्यास आदि, जिन्होंने हरि की महिमा श्रद्धा से बयान की। मैं उनके चरण कमल को प्रणाम करता हूँ। मेरे सारे मन पूरे करो। कलि युग के कवि जिन्होंने रघु…
- 1.2.31
फिर मैं सरस्वती और गंगा को मथा टेकता हूं। सरस्वती बोलने की देवी हैं और गंगा देवताओं की नदी हैं। दोनों पाक हैं और दोनों के काम प्यारे हैं। एक से नहाने और पानी पीने से पाप खतम हो जाता है। दूसरी को बताने और सुनने से समझ-बुद्धि की कमी दूर हो…
- 1.2.33
मैं अयोध्या शहर को नहीं झुकता हूं, बहुत पावनी है, और सरयू नदी को भी झुकता हूं जो कलि युग के सारे पाप मिटा देती है। फिर शहर के आदमी और औरतों को भी प्रणाम करता हूं, क्योंकि भगवान की इन पर कोई छोटी मोहब्बत नहीं थी, बहुत प्यार था। सीता की…
- 1.2.34
मैं उन अवध के राजा को प्रणाम करता हूँ। उनका राम के चरणों के लिए प्यार सच्हा था। जब राम से बिछड़ गए, तो अपनी जान से प्यारी अपनी बॉडी को ऐसे छोड़ दिया जैसे कोई घास की पत्ती हटा दे।
- 1.2.35
मैं जनक और उनके परिवार को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें राम के चरणों के लिए गेहरा छिपा प्यार था। उन्होंने इस प्यार को योग और राजा के सुख दोनों के बीच छिपा रखा, पर राम को देखते ही वो सब सामने आ गया। सबसे पहले मैं भरत के चरणों को प्रणाम करता हूँ…
- 1.2.36
मैं हनुमान को प्रणाम करता हूँ। वो पवन के बेटे हैं। बुरे लोगों का एक जंगल है, और हनुमान उसको जलाने वाली आग है। वो ज्ञान का खजाना है। उनके दिल में राम बसते हैं, धनुष और तीर लेकर।