Opening the text
यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परख’ है: राज-वैभव का द्वार खुलते ही त्याग का द्वार भी खुलता है। अयोध्या काण्ड में राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप करुणा, धीरज, और पितृ-आज्ञा-पालन के द्वारा साधक को सिखाता है कि मुक्ति की सीढ़ी घर-गृहस्थी से भागना नहीं, बल्कि आसक्ति का रूपांतरण है—स्वेच्छा से व्रत बनकर आया हुआ वनवास।
मुख्य प्रतीक ‘दाह’ (अधर सूखना, अंग जलना) है—यह केवल शारीरिक पीड़ा नहीं, धर्म-संकट की अग्नि है जो आसक्ति को तपाकर वैराग्य में ढालती है। कैकेयी की ‘सरुष’ निकटता ‘कुटिल-वाक्’ का प्रतीक बनकर दिखाती है कि वाणी भी धर्म-युद्ध का शस्त्र हो सकती है। दशरथ की विवशता ‘वचन’ की बेड़ी है—राजा भी सत्य-प्रतिज्ञा के आगे असहाय। राम का मृदु स्वभाव ‘बिगत सब दूषन’ की छवि है: मर्यादा में स्थित प्रेम, जो शोक को शान्त-धीरता में रूपांतरित करता है। ‘घर से वन’ का स्थापत्य-रूपक भीतर की यात्रा है—गृहस्थी का त्याग नहीं, आसक्ति का रूपांतरण; वनवास ‘दण्ड’ नहीं, ‘व्रत’ बनकर स्वीकारा गया धर्म। लोक-निन्दा/लोक-शोक सामाजिक धर्म का दर्पण है—व्यक्ति का निर्णय समुदाय की नैतिक चेतना में प्रतिध्वनित होता है।
Verse 82 (चौपाई)
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।। सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।। करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।। मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।। सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।। देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना। सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
उसके होंठ सूखे हुए थे, सारे जिस्म में जलन थी। वो एक गरीब साँप जैसा था जिसके पास कोई मोती नहीं थी। कैकेयी पास खड़ी थी, उस्से देख के लगा जैसे मौत घर आ गई हो। राम का दिल बहुत नरम था, उसने ऐसा दुख पहले कभी देखा या सुना नहीं था। फिर भी वो शांत रहा, सोचा कि यह क्या टाइम है, और अपनी माँ से आराम से पूछा। माँ, मुझे बताओ पापा को क्या हुआ है। मैं कोशिश करूँगा कि वो ठीक हो जाए। सुन राम, यह पूरा मैटर यह है कि राजा तुमपे बहुत प्यार करता है। उसने मुझे दो चीज़ें माँगने को कहा था, मैने वो माँगा जो मुझे सही लगता था। यह सुन के राजा बहुत परेशान हो गया। वो तुम्हारे लिए कोई बुरी बात नहीं कर सकता।
Verse 83 (दोहा/सोरठा)
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
एक तरफ बेटे का प्यार था, दूसरी तरफ प्रॉमिस। राजा बहुत परेशान हो गया। वो अपना वर्ड नहीं तोड़ सकता था, वो सर पे ले के बैठा था, और उसका दुख दूर नहीं हो रहा था।
Verse 84 (चौपाई)
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।। जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।। सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।। मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।। सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
वो डरे बिना बैठी और कड़वी बातें बोली। उसकी बातें सुन के वो बहुत दुखी हुआ। उसकी जीभ कमान थी, उसके शब्द तीर थे, जैसे कोई योधा राजा पे तीर चला रहा हो। जैसे उसने अपने आप में कड़कपन भर लिया हो, वो बेस्ट हीरो को धनुष चलाना सिखाने लगी। उसने पूरा मैटर रघु के राजा को बताया, बिल्कुल कड़क हो के बैठी। राम, सूर्य वंस का शहज़ादा, अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था। वो हमेशा खुश रहता था। उसने ऐसी बातें बोली जिसमें कोई बुरी बात नहीं थी, नरम और प्यारी, जैसे गार्डन में फूल हो। माँ सुन, वो बेटा बहुत खुशकिस्मत होता है जो माँ बाप की बात मानता है। बेटा जो माँ बाप को खुश रखता है, ऐसा बेटा पूरी दुनिया में मिलना मुश्किल है।
Verse 85 (दोहा/सोरठा)
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
जंगल में रिशियों से मिलना बहुत खास है, और यह मेरे लिए हर तरह से अच्छा है। इसमें पहले पापा का ऑर्डर है, और फिर तुम्हारी भी परमिशन है।
Verse 86 (चौपाई)
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु। जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।। सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।। तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।। अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।। राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
भरत मेरे जान से भी प्यारा है, उसको ही राज्य मिलेगा। आज किस्मत मेरे साथ है, सब कुछ मेरे फेवर में हो गया। अगर मैं इस काम के लिए वन नहीं जाता, तो लोग मुझे पहले ही बेवकूफ समझते। लोग ऐसा करते, अमृत छोड़ के ज़हर माँग लेते, कल्प तरु को छोड़ के अरेंडु को सर्व करते। इसलिए माँ, यह मौका हाथ से मत जाने दो। दिल में सोच के देखो। माँ, मुझे एक बात का दुख है, राजा बिल्कुल टूट गया है। पापा ने इतनी बात में इतना दुख पा लिया। माँ मुझपे भरोसा नहीं करती। राजा इतना धीर है, गुणों का समुंदर है, फिर भी मैंने बड़ा अपराध कर दिया। मैं जा रहा हूँ और राजा मुझसे कुछ नहीं कह रहे। मेरी कसम, मैं सच बोल रहा हूँ।
Verse 87 (दोहा/सोरठा)
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
रघुकुल के राजा के जो सीधे-सादे बातें हैं, बेवकूफ लोग उन्हें भी टेढ़ा समझते हैं। पानी जैसे अपनी मर्ज़ी से बहता है, लेकिन पानी वही रहता है, वैसे ही उनकी बातें हैं।
Verse 88 (चौपाई)
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।। तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।। पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।। लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
रानी ने देखा कि राम अकेले हैं, तो वो उनके पास गई। देखने में प्यार से बात कर रही थी, पर दिल में कुछ और था। उसने कहा, तुम्हारी कसम और भरत के आने की कसम, मैं कोई दूसरी वजह नहीं जानती। बेटा, तुम कोई गलती नहीं कर रहे। माँ बाप तो सुख देने वाले होते हैं। राम, तुम जो भी कह रहे हो वो सच है। तुम अपने माँ बाप की बात मान रहे हो। पापा को समझा के यही कहो जो ठीक हो, जिससे किसी को बुरा ना लगे। जिस बेटा जैसा तुम हो, उसके साथ ऐसा करना ठीक नहीं है। कैसे बातें अच्छी लगती हैं? जैसे गया जैसे तीरथ जाना, वैसे ही यह बातें हैं। राम को माँ की सारी बातें अच्छी लगी। जैसे गंगा का पानी अच्छा लगता है, वैसे ही।
Verse 89 (दोहा/सोरठा)
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
राजा बेहोश हो गया, राम का नाम लिया और उसके बाद लेट गया। मंत्री ने कहा कि राम आ रहे हैं, और सही टाइम पे विनम्र बात की।
Verse 90 (चौपाई)
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।। लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।। रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।। सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।। सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।
राजा ने राम के पैर अपनी आँखों से लगाये। फिर खुद को संभाला और आँखें खोली। मंत्रियों ने राजा को बिठाया। राजा राम के पाँव पड़ गया और राम देखते रहे। राजा ने राम को दिल से लगा लिया। जैसे कोई अपना खोया हुआ मोती वापस पा ले, वैसा ही था। राजा सिर्फ राम को देख रहा था, आँखों से आँसू आ रहे थे। दुख में कुछ बोल नहीं पा रहा था, बार बार दिल से लगा रहा था। राजा मन में मन राम को समझा रहा था कि वन मत जाओ। फिर शिव जी को याद करके बोला, मेरी प्रेयर सुनो, आप तो भोला भंडारी हो, मेरी दिक्कत दूर करो, मुझे अपना दास समझो।
Verse 91 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
तुम सब के दिल में रहते हो, सब को सही रास्ता दिखाते हो। मुझे ऐसा बना दो कि मैं राम को अपना दिल दे दूँ। मैं तुम्हारा कहा मान के घर पे रहूँगा, शर्म और प्यार सब छोड़ के।
Verse 92 (चौपाई)
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।। सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।। अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।। रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।। देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।। अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।। देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
लोग मुझे बुरा कहें, मेरी बदनामी हो जाए, मैं नरक में भी पड़ जाऊँ, पर स्वर्ग में जाने का कोई फायदा नहीं। मैं सारा दुख सहलूँगा, बस राम मेरी आँखों में नहीं आना चाहिए। राजा ने मन में सोचा पर कुछ बोला नहीं, उसका दिल पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था। जब उसने देखा कि राम अपने बाप से कितना प्यार करते हैं, तो माँ ने सोचा वो कुछ कहेंगे। वक्त और जगह देख के वो धीरे से बोले। बाप, मैं कुछ कहता हूँ, बचपन की बात माफ़ करना। इतनी छोटी बात पे तुमने इतना दुख लिया, मुझे पहले किसी ने बताया भी नहीं। मैंने गोसाईं की नज़र देख के माँ से पूछा, और सुन के मेरे शरीर को ठंडी हवा लगी।
Verse 93 (दोहा/सोरठा)
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
यह बहुत अच्छा वक्त है बाप, प्यार में सब चिंता छोड़ दो। खुशी से मुझे आदेश दो, और तुम्हारा दिल खुश हो जाए।
Verse 94 (चौपाई)
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।। आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।। बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।। अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।। नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।। सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
दुनिया में उसका जन्म धन्य है जिसके बाप उसकी बातें सुन के खुश होता है। उसके पास चारो चीज़ें हैं, बाप और माँ उसके लिए जान के बराबर हैं। तुम्हारा आदेश मिल के मेरा जन्म सफल हो गया, अब मुझे जल्दी से भेज दो। मैं माँ से मिल के परमिशन लूँगा और फिर उनके पाँव छू के चला जाऊँगा। ऐसा कह के राम ने चलने की तैयारी की, राजा इतना दुखी था कि कुछ बोल नहीं पाया। शहर में यह बात फैल गई, जैसे सब के शरीर में ज़हर घुल गया हो। सुन के सब लोग दुखी हो गए, जैसे पेड़ और बेल सूख जाते हैं। जहाँ किसी ने सुना वही अपना सिर पीटने लगा, बहुत दुख था और कोई शांति नहीं थी।
Verse 95 (दोहा/सोरठा)
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
उनके मुँह सूख रहे थे, आँखों से आँसू आ रहे थे, दिल में इतना दुख था कि समा नहीं रहा था। जैसे अयोध्या पे दया की बारिश बरसी हो।
Verse 96 (चौपाई)
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।। एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।। निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।। पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।। सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।। सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।
इस बीच में विधि को ऐसे बात सुननी पड़ी जो काम की नहीं थी। लोगों ने कैकेयी को यहाँ-वहाँ गाली दी। इस पापी औरत पर क्या हैरानी? ऐसा लगा जैसे उसके घर में आग लगा दी हो। वो अपने हाथों से अपनी आँखें निकालना चाहती थी। अमृत छोड़ के ज़हर पीना चाहती थी। वो धोखेबाज़, कठोर और बुरी सोच वाली थी। नसीब भी उसका खराब था। वो रघु वंश के बाँस के जंगल की आग बन गई। पेड़ के साये में बैठ के उसने पेड़ काट दिया। खुशी के बीच में दुख लाई, और बड़ा नाटक किया। राम उसके जान के बराबर था। ऐसे में उसने धोका क्यों किया? कवि सच बोलते हैं। औरत का स्वभाव समझना बहुत मुश्किल है। वो अपना ही परछा पकड़ती है। भाई, औरत का रास्ता समझना नामुमकिन है।
Verse 97 (दोहा/सोरठा)
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
आग जो नहीं जला सके, समुंदर जो निगल न सके। जब कोई कमज़ोर औरत ताकतवर बन जाए, वो काम न कर सके। इस दुनिया में कौन है जो वक़्त से बच सके?
Verse 98 (चौपाई)
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।। जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।। एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।। सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।। कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
विधि क्या सुनाए, और किसको सुनाए? क्या दिखाए, और किसको दिखाए? कुछ लोग कहते हैं राजा ने ठीक नहीं किया। पर सोचने पर, उसने बुरी बात को जगह नहीं दी। जो हुआ वो दुख का बरतन बन गया। वो एक मजबूर औरत थी, जैसे उसका ज्ञान और गुण चला गया हो। कुछ धरम के ज्ञाता कहते हैं कि राजा में कोई दोष नहीं। वो शिबि और दधीचि, हरिश्चंद्र की कहानियाँ बताते हैं। हर एक पूरी पूरी बताता है। कुछ कहते हैं भरत ने हाँ कही थी। कुछ चुपचाप सुनते रहते हैं, उदास हो के। कुछ कान बंद करके, दाँत और जीभ दबा के कहते हैं कि यह बात झूठ है। अच्छे लोग उनसे कहते हैं कि भरत के लिए राम जान से प्यारे हैं।
Verse 99 (दोहा/सोरठा)
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
अगर चाँद को आग जला दे, अगर अमृत ज़हर बन जाए। फिर भी भरत कभी सपने में भी राम के खिलाफ़ कुछ नहीं करेगा।
Verse 100 (चौपाई)
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।। खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।। बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।। भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।। कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।। कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
सिर्फ वो लोग विधि को दोष दे सकते हैं जिन्होने अमृत दिखाया और ज़हर दिया। शहर में हहाकार मचा था। सब परेशान थे। दिल में आग थी, खुशी मिट गई। ब्राह्मण औरतें, जो कैकेयी को बहुत प्यारी थी, उसको समझाने लगी। उसकी अच्छाई की तारीफ करने लगी। उनकी बातें तीर की तरह लगी। वो कहने लगी, भरत मुझे राम से ज़्यादा प्यारा नहीं है। सारी दुनिया यह जान ले। राम से प्यार रखो। आखिर क्या गलती हुई है कि आज उसे जंगल भेज रहे हो? कभी तुमने मुझे अपनी सौतन समझा? सारी दुनिया तुम्हारा प्यार और भरोसा जानती है। कौशल्या, अब क्या बिगड़ा? तुम्हारे लिए तो वज्र भी शहर से गुज़र गया।
Verse 101 (दोहा/सोरठा)
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।
क्या सीता अपने पिया को छोड़ देगी, या लक्ष्मण घर पे रहेगा? क्या भरत राज पायेगा, या राजा राम के बिना जियेगा? यह सब सवाल थे उस वक्त।
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘पितृ-भक्ति, वचन-पालन, और संकट में समता’ की सिद्धि देता है; गृहस्थ-साधक के लिए यह पाठ शोक-निवारण, मन-स्थैर्य, तथा ‘धर्म-निर्णय’ की बुद्धि बढ़ाता है—क्योंकि राम के धैर्य का स्मरण स्वयं ‘अशान्त मन’ को शान्त करता है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-संपुट जोड़ा जाता है; वचन-पालन के प्रसंग में कई परंपराएँ ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम’ को भी स्मरण-रूप में रखती हैं (स्थानीय परंपरा-भेद संभव)।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.