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राज्याभिषेक-उपरांत ‘धर्म-स्थापन’ और ‘भक्ति-स्थैर्य’ का सोपान: साधक के भीतर राम-राज्य (अन्तःकरण-राज्य) की प्रतिष्ठा, जहाँ सेवा, सत्संग, और नाम-स्मरण जीवन-व्यवस्था बनते हैं। यह चरण ‘फल-श्रुति’ द्वारा पाठक को प्रत्यक्ष साधना-फल का आश्वासन देकर मन को निष्काम-भक्ति की ओर स्थिर करता है।
यह प्रकरण ‘राज्याभिषेक’ को साधक के भीतर ‘राम-राज्य’ की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाता है। कैकेयी की लज्जा—अहं-भ्रम और कर्म-फल की ग्लानि—भवानी के प्रबोधन से शुद्ध होकर ‘अनुग्रह’ में बदलती है: दोष-बोध का परिष्कार, न कि आत्म-नाश। जटा-निर्मोचन/स्नान/दिव्य-वस्त्र—वैराग्य-परिपाक के बाद शुद्ध चित्त का अलंकरण; बाह्य शृंगार नहीं, अन्तःकरण का संस्कार। वेद-स्तुति और शम्भु-स्तुति—ज्ञान और भक्ति का संगम; निर्गुण-सगुण की एकता का सिद्धान्त-स्थापन कि राम ‘सगुन-निर्गुन रूप अनूप’ हैं। देव-दुन्दुभि और मुनि-हर्ष—साधना-सिद्धि पर अन्तः-आकाश में उठने वाला ‘मंगल-नाद’। फलश्रुति—कथा/नाम को औषधि-रूप बताकर ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव-भय’ के दाह का प्रतीक; पाठक के लिए प्रत्यक्ष साधना-फल का आश्वासन। कपियों की विदाई और अंगद का विनय—सिद्धि के बाद भी भक्ति का अनुशासन: सेवा, सत्संग, और नाम-स्मरण ही जीवन-व्यवस्था।
Verse 24 (दोहा/सोरठा)
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ। लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ।।5।।
puni prabhu haraṣi satruhana bheṇṭe hṛdayã lagāi. lachimana bharata mile taba parama prema dou bhāi..5..
फिर प्रभु खुश होके शत्रुघ्न से मिले और उसे अपने दिल से लगा लिया। उसके बाद लक्ष्मण और भरत भी मिले, दोनों भाइयों में बहुत प्यार था।
Verse 25 (चौपाई)
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।। सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।। प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।। प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।। अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।। कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।। छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।। एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।। कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।
bharatānuja lachimāna puni bheṇṭe. dusaha biraha saṁbhava dukha meṭe.. sītā carana bharata siru nāvā. anuj sameta parama sukha pāvā.. prabhu biloki haraṣe purabāsī. janita biyoga bipati saba nāsī.. prema-ātura saba loga nihārī. kautuka kīnha kṛpāla kharārī.. amita rūpa pragaṭe tehi kālā. jathāyoga mile sabahi kṛpālā.. kṛpā-dṛṣṭi raghubīra bilokī. kie sakala nara nāri bisokī.. chana mahĩ sabahi mile bhagavānā. umā marama yaha kāhũ na jānā.. ehi bidhi sabahi sukhī kari rāmā. āgẽ cale sīla guna dhāmā.. kausalyādi mātu saba dhāī. nirakhi baccha janu dhenu lavāī..
भरत के छोटे भाई लक्ष्मण फिर से मिले, और बिछड़ने का जो दर्द था वो मिट गया। भरत ने सीता के चरणों में सिर झुकाया, और अपने छोटे भाइयों के साथ बहुत खुशी पाई। प्रभु को देख के शहर के लोग खुश हो गए, बिछड़ने के सारे दुख खत्म हो गए। सब लोग प्यार में डूबे हुए थे, प्रभु ने एक चमत्कार दिखा दिया। उस वक्त प्रभु के अनेक रूप दिखे, और वो सबसे मिला जैसे होना चाहिए था। रघुवीर की कृपा की नज़र से हर औरत और मर्द का दुख दूर हो गया। एक पल में भगवान सबसे मिल गया, पर यह राज़ कोई नहीं समझता। ऐसे ही राम ने सबको खुश कर दिया और आगे बढ़ गया, वो शील और गुणों का घर था। फिर कौसल्या और बाकी माताएँ दौड़ कर आईं, अपने बेटे को देख कर जैसे गाय अपने बच्चे को देख कर खुश होती हैं।
Verse 26 (छंद)
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई। अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥
janu dhenu bālaka baccha taji gṛhã carana bana parabasa gaī̃. dina anta pura rukha stravata thana huṅkāra kari dhāvata bhaī.. ati prema saba mātu bheṭī̃ bacana mṛdu bahubidhi kahe. gaī biṣama biyoga bhava tinh haraṣa sukha aganita lahe..
जैसे गाय को जब ज़ोर से बच्चे से अलग करके जंगल में भेजा जाता है, शाम को वो शहर की तरफ मुड़ती है, दूध टपकता है और आवाज़ करके दौड़ती आती है। वैसे ही सारी माताएँ अपने बेटे से प्यार से मिली और उन्होंने बहुत नरम-नरम बातें कही। बिछड़ने का जो बड़ा दुख था वो चला गया, और उन्होंने अनंत खुशी पाई।
Verse 27 (दोहा/सोरठा)
भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि।।6(क)।। लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6।।
bheṭeu tanaya sumitrā̃ rāma carana rati jāni. rāmahi milata kaikeī hṛdayã bahuta sakucāni..6(ka).. lachimāna saba mātanhi mili haraṣe āsiṣa pāi. kaikei kahã puni puni mile mana kara chobhu na jāi..6..
सुमित्रा अपने बेटे से मिली, उसको पता था कि उसका दिल राम के चरणों में लगा है। पर जब कैकेयी राम से मिली, उसका दिल बहुत शर्मा गया। लक्ष्मण सारी माताओं से मिला और खुश होके उनका आशीर्वाद लिया। पर कैकेयी से बार-बार मिला, उसका दिल शांत नहीं हुआ।
Verse 28 (चौपाई)
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।। deहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।। सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।। कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।। नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।। कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।। हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।। अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।
sāsunhaṁ sabani milī baidehī | carananhi lāgi haraṣu ati tehī || dehiṁ asīsa būjhi kusalātā | hoi acala tumhār ahi-vātā || saba raghupati mukha-kamala bilokahiṁ | maṅgala jāni nayana-jala rokahiṁ || kanaka thāra ārati utārahiṁ | bāra-bāra prabhu gāta nihārahiṁ || nānā bhāँti nichāvari karahīṁ | paramānanda haraṣa ura bharahīṁ || kausalya puni-puni raghubīrahi | citavati kṛpā-siṁdhu raṇadhīrahi || hṛdayaṁ bicārati bārahiṁ-bārā | kavan bhāँti laṅkāpati mārā || ati sukumāra jugala mere bāre | nisicara subhaṭa mahābala bhāre ||
सारी ससुर वाली माताएँ सीता से मिली, उसने उनके चरणों में सिर झुकाया और वो बहुत खुश हुई। उन्होंने आशीर्वाद दिया और पूछा कि कैसी है, तुम्हारा घर सदा खुश रहे। सब लोग रघुपति के चेहरे को देख रहे थे, वो मंगल समझ के आँसू रोक नहीं पा रहे थे। सोने की थाली से आरती उतारी और बार-बार प्रभु के शरीर को देखा। बहुत तरह से पूजा की और दिल में खुशी भर गई। कौसल्या बार-बार रघुवीर को देख रही थी, वो कृपा का सागर और युद्ध का वीर था। उसके दिल में बार-बार यह बात आ रही थी कि कैसे लंका के राजा को मारा। मेरे दोनों बेटे इतने नरम-कोमल हैं और वो राक्षस बहुत ताकतवर थे।
Verse 29 (दोहा/सोरठा)
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।।7।।
lachimana aru sītā sahita prabhahi bilokati mātu | paramānanda magana mana puni-puni pulakita gātu ||7||
माँ ने देखा कि प्रभु लक्ष्मण और सीता के साथ आ रहे हैं। उनका मन इतना खुश हुआ कि जैसे कोई बहुत वाले दिन का सुख मिल गया हो। बार-बार उनका पूरा बदन खुशी से काँपने लगा।
Verse 30 (चौपाई)
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।। हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।। भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।। देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।। पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।। गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।। ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।। मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।। सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।
laṅkāpati kapīsa nala nīlā | jāṁvanta aṅgada subhasīlā || hanumadādi saba bānara bīrā | dhare manohara manuja sarīrā || bharata saneha sīla brata nemā | sādara saba baranahiṁ ati premā || dekhi nagara-bāsinhi kai rītī | sakala sarāhahi prabhu pada prītī || puni raghupati saba sakhā bolāe | muni pada lāgahu sakala sikhāe || guru basiṣṭha kula-pūjya hamāre | inha kī kṛpāँ danuja rana māre || e saba sakhā sunahu muni mere | bhae samara-sāgara kahaँ bere || mama hita lāgi janma inha hāre | bharatahu te mohi adhika piāre || suni prabhu bacana magana saba bhae | nimiṣa nimiṣa upajata sukha nae ||
लंका के राजा, वानर सेना के सरदार, नल, नील, जामवंत और अंगद सब थे। हनुमान और बाकी सारे बहादुर वानरों ने इंसान जैसा रूप धर लिया। भरत ने उन सब का बहुत प्यार से वर्णन किया। वो अपने धरम, व्रत और अच्छे स्वभाव के लिए जाने जाते थे। शहर के लोगों ने देखा कि यह सब प्रभु के पैरों कितनी लगाव रखते हैं। फिर प्रभु ने अपने सारे साथियों को बुलाया और कहा कि ऋषि के पैर छूना सीखो। उन्होंने कहा कि गुरु वशिष्ठ हमारे कुल के गुरु हैं। उनकी कृपा से ही दानव युद्ध में मारे गए। प्रभु ने कहा कि दोस्तो, मेरे ऋषि सुनो। तुम लोग तो समुंदर जैसी लड़ाई में भी मेरे साथ रहे। मेरे लिए तुमने अपने जनम भी बिता दिए। मुझे भरत से भी ज़्यादा प्यारे हो तुम लोग। प्रभु की बात सुनके सब बहुत खुश हो गए। हर पल नया सुख महसूस हो रहा था।
Verse 31 (दोहा/सोरठा)
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ।।8(क)।। सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।।8(ख)।।
kausalya ke carananhi puni tinh nāyu mātha | āsisa dīnhe haraṣi tumha priya mama jimi raghunātha ||8(ka)|| sumana bṛṣṭi nabha saṅkula bhavana cale sukhakaṁda | caṛhī aṭārinhi dekha-hiṁ nagara nāri nara bṛṁda ||8(kha)||
फिर उन सब ने कौसल्या माँ के पैर छूए और उनका सर झुकाया। माँ बहुत खुश होकर आशीर्वाद दिया कि तुम मुझे रघुनाथ जैसे प्यारे हो। आसमान से फूल बरसने लगे, इतने कि पूरा आसमान भर गया। प्रभु खुशी से महल की तरफ चले गए। औरतों और मर्दों की भीड़ छत पर चढ़ गई शहर का नज़ारा देखने।
Verse 32 (चौपाई)
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।। बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।। नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।। जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।। कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।। करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।। पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।। तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।
kaṁcana kalasa bicitra saṁvāre | sabahiṁ dhare saji nija-nija dvāre || baṁdanavāra patākā ketū | sabanhi banāe maṅgala hetū || bīthīṁ sakala sugandha siṁcāī | gajamani raci bahu cauka purāī || nānā bhāँti sumaṅgala sāje | haraṣi nagara nisāna bahu bāje || jahaँ-tahaँ nāri nichāvari karahīṁ | dehiṁ asīsa haraṣa ura bharahīṁ || kaṁcana thāra āratī nānā | jubatī sajaṁ kara-hiṁ subha gānā || karahiṁ āratī ārati-hara keṁ | raghukula kamala bipina dinakara keṁ || pura sobhā saṁpati kalyānā | nigama seṣa sāradā bakhānā || teu yaha carita dekhi ṭhagi rahahīṁ | umā tāsu guna nara kimi kahahīṁ ||
लोगों ने सोने के बर्तन सजाए और अपने अपने दरवाज़े पर रख दिए। हर तरफ पताका और झंडा लगाया, सब शुभ काम के लिए। गलियों में इत्र डाला और आंगन में रंगोली बनाई। हर तरह से शुभ सजावट की और ढोल बजाए। औरतें खुश होकर आशीर्वाद देती थी, उनका दिल खुशी से भरा था। सोने की थाल में आरती की और जवानियों ने अच्छे गाने गाए। आरती उसकी की जो दुख देता है, रघु कुल के सूरज की। शहर की शोभा, संपत्ति और कल्याण के बारे में वेद भी बताते हैं। लेकिन यह चरित्र देखके वो भी हैरान रह गए। उमा, इंसान कैसे बताए उसके गुण?
Verse 33 (दोहा/सोरठा)
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस।।9(क)।। होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9(ख)।।
nāri kumudinīṁ avadha-sara raghupati biraha dinesa | asta bhaeṁ bigasata bhaīṁ nirakhi rāma rākesa ||9(ka)|| hohiṁ saguna subha bibidha bidhi bājahiṁ gagana nisāna | pura nara nāri sa-nātha kari bhavana cale bhagavāna ||9(kha)||
अयोध्या की औरतें जैसे कमल के फूल थी, जो प्रभु के बिना सूख गई थी। अब जब रघुपति वापस आए, वो खिल गई जैसे चाँद निकलने से फूल खिलते हैं। अच्छे शगुन होने लगे और आसमान में ढोल बजने लगे। प्रभु ने शहर के मर्दों और औरतों को वापस अपना बनाया और महल की तरफ चले गए।
Verse 34 (चौपाई)
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।। ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।। कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।। गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।। सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।। मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।। कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।। अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।
prabhu jānī kaikēī lajanī | prathama tāsu gṛha gae bhavānī || tāhi prabodhi bahuta sukha dīnhā | puni nija bhavana gavana hari kīnhā || kṛpāsiṁdhu jaba maṁdira gae | pura nara nāri sukhī saba bhae || gura basiṣṭha dvija liē bulāī | āju sugharī sudina samudāī || saba dvija dehu haraṣi anusāsana | rāmacandra baiṭhahiṁ siṁghāsana || muni basiṣṭha ke bacana suhāe | sunata sakala bipranha ati bhāe || kahahiṁ bacana mṛdu bipra anekā | jaga-abhirāma rāma abhiṣekā || aba munibara bilaṁba nahiṁ kīje | mahārāja kahaṁ tilaka karīje ||
भगवान ने जाना कि कैकेयी शर्मा रही है। तो पार्वती पहले उसके घर गई। उसने कैकेयी को समझाया और बहुत सुकून दिया। फिर भगवान वापस अपने धाम चले गए। जब वोह दया के सागर पैलेस पहुँचे, शहर के सब लोग खुश हो गए। गुरु वशिष्ठ ने ब्राह्मणों को बुलाया। आज एक अच्छा दिन था। उन्होंने कहा, ब्राह्मण भाइयों, खुशी से हाँ करो। रामचंद्र सिंहासन पर बैठे। वशिष्ठ की बातें बहुत प्यारी थीं। सब ब्राह्मण सुन के खुश हो गए। बहुत से ब्राह्मणों ने नरम-नरम कहा कि राम का राज्याभिषेक होना चाहिए। वोह पूरे जगत को खुशी देने वाले हैं। हे मुनि, अब देर न करो। महाराज का तिलक कर दो।
Verse 35 (दोहा/सोरठा)
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10(क)।। जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।।
taba muni kaheu sumaṁtra sana sunata caleu haraṣāi | ratha aneka bahu bāji gaja turata saṁvāre jāi ||10(ka)|| jahaṁ-tahaṁ dhāvana paṭhaī puni maṁgala drabya magāi | haraṣa sameta basiṣṭha pada puni siru nāyu āi ||10(kha)||
तब ऋषि ने सुमंत्र को कहा। सुमंत्र सुन के खुशी से निकल पड़ा। उसने तुरंत बहुत सारे रथ, घोड़े और हाथी तैयार करवाए। वोह हर तरफ दौड़ के लोग भेजा और शुभ चीज़ें मंगवाई। फिर खुशी से वापस आया और वशिष्ठ के पाँव सर झुकाया।
Verse 36 (चौपाई)
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।। राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।। सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।। पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।। अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।। भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।। पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।
avadhapurī ati rucira banāī | devanha sumana bṛṣṭi jhari lāī || rāma kahā sevakanha bulāī | prathama sakhanha anhavāvahu jāī || sunata bacana jahaṁ-tahaṁ jana dhāe | sugrīvādi turata anhavāe || puni karunānidhi bharatu haṁkāre | nija kara rāma jaṭā nirūāre || anhavāe prabhu tīniu bhāī | bhagata bachala kṛpāla raghurāī || bharata bhāgya prabhu komalatāī | seṣa koṭi sata sakahiṁ na gāī || puni nija jaṭā rāma bibarāe | gura anusāsana māgi nahāe || karī majjana prabhu bhūṣana sāje | aṁga anaṁga dekhi sata lāje ||
अयोध्या को बहुत सुंदर बनाया गया। देवताओं ने फूल बरसाए। राम ने सेवको को कहा के पहले दोस्तों को नहला दो। लोग सुन के हर तरफ दौड़ पड़े। सुग्रीव और बाकी सब तुरंत नहलाए गए। फिर भरत को बुलाया गया। राम ने खुद अपने हाथ से उसकी जटें खोल दी। भगवान ने तीनों भाइयों को नहलाया। राम अपने भक्तों के बहुत दयालु हैं। भरत की किस्मत और राम की नरमी का कोई अंत नहीं। शेष भी गाके नहीं बता सकता। फिर राम ने अपनी जटें खोली। गुरु की अनुमनी लेकर नहाए। नहाने के बाद भगवान ने गहने पहने। उनकी खूबसूरती देख के कामदेव भी शर्मा गया।
Verse 37 (दोहा/सोरठा)
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ। दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।11(क)।। राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि। देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि।।11(ख)।। सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।।11(ग)।।
sāsunha sādara jānakihi majjana turata karāi | dibya basana bara bhūṣana aṁga-aṁga saje banāi ||11(ka)|| rāma bāma disi sobhati ramā rūpa guna khāni | dekhi mātu saba haraṣīṁ janma suphala nija jāni ||11(kha)|| sunu khagesa tehi avasara brahmā siva muni bṛṁda | caṛhi bimāna āe saba sura dekhana sukhakaṁda ||11(ga)||
सास ने सीता को इज्जत से नहलाया। उसने देवी कपड़े और गहने पहने। राम के बायें तरफ सीता खड़ी थी। वोह लक्ष्मी जैसी सुंदर थी। माँ ने देख के खुशी से अपना जन्म सफल समझा। गरुड़, सुन। उस वक्त ब्रह्मा, शिव और बहुत ऋषि आसमान से आए। सब देवता खुशी के लिए आए थे।
Verse 38 (चौपाई)
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।। रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।। जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।। बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।। प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।। बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।। सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
prabhu biloki muni mana anurāgā | turata dibya siṅghāsana māgā || rabi sama teja so barani na jāī | baiṭhe rāma dvijanha siru nāī || janakasutā sameta raghurāī | pekhi praharaṣe muni samudāī || beda maṃtra taba dvijanha ucāre | nabha sura muni jaya jayati pukāre || prathama tilaka basiṣṭha muni kīnhā | puni saba bipranha āyasu dīnhā || suta biloki haraṣīṃ mahatārī | bāra bāra āratī utārī || bipranha dāna bibidha bidhi dīnhe | jācaka sakala ajācaka kīnhe || siṅghāsana para tribhuana sāī | dekhi suranha duṃdubhī bajāīṃ ||
रिशियों ने भगवान को देखा और उनका दिल प्यार से भर गया। तुरंत उन्होंने देवताओं का सिंहासन मंगवाया। राम की चमक सूरज जैसी थी, बता नहीं सकते। राम बैठे और ब्राह्मिण सर झुकाए। सीता के साथ राम सिंहासन पर बैठे। सब ऋषि देख के बहुत खुश हुए। ब्राह्मिणों ने वैदिक मंतर पढ़े। आसमान में देवता जय-जय करने लगे। पहले वशिष्ठ ने तिलक किया। फिर सब ब्राह्मिणों को आदेश दिया। माँ ने अपने बेटे को देखा और खुशी से आरती उतारी। ब्राह्मिणों ने बहुत तरह के दान दिए। सब लोग खुश हो गए। तीन दुनिया के स्वामी सिंहासन पर बैठे। देवता देख के ढोल बजाने लगे।
Verse 39 (छंद)
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।। भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते।।1।। श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।। मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।।2।।
nabha duṃdubhīṃ bājahiṃ bipula gaṃdharba kiṃnara gāvahīṃ | nācahiṃ apacharā bṛṃda paramānanda sura muni pāvahīṃ || bharatādi anuj bibhīṣana aṅgada hanumadādi sameta te | gahẽ chatra cāmara byajana dhanu asi carma sakti birājate ||1|| śrī sahita dinakara baṃsa būṣana kāma bahu chabi sohāī | nava aṃbudhara bara gāta aṃbara pīta sura mana mohāī || mukuṭāṅgadādi bicitra bhūṣana aṅga aṅganhi prati saje | aṃbhoja nayana bisāla ura bhuja dhanya nara nirakhaṃti je ||2||
आसमान में बड़े ढोल बजने लगे। गंधर्व और किन्नर गाने लगे। अप्सराएं नाचने लगी और देवी-मुनि लोग खुश हो गए। भरत और भाई लोग, विभीषण, अंगद, हनुमान और बाकी सब, साथ में खड़े थे। छता पकड़े, चामर झाड़े, तीर-कमान पकड़े, और चमक रहे थे। सीता के साथ सूर्यवंशी राजा आए जो प्यार से भी ज़्यादा सुंदर थे। उनका शरीर नए बादल जैसा और पीले कपड़े देवी लोग को पसंद आए। मुकुट, कंगन और अलग-अलग गहने हर अंग पे सज गए। कमल जैसी आँखें, चौड़ी छाती, बाजूवाल लोग, जिन्हे देखता है वो खुशनसीब है।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस। बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।12(क)।। भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम। बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम।। 12(ख)।। प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान। लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।12(ग)।।
vaha sobhā samāja sukha kahata na banai khagesa | baranahiṃ sārad seṣa śruti so rasa jāna mahesa ||12(ka)|| bhinna bhinna astuti kari gae sura nija nija dhāma | baṃdī beṣa beda taba āe jahã śrīrāma ||12(kha)|| prabhu sarbagya kīnha ati ādara kṛpānidhāna | lakheu na kāhū̃ marama kachu lage karana guna gāna ||12(ga)||
गरुड़, उस सभा की शोभा और खुशी का बात करना मुश्किल है। सरस्वती, शेषनाग और वेद भी लिखते हैं, लेकिन पूरा मज़ा सिर्फ महेश जानता है। अलग-अलग तरीके से तारीफ करके देवी लोग अपने घर चले गए। फिर वेद भी वहां आए, जहां श्री राम थे। सब कुछ जानने वाले प्रभु ने उनकी बहुत इज़्ज़त की। लेकिन कोई भी उनका असली मक़सद समझ नहीं पाया। उन्होंने उन्हे अपने गुण गाने लगा दिया।
Verse 41 (छंद)
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।। अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।। तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे। जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी। बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।। जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।। अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने। फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।। जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं। करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
jaya saguna nirguna rūpa rūpa anūpa bhūpa siromane | dasakaṃdharādi pracaṃḍa nisicara prabala khala bhuja bala hane || avatāra nara saṃsāra bhāra bibhaṃji dāruna dukha dahe | jaya pranatapāla dayāla prabhu saṃjukta sakti namāmahe ||1|| tava biṣama māyā basa surāsura nāga nara aga jaga hare | bhava paṃtha bhramata amita divasa nisi kāla karma gunani bhare | je nātha kari karunā biloke tribidhi dukha te nirbahe | bhava kheda chedana daccha hama kahũ raccha rāma namāmahe ||2|| je gyāna māna bimattta tava bhava harani bhakti na ādarī | te pāi sura durlabha padādapi parata hama dekhata harī | bisvāsa kari saba āsa parihari dāsa tava je hoi rahe | japi nāma tava binu śrama tarahiṃ bhava nātha so samarāmahe ||3|| je carana siva aja pūjya raja subha parasi munipatinī tarī | nakha nirgata muni baṃditā treloka pāvani surasarī | dhvaja kulisa aṃkusa kaṃja juta bana phirata kaṃṭaka kina lahe | pada kaṃja dvaṃda mukuṃda rāma rameśa nitya bhajāmahe ||4|| abhyaktamūlamanādi taru tvaca cāri nigamāgama bhane | ṣaṭ kaṃdha sākhā paṃca bīsa aneka parna sumana ghane | phala jugala bidhi kaṭu madhura beli akeli jehi āśrita rahe | pallavata phūlata navala nita saṃsāra biṭapa namāmahe ||5|| je brahma ajamadvaītamanubhavagamya manapara dhyāvahīṃ | te kahahũ jānahũ nātha hama tava saguna jasa nita gāvahīṃ | karuṇāyatana prabhu sadguṇākara deva yaha bara māgahīṃ | mana bacana karma bikāra taji tava carana hama anurāgahīṃ ||6||
जय हो आपको, रूप वाले और रूप से परे, गुण वाले और निर्गुण। आप जैसा कोई राजा नहीं। आपने रावण जैसे बड़े राक्षस को मार डाला। अपनी बाज़ूवाली ताकत से बुरी लोग को खत्म किया। आप इंसान बनके आए दुनिया का बोझ हल्का करने। बड़े दुख को जला दिया। जय हो आपको, जो झुकने वालों की रक्षा करते हैं। हम आपको नमस्ते करते हैं। आपकी माया बड़ी है, देवी, असुर, नाग, इंसान, सब उसमें फंसे हैं। दिन रात चलते फिरते हैं, काल, कर्म और गुणों में बंधे हैं। पर जिस पर आप दया की नज़र डालते हैं, वो तीन तरह के दुख से छूट जाते हैं। हे राम, भव का दर्द काटने वाले, हमारी रक्षा करो। हम आपको नमस्ते करते हैं। जो लोग ज्ञान का अहंकार में रहते हैं, भक्ति की कदर नहीं करते, वो देवी लोग के लिए भी मुश्किल पद पाते हैं, हम देखते हैं कि वो गिर जाते हैं। पर जो लोग आप पे भरोसा रखते हैं, सब आस छोड़के आपके दास बन जाते हैं, वो बिना मेहनत के भव पार कर जाते हैं। आपका नाम जपके। हे नाथ, हम आपको याद रखते हैं। आपके चरण शिव और ब्रह्मा पूजते हैं। मुनि की पत्नी ने जिस धूल को छुआ, वो पार हो गई। आपके नाखून से गंगा निकली, जो तीन दुनिया को साफ करती है। झंडा, वज्र, अंकुश, कमल, यह सब निशानियां हैं। जंगल में कांटे क्यों सताएंगे जिसके साथ आप हो? हे राम, मुकुंद, लक्ष्मी के स्वामी, हम आपके चरण कमल को हमेशा भजते हैं। हम दुनिया के पेड़ को नमस्ते करते हैं, जिसका जल बिन है, शुरू नहीं है। उसकी छाल चार वेद हैं। छह ढक्कन, पचास शाखाएं, और पच्चीस तत्व, बहुत पत्ती और फूल हैं। दो तरह के फल हैं, कड़वा और मीठा। और एक बेल है जो उसके साथ चिपकी है, जिसके सारे जीव सहारते हैं। हमेशा नए पत्ती और फूल आते रहते हैं, यह दुनिया का पेड़ है। जो लोग ब्रह्म को ध्यान में रखते हैं, जो न जन्मा, जो दूसरा नहीं, जो अनुभव से जाना जाता है, वो भी आपके सगुन रूप की तारीफ गाते हैं। हे दया के धार, गुणों का खजान, देवी यह वरदान मांगते हैं। मन, बानी और करम की बुराई छोड़के, हम आपके चरण से प्यार करते हैं।
Verse 42 (दोहा/सोरठा)
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।। बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर। बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
saba ke dekhata bedanha binatī kīnhi udāra | antardhāna bhae puni gae brahma āgāra ||13(ka)|| bainateya sunu saṃbhu taba āe jahã raghubīra | binaya karata gadagada girā pūrita pulaka sarīra ||13(kha)||
सबके सामने वेदों ने बड़ी इल्तिजा की। फिर वो गायब हो गए और ब्रह्मा के पास चले गए। सुन गरुड़, फिर शिव वहां आए जहां रघुवीर थे। उनकी आवानी रुक गई, शरीर में रोमांच आ गया।
Verse 43 (छंद)
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।। अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।। दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।। रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।। महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।। मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।। बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।। नहिं राग न लोभ न मान मदा।। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।। एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।। करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।। मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।। गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
jaya rāma ramā-ramaṇaṁ samanaṁ | bhava-tāpa bhayākula pāhi janaṁ || avadheśa sureśa rameśa vibho | śaraṇāgata māgata pāhi prabho ||1|| daśaśīsa bināsana bīsa bhujā | kṛta dūri mahā mahi bhūri rujā || rajanīcara bṛnda pataṅga rahe | sara pāvaka teja pracaṇḍa dahe ||2|| mahi-maṇḍala maṇḍana cārutaraṁ | dhṛta sāyaka cāpa niṣaṅga baraṁ || mada moha mahā mamatā rajanī | tama puñja divākara teja anī ||3|| manajāta kirāta nipāta kiye | mṛga-loka kubhoga sareṇa hiye || hati nātha anāthani pāhi hare | viṣayā bana pāṁvara bhūli pare ||4|| bahu roga biyoganha loka hae | bhavad-aṅghri nirādara ke phala e || bhava-sindhu agādha pare nara te | pada-paṅkaja prema na je karate ||5|| ati dīna malīna dukhī nitahīṁ | jinha ke pada-paṅkaja prīti nahīṁ || avalaṁba bhavaṁta kathā jinha ke | priya saṁta anaṁta sadā tinh keṁ ||6|| nahiṁ rāga na lobha na māna madā | tinh keṁ sama baibhava vā bipadā || ehi te tava sevaka hota mudā | muni tyāgata joga bharosa sadā ||7|| kari prema niraṁtara nema liyeṁ | pada-paṅkaja sevata suddha hiyeṁ || sama māni nirādara ādarahī | saba saṁta sukhī bicaranti mahī ||8|| muni mānasa paṅkaja bhṛṅga bhaje | raghubīra mahā raṇadhīra aje || tava nāma japāmi namāmi harī | bhava-roga mahāgada māna arī ||9|| guṇa śīla kṛpā paramāyatanaṁ | praṇamāmi niraṁtara śrī-ramaṇaṁ || raghu-naṁda nikaṁdaya dvaṁdva-ghanaṁ | mahipāla bilokaya dīna janaṁ ||10||
जय राम, लक्ष्मी के प्रिय, सब दुख मिटाने वाले। दुनिया की गर्मी और डर से लोगों की रक्षा करो। अयोध्या के स्वामी, देवी के स्वामी, लक्ष्मी के स्वामी, शरण में आने वालों की रक्षा करो। दस सिर वाले रावण को मार डाला, बीस हाथ वाले को खत्म किया। दुनिया से बड़े बड़े रोग दूर कर दिए। रात के राक्षस कीड़े जैसे जल गए, आपकी आग में। पूरी दुनिया का श्रृंगार, सबसे सुंदर। तीर, धनुष और क्विवर पकड़े हुए। आपकी चमक सूरज जैसी है, अहंकार, मोह और बड़ी ममता की अंधेरी रात को भगा देती है। इच्छा नाम के शिकारी को मार डाला। जीव लोग बुरी आदतों में फंसे, दुखी होकर भाग गए। हे नाथ, अनाथों की रक्षा करो। जो लोग विषयों के जंगल में भटक गए, उन्हे बचा लो। बहुत लोग बिमारी और जुदाई में फंसे हैं, यह आपके चरण की कदर न करने का फल है। लोग भव सागर में गिरते हैं जो आपके चरण कमल से प्यार नहीं करते। हमेशा दुखी, मैल और परेशान रहते हैं जिन्हे आपके चरण से प्यार नहीं है। पर जिनके सहारे आपकी कथा है, उनको अनंत संत प्यारे हैं। उनमें न राग, न लोभ, न अहंकार, न नशा। उनके लिए सुख और दुख बराबर है। इसलिए आपके सेवक खुश रहते हैं। मुनि लोग भी योगा छोड़के आप पे भरोसा करते हैं। हमेशा प्यार से, नियम पकड़के, आपके चरण कमल को सर्व करते हैं, साफ दिल से। बदनामी और इज़्ज़त को बराबर मानके, सब संत दुनिया में खुश घूमते हैं। मुनि के मन का कमल भ्रमर आपके चरण का रस पीता है। हे रघुवीर, बड़े योद्धा, जिसे कोई हरा नहीं। आपका नाम जपता हूं, आपको नमस्ते करता हूं, हे हरि, अहंकार का दुश्मन, भव रोग की बड़ी दवा। गुण, शील और दया का धार, मैं हमेशा लक्ष्मी के प्रिय को नमस्ते करता हूं। हे रघु कुल की शान, द्वैत के बादल काटने वाले, हे राजा, गरीब लोगों पे नज़र रखना।
Verse 44 (दोहा/सोरठा)
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग। पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।।
bāra bāra bara māgaũ harakhi dehu śrīraṅga | pada-saroja anapāyanī bhagati sadā sat-saṅga ||14(ka)||
मैं बार-बार यह दुआ माँगता हूँ कि आप खुशी से मुझे यह देंगे। भगवान, मुझे आपके चरणों में पक्की भक्ति मिले। और हमेशा अच्छे लोगों की कंपनी रहे। शिवजी ने राम के गुण गाकर खुशी से कैलास चले गए।
इसी अंश की फलश्रुति में कहा है कि ‘महाराज कर सुभ अभिषेका’ सुनने से नर को ‘बिरति-बिबेक’ मिलता है; सकाम जन ‘सुख-संपति’ पाते हैं और अंतकाल ‘रघुपति पुर’ जाते हैं; विरक्त-विषयी दोनों को ‘भक्ति-गति-संपति’ की नई उपलब्धि होती है तथा ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव भय’ का दमन होता है।
परम्परागत पाठ-प्रयोग में इस प्रकार के अभिषेक/स्तुति-प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संपुट) या ‘राम राम’ जप-संपुट जोड़ा जाता है; रामानन्दी/मानस-परायण परम्परा में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ को भी कीर्तन-संपुट रूप में रखा जाता है।
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