त्याग-धर्म की देहरी: राज-सुख और गृह-आसक्ति के बीच ‘राम-रजाइ’ (दैवी आज्ञा) को सर्वोच्च मानकर मन का राज्य ईश्वर को अर्पित करना। यह सोपान साधक को ‘स्व’ के अधिकार-बोध से निकालकर ‘सेवक-भाव’ और लोकहित-धर्म में प्रतिष्ठित करता है—जहाँ विरह (वियोग) ही वैराग्य का ईंधन बनता है।
यह प्रकरण ‘त्याग-धर्म की देहरी’ पर खड़ा है: (1) ‘रात्रि का पलक-सम बीतना’ समय की क्षणभंगुरता का प्रतीक है—सुख टिकाऊ नहीं, इसलिए आसक्ति का आधार भी अस्थिर। (2) राम-भरत का गुण-गान ‘प्रेम’ को धर्म-निर्णय की ऊर्जा बनाता है—यह भावुकता नहीं, ‘राम-रुख’ के अनुरूप विवेक है। (3) ‘राज-समाज/प्रातः’ निजी कक्ष से सार्वजनिक चौक तक का संकेत है—धर्म का क्षेत्र घर से निकलकर लोक-कल्याण बनता है। (4) देवताओं की स्वार्थ-चेष्टा यह दिखाती है कि बाह्य शक्तियाँ भी साधक को भ्रमित कर सकती हैं; कसौटी केवल ‘प्रभु-आज्ञा’ है। (5) भरत का सेवक-धर्म—राज्य/अधिकार को ‘स्व’ की संपत्ति न मानकर ‘प्रभु की अमानत’ मानना; मन का राज्य ईश्वर को अर्पित करना। कुल मिलाकर, करुण (वियोग) यहाँ शान्त (वैराग्य) की जननी है और दास्यभक्ति उसका स्थायी आसन।
चौपाई 290.1-4
राम भरत गुन गनत सप्रीती।निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।
राज समाज प्रात जुग जागे।न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई।बंदि चरन बोले रुख पाई।।
नाथ भरतु पुरजन महतारी।सोक बिकल बनबास दुखारी।।
सहित समाज राउ मिथिलेसू।बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा।हित सबही कर रौरें हाथा।।
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ।मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा।नरक सरिस दुहु राज समाजा।।
rāma bharata guna ganata saprītī |nisi daṁpatihi palaka sama bītī ||
rāja samāja prāta juga jāge |nhāi nhāi sura pūjana lāge ||
ge nahāi gura pahīṁ raghurāī |baṁdi carana bole rukha pāī ||
nātha bharatu purajana mahatārī |soka bikala banabāsa dukhārī ||
sahita samāja rāu mithilesū |bahuta divasa bhae sahata kalesū ||
ucita hoi soi kījia nāthā |hita sabahī kara raureṁ hāthā ||
asa kahi ati sakuce raghurāū |muni pulake lakhi sīlu subhāū ||
tumha binu rāma sakala sukha sājā |naraka sarisa duhu rāja samājā ||
राम और सीता प्यार से भरत के गुण गिन रहे थे, और उन्हें लगा रात पलक जैसी निकल गयी। सुबह दोनों राज दरबार जाग गए, नहाकर भगवन की पूजा में लग गए। राम नहाकर अपने गुरु के पास गया, उनके चरण छूए, और सही वक्त देखकर बोला। प्रभु, भरत, शहर के लोग और माँ सब दुखी हैं और इस जंगल की जिंदगी से परेशान हैं। मिथिला के राजा जनक अपने साथियों के साथ बहुत दिन से तकलीफ झेल रहे हैं। प्रभु, जो ठीक लगे वही कीजिए। सबका भला आपके हाथ में है। ये बोलकर राम को बहुत शरम आयी, और रिशि ने उनकी निर्मलता और स्वभाव देख खुशी से झूम गया। राम, आपके बिना दोनों दरबारों का सारा सुख सामान नरक जैसा है।
दोहा 290
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
prāna prāna ke jīva ke jiva sukha ke sukha rāma |tumha taji tāta sohāta gṛha jinhahi tinhahiṁ bidhi bāma ||290||
राम, तुम ज़िंदगी की ज़िंदगी हो, जीव के जीव हो, और खुशी की खुशी हो। तुम्हे छोड़ के जो अपने घर में सुखी होते हैं, बेटे, उनकी किस्मत उलटी हो गयी है।
चौपाई 291.1-4
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ।जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू।जहँ नहिं राम पेम परधानू।।
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं।तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।
राउर आयसु सिर सबही कें।बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ।भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।
करि प्रनाम तब रामु सिधाए।रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए।सील सनेह सुभायँ सुहाए।।
महाराज अब कीजिअ सोई।सब कर धरम सहित हित होई।।
so sukhu karamu dharamu jari jāū |jahã na rāma pada paṁkaja bhāū ||
jogu kujogu gyānu agyānū |jahã nahiṁ rāma pema paradhānū ||
tumha binu dukhī sukhī tumha tehīṁ |tumha jānahu jiya jo jehi kehīṁ ||
rāura āyasu sira sabahī keṁ |bidita kṛpālahi gati saba nīkeṁ ||
āpu āśramahi dhāria pāū |bhayau saneha sithila munirāū ||
kari pranāma taba rāmu sidhāe |riṣi dhari dhīra janaka pahiṁ āe ||
rāma bacana guru nṛpahi sunāe |sīla saneha subhāyã suhāe ||
mahārāja aba kījia soī |saba kara dharama sahita hita hoī ||
जिस खुशी में राम के चरणों की मोहब्बत नहीं है, उस खुशी को, उस करम को और उस धरम को जल जाना दो। जिस योग में राम का प्यार सबसे ऊपर नहीं है, वो योग गलत योग है। और जिस ग्यान में राम का प्यार सबसे ऊपर नहीं है, वो ग्यान ही अग्यान है। आपके बिना सब दुखी हैं, और आपके साथ सब खुश हैं। आप हर एक के दिल की बात जानते हैं। आपका हुकुम सब अपने सिर पर लेते हैं। और आपकी दया को सबकी हालत अच्छी तरह मालूम है। अब अपने पैर आश्रम में रख लीजिए। रिशियों के राजा को प्यार ने पकड़ लिया और वो कमजोर हो गए। फिर राम ने प्रनाम किया और निकल गए। रिषि ने अपने दिल को ठीक किया और जनक के पास पहुंचे। गुरु ने राजा को राम की बातें सुनाई, जिनमें राम का अपना प्यार और सीधा स्वभाव दिखता था। महाराज, अब वो काम कीजिए जिससे सबका भला हो और धरम भी साथ रहे।
दोहा 291
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।
gyāna-nidhāna sujāna suci dharama dhīra narapāla |tumha binu asamañjasa samana ko samaratha ehi kāla ||291||
राजा, आप ग्यान खजाने हो, समझदार हो, पाक साफ़ हो, और धरम में पक्के हो। इस वक्त इस उलझन को आप के सिवा और कौन सुलझा सकता है?
चौपाई 292.1-4
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे।लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं।आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।
रामहि रायँ कहेउ बन जाना।कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।
हम अब बन तें बनहि पठाई।प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी।भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।
समउ समुझि धरि धीरजु राजा।चले भरत पहिं सहित समाजा।।
भरत आइ आगें भइ लीन्हे।अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
तात भरत कह तेरहुति राऊ।तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।
suni muni bacana janaka anurāge |lakhi gati gyānu birāgu birāge ||
sithila sanehaṁ gunata mana māhīṁ |āe ihā̃ kīnha bhala nāhī ||
rāmahi rāyã kaheu bana jānā |kīnha āpu priya prema pravānā ||
hama aba bana teṁ banahi paṭhāī |pramudita phiraba bibeka baṛāī ||
tāpasa muni mahisura suni dekhī |bhae prema basa bikala biseṣī ||
samau samujhi dhari dhīraju rājā |cale bharata paiṁ sahita samājā ||
bharata āi āgeṁ bhai līnhe |avasara sarisa su-āsana dīnhe ||
tāta bharata kaha terahuti rāū |tumhahi bidita raghubīra subhāū ||
रिशि की बात सुन के जनक को बहुत प्यार आ गया। बाकी सबकी हालत देख के, उनका ग्यान और जग से अलग रहने की भावना भी और बढ़ गयी। प्यार से भर जाते हुए उनके मन में आया, "यहाँ आना मेरा भला नहीं हुआ।" "राजा दशरथ ने राम को बन जाने को कहा था, पर उन्होंने खुद अपने प्यारे बेटे के लिए जान दे के अपने प्यार का सबूत दे दिया।" "अब हमने उन्हे एक बन से दूसरे बन में भेज दिया है, और हम खुश होकर वापस जायेंगे, अपनी समझदारी की दाद देते हुए।" जब तपस्वी, रिशि और ब्राह्मणों ने यह सुना और देखा, तो वो भी प्यार के वश में आ गये और खास तरह से दुखी हो गये। वक्त समझ के राजा ने हिम्मत रखी और अपने साथियों के साथ भरत के पास चल दिया। भरत आगे आया उनसे मिलने, और वक्त के हिसाब से जितनी अच्छी सीट हो सकती थी, वो दी। तिरहुत के राजा ने कहा, "प्यारे भरत, रघु कुल के वीर राम का स्वभाव तुम्हे अच्छे से पता है।"
दोहा 292
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।
rāma satya-brata dharama-rata saba kara sīlu sanehu |saṅkaṭa sahata sakoca basa kahi-a jo āyasu dehu ||292||
राम अपने सच के वादे पर पक्का रहता है और धरम में लगा रहता है। सब के साथ अच्छे से पेश आता है और सब से प्यार करता है। शर्म और संकोच की वजह से तकलीफ सहता है, अपनी तरफ से कुछ नहीं बोलता। जो आदेश है उसे बता दो।
चौपाई 293.1-4
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी।बोले भरतु धीर धरि भारी।।
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू।कुलगुरु सम हित माय न बापू।।
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू।ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।
सिसु सेवक आयसु अनुगामी।जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।
एहिं समाज थल बूझब राउर।मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता।छमब तात लखि बाम बिधाता।।
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना।सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू।बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।
suni tana pulaki nayana bhari bārī |bole bharatu dhīra dhari bhārī ||
prabhu priya pūjya pitā sama āpū |kula-guru sama hita māya na bāpū ||
kausika-ādi muni saciva samājū |gyāna ambu-nidhi āpuna ājū ||
sisu sevaka āyasu anugāmī |jāni mohi sikha dei-a svāmī ||
ehiṁ samāja thala būjhaba rāura |mauna malina maiṁ bolaba bāura ||
choṭe badana kahauṁ baṛi bātā |chamaba tāta lakhi bāma bidhātā ||
āgama nigama prasiddha purānā |sevā-dharamu kaṭhina jagu jānā ||
svāmi dharama svārathahi birodhū |bairu aṁdha premahi na prabodhū ||
ये सब सुन के भरत के बदन में रोंगटे खड़े हो गए और आँखों में आँसू भर आए। उसने बहुत हिम्मत करके बात शुरू की। प्रभु, आप मुझे प्यारे हो और आपको मन्ना चाहिए, पिता जैसा। अपने हित में आप कुल के गुरु जैसे हो, न माँ इतनी दोस्त है न बाप। यहाँ विश्वामित्र और बाकी रिशि हैं, मंत्री हैं, पूरी सभा है, और आप खुद आज ज्ञान का सागर हो। जान लीजिए मैं एक बच्चा हूँ, एक नौकर हूँ, जो आपका हुकुम मानता है। मुझे समझाओ, स्वामी। इतनी बड़ी सभा में, ऐसी जगह पे आप मुझसे पूछ रहे हो। मैं तो दोषी हूँ, चुप रहना चाहिए, और अगर बोलूँगा तो पागल की तरह बोलूँगा। मैं छोटे मुँह से बड़ी बात कह रहा हूँ। माफ़ कर दो, पिता, क्योंकि मेरी किस्मत खराब है। तंत्र, वेद और पुराण सब में लिखा है, और दुनिया जानती है कि सेवा का धरम बहुत मुश्किल है। नौकर का धरम अपने स्वामी के लिए अपने फायदे के खिलाफ़ होता है। दुश्मनी अंधी होती है, और प्यार को समझाया नहीं जा सकता।
दोहा 293
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।
rākhi rāma rukha dharamu bratu parādhīna mohi jāni |saba keṁ sammata sarba hita kari-a pemu pahicāni ||293||
राम क्या चाहते हैं उसको ध्यान में रखना। धरम का व्रत भी रखना। मैं दूसरों पर निरोभ हूँ, यह जान कर। सबको थिक लगे ऐसी चीज करो जो सबके लिए अच्छी हो। मेरा प्यार पेहचान कर।
चौपाई 294.1-4
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ।सहित समाज सराहत राऊ।।
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे।अरथु अमित अति आखर थोरे।।
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी।गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
भूप भरत मुनि सहित समाजू।गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा।मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी।निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।
राम भगतिमय भरतु निहारे।सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।
सब कोउ राम पेममय पेखा।भउ अलेख सोच बस लेखा।।
bharata bacana suni dekhi subhāū |sahita samāja sarāhata rāū ||
sugama agama mṛdu mañju kaṭhore |arathu amita ati ākhara thore ||
jyau mukha mukura mukuru nija pānī |gahi na jāi asa adabhuta bānī ||
bhūpa bharata muni sahita samājū |ge jahã bibudha kumuda dvija-rājū ||
suni sudhi soca bikala saba logā |manahũ mīna-gana nava jala jogā ||
devã prathama kula-guru gati dekhī |nirakhi videha saneha biseṣī ||
rāma bhakti-maya bharatu nihāre |sura svārathī hahari hiyã hāre ||
saba kou rāma pema-maya pekhā |bhau alekha soca basa lekhā ||
भरत के बात सुन कर और उसका स्वभाव देख कर, जनक राजा और उनका पूरा दरबार सब ने उसकी तारीफ की। उसकी बात समझना आसान थी पर गहरी थी, नरम और प्यारी थी पर पक्की थी, और थोडे ही शब्द में बहुत ज्यादा मतलब था। जैसे चेहरा शीशे में दिखता है पर हाथ से पकडा नहीं जा सकता, वैसे ही उसकी अद्भुत बात थी, जो पकडी नहीं जा सकती। राजा, भरत और रिशी, पूरी सभा के साथ, वहां गए जहां राम थे, जो भगवानों के लिए कमल के फूल के लिए चांद जैसे थे। खबर सुन कर सारे लोग परेशान हो गए, जैसे मछलियां जब उनको नया पानी मिलता है। पहले भगवानों ने अपने कुल गुरु की हालत देखी, और फिर जनक का खास प्यार देखा। भरत को देखा जो पूरी तरह राम की भक्ति में डूबा था, और अपने मतलब के भगवान दिल से कांप गए। सब को राम के प्यार से भरा हुआ देखा, और उनका चिंता इतना बढ गया के हद पार कर गई, और वो अपनी परेशानी में बेबस रह गए।
दोहा 294
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।
rāmu saneha sakoca basa kaha sasoca surarāja |racahu prapañcahi pañca mili nāhi ta bhayau akāju ||294||
देवताओं के राजा इंद्र ने चिंता में कहा कि राम प्यार और झिझक में फंसे हुए हैं। सब मिलकर कोई प्लान बनाओ, वरना हमारा काम बिगड़ जाएगा।
चौपाई 295.1-4
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही।देबि देव सरनागत पाही।।
फेरि भरत मति करि निज माया।पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी।बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
मो सन कहहु भरत मति फेरू।लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी।सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।
सो मति मोहि कहत करु भोरी।चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।
भरत हृदयँ सिय राम निवासू।तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।
अस कहि सारद गइ बिधि लोका।बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।
suranha sumiri sāradā sarāhī |debi deva saranāgata pāhī ||
pheri bharata mati kari nija māyā |pālu bibudha kula kari chala chāyā ||
bibudha binaya suni debi sayānī |bolī sura svāratha jaṛa jānī ||
mo sana kahahu bharata mati pherū |locana sahasa na sūjha sumerū ||
bidhi hari hara māyā baṛi bhārī |sou na bharata mati sakai nihārī ||
so mati mohi kahata karu bhorī |caṁdinī kara ki caṇḍakara corī ||
bharata hṛdayã siya rāma nivāsū |tahã ki timira jahã tarani prakāsū ||
asa kahi sāradā gai bidhi lokā |bibudha bikala nisi mānahũ kokā ||
देवताओं ने सारदा को याद किया और उसकी तारीफ की. बोले, हे देवी, जो देवता आपकी शरण में आए हैं, उनकी रक्षा करो. अपनी माया का इस्तेमाल करके भरत का दिमाग मोड़ दो, और धोखे के पीछे छुप कर देवताओं की वंश को बचाओ. देवी समझदार थी. उसने देवताओं की गुजारिश सुनी, और उन्हें बेवकूफ और स्वार्थी जान कर जवाब दिया. तुम मुझे कहते हो कि मैं भरत का दिमाग मोड़ दूँ? हज़ार आँखों से भी सुमेरु पर्वत को तुम नहीं देख सकते. ब्रह्मा, विष्णु और शिव की माया कितनी बड़ी और तगड़ी है, फिर भी वो भरत का दिमाग नहीं पढ़ सकते. और तुम मुझे कहते हो ऐसे दिमाग को बेवकूफ बनाओ! ये जैसे धूप में चाँद की रोशनी से सूरज को चुरा लो. सीता और राम भरत के दिल में रहते हैं. जहाँ सूरज की रोशनी हो, वहाँ अँधेरा कैसे हो सकता है. ये कहकर सारदा ब्रह्मा की दुनिया में चली गई, और देवता उदास रह गए, जैसे रात में चक्रवाक पक्षी रोते हैं.
दोहा 295
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।
sura svārathī malīna mana kīnha kumantra kuṭhāṭu |raci prapañca māyā prabala bhaya bhrama arati ucāṭu ||295||
देवतास खुद का मतलब सोचते थे और उनका मन खराब था. इसलिए उन्होने गलत सलाह दी और बुरी चाल चली. उन्होने एक बहुत ताकतवार माया का जाल बनाया, जिसमे डर, भ्रम, बेसुकूनी और उदासी थी.
चौपाई 296.1-4
करि कुचालि सोचत सुरराजू।भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
गए जनकु रघुनाथ समीपा।सनमाने सब रबिकुल दीपा।।
समय समाज धरम अबिरोधा।बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
जनक भरत संबादु सुनाई।भरत कहाउति कही सुहाई।।
तात राम जस आयसु देहू।सो सबु करै मोर मत एहू।।
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी।बोले सत्य सरल मृदु बानी।।
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू।मोर कहब सब भाँति भदेसू।।
राउर राय रजायसु होई।राउरि सपथ सही सिर सोई।।
kari kucāli socata surarājū |bharata hātha sabu kāju akāju ||
gae janaku raghunātha samīpā |sanamāne saba rabikula dīpā ||
samaya samāja dharama abirodhā |bole taba raghubaṁsa purodhā ||
janaka bharata saṁbādu sunāī |bharata kahāuti kahī suhāī ||
tāta rāma jasa āyasu dehū |so sabu karai mora mata ehū ||
suni raghunātha jori juga pānī |bole satya sarala mṛdu bānī ||
bidyamāna āpuni mithilesū |mora kahaba saba bhā̃ti bhadesū ||
rāura rāya rajāyasu hoī |rāuri sapatha sahī sira soī ||
देवताओं के राजा इंद्रा ने बुरा प्लान बनाया। वो परेशान थे, क्योंकि सब कुछ भरत के हाथ में था, काम बनेगा या बिगड़ेगा। जनक राम के पास गए। राम, जो सूरज वंश की शान थे, उन्होंने सब को इज़्ज़त से स्वागत किया। तब रघु वंश के पुरोहित वशिष्ठ बोले। उनकी बात समय और सभा के हिसाब से थी और धरम के खिलाफ नहीं थी। उन्होंने जनक और भरत की बात-चीत सुनाई। और भरत की जो अच्छी बातें थी वो भी दोहराए। प्यारे राम, जो आदेश आप देंगे सब वो करें। यही मेरा विचार है। यह सुन कर राम ने दोनों हाथ जोड़ के बोला। उनकी आवाज़ सच्ची, सीधी और नरम थी। जब आप खुद और मिथिला के राजा हाज़िर हैं, तब मुझे बोलना बिल्कुल शोभा नहीं देता। आप और राजा जो भी आदेश देंगे, आपकी कसम, मैं उसको ज़रूर सिर पे ले लूंगा।
दोहा 296
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
rāma sapatha suni muni janaku sakuce sabhā sameta |sakala bilokata bharata mukhu banai na utaru deta ||296||
राम ने जब कसम खाई, तो सुन कर रिशि वसिष्ठ और जनक दोनों को शरम आई, और साथ में पूरी सभा की सबको। सब लोग भरत के चेहरे को देख रहे थे, क्योंकि किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
चौपाई 297.1-4
सभा सकुच बस भरत निहारी।रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा।बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।
सोक कनकलोचन मति छोनी।हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।
भरत बिबेक बराहँ बिसाला।अनायास उधरी तेहि काला।।
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे।रामु राउ गुर साधु निहोरे।।
छमब आजु अति अनुचित मोरा।कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई।मानस तें मुख पंकज आई।।
बिमल बिबेक धरम नय साली।भरत भारती मंजु मराली।।
sabhā sakuca basa bharata nihārī |rāmabaṁdhu dhari dhīraju bhārī ||
kusamau dekhi sanehu sãbhārā |baṛhata biṁdhi jimi ghaṭaja nivārā ||
soka kanakalocana mati chonī |harī bimala guna gana jagajonī ||
bharata bibeka barāhã bisālā |anāyāsa udharī tehi kālā ||
kari pranāmu saba kahã kara jore |rāmu rāu gura sādhu nihore ||
chamaba āju ati anucita morā |kahaũ badana mṛdu bacana kaṭhorā ||
hiyã sumirī sāradā suhāī |mānasa teṁ mukha paṁkaja āī ||
bimala bibeka dharama naya sālī |bharata bhāratī maṁju marālī ||
भरत देखता है कि सब लोग सभा में बोहोत शरम फील कर रहे हैं। वो राम के भाई हैं, और अपने दिल पर बोहोत कंट्रोल रखते हैं। वो समझते हैं कि अब वक्त सही नहीं है। अपने प्यार को रोक लेते हैं, जैसे रिशि अगस्त्य ने विंध्य पहाड़ को रोका था जब वो बढ़ता ही जा रहा था। भरत का दुख जैसे डेमन हिरन्याक्ष था, और उनका समझ जैसे ज़मीन थी जिसे वो ले गया। लेकिन उनके साफ साफ गुनों का झुंड जैसे दुनिया का गर्भ था, जिससे बचाने वाला निकला। भरत का समझ जैसे बड़ा सूवर रूप था, जिसने उस वक्त ज़मीन को बिना मेहनत के उठा लिया। हाथ जोड़ कर सब को प्रनाम करते हैं, और राम, राजा, गुरु और साधु सब से रिक्वेस्ट करते हैं। आज मेरा जो बिहेवियर था वो बोहोत गलत था, माफ कर दो। मेरा मुँह नरम है पर मैं कड़क बातें बोल रहा हूँ। अपने दिल में वो सरस्वती को याद करते हैं, और वो उनके दिमाग के मानसरोवर से उनके कमल जैसे मुँह में आ जाती हैं। भरत की बोली जैसा सुंदर हंस है, जिसमे साफ समझ, धरम और समझदारी भरी हुई है।
दोहा 297
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
nirakhi bibeka bilocananhi sithila sanehã samāju |kari pranāmu bole bharatu sumiri sīya raghurāju ||297||
भरत ने सोच समझ के आँखों से देखा कि सभी लोग वहाँ प्यार में ऐसे बी गए थे कि उनका जिस्म धीमा पड़ गया था। फिर उन सबको प्रणाम किया, और सीता और राम को याद किया जो रघु वंस के राजा थे, और बोलने लगा।
चौपाई 298.1-4
प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी।पूज्य परम हित अतंरजामी।।
सरल सुसाहिबु सील निधानू।प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।
समरथ सरनागत हितकारी।गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई।मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली।आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू।अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।
राम रजाइ मेट मन माहीं।देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई।प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।
prabhu pitu mātu suhṛda gura svāmī |pūjya parama hita ataṁrajāmī ||
sarala susāhibu sīla nidhānū |pranatapāla sarbagya sujānū ||
samaratha saranāgata hitakārī |gunagāhaku avaguna agha hārī ||
svāmi gosā̃ihi sarisa gosāī |mohi samāna maiṁ sāĩ dohāī ||
prabhu pitu bacana moha basa pelī |āyaũ ihā̃ samāju sakelī ||
jaga bhala poca ū̃ca aru nīcū |amia amarapada māhuru mīcū ||
rāma rajāi meṭa mana māhīṁ |dekhā sunā katahũ kou nāhīṁ ||
so maiṁ saba bidhi kīnhi ḍhiṭhāī |prabhu mānī saneha sevakāī ||
मेरे प्रभु ही मेरे पिता है, मा है, दोस्त है, गुरु है और स्वामी है। पूजने लायक है, मेरे सबसे बड़ा भलाई चाहने वाले हैं, और हर दिल की बात जानने वाले हैं। वो सीधे हैं, सच्चा और अच्छा स्वामी हैं, अच्छी सिफतों का खजाना हैं, जो उनके आगे झुके उनकी रक्षा करते हैं, सब कुछ जानते हैं और समझदार हैं। वो सब कुछ कर सकते हैं, जो उनसे शरण लेते हैं उनका भला करते हैं, अच्छाई पसंद करते हैं, और बुराई और पाप दूर करते हैं। स्वामी में मेरे प्रभु अपने स्वामी के बराबर हैं, और नौकर में मैं अपने आप के बराबर हूँ। मैं अपने स्वामी को गवाह मानता हूँ। अपने प्रभु और पिता की बात को छोड़ के, अपने मोह में फँस के मैं यहाँ आ गया, सब को साथ ले के। इस जगत में अच्छे भी हैं बुरे भी, ऊँचे भी हैं नीचे भी। एक तरफ अमृत और अमर होने का पद है, दूसरी तरफ जहर और मौत है। पर मैंने कही देखा या सुना नही कि कोई अपने मन में भी राम के हुकुम को मिटा सके। फिर भी मैंने हर तरह से हिम्मत की, और मेरे प्रभु ने उससे प्यार से की हुई सेवा मान ली।
दोहा 298
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
kṛpā̃ bhalāī āpanī nātha kīnha bhala mora |dūṣana bhe bhūṣana sarisa sujasu cāru cahu ora ||298||
हे भगवन, अपनी कृपा से तुमने मुझे अच्छा बना दिया। मेरे गलतियां भी अब सजावन लगती हैं, और मेरे नाम की अच्छी चर्चा चारो तरफ फैल गई है।
चौपाई 299.1-4
राउरि रीति सुबानि बड़ाई।जगत बिदित निगमागम गाई।।
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी।नीच निसील निरीस निसंकी।।
तेउ सुनि सरन सामुहें आए।सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।
देखि दोष कबहुँ न उर आने।सुनि गुन साधु समाज बखाने।।
को साहिब सेवकहि नेवाजी।आपु समाज साज सब साजी।।
निज करतूति न समुझिअ सपनें।सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी।भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना।गुन गति नट पाठक आधीना।।
rāuri rīti subāni baṛāī |jagata bidita nigamāgama gāī ||
kūra kuṭila khala kumati kalaṁkī |nīca nisīla nirīsa nisaṁkī ||
teu suni sarana sāmuheṁ āe |sakṛta pranāmu kiheṁ apanāe ||
dekhi doṣa kabahũ na ura āne |suni guna sādhu samāja bakhāne ||
ko sāhiba sevakahi nevājī |āpu samāja sāja saba sājī ||
nija karatūti na samujhia sapaneṁ |sevaka sakuca socu ura apaneṁ ||
so gosāĩ nahi dūsara kopī |bhujā uṭhāi kahaũ pana ropī ||
pasu nācata suka pāṭha prabīnā |guna gati naṭa pāṭhaka ādhīnā ||
आपका तरीका, आपकी मीठी बात और आपकी बड़ियाई पूरी दुनिया में जानी हुई है। वेद और शास्त्रों में भी इसकी तारीफ गाई गई है। जो लोग ज़लीम हैं, टेढ़े हैं, बुरे हैं, खराब दिमाग वाले हैं, पाप से लटके हुए हैं, नीच हैं, बिना गुण के हैं, कोई साहिब नहीं उनका, और शर्म खत्म हो गई है उनकी, उन सब ने भी जब आपका नाम सुना और आपके पास शेल्टर लेने आए, तोह आपने एक प्रणाम से ही उनको अपना बना लिया। उनके कोई दोष देख कर आपने कभी दिल में नहीं आए। और किसी एक गुण सुनते ही आपने साधुओं की सभा में उसकी तारीफ कर दी। कौन सा ऐसा और साहिब है जो अपने नौकर को इतना प्यार दे? आप खुद सब सामान और इंतेज़ाम सब उसके लिए कर देते हैं। आपने अपने किए हुए काम को सपने में भी नहीं सोचा। लेकिन नौकर का शर्म और जिझक अपने दिल में महसूस करते हैं और परेशान होते हैं। ऐसा मेरा भगवान है, दूसरा कोई ऐसा गुस्से वाला नहीं। हाथ उठा कर मैं यह कह रहा हूँ, यह मेरा वादा है। जानवर नाचता है और तोता पढ़ना सीख जाता है। लेकिन उनका गुण और उनका कौशल पूरी तरह उस नाच सिखाने वाले और उस्ताद पर ही डिपेंड करता है।
दोहा 299
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।
yoṁ sudhāri sanamāni jana kie sādhu siramora |ko kṛpāla binu pālihai biridāvali barajora ||299||
ऐसे अपने लोगों को ठीक करके उनकी इज्जत करके, वो उन्हें अच्छे लोगों के सिर की ताज जैसा बना देते हैं। बिना दयालु हुए कौन अपनी खुद की सिफत को ऐसे पकड़ के रखेगा?
परंपरागत मान्यता में भरत-चरित्र का पाठ ‘सेवक-भाव’, ‘विवेक’ और ‘राम-आज्ञा-निष्ठा’ को दृढ़ करता है; गृह-कलह/अधिकार-विवाद शांत होकर ‘लोकहित-धर्म’ की बुद्धि जागती है, तथा राम-वियोगजन्य करुण रस मन को शान्त-वैैराग्य की ओर मोड़ता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में दास्य-स्थापन हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सीयावर रामचंद्र की जय’ का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; विशेषतः ‘राम-रजाइ’ विषयक पंक्तियों के बाद ‘राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट प्रचलित है।
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