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वन-मार्ग ‘अन्तर्मुख साधना’ का सोपान है: जहाँ गृह-धर्म की संरक्षा (राज्य/समाज) से हटकर साधक ‘विरह, भय, और विवेक’ के माध्यम से आसक्ति-छेदन करता है। यहाँ सीता-वियोग ‘जीव की आत्म-विस्मृति’ और राम का अन्वेषण ‘नाम-स्मरण से पुनःस्वरूप-प्राप्ति’ का प्रतीक बनता है। जटायु-मोक्ष और शबरी-भक्ति इस सीढ़ी पर दो द्वार हैं—(1) करुणा द्वारा उद्धार, (2) नवधा-भक्ति द्वारा साधन-क्रम।
वन-मार्ग को ‘अन्तर्मुख साधना’ का सोपान बनाकर यह प्रकरण दिखाता है कि गृह-धर्म की बाह्य संरक्षा से हटते ही साधक के भीतर ‘विरह, भय, विवेक’ तीनों एक साथ जागते हैं। सीता का लक्ष्मण को आते देख ‘बाहिज चिंता’ करना—जीव का बाह्य-आधारों पर टिकना; और राम से अलग होने का भय—आत्म-विस्मृति की छाया। यही भय जब राम-स्मरण/शरणागति में ढलता है तो वह आसक्ति-छेदन का औजार बन जाता है। करुणा-सिद्धान्त (जटायु) और साधन-क्रम (शबरी की नवधा-भक्ति) इस सोपान के दो द्वार हैं: एक बताता है कि प्रेम-करुणा धर्म-न्याय से भी ऊँची होकर उद्धार करती है; दूसरा बताता है कि भक्ति कुल/बल/योग्यता से स्वतंत्र होकर ‘नाम’ के सहारे सेतु बनती है।
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परंपरा में जटायु-उद्धार और शबरी-प्रसंग का पाठ ‘करुणा-प्राप्ति, नाम-निष्ठा, और जाति-गर्व-क्षय’ का फलदायक माना जाता है। विशेषतः नवधा-भक्ति का श्रवण/पाठ भक्ति-स्थिरता और साधना-क्रम की बुद्धि देता है; पम्पा-वर्णन चित्त-शुद्धि (मानस-निर्मलता) का फल कहा जाता है।
सामान्य वैष्णव-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-जप को समपुट-रूप में जोड़ा जाता है; नवधा-भक्ति प्रसंग में कई पाठ-परंपराएँ ‘रामचरन-सरोज-रज’/‘सियावर रामचंद्र की जय’ उद्घोष को भी संगत मानती हैं। (स्थानीय संप्रदाय/पाठ-परिवार के अनुसार भेद मिलता है।)
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